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Sunday, December 30, 2012

छत्तीसगढ़ वास्तु - II

छत्तीसगढ़ में वास्तु कला का स्पष्ट और नियमित इतिहास भव्य कलात्मक देवालयों में झलकता है। पांचवीं-छठी सदी ईस्वी से आरंभ होने वाले इस क्रम की रचनात्मक गतिविधियां क्षेत्रीय विभिन्न राजवंशों से जुड़ी हुई हैं। आरंभिक क्रम में नल, शरभपुरीय और सोम-पाण्डु कुल हैं। राजनैतिक इतिहास के इसी कालक्रम में छत्तीसगढ़ अंचल में वास्तु प्रयोगों का स्वर्णिम युग घटित हुआ है। पत्थर और ईंटों पर ऐसी बारीक-सघन पच्चीकारी उकेरी गई है, उनका ऐसा सुसंहत संयोजन हुआ है कि देखते ही बनता है। वास्तुशास्त्र के निर्देश और प्रतिमा विज्ञान का मूर्तन, धार्मिकता से ओत-प्रोत है तो उसमें स्थापत्य विज्ञान और तकनीक का चमत्कार भी है और इसका संतुलित स्वरूप-आकार ही पूरी दुनिया को आकृष्ट करता है, हमें सिरमौर स्थापित कर देता है।

राजिम के रामचन्द्र मंदिर में प्रयुक्त स्थापत्य खंड और राजीव लोचन मंदिर, छत्तीसगढ़ के आरंभिक वास्तु की झलक युक्त हैं, जो नलवंशी/शरभपुरीय वास्तुकला से संबंधित माने जाते हैं। नल वंश की कला पर भौगोलिक और राजनैतिक कारणों से वाकाटक सम्पर्कों का प्रभाव रहा है। इसी वंश की अन्य स्थापत्य गतिविधियों में बस्तर के गढ़ धनोरा के वैष्णव और शैव मंदिर तथा भोंगापाल के मंदिर और बौद्ध चैत्य हैं। बस्तर तथा उससे संलग्न विशेषकर महाराष्ट्र की सीमा में तथा उड़ीसा और आंध्रप्रदेश की सीमाओं पर भी नल वास्तु के अन्य केन्द्र उद्‌घाटित हो सकते हैं।

शरभपुरीय शासकों के काल की रचनाओं के कुछ अवशेष उड़ीसा की सीमा और रायपुर क्षेत्र से ज्ञात हुए हैं किन्तु इनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र ताला स्थित लगभग छठी सदी ईस्वी के दो मंदिर हैं। मंदिर वास्तु के अपेक्षाकृत सुरक्षित अवशेषों में क्षेत्रीय इतिहास के ये प्राचीनतम उदाहरण हैं। जिठानी और देवरानी नाम से अभिहित इन मंदिरों में देवरानी अधिक सुरक्षित व पूर्वज्ञात है, जबकि जिठानी मंदिर की संरचना कुछ वर्षों पूर्व राज्य शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा कराये गए कार्यों से स्पष्ट हुई और इसी दौरान देवरानी मंदिर के प्रांगण से प्रसिद्ध, बहुचर्चित रूद्रशिव की प्रतिमा प्राप्त हुई, जो अब विश्व विख्‍यात है, लेकिन वास्तु शास्त्र के अध्येताओं के लिए आज भी ताला के मंदिर प्रबल जिज्ञासा और आकर्षण के केन्द्र हैं। डोनाल्ड स्टेड्‌नर, जोना विलियम्स, माइकल माएस्टर जैसे विदेशी अध्येताओं के अतिरिक्त देश के प्राचीन वास्तु के शीर्ष अधिकारी ज्ञाताओं डाक्टर प्रमोदचंद्र, कृष्णदेव और एम.ए. ढाकी ने ताला की वास्तु कला को देखा-परखा और सराहा है। डा. के.के. चक्रवर्ती के शोध का प्रमुख हिस्सा ताला पर केन्द्रित है, जिसमें स्थल की वास्तु कला का सांगोपांग अध्ययन किया गया है।

शिखरविहीन देवरानी मंदिर विस्तृत जगती पर निर्मित है, किंतु गर्भगृह, अन्तराल-मण्डप, अर्द्धमण्डप, सोपानक्रम तथा विभिन्न प्रतिमाओं की विशिष्टता रोचक है। सुदीर्घ वास्तु कला परम्परा से विकसित उच्च प्रतिमान, पूरी संरचना को भव्य आकर्षक बना देता है। दक्षिणाभिमुख विलक्षण जिठानी मंदिर में पूर्व तथा पश्चिम सोपानक्रम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। इस मंदिर का तल विन्यास असमान सतह वाला और स्तंभों से कोष्ठकों में विभक्त है, निश्चय ही ऐसी संरचनाएं स्थानीय शास्त्रीय वास्तु ग्रंथों के निर्देशों का परिणाम हैं। दोनों मंदिर मूलतः विशाल पाषाण खंडों से निर्मित हैं, किंतु संभवतः परवर्ती परिवर्धन में ईंटों का प्रयोग किया गया है। देवरानी मंदिर का पूरा चबूतरा, मूल संरचना के निचले हिस्से को ढंकते हुए ईंट निर्मित कोष्ठकों को पूर कर बनाया गया है।

इसके पश्चात्‌ पाण्डु-सोमवंशी स्थापत्य उदाहरणों की भरमार छत्तीसगढ़ में है, जिनमें मल्हार के देउर मंदिर के अतिरिक्त सभी महत्वपूर्ण सुरक्षित संरचनाएं ईंटों से निर्मित हैं। इस क्रम का आरंभिक चरण सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर है, जो हर्षगुप्त की विधवा महारानी वासटा द्वारा बनवाया गया है। लगभग सातवीं सदी का यह मंदिर, ईंटों पर मूर्त, छत्तीसगढ़ के वास्तु सौन्दर्य का अग्रगण्य उदाहरण है। बारीक नक्काशी, चैत्य गवाक्ष अलंकरण, कीर्तिमुख आदि मंगल लक्षणों के साथ तीनों दिशाओं में उकेरे गए कूट गवाक्ष सिद्धहस्त कारीगरों की प्रतिभा के प्रमाण हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार, पाषाण निर्मित है और सामने का भाग स्तंभों पर आधारित मण्डप था, जो मंदिर संरक्षण के पूर्व ही मलबे का ढेर बन चुका था।

मल्हार का पश्चिमाभिमुख देउर महत्वपूर्ण और विशाल है, जिसके वास्तु विन्यास में ताला के स्थापत्य की स्मृति सुरक्षित जान पड़ती है। यहां गर्भगृह, अन्तराल-मण्डप तथा अर्द्धमण्डप की भित्तियां कुछ ऊंचाई तक सुरक्षित हैं, लेकिन मंदिर शिखर विहीन है। गर्भगृह में लिंग पीठिका अवशिष्ट है। मंदिर की वाह्य भित्तियों में आरंभिक दक्षिण भारतीय वास्तु शैली का प्रभाव झलकता है। इसके पश्चात्‌ खरौद, पलारी, धोबनी, सिरपुर आदि स्थानों पर विशेष प्रकार के तारकानुकृति योजना पर ईंटों से निर्मित मंदिर हैं। खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर पुनर्संरचित है। इन्दल देउल ऊंची जगती पर पश्चिमाभिमुख निर्मित है और सौंराई या शबरी मंदिर मंडप युक्त है। पलारी का मंदिर अत्यंत सुरक्षित स्थिति में नयनाभिराम रूप में है और धोबनी के मंदिर का अग्रभाग क्षतिग्रस्त है। इसी प्रकार सिरपुर का राम मंदिर व कुछ अन्य अवशेष तारकानुकृति ईंट निर्मित संरचनाएं हैं। सिरपुर उत्खनन से उद्‌घाटित आनंदप्रभकुटी विहार और स्वस्तिक विहार साम्प्रदायिक समन्वय और सहजीवन की तत्कालीन भावना को तो उजागर करते ही हैं, छत्तीसगढ़ में मंदिर-इतर वास्तु प्रयोगों के भी उदाहरण हैं। अड़भार के ध्वस्त मंदिर की भू-योजना व अवशेष ही प्राप्त हैं, किन्तु यहां अष्टकोणीय योजना व दोहरा प्रवेश द्वार, क्षेत्रीय वास्तु विशिष्टता को रेखांकित करता है।

रायगढ़ के देउरकोना और पुजारीपाली में तथा सरगुजा अंचल के मुख्‍यतः डीपाडीह, बेलसर, सतमहला, भदवाही आदि स्थानों में भी तत्कालीन स्थापत्य उदाहरण मंदिर व मठ प्रकाश में आए हैं। देउरकोना का मंदिर पाषाण निर्मित है, किन्तु इसका दृश्य प्रभाव ईंटों की संरचना जैसा है। इस मंदिर में कालगत सभी विशेषताओं का दिग्दर्शन होता है। पुजारीपाली के अधिकांश अवशेष काल प्रभाव से नष्टप्राय हैं, किन्तु यहां भी तत्कालीन वास्तु शैली में ईंटों की संरचनाओं के प्रमाण सुरक्षित हैं। डीपाडीह में अधिकांश मंदिर परवर्तीकालीन हैं, किन्तु समकालीन स्मारकों में उरांव टोला का शिव मंदिर महत्वपूर्ण है। यह मंदिर भी विशिष्ट कोसलीय शैली का तारकानुकृति योजना पर निर्मित मंदिर है, जिसके समक्ष विशाल मण्डप के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। बेलसर का मुख्‍य मंदिर, देवटिकरा के देवगढ़ का मंदिर समूह व छेरका देउल, भदवाही स्थित सतमहला के मंदिरों में तत्कालीन ईंट-पाषाण मिश्रित प्रयोग, तारकानुकृति योजना और वास्तु कला साधना की पुष्ट परम्परा के दर्शन होते हैं।

इसके पश्चात्‌ का कालखंड लगभग ग्यारहवीं सदी ईस्वी से तेरहवीं सदी ईस्वी का है। इस काल में रायपुर-बिलासपुर में प्रमुखतः कलचुरि, दुर्ग-राजनांदगांव में फणिनाग, बस्तर में छिन्दक नाग, कांकेर के परवर्ती सोमवंश और रायगढ़ अंचल में कलचुरि-कलिंग सोम मिश्रित राजवंशों की वास्तु गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विस्तृत क्षेत्र रत्नपुर के कलचुरियों के अधीन रहा। कलचुरियों की रत्नपुर शाखा की वास्तु कला का प्रभाव शहडोल जिले के सीमावर्ती और अन्दरूनी हिस्सों के कुछ स्थलों तक दृष्टिगोचर होता है।

रत्नपुर कलचुरि शाखा का आरंभिक सुरक्षित उदाहरण तुमान से ज्ञात हुआ है। मूलतः तुम्माण संज्ञा वाला यह स्थल, रत्नपुर कलचुरियों की आरंभिक राजधानी भी था। यहां मुख्‍य मंदिर पश्चिमाभिमुख तथा शिव को समर्पित है। भू सतह पर आधारित संरचना-मूल से उन्नत विशाल मण्डप संलग्न है। खुले मण्डप में पहुंचने के लिए पश्चिम, उत्तर व दक्षिण तीन दिशाओं में सोपान व्यवस्था है। इस स्थापत्य विशिष्टता में उड़ीसा शैली के जगमोहन का साम्य दृष्टिगत होता है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार शाखों पर विष्णु के दशावतारों का अंकन रोचक और विशिष्ट है।

पाली का पूर्वाभिमुख महादेव मंदिर मूलतः बाणवंशी शासक मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा निर्मित कराए जाने की सूचना प्रवेश के सिरदल पर अभिलिखित है। जाजल्लदेव प्रथम के काल में मंदिर का कलचुरि शैली में पुनरुद्धार हुआ। जांजगीर का शिखर विहीन विष्णु मंदिर विशाल व ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर की अवशिष्ट मूल जगती पर आदमकद प्रतिमाएं व शास्त्रीय मान की अलंकरण योजना अनूठी और अपने प्रकार का एकमात्र उदाहरण है। इस चतुरंग-सप्तरथ मंदिर का मंडप वर्तमान में नहीं है। उत्सेध में भिट्‌ट, पीठ, जंघा, वरंडिका और शिखर मूल और शिखर शीर्ष का निचला भाग ही अवशिष्ट है। यह मंदिर कलचुरि वास्तु कला का सर्वाधिक विकसित और उन्नत उदाहरण है।

महानदी के दाहिने तट पर स्थित नारायणपुर के दो मंदिरों में जांजगीर के आस-पास स्थित विष्‍णु मंदिर और शिव मंदिर की साम्‍यता है। पूर्वाभिमुख मुख्‍य मंदिर विष्‍णु का है, किन्‍तु इसके गर्भगृह में मूल प्रतिमा नहीं है। प्रवेश द्वार पर शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर की भांति विष्‍णु के 24 स्‍वरूप हैं। ऐसा अंकन जांजगीर के विष्‍णु मंदिर की वाह्य भित्ति पर है। इस मंदिर की जंघा पर पश्चिम में नृसिंह व बुद्ध, उत्‍तर में वामन व कल्कि तथा दक्षिण में वराह व बलराम प्रतिमा है। साथ ही कृष्‍ण लीला के पूतना वध और धेनुकासुर वध के अतिरिक्‍त मिथुन प्रतिमाएं भी हैं। इसके साथ की संरचना जांजगीर के शिव मंदिर तुल्‍य छोटी व सादी, पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर है, जिसके प्रवेश द्वार पर द्वादश आदित्‍य का अभिकल्‍प है।

मल्हार का स्थानीय प्रचलित पातालेश्वर नामक मंदिर, यहां प्राप्त अभिलेख के आधार पर बारहवीं सदी ईस्वी का केदारेश्वर मंदिर, पश्चिमाभिमुख तथा निम्नतलीय गर्भगृह वाला है, किन्तु मंडप की योजना तुमान के सदृश्य है, जिसमें तीन दिशाओं से प्रवेश किया जा सकता है। गर्भगृह में काले पत्थर की लिंगपीठिका के त्रिकोणीय विवर में लिंग स्थापना है। आरंग का भाण्ड देउल जगती पर निर्मित भूमिज शैली का, तारकानुकृति योजना वाला जैन मंदिर है।

सरगुजा के त्रिपुरी कलचुरि काल के वास्तु अवशेष मुख्‍यतः डीपाडीह और महेशपुर से प्राप्त हुए हैं, जिनमें मध्ययुग के आरंभिक चरण की पुष्टता और सफाई दिखाई देती है। बस्तर में छिंदक नागवंशियों का केन्द्र बारसूर रहा, जहां विशाल गणेश प्रतिमाएं एवं चन्द्रादित्य, मामा-भांजा, बत्तीसा, बारा खंभा मंदिर तथा पेदम्मा गुड़ी महत्वपूर्ण स्मारक हैं। इस वास्तु शैली में सेउण देश, परमार और काकतीय वास्तु का साम्य दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार नारायणपाल, ढोंडरेपाल और छिन्दगांव के मंदिर भी उल्लेखनीय हैं, जबकि दन्तेवाड़ा, बस्तर गांव और गुमड़पाल के मंदिर स्पष्टतः द्रविड़ शैली के और काकतीयों से संबंधित माने जा सकते हैं।

कवर्धा के निकट भोरमदेव मंदिर स्पष्टतः भूमिज शैली का फणिनाग वंश से संबंधित अपने प्रकार का सर्वोत्कृष्ट नमूना है, यह परिसर और निकटस्थ क्षेत्र इस वंश के सुदीर्घकालीन गतिविधियों का केन्द्र रहा। ग्राम चौरा स्थित मड़वा महल और छेरकी महल तथा आसपास ही गण्डई, सिली-पचराही, बिरखा-घटियारी, देवरबिजा, धमधा और अन्य स्‍मारक-अवशेष देव बलौदा तक फैले हैं। कांकेर सोमवंश से संबंधित दुधावा बांध के डूब में आया देवखूंट शिव मंदिर, सिहावा का कर्णेश्वर मंदिर तथा रिसेवाड़ा और देवडोंगर के स्थापत्य अवशेष उल्लेखनीय प्रतिनिधि स्मारक हैं।

किरारी गोढ़ी, गनियारी, नगपुरा, शिवरीनारायण आदि स्थानों में भी समकालीन वास्तु कला के महत्वचूर्ण उदाहरण शेष हैं। कुटेसर नगोई, पंडरिया, भाटीकुड़ा, वीरतराई, कनकी आदि स्थानों में भी स्फुट अवशेष प्राप्त होते हैं। वास्तु कला के परवर्ती उदाहरण सरगांव, बेलपान, रतनपुर, चैतुरगढ़, डमरू, मदनपुर, चन्दखुरी, सहसपुर, आमदी-पलारी, खल्‍लारी आदि स्थलों के स्मारकों और अवशेषों में दृष्टिगोचर होता है। छत्तीसगढ़ में इस क्रम का परवर्ती चरण मराठाकाल में घटित हुआ, जिसके महत्वपूर्ण उदाहरण रतनपुर का कंठी देउल, रामटेकरी मंदिर और रायपुर का दूधाधारी मंदिर है।

छत्तीसगढ़ का विस्तृत उपजाऊ मैदानी क्षेत्र लगभग चारों ओर से पहाड़ियों, नदियों से घिरकर प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित देश का मध्यस्थ हिस्सा है, इसलिए विभिन्न राजवंशों का कालक्रम में स्थायित्व व निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रभाव संचार लगातार बना रहा, इसलिए इस क्षेत्र में राष्ट्रीय धारा के मूल तत्वों का प्रतिबिम्ब तो दिखाई देता ही है, अपनी मौलिकता और विशिष्टता भी सुरक्षित रही है, यही प्रवृत्ति छत्तीसगढ़ के वास्तु कला के विकसित होते, विभिन्न चरणों में देखी जा सकती है और सामान्य धारा की अनुभव सम्पन्न विशेषताओं में क्षेत्रीय और स्थानीय विचारधारा के साथ प्रयोगों का रंग घोलकर, परिणाम में हमारे समक्ष वास्तु कला का भव्य और चमत्कारिक किन्तु आकर्षक और आत्मीय प्रमाण, आज भी विद्यमान है।

(तस्वीर, एक भी नहीं, यह सब तो यहां आ कर और मौके पर जा कर देखें.)

लगभग 15 वर्ष पहले लिए गए मेरे नोट्स पर आधारित लेख का उत्तरार्द्ध, जिसका पूर्वार्द्ध यहां है.

Monday, December 24, 2012

छत्तीसगढ़ वास्तु - I

अनादि, अनंत, असीम और गूढ़। रहस्यगर्भा सृष्टि में प्रकृति- नदी, जंगल और पहाड़, हमारा परिवेश- पूरा दृश्य संसार और जन्मी है मनु की संतान। सृजन की संभावनायुक्त, रचना का बीज जाने कब से पल्लवित-पुष्पित हो रहा है। विचारशील मानव की इसी सृजनात्मकता ने अपनी सहोदरा दृश्‍य-प्रकृति की पृष्ठभूमि के साथ पूरी दुनिया में रचे-गढ़े हैं अपनी विरासत के निशान। अजूबे और विचित्र, कभी कलात्मक तो कभी कल्पनातीत। आदिमानव-पूर्वजों की यही अवशिष्ट वसीयत आज विरासत है, धरोहर है, मनु-संतान की सम्पन्नता है।

हमारे पूर्वज- आदि मानव ने यही कोई चालीस-पचास हजार साल पहले अपने निवास के लिए, प्रकृति के विस्तृत अंक में सुरक्षित और निजी कोष्ठ की तलाश की। पेड़ों पर, पेड़ के नीचे तलहटी में रात बिताने-सुस्ताने वाले मानव को पहाड़ियों की कोख-कन्दरा अत्यंत अनुकूल प्रतीत हुई, और मौसम की भिन्नता से बच कर, सुरक्षित निवास और परिग्रह केन्द्र की पहचान बन कर उसके लिए पहाड़ी गुफाएं अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी साबित होने लगीं, हजारों साल तक यही गुफाएं आखेटजीवी मानव का निवास बनी रहीं। मानव चेतना में वास्तु अथवा स्थापत्य का अभिकल्प, इसी रूप में पूरी दृढ़ता से अंकित है।

कृषिजीवी और पशुपालक मानव पहाड़ी-तलहटी से उतर कर मैदान की ओर बढ़ने लगा, तब उसे वापस अपने निवास- गुफाओं तक लौट कर जाना और पुनः जीवनचर्या के लिए मैदान में आना निरर्थक प्रतीत हुआ, इसीलिए तब आवश्यकता हुई मैदान पर ही अपने निवास रचने-गढ़ने की। आरंभ में लकड़ी, घास-फूस, पत्थर, मिट्‌टी प्राकृतिक रूप से प्राप्त सहज उपादानों का उपयोग कर उसने वास्तु-आवास की नींव रखी। कन्दरावासी मानव के आरंभिक मैदानी आवास, गुफाओं से मिलते-जुलते सामान्य प्रकोष्ठ रहे होंगे। वर्तमान में भी इसी आदिम शैली में जीवन निर्वाह करने वाली 'सबरिया' जाति के कुन्दरा में प्राकृतिक पहाड़ी कन्दरा की स्मृति विद्यमान है।

आरंभिक वास्तु परम्परा के स्फुट प्रमाण ही हमारे देश में उपलब्ध हैं, किन्तु इसका उत्स हड़प्पायुगीन सभ्यता में देखने को मिलता है, जहां व्यवस्थित नगर-विन्यास में ईंटों से निर्मित पक्की बहुमंजिली इमारतें, चौड़ी समकोण पर काटती सड़कें, स्नानागार, अन्नागार का सम्पूर्ण विकसित वास्तुशास्त्रीय उदाहरण- अवशेष प्रकाशित हुआ है। वैदिक ग्रंथों में ज्यामितीय नियमों के साथ देवालयों, प्रासादों का उल्लेख तो आता है, किन्तु इस काल में सभ्यता का व्यतिक्रम है, फलस्वरूप विकसित नगरीय सभ्यता के स्थान पर अपेक्षाकृत अस्थायी वास्तु संरचनाओं वाली सामूहिक निवास की ग्रामीण रीति की सभ्यता का अनुमान होता है।

तत्पश्चात्‌ लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व भारतीय मनीषियों ने वास्तुशास्त्र के अधिभौतिक और भौतिक सिद्धांतों पर सूक्ष्मता से गूढ़ विचार कर रचनाएं आरंभ कर दी थीं फलस्वरूप वैदिक साहित्य की पृष्ठभूमि पर पुराण, आगम, तंत्र, प्रतिष्ठा ग्रंथ, ज्योतिष और नीति ग्रंथों के प्रणयन में वास्तु कला संबंधी निर्देश विस्तार से मिलते हैं। साथ ही अपराजितपृच्‍छा, भुवन प्रदीप, मानसार, मानसोल्लास, मयमत, रूपमण्डन, समरांगण सूत्रधार, शिल्पशास्त्र, वास्तुपुरुष विधान, वास्तु शास्त्र, विश्वकर्मा विद्या प्रकाश आदि चौबीस प्रमुख शुद्ध वास्तुशास्त्रीय ग्रंथों का प्रणयन हुआ। इसके अतिरिक्त सैकड़ों अन्य महत्वपूर्ण तथा क्षेत्रीय ग्रंथ हैं। इस काल में वास्तु प्रयोगों और उदाहरणों की उपलब्ध जानकारी में अधिकांश स्मारक रचनाएं हैं, जिनमें स्तंभ या लाट और स्तूप प्रमुख हैं।

ईस्वी सन्‌ के पूर्व और पश्चात्‌ के लगभग दो सौ साल, भारतीय इतिहास का अंधकार युग है और इसी काल तारतम्य में संरचनात्मक के बजाय शिलोत्खात वास्तु प्रयोगों के उदाहरण मुख्‍यतः ज्ञात हैं, जिनमें चैत्य, गुहा, विहार की प्रधानता है। वास्तु-शिल्प विकास की वास्तविक प्रक्रिया का नियमित आरंभ, स्वर्ण युग- गुप्त काल में हुआ, जब वैचारिक धरातल पर अत्यंत सुलझे और प्रयोग के स्तर पर व्यवस्थित व सुगठित वास्तु प्रयोगों के परिणाम दिखने लगे, तबसे वस्तुतः वास्तु कला का इतिहास, मंदिरों के निर्माण का ही इतिहास है, जो मध्ययुग तक लगातार विकसित होता रहा।

छत्तीसगढ़ में भी वास्तु कला के स्फुट अवशेष लगभग सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी पूर्व के हैं, जिनमें मल्हार उत्खनन से उद्‌घाटित संरचनाएं हैं। संभवतः राजिम और आरंग के अवशेष भी इसके समकालीन हैं। इसके पश्चात्‌ छत्तीसगढ़ की विशिष्टता मृत्तिका दुर्ग यानि मिट्‌टी के परकोटे वाले गढ़ हैं, किन्तु इन गढ़ों का विस्तृत और गहन अध्ययन अब तक न होने से तथा वैज्ञानिक रीति से उत्खनन के अभाव में इनके कालगत महत्व को प्रामाणिक रूप से स्थापित नहीं किया जा सका है, तथापि वास्तु कला की दृष्टि से वर्तमान में उपलब्ध अवशेष ही तत्कालीन वास्तु प्रयास और मानवीय श्रम की गाथा गढ़ने के लिए पर्याप्त हैं। छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में ऐसे गढ़ संख्‍या में, छत्तीस से कहीं अधिक हैं, जो विस्तृत उपजाऊ क्षेत्र हैं। इनमें कही विशाल और ऊंचे प्रकार हैं तो कहीं ये प्राकार रहित हैं और कहीं-कहीं दोहरे प्राकार के प्रमाण भी हैं। कहीं ये वृत्ताकार, कहीं चतुर्भुज, कहीं अष्टकोणीय, कहीं दो द्वार वाले कहीं-कहीं आठ द्वार अथवा बारह द्वार वाले भी हैं, प्रसंगवश अड़भार को अष्टद्वार और बाराद्वार को द्वादश द्वार का अपभ्रंश माना जाता है। परिखा अथवा खाई, इन गढ़ों की सामान्य पहचान है, जिनमें खतरनाक जल-जन्तु छोड़े गए होंगे, आज भी ऐसे कई स्थानों की खाई और तालाबों में मगर पाए जाते हैं।

लगभग 15 वर्ष पहले लिए गए मेरे नोट्स पर आधारित लेख का पूर्वार्द्ध, जिसका उत्‍तरार्द्ध यहां है.

Friday, December 14, 2012

बुद्धमय छत्तीसगढ़

सोलहवें नक्षत्र विशाखा के मास में, षोडश कला युक्त चन्द्रमा की तिथि- वैशाख पूर्णिमा; बुद्ध के जन्म के साथ-साथ, सम्बोधि और निर्वाण की तिथि भी मानी गई है। इस तिथि पर आज हम बुद्ध का सामूहिक स्मरण करने के लिये एकत्र हैं। समाप्ति-आसन्न इस शताब्दी की परिस्थितयां, आशा और उल्लास के बदले गहन तिमिर निशा को उन्मुख हैं, तब इस बुद्ध पूर्णिमा की निर्मल, शीतल आभा, प्रेरणा की ऐसी किरण बन सकती है, जिसने पचीस सौ साले पहले भी मानव सम्यता का मार्ग प्रशस्त किया था।

गौतम बुद्ध के लिये एक प्राच्य अध्येता की टीप है- ''यदि उनके मरणोपरान्त, उनके वैश्विक प्रभावों का ही मूल्यांकन किया जाय, तब भी वे निश्चय ही भारत में जन्मे महानतम व्यक्ति थे।'' इस प्रभाव के आंकलन हेतु छत्तीसगढ़ अंचल से प्रकाश में आये पुरावशेष सक्षम हैं, किन्तु इसके पूर्व बुद्ध समग्र के प्रति बट्रेंड रसेल और अल्बर्ट आईन्सटीन के कथन उल्लेखनीय हैं। रसेल के शब्दों में- बुद्धिमता और गुणवत्ता की जिस ऊंचाई पर क्राइस्ट हैं, क्या इतिहास में वहां कोई और है - मुझे बुद्ध को इस दृष्टि से, क्राइस्ट से ऊपर रखना होगा। आइन्सटीन का विचार है कि यदि कोई धर्म आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय स्थापित कर सकता है, तो वह बौद्ध धर्म ही है। यही दृष्टिकोण आज बुद्ध स्मरण की वास्तविक प्रासंगिकता है।

बौद्ध पुरावशेष, विशेषकर बुद्ध प्रतिमाएं, आरंभिक काल में और हीनयान सम्प्रदाय में तो संभव नहीं हुई, किन्तु महायान और वज्रयान से लेकर जेन और नव-बौद्ध तक, जो कहीं न कहीं बुद्ध शिक्षा की मूल परम्परा का ही विकास है, इन सभी ने अपनी रचनात्मकता से भारतीय कला और परंपरा को सम्पन्न बनाया है। इसलिये बौद्ध प्रतिमाएं मात्र कलावशेष न होकर बौद्ध धर्मशास्त्र को भी रूपायित करती है। इनका निर्माण बौद्ध दर्शन और सम्प्रदाय के विचारों पर आधारित और विकसित बौद्ध प्रतिमा शास्त्र के मानदण्डों के अनुरूप हुआ है।

छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा का आरंभ नेपाली परम्परा के एक अपेक्षाकृत परवर्ती ग्रन्थ ''अवदान शतक'' के उल्लेख से किया जाना उपयुक्त होगा, जिसके अनुसार बुद्ध की चरण-धूलि से दक्षिण कोसल अर्थात्‌ वर्तमान छत्तीसगढ़ की भूमि भी पवित्र हुई है। एक अन्य महत्वपूर्ण विवरण प्रसिद्ध चीनी यात्री युवान-च्वांग (व्हेनसांग) का है, जिसने सातवीं सदी ईस्वी में सोलह वर्ष भारत में व्यतीत करते हुये प्रमुख बौद्ध केन्द्रों का भ्रमण किया था। उसने कलिंग (उड़ीसा) होते हुए उत्तर-पश्चिमी दिशा में पहाड़ों और जंगलों के रास्ते किआओ-सा-लो अर्थात्‌ (दक्षिण) कोसल में प्रवेश किया। वह लिखता है कि यहां के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और ऐसे भी लोग हैं जो बौद्ध धर्म को नहीं मानते। आगे विवरण मिलता हे कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता है। उसके आंकड़ों के अनुसार यहां के सौ बौद्ध विहारों में महायान सम्प्रदाय के लगभग दस हजार भिक्षु निवास करते हैं। उसने करीब सत्तर देव मंदिर भी देखे, जिनमें भक्तों की बड़ी भीड़ होती थी। तत्कालीन पुरावशेषों और इतिहास का उल्लेख करते हुये उसका कथन है कि राजधानी की दक्षिण दिशा में एक प्राचीन स्तूप था, जिसे अशोक ने निर्मित कराया था, इस स्थान पर तथागत ने अविश्वासियों को चमत्कार दिखाकर वश में किया था। बाद में इस विहार में नागार्जुन ने निवास किया था, तब इस देश का राजा सातवाहन था। युवान-च्वांग कोसल से आंध्र, कांचीपुरम्‌ की ओर आगे बढ़ा। वैसे तो युवान-च्वांग के कोसल और उसकी राजधानी पर विद्वानों का मतैक्य नहीं है, किन्तु सिरपुर के पुरावशेषों से उसके विवरण का सर्वाधिक साम्य प्रतीत होता है। प्रसंगवश सिरपुर की खुदाई से आठवीं सदी ईस्वी के चीनी शासक काई-युवान के सिक्के की प्राप्ति भी उल्लेखनीय है।
सिरपुर स्‍तूप

लगभग सातवीं सदी ईस्वी के शासक भवदेव रणकेसरी के भांदक (?) शिलालेख में शाक्य मुनि बुद्ध के मंदिर निर्माण की जानकारी है। इसी पाण्डुवंश के प्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के मल्हार ताम्रलेख में बौद्ध संघ को कैलासपुर नामक गांव दान में दिये जाने का उल्लेख है। बालार्जुन के काल में ही बौद्ध विहार, मंदिर और भिक्षुओं का उल्लेख सिरपुर से प्राप्त एक शिलालेख में आया है। युवान-च्वांग का कथन कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता था, शैव धर्मावलम्बी बालार्जुन के अभिलेखों और तत्कालीन निर्माण से मेल खाता है और उसकी धार्मिक उदारता और सहिष्णुता के परिचायक हैं।

कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम के रतनपुर शिलालेख के अनुसार रूद्रशिव स्वयं के व अन्य धर्म सिद्धातों के अतिरिक्त दिग्नाग के प्रामाणिक कार्य का भी ज्ञाता था। पृथ्वीदेव द्वितीय के कोनी शिलालेख प्रशस्ति का रचयिता काशल बौद्ध आगमों का ज्ञाता था। इन उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि बारहवीं सदी ईस्वी तक निश्चय ही छत्तीसगढ़ अंचल में बौद्ध धर्म का अध्ययन व उसका पर्याप्त सम्मान होता था। इसीलिये बौद्ध धर्म का ज्ञान किसी व्यक्ति के गुणों में विशेष रूप से उल्लेख किये जाने योग्य कारक होता था।

बौद्ध स्थापत्य अवशेषों की दृष्टि से अंचल के सिरपुर, मल्हार तथा भोंगापाल (बस्तर, नारायणपुर से 30 किलोमीटर) महत्वपूर्ण स्थल है। सिरपुर में 1954-55 में आरंभ हुई खुदाई से मुख्‍यतः आनंदप्रभकुटी विहार, स्वस्तिक विहार एवं कुछ अन्य बौद्ध विहार अवशेष प्रकाश में आये। आनंदप्रभकुटी विहार में मुख्‍य संरचना के साथ संलग्न पक्के धरातल वाले विशाल प्रांगण के चारों ओर कोठरियों की क्रमहीन पंक्तियां हैं। मुख्‍य संरचना की योजना वर्गाकार है, जिसमें उत्तर की ओर नक्काशीदार तोरण द्वार तथा द्वारपाल, यक्षों की प्रतिमाओं का स्थान निर्धारित है। सभामण्डप सोलह स्तंभ पीठिकायुक्त है। पृष्ठवर्ती कोठरियों की पंक्ति के मध्य भूस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की अतिमानवाकार प्रतिमा स्थापित है।

स्वस्तिक विहार का नामकरण उसकी विशिष्ट आकार की योजना के कारण निर्धारित हुआ। यहां मध्य में खुले आंगन के चारों ओर तीन-तीन कोठरियों की पंक्ति के साथ प्रमुख कक्ष में विशाल आकार की भूस्पर्श बुद्ध प्रतिमा है। दोनों विहारों में बुद्ध के साथ पद्‌मपाणि भी स्थापित हैं, जबकि स्वस्तिक विहार की खुदाई से लाल बलुए पत्थर की हारीति प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी। स्वस्तिक विहार के निकट ही पांच अन्य विहारों के अवशेष भी उद्‌घाटित हुए, जिनमें सामान्यतः खुला आंगन, चारों ओर कोठरियां और मध्य में उपास्य देव की स्थापना के लिये प्रधान कक्ष की योजना होती थी। इनमें से एक विशेष उल्लेखनीय विहार में विशाल मात्रा में कांच एवं सीप की चूड़ियां प्राप्त हुई हैं, जिससे अनुमान होता है कि यह भिक्षुणियों का विहार रहा होगा। इन्हीं विहारों में एक लघु स्फटिक स्तूप, सुनहला वज्र तथा बौद्ध मंत्र लेख युक्त मिट्‌टी की पकी मुहरों के साथ अभिलिखित बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

मल्हार में 1975 से आरंभ हुए उत्खनन के तृतीय काल (ईस्वी 300 से ईस्वी 650 तक) स्तर में शिव मंदिर, आवासीय अवशेषों के साथ वज्रयान सम्प्रदाय का बौद्ध मंदिर और चैत्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मंदिर के बीच ईंट रोड़े का धरातल बनाकर, उस पर पकी ईंटों का फर्श है। यहां हेवज्र की प्रतिमा स्थापित थी। मंदिर की योजना में प्रदक्षिणा पथ, बरामदा और पांच कक्षों का भी प्रावधान है। मल्हार उत्खनन की एक अन्य संरचना के पश्चिमी भाग में अर्द्धवृत्ताकार ऊंचे चबूतरे के संकेत मिले, जिस पर मुख्‍य प्रतिमा स्थापित रही होगी। यहीं चार द्वार स्तंभ, एक बड़े स्तूप संरचना की संभावना और बौद्ध प्रतिमाओं के साथ ही बौद्ध मंत्र अंकित विविध मृण्मुद्राएं तथा स्तूपाकार स्फटिक खंड भी प्राप्त हुआ।

बस्तर में बौद्ध स्थापत्य अवशेषों-स्तूप आदि का अनुमान पूर्व से किया जाता रहा, किन्तु बौद्ध स्थापत्य के पुष्ट प्रमाण 1990 की खुदाई से उजागर हुये। भोंगापाल नामक ग्राम में लगभग पांचवीं-छठी सदी ईस्वी के शैव व शाक्त मंदिरों के साथ एक विशाल आकार (36×34×5.5 मीटर) के टीले से ईंट निर्मित चैत्य के अवशेष प्रकाश में आए, जिस पर पूर्व से ही पद्‌मासन ध्यानी बुद्ध की प्रतिमा अवस्थित थी। अर्द्धवृत्ताकार पृष्ठ वाले सर्वांग चैत्य की योजना में चबूतरा, मंडप, प्रदक्षिणा पथ, गर्भगृह, बरामदे एवं पार्श्वकक्ष है। दुर्गम महाकान्तार की तत्कालीन स्थितियों में नल शासकों के काल में हुए इस चैत्य का निर्माण धार्मिक समन्वय व सद्‌भाव के साथ बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का प्रबल प्रमाण है।

हीनयान की मूर्तिकला में मुख्‍यतः जातक कथाओं, यक्ष-यक्षिणियों और लोक जीवन के दृश्यों के साथ बुद्ध को उनके प्रतीकों, यथा- चक्र, छत्र, बोधिवृक्ष, चरण चिन्ह आदि अंकनों से प्रदर्शित किया गया है, जबकि महायान और वज्रयान की कला के माध्यम से बौद्ध देवकुल के ध्यानी बुद्ध मानुषी बुद्ध, शाक्य मुनि गौतम और बोधिसत्वों के साथ ही बुद्ध और बोधिसत्वों की शक्तियां तारा की अवधारणा और प्रतिमा शास्त्र के अनुरूप प्रतिमाओं का निर्माण आरंभ हुआ। ध्यानी बुद्धों में अमिताभ, अक्षोम्य, वैरोचन, अमोघसिद्धि और रत्नसंभव क्रमशः पांच अधिभौतिक तत्वों संज्ञा, विज्ञान, रूप, संस्कार और वेदना का रूपांकन है। शाक्य मुनि गौतम को मुख्‍यतः ध्यान, भूस्पर्श और धर्मचक्र मुद्रा में प्रदर्शित किया जाता है। बोधिसत्वों में प्रमुख मैत्रेय, पद्मपाणि अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और वज्रपाणि हैं। इनमें मैत्रेय, भावी बोधिसत्व होते हुए भी बोधिसत्व के रूप में मान्य हैं। पद्मपाणि, बोधिसत्वों में प्रधान और दयापूर्ण है। मंजुश्री, बुद्धि को प्रखर कर, मूल और मिथ्या का नाश करने के लिये खड्‌ग धारण करते हैं और अपेक्षाकृत कठोर बोधिसत्व, वज्रपाणि पाप और असत्‌ के शत्रु हैं। तारा के साथ अन्य देवियों, व्यन्तर देवताओं और हिन्दू देवताओं के वज्रयानी स्वरूप की निर्माण परम्परा भी ज्ञात होती है।

छत्तीसगढ़ अंचल से प्राप्त बौद्ध प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिरपुर की धातु प्रतिमाएं हैं। लगभग सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी में सिरपुर धातु प्रतिमा निर्माण का केन्द्र था। यहां प्रतिमाओं को टुकड़ों में अलग-अलग ढालकर जोड़ लिया जाता था इसके वस्त्राभूषण गढ़कर उस पर सोने का मुलम्मा कर, आंखों में चांदी का जड़ाव, बालों में काला रंग, ओंठ पर ताम्बे का रंग चढ़ाकर अंत में असली रत्नों सहित आभूषण से अलंकृत किया जाता था। सिरपुर से लगभग 25 धातु प्रतिमा की दुर्लभ निधि 1939 में अनायास श्रमिकों के हाथ लगी (कहीं कहीं यह संखया 44 और 60 भी बताई गई है), जिसमें से छः मूर्तियां तत्कालीन मालगुजार ने विभिन्न लोगों को भेंट में दे दी। दो प्रतिमाएं मुनि कांतिसागर को प्रदान की गई, उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली तारा की प्रतिमा को मुनि ने भारत विद्या भवन, मुम्बई को सौंप दिया, किन्तु यह प्रतिमा आजकल लास एंजिलिस, अमरीका के काउन्टी म्यूजियम में प्रदर्शित है। इस निधि की ग्यारह प्रतिमाएं रायपुर संग्रहालय में है जिसमें तीन प्रतिमाएं बुद्ध की, चार पद्मपाणि की, एक वज्रपाणि की, दो मंजुश्री की तथा एक तारा की है। इसके साथ ही खुदाई से प्राप्त भूस्पर्श बुद्ध की लघु प्रतिमा कला प्रतिमान की दृष्टि से उच्च कोटि की है। सिरपुर की यह निधि न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि संपूर्ण भारतीय कला की अनुपम निधि है।

सिरपुर से प्राप्त पाषाण बौद्ध प्रतिमाओं में कनिंघम को प्राप्त विशाल प्रतिमा शीर्ष, विहारों से प्राप्त प्रतिमाओं के अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर की भूस्पर्श बुद्ध की लगभग डेढ़ मीटर ऊंची प्रतिमा उल्लेखनीय है। प्रतिमा पार्श्व में पारंपरिक सिंह व्याल के स्थान पर मेष व्याल का अंकन है। प्रतिमा के साथ मोर व सर्प का भी अंकन है अतएव इसकी पहचान अक्षोभ्य से भी की गई है। गंधेश्वर मंदिर की एक अन्य प्रतिमा पर उड़ीसा कला शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है इस प्रतिमा के उष्णीश-शीर्ष पर बौद्ध मंत्र अभिलिखित है। प्रतिमा का सौम्य भाव मुग्ध करने में सक्षम है। रायपुर संग्रहालय में भी सिरपुर से प्राप्त बौद्ध पाषाण प्रतिमाएं सुरक्षित है, जिनमें पद्मपाणि एवं तारा के साथ स्थानक बुद्ध प्रतिमा महत्वपूर्ण है। कमलासन पर स्थित तीनों प्रतिमाएं लय और भंगिमा की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक है, जिसमें कलाकार के सुदीर्घ कलाभ्यास से विकसित उत्कर्ष के सहज दर्शन होते हैं। इसके अतिरिक्त सिरपुर के स्थानीय संग्रह में भी कुछ आकर्षक बौद्ध प्रतिमाएं सुरक्षित हैं।

मल्हार में बुद्ध की भूस्पर्श प्रतिमा, ध्यानी बुद्ध, हेवज्र, पद्मपाणि, तारा तथा विशेष उल्लेखनीय बोधिसत्व प्रतिमा है। इस चतुर्भुजी आसनस्थ प्रतिमा का अलंकरण चक्राकार कुंडल, ग्रैवेयक, कटिबंध, केयूर आदि से किया गया है। प्रतिमा के ऊपरी भाग में विभिन्न मुद्राओं में पांच ध्यानी बुद्ध तथा तारा व मंजुश्री अंकित है। मल्हार स्थानीय संग्रहालय के एक स्तंभ पर बुद्ध के जीवन चरित का अंकन किया गया है। ग्राम के एक निजी भवन में प्रयुक्त, प्राचीन अलंकृत स्तंभ भी उल्लेखनीय है, जिस पर कच्छप और उलूक जातक के कथानकों का दृश्यांकन है। मल्हार से संलग्न ग्राम जैतपुर से विविध बौद्ध प्रतिमाएं ज्ञात हैं। मल्हार के स्थानीय संग्रह तथा ग्राम में विभिन्न स्थानों पर भी बौद्ध प्रतिमाएं देखी जा सकती है। कला शैली के आधार पर यह स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है कि मल्हार सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी से बारहवीं सदी ईस्वी तक बौद्धों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है और यहां हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों का जैन और बौद्ध सम्प्रदाय के साथ सह-अस्तित्व था। तत्कालीन यह वातावरण वर्तमान के लिये प्रेरक होकर अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल के अन्य स्थलों, यथा-हथगढ़ा (रायगढ़), राजिम, आरंग, तुरतुरिया आदि से भी महत्वपूर्ण बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। एक विशेष प्रतिमा खैरागढ़ विश्वविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षित है। इस मानवाकार बुद्ध प्रतिमा के परिकर में बुद्ध के जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा परिनिर्वाण का दृश्यांकन है। रतनपुर से प्राप्त बुद्ध की भूस्पर्श मुद्रा की एक प्रतिमा, बिलासपुर संग्रहालय के संग्रह में है। छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों के साथ अंचल की परम्परा का संक्षिप्त उल्लेख समीचीन होगा। जिला गजेटियर की सूचना के अनुसार तुरतुरिया में बौद्ध भिक्षुणियों का मठ था। सरगुजा के मैनपाट की आधुनिक संरचनाओं में विद्यमान वहां के धार्मिक वातावरण को आत्मसात करते ही बौद्ध धर्म की काल निरपेक्ष पवित्रता का आभास सहज सुलभ हो जाता है और अन्ततः बिलासपुर में भी वार्ड क्रमांक 33 में एक आधुनिक किन्तु उपेक्षित मंदिर है, जहां बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है।

बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा करते हुए यह स्वाभाविक स्मरण होता है कि इस भूमि से प्रारंभ और विकसित यह धर्म देश में पुरावशेषों के अनुपात में अत्यल्प अवशिष्ट रह गया था। 1951 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 2487 बौद्ध मतावलम्बी थे, किन्तु 1961 की जनगणना में बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्‍या 32,50,227 हो गई। निश्चय ही यह बौद्ध धर्म के पुनरूद्धार का दौर है। आज के इस वक्तव्य को रंजीत होसकोटे के उद्धरण से विराम देता हूं। धर्म-दर्शन विषय के टीकाकार होसकोटे ने हाल के वर्षों में बौद्ध धर्म के नैतिक एवं राजनैतिक पक्षों पर भारत के दलित वर्ग के विशेष संदर्भ में व्यापक कार्य किया है। होसकोटे का बुद्धवचन का निरूपण है- ''बुद्ध के लिये आनंद हमसे घृणा करने वालों से घृणा करने में नहीं अपितु ऐसी भावनाओं से दूषित होने के नकार में है- जो घातक सोच के दबाव से मुक्ति है।''

सम्यक विचार मंच, बिलासपुर द्वारा बुद्ध जयंती दिनांक 30 अप्रैल 1999 को ''अतीत-वर्तमान'' श्रृंखलान्तर्गत प्रेस क्लब बिलासपुर में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुत मेरा आलेख। यह व्याख्‍यान, आधार वक्तव्य बन गया और इसके बाद बौद्ध परम्परा पर लंबी चर्चा हुई थी, जिसमें भाग लेने वाले चित्र में दिखाई दे रहे हैं- आयोजक सर्वश्री कपूर वासनिक, राजेश तिवारी, डा. चन्द्रशेखर रहालकर, आनंद मिश्र, नंद कश्यप, प्रदीप पाटिल, शाकिर अली, सी के खाण्‍डे, रत्‍नाकर पहाड़ी, डा. हेमचन्‍द्र पांडे, डा. आर जी शर्मा, उदय प्रताप सिंह चंदेल, रोहिणी कुमार बाजपेयी आदि।

हाल के वर्षों में, जिसका विवरण यहां नहीं है, मुख्‍यतः सिरपुर उत्‍खनन से महत्‍वपूर्ण बौद्ध अवशेष, यहां विहार व स्‍तूप के चित्र लगाए गए हैं, प्रकाश में आए हैं।

Friday, December 7, 2012

ब्‍लागरी का बाइ-प्रोडक्‍ट

आप सभी वेब परिचित, प्रत्‍यक्ष मुलाकात तक अन्‍तरिक्षीय देवों की तरह होते हैं, इसलिए यहां, आपके 'सामने' ईमानदार बना रह सकना आसानी से संभव हो जाता है, ज्‍यों कन्‍फेशन बाक्‍स की सचबयानी।

पड़ोसी और अजनबी-परदेसी से बात छुपाने का औचित्‍य नहीं होता, पड़ोसी को पता चलनी ही है, अजनबी को क्‍या लेना-देना बातों से और उसके साथ सब बातों को परदेसी हो जाना है। आप सब तो बगल में होकर भी परदेसी हैं, फिर आपसे क्‍या दुराव-छिपाव।

माना कि दीवारों के भी कान होते हैं मगर 'आनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पालिसी' ... कभी सच भी तो सर चढ़कर बोलने लगता है, प्रियं ब्रूयात से अधिक जरूरी सत्‍यं ब्रूयात हो जाता है।

वैसे सच और ईमानदारी के पीछे अगर कोई कारण होते हैं, वह सब लबार के लिए भी लागू हो जाते हैं, ज्‍यों शराबी बाप के दो बेटों में एक शराब पीने लगा, क्‍योंकि उसका बाप शराबी था और दूसरा शराब से नफरत करता, कारण वही कि उसका बाप शराबी था। या दार्शनिक वाक्‍य- 'जो सुख का कारण है, वही दुख का कारण बनता है।' बहादुरशाह ज़फर की कही-अनकही है-
कहां तक चुप रहूं, चुपके रहे से कुछ नहीं होता,
कहूं तो क्‍या कहूं उनसे, कहे से कुछ नहीं होता।

परोक्ष मुलाकात की धूमिल ही छवि है स्‍मृति में। चलिए आपसे प्रत्‍यक्ष होने के अवसर की प्रतीक्षा रहेगी। आपकी टिप्‍पणी में प्रशंसा है, अस्‍वीकार कैसे करूं, लेकिन सचाई यह है कि साहित्‍य से सीधा कुछ रिश्‍ता रहा नहीं। कभी लिपि की दिशा से, कभी संस्‍कृति तो कभी इतिहास-पुरातत्‍व के माध्‍यम से लिखना-पढ़ना साधने की कोशिश करता हूं, मुझे पता है जैसा चाहता हूं वैसा ठीक सधता नहीं, लेकिन मैं भी पीछा छोड़ता नहीं। 

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लेकिन कुछ समय के लिए तुम्‍हें सचमुच नास्तिक मान बैठा था, तुम तो पक्‍के आस्तिक निकले, साम्‍यवाद पर ऐसी आस्‍था, चकित हूं मैं।

मैं तो मंदिर जाता हूं, कुछ कर्मकाण्‍डों का अनुकरण भी कर लेता हूं मन नहीं रमता उसमें, लेकिन लगता है कि कुछ चीजें जिनसे न लाभ न हानि, उनसे सहमति-असहमति से निरपेक्ष रह कर नकल निभा लेने में हर्ज नहीं, क्‍योंकि गांठ बांधकर विरोध भी तो एक तरह का आकर्षण है, आसक्ति है, वह सिर्फ विरोधी नहीं रह जाता। निरासक्‍त रहना ही सच्‍ची नास्तिकता है और तभी वह आस्तिकता जैसी पवित्र और सम्‍मानजनक है। हां, मैं ताबीज, गंडा नहीं बांधता, भौतिक या वैचारिक दोनों तरह के, अंगूठी, नग-पत्‍थर नहीं धारण करता और नाम जपन, नियमित दीप-धूप-अगरबत्‍ती भी नहीं करता यह सूचना के बतौर बता रहा हूं, क्‍योंकि इसकी घोषणा भी आसक्ति और आस्तिकता ही है, ''न के प्रति आसक्ति।''

कुछ संस्‍थाएं हैं आसपास, एक सद्यजात छोड़े बच्‍चों को पालती है, एक मानसिक विकलांग महिलाओं की देखरेख करती है और एक बुजुर्गों का जतन। जब भी मन खिन्‍न होता है, कमजोर होता है या किसी भौतिक, मानसिक जीत का जश्‍न मनाने का उत्‍साह बेकाबू होता है तो इन्‍हीं तीन का स्‍मरण करता हूं या अवसर निकाल कर स्‍वयं जाता हूं। मंदिर जा कर या भगवान को याद कर वैसा नहीं महसूस कर पाता, जैसा औरों से सुनता हूं, पढ़ा है। यह भी स्‍पष्‍ट कर दूं कि इनमें पहली हिन्‍दू संस्‍था द्वारा, दूसरी इसाईयों की और तीसरी नाम ध्‍यान न रही संस्‍था, वहां के एक सक्रिय मुस्लिम सदस्‍य का जिक्र हुआ था, द्वारा संचालित है, संयोगवश। 

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पत्रकार अक्‍सर 'खोजी' होते हैं और उनकी खोज अपने-अपने 'सत्‍य की खोज' की तरह नित नूतन पहली बार ही होती है यानि जिसे उसने पहली बार जाना, वह पहली बार ही जाना गया है और वही इसे उजागर कर यह 'सत्‍यार्थ प्रकाश' फैला रहा है। अखबारों का 'दुर्लभ', 'पहली बार', 'नया', 'एक्‍सक्‍लूसिव-बाइलाइन' और अब तक अनजाना- 'रहस्‍योद्घाटन' अक्‍सर ऐसा ही होता है, लेकिन शायद यही शोध और खोज का फर्क है। यह पत्रकारों की मेहनत को कमतर आंकना नहीं है, लेकिन आम प्रवृत्ति लगभग इसी तरह प्रकट होती रहती है, यह मीडिया की विश्‍वसनीयता को कम करती है। इन सबके पीछे समय सीमा का तर्क होता है यानि अखबार, जो रोज छपते हैं और चैनल, जिन्‍हें 24 घंटे कुछ न कुछ परोसना है और सबसे पहले। 'एक-दिवसीय इतिहास बन रहा है और अखबार क्‍या तवारीख भी रद्दी में बिक रहा है।'

इम्‍पैक्‍ट फीचर, साफ्ट स्‍टोरी और पेड न्‍यूज के बीच की क्षीण सी रेखा कभी आभासी मात्र जान पड़ती है। रील-रियल से रियलिटी शो और लाइव का गड्ड-मड्ड... ठीक-ठाक प्रूफ (रीडिंग) न होने से भी एडवरटोरियल, एडिटोरियल हो सकता है। 'जब मिल बैठेंगे तीन यार...', जैसे उद्घोष के साथ शराब निर्माता मिनरल वाटर और सोडा भी बनाते-बेचते हों तो शराबी को थोड़ी आसानी हो जाती है लेकिन पानी के ग्राह‍क को शराबी समझ लेने की गलती भी आसानी से हो सकती है।

समाचार-पत्र/मीडिया, पत्रकारों की छवि और चरित्र, उनके आक्रामक तेवर और आतंक के लिए 'पीपली लाइव' का हवाला देने वालों के ध्‍यान में नवम्‍बर, 1894, वाशिंग्‍टन में स्‍वामी विवेकानंद की लेखी का यह उद्धरण भी रहे- ''भारत में मेरे नाम पर काफी हो-हल्‍ला हो चुका है। आलासिंगा ने लिखा है कि देश भर का प्रत्‍येक गांव अब मेरे विषय में जान चुका है। अच्‍छा, चिर शान्ति सदा के लिए समाप्‍त हुई और अब कहीं विश्राम नहीं है। मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि भारत के वे समाचार-पत्र मेरी जान ले लेंगे। अब वे लिखेंगे कि मैं किस दिन क्‍या खाता हूं, कैसे छींकता हूं। भगवान उनका कल्‍याण करे।'' 

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