Showing posts with label छत्‍तीसगढ़. Show all posts
Showing posts with label छत्‍तीसगढ़. Show all posts

Wednesday, May 6, 2026

हमारा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद कक्षा 3 से कक्षा 8 तक के ‘सहायक वाचन‘ के लिए 'हमारा छत्तीसगढ़' पुस्तके तैयार कराई गई थीं। इन पुस्तकों में पाठ-विषय का चयन-निर्धारण स्तरीय था किंतु इन पुस्तकों के प्रकाशन होने पर तथ्यों और प्रस्तुति संबंधी विभिन्न आपत्तियां और विवाद उभरने लगे। इस पर शासन के स्कूल शिक्षा विभाग अंतर्गत तत्कालीन प्रभारी अधिकारी श्री सुनील कुजूर, आइएएस द्वारा बैठक आहूत हुई। सामान्यतः ऐसी बैठकों में चर्चा आई-गई हो जाती है, यह ध्यान रखते हुए समिति के सदस्य के रूप में डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम और राहुल कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से लिखित प्रतिवेदन सहित विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा-टिप्पणी की गई थी। उन पुस्तकों और बैठक का परिणाम क्या हुआ, अवगत नहीं कराया गया, न ही उसका कोई परिणाम जानने को मिला। अब उन पुस्तकों की भी जानकारी नहीं मिलती, किंतु यह एक सार्थक प्रयास था, इस दृष्टि से हमारा उक्त प्रतिवेदन यहां प्रस्तुत है-

हमारा छत्तीसगढ़ 
प्रतिवेदन - एल.एस. निगम एवं राहुल कुमार सिंह 

संबंधित पाठ- 
कक्षा-3         1, 3 एवं 7 
कक्षा-4         1, 3 एवं 7 
कक्षा-5         1, 2 एवं 3 
कक्षा-6         1, 3, 8 एवं (10) 
कक्षा-7         1 एवं 8 
कक्षा-8         1, 11 एवं 15 

सामान्य अभ्युक्ति- 
1. ‘हमारा छत्तीसगढ़’ पुस्तकमाला की सामान्य अवधारणा, विषय-वस्तु और सामग्री-चयन, सामान्यतः प्रशंसनीय और स्वागतेय है। 
2. प्राथमिक और पूर्व-माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बच्चों की पीठ पर बढ़ते बस्ते के बोझ की चिन्ता सदैव की जाती है। इस दृष्टि से अत्यावश्यक माने जाने वाले क्षेत्रों के लिए पृथक-पृथक पाठ्य-पुस्तकों के बजाय नियमित पाठ्यक्रम के ‘भाषा’, ‘सामाजिक अध्ययन’ और ‘विज्ञान’ विषयों के साथ क्रमशः सहायक-वाचन (आंचलिक विशिष्टता और गौरव), पर्यावरण तथा सूचना-प्रौद्योगिकी के पाठ जोड़ा जाना उपयुक्त होगा। इससे बस्ते के बोझ के साथ-साथ अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा। 
3. पाठ तैयार करने में यह ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि पाठ्य-सामग्री का गहन और सूक्ष्म निरीक्षण, विषय-विशेषज्ञों, भाषा-विशेषज्ञों तथा बाल-शिक्षा मनोविज्ञानियों द्वारा किया जाए। 
4. हमारा छत्तीसगढ़ पुस्तकमाला के अधिकतर पाठों के लेखक और सम्पादक डा. श्याम सुंदर त्रिपाठी यदि एक ही व्यक्ति हैं, तो यह स्थिति उचित नहीं है, क्योंकि इससे पाठों में आवश्यक संशोधन प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। 
5. पाठ को ‘किरण’ कहने पर पुनर्विचार किया जा सकता है। 

कक्षा और पाठवार टिप्पणी/संशोधन सुझाव 
कक्षा-3 पाठ 1, 3 एवं 7 
पृष्ठ-2 नक्शे में सभी जिले दर्शित हैं, अतः प्रमुख शब्द अनावश्यक है। 
पृष्ठ-4 प्राचीनता के क्रम में ‘है’ के स्थान पर ‘माना जाता है’, उपयुक्त होगा। 
पृष्ठ-10 ‘देवलदेव’ के स्थान पर ‘भांडदेवल’ होना चाहिए। 
पृष्ठ-11 ‘शिवरीनारायण’ के बाद जांजगीर-चांपा जिले के चन्द्रपुर की चन्द्रहासिनी देवी का तत्पश्चात्, रायगढ़ जिले का उल्लेख, उचित होगा। 
पृष्ठ-12 कविता की पंक्तियों का पुनः मिलान उचित होगा। 
पृष्ठ-33 दूरी, वृक्षों के नाम, पुनः मिलान करना उचित होगा। सतयुग के साथ शायद शब्द का प्रयोग उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-34 ‘पागल जैसे हो गए’ को अन्य प्रकार से लिखा जाना उचित होगा। 
पृष्ठ-37 वाद्यों के नामों को पुनः जांच लेना आवश्यक है। 

कक्षा-4 पाठ 1, 3 व 7 
पृष्ठ-1 ‘कौशल’ और ‘विनताश्व’ शब्दों की वर्तनी जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-2 ‘दहेज में उत्तर कौशल’ वाक्य की जांच आवश्यक है। ‘वाल्मिकी’ और ‘राम’ के साथ ‘श्री’ आवश्यक नहीं है। ‘वृह्दबल’ की वर्तनी जांचना आवश्यक है। ‘बुन्देलखण्ड के शहडोल’ के औचित्य पर विचार करना उचित होगा। 
पृष्ठ-3 ‘कान्तर’ के स्थान पर ‘कान्तार’ होना चाहिए और विदर्भ के साथ बरार का उल्लेख भी उचित होगा। पैरा 2 व 3 का पुनर्लेखन उपयुक्त होगा, जिसमें विद्वानों के मतभेद के बजाय अधिकतर मान्य तथ्य उल्लिखित होे। 
पृष्ठ-4/5 गढ़ स्थान नामों को पुनः जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-6 गढ़ों का प्रशासनिक केन्द्र होना और भौतिक स्वरूप वाले गढ़ का अन्तर स्पष्ट करना चाहिए। ‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ 
पृष्ठ-14 कोशला ग्राम का उल्लेख भ्रामक है। ‘श्री’ अनावश्यक है। ‘रानकावति’ वर्तनी की जांच आवश्यक है। पृष्ठ-17 राजिम तेलिन, जगतपाल, भगवान विष्णु, चौदहवीं शताब्दी- इन उल्लेखों में तथ्य और मान्यता का घालमेल है। ‘बड़े मंदिर’ शब्द उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-18 ‘स्कन्ध’ के स्थान पर ‘स्कन्द’ शब्द होना चाहिए। 
पृष्ठ-19 ‘धौम्य’ की वर्तनी जांचनी है। ‘ऋषियों के आश्रम आज भी’ उपयुक्त नहीं है। मन्दिरों की संख्या ‘बाइस’ की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-37 ‘मन्दाकिनी’ नाम के समीकरण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-39 श्लोक का पुनः मिलान उचित होगा। ‘थुआमाल’ की वर्तनी की जांच आवश्यक है। ‘मील’, ‘किमी’ के बजाय ‘किलोमीटर’ लिखना व माप का उल्लेख उपयुक्त होगा। ‘चन्द्रमा की आकृति’ अथवा ‘अर्द्धचन्द्राकार’ जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-40 ‘कालीदास’ अथवा ‘कालिदास’ वर्तनी के साथ संदर्भ की जांच आवश्यक है। ‘रावा घाट’ वर्तनी/उच्चारण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-41 ‘मैय्या’ के बजाय ‘मैया’ होना चाहिए। ‘पुस्तक माला के भाग एक’ उल्लेख उचित नहीं है। 
पृष्ठ-42 जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर का दन्तेवाड़ा से अलग होना, स्पष्ट करना चाहिए। ‘नारायण पाल’ और ‘नाग कालीन’ मिलाकर लिखना उपयुक्त होगा। 

कक्षा-5 पाठ 1, 2 व 3 
पृष्ठ-1 ‘छत्तीसगढ़ की काशी’ रतनपुर के लिए पूर्व प्रचलित है। 
पृष्ठ-5 ‘सूर्य वर्मा’ के बजाय ‘सूर्यवर्मा’ उचित होगा। ‘स्वास्तिक’ के बजाय ‘स्वस्तिक’ होना चाहिए, जो बौद्ध विहार है। अन्य बौद्ध विहार का नाम आनन्दप्रभ कुटी विहार है। 
पृष्ठ-6 ‘महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य’ उल्लेख उचित नहीं है। ‘आनन्द प्रभु’ की वर्तनी उपरोक्तानुसार होगी। 
पृष्ठ-8 पाठ ‘कथा श्रृंगी ऋषि की’ के औचित्य पर पुनर्विचार आवश्यक है। 
पृष्ठ-15 ‘मध्यप्रदेश’ के स्थान पर ‘मध्यप्रान्त’ होना चाहिए। ‘चौहान वंशीय’ के स्थान पर ‘चौहानवंशी’ होना चाहिए। पृष्ठ-17 ‘हजारी बाग’ के स्थान पर ‘हजारीबाग’ होना चाहिए। 

कक्षा-6 पाठ 1, 3, 8 व (10), 
कक्षा-7 पाठ 1, व 8, 
कक्षा-8 पाठ 1, 11, व 15 
पर चर्चा के दौरान प्रतिवेदकों द्वारा टिप्पणियां की गईं।

Friday, March 6, 2026

छत्तीसगढ़ : पत्र-पत्रकारिता

1982 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ छपी। विजय दत्त श्रीधर, संपादक और संयोजक, म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ ने ‘आभार‘ लिखा साथ ही पुस्तक में उनके लेख ‘मध्य प्रदेश में पत्रकारिता: उद्भव और विकास‘ तथा ‘ग्वालियर अंचल की पत्रकारिता‘ (ग्वालियर, मुंरैमा, भिण्ड, शिवपुरी, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले) शामिल हैं। अन्य लेख हैं- 

मालवा की पत्रकारिता (इन्दौर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, झाबुआ, धार, मन्दसौर, देवास और खरगोन जिले) - शिव अनुराग पटैरिया, राजेश बादल 

भोपाल अंचल की पत्रकारिता (भोपाल, सिहोर और रायसेन जिले) -भाई रतनकुमार 

महाकौशल की पत्रकारिता (जबलपुर, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, बालाघाट, मण्डला, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद, खण्डवा और बैतूल जिले) - गंगाप्रसाद ठाकुर 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले) - स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 

विध्य की पत्रकारिता (रीवा, सीधी, पन्ना, शहडोल, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया जिले) - अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव

‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ लेख में स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के साथ, प्रस्तुति-डा. सुशील त्रिवेदी, नाम भी है। पुस्तक का यह अंश- लेख, यहां प्रस्तुत है। 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता
-स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी
प्रस्तुति-डा० सुशील त्रिवेदी

छत्तीसगढ़ (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले।) में पत्रकारिता का इतिहास अपेक्षाकृत अधिक पुराना नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि यह इलाका बीहड़ जंगलों और पहाड़ों से भरा हुआ रहा और दूसरा यह कि यहाँ आवागमन के साधन बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक अत्यन्त न्यून थे। शिक्षा का कोई प्रसार नहीं था। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों का प्रकाशन इस क्षेत्र में विलम्ब से शुरू होना स्वाभाविक ही है। 

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान राजनाँदगाँव जिले (तत्कालीन राजनाँदगाँव रियासत) से 1889-90 में श्री भगवानदीन सिरौठिया ने ‘प्रजा हितैषी‘ नामक पहला पत्र निकाला था। यह पत्र रियासत के तत्कालीन शासक राजा बलरामदास के संरक्षण में प्रकाशित होता था। दुर्भाग्य से इस पत्र के अंक उपलब्ध नहीं हैं। इस पत्र को रियासती संरक्षण मिला हुआ था, इससे यह अनुमान किया गया है कि इसकी शैली और विचार पर रियासत की छाप थी और यह जनभावनाओं का सच्चा प्रतीक नहीं था। 

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का प्रारंभ ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ से माना जाता है। जनवरी 1900 में इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन पेण्डरा (बिलासपुर जिला) से प्रारंभ हुआ था। इसके प्रकाशक रायपुर के प्रसिद्ध जनसेवी स्वर्गीय पण्डित वामनराव लाखे और सम्पादक पं० माधवराव सप्रे तथा पं० रामराव चिंचोलकर थे। चिंचोलकर जी बिलासपुर के रहने वाले थे और वकालत करते थे। (उनका स्वर्गवास 1906 में हो गया था)। ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का मुद्रण पहले रायपुर के कय्यूमी प्रेस से होता था। बाद में वह देशसेवक प्रेस, नागपुर से छपता रहा। 32 पृष्ठ की यह पत्रिका 1/8 डिमाई आकार की थी। इसका वार्षिक शुल्क केवल डेढ़ रु० था। इसके प्रथम और अंतिम 4 पृष्ठ रंगीन कागज के होते थे।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के प्रथम अंक में इसके प्रकाशन के उद्देश्यों को बताते हुए संपादक-द्वय ने लिखा ‘सम्प्रति छत्तीसगढ़ विभाग को छोड़ ऐसा एक भी प्रान्त नहीं है जहाँ दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या त्रैमासिक पत्र प्रकाशित न होता हो। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि सुसम्पादित पत्रों के द्वारा हिन्दी भाषा की उन्नति हुई है, अतएव यहाँ भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी भाषा में उन्नति करने में विशेष प्रकार से ध्यान दे। आजकल भाषा में बहुत सा कूड़ा-कर्कट जमा हो रहा है, वह न होने पावे इसलिए प्रकाशित ग्रन्थों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा समालोचना भी कहे।‘

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा मानता था। यह पत्र हिन्दी को ठोस, सुरुचिपूर्ण, प्रगतिशील साहित्य देना चाहता था। ‘मित्र‘ ने हिन्दी में आलोचना की शुरूआत की थी और क्रमशः उसके स्तर को ऊपर उठाया था। अपने छोटे से काल में उसने तत्कालीन पत्रिकाओं में काफी ऊँचा स्थान अर्जित कर लिया था। देश के प्रायः सभी पत्रों ने उसकी नीति की प्रशंसा की थी और सभी प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ इसमें प्रकाशनार्थ दीं। ‘मित्र‘ के स्तम्भ थे- प्रेरित पत्र, हितबोध, सुभाषित संग्रह, समाचार प्राप्त, नारी धर्म और नारी शिक्षा, लोकोक्ति और कहावत, समालोचना तथा जीवनी। इसमें घारावाहिक लेख भी छपते थे। 

सप्रे जी ने ‘मित्र‘ के माध्यम से लेखकों की एक पीढ़ी तैयार की। इस पत्र में पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं० श्रीधर पाठक, पं० कामता प्रसाद गुरु, पं० गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं० जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल जैसे अनेक शीर्षस्थ लेखकों की प्रारम्भिक रचनाएँ छपीं। अर्थाभाव के बाद भी मित्र का प्रकाशन होता रहा। सत्रे जी का अपने पाठकों पर पूरा विश्वास था। फिर भी यह पत्र स्वावलम्बी न बन सका। जनवरी 1902 के अंक में सम्पादकों ने घोषणा कर दी कि ‘यदि इस वर्ष भी घाटा रहा तो समझ लीजिए आपके प्रिय ‘मित्र‘ के 100 वर्ष पूरे हो चुके और फिर यही इसकी आयु का अंतिम वर्ष भी होगा।‘ अंततः दिसम्बर 1902 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का प्रकाशन बन्द होने के बाद एक दीर्घ अन्तराल आया। इसी बीच छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सक्रियता आयी। कांग्रेस द्वारा संचालित कार्यक्रम तेजी से चल पड़े। समाज सुधार की और जन नेताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। सन् 1914 में रायपुर जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रयास हुआ जिसके जरिये ‘कबीर पंथी‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। परंतु यह पत्रिका ज्यादा चल नहीं सकी।

सन् 1919 में रायपुर से कान्यकुब्ज सभा द्वारा ‘कान्यकुब्ज नायक‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन पं० रघुबर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में किया गया। यह प्रयास भी अल्पजीवी रहा और एक वर्ष चलकर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। पत्र का वार्षिक मूल्य दो रुपये था। इस पत्र की व्यवस्था पं० मातादीन शुक्ल के जिम्मे थी।

सन् 1920 से 1930 तक की अवधि पत्रकारिता के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही। इस दौरान महात्मा गांधी का सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी हो चुका था। विदेशी शासन के प्रति आम जनता का विरोध मुखर हो चला था। कांग्रेस ने आजादी के लिए दो-आयामी कार्यक्रम संचालित किये थे। पहले के द्वारा स्थानीय शासन संस्थाओं और धारा सभाओं के चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया और दूसरे कार्यक्रम के तहत सत्याग्रह संचालित करने और सामाजिक उत्थान के रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने को प्राथमिकता दी गयी। पत्रकारिता की दृष्टि से उल्लेखनीय बात यह भी थी कि छत्तीसगढ़ से बाहर जाकर पं० माधवराव सप्रे ने हिन्दी ग्रन्थमाला की नींव डाली और फिर हिन्दी ‘केसरी‘ का सम्पादन किया। ‘कर्मवीर‘ और ‘श्री शारदा‘ के संस्थापन में भी सप्रे जी का प्रमुख प्रभाव था। 1920 में छत्तीसगढ़ के ईसाई समाज ने मसीही मासिक ‘भानूदय‘ मुंगेली से निकालना शुरू किया। इसके सिर्फ चार अंक छपे थे।

तीसरे दशक में बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने श्री कुलदीप सहाय के सम्पादन में ‘विकास‘ मासिक का प्रकाशन किया था। श्री सहाय ‘विकास‘ के अलावा ‘कर्मवीर‘ तथा ‘महाकोशल‘ के सम्पादन से भी जुड़े थे। 

रायगढ़ जिले के चन्द्रपुर स्थान से 1923 में मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित हिन्दी मासिक ‘छत्तीसगढ़‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

सन् 1930 से 1940 तक की अवधि में जैसे-जैसे राष्ट्रीय गतिविधियाँ तेज हुई, वैसे-वैसे छत्तीसगढ़ में पत्रिकारिता का स्वरूप भी पल्लवित-पुष्पित होता गया। रायपुर के वयोवृद्ध पत्रकार श्री कन्हैयालाल वर्मा ने सन् 1934 में नागपुर से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘हिन्दवासी‘ का सम्पादन किया। 

सन् 1935 में डिस्ट्रिक्ट कौंसिल, रायपुर द्वारा ‘उत्थान‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इसके सम्पादक पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी थे। पत्र इण्डियन प्रेस से प्रकाशित होता था। छपाई अत्यन्त सुन्दर थी। इसमें शिक्षा और साहित्य से संबंधित विषयों पर समानुपात में लेख प्रकाशित होते थे। शिक्षा संस्थाओं और आम लोगों, दोनों के ही बीच यह पत्र बहुत लोकप्रिय था। इसमें छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित होती थी। जब सरकार ने रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल को भंग कर दिया तब ‘उत्थान‘ को 1937 के बाद बन्द कर दिया गया। छत्तीसगढ़ का यह महत्वपूर्ण मासिक-पत्र लगभग साढ़े तीन वर्ष तक प्रकाशित हुआ। पण्डित नेहरू तथा डा० राजेन्द्र प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इस प्रकाशन को सराहा था। 

सन् 1935 में रायपुर से मासिक पत्रिका ‘आलोक‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिन्दी साहित्य मण्डल द्वारा किया जाता था और श्री केशव प्रसाद वर्मा तथा श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी इसका संपादन करते थे। इस पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक सक्रियता को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान किया था। श्री केशव प्रसाद वर्मा के संपादकत्व में पटेरिया बुक डिपो, रायपुर, ने शैक्षणिक पत्रिका ‘शिक्षा‘ के भी कुछ अंक प्रकाशित किये। 

सन् 1936 में धारा सभा के चुनाव के बाद प्रथम बार सन् 1937 में तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बना था। कांग्रेस के उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार के लिए रायपुर से पहली बार साप्ताहिक ‘कांग्रेस पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके संपादक सर्वश्री नन्द कुमार दानी, गौरीशंकर आगम तथा स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी थे। 

सन् 1936 में दुर्ग से ‘हैहयवंश‘, सन् 1937 में सरगुजा से ‘सरगुजा सन्देश‘ और धमतरी से ‘नवयुवक‘ पत्रों का प्रकाशन हुआ। 1940 में राजकुमार कालेज ने अर्द्धवार्षिक पत्र ‘मुकुट‘ का प्रकाशन शुरू किया। 

वर्ष 1941 से शुरू होने वाले दशक में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का विकास ज्यादा तेज गति से हुआ। दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों के प्रकाशनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 

रायपुर जिला 
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ‘अग्रदूत‘ के प्रकाशनारम्भ से जबरदस्त शक्ति मिली थी। विदेशी हुकूमत के विरुद्ध इस साप्ताहिक अखबार (सम्पादक केशव प्रसाद वर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी) ने जबरदस्त अभियान चलाया। छत्तीसगढ़ का यह पहला राष्ट्रवादी समाचार पत्र 20 जून 1942 से रायपुर में छपना शुरू हुआ था। सन् 1943 में प्रांतीय प्रेस सलाहकार समिति के संयोजक ने इसके सम्पादकों को ‘आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन‘ के लिए दो बार चेतावनी दी थी। सितम्बर 1943 में इसके सम्पादकों को तीन माह के लिए जाँच आदेश दिये गये। 1943 की अंतिम तिमाही में श्री केशव प्रसाद वर्मा के गिरफ्तार होने पर इस अखबार का प्रकाशन अस्थायी तौर पर स्थागित कर दिया गया जो 1944 में फिर शुरू हुआ। यह साप्ताहिक अभी भी प्रकाशित हो रहा है। सम्पादक हैं श्री विष्णु सिन्हा। ‘अग्रदूत‘ में प्रकाशित होने वाली राजनीतिक डायरी बहुत लोकप्रिय हुआ करती थी। 

सन् 1943-44 में श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादन में ‘सावधान‘ साप्ताहिक का रायपुर से कुछ समय तक प्रकाशन हुआ था। श्री द्विवेदी हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में ‘नवभारत‘ (नागपुर) से जुड़े हुए हैं। ‘नवभारत‘ का रायपुर संस्करण उन्हीं के संपादकत्व में आरंभ हुआ था। 

पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा नागपुर से साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ का प्रकाशन किया जाता था। इसके सम्पादक श्री सांताचरण दीक्षित और श्री कुलदीप सहाय जैसे वरिष्ठ पत्रकार थे। बाद में, मार्च 1946 में यह पत्र रायपुर आ गया और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के संपादन में प्रकाशित होने लगा। 

साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ शीघ्र ही छत्तीसगढ़ का प्रमुख समाचार-पत्र बन गया। वर्ष 1948 में श्री श्यामाचरण शुक्ल भी ‘महाकोशल‘ के सम्पादन कार्य में सहयोगी बन गये। 

वर्ष 1951 में ‘महाकोशल‘ दैनिक हो गया। छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाला यह पहला दैनिक है। छत्तीसगढ क्षेत्र के प्रायः सभी वरिष्ठ पत्रकार अपने प्रारंभिक समय में इससे जुड़े रहे। सन् 1954 में जब श्री त्रिवेदी शासकीय सेवा में चले गये तब विश्वनाथ वैशम्पायन इसके सम्पादक बने। उनके बाद सर्वश्री विष्णुदत्त मिश्र तरंगी, गुरुदेव कश्यप, कमल दीक्षित इसके सम्पादक रहे। शासकीय सेवा से निवृत्त होने पर श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 1979 में पुनः इसके सम्पादक बने। सम्प्रति श्री कमल ठाकुर इसके सम्पादक हैं। 

सन् 1947 में ‘छत्तीसगढ़ केशरी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 1952 में इसका नाम ‘हिन्द केशरी‘ कर दिया गया। इस नाम से यह तीन वर्ष तक निकलता रहा। सन् 1948 में ‘श्री‘ नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्रिका 1952 में बन्द हो गयी । 

1948 में श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ के सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्याम सुकवि थे और उनके सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका के रूप में कुछ वर्षों तक प्रकाशित होती रही। 
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख राजनीतिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने 4 सितम्बर 1950 से ‘राष्ट्रबन्धु‘ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया। यह अर्द्धसाप्ताहिक था और तत्कालीन शासन की नीतियों का कटु आलोचक था। 1953 में ठाकुर साहब सर्वाेदय आंदोलन में चले गये तो यह पत्र एक स्वतंत्र साप्ताहिक बन गया। अगले वर्ष इसका प्रकाशन बन्द हो गया। 1961 में फिर शुरू हुआ और बन्द हो गया। किन्तु 1967 में श्री हरि ठाकुर के सम्पादन में ‘राष्ट्रबन्धु‘ पुनः प्रकाशित होने लगा। 

सन् 1950 के पहले गास मेमोरियल सेन्टर, रायपुर, से ‘मसीही आवाज‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी के आसपास ‘साथी‘ नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित हुआ था। इसके संपादक श्री राजेन्द्र कुमार चौबे थे। कबीर पंथियों ने रायपुर से ‘वंश प्रताप मणि माला‘ का प्रकाशन मासिक के रूप में शुरू किया। 

सन् 1950 में महासमुन्द से मासिक ‘सेवक‘ का प्रकाशन हुआ किन्तु एक वर्ष चल कर यह बन्द हो गया। इसी वर्ष रायपुर से श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ ने साप्ताहिक ‘नव राष्ट्र‘ निकाला। यह स्वतंत्र विचारधारा का पत्र था। इसकी प्रसार संख्या सीमित थी किन्तु प्रभाव अच्छा था। यह समाचार-पत्र लगभग ग्यारह वर्ष तक निकलता रहा। इस अवधि में कई बार उसका प्रकाशन स्थगित भी हुआ। रायपुर से वर्ष 1951 में ‘रायपुर समाचार‘ निकला। यह साप्ताहिक था, जो सिर्फ एक साल चला। 

रायपुर जिले से पहला अंग्रेजी पत्र 1953 में जगदीशपुर से प्रकाशित हुआ। मेनोनाइट मिशन की सामान्य सभा द्वारा प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्र का नाम था, ‘इण्डिया कालिग‘। वर्ष 1953 में इसका सिर्फ एक अंक प्रकाशित हुआ, फिर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। वर्ष 1956 में इसका पुनः प्रकाशन हुआ। रायपुर से 27 नवम्बर 1959 से ‘प्रिज्म‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक कुछ समय के लिए निकला। दिसम्बर 1960 में रायपुर से श्री क्रांति कुमार द्विवेदी ने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘वाल्कैनो‘ शुरू किया। पर यह पत्र ज्यादा समय तक चल नहीं सका। 

1954 में गास मेमोरियल सेंटर, रायपुर ने हिन्दी और सिधी में ईसाई धर्म की पत्रिका ‘प्रकाश‘ निकालना शुरू किया। इसका प्रकाशन 1958 में बन्द हो गया। सिन्धी पाठकों के लिए 1955 में निर्दलीय साप्ताहिक ‘लोक सेवा‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। किन्तु एक अंक के बाद ही इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष महासमुन्द से ‘लोकसेवा‘ नामक हिन्दी पत्र निकला जो 1956 तक चला। धमतरी के पास शांतिपुर के मेनोनाइट चर्च ने 1956 में हिन्दी साप्ताहिक ‘मेनोनाइट पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका कुछ वर्षों तक चली। 

वर्ष 1956 में श्री खूबचन्द बघेल ने ‘छत्तीसगढ़‘ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया जो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रवक्ता पत्र था। इसका प्रकाशन जनवरी 1958 में बन्द हो गया। भारत सेवक समाज की रायपुर जिला शाखा ने 1956 में ‘भारत सेवक‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली जो 1960 तक चली। महासमुन्द में आर्य समाज ने आदर्श भारती‘ नामक मासिक का प्रकाशन 1957 में शुरू किया। यह पत्रिका रायपुर जिले में ईसाई मिशन के अभियान की कटु आलोचक थी। इसी वर्ष रायपुर से हिन्दी साप्ताहिक ‘रायपुर टाइम्स‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1959 पत्रकारिता के इतिहास की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इस वर्ष चार सामयिकी के अतिरिक्त यहाँ से दो दैनिक पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। 9 अप्रैल 1959 को ‘नवभारत‘ श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादकत्व में और 19 अप्रैल 1959 को ‘नई दुनिया‘ श्री मायाराम सुरजन के संपादन में निकलने लगा। बाद में ‘नई दुनिया‘ ने दैनिक ‘देशबन्धु‘ नाम ग्रहण कर लिया। 

1960 से श्री गोविन्दलाल वोरा ‘नवभारत‘ के सम्पादक हैं। श्री वोरा रायपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। अब यह जिम्मेदारी ‘नवभारत‘ की उप-संपादक श्रीमती आशा शुक्ला सम्हाल रही हैं। ‘नवभारत‘ के नरेन्द्र पारख ने गत वर्ष वीरनारायण सिंह पुरस्कार पाया। 

ग्रामीण पत्रकारिता को नये आयाम देने वाले ‘देशबंधु‘ का सम्पादन श्री ललित सुरजन कर रहे हैं। एक लम्बी अवधि तक श्री रामाश्रय उपाध्याय इसके स्थानीय सम्पादक रहे। ग्रामीण पत्रकारिता का स्टेट्समैन पुरस्कार स्थापना के प्रथम वर्ष ही ‘देशबंधु‘ के श्री राजनारायण मिश्र ने जीता। दूसरे और तीसरे साल भी क्रमशः श्री गिरिजा शंकर और श्री जिया उल हुसैनी ने यह गौरव पाया। ललित जी पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। 

साप्ताहिक ‘ठोकर‘ का प्रकाशन 23 जनवरी 1959 को शुरू होकर 1961 में बन्द हो गया। 

रायपुर का पहला सांध्य दैनिक ‘मध्यप्रदेश‘ 4 अक्टूबर 1959 को निकला, पर शीघ्र ही यह बन्द हो गया। इसी वर्ष दो पाक्षिकों, ‘नया कदम‘ और ‘रिपब्लिक‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1960 में ग्यारह समाचार पत्र निकले। इनमें 26 नवम्बर 1960 से शुरू हुआ सांध्य दैनिक ‘विचार और समाचार‘ उल्लेखनीय था। इसके सम्पादक श्री विश्वनाथ वैशम्पायन थे। बाद में यह साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। सुसम्पादन के लिए यह प्रशंसित हुआ था। इसका प्रकाशन लगभग सात वर्ष तक हुआ। अर्द्ध साप्ताहिक पत्र ‘रायपुर न्यूज‘ का प्रकाशन 30 अप्रैल 1960 से शुरू हुआ था। श्री किशोरीलाल मिश्र इसके सम्पादक थे। ‘एम०पी० टाइम ऐण्ड टाइड‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक भी इसी समय निकला। फरवरी 1960 से ‘राय चक्र‘ नामक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ परन्तु आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन करने के कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया। इसी अवधि में महासमुन्द से ‘छत्तीसगढ़ समाचार‘, ‘श्यामसुन्दर‘ और ‘तहलका‘ साप्ताहिक निकला। रायपुर से ‘बढ़ते चलो‘, ‘हमराही‘, ‘सिने तरंग‘ और ‘ग्राम दर्शन‘ का प्रकाशन हुआ। 

रायपुर से एक अन्य दैनिक ‘युगधर्म‘ का प्रकाशन 26 जनवरी 1961 से शुरू हुआ। प्रथम संपादक श्री पद्माकर भाटे थे। बीच में श्री रामावतार शर्मा भी संपादक रहे। अब इसके सम्पादक श्री बबन प्रसाद मिश्र हैं। इसी वर्ष ‘अनमोल‘, ‘जननाद‘, ‘जागते रहो‘, ‘भारत टाइम्स‘ साप्ताहिक पत्रों और ‘सहयोग दर्शन‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। 26 जनवरी 1962 से साप्ताहिक ‘नभ‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री मधुकर खेर इसके सम्पादक थे। 5 अंकों के बाद ‘नभ‘ बन्द हो गया। 

वर्ष 1964 और 1970 के बीच रायपुर से एक सांध्य दैनिक, दो अर्द्ध साप्ताहिक, पन्द्रह साप्ताहिक, तीन पाक्षिक, दो मासिक, एक द्वैमासिक और एक त्रैमासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। इनमें से ‘समाचार दर्पण‘ नियमित रूप से साप्ताहिक के रूप में दो वर्ष (1964-65) तक प्रकाशित हुआ। श्री कुमार साहू इसके सम्पादक और श्री कनक राम कोठारी प्रकाशक थे। इसी तरह ‘रायपुर सन्देश‘ सांध्य दैनिक भी मई 1966 में निकला जो 25 अक्टूबर 1967 को बन्द हो गया। जुलाई 1966 से निकलने वाला साप्ताहिक ‘स्नातक‘ विद्यार्थियों के बीच बहु-प्रसारित था किन्तु इसका प्रकाशन भी अक्टूबर 1969 में बन्द हो गया। अक्टूबर 1965 से ‘साजना‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। यह साहित्यिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष तक हुआ। 1964 में विवेकानन्द आश्रम ने त्रैमासिक ‘विवेक ज्योति‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विषयों की है। 

रायपुर के अन्य पत्रों में स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध तथा जयनारायण पांडे की स्मृति में अक्टूबर, 1965 से श्री हरि ठाकुर के संपादन में मासिक ‘संज्ञा‘, ‘हस्ताक्षर‘ (विभु खरे), ‘छत्तीसगढ़ी‘ (दयाशंकर शुक्ल), ‘छत्तीसगढ़ केसरी‘ (दीपचन्द डागा), ‘जवाहर ज्वाला‘ (साप्ताहिक), ‘छत्तीसगढ़ सेवक‘ (पाक्षिक), ‘लोकशक्ति‘ (सांध्य दैनिक), ‘प्रजापुकार‘ (साप्ताहिक), ‘गाइड‘ (उर्दू साप्ताहिक), ‘आजाद कलम‘ (साप्ताहिक), ‘सन्मार्ग‘ (साप्ताहिक), ‘कमलनंद‘ (पाक्षिक), ‘विजेता‘ (साप्ताहिक), ‘पहरेदार‘ (साप्ताहिक), ‘विजययंत‘ (साप्ताहिक), ‘तिनका‘ (साप्ताहिक), ‘सम्वाददाता‘ (साप्ताहिक), ‘कुरुद केसरी‘ (पाक्षिक), ‘गोंडवाना‘ (साप्ताहिक), ‘पुष्पहार‘ (साप्ताहिक), ‘अपने ग्रन्थ‘ (मासिक), शामिल हैं। भाटापारा से ‘भाटापारा टाइम्स‘ (साप्ताहिक) 1972 में निकलना शुरू हुआ। 

रायपुर से 5 अगस्त, 1974 को श्री गोविन्दलाल वोरा के सम्पादकत्व में आंग्ल दैनिक ‘मध्यप्रदेश क्रानिकल‘ निकला। दूसरा अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद‘ सितम्बर 1974 में निकला (सं० श्री रामचन्द्र संगीत) जो 1974 में ही बंद हो गया। 

रविशंकर विश्वविद्यालय ने 1968-69 में पत्रकारिता के अध्ययन की विशेष व्यवस्था की और स्नातक उपाधि (बी० जे०) पाठ्यक्रम शुरू किया। 

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकारों में श्री मधुकर खेर का उल्लेखनीय स्थान है। वे प्रेस ट्रस्ट आव् इंडिया, ‘टाइम्स आव् इंडिया‘, ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ आदि के सक्रिय सम्वाददाता हैं। 

आज भी रायपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचार केन्द्र है और यहाँ के दैनिक पत्र अत्यन्त सम्मानित और बहुप्रसारित हैं। तीनों प्रमुख समाचार पत्रों- ‘नवभारत‘, ‘देशबन्धु‘ और ‘युगधर्म‘ ने मुद्रण की आफसेट पद्धति अपनाई हुई है। प्रसार संख्या की दृष्टि से रायपुर ‘नवभारत‘ का मध्यप्रदेश में दूसरा स्थान है। 

दुर्ग-राजनाँदगाँव 
जिला सन् 1947 में खैरागढ़ से ‘प्रजा बन्धु‘ पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ हुआ परन्तु अगले वर्ष ही वह बन्द हो गया। अक्टूबर 1947 में दुर्ग से ‘जिन्दगी‘ साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ। यह स्वतन्त्र रीति नीति का पत्र था। इसके प्रकाशक और सम्पादक श्री केदारनाथ झा ‘चन्द्र‘ थे। 1954 तक यह तीन बार बन्द हुआ और निकला, फिर 1961 में अंतिम रूप से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। अगस्त 1948 में राजनाँदगाँव से पाक्षिक ‘स्वतन्त्र भारत‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। यह भी बहुत कम समय तक चला। राजनाँदगाँव से ही मार्च 1950 में मासिक ‘चित्र संसार‘ निकला। इसका प्रकाशन उसी वर्ष अक्टूबर माह में बन्द हो गया। 

राजनाँदगाँव से 26 जनवरी 1951 से ‘जनतन्त्र‘ साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ हुआ। प्रख्यात साहित्यकार डा० बलदेव प्रसाद मिश्र इसके संरक्षक और सम्पादक थे। इसी केन्द्र से 15 अगस्त 1956 को साप्ताहिक ‘सबेरा‘ का प्रकाशन शुरू हुआ और 1962 तक चला। इसके सम्पादक श्री शरद कोठारी थे। अब वे दैनिक ‘सबेरा संकेत‘ निकाल रहे हैं जो जिले का प्रमुख पत्र है। 

दुर्ग से 1958 में ‘ज्वालामुखी‘ का प्रकाशन हुआ जो 1967 तक चला। इसके प्रकाशक श्री कपिलनाथ ब्रह्मभट्ट थे। 1959 में ‘भारत केसरी‘ साप्ताहिक राजनाँदगाँव से निकला जो 1961 तक चला। श्री ब्रह्मभट्ट बड़े जीवट के पत्रकार थे और अनेक पत्रों से सम्वाददाता के रूप में जुड़े रहे। 

सन् 1958 के बाद दुर्ग-राजनाँदगाँव से बहुत से समाचार पत्र निकले किन्तु उनका अस्तित्वकाल अत्यन्त अल्प रहा। ऐसे पत्रों में ‘प्रेरणा‘, ‘अभियान‘ और ‘चेतावनी‘ प्रमुख थे। 1960 में दुर्ग से ‘साहू सन्देश‘ निकलना शुरू हुआ। भिलाई से 1962 में हिन्दी और अंग्रेजी में ‘भिलाई समाचार‘ निकलने लगा। 1963 में दुर्ग से ‘छत्तीसगढ़ सहयोगी‘ (साप्ताहिक), ‘भिलाई श्रमिक आह्वान‘ (साप्ताहिक) और दुर्ग से ही ‘शांति की देवी‘ (मासिक) निकले। 

सन् 1965-67 के दौरान ‘चिन्तक‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अग्रवाल जगत‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अनन्त‘ मासिक (भिलाई), ‘पञ्च निर्मित‘ साप्ताहिक (बालोद), ‘कामगार मित्र‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘छत्तीसगढ़‘ अर्द्ध साप्ताहिक (दुर्ग), ‘श्रमदेव‘ (दुर्ग), ‘दुर्ग टाइम्स‘ साप्ताहिक (दुर्ग) और ‘सोशलिस्ट वर्कर‘ अंग्रेजी साप्ताहिक (दुर्ग) प्रकाशित हुए। 

दुर्ग जिले के दो पत्रकारों ने राजनीति में भी अच्छा स्थान बनाया। श्री चन्दूलाल चन्द्राकर राष्ट्रीय दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के प्रधान सम्पादक रहे और बाद में केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में राज्य मन्त्री रहे। ‘नवभारत‘, ‘नव-भारत टाइम्स‘ तथा अन्य समाचार पत्रों के सम्वाददाता रहे श्री मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के जागरूक विधायक के रूप में स्थान बनाया है और सम्प्रति उच्च शिक्षा राज्य मन्त्री हैं। 

बस्तर जिला 
आजादी के पहले जगदलपुर एक छोटा सा कस्बा था। पूरे जिले में आदिवासी निवास करते थे। करीब 14,000 वर्गमील की लम्बाई-चौड़ाई बाले इस जिले में कुल 40-45 प्राथमिक शालाएँ थीं। एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल सिर्फ जगदलपुर में था। जगदलपुर में ब्रिटिश राज्य का प्रशासक रहता था। उनके सुख सुभीते के लिए पानी का नल था और कस्बे में बिजली भी थी। सरकारी खबरों के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के पहले से ही ‘बस्तर समाचार‘ नाम का एक साप्ताहिक अखबार सरकारी इन्तजाम में प्रकाशित किया गया था। यह सरकारी अखबार जगदलपुर के सरकारी प्रेस में छपता था। 

1947 के बाद बस्तर में पत्रकारिता का नया युग शुरू हुआ। वहाँ के प्रमुख पत्रकार थे पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी और स्वर्गीय मतीश बनर्जी। एक दक्षिण भारतीय शर्मा जी भी थे। पूर्वी पाकिस्तान (आज के बाँगला देश) के लोग जब बस्तर में आने को हुए तब बोस बन्धुओं का भी यहाँ आगमन हुआ। पुनर्वासियों के सुख-सुभीतों की ओर उनका ध्यान था। श्री मतीश बनर्जी और पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी द्वारा उत्साहित करने पर बोस बन्धुओं ने ‘दण्डकारण्य समाचार‘ 1948 के लगभग प्रकाशित करना शुरू किया, जो आजतक चल रहा है। इसके सम्पादक मतीश बनर्जी थे। अखबार 8 पृष्ठों का था। इसके चार पृष्ठ हिन्दी में और चार अंग्रेजी में छपते थे। ‘दण्डकारण्य समाचार‘ जिले के बाहर भी प्रसारित रहा। अब इसके सम्पादक श्री तुषार कान्ति बोस हैं। 

श्री रविशंकर वाजपेयी के सम्पादकत्व में साप्ताहिक ‘बस्तर टाइम्स‘ निकल रहा है। 

बिलासपुर जिला 
पहले उल्लेख किया जा चुका है कि पेन्ड्रा रोड से प्रकाशित होने वाले ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ ने बिलासपुर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास को एक नया मोड़ दिया था। श्री माधवराव सप्रे के सम्पादन में निकला यह समाचार-पत्र हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन में भी बहुत सहायक सिद्ध हुआ था। 

सन् 1920 के बाद बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने ‘विकास‘ नामक पत्रिका निकाली थी। सन् 1937 में ‘सचेत‘ साप्ताहिक का प्रकाशन हुआ था, पर वह थोड़े समय तक ही चला। 

सितम्बर, 1941 में बिलासपुर से एक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ ‘पराक्रम‘, जिसके सम्पादक श्री रामकृष्ण पाण्डेय थे (उन्हें लोग पराक्रमी पांडे कहने लगे थे)। सितम्बर 1952 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया था जो मार्च 1953 में पुनः प्रारम्भ हुआ। इसी तरह 1955 में कुछ समय बन्द रहने के बाद यह फिर चालू हो गया था, पर ज्यादा चल नहीं सका। 

सन् 1950 में ‘प्रकाश‘ साप्ताहिक निकला जो 1952 में बन्द हो गया। ‘लोकमित्र‘ साप्ताहिक श्री वृन्दावन बिहारी मिश्र के सम्पादन में 1953 से निकलना शुरू हुआ। बाद में श्री बृजराय नारायण मिश्र के सम्पादन में चलता रहा। इन दिनों यह श्री अवध किशोर मिश्र के सम्पादन में निकल रहा है। 

सन् 1953 में एक निर्भीक साप्ताहिक ‘तूफान‘ श्री काले के सम्पादन में निकलना शुरू हुआ किन्तु 1962 में श्री काले के असामयिक निधन से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष यहाँ से ‘नव समाज‘ साप्ताहिक, ‘नई दिशा‘ त्रैमासिक और ‘मुक्ति‘ साप्ताहिक निकले। ‘नई दिशा‘ के सम्पादक श्री श्रीकान्त वर्मा और श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव थे। इसके सलाहकार थे श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, श्री प्रभाकर माचवे और श्री नरेश मेहता। मई 55 में आरम्भ हुई इस पत्रिका का वार्षिक मूल्य 4 रु० और एक प्रति का मूल्य 1 रु० था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी। श्री वर्मा बाद में ‘दिनमान‘ के विशेष सम्वाददाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए और सम्प्रति राज्यसभा के सदस्य हैं। 

सन् 1959 में सक्ति से ‘अवतार‘ पाक्षिक निकलने लगा पर शीघ्र ही बन्द हो गया। इसी वर्ष चाँपा से ‘सक्ति टाइम्स‘ पाक्षिक निकलना शुरू हुआ। सन् 1960 में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘क्षितिज‘ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सन् 1960 में बिलासपुर से ‘मुक्ति दूत‘ दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया, पर वह चल नहीं पाया। इसी समय सहकारी संस्था ने ‘छत्तीसगढ़ सहकारी समाज‘ मासिक निकालना शुरू किया। सन् 1961 में बिलासपुर से ‘नया तूफान‘ साप्ताहिक, ‘छत्तीसगढ़ सह गौरव‘ मासिक, ‘ज्ञान यज्ञ‘ मासिक और ‘बवंडर‘ साप्ताहिक निकले। 

वास्तव में जिले की पत्रकारिका को निश्चित दिशा देने में ‘बिलासपुर टाइम्स‘ का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। श्री डी० पी० चौबे ने इसे एक साप्ताहिक के रूप में निकालना शुरू किया था। वर्ष 1974 में उन्होंने श्री बी० आर० यादव के सहयोग से उसे दैनिक के रूप में स्थापित कर दिया। प्रखरता और स्वच्छता के लिए ‘बिलासपुर टाइम्स‘ उल्लेखनीय है। श्री यादव लम्बे अरसे तक ‘नवभारत‘ के बिलासपुर सम्वाददाता रहे हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश शासन के काबीना मन्त्री हैं। ‘बिलासपुर टाइम्स‘ में श्री गुरुदेव कश्यप तथा श्री कमल ठाकुर सम्पादक रहे। 

बिलासपुर में ‘बूंद और मोती‘ श्री के० भगवान के सम्पादन में, हसदेव टाइम्स‘ श्री कृष्ण कुमार शर्मा के संपादन में तथा ‘सेन्ट्रल टाइम्स‘ 1966 से श्री कृष्णमूर्ति टाह के नेतृत्व में निकल रहे हैं। कोरबा से सन् 1966 साप्ताहिक ‘वक्ता‘ श्री राजेन्द्र गुप्त के सम्पादकत्व में नियमित रूप से निकल रहा है। 

सन् 1977 से बिलासपुर से दैनिक ‘लोक स्वर‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्यामलाल चतुर्वेदी, डा० सच्चिदानन्द पाण्डे और श्री रमेश नैयर ने भी इसका सम्पादन किया है। वर्तमान में श्री बजरंग केडिया संपादक हैं। 

बिलासपुर महत्वपूर्ण समाचार केन्द्र है किन्तु यहाँ रायपुर से निकलने वाले समाचार पत्रों का प्रभाव छाया हुआ है। 

रायगढ़ जिला 
समाचार-पत्र-प्रकाशन की दृष्टि से रायगढ़ जिला काफी पिछड़ा रहा है। सन् 1923 में श्री मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा रायगढ़ से ‘छत्तीसगढ़‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसका आकार 10X7 इंच और वार्षिक मूल्य 2 रु० था। 

एक लम्बे अन्तराल के बाद 1950 में रायगढ़ से ‘अधिकार‘ नामक साप्ताहिक का कुछ समय तक प्रकाशन हुआ। सन् 1951 में ‘बापू‘ नामक हिन्दी मासिक रायगढ़ से निकला जिसके संपादक स्वामी गौरीशंकर थे। बाद में ‘राष्ट्र केसरी‘ नामक हिन्दी साप्ताहिक भी यहीं से निकला। जनवरी 1956 में इन दोनों समाचार पत्रों को मिलाकर ‘नई बात‘ नामक नया हिन्दी साप्ताहिक निकाला गया, परन्तु यह नवम्बर 1958 में बन्द हो गया। 

सन् 1953 में रायगढ़ से ‘भूचाल‘ साप्ताहिक निकाला गया, जो अगले वर्ष ही बन्द हो गया। 

सन् 1957 में ‘महाभारत‘ हिन्दी मासिक प्रकाशित हुआ। सन् 1959 में ‘नई बात‘ साप्ताहिक का पुनः प्रकाशन हुआ और 1965 तक चलता रहा। 

सरगुजा जिला 
छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्र में आवागमन के साधनों से दूर स्थित सरगुजा जिले में पत्रकारिता की गतिविधियाँ अत्यन्त अल्प रही हैं। सन् 1960 के आसपास यहाँ से श्री समर बहादुर सिंह के सम्पादन में ‘राष्ट्रवाणी‘ निकलता रहा है। फिर श्री रवीन्द्र प्रताप सिंह के संपादन में ‘सरगुजा सन्देश‘ निकला। यह पत्र आज भी निकल रहा है और साफ सुथरा है। सन् 1978 में ‘सरगुजा वाणी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर जिले से इस समय 6 दैनिक, 15 साप्ताहिक, 1 पाक्षिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकल रहे हैं। दुर्ग जिले से 6 साप्ताहिक, बस्तर जिले से 6 साप्ताहिक, राजनाँदगाँव जिले से 3 दैनिक, 7 साप्ताहिक और 1 पाक्षिक पत्र का प्रकाशन हो रहा है। बिलासपुर जिले से 2 दैनिक, 11 साप्ताहिक और 1 मासिक पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। सरगुजा जिले से 1 साप्ताहिक और 2 पाक्षिक तथा रायगढ़ जिले से 3 साप्ताहिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकलते हैं। 

पश्चलेख- 
इस क्रम में उल्लेखनीय कि जिला गजेटियरों के अध्याय 18 में जिले के समाचार पत्रों की जानकारी होती थी। संभवतः उक्त पुस्तक के लिए सामग्री उसी के आधार पर विकसित की गई है। अगले क्रम में दो, लगभग एक जैसे प्रकाशनों का उल्लेख प्रासंगिक होगा। इनमें माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल से 2002 (नवंबर?) में प्रकाशित पुस्तिका, डॉ. मंगला अनुजा ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ तथा इसी संस्था की जनसंचार माध्यमों पर केन्द्रित शोध पत्रिका ‘आंचलिक पत्रकार‘ के दिसंबर 2002 अंक में डा. मंगला अनुजा का ही इसी यानी ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ शीर्षक से प्रकाशित लंबा लेख है। इन लेखों का आधार पूर्व उल्लिखित पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ का लेख ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ जान पड़ता है, मगर इसमें चित्रों सहित जानकारियां 2002 तक अद्यतन कर दी गई हैं और पुस्तिका के आरंभ में अनुक्रम है, जिसमें 375 पत्र-पत्रिकाओं का नाम, पृष्ठ संख्या के साथ है, जिससे इसकी उपादेयता बढ़ गई है। 

इसी प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी से 2011 में ‘हिदी पत्रकारिता का इतिहास छत्तीसगढ़‘ प्रकाशित हुआ है। यह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता शोध परियोजना के अंतर्गत विभाष झा द्वारा तैयार की गई है। इसमें यहां आए पूर्व प्रकाशनों का उल्लेख नहीं है। पुस्तक में पत्रकारिता के संक्षिप्त इतिहास के अलावा प्रमुखतः विभिन्न विश्लेषणात्मक शीर्षकों में वरिष्ठ पत्रकारों से हुई बातचीत है।

आंचलिक पत्रकार के उक्त अंक में विजयदत्त श्रीधर ने ‘सम्पादकीय‘ में लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का व्यापक अध्ययन, गहन विश्लेषण और व्याख्या होनी चाहिए। वहां के विश्व विद्यालय यदि ऐसा कोई गहन गंभीर-व्यापक शोध करा सकें, तब वे छत्तीसगढ़ के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहासक्रम की विश्रृंखलित कड़ियां भी जोड़ पाएंगे, इसमें सन्देह नहीं।‘

रायपुर, छत्तीसगढ़ में सन 2005 में ‘कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। जानकारी मिली है कि विश्वविद्यालय द्वारा माधवराव सप्रे के ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के सभी 36 अंकों का पुनर्प्रकाशन किया गया है। इस क्रम में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का- बीसवीं सदी का पहला, दूसरा और तीसरा चतुर्थांश, यानी 1900 से 1925, 1926-1950, 1951-1975 तथा इसके पश्चात के लिए प्रत्येक दशक और फिर पृथक राज्य गठन के बाद प्रत्येक पंचवर्षीय कालखंड में अध्ययन, अभिलेखन हेतु प्रयास समीचीन होगा। इस अध्ययन में पत्र-पत्रिका, संपादक, प्रमुख संवाददाता-पत्रकार, उल्लेखनीय घटना, विकास और उपलब्धियां शामिल हों। साथ ही डिजिटल अभिलेखन, जिसमें पत्र-पत्रिकाएं, चित्र, संबंधित दस्तावेज तथा इसके पश्चात संभव हो तो महत्वपूर्ण आडियो-वीडियो फाइल्स भी हों। आशा है कि पत्रकारिता और जनसंचार का यह विश्वविद्यालय ऐसी सारी संभावनाओं की दिशा में अग्रसर होगा।

यह दौर तो अपनी निजी खास रुचि से चुने गए, सतही जानकारी और अनावश्यक दुहराव वाले खर्चीले कॉफी टेबल बुक का है, जो प्रकाशन से जुड़े लोगों/संस्थानों के लिए फायदेमंद होता है मगर अपने वास्तविक लक्ष्य, पाठकों के लिए अक्सर उपयोगी नहीं होता और अधिकतर भ्रामक भी होता है। मानता हूं कि ऐसी जानकारियां, मूल स्रोत के उल्लेख सहित सार्वजनिक, निःशुल्क और सहज नेट पर उपलब्ध होनी चाहिए। अपने स्तर पर पिछले वर्षों से मेरा यही प्रयास है। जिसका एक उदाहरण यह है। इसके लिए मूल स्रोतों की तलाश और जानकारी जुटाना, पढ़ कर फीड करना एवं नेट पर अपलोड कर सार्वजनिक करना, यह सभी काम मेरे स्वयं द्वारा यथासंभव सावधानी और जिम्मेदारी से किया गया है।

यह प्रस्तुति सामान्य जानकारी के लिए तैयार की गई है, किंतु शोध-संदर्भों के लिए मूल स्रोतों को देखना चाहिए।

Friday, October 17, 2025

धानी छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, खास कर मध्य छत्तीसगढ़, जहां धान उपज का रकबा और पैदावार अधिक है, वहीं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में 23000 से अधिक प्रकार के धान बीजों का संग्रह है। इसके साथ दो बातें जोड़ कर देखना जरूरी है कि फसल-चक्र परिवर्तन और मिलेट्स पर भी जोर दिया जाता है, जो आवश्यक है तथा यह भी कि भोजन में कार्बोहाइड्रेट प्रतिशत सीमित रखना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। 

इस बीच छत्तीसगढ़ में 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक धान खरीदी के कुल 2739 केंद्रों के माध्यम से 3100/ प्रति क्विंटल की दर से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी निर्धारित है। याद आया कि हमने 1965-66 में 'बालभारती' कक्षा-3 में पाठ पढ़ा था-

पाठ 28

धान की खेती


आज रायपुर शहर में किसानों की बड़ी भीड़ थी। सभी बहुत खुश दिखाई देते थे। जिलाध्यक्ष की कचहरी के सामने एक मंडप बनाया गया था। सुन्दर बंदनवारों और झंडियों से मंडप खूब सजाया गया था। मंडप में सभा का प्रबन्ध किया गया था, वहाँ प्रमुख अधिकारी और नेतागण इकट्ठे हुए थे। वहाँ आये हर व्यक्ति की जबान पर धमतरी के किसनसिंह का नाम था, क्योंकि आज का यह उत्सव उन्हीं के सम्मान के लिए हो रहा था। 

परन्तु किसनसिंह का यह सम्मान किसलिए? उन्होंने ऐसा क्या काम किया है? 

इसका कारण यह था कि किसनसिंह ने अपने खेत में सबसे अधिक धान पैदा की थी। छत्तीसगढ़ की मुख्य फसल धान है। अच्छी बरसात होने पर धान के पौधों को रोपने के पन्द्रह-बीस दिनों बाद सभी ओर हरी-हरी धान लहलहाने लगती है। पौष माह में कटाई के बाद धान की फसल तैयार हो जाती है। साधारणतः एक एकड़ जमीन में दस बारह मन धान पैदा होती है। परन्तु किसनसिंह ने अपनी एक एकड़ जमीन में पच्चीस मन धान पैदा की। सारे किसानों को किसनसिंह की इस सफलता पर बड़ी खुशी हो रही थी। वे जानते हैं कि अपने खेतों में अधिक से अधिक अनाज पैदा करना सबसे बड़ी देश-सेवा है। इससे देश में संपत्ति बढ़ेगी और जनता को खूब अनाज मिलेगा। दूसरे देशों के सामने हमें हाथ नहीं फैलाना होगा। इसलिए किसनसिंह ने जो कार्य कर दिखाया है, उसका महत्व बहुत अधिक है और इसीलिए आज उनका सम्मान किया जा रहा है।

सभा का समय होने पर जिलाध्यक्ष के साथ किसनसिंह मंडप में आये। उन्हें मंडप में आता देखकर सब लोग खड़े हो गये। वे मंच पर जाकर बैठ गये। फिर जिलाध्यक्ष ने अपना भाषण शुरू किया- 

‘‘किसान भाइयों! आप सभी जानते हैं कि हम लोग यहाँ श्री किसनसिंह का सम्मान करने के लिए इकट्ठे हुए है। देश में धान की फसल बढ़ाने के लिए सरकार ने अभी-अभी एक नया तरीका बताया है। अपने जिले में भी इस साल बहुत से किसानों ने यही तरीका अपनाया है। इससे उन्हें बहुत लाभ भी हुआ है। जहाँ पहले एक एकड़ जमीन में दस या बारह मन धान पैदा होती थी, वहाँ इस तरीके से बीस-बीस मन तक धान पैदा हुई है। कुछ किसानों ने तो बाईस मन तक धान पैदा की है, परन्तु किसनसिंह इन सबसे आगे बढ़ गये हैं। उन्होंने एक एकड़ जमीन में पच्चीस मन धान पैदा की है। आप सबकी ओर से मैं उनको बधाई देता हूं और उन्हें सरकार को ओर से एक हजार एक रुपये इनाम के रूप में भेंट करता हूँ।‘‘

इसके बाद जिलाध्यक्ष ने किससिंह को फूलों की माला पहनाई और रुपयों की थैली भेंट की। सभा में आये हुए सब लोगों ने तालियाँ बजाईं। तालियों की गड़गड़ाहट समाप्त होने पर किसनसिंह ने अपना भाषण शुरू किया- 

‘‘जिलाध्यक्ष महोदय और किसान भाइयो! आप लोगों ने मेरा जो सम्मान किया, उसके लिए मैं आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ। देश की संपत्ति बढ़ाना हमारा कर्त्तव्य है। इसके लिए जो कुछ भी हम कर सकें, वही हमारी सबसे बड़ी देश-सेवा होगी। अब मैं धान की फसल तैयार करने के नये तरीके के बारे में दो-चार बातें कहूँगा। पहली बात है, बीज का चुनाव। बीज अच्छा हो तो फल भी अच्छा होता है। धान की अच्छी फसल के लिए ठोस बीज चाहिए। ठोस बीजों का चुनना बहुत सरल है। बीजों को नमक के पानी में डाल दो। जो बीज हलका होगा, वह ऊपर तैर आयेगा। जो बीज नीचे बैठ जाये उसे ठोस समझना चाहिये। इन चुने हुए बीजों में कीड़े मारने वाली दवा लगा देना चाहिये और फिर उन्हें बोना चाहिये। ऐसा करने से फसल को कीड़ा नहीं लगता। 

पौधा लगाने के लिए क्यारियाँ ऊँची होनी चाहिये। उनमें गोबर और राख की खाद डालना चाहिये। जिस स्थान पर ऐसी खाद डाली जाती है, वहाँ पौधे ऊँचे और घने होते हैं। जिस जमीन में इन पौधों को रोपा जाये, उसमें भी खाद देना चाहिये। इसके लिए सड़ी पत्तियां, खली और हड्डियों का चूरा बहुत लाभदायक होता है। 

‘‘पौधों को एक सीधी कतार में रोपना चाहिये और दो पौधों के बीच साधारणतः आठ या दस अंगुल की जगह छोड़ देनी चाहिये। इससे पौधों को बढ़ने के लिए काफी जगह मिलती है। उन्हें धूप, प्रकाश और गरमी भी मिलती है। एक कतार में और थोड़ी-थोड़ी दूर पौधा रोपने से निदाई अच्छी तरह हो सकती है। धान की बाढ़ अच्छी होती है। उसमें अधिक अंकुर फूटते हैं, अच्छी बालें लगती हैं और खूब धान होती है। 

मैंने शुरू से ही बड़ी देखभाल की इसीलिए मैं इतनी धान पैदा कर सका और आपके सम्मान के योग्य ठहरा। मैं आपको इसके लिए बार-बार धन्यवाद देता हूँ।‘‘ 

ऐसा कहते हुए किसनसिंह ने दोनों हाथ जोड़े, और अपना भाषण समाप्त किया। एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट हुई। जिलाध्यक्ष महोदय से कहा-अब राष्ट्र-गीत गाया जायेगा। यह सुनकर सब लोग अपने-अपने स्थान पर चुपचाप खड़े हो गये। राष्ट्रगीत के बाद सभा समाप्त हो गई।

Saturday, August 20, 2022

संविधान सभा में छत्तीसगढ़ के सदस्य

यहां प्रस्तुत जानकारी, मुख्यतः इंटरनेट पर उपलब्ध अधिकृत या विश्वसनीय स्रोतों से ली गई है। साथ ही अल्पज्ञात प्रकाशित सामग्री तथा स्वयं द्वारा एकत्र जानकारियों का समन्वय किया गया है। यथासंभव तथ्यों का परीक्षण स्वयं किया गया है। भारत शासन द्वारा सन 2000 में पुनर्मुद्रित कराई गई भारतीय संविधान की प्रति, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर के पं. सुन्दरलाल शर्मा ग्रंथागार में उपलब्ध है, सदस्यों के हस्ताक्षर के लिए स्वयं अवलोकन कर इसे आधार बनाया गया है। अन्य जानकारी किसी अधिकृत स्रोत से उपलब्ध होने पर, यहां प्रस्तुत जानकारी में संशोधन/परिवर्धन कर दिया जावेगा।

इंटरनेट पर उपलब्ध कान्स्टीट्युएंट असेंबली ऑफ इंडिया - वाल्युम 1 में सोमवार, 9 दिसंबर 1946 की पहली बैठक में रजिस्टर में हस्ताक्षर के लिए नामों में मद्रास 43, बाम्बे से 19, बंगाल से 26, युनाइटेड प्राविंस से 42, पंजाब से 12, बिहार से 30, सी.पी. एंड बरार के 14, असम के 7, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस से 2, उड़ीसा से 9, सिंध से 1, दिल्ली से 1, अजमेर-मेरवारा से 1, कुर्ग से 1, इस प्रकार कुल 208 नामों का उल्लेख है, जिसमें सी.पी. एंड बरार के 14 नामों में सरल क्रमांक 1 पर पं. रवि शंकर शुक्ल, 6 पर ठाकुर छेदीलाल, एम.एल.ए., 10 पर गुरु अगमदास अगरमनदास, एम.एल.ए. का नाम छत्तीसगढ़ के सदस्यों का आया है। कान्स्टीट्युएंट असेंबली ऑफ इंडिया - वाल्युम 4 में सोमवार, 14 जुलाई 1947 की बैठक में रजिस्टर में हस्ताक्षर के लिए नामों में इस्टर्न स्टेट्स से राय साहब रघुराज सिंह का नाम आया है।

विकिपीडिया के ‘भारतीय संविधान सभा‘ पेज पर मध्यप्रांत और बरार [संपादित करें] के अंतर्गत दर्ज सदस्य नामों में से छत्तीसगढ़ के नाम, गुरु अगमदास, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, पं किशोरी मोहन त्रिपाठी, घनश्याम सिंह गुप्ता, रविशंकर शुक्ल, रामप्रसाद पोटाई, इस प्रकार कुल छह नाम हैं।

विकिपीडिया के कान्स्टीट्युएंट असेंबली ऑफ इंडिया पेज पर सेंट्रल प्राविंसेस एंड बरार के 19 नाम हैं, जिनमें ठाकुर छेदीलाल, घनश्याम सिंह गुप्ता, रविशंकर शुक्ल के अतिरिक्त अंबिका चरण शुक्ल (क्रम 1 पर) तथा गनपतराव दानी (क्रम 19 पर) नाम मिलता है, जो छत्तीसगढ़ से संबंधित हैं, उक्त दोनों नामों की पुष्टि अन्य स्रोतों से नहीं हुई है। साथ ही सेंट्रल प्राविंसेस स्टेट्स के सागर निवासी रतनलाल किशोरीलाल मालवीय, चिरमिरी में श्रमिक नेता के रूप में सक्रिय रहे, इसलिए छत्तीसगढ़ के सदस्यों में उनका नाम भी जोड़ लिया जाता है।

जानकारी मिलती है कि पुनर्गठित संविधान सभा के 299 सदस्यों की बैठक 31 दिसंबर 1947 को हुई, जिन सदस्यों की 2 वर्ष 11 माह, 18 दिन में कुल 114 दिन बैठक के बाद 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षर कर संविधान को मान्यता दी गई। संविधान सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर संविधान की प्रति में पेज 222 पर आठवीं अनुसूची के बाद पेज 231 तक दस पृष्ठों पर हैं। पेज 222 पर 17, 223 पर 30, 224 पर 34, 225 पर 34, 226 पर 34, 227 पर 32, 228 पर 30, 229 पर 34, 230 पर 34, 231 पर 5, इस प्रकार कुल 284? हस्ताक्षर हैं। हस्ताक्षरों के संबंध में ध्यान देने योग्य-

0 कुछ सदस्यों ने दो लिपियों में हस्ताक्षर किए हैं।
0 हस्ताक्षर के साथ कोष्ठक में नाम भी लिखा है।
0 मैसूर के एच.आर. गुरुवरेड्डी का हस्ताक्षर पेज 226 पर तथा पेज 229 पर, इस प्रकार एक ही व्यक्ति का एक जैसा ही दो हस्ताक्षर, कोष्ठक में नाम सहित आया है।
0 पेज 229 पर दो हस्ताक्षर के नीचे दिनांक 24.1.1950 भी अंकित है।
0 राजेन्द्र प्रसाद का हस्ताक्षर जिस स्थान पर है, उसे देख कर लगता है कि अंतिम प्रारूप हस्ताक्षर के लिए सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू को प्रस्तुत किया गया और जैसा कायदा है, लेख और हस्ताक्षर के बीच खाली स्थान न छोड़ते हुए, उन्होंने अपने हस्ताक्षर किए हैं। अतएव राजेन्द्र प्रसाद द्वारा जगह बनाते जवाहरलाल नेहरू के उपर तिरछे हस्ताक्षर किया गया।
0 संविधान सभा की बैठकों के प्रतिवेदन से जानकारी मिलती है कि 24 जनवरी 1950 को संविधान की प्रति पर हस्ताक्षर के लिए अध्यक्ष द्वारा सदस्यों से आग्रह किया जाता है कि वे एक-एक कर आएं और प्रतियों पर हस्ताक्षर करें। सदस्यगण जिस क्रम में बैठे हैं, उसी क्रम में उन्हें पुकारा जाएगा प्रधानमंत्री को पब्लिक ड्यूटी में जाना है इसलिए हस्ताक्षर के लिए उनसे पहले आग्रह किया गया।
0 ग्रंथागार वाली जिस प्रति का मैंने अवलोकन किया है उसमें कुल 231 पेज में, पेज 228 तथा पेज 229 दो-दो बार हैं, इससे संभव है कि इस संस्करण में मुद्रित किसी प्रति में उक्त दो पेज कम हों।

छत्तीसगढ़ के सदस्यों में, पेज 227 पर रविशंकर शुक्ल और ठाकुर छेदीलाल के हस्ताक्षर 228 पर घनश्याम सिंह गुप्त के हस्ताक्षर (नागरी में), 229 पर रामप्रसाद पोटाई और 230 पर के.एम. त्रिपाठी के हस्ताक्षर (रोमन में) हैं, इस प्रकार कुल पांच व्यक्तियों के हस्ताक्षर हैं। लोक सभा की साइट पर नवंबर 1949 की स्थिति में संविधान सभा के सदस्यों की प्रदेशवार सूची में सेंट्रल प्राविंसेस एंड बरार के 17 नामों में छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल (क्रम 5 पर), घनश्याम सिंह गुप्त (क्रम 10 पर), रवि शंकर शुक्ल (क्रम 13 पर) तथा सेंट्रल प्राविंसेस स्टेट्स के तीन नामों में छत्तीसगढ़ के किशोरीमोहन त्रिपाठी (क्रम 2 पर) तथा रामप्रसाद पोटई (क्रम 3 पर) हैं। इस प्रकार पुष्टि होती है कि उक्त पांच संविधान सभा के नियमित तथा हस्ताक्षर की तिथि तक सदस्य रहे।


उक्त संविधान पुरुषों के यों अन्य फोटो भी उपलब्ध होते हैं, किंतु यहां उनकी फोटो आगे आए समूह चित्र से निकाली गई है। उक्त समूह चित्र में घनश्याम सिंह गुप्त की पहचान मेरे द्वारा निश्चित नहीं कर पाने के कारण उनकी अन्य तस्वीर ली गई है। फोटो के नीचे हस्ताक्षर संविधान की प्रति में किए गए हस्ताक्षर से लिए गए हैं।

यहां आए छत्तीसगढ़ के नामों में मुख्यमंत्री रहे रविशंकर शुक्ल, अकलतरा के बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, दुर्ग के घनश्याम सिंह गुप्त, कांकेर के रामप्रसाद पोटई, रायगढ़ के के.एम. त्रिपाठी यानी किशोरी मोहन त्रिपाठी और सतनामी गुरु अगमदास अगरमनदास, उनका परिवार सामान्यतः जाना जाता है। रघुराज सिंह (Ragho Raj Singh), सरगुजा स्टेट के दीवान रहे तथा बाद में राजकुमार कॉलेज, रायपुर में प्रिंसिपल रहे, उनका परिवार अब रायपुर निवासी है।

सामने से पहली की पंक्ति-59 सदस्य, दूसरी पंक्ति-59, तीसरी पंक्ति-58, चौथी पंक्ति-54 तथा सबसे पीछे पांचवीं पंक्ति में 48, इस प्रकार कुल 278 व्यक्ति हैं। चित्र में पं. रविशंकर शुक्ल पहली पंक्ति में बायें से दाएं गणना में क्रम 39 पर, इसी तरह ठाकुर छेदीलाल दूसरी पंक्ति में क्रम 40 पर, किशोरी मोहन त्रिपाठी तीसरी पंक्ति में क्रम 7 पर और रामप्रसाद पोटई इसी तीसरी पंक्ति में क्रम 34 पर हैं। जैसा कि उपर उल्लेख है इस तस्वीर में घनश्याम सिंह गुप्त की पहचान निश्चित नहीं हो सकी है।

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत का संविधान पारित किए जाने के अवसर पर अपने भाषण में अनुवादकों का उल्लेख करते हुए कहा था माननीय श्री जी.एस. गुप्त की अध्यक्षता वाली अनुवाद समिति के द्वारा संविधान में प्रयुक्त अंग्रेजी के समानार्थी हिंदी शब्द तलाशने का कठिन कार्य किया गया है।

संबंधित अन्य जानकारी की प्रस्तुति ‘हमारे संविधान पुरुष और हिंदी‘ शीर्षक से अगली पोस्ट पर।

दैनिक सांध्य छत्तीसगढ़ में प्रकाशित


Monday, October 4, 2021

अभिलेख सूची

छत्तीसगढ़ के प्राचीन अभिलेखों- शिलालेख, ताम्रपत्र आदि की यह सूची, समय-समय पर अद्यतन की जा रही है।

• सुतनुका देवदासी का रामगढ़ (सरगुजा) जोगीमारा गुहालेख
• रामगढ़ (सरगुजा) सीताबेंगरा गुहालेख
• किरारी काष्ठ स्तंभलेख
• आरंग ब्राह्मी शिलालेख
• कुमारवरदत्तश्री का ऋषभतीर्थ गुंजी भित्तिलेख
• मल्हार से प्राप्त 'राधिकस' शिलालेख- बिलासपुर संग्रहालय
• बूढ़ीखार, मल्हार विष्णु प्रतिमालेख
• छातागढ़ का प्रथम शिलालेख- रायपुर संग्रहालय
• छातागढ़ का द्वितीय शिलालेख- रायपुर संग्रहालय
• आतुरगांव, कांकेर का शिलालेख
• मल्हार का 'सक अमचस' शिलालेख
• सेमरसल का खंडित शिलालेख
• मदकूदीप का प्रथम शिलालेख
• मदकूदीप का द्वितीय शिलालेख
• तरेंगा का शिलालेख
• पाण्डुका का शिलालेख
• राजर्षितुल्य कुल के भीमसेन द्वितीय का आरंग ताम्रलेख, गुप्त संवत 182?
• मेकल पाण्डुवंश के उदीर्ण्णवैर (शूरबल) का बम्हनी ताम्रलेख राज्यवर्ष 2
• सामंत इन्द्रराज का मलगा ताम्रपत्र राज्यवर्ष 1 या 11
• मल्हार का मेकल पाण्डुवंश का अधूरा ताम्रलेख
• शूरबल का मल्हार का ताम्रलेख राज्यवर्ष 8
• नरेन्द्र का पिपरदुला ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• नरेन्द्र का कुरूद ताम्रलेख राज्यवर्ष 24
• नरेन्द्र का रवांन (मल्हार) का अधूरा ताम्रलेख
• जयराज का अमगुड़ा ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• जयराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• जयराज का आरंग ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• जयराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• सुदेवराज का नहना ताम्रलेख राज्यवर्ष 2
• सुदेवराज का धमतरी ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• सुदेवराज का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का आरंग ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का कौआताल ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का रायपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 10
• सुदेवराज का सारंगढ़ (चुल्लाण्डरक ग्रामदान) ताम्रलेख
• सुदेवराज का पोखरा ताम्रलेख (मध्य पृष्ठ)
• प्रवरराज का ठकुरदिया ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• प्रवरराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• रक्सा (पोखरा) ताम्रलेख
• अमरार्यकुल के व्याघ्रराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 4
• कोसल पाण्डुवंश के ईशानदेव का लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद शिलालेख
• तीवरदेव का बोंडा ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• तीवरदेव का राजिम ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• तीवरदेव का बलौदा ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• तीवरदेव का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष
• तीवरदेव का (तिरुवनंतपुरम) ताम्रलेख राज्यवर्ष
• नन्नराज का अड़भार (अधूरा)ताम्रलेख
• भवदेव रणकेसरी का आरंग या भांदक में प्राप्त शिलालेख
• वासटा का लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर) से प्राप्त शिलालेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का बरदुला ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का बोंडा ताम्रलेख राज्यवर्ष 22
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का मल्लार ताम्रलेख फाल्गुन वर्ष- 57
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का लोधिया ताम्रलेख राज्यवर्ष 57
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का मल्लार ताम्रलेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 25
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 37
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 38
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 46
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 48
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 55
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित कतम्बपदूल्लक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित कोशम्ब्रक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित चोरपद्रक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख
• मल्हार के रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय और गुलाब सिंह ताम्रलेख
• सिरपुर गंधेश्वर मंदिर से प्राप्त जोर्ज्जराक शिलालेख व अन्य शिलालेख
• सेनकपाट, सिरपुर शिलालेख
• सिरपुर सुरंग टीले से प्राप्त शिलालेख
• बुद्धघोष का सिरपुर के निकट प्राप्त शिलालेख
• मल्हार का तिथिरहित कैलासपुर ग्रामदान ताम्रलेख
• तिथिरहित शुष्क सिरिल्लिका ग्रामदान ताम्रलेख,
• तिथिरहित पातिकारसीमक ग्रामदान का अधूरा ताम्रलेख
• मल्हार का बासिन डिपरा शिलालेख
• सिरपुर गंधेश्वर मंदिर के शिलालेख

• भवदत्तवर्मन का रिठापुर ताम्रपत्र, राज्यवर्ष-11
• स्कंदवर्मन? का पोड़ागढ़ शिलालेख, राज्यवर्ष-12
• अर्थपति भट्टारक का केसरीबेड़ा ताम्रपत्र, राज्यवर्ष-7
• विलासतुंग का राजिम शिलालेख

• बड़े डोंगर (बस्तर) का उभपार्श्वीय शिलालेख
• मोहला (दुर्ग) का वाकाटक अधूरा ताम्रलेख
• शिवदुर्ग का दुर्ग में प्राप्त शिलालेख
• मदकूदीप से प्राप्त दो शिलालेख

• त्रिपुरी कलचुरियों का महेशपुर शिलालेख
• डीपाडीह शिलालेख

• पृथ्वीदेव प्रथम का रायपुर ताम्रलेख कलचुरि संवत 821
• पृथ्वीदेव प्रथम का अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत 831
• जाजल्लदेव प्रथम का रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 866
• जाजल्लदेव प्रथम के पाली मंदिर के लघु लेख
• रत्नदेव द्वितीय का शिवरीनारायण ताम्रलेख कलचुरि संवत 880
• रत्नदेव द्वितीय का सरखों ताम्रलेख कलचुरि संवत 880
• रत्नदेव द्वितीय कालीन अकलतरा शिलालेख
• रत्नदेव द्वितीय का पारागांव ताम्रलेख कलचुरि संवत 885
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन कोटगढ़ शिलालेख
• पृथ्वीदेव द्वितीय का दहकोनी ताम्रलेख कलचुरि संवत 890
• रत्नदेव द्वितीय कालीन कुगदा शिलालेख कलचुरि संवत् 893
• रत्नदेव द्वितीय का पासिद ताम्रलेख कलचुरि संवत 893
• पृथ्वीदेव द्वितीय का बिलाईगढ़ में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि) संवत् 896
• राजिम शिलालेख कलचुरि संवत 896
• पारागांव ताम्रपत्र कलचुरि संवत 897
• शिवरीनारायण मूर्तिलेख कलचुरि संवत् 898
• कोनी शिलालेख कलचुरि संवत 900
• अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत 900?
• पृथ्वीदेव द्वितीय का घोटिया में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि संवत 1000? (900)
• गोपालदेव का पुजारीपाली शिलालेख
• पृथ्वीदेव द्वितीय का अमोदा में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि संवत् 905
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 910
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 915
• जाजल्लदेव द्वितीय का समडील शिलालेख क.सं. 913
• जाजल्लदेव द्वितीय का अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत् 91(9)
• जाजल्लदेव द्वितीय कालीन मल्हार शिलालेख कलचुरि संवत 919
• अमरकंटक मूर्तिलेख कलचुरि संवत 922
• रत्नदेव तृतीय का खरौद शिलालेख कलचुरि संवत 933
• पासिद ताम्रलेख कलचुरि संवत 934
• प्रतापमल्ल का पेंडराबंध ताम्रलेख कलचुरि संवत 965
• प्रतापमल्ल का कोनारी ताम्रलेख कलचुरि संवत 968
• प्रतापमल्ल का बिलाईगढ़ ताम्रलेख कलचुरि संवत् 969
• वाहर के महामाया मंदिर, रतनपुर शिलालेख संवत 1552
• वाहर का कोसगई प्रथम शिलालेख
• वाहर का कोसगई द्वितीय शिलालेख विक्रम संवत 1570
• ब्रह्मदेव का रायपुर शिलालेख विक्रम संवत् 1458
• हरि ब्रह्मदेव का खल्लारी शिलालेख विक्रम संवत 1470
• भानुदेव का कांकेर शिलालेख शक संवत 1242
• अमरसिंह देव का आरंग ताम्रपत्र संवत 1792

• लखनी देवी मंदिर, रतनपुर शिलालेख
• लहंगाभाठा जबलपुर संग्रहालय शिलालेख

• मलुगिदेव का कोटेरा ताम्रलेख शक संवत 1106
• भोजदेव का कोटेरा ताम्रलेख शक संवत 1126 का ताम्रलेख
• भोरमदेव से प्राप्त सं. 1407 का सती शिलालेख
• देवकूट मंदिर शिलालेख

• बाघराज का तिथिरहित गुरुर स्तंभलेख
• कर्णराज का सिहावा लेख शक संवत 1114 (ईस्वी 1191-92)
• पम्पराज के दो ताम्रपत्र लेख कलचुरि संवत 965 और 966 (ईस्वी 1213 और 1214)
• भानुदेव का कांकेर शिलालेख शक संवत 1242 (ईस्वी 1320)


• रतनपुर कर्णार्जुनी मंदिर शिलालेख सं.1927
• शिवरीनारायण सिंदुरगिरी मंदिर शिलालेख

रत्नपुर भोंसलाकालीन उत्कीर्ण लेख
• रतनपुर कर्णार्जुनी मंदिर शिलालेख संवत 1927
• शिवरीनारायण सिंदुरगिरी मंदिर शिलालेख
• सरगुजा अंचल के अन्य उत्कीर्ण लेख
• महेशपुर से प्राप्त त्रिपुरी कलचुरियों का शिलालेख
• डीपाडीह शिलालेख

मेरे द्वारा तैयार यह सूची पूर्व में इस ब्लाग के पेज के रूप में थी, अब पोस्ट के रूप में प्रस्तुत की गई है। पोस्ट पर आई टिप्पणियों को भी यथावत रखा जा रहा है।

1. शकुन्तला शर्मा June 10, 2013 at 6:26 PM छत्तीसगढ की पावन धरा इतनी समृध्द है, ऐसा तो मैने कभी सोचा भी नहीं था, मुझे लगता है कि जिस तरह राहुल जी की गति बढ रही है, यह लिस्ट भी बढेगी। जितने भी शिलालेख, भित्तिलेख, गुहालेख, स्तम्भलेख, प्रतिमालेख एवम् ताम्रपत्रलेख उपलब्ध हैं, इन सबको शीघ्रातिशीघ्र, पढने की उत्कट इच्छा हो रही है। राहुल जी की साधना स्तुत्य है।
2. RAM SUMER July 16, 2013 at 6:18 PM Mati m mil jaahi re mati ke chola kaakhar karaun main gumaan. ... Sir! Ye abhilekh likhne-likhaane vaale raaje -mahaaraaje yaa unke vansh ke log smy ke pravaah me kahaan kho gaye sir.....! Aur chhattisgarh fir se matiyaet hone jaa rahaa hai power plant ke baadh me.... Jim kisaano ko kayi sau saal tk unke kheton ko pani ke liye trsna padaa.... ab apne purkhon ki thaati ko kaudiyon ke daam bechkr kin dhoolkno me gum ho jayenge. pta nhi ?
3. Unknown January 8, 2019 at 9:22 PM Excellent knowledge sir...
4. mspotapani April 25, 2020 at 8:27 PM दुर्लभ संकलन एवं शोध के लिए सादर-सादर नमन सरजी।
5. Anonymous July 1, 2020 at 2:49 PM सर इसमें धमधा के महामाया मंदिर का शिलालेख और दानी तालाब का ताम्रपत्र भी जोड़ सकते हैं।
6. Unknown July 8, 2021 at 11:10 PM Sbhi shilalekh k bare m detail jankari upload kre....

Monday, September 21, 2020

गांधीजी की तलाश

सदी बीत गई, सन् 1920, जब गांधीजी आए थे। इस साल 2 अक्टूबर के आगे-पीछे, गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रथम प्रवास के बताए जाने वाले माह, सितंबर-दिसंबर के बीच भटकते मन ने सत्य के प्रयोग करना चाहा, यहां उसका लेखा-जोखा है। विभिन्न स्रोतों से यहां एकत्र की गई जानकारियों का उद्देश्य यह कि गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास की तथ्यात्मक, असंदिग्ध जानकारी स्पष्ट हो सके, ताकि ‘सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय‘ तथा ऐसे अन्य प्रामाणिक स्रोतों में जहां यह सूचना दर्ज नहीं है, प्रविष्टि के लिए ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सके।

‘‘श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ‘‘ का प्रकाशन उनकी 79 वीं जन्म-तिथि पर अगस्त 1955 में हुआ था। सन 1920 में गांधीजी के रायपुर आने का संभवतः पहले-पहल उल्लेख यहीं हुआ है। इस ग्रंथ के जीवनी खंड में श्री रविशंकर शुक्ल के ‘मेरे कुछ संस्मरण‘ शीर्षक लेख में पेज 44 पर उल्लेख आया है कि ‘‘सन् 1920 की कलकत्ता की विशेष कांग्रेस से पूर्व महात्मा गांधी रायपुर आये थे।‘‘ इस पंक्ति के अलावा गांधीजी के रायपुर आगमन-प्रवास का कोई विवरण यहां नहीं दिया गया है। इसके पश्चात् ‘‘सन् 1920 में दिसम्बर मास में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ‘‘, उल्लेख आता है। आगे उनकी 1933 की यात्रा का विवरण पर्याप्त विस्तार से है। ध्यातव्य है कि सन 1920 में कलकत्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का विशेष अधिवेशन, गांधीजी की उपस्थिति में 4 से 9 सितंबर तक हुआ था, जिसमें असहयोग, हंटर कमेटी की रिपोर्ट तथा पंजाब में हुए अत्याचारों के संबंध में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के रुख पर प्रस्ताव पारित किये गये।

‘मध्यप्रदेश संदेश‘ के 30 जनवरी 1988 अंक में सितम्बर, 1920 की 20 एवं 21 तारीख को गांधीजी की छत्तीसगढ़ यात्रा, जिसमें रायपुर, धमतरी और जाने तथा यात्रा का कारण कंडेल नहर आंदोलन, उल्लेख आया है। इसी अंक में अन्य स्थान पर धमतरी से कुरुद और कन्डेल ग्राम जाने का भी लेख है। पुनः इस अंक में श्यामसुन्दर सुल्लेरे के लेख का उद्धरण है- ‘‘21 दिसंबर, 1920 को गांधी जी रायपुर से धमतरी होते हुए कुंडेल गांव भी गए और सत्याग्रहियों से मिलकर उनके साहस की सराहना की।

अक्टूबर 1969 में मध्यप्रदेश गांधी शताब्दी समारोह समिति के लिए सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय द्वारा ‘मध्यप्रदेश और गांधीजी‘ पुस्तक प्रकाशित की गई। प्रस्तावना में बताया गया है कि पुस्तक की सामग्री का संकलन, लेखन, सम्पादन तथा मुद्रण का कार्य श्री श्यामसुन्दर शर्मा ने किया है। पुस्तक के आरंभ में ‘‘दस ऐतिहासिक यात्राएँ‘‘ शीर्षक लेख है, जिसमें बताया गया है कि ‘‘सन् 1920 में रायपुर तथा धमतरी की यात्रा में भी मौलाना शौकतअली गांधीजी के साथ थे।‘‘ तथा ‘‘गांधीजी की रायपुर तथा धमतरी की प्रथम यात्रा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण कही जा सकती है कि धमतरी की जनता ने सत्याग्रह-युग के विधिवत् उद्घाटन के पहले ही असहयोग तथा बहिष्कार के मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त की थी। सन् 1920 में जब गांधीजी धमतरी गए तब तक वहां कण्डेल नहर सत्याग्रह द्वारा जनता विदेशी शासन से लोहा ले चुकी थी और उसे सफलता भी मिल चुकी थी।‘‘ यहां तिथि अथवा माह का उल्लेख नहीं है।

पुस्तक में ‘‘दूसरी यात्रा-1920 रायपुर तथा धमतरी में‘‘ लेख की उल्लेखनीय प्रासंगिक जानकारियां इस प्रकार है कि सितंबर 1920 कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन, इन दो ऐतिहासिक अधिवेशनों के बीच (पं. रविशंकर शुक्ल के संस्मरण में दी गई जानकारी से यह अलग है।) रायपुर नामक स्थान को इस बात का गौरव प्राप्त है कि उसने गांधीजी का स्वागत किया औैर उनके राजनीतिक विचारों का श्रवण तथा मनन किया। ... जुलाई के महीने में धमतरी के निकट कंडैल नामक गांव में नहर-सत्याग्रह आरंभ हो गया। गांधीजी की रायपुर की यह यात्रा इसी सत्याग्रह की पृष्ठभूमि में हुई थी। कंडैल नहर-सत्याग्रह के प्रमुख संचालक, पं. सुन्दरलाल शर्मा को गांधीजी से परामर्श के लिए कलकत्ता भेजा गया। किन्तु कलकत्ता में उन की गांधी से भेंट न हो सकी और दक्षिण भारत के किसी स्थान पर ही यह भेंट हुई। श्री शर्मा ने उन्हें कण्डैल नहर-सत्याग्रह का परिचय दिया तथा उनसे धमतरी आने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे पं. सुन्दरलाल शर्मा के साथ 20 अथवा 21 दिसम्बर 1920 को कलकत्ता से रायपुर पधारे। उनके साथ अली-बन्धुओं में मौलाना शौकत अली भी थे।

आज जो गांधी चौक है, उस स्थान पर एक विशाल सार्वजनिक सभा में उनका भाषण हुआ। इस समय गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। ... रायपुर से गांधी जी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये। ... धमतरी पहुंचने पर गांधीजी का बड़े उत्साह से स्वागत हुआ। कंडैल सत्याग्रह अब तक समाप्त हो चुका था ... उनके भाषण का प्रबंध जामू हुसैन के बाड़े में किया गया था ... श्री उमर सिंह नामक एक कच्छी व्यापारी ने उन्हें कंधे पर बिठाया और मंच तक ले गया ... श्री बाजीराव कृदत्त ने नगर तथा ग्राम-निवासियों की ओर से गांधीजी को 501 रु. की थैली भेंट की। लगभग 15000 लोगों की उपस्थिति में गांधीजी और मौलाना शौकत अली के भाषण हुए। गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग और सत्याग्रह की बात लोगों को समझाई। श्री शौकतअली ने अपने भाषण में सदा की तरह मजाकिया अंदाज में कहा- मैं तो हाथी जैसा हूं और गांधीजी बकरी जैसे हैं ...

धमतरी से गांधीजी कंडैल ग्राम भी गये। इस अवसर पर वे कुरुद गांव भी गये ... धमतरी में गांधीजी के ठहरने की व्यवस्था श्री नारायणराव मेघावाले के निवास-स्थान पर की गई थी जहां उन्होंने रात्रि विश्राम किया। प्रातःकाल वे पुनः रायपुर के लिये रवाना हो गये। ... धमतरी से लौटने के बाद गांधीजी ने रायपुर में महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया ... अनुमानतः दो हजार रुपयों के मूल्य के सोने चांदी के गहने और रुपये एकत्रित हो गये। ... इस सभा के पश्चात् बापू नागपुर की ऐतिहासिक-कांग्रेस के लिए रवाना हो गये।

रायपुर से प्रकाशित राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के गांधी जन्म शताब्दी अंक 2-10-1969 में पेज-4 पर श्री रामानन्द दुबे का संस्मरण, ‘मुझे महिलाओं में देखकर बापू खिलाखिला कर हंस पड़े थे‘ शीर्षक प्रकाशित हुआ। यह शीर्षक सन 1945 मई के बंबई में आयोजित शिविर के प्रसंग से संबंधित है। मगर इस लेख का आरंभ होता है- ‘गांधीजी को निकट से निहारने की लालसा बचपन से थी। सन् 1920-21 में जब वे कलकत्ता जाते हुए रायपुर पधारे थे तब मैं नौ वर्ष का निरा नादान बालक था। आनन्द समाज पुस्तकालय के समीप ‘विनोबा‘ बालोद्याान के मैदान में टट्टों से बने विशाल पेंडाल में उनका कार्यक्रम था। टट्टों के छेद से घुसकर किसी प्रकार मैं मंच के पास पहुंच ही गया और गांधीजी को जी भरकर देखा। यह प्रथम दर्शन लाभ था। बाल मन पर उनका अमिट प्रभाव पड़ा जो जीवन पर्यन्त कायम रहेगा।‘ इस संस्मरण में तिथि रहित काल 1920-21 तथा ‘कलकत्ता जाते हुए‘ विशेष ध्यान देने योग्य है।

सन 1970 में ‘‘छत्तीसगढ़ में गाँधीजी‘‘ का प्रकाशन, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से गांधी शताब्दी समारोह समिति द्वारा डॉ. ठा. भा. नायक के सम्पादकत्व में हुआ। इस पुस्तक में श्री हरि ठाकुर ने अपने लेख में लिखा है कि ‘‘देश को गांधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का मार्ग सुझाया। ... कन्डेल नामक ग्राम में नहर सत्याग्रह आरम्भ हुआ। इस सत्याग्रह के सूत्रधार थे पं. सुन्दरलाल शर्मा ... अन्त में इस सत्याग्रह के नेताओं ने गांधीजी से पत्र-व्यवहार किया। और गांधीजी ने इस सत्याग्रह का मार्गदर्शन करना स्वीकार किया। गांधीजी उस समय बंगाल का दौरा कर रहे थे। उन्हें बुलाने के लिये पं. सुन्दरलाल शर्मा गये। 20 दिसम्बर सन् 1920 को महात्मा गांधी का प्रथम बार रायपुर आगमन हुआ। उसी दिन उन्होंने गांधी चौक में अपार जनसमूह को संबोधित किया। रायपुर से गांधीजी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये।... गांधीजी के आगमन के साथ ही कंडेल सत्याग्रह स्थगित हो गया। ... इसलिये गांधीजी धमतरी से ही वापस लौट आये। धमतरी और कुरुद से वापस लौटने पर गांधीजी पुनः राययपुर में रुके और उन्होंने महिलाओं की एक विशाल सभा को संम्बोधित किया। महिलाओं से गांधीजी ने ‘तिलक स्वराज्य‘ फण्ड के लिए मांग की और उन्हें तुरन्त दो हजार रु. के मूल्य के गहने प्राप्त हुए।

इस पुस्तक में केयूर भूषण मिश्र ने अपने लेख में मात्र उल्लेख किया है कि ‘‘कन्डेल सत्याग्रह सन् 1917 में प्रारंभ हुआ और 1920 में इस सत्याग्रह ने सफलता प्राप्त की।‘‘ किंतु यहां सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं है। डॉ. शोभाराम देवांगन के लेख में ‘‘इस सत्याग्रह को व्यापक तथा सर्वदेशीय रूप प्रदान करने हेतु यहां से पं. सुन्दरलालजी शर्मा राजिम वाले को 2 दिसम्बर सन् 1920 ईं को महात्मा गांधीजी के पास कलकत्ता इस परिस्थिति का ज्ञान कराने तथा उन्हें धमतरी लाकर आशीर्वाद प्राप्त करने के अतिरिक्त इस सत्याग्रह का संचालन सूत्र उनके हाथ में देने की अपेक्षा कर रवाना किया।’’ ... इस तरह यह नहर सत्याग्रह, महात्मा गांधी के धमतरी आगमन के पूर्व ही पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।‘‘(पेज-90) यहां सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की स्पष्ट चर्चा नहीं है।

हरिप्रसाद अवधिया ने लिखा है कि ‘‘अपने आन्दोलन के सर्व प्रथम चरण में ही सन् 1920 में मौलाना शौकत अली को साथ लिये गांधीजी का रायपुर में आगमन हुआ। इस पुस्तक में डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र और घनश्याम सिंह गुप्त के संस्मरणों में सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ के प्रवास की चर्चा नहीं है।

अब्बास भाई का संस्मरण है कि सन् 1921 में महात्माजी और मौलाना शौकत अली का रायपुर में आगमन हुआ। उन्हें धमतरी जाना था परन्तु शासन और पुलिस के आतंक के कारण मोटर मिलना दुष्कर था। पं. शुक्लजी के आह्वान पर मैं महात्माजी, मौलाना शौकत अली और उनकी पार्टी को अपनी मोटर बस में ले जाने के लिए तैयार हुआ। समय पर पुलिस वालों ने मेरे मोटर ड्राइवर को वहीं रोक लिया। ... मैं महात्माजी और मौलाना सहित पं. शुक्लजी और दूसरे नेतागण को रायपुर ब्राह्मणपारा में जो लाइब्रेरी है, वहां सं बैठाकर धमतरी ले गया। ... रायपुर मोटर बस सर्विस, रायपुर के नामसे सर्विस चलती थी तथा प्रोप्रायटर वली भाई एण्ड ब्रदर्स। ... डिप्टी कमिश्नर श्री सी. ए. क्लार्क ने हमारी कंपनी का मोटर चलाने का लाइसेंस भी रद्द कर दिया।

प्रभूलाल काबरा ने लिखा है कि- राजनांदगांव में गांधीजी मौ. मोहम्मद अली, शौकत अली, जमनालाल बजाज, के साथ जब कलकत्ता जा रहे थे ... जिस समय वे कलकत्ता के खास अधिवेशन में जा रहे थे उसी ट्रेन में लोकमान्य तिलक, दादा साहब खापर्डे, डा. मुंजे भी प्रथम दर्जे के डब्बे में यात्रा कर रहे थे ... आखिर गांधीजी ने दरवाजा खोला। इसके पश्चात्, जब गांधीजी रायपुर आयेः- में बताया है कि ‘‘ज्योंही गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी, श्री शुक्ल आदि नेतागण ... इस विवरण के साथ सन् नहीं दिया गया है, लेकिन अनुमान होता है कि यह सन् 1933 का विवरण है। कन्हैया लाल वर्मा का संस्मरण भी बिना सन् के उल्लेख के है। अद्वैतगिरी जी ने लिखा है कि सन् 1920 में गांधीजी रायपुर आये। स्वर्गीय श्री सुन्दरलालजी शर्मा के भांजे कन्हैयालाल जी अध्यापक के निवासगृह में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई। संध्याकाल उन्होंने एक आमसभा को संबोधित किया। भाषण के मुख्य विषय देश की स्वतंत्रता, एकता और सत्याग्रह थे।

महंत लक्ष्मीनारायण दास जी ने लिखा है कि सन् 1921 की घटना है, जब महात्मा गांधी पहली बार रायपुर आये और उन्होंने जैतूसाव मठ को अपनी अविस्मरणीय भेंट दी। ... महात्मा गांधी के साथ उनके दो अनन्य मित्र और अनुयायी स्वर्गीय शौकत अली और स्वर्गीय मोहम्मद अली भी साथ थे।

इसी पुस्तक के अन्य लेख में डा. शोभाराम देवांगन ने लिखा है कि पं. सुन्दरलालजी शर्मा, राजिम वाले, महात्मा गांधी को धमतरी लाने के लिये 2 दिसम्बर, सन् 1920 को कलकत्ता गये थे किन्तु वहां उनसे भेंट न हो सकी। ... अंत में उनसे दक्षिण भारत के एक नगर में जहां महात्माजी का कार्यक्रम अधिक दिनों के निश्चित था, वहां भेंट होना संभव हुआ। वे गांधीजीको धमतरी तहसील के कंडेल गांव के नहर सत्याग्रह का पूर्ण परिचय कराकर धमतरी में लाने में सफल हुए (पेज-41)। 21 दिसंबर, 1920 ई. को ठीक 11 बजे महात्मा गांधी मौलाना शौकत अली के साथ, रायपुर होते हुए यहां पधारे। ... महात्मा गांधीजी के भाषण का प्रबन्ध यहां के एक प्रसिद्ध सेठ हुसेन के वृहत बाड़े में निश्चित हुआ था ... गुरुर निवासी श्री उमर सेठ नामक, एक कच्छी व्यापारी झट महात्माजी को उठाकर और अपने कंधों पर बिठाकर ... मालगुजार श्रीमन बाजीराव कृदत्त महोदय के हाथ से 501/ रुपये की थैली भेंट कर उनका हार्दिक स्वागत किया गया। लेख में बताया गया है कि लगभग 1 घंटे का भाषण हुआ इसके पश्चात् लगभग साढ़े बारह बजे सभा का कार्य समाप्त हुआ। श्री नत्थूजी जगताप के भवन पर फलाहार और लगभग दो बजे दिन को यहां से रायपुर के लिए प्रस्थान किए। इस तरह तीन चार घंटे के लिये यह नगर महात्माजी के आगमन पर आनंद विभोर में मग्न रहा।

श्रीमती प्रकाशवती मिश्र ने लिखा है कि महात्माजी के दर्शन 1920 के दिसम्बर माह में हुए जब रायपुर में उनका आगमन हुआ। कलकत्ते में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। लाला लाजपतराय अध्यक्ष थे। उसके पश्चात अखिल भारतवर्षीय दौरे पर कांग्रेस का असहयोग आन्दोलन के प्रचारार्थ महात्माजी रायपुर पधारे। महात्माजी उस समय ठक्कर बैरिस्टर के बंगले में ठहरे थे। ... महात्माजी रायपुर के दौरे के समय कुरुद व धमतरी भी गये थे।

धमतरी नगरपालिका परिषद, शताब्दी वर्ष 1981 की स्मारिका में, त्रिभुवन पांडेय ने सम्पादकीय में गांधीजी का पहली बार धमतरी आगमन नहर सत्याग्रह से प्रभावित होने के कारण और प्रवास की तिथि 21 दिसंबर 1920 बताया है। स्मारिका के इतिहास खण्ड ‘महात्मा गांधी की धमतरी यात्रा‘ शीर्षक सहित है, जिसमें 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास संबंधी जानकारी ‘मध्यप्रदेश और गाांधीजी‘ से ली गई है।

इस स्मारिका में भोपालराव पवार का लेख है, जिसका प्रासंगिक अंश- ‘‘अगस्त 1920 में कलकत्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विशेष अधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने असहयोग का प्रस्ताव खूब कश्मकश के बीच पास कराया और देश को तीन नये नारे दिये:- (1) सरकारी शिक्षालयों में पढ़ना पाप है। (2) सरकारी अदालतों में जाना पाप है। (3) विदेशी वस्त्रों का उपयोग करना पाप है। उन दिनों मैं भी श्री त्र्यंबकरावजी कृदत्त के साथ कलकत्ता में पढ़ता था। स्व. पं. सुन्दरलालजी शर्मा और स्व. नत्थूजीराव जगताप कलकत्ता अधिवेशन में आये थे और उसी मकान में ठहरे थे - जहां हम लोग रहते थे। ... स्व. शर्मा जी और स्व. जगताप साहेब ने महात्मा जी को धमतरी आने का निमंत्रण दिया, जिसे महात्मा जी ने स्वीकार किया। जिस दिन असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ - उसी दिन रात में कलकत्ता के विल्गिंटन स्क्वेयर में गांधीजी की आमसभा हुई। जिसमें उन्होंने अपने तीन नारों को दुहराया। दूसरे दिन हमलोग भी पढ़ाई छोड़कर उसी गाड़ी से घर आये-जिससे महात्मा जी रायपुर आये। रायपुर से महात्माजी को कार द्वारा धमतरी लाया गया और हम लोग ट्रेन से धमतरी आये।’’ अन्य स्रोतों के तथ्य इससे मेल नहीं खाते, इसलिए यह विश्वसनीय नहीं रह जाता।

सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास के संबंध में 1973 में प्रकाशित रायपुर जिला गजेटियर में जानकारी दी गई है कि महात्मा गांधी, कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के ठीक पहले 20 दिसंबर 1920 को अली बंधुओं के साथ तिलक कोष और स्वराज्य कोष के सिलसिले में रायपुर आए। गांधी जी धमतरी तथा कुरुद भी गए। गजेटियर में कंडेल नहर सत्याग्रह की घटना का विवरण गांधीजी के साथ नहीं, बल्कि पृथक से हुआ है। उल्लेखनीय है कि उक्त जानकारी के मूल स्रोत-संदर्भ का हवाला भी यहां नहीं दिया गया है।

यहां 1975 में प्रकाशित द्वारिका प्रसाद मिश्र के ‘लिविंग एन एरा‘ का उल्लेख आवश्यक है, 1998 में इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद ‘मेरा जिया हुआ युग‘ प्रकाशित हुआ, जिसके अध्याय-2 में 1920 के नागपुर अधिवेशन प्रसंग है। इसमें गांधी के छत्तीसगढ़-रायपुर प्रवास का उल्लेख नहीं है। यहां प्रासंगिक अंश मात्र इतना है- 
‘काँग्रेस के नागपुर अधिवेशन की तिथि ज्यों-ज्यों निकट आती गई त्यों-त्यों देश में उत्साह और आशा का संचार बढ़ता गया। रायपुर में भी उत्तेजना थी। दर्शक होकर इस महत्वपूर्ण अधिवेशन में उपस्थित रहने के लिए अनेक व्यक्ति बड़े उत्सुक थे। यह सुगम भी था क्योंकि रायपुर से नागपुर रेल और सड़क दोनों से जुड़ा था। सभी काँग्रेस कार्यकर्ताओं और उनके नेता रविशंकर शुक्ल से परिचित होने के कारण मैं सरलता से काँग्रेस का प्रतिनिधि बन गया।
१९२० से मैंने काँग्रेस के वार्षिक और लगभग सभी विशेष अधिवेशन देखे हैं लेकिन नागपुर के इस अधिवेशन की तुलना में कोई भी अन्य अधिवेशन नहीं ठहर सकता। कई कारणों से वह अनूठा था। १४००० से भी अधिक प्रतिनिधि इस अधिवेशन में उपस्थित थे।'

‘मध्यप्रदेश संदेश‘ का 15 अगस्त 1987 का अंक में स्वाधीनता आंदोलन विशेषांक था। इसमें सन्तोष कुमार शुक्ल के लेख में कंडेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में कहा गया है कि ‘‘पं. सुन्दरलाल शर्मा, श्री नारायणराव मेघावाले तथा छोटेलाल बाबू ने गांधी जी के सत्याग्रह से प्रेरणा पाकर ऐसा कदम उठाया था। जब नहर सत्याग्रह उग्र रूप से चल रहा था तभी पं. सुन्दरलाल ने सत्याग्रह के प्रणेता महात्मा गांधी से परामर्श लेकर इसे अखिल भारतीय रूप प्रदान करने का विचार किया। वे गांधीजी से मिलने कलकत्ता गये और उन्हीं के साथ 20 दिसम्बर, 1920 को कलकत्ता से रायपुर पधारे व उनके साथ मौलाना शौकतअली भी रायपुर आये थे। छत्तीसगढ़ में गांधीजी की यह प्रथम यात्रा थी। रायपुर में गांधी जी पं. रविशंकर शुक्ल के निवास-स्थान पर ठहरे। गांधीजी धमतरी और कुरूद भी गये। धमतरी में गांधीजी की ठहरने की व्यवस्था श्री नारायणराव मेघावाले के निवास-स्थान पर हुई थी। जब गांधीजी धमतरी पहुंचे तब कंडेल सत्याग्रह समाप्त हो चुका था। धमतरी की जनता विजयी सत्याग्रही के समान सत्याग्रह आंदोलन के जन्मदाता का स्वागत कर रही थी। धमतरी की सभा में श्री बजीराव कृदत्त ने ग्रामवासियों की ओर से 501 रुपये की थैली गांधीजी को भेंट दी। गांधीजी ने कंडेल ग्राम जाकर ग्रामवासियों को धन्यवाद दिया था, सत्याग्रह के मौलिक गुणों को समझाया भी था।‘‘

इस अंक में सुन्दर लाल त्रिपाठी के लेख के विवरण से सन 1921 तक बस्तर के लोग महात्मा गांधी से अनजान थे। वे स्वयं 1921 में उत्तरप्रदेश गए तब महात्मा गांधी के दर्शन का भी सौभाग्य मिला। उनके इस लेख में 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं की है। स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के लेख में कहा गया है- सन 1920 में तिलक निधि के संग्रह के सिलसिले में महात्मा गांधी के रायपुर आगमन ने राष्ट्रीयता की भावना को प्रस्फुटित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। तब कांग्रेस में महात्मा गांधी का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। उनके द्वारा प्रणीत सत्याग्रह के शस्त्र का सर्वप्रथम उपयोग हुआ रायपुर जिले के कण्डेल नहर सत्याग्रह के रूप में, जिसके सूत्रधार थे धमतरी के बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव। ... किसानों के इस अभूतपूर्व सत्याग्रह की सूचना महात्मा गांधी तक पहुंची। राजिम के लोकप्रिय नेता. पं. सुन्दरलाल शर्मा जो कि स्वयं उन दिनों हरिजन उद्धार के रचनात्मक अभियान के सूत्रधार थे, गांधी जी को लेकर रायपुर आये। गांधी जी के आगमन की सूचना से हुकुमत के शिविर में हड़कम्प मच गया। सरकारी कार्यवाही वापिस ली गई लेकिन इस सत्याग्रह को राष्ट्रव्यापी महत्व मिला। स्वयं गांधी जी धमतरी गये जहां उनका सार्वजनिक अभिनंदन, तत्कालीन नगरपालिका के द्वारा किया गया।‘‘

इसी अंक में सालिकराम अग्रवाल ‘शलभ‘ के लेख का उद्धरण है- ‘‘छत्तीसगढ़ के गांधी पंडित सुन्दरलाल शर्मा 3-12-1920 (तिथि छपाई के अक्षर के बजाय हाथ की लिखावट में है, जिससे अनुमान होता है कि यह अंतिम प्रूफ में संशोधित किया गया है।) को महात्मा गांधी से मिलने कलकत्ता गए और कंडेल ग्राम के नहर के सत्याग्रह और अंग्रेजों की दमन नीति से गांधी जी को अवगत कराया। अंग्रेजी सरकार से असहयोग करने की वृहत योजना लेकर जब श्री सुन्दरलाल शर्मा वापस आये तब धमतरी तहसील सहित समूचे रायपुर जिले में खलबली मच गई‘‘ इस लेख में तब गांधी जी के छत्तीसगढ़ प्रवास का कोई उल्लेख नहीं है। आगे इस अंक में राजेन्द्र कुमार मिश्र द्वारा प्रस्तुत पं. द्वारका प्रसाद मिश्र के संस्मरण में सन 1920 और गांधीजी की चर्चा में छत्तीसगढ़ प्रवास का उल्लेख नहीं है। इसी तरह श्यामलाल चतुर्वेदी द्वारा प्रस्तुत पंडित मुरलीधर मिश्र ने 1919 में जलियांवाला बाग के शहीदों की स्मृति में शोक दिवस मनाने और जुलूस निकाले जाने के बाद सीधे 1921 में नागपुर कांग्रेस के बाद जिला राजनीतिक सम्मेलन को याद किया है। इस बीच 1920 और गांधी जी के छत्तीसगढ़ प्रवास का उल्लेख नहीं किया है।

डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र एवं डॉ. शांता शुक्ला की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास‘ द्वितीय संस्करणः 1990 में पेज 106 पर उल्लेख है- ‘1920 का वर्ष भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में नये युग का प्रतीक था। ... चूंकि महात्मा गाँधी इस वर्ष छत्तीसगढ़ आये थे और धमतरी तहसील के विभिन्न स्थानों व रायपुर नगर की यात्रा की थी,‘। पेज 108 पर- पं. सुन्दरलाल शर्मा (राजिम वाले) को 2 दिसंबर 1920 को, महात्मा गाँधी को धमतरी आमंत्रित करने हेतु कलकत्ता भेजा गया, सत्याग्रह की बागडोर उनके हाथों में सौंपकर सत्याग्रह को सफल बनाने का निर्णय लिया गया।‘ इसी पेज पर- ‘यह नहर सत्याग्रह महात्मा गाँधी के धमतरी आगमन के पूर्व ही सफलता के साथ खत्म हो गया। गाँधीजी के छत्तीसगढ़ आगमन पर धमतरीवासियों ने विजयी सत्याग्रहियों के रूप में गाँधीजी का हार्दिक स्वागत किया।‘ पेज 214 पर- ‘शर्माजी ने स्थिति का निरीक्षण करने के लिए महात्मा गाँधी को आमन्त्रित किया व उन्हें लाने के लिए स्वयं कलकत्ता गये और महात्मा गाँधी जी को लेकर 20 दिसम्बर, 1920 को रायपुर आये। गाँधीजी का यह प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन था।‘ (प्रसंगवश, पुस्तक के इस संस्करण के अंत में ‘छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक स्रोत‘ सूची है, जिसमें 1979 तक के शोध-प्रबंध सम्मिलित हैं, अतएव पुस्तक का पहला संस्करण इसके पश्चात का होगा, किंतु पेज-2 पर उल्लेख है कि ‘वर्तमान छत्तीसगढ़ में रायपुर, सरगुजा, बिलासपुर, दुर्ग एवं बस्तर जिले हैं‘, यहां रायगढ़ और राजनांदगांव जिले का नामोल्लेख न होना, समझ से परे है।)

डाॅ. भगवान सिंह वर्मा की पुस्तक छत्तीसगढ़ का इतिहास राजनीतिक एवं सांस्कृतिक (प्रारंभ से 1947 ई. तक), संस्करणः तृतीय संशोधित 1995, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल में पेज 153 पर उल्लेख इस प्रकार है- ‘कन्डेल का आन्दोलन - इन दिनों छत्तीसगढ़ में शासन के खि़लाफ़ आन्दोलन करने के लिए लोगों में ग़ज़ब का उत्साह था। 20 सितम्बर सन् 1920 ई. को कण्डेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में गाँधीजी का रायपुर आगमन हुआ। वे कुरुद और धमतरी भी गये।‘

इसी पुस्तक में पुनः पृष्ठ - 155-56 पर उल्लेख है- कंडेल ग्राम का यह आन्दोलन अनेक माह तक चलता रहा। सरकारी अत्याचार दिनों दिन बढ़ते गये, ऐसी स्थिति में आन्दोलन का नेतृत्व गाँधीजी को ही सौंपने का विचार किया गया। इस आशय की प्रार्थना गाँधीजी से की गयी, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस हेतु पं. सुन्दरलाल शर्मा गाँधीजी से भेंट करने कलकत्ता गये। इसकी सूचना पाकर सरकार की सक्रियता में वृद्धि हुई। आन्दोलन स्थल पर जाकर रायपुर के डिप्टी कमिश्नर ने वस्तुस्थिति का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने यह सुझाव दिया कि ग्रामवासियों पर लगाया गया आरोप निराधार है। ऐसी स्थिति में उन्होंने जुर्माने की राशि को माफ करने की घोषणा की और प्रामीणों को जानवर वापस कर दिये गये। इस प्रकार गांधीजी के यहाँ आने के पूर्व यह सत्याग्रह आन्दोलन सफलतापूर्वक समाप्त हो गया, जो सम्पूर्ण क्षेत्र के लिए गौरव का प्रतीक था। गाँधीजी ने यहाँ आकर आन्दोलन को क्रियान्वित करने के सम्बन्ध में जनता का मार्गदर्शन किया।

गाँधीजी का छत्तीसगढ़ प्रवास - दिसम्बर सन् 1920 ई. में गांधीजी का छत्तीसगढ़ आगमन हुआ। वे सर्वप्रथम रायपुर आये। उनके आगमन से इस अंचल में राजनीतिक हलचल तीव्र हो उठी। रायपुर की जनता ने उनका हार्दिक स्वागत किया। गांधी चैक से उन्होंने लोगों को सम्बोधित किया। उन्होंने लोगों से यह आह्वान किया कि दासता से मुक्ति पाने के लिए वे असहयोग आन्दोलन में जुड़ें। 21 दिसम्बर सन् 1920 ई. को गांधीजी धमतरी पहुंचे। वहाँ भी उनका शानदार स्वागत किया गया। उन्होंने वहाँ लोगों को मंडई-बन्ध-चौक में सम्बोधित किया। धमतरी तहसील के प्रतिष्ठित जमींदार बाज़ीराव कृदत्त ने 501/- (पाँच सौ एक रुपये) की थैली भेंटकर उनका अभिनन्दन किया। उन्होंने अपने भाषण में कंडेल आन्दोलन की सफलता के लिए लोगों को बधाई दी और उनसे काँग्रेस के कार्यक्रम में सक्रियता से भाग लाने की अपील की। वहाँ से वे लगभग 3.00 बजे रायपुर के लिये रवाना हुये। मार्ग में उन्होंने कुरुद को जनता से भेंट की। रायपुर आने पर उन्होंने आनन्द समाज वाचनालय के समीप महिलाओं को एक सभा को सम्बोधित किया। सभा के दौरान महिलाओं ने तिलक स्वराज्य फंड के लिए 2,000/- (दो हजार रुपये) का दान दिया। इसके बाद वे वापस चले गये, पर उनका व्यक्तित्व यहाँ के युवकों और महिलाओं को प्रभावित करता रहा। उन्होंने महिलाओं को भी स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

यही उल्लेख डाॅ. भगवान सिंह वर्मा की पुस्तक छत्तीसगढ़ का इतिहास (राजनीतिक एवं सांस्कृतिक) (प्रारंभ से 2000 ई.) पंचम संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण 2007, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल के पेज 220 तथा पेज 221-222 पर भी है।

2003 में प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर-20‘, पं. सुन्दरलाल शर्मा जयंती समारोह परिशिष्टांक तथा इस दौर के अन्य स्रोतों से भी इसी से मिलती-जुलती जानकारी सामने आती है, जिनमें से दो का उल्लेख यहां किया जा रहा है। 1992 में प्रकाशित ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर स्मृति ग्रंथ में महात्मा गांधी के 1926 में बिलासपुर आगमन पर बैरिस्टर का स्वागताध्यक्ष होना बताया गया है तथा कुलदीप सहाय ने 1917 से 1921 तक के अपने संस्मरण में गांधी जी के छत्तीसगढ़ आने का उल्लेख नहीं किया है। एक अन्य प्रकाशन, अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकार परिषद द्वारा 11 सिंतबर 1995 तिथि पर महात्मा गांधी 125 वां जन्म वर्ष समारोह आयोजन कर स्मारिका निकाली गई। स्मारिका समिति में राजेन्द्र प्र. पाण्डेय के साथ 9 अन्य नाम हैं। स्मारिका में ‘गांधी जी की छत्तीसगढ़ यात्रा‘ शीर्षक भुवनलाल मिश्र का लेख है। इस लेख में कहा गया है कि ‘‘इसी कंडेल नहर सत्याग्रह के नेतृत्व को गांधी जी को सौंपने हेतु पंडित सुंदर लाल शर्मा अपने सहयोगियों के परामर्श से कलकत्ता गये एवं महात्मा गांधी को 20 दिसंबर सन् 1920 को साथ लेकर रायपुर आये।‘‘ ... ‘‘अंतोतगत्वा गांधी जी के आगमन के एक दिन पूर्व अंग्रेजी शासन को आंदोलनकारियों के कदमों पर झुकना पड़ा।‘‘ ... ‘‘इस तरह इतिहास की धारा ही बदल गयी, अन्यथा बिहार के प्रसिद्ध चंपारन सत्याग्रह के बाद महात्मा गांधी को कंडेल नहर सत्याग्रह का नेतृत्व करना पड़ता जिससे पूरा छत्तीसगढ़ गौरवान्वित हुआ होता।’’ इसके पश्चात लेख में गांधी जी की रायपुर सभा, धमतरी और वहां से लौटते हुए कुरुद की सभा की जानकारी दी गई है। इसी लेख में आगे कहा गया है कि ‘‘सन 1920 एवं सन 1933 में किये गये दो यात्राओं के अवसर पर महात्मा गांधी ने छत्तीसगढ़ का कुल मिलाकर 6-7 दिन भ्रमण किया था।‘‘ तथा ‘‘शासकीय ग्रंथों में राष्ट्रपिता के छत्तीसगढ़ भ्रमण को बहुत ही संक्षिप्त रूप में लिखा गया है जो खेद की बात है। धमतरी के देशभक्त स्व. डा, शोभाराम देवांगन, भूतपूर्व शिक्षा मंत्री श्री भोपाल राव पवार आदि लेकों ने उसे विस्तार पूर्वक लिखने का प्रयास किया है, किंतु इस दिशा में और शोध की आवश्यकता है।‘‘

प्रसंगवश, सन 2004 में कु. साधना श्रीवास्तव के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के शोध-प्रबंध ‘छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय आंदोलन में धमतरी अंचल का योगदान‘ में पंढरी राव कृदत्त का साक्षात्कार शामिल है, जो 29-3-2001 को लिया गया था। शोध प्रबंध में यह साक्षात्कार शोधार्थी की लिखावट में, पंढरी राव कृदत्त के हस्ताक्षर सहित है। यहां गांधीजी का दो बार आना कहा गया है, किंतु पहली बार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और ‘गांधी जी जब 1930 में आये‘ उल्लिखित है‘, अतएव ठोस प्रमाणस्वरूप स्वीकार किया जाना संभव नहीं होता। साक्षात्कार शब्दशः इस प्रकार है-


साक्षात्कार
पंडरी राव कृदत्त

1930 में नवागांव में जंगल सत्याग्रह लोगों ने किया। उसमें दो-तीन दिन लोगों की गिरफ्तारियां हुई। गोली चली व दो लोगों की मृत्यु हो गयी। नत्थूजी जगताप व बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में सत्याग्रह चल रहा था। नारायण राव जी का भी सहयोग था। गांधी जी का यहां दो बार आना हुआ। एक बार उनका मुनिस्पल हाई स्कूल में उनका भाषण हुआ था। जहां लोगो ने अपने गहने तक उतार कर आंदोलन के लिये दिये उनमें से एक यशोदाबाई कृदत्त जो कि नत्थूजी जगताप की बुआ थी उन्होंने भी अपने गहने उतार कर दिये।

इस आंदोलन के पहले 1920 में कंडेल का एक नहर आंदोलन हुआ जिसमें सरकार द्वारा नहर के किनारे चरने वाले पशुओं को कांजी हाउस में बंद करने का षड़यंत्र सरकार द्वारा हुआ तो इस आंदोलन के आधार पर जितने भी बैल बाजार हैं उन्हें बेचने के लिये घुमाया गया पर किसी ने नहीं खरीदा व सरकार को झुकना पड़ा।

गांधी जी जब 1930 में आये तो उन्होंने कहा कि यह आंदोलन तो मेरे आंदोलन के पूर्व ही हो चुका है और सराहनीय है।

धमतरी क्षेत्र में बहुत से और भी आंदोलन हुये। आज भी कई लोगों को पेंशन मिलती है। धमतरी के मराठा पारा में एक आश्रम हुआ करता था जहां सत्याग्रही लोग एकत्र होकर प्रभातफेरी किया करते थे। व सुबह सुबह प्रभात फेरी में जाया करते थे मेरी उम्र उस समय 8 वर्ष की थी मैं भी उन लोगो के साथ घूमा करता था।

पंढरीराव कृदत
29-3-2001

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 18, जुलाई 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसके पेज 229-230 पर, जुलाई से नवंबर 1920, ‘हमारी दैनन्दिनी‘ शीर्षक के अंतर्गत 10 अगस्त से 26 अगस्त तक का विवरण देते हुए लिखा है कि ‘‘हम लगातार 24 घंटे मद्रासके अतिरिक्त और किसी स्थानपर न रह सके और मद्रास भी इसी कारण रह पाए क्योंकि हम पहले-पहल वहीं गये थे। बादमें तो केन्द्रस्थान होनेके कारण हम आते-जाते दो-चार घंटे वहाँ रुकते। सेलमसे बंगलौर की 125 मीलकी यात्रा हमें मोटरमें तय करनी पड़ी थी। इस रफ्तार से यात्रा करना हमारे लिए कुछ अधिक हो जाता था; लेकिन निमन्त्रण बहुत जगहोंसे मिले थे। इनकार करना उचित नहीं लगता था और फिर यह लोभ भी था कि हम जितनी दूरतक अपना सन्देश पहुँचा सकें उतना ही अच्छा है।‘‘ इस दौरे में बम्बई और अहमदाबाद होते गांधीजी 3 सितंबर 1920 की रात में कलकत्ता पहुंचे थे। इसके पश्चात् 10 सितंबर तक कलकत्ता में, 17 सितंबर तक बंगाल में और 20 सितंबर को साबरमती आश्रम में होने की स्पष्ट जानकारी मिलती है। इस प्रकार कलकत्ता विशेष अधिवेशन के पूर्व गांधीजी के रायपुर आगमन की संभावना नहीं जान पड़ती।

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 19, नवंबर 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसमें नवंबर 1920 से अप्रैल 1921 में पेज 133 पर 16 दिसंबर 1920, गुरुवार को ढाका से कलकत्ता जाते हुए मगनलाल गांधी को लिखे पत्र की जानकारी है। पेज 143 पर 18 दिसंबर को नागपुर की सार्वजनिक सभा में भाषण की जानकारी है। पेज 151 पर 25 दिसंबर को नागपुर की बुनकर परिषद् में भाषण तथा पेज 152 पर नागपुर के अन्त्यज सम्मेलन में भाषण। पेज 161 पर 26 दिसंबर को नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन के उद्घाटन दिवस पर, गांधीजी द्वारा में भाषण, श्री विजयराघवाचार्य को कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया था।

सी.बी. दलाल की अंगरेजी पुस्तक ‘गांधीः 1915-1948‘ ए डिटेल्ड क्रोनोलाजी, गांधी पीस फाउंडेशन नई दिल्ली ने भारतीय विद्या भवन बम्बई के साथ मिलकर सन 1971 में प्रकाशित किया है। पुस्तक के पेज 35 पर माह दिसंबर, सन 1920 के गांधीजी के दैनंदिन का उल्लेख है, जिसके अनुसार गांधीजी ने 17 दिसंबर 1920 को कलकत्ता छोड़ा और 18 दिसंबर 1920 को नागपुर की आमसभा में रहे। इसके पश्चात दिनांक 19 से 23 तक नागपुर में तथा पुनः 31 दिसंबर तक नागपुर के विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए। एक अन्य अंगरेजी पुस्तक के. पी गोस्वामी की ‘‘महात्मा गांधी ए क्रोनोलाजी‘‘ मार्च 1971 में पब्लिकेशन डिवीजन से प्रकाशित हुई है। इसमें भी गांधीजी के प्रवास की तिथियां दलाल की पुस्तक की तुलना में संक्षिप्त, किंतु पुष्टि करने वाली हैं।

सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ आने के संबंध में पं. सुंदरलाल शर्मा द्वारा किया गया कोई उल्लेख नहीं मिलता, वहीं सर्वविदित है कि गांधीजी की आत्मकथा के अंतिम दो शीर्षकों में से ‘असहयोगका प्रवाह‘ में सितंबर 1920 के कलकत्ता के विशेष अधिवेशन का तथा ‘नागपुरमें‘ में दिसंबर 1920 के नागपुर वार्षिक अधिवेशन का उल्लेख है। यहां भी छत्तीसगढ़ का कोई उल्लेख नहीं हुआ है। इस तरह पं. सुंदरलाल शर्मा और महात्मा गांधी, दोनों द्वारा 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास का उल्लेख न होने से संदेह/संभावना की गुंजाइश रह जाती है कि ऐसा संयोग-मात्र हो सकता है किंतु विसंगतियों तथा प्रामाणिक प्रकाशनों से मिलान करने पर छत्तीसगढ़ के लिए इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गौरव के प्रसंग पर तथ्यों, दस्तावेजों के साथ असंदिग्ध जानकारियों आवश्यक हो जाती है। अपने संसाधनों की सीमा में जितनी जानकारी जुटा पाया, जानता हूं कि वह पर्याप्त नहीं है, सुधिजन के परीक्षण हेतु प्रस्तुत है। आशा है कि कुछ और पुष्ट जानकारी प्राप्त हो सकेगी, जिससे इतिहास के पन्नों में स्पष्टीकरण, संशोधन हो सके। अन्यथा, मान लेना होगा कि 1920 में छत्तीसगढ़ में गांधीजी का सघन-आह्वान हुआ, जिसके चलते समय बीत जाने पर वे साकार सत्य की तरह साक्षात हो गए।
इंडिया टुडे, 12 अक्टूबर 2022 के अंक में
 20 दिसंम्बर 1920 में गांधी का
प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन बताया गया है।