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Saturday, December 21, 2019

हाशिये पर

• मेरे सम्माननीय 80 पार चुके बुजुर्ग हैं शर्मा जी, पिछले दिनों तटस्थ भाव से कहा, पत्नीे बिस्तर पर हैं, मेरे सामने चली जाएं तो ठीक, यदि मैं पहले गया तो उनकी देखभाल कौन करेगा। हम आपस में बात करने लगे कि उनके बच्चे बहू..., सब हैं, 'भरा-पूरा परिवार', दोनों नौकरी-पेशा हैं, जिसका दाना-पानी जहां लिखा,अपने बच्चों की देखभाल नहीं कर पा रहे थे सो हास्टल में दाखिला कराया है, मां-सासू मां के लिए क्या और कितना कर पाएंगे। किसी पक्ष की आलोचना की जा सकती है, लेकिन है यह वस्तुतः आज की सहज, सामान्य, स्वाभाविक परिस्थितियां।

• कुछ बरस पहले बिलासपुर में एक अखबार ने जानना चाहा कि ऐसा कौन सा सरकारी दफ्तर है, जो सबसे कम जनोपयोगी है (या जिसे बंद किया जा सकता है), इसमें अव्वल नंबर पर था पुरातत्व विभाग यानि मेरा कार्यालय। मैंने उन पत्रकार महानुभाव का पता करने की कोशिश की, प्रेस ने तो नहीं बताया लेकिन पता लग गया, वे युवा पत्रकार परिचित निकले और स्वयं पहल कर खेद व्यक्त किया। फोन पर धन्यवाद देने पर उन्हें लगा कि मैं व्यंग्य या खीझ में ऐसा कह रहा हूं। बाद में प्रत्यक्ष मुलाकात में मैंने स्पष्ट‍ किया कि यह तो मेरे लिए अपेक्षित था, क्योंकि इस (और ऐसे अन्य सर्वेक्षण संबंधी) कार्यालय का सामान्य-जन से सीधा ताल्लुक कम ही होता है। मैं यह भी मानता हूं कि पुरातत्व‍-संस्कृति जैसी चीज हाशिये पर ही होनी चाहिए। मुख्य धारा में तो रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्य्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और भू-राजस्व के साथ कानून-व्यवस्था को ही होना चाहिए। राग-रंग को हाशिये पर ही होना चाहिए। पुरातत्व-संस्कृति मुख्य धारा में आए तो इनका और समाज दोनों का बंठाधार होते देर नहीं। वैसे भी हाशिया महत्वपूर्ण, विशेष उल्लेखनीय और ध्यान देने योग्य के लिए नियत स्थान है। 

• चर्चित, पुरस्कृत कलाकार-साहित्यकार सब से अच्छे न माने जाएं, लेकिन अधिकतर अच्छे कलाकार जरूर होते हैं और कुछ उदाहरणों में अनूठे और श्रेष्ठ भी। सम्मानित-पुरस्कृत कलाकारों में आमतौर पर (अन्य से अलग) अपनी कला क्षमता के साथ 'नागर समाज या मुख्य धारा' में उपयुक्त साबित हो कर हाशिये पर सुशोभित होने के लिए आवश्यक अतिरिक्त गुण (जागरूकता और उद्यम), अन्य की अपेक्षा अधिक होता है। 

• विनोद कुमार शुक्ल के चर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्माःन मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्य पर खरीद कर पुस्तकों को लुगदी होने से बचा सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है। 

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं। तब सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

Sunday, November 24, 2019

राज्‍य-गीत

साहित्यकार एवं भाषाशास्त्री आचार्य डॉ. नरेन्‍द्र देव वर्मा लिखित छत्तीसगढ़ी गीत 'अरपा पैरी के धार...' को मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा राज्योत्सव के मंच से 3 नवम्बर 2019 को छत्तीसगढ़ का राज्य-गीत घोषित किया गया। इस दिन डॉ. वर्मा पूरे 80 वर्ष के होते। यह राज्य-गीत सोमवार, 18 नवम्बर 2019 को राजपत्र में प्रकाशित हो कर, अधिसूचना जारी दिनांक से प्रभावशील हो गया। राज्य-गीत का गायन सभी शासकीय कार्यक्रमों के प्रारंभ में सुनिश्चित किए जाने के निर्देश जारी हुए हैं। राज्य-गीत का अधिसूचित स्वरूप आगे है-

अरपा पइरी के धार महानदी हे अपार,
इन्द्राबती ह पखारय तोर पइँया।
महूँ पाँव परँव तोर भुइँया,
जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया॥
सोहय बिन्दिया सही घाते डोंगरी, पहार
चन्दा सुरूज बने तोर नयना,
सोनहा धाने के संग, लुगरा के हरियर रंग
तोर बोली जइसे सुघर मइना।
अँचरा तोरे डोलावय पुरवइया।।
(महूँ पाँव परँव तोर भुइँया, जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया।।)
रइगढ़ हाबय सुघर तोरे मँउरे मुकुट
सरगुजा (अऊ) बेलासपुर हे बहियाँ,
रइपुर कनिहा सही घाते सुग्घर फभय
दुरुग, बस्तर सोहय पयजनियाँ,
नाँदगाँवे नवा करधनियाँ
(महूँ पाँव परँव तोर भुइँया, जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया।।)

इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद स्‍वयं डॉ. नरेन्‍द्र देव वर्मा ने इस प्रकार किया था-

Arpa and Pairi, the streams
And the great Mahanadi flow,
Indravati washes your feet,
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh

Hills and mountains are
A 'bindiya' on your forehead
The sun and the moon, your eyes
You are enriched with golden paddy
Your 'sari' is green
The wind flutters the full of your 'sari'
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh.

Raigarh your crown, ceremonious and beautiful,
Sarguja and Bilaspur are your hands
Raipur is your waist
Durg and Bastar are your feet
Rajnandgaon in your new belt
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh.

राज्य गीत गायन के संबंध में निर्देश
अवधि- 1 मिनट 15 सेकंड
यह गीत सन 1973 में लिखा गया, डाॅ. वर्मा के पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि यह गीत डायरी में उनकी लिखावट में दर्ज सुरक्षित है। गीत के पांच अंतरा में से पहले दो अंतरा राज्य-गीत के रूप में आए हैं। गीत में रइगढ़ को मँउरे मुकुट और बेलासपुर के साथ सरगुजा को बहियाँ कहा जाना, ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो मेरे लिए जिज्ञासा का विषय है अर्थात् लगता है कि सरगुजा को मुकुट और रायगढ़ को बांह, क्यों नहीं कहा गया है? बहरहाल ...

इस गीत की रचना, संगीत और गायन डाॅ. वर्मा ने किया था। डाॅ. बिहारीलाल साहू और सुरेश देशमुख इसके प्रथम चरण का स्मरण करते हैं। रायपुर, जोरापारा के सुकतेल भवन में तब संगीत बैठकें होती थीं। इस गीत के साथ रामेश्वर वैष्णव, धनीराम पटेल, पद्मलोचन जायसवाल, ललिता शर्मा को भी याद किया जाता है। आगे चलकर यह गीत दाऊ महासिंग चंद्राकर के ‘सोनहा बिहान‘ के साथ जुड़ा। ‘सोनहा बिहान‘ डाॅ. वर्मा के हिन्दी उपन्यास ‘सुबह की तलाश‘ का नाट्य रूपांतर था। मुकुंद कौशल और विवेक वासनिक सोनहा बिहान के दौर और इस गीत की संगीत रचना के साथ गोपाल दास वैष्णव, सत्यमूर्ति देवांगन (बुद्धू गुरूजी), मुरली चंद्राकर, जगन्नाथ भट्ट, दुर्गा प्रसाद भट्ट, मदन शर्मा, श्रवण कुमार दास को याद करते हैं। यह सर्वविदित है कि इस गीत की रचना के बाद अब तक उस दौर के केदार यादव, साधना यादव, ममता चंद्राकर, लक्ष्मण मस्तुरिया, कविता वासनिक, गणेश यादव, जयंती यादव, कुलेश्वर ताम्रकार से आज की बाल प्रतिभा आरु साहू जैसे सभी प्रमुख गायकों ने अपना स्वर दे कर इसे राज्य के जन-गीत की प्रतिष्ठा दी है।

Thursday, October 31, 2019

छत्तीसगढ़ की राजधानियां

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में गुहावासी पुरखों का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र रायगढ़ अंचल रहा, जहां सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बसनाझर, ओंगना, करमागढ़, खैरपुर, छापामाड़ा, बोतलदा, भंवरखोल, अमरगुफा-छेरीगोडरी, सुतीघाट, टीपाखोल, नवागढ़ी, बेनीपाट, सिरोली डोंगरी, पोटिया, गीधा जैसे अनेक स्थल हैं। इस काल की गतिविधियों के प्रमाण कोरिया, बस्तर और दुर्ग-राजनांदगांव अंचल से भी चित्रित शैलाश्रयों के रूप में मिलते हैं। मौर्यकाल में सरगुजा के रामगढ़, शक-सातवाहनकाल में मल्हार और किरारी के पुरातात्विक प्रमाणों से अनुमान होता है कि ये स्थल तत्कालीन सत्ता के केन्द्र रहे होंगे। 

नलों की राजधानी पुष्करी का समीकरण बस्तर के गढ़ धनोरा के साथ किया जाता है। श्रीपुर-सिरपुर शरभपुरियों के काल से प्रतिष्ठित होते हुए पांडु-सोमकाल में न सिर्फ राजधानी बल्कि छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण धार्मिक और आर्थिक केन्द्र रहा। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने दक्षिण कोसल की जिस भव्य राजधानी का बौद्ध केन्द्र के रूप में विवरण दिया है, उसका सबसे करीबी मेल सिरपुर से ही होता है। कलचुरियों ने तुमान के बाद रतनपुर को राजधानी बनाया तथा इसके साथ पाली, कोसगईं और चैतुरगढ़ भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहे। बस्तर में छिंदक नागों की राजधानी बारसूर बना तो कांकेर परवर्ती सोमवंशियों की और 'बस्तर' (वर्तमान गांव) को काकतीयों की राजधानी का गौरव प्राप्त हुआ। कवर्धा-भोरमदेव फणिनागवंशियों की राजधानी रही और इस क्षेत्र का पचराही भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहा।

इतिहास सम्मत जानकारी मिलती है कि कलचुरी राजा सिंघण के दो बेटे हुए, डंघीर और रामचन्द्र। डंघीर रतनपुर गद्दी पर रहे और उल्लेखनीय नाम संयोग कि ‘रामचन्द्र’ ने रायपुर नगर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया। इस तरह कलचुरियों की ही एक शाखा ने चौदहवीं सदी के अंतिम चरण में रायपुर को पहली बार राजधानी बनाया। इस रामचन्द्र के पुत्र ब्रह्मदेव की राजधानी खल्वाटिका-खल्लारी का उल्लेख भी शिलालेखों में मिलता है। संवत 1470 यानि ईस्वी 1415 का लेख कलचुरि शासकों का अंतिम शिलालेख है। ब्रह्मदेव के लेखों से रामचन्द्र की फणिवंश के शासक भोणिंगदेव पर विजय, देवपाल द्वारा खल्वाटिका में मंदिर निर्माण तथा रायपुर में हाटकेश्वर महादेव मंदिर निर्माण का पता चलता है।

इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया होता है अक्सभर किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ताच का मुख्य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्यालय के साथ-साथ धार्मिक तीर्थस्थल भी हो तो वहां इतिहास-मार्ग और भी दुर्गम हो जाता है, छत्तीसगढ़ की पुरानी राजधानियों की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। चतुर्युगों में राजधानी के गौरव से महिमामण्डित मान्यता, मूरतध्वज की नगरी और भगवान कृष्ण की पौराणिक कथाओं से रतनपुर को सम्बद्ध कर देखा गया। सिरपुर की समृद्धि भी परत-दर-परत सामने आ कर, छत्तीसगढ़ के वैभव का इतिहास-प्रमाण बन रही है।

पुरातत्वीय वैभव से संपन्न सिरपुर में महानदी के सुरम्य तट पर कला-स्थापत्य उदाहरणों के साथ-साथ धार्मिक सौहार्द्र के प्रमाण सुरक्षित हैं, जिनमें ईंटों का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर और अन्य मंदिर, भव्य कलात्मकता तथा अलंकरण अभिप्रायों वाला अद्वितीय तीवरदेव महाविहार और अन्य विहार, राजप्रासाद, विशाल सुरंगटीला मंदिर, स्तूप, आवासीय मठ-संरचनाएं इस नगरी की गाथा बखानती हैं। इसके अतिरिक्त यहां से प्राप्त सिक्के, ताम्रपत्र और धातु प्रतिमाओं की बहुमूल्य निधि प्राप्त हुई है। मल्हार-जुनवानी ताम्रलेख में रोचक विवरण है कि सिरपुर राजधानी में भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया, जिसमें स्पष्ट कर दिया गया है कि हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर होगा। संभवतः तब भी यह किस्सा प्रचलन में रहा होगा, जिसमें राजधानी सीमा में राजा द्वारा ब्राह्मण को एक खाट के बराबर भूमिदान की चर्चा होती है, किन्तु बाद में दान प्राप्तकर्ता ने खाट की रस्सी खोलकर पूरे राजमहल को घेर लिया था। इसी तरह सिरपुर ताम्रपत्र निधि से यहां शैव सम्प्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है महाशिवगुप्त बालार्जुन इन्हीं शैव-सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर परम माहेश्वर की उपाधि का धारक बना था। यह भी उल्लेखनीय है कि बालार्जुन के बाद छत्तीसगढ़ के स्वर्ण युग और उसकी राजधानी श्रीपुर की चमक फीकी पड़ने लगी।

राजधानी-नगरों की कहानी बड़ी अजीब होती है, कहीं तो उनका वैभव धुंधला जाता है और कभी-कभी उनकी पहचान खो जाती है। छत्तीोसगढ़ या प्राचीन दक्षिण कोसल के दो प्रमुख नगरों- राजधानियों शरभपुर और प्रसन्नपुर की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। शरभपुर का समीकरण सिरपुर, मल्हार, सारंगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ स्थलों से जोड़ा गया, किन्तु प्रसन्नपुर की चर्चा भी नहीं होती। इसी प्रकार इस अंचल में कोसल नगर और ‘गामस कोसलीय‘ नाम के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, किंतु यह स्थान ‘कोसल’ राजधानी था अथवा नहीं, या कहां स्थित था, निश्चित तौर पर यह भी नहीं तय किया जा सका है। अंचल के सर्वाधिक अवशेष सम्पन्न पुरातात्विक स्थल मल्हार का राजनैतिक केन्द्र या राजधानी होना, अभी तक अनिश्चित है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक राजधानी रतनपुर के संबंध में ऐसा कोई सन्देह नहीं है, जो रायपुर से पहले लगभग पूरी सहस्राब्दि छत्तीसगढ़ की राजधानी रहा। राजधानी तुम्माण का स्थानान्तरण रतनपुर को इस दृष्टिकोण से देखा जाना भी समीचीन होगा, कि यह काल कबीलाई छापामारी से विकसित होकर खुले मैदान में विस्तृत हो जाने का था। मुगलकाल में राजा टोडरमल का भू-राजस्व व्यवस्थापन आरंभिक माना जाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि तत्कालीन छत्तीरसगढ़ की व्यवस्था, जमींदारियों, ताहुतदारियों और खालसा में मालगुजारी और रैयतवारी में विभाजित कर ऐसा व्यवस्थित प्रबंधन रतनपुर राजधानी से हुआ था। छत्तीस गढ़ों की यही व्यवस्था इस राज्य के नाम का आधार बनी। रतनपुर राजधानी के साथ इन गढ़ों के माध्यम से खालसा क्षेत्र का केन्द्रीय प्रशासन होता रहा तो इसके समानांतर बस्तर, कांकेर, नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान, कवर्धा, रायगढ़, सक्ती, सारंगढ़, सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगबखार भी सीमित-संप्रभु रियासती सत्ता के केन्द्र रहे।

इतिहास में झांककर समाज के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा बनती है और इतिहास के संदर्भ कोश से प्रेरक आशा का उत्साह संचारित होता है, आगत की तस्वीर उजागर होती है। रायपुरा से किला-पुरानी बस्ती और रायपुर से नया रायपुर तक का सफर न सिर्फ समय की बदलती करवट है, बल्कि यह राज्य की क्षमता और उसके पुरुषार्थ का भी प्रमाण है। नया रायपुर (अब अटल नगर, नवा रायपुर) के साथ नये संकल्पों का दौर आरंभ हो रहा है, इस नयी राजधानी में राज्योत्सव के शुभारंभ अवसर के लिए निर्धारित मुहूर्त पर प्रकृति ने जलाभिषेक कर मानों राज्य के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया है। इस अवसर पर अपने गौरवशाली अतीत का स्मरण इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें दृढ़ संकल्पों के साथ कर्म-उद्यम का यज्ञफल राज्य के लिए शुभ और मंगल सुनिश्चित करेगा।

नवभारत, संपादकीय पृष्ठ पर 3 नवंबर 2012 को प्रकाशित

Sunday, October 27, 2019

ऐतिहासिक छत्‍तीसगढ़

प्राचीन दक्षिण कोसल अर्थात्‌ वर्तमान छत्तीसगढ़ व उससे संलग्न क्षेत्र के गौरवपूर्ण इतिहास का प्रथम चरण है- प्रागैतिहासिक मानव संस्कृति के रोचक पाषाण खंड, जो वस्तुतः तत्कालीन जीवन-चर्या के महत्वपूर्ण उपकरण थे। लगभग इसी काल (तीस-पैंतीस हजार वर्ष पूर्व) के बर्बर मानव में से किसी एक ने अपने निवास गुफा की दीवार पर रंग में डूबी कूंची फेरकर, अपनी कलाप्रियता का प्रमाण भी दर्ज कर दिया। मानव संस्कृति की निरन्तर विकासशील यह धारा ऐतिहासिक काल में स्थापत्य के विशिष्ट उदाहरण- मंदिर, प्रतिमा, सिक्के व अभिलेख में अभिव्यक्त हुई है। विभिन्न राजवंशों के गौरवपूर्ण कला रुझान व महत्वाकांक्षी अभियानों से इस क्षेत्र के सांस्कृतिक तथा राजनैतिक इतिहास का स्वर्ण युग घटित हुआ। धरोहर सम्पन्न छत्‍तीसगढ़ की परिसीमा, आज भी पुरा सम्पदा का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

छत्‍तीसगढ़ का यह क्षेत्र नैसर्गिक सम्पदा से पूर्ण रहा है। महानदी, इन्द्रावती, शिवनाथ, अरपा, हसदेव, केलो, रेन आदि सरिताओं के सुरम्य प्रवाह से सिंचित तथा सघन वनाच्छादित यह भू भाग आदि मानवों द्वारा संचारित रहा है। इनके पाषाण उपकरण और शैलचित्र, नदी तटवर्ती क्षेत्र तथा सिंघनपुर, कबरा पहाड़, करमागढ़ (रायगढ़ जिला) आदि स्थलों से ज्ञात हुए हैं। शास्त्रीय ग्रन्थों में इस क्षेत्र से संबंधित उल्लेख प्राप्त होने लगते हैं। रामायण के कथा प्रसंगों तथा राम के वन गमन का मार्ग, इस क्षेत्र से सम्बद्ध किया जाता है। महाभारत में पाण्डवों के दिग्विजय व अन्य प्रसंगों तथा पौराणिक ग्रन्थों में भी दक्षिण कोसल का उल्लेख अनेक स्थलों पर आया है। प्राचीन परम्पराओं और दंतकथाओं से भी यह अनुमान होता है के यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही विशेष महत्व का भू भाग रहा है।

मौर्य काल अर्थात्‌ ईस्वी पूर्व चौथी सदी से इस क्षेत्र में नगर सभ्यता के विकास का संकेत मिलने लगता है। सरगुजा जिले की रामगढ़ पहाड़ी के ब्राह्मी अभिलेख के सिवाय आहत सिक्के, मिट्टी के गढ़ और मृद्‌भाण्ड विशेष उल्लेखनीय हैं, जिनसे इस क्षेत्र की सांस्कृतिक सम्पन्नता का अनुमान सहज ही होता है।

मौर्यों के पश्चात्‌ तत्कालीन क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव रहा, जिसके सीमित प्रमाण उपलब्ध होते हैं। ईसा की आरंभिक शताब्दियों के स्पष्ट प्रमाण के रूप में अभिलेख, सिक्के, प्रतिमाएं, लाल ओपदार ठीकरे आदि प्राप्त हुए हैं। इस काल में विदेश व्यापार संबंध के परिचायक रोम और चीन के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

चौथी सदी ईस्वी के वाकाटक-गुप्त काल के पश्चात्‌ से इस क्षेत्र के इतिहास की रूपरेखा स्पष्ट होने लगती है। समुद्रगुप्त के प्रसिद्ध इलाहाबाद अभिलेख में दक्षिणापथ के शासकों में कोसल के महेन्द्र नामक शासक का उल्लेख प्रथम क्रम पर है। गुप्तों के प्रभाव के अन्य साक्ष्य भी ज्ञात होते हैं।

गुप्तों के समकालीन शूरा अथवा राजर्षितुल्य कुल तथा मेकल के पाण्डुवंश की सूचना मुख्‍यतः ताम्रपत्रों से मिलती है। राजर्षितुल्य कुल के भीमसेन द्वितीय के ताम्रपत्र से इसके महत्वपूर्ण शासक होने का स्पष्ट अनुमान होता है। सुवर्ण नदी से जारी किए गए इस ताम्रपत्र में शूरा को राजवंश का संस्थापक बताया गया है। मेकल के पाण्डुकुल के ताम्रपत्रों से जयबल, वत्सराज, नागबल, भरतबल एवं शूरबल जैसे शासकों के नाम मिलते हैं।

लगभग पांचवीं-छठी ईस्वी में शरभपुरीय या अमरार्यकुल नामक महत्वपूर्ण राजवंश की सूचना प्राप्त होती है। इस वंश की प्रमुख राजधानी शरभपुर थी, जो बाद में प्रसन्नपुर स्थानान्तरित हो गई। इनकी द्वितीय राजधानी के रूप में श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर) का नाम ज्ञात होता है। इस वंश के विभिन्न ताम्रपत्रों से शरभ, नरेन्द्र, प्रसन्नमात्र, जयराज, सुदेवराज, प्रवरराज तथा व्याघ्रराज का नाम मिलता है। इनमें एकमात्र प्रसन्नमात्र के सिक्के विस्तृत भूभाग से प्राप्त हुए हैं।

लगभग छठी ईस्वी में एक अन्य राजवंश का उदय होता है, जो इतिहास में कोसल के पाण्डुवंश के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी राजधानी श्रीपुर थी। इस वंश का आरंभ उदयन से ज्ञात होता है। इस वंश के शिलालेखों व ताम्रपत्रों से इन्द्रबल, ईशानदेव, नन्न, तीवरदेव, महाशिवगुप्त बालार्जुन आदि शासकों के नाम ज्ञात होते हैं।

लगभग सातवीं सदी ईस्वी से दसवीं सदी ईस्वी का काल मुखयतः सोमवंशी शासकों के आधिपत्य का है। इनकी राजधानी सुवर्णपुर, उड़ीसा थी। इस वंश के अभिलेखों से वंश के प्रथम शासक शिवगुप्त के अतिरिक्त ययाति, धर्मरथ, नहुष उद्योतकेसरी, कर्णकेसरी आदि शासक नाम मिलते हैं। इसी काल में त्रिपुरी के कलचुरियों के प्रच्छन्न प्रभाव के अतिरिक्त बाणवंशी शासकों के आधिपत्य के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं।

दसवीं सदी ईस्वी में त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा ने तुम्माण (वर्तमान तुमान, कोरबा जिला) को राजधानी बना कर शासन आरंभ किया। इस वंश के राजाओं में आरंभिक नाम कलिंगराज, कमलराज मिलते हैं। इसके पश्चात्‌ रत्नदेव, पृथ्वीदेव, जाजल्लदेव, प्रतापमल्ल आदि शासकों के नाम मिलते हैं। परवर्ती काल में इस वंश की राजधानी रत्नपुर स्थानान्तरित हुई, पुनः इसी वंश की एक शाखा ने रायपुर को अपनी राजधानी बनाया। मराठों के आगमन अर्थात्‌ अठारहवीं सदी ईस्वी तक इस क्षेत्र पर कलचुरियों का एकाधिपत्य रहा।

इस क्षेत्र में उपरोक्त वर्णित राजवंशों के विभिन्न निर्माण कार्यों से जहां उनकी धार्मिक सहिष्णुता, कलाप्रियता व शास्त्रीय मान्यताओं के संरक्षण का परिचय मिलता है वहीं काव्य चमत्कार, भाषा ज्ञान, धातु सम्पन्नता की झलक, अभिलेख व सिक्के हैं। इस प्रकार की महत्वपूर्ण पुरा सम्पदा निम्नानुसार है-

स्थापत्य अवशेषों के महत्वपूर्ण उदाहरण इस क्षेत्र में विद्यमान हैं। रामगढ़ की गुफाओं से आरंभ होकर निःसंदेह इसका विशिष्ट पड़ाव मल्हार था, किन्तु मल्हार से अब तक कोई महत्वपूर्ण संरचना प्रकाश में नहीं आई अतः इसके पश्चात्‌ बिलासपुर जिले के अत्यंत विशिष्ट स्थल ताला पर दृष्टि केन्द्रित की जा सकती है, जहां उत्तर गुप्त कालीन दो शिव मंदिर हैं। इनमें से देवरानी मंदिर नाम से प्रसिद्ध स्मारक अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित और पूर्वज्ञात संरचना है, जबकि जिठानी मंदिर की अवशिष्ट संरचना पुरातत्व विभाग के कार्यों से स्पष्ट हुई है।

इसके पश्चात्‌ पाण्डु-सोमवंशी शासकों के निर्माण का काल छठी-सातवीं सदी के आरंभ होता है। इन राजवंशों के प्रमुख स्थापत्य उदाहरणों में सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, खरौद के मंदिर, राजिम का राजीव लोचन व अन्य मंदिर, अड़भार का शिव मंदिर, धोबनी का चितावरी दाई मंदिर, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, मल्हार का देउर आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। इस काल की क्षेत्रीय वास्तु शैली की विशेषता ताराकृति योजना पर बने ईंटों के मंदिर हैं।

लगभग दसवीं सदी ईस्वी तक इस कालावधि में कुछ अन्य राजवंशों ने भी महत्वपूर्ण निर्माण कार्य कराया। इनमें उल्लेखनीय उदाहरण सरगुजा जिले के डीपाडीह, देवगढ़, सतमहला, महेशपुर आदि स्थलों में विद्यमान है। रायगढ़ जिले में इस काल के उदाहरणस्वरूप नेतनागर, पुजारीपाली, सारंगढ़, कांसाबेल के अवशेष हैं। इस परिप्रेक्ष्‍य में पाली का महादेव मंदिर व शिवरीनारायण का केशवनारायण मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं।

कलचुरि शासकों के निर्माण का क्रम ग्यारहवीं सदी ईस्वी से प्रारंभ होता है। इन शासकों के प्रमुख स्थापत्य उदाहरण तुमान, जांजगीर, गुड़ी, मल्हार, शिवरीनारायण, किरारी गोढ़ी, सरगांव, रतनपुर आदि स्थलों के मंदिर अवशेष, विशेष महत्व के हैं।

कुछ अत्यंत विशिष्ट और उल्लेखनीय प्रतिमाओं में मल्हार के अभिलिखित विष्णु, स्कन्द माता, कुबेर, डिडिनेश्वरी देवी के रूप में पूजित राजमहिषी आदि हैं। अड़भार में महिषासुरमर्दिनी, अष्टभुजी शिव, पार्श्वनाथ, गंगा-यमुना, मिथुन आदि प्रतिमाएं हैं। ताला के रूद्र शिव, कार्तिकेय, शिव लीला के दृश्य व कीर्तिमुख भारतीय कला के अद्वितीय उदाहरण हैं। खरौद की गंगा-यमुना, शिवरीनारायण के शंख व चक्र पुरुष तथा विष्णु के विभिन्न रूपों युक्त केशवनारायण मंदिर का द्वार शाख भी उल्लेखनीय है। पाली के मंदिर की प्रतिमाओं का संतुलन व विविधता दर्शनीय है। अन्य स्थलों से भी कुछ विशिष्ट प्रतिमाएं ज्ञात हैं, जिनमें रतनपुर के कंठी देवल और किला प्रवेश द्वार की प्रतिमाओं का उल्लेख किया जा सकता है। महमंदपुर की सर्वतोभद्र महामाया जैसी कई विशिष्ट किन्तु अल्पज्ञात प्रतिमाएं भी क्षेत्र में उपलब्ध हैं।

छत्‍तीसगढ़ की मूर्तिकला विविध कला शैलियों के परिपक्व अवस्था का परिचायक है। यहां के प्राचीन शिल्पियों ने शास्त्रीय ज्ञान और मौलिक प्रतिभा का अनूठा समन्वय, अत्यंत रोचक है। मूर्तिकला में नैसर्गिक रूप-सौन्दर्य लावण्य, भावाभिव्यक्ति तथा सुरुचिपूर्ण अलंकरण सहज आकर्षक है।

अभिलेखों की दृष्टि से इस क्षेत्र में प्रारंभिक अभिलेख ईस्वी पूर्व तीसरी सदी के हैं। रामगढ़ पहाड़ी के गुफालेख, ऋषभतीर्थ, गुंजी चट्टानलेख, बूढ़ीखार मूर्तिलेख, सेमरसल शिलालेख, किरारी काष्ठ स्तंभलेख, आरंग व दुर्ग के ब्राह्मी शिलालेख प्रमुख हैं। इन लेखों का काल ईस्वी पूर्व तीसरी-दूसरी सदी है। ये लेख पालि-प्राकृत भाषा में, ब्राह्मी लिपि के रूपों में उत्कीर्ण हैं।

चौथी सदी ईस्वी के पश्चात्‌ क्षेत्रीय राजवंशों के विभिन्न अभिलेख प्राप्त होने लगते हैं। इनमें मुख्‍यतः पीपरदुला, कुरुद, मल्हार, आरंग, खरियार, सिरपुर, कौआताल, सारंगढ़, रायपुर, पोखरा, ठकुरदिया, बोण्डा, राजिम, बलौदा, अड़भार, लोधिया, बरदुला, सेनकपाट, खरौद, पाली, ताला आदि स्थलों के ताम्रपत्र व शिलालेख हैं। ये अभिलेख दसवीं सदी ईस्वी तक के उपरोल्लिखित राजवंशों से सम्बद्ध हैं। कुछ स्थानों पर तीर्थयात्रियों अथवा सामान्य नामोल्लेख वाले अभिलेख मिले हैं। इन लेखों की लिपि, पेटिकाशीर्ष और कीलाक्षर में विकसित ब्राह्मी, कुटिल या आरंभिक नागरी है, लेखों की भाषा लगभग शुद्ध संस्कृत है।

दसवीं सदी ईस्वी के पश्चात्‌ कलचुरियों के अभिलेख प्राप्ति के महत्वपूर्ण स्थल हैं- रायपुर, अमोदा, रतनपुर, पाली, शिवरीनारायण, खरौद, अकलतरा, कोटगढ़, सरखों, पारगांव, दैकोनी, कुगदा, कोथारी, बिलईगढ़, राजिम, कोनी, घोटिया, पुजारीपाली, मल्हार, पेन्डराबंध, कोसगईं, खल्लारी, आरंग, कोनारी तथा एक अन्य राजवंश का लहंगाभांठा शिलालेख। कुछ स्थानों से मूर्तिलेख भी प्राप्त हुए हैं। ये लेख भी ताम्रपत्र या शिलालेख हैं, तथा संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। लिपि, नागरी का विकसित होता हुआ रूप है।

इस क्षेत्र से सिक्कों की प्राप्तियां भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आरंभिक काल के सिक्कों में मौर्यकालीन आहत सिक्के ठठारी से प्राप्त हुए हैं। मघ, रोमन, कुषाण, सातवाहन आदि राजवंशों के सिक्कों का प्रमुख प्राप्ति स्थल मल्हार व बालपुर है। विभिन्न कालों और धातुओं से निर्मित विविध तकनीक के सिक्के जिन स्थानों से प्रमुखतः मिले हैं, उनमें केरा, सोनसरी, भगोड़, धनपुर, केन्दा, चकरबेढ़ा, आदि ग्रामों का उल्लेख किया जा सकता है। सातवाहन शासक अपीलक, माघश्री सिक्के तथा प्रसन्नमात्र व अन्य शासकों के ठप्पांकित तकनीक से निर्मित सिक्के इस क्षेत्र की मुद्राशास्त्रीय विशिष्टता रेखांकित करते हैं।

नवम्‍बर 1986 में मध्‍यप्रदेश राज्‍य स्‍थापना के तीन दशक पूरे होने पर मूलतः डा. लक्ष्‍मीशंकर निगम के मार्गदर्शन एवं श्री जी एल रायकवार के सहयोग से मेरे द्वारा संयोजित लेख, अब नई जानकारियां शामिल कर इस पेज अद्यतन किया जा रहा है। यहां आई जानकारियां पूर्व में हुए शोध और प्रकाशनों से भी ली गई हैं, लेकिन स्‍मारक, अवशेषों का सर्वेक्षण और तथ्‍यों का परीक्षण यथासंभव मेरे द्वारा किया गया है।

Thursday, October 17, 2019

आसन्न राज्य

बात अक्टूबर 2000 की है, 1 नवंबर को 'छत्तीसगढ़' राज्य बनना तय हो गया था। इसी दौरान अखबारों के लिए मैंने यह नोट 'छत्तीसगढ़: सपने की कविता और हकीकत का अफसाना' बनाया था, खंगालते हुए मिला, अब यहां-

इतिहास, सदैव अतीत नहीं होता और वह व्यतीत तो कभी भी नहीं होता। हम इतिहास के साथ जीते हैं, उसे रचते-गढ़ते हैं ओर इसीलिए प्रत्येक सुनहरे भविष्य में इतिहास की छाप होती है। कभी-कभी आगामी कल भी ऐतिहासिक होता है। ऐसे ही घटित होने वाले इतिहास की आतुर प्रतीक्षा है जिसके साथ न सिर्फ हम जी रहे हैं बल्कि जिसके साथ पीढ़िया बीती हैं और जिस इतिहास को इस विशाल समष्टि ने अपने हाथों रचा-गढ़ा है ‘पृथक छत्तीसगढ़ राज्य’ जिसके औपचारिक निर्माण की तैयारी चाक-चैबंद है और जिसके स्वागत का उल्लास अब सतह पर आ गया है, सपना आकार ले रहा है। लगभग छह सौ साल पहले दक्षिण कोसल के छत्तीसगढ़ में बदलते करवट को ज्ञात इतिहास में पहली बार पंद्रहवीं सदी के अंत में खैरागढ़ के कवि दलराम राव ने रेखांकित किया- ‘लक्ष्मीनिधि राय सुनौ चित दै, गढ़ छत्तीस में न गढै़या रही।

बदलते माहौल में यह कवि अपने अन्नदाता लक्ष्मीनिधि राय की प्रशस्ति करते हुए इस स्वप्नदृष्टा कवि के शब्द अभिलेख बन गए, सपना साकार हो गया। सोलहवीं सदी के मध्य में कल्याणसाय ने इस भू-भाग के व्यवस्थापन को अमलीजामा पहनाकर इसे मूर्त आकार दे दिया और अपनी प्रशासनिक क्षमता के साथ पूरे अंचल की प्रशासनिक व्यवस्था को एक नियमबद्ध सूत्र में पिरो दिया। गढ़ और गढ़ीदार, दीवान, चैबीसा, बरहों, दाऊ और गौंटिया, खालसा, और जमींदारी।

इस नवसृजन की प्रक्रिया में उसने न जाने कितने स्वप्न देखे होंगे और अंचल में व्यापक चेतना का संचार किया होगा। कल्याणसाय के राजस्व प्रशासन की इकाई गढ़ों की रूढ़ संख्या अड़तालिस-छत्तीस रही और यह अंचल छत्तीसगढ़ बन गया। शब्द साम्य मात्र के आधार पर इसे ‘चेदीशगढ़’ और ‘छत्तीस घर’ भी कहा गया। लेकिन कल्याणसाय के सपनों में तथ्यों की सच्चाई और उसका ठोसपन सक्षम साबित हुआ। लोग सिर्फ छत्तीसगढ़ का सपना ही नहीं देखते रहे, उस पर गंभीर विचार, सक्रिय पहल, गतिविधियां भी संचालित करते रहे।

ऐसे लोगों में से कुछेक ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, माधवराव सप्रे, पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय, ठाकुर प्यारेलाल सिंह है। और भी जननायक है जिनकी चर्चा और सूची सहज उपलब्ध हो जाती है। किंतु कुछ ऐसी भी नाम हैं जो अल्पज्ञात बल्कि इस संदर्भ में लगभग अनजाने रह गए हैं। इन्हीं में से एक है डॉ. इंद्रजीत सिंह। मुस्लिम इतिहासकारों ने जिस क्षेत्र का आमतौर पर गोंडवाना नाम दे रखा था यही गोंडवाना आज के छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि है। गोंडवाना की सांस्कृतिक सामाजिक पहचान को रेखांकित करने के उद्देश्य से डॉ. इंद्रजीत सिंह ने लगभग 70 साल पहले पूरे गोंडवाना का व्यापक भ्रमण-सर्वेक्षण कर अंचल के भौगोलिक परिवेश और आदिम संस्कृति की विशिष्ट महानता को समझने के लिए गहन शोध किया और मध्य- भारत में सामाजिक मानवशास्त्रश के क्षेत्र में किसी स्थाषनीय द्वारा किया गया यह पहला शोध सन् 1944 में ‘द गोंडवाना एंड द गोंड्स’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ जिसकी पृष्ठभूमि पर नागपुर विधानसभा में ठाकुर रामकृष्णसिंह व अन्य विधायकों ने गोंडवाना राज्य के गठन की गुहार की थी। ऐसे ढेरों जाने-अनजाने सद्प्रयास अब फलीभूत हो रहे हैं।

इस अंचल की सम्पन्नता इसकी नैसर्गिक विविधता है। यहां उच्च सांस्कृतिक परंपराएं और प्रतिमान हैं। लोगों में व्यापक गहरी सूझ और प्रासंगिक विचारशीलता है। इसीलिए पृथक छत्तीसगढ़ राज्य से अगर प्रशासनिक सुविधा होगी तो यह उससे कहीं अधिक सांस्कृतिक आवश्यकता की पूर्ति करेगा। छत्तीसगढ़ की मध्यप्रदेश से पृथकता सीमाओं का संकोच है तो सोच का विस्तार है जिसे हम अपनी सीमा संकीर्णताओं से आगे बढ़कर उदार जागरूकता से प्रमाणित करेंगे।

Sunday, September 22, 2019

सतीश जायसवाल: अधूरी कहानी

वह पहला ‘रविवार‘ था, किसी वर्ष-माह का नहीं, आनंद बाजार पत्रिका समूह के हिन्दी साप्ताहिक का अंक। ‘सतीश जायसवाल‘ नाम बिलासपुर के लिए घर का जोगी... था। चालीस-एक साल पुरानी बात। ‘दिनमान‘ ने जमीन बना दी थी कि यहां हिन्दी पाठकों के बीच भी समाचार पत्रिका के लिए गुंजाइश है और अब बात यहां तक आ पहुंची थी कि साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं के दिन लद रहे हैं। इस दौर के लिए मील का पत्थर बनी ‘रविवार‘।

इस प्रवेशांक में अधूरी आजादी जैसा एक लेख आया, लेखक का नाम था- सतीश जायसवाल। इसमें बात बिल्हा से संबंधित थी, इसलिए संदेह नहीं हुआ कि ये अपने ‘आन गांव के सिद्ध’ सतीश जायसवाल हैं। बाद में इसी पत्रिका में उनका एक लेख शीर्षक ‘काम की बात‘ जैसा कुछ था, छपा। इस दौरान मैं एक स्मारिका के संपादन से जुड़ा था। संयोग बना कि उनका लेख और स्मारिका का अंश, साथ-साथ कुछेक की राजनीतिक रोटी सेंकने का माध्यम बना। इस क्रम में रविवार के बप्पादित्य राय और संपादक एसपी यानि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बिलासपुर आया करते और हम सबका दिन इकट्ठे, बिलासपुर न्यायालय में कोर्ट के सामने ढाई फुट उंची डेढ़ ईंट की दीवार पर बैठे हुए बीतता।

बिल्हा की कहानी छपी तो संदर्भ बना कि इस क्षेत्र के विधायक चित्रकांत जायसवाल उनके चाचा हैं। बिलासपुर के प्रमुख राजनीतिज्ञों मथुरा प्रसाद दुबे, श्रीधर मिश्रा, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला, रोहिणी प्रसाद बाजपेयी के बीच वे अकेले ‘जायसवाल‘ थे, चित्रकार तो थे ही, जोड़ा हंस वाला हिन्द प्रकाशन, जहां से बलदेव प्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ छपी थी, वही उनका निवास था, शिक्षा मंत्री रहते हुए छात्रों के हड़ताल पर उनका गांधीवादी प्रतिरोध उनकी पहचान बन गया था। इन नेताओं का जन-सरोकार तो था ही, संगीत, साहित्य, विधि, विज्ञान, पुरातत्व, इतिहास की समझ भी कम न थी, उन्हें इस माहौल का लाभ मिला। उनके बौद्धिक व्यक्तित्व में अब भी देखा जा सकता है कि वे, विधा कोई भी हो, उसके व्याकरण पर कम ध्यान देते हैं, गोया, संवेदनात्मक ज्ञान और कई बार व्याकरण वे स्वयं विकसित कर लेते हैं। उनके लेखन में यही, संस्कृति-परम्परा के साथ उनकी मौलिकता का सहज समन्वय, अनूठा रस पैदा करता है। उन पर शोध होगा तो निष्कर्ष अध्याय का आशय इसके करीब ही होगा।

चित्रकांत जी से रिश्ते के सिलसिले में उनकी एक पुरस्कृत कहानी याद आती है, जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुई थी। कहानी के पात्रों को जानने वालों में से जिसने भी यह कहानी पढ़ी, उनके गले मुश्किल से उतरी। बिलासपुर के कुछ अन्य राजनैतिक व्यक्तियों और प्रतिष्ठित परिवारों के नाजुक-अंतरंग प्रसंगों में भी उन्हें कहानी दिखी और इस तरह की कहानियों लिखने-छपने के कारण वे खासे चर्चित होते रहे, जिसकी उन्होंने खुद शायद ही कभी परवाह की। इसी तरह संस्मरण-लेख के नारी पात्रों के रागात्मक विवरण उनके और अनजान पाठकों के लिए काव्यात्मक साहित्य, तो उन पात्रों के लिए असमंजस का कारण बनते रहे। वास्तविक व्यक्ति को पात्र बनाकर, उनके साथ अपने संस्मरण को कहानी बना देने का सफल प्रयोग उन्होंने ‘मछलियों के नींद का समय‘ में किया है, जिसमें डॉ. शंकर शेष, एक पात्र हैं और कहानी उनकी पत्नी के वाक्य से समाप्त होती है कि ‘‘यह मछलियों की नींद का समय है और लोग शिकार पर निकले हैं।‘‘

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे बख्शी सृजन पीठ के पहले अध्यक्ष नियुक्त हुए। मध्यप्रदेश में संस्कृति विभाग की लगभग सभी गतिविधियां विभिन्न परिषद, अकादमी, केन्द्र और पीठ के माध्यम से संचालित होती थीं, जिनका मुख्यालय भोपाल था। बख्शी सृजन पीठ, संभवतः भिलाई इस्पात संयंत्र के सहयोग और प्रथम अध्यक्ष डॉ. प्रमोद वर्मा की सुविधा अनुरूप भिलाई में था और बंटवारे में बस एक यही छत्तीसगढ़ के हिस्से आया। डॉ. प्रमोद वर्मा के बाद लंबे समय से खाली पड़े पीठ में उन्होंने नई जान फूंकी, नियमित गतिविधियां आरंभ हुई और संस्कृति विषयक कई क्षेत्रों यथा क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र की दोहरी सदस्यता के लिए भी उन्होने पहल की।

कवि, कहानीकार वे हैं ही, यात्रा-संस्मरणों में उनकी दृष्टि, संवेदना और शैली का जवाब नहीं। उनके रिपोर्ताज संस्कृति के पक्षों को रेखांकित करने वाले हैं वहीं पत्रकारिता को भी उन्होंने आजमाया है। नरसिंहनाथ, बस्तर, चितेरे, रामनामी जैसे विषयों पर उनका लेखन, दस्तावेज की तरह है। लेकिन उनकी कलम में मुझे तलवार कभी नहीं दिखा, खासकर संस्मरणों और कहानियों में भी, वह छुरी-कटारी की तरह, बल्कि अक्सर नश्तर की तरह चलती है, नासूर पर चीरा लगाती है और परदानशीनी को तार-तार भी करती है। कील, कांटे और कमंद उनके उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल वे बड़ी चतुराई से और कई बार निर्ममतापूर्वक करते हैं।

उनके साथ का एक यादगार अभियान कोई बीस बरस पहले ‘सतगढ़ा राज‘ का था। आकाशवाणी वाले संजय रंजन भी साथ थे। छत्तीसगढ़ के इतिहास का हजार साल मानों हमलोगों के सामने खुल गया। सतगढ़ा राज की बैठक तुमान में हो रही थी, जो छत्तीसगढ़ में कलचुरियों की पहली राजधानी थी और यह वस्तुतः सात पुराने जमींदार प्रमुखों का अधिवेशन था, यही सात, कभी छत्तीस-अड़तालिस गढ़ों में भी शामिल थे और रतनपुर के कलचुरि शासकों का खालसा क्षेत्र पश्चिम, उत्तर और पूर्व में इनसे घिरा था। पूरे दिन की लंबी बातचीत और साक्षात्कार का सिलसिला हम सबके लिए अपनी समझ साफ करने का अवसर बना। इस दौरान उनकी योजना और कार्यशैली मेरे लिए सबक थी। उनके आयोजन-प्रभुत्व का एक प्रसंग ताला में किरातार्जुनीय नाटक का प्रदर्शन, जिसके किस्से मैंने सुने और एक अन्य, तत्कालीन बिलासपुर आयुक्त मदन मोहन उपाध्याय जी की अगुवाई और आपके संयोजकत्व में बिलासपुर में कहानी-99 का आयोजन था, जिसमें कमलेश्वर जी की विशेष उपस्थिति थी और मुझे उनसे लंबी बातचीत का अवसर मिला था।

खाने और पहनने में सलीका और तमीज, जिसके मानक कई बार उनके खुद के तय किए होते हैं, शास्त्रीय शैली में अनूठे मानक और व्याकरण निर्धारित करते हुए उनकी रचनात्मक प्रतिभा और सक्रिय-गति देखते ही बनती है। अपने तय तौर-तरीकों के प्रति वे बेहद आग्रही होते हैं। खाने-पहनने को ग्रहण-धारण करने, बरतने के अलावा इन विषयों के बतरस का भी आनंद लेते हैं, इसलिए, इस अवसर पर जाहिर कर रहा हूं कि पीठ पीछे मैं उन्हें सुरुचि भोजनालय, सुरुचि वस्त्रालय कहा करता हूं। मजेदार कि उन्हें जितना और जैसा ताल्लुक अपने रोटी-कपड़े के लिए है, मकान के लिए कतई नहीं। अब तक मेरी जानकारी में उनके ठिकाने किराये के मकान ही रहे हैं, उनके ये डेरे बेशक साफ, सुघड़ होते हैं।

वे जितने यात्रा-लोलुप हैं, उतना ही रेल स्टेशनों (और रेल अधिकारियों) को भी पसंद करते हैं, उनमें यह विशिष्ट रस-बोध है। छोटे-छोटे सूने से स्टेशन, रसमड़ा हो, पाराघाट से बदलकर जयरामनगर, उस्लापुर, खोड़री-खोंगसरा-भनवारटंक या फिर सिन्नी, इन सबके साथ आप उनका रोमांस पढ़-सुन सकते हैं और रोमांच महसूस कर सकते हैं। बिलासपुर स्टेशन का अंगरेजी तहजीब की याद दिला सकने वाला रेस्टोरेंट या एएचव्हीलर तो उनके ठिकाने रहे ही। दरअसल वे यात्रा के साथ पड़ाव, सांसारिकता और विरक्ति, वार्ता के दौरान मौन जैसे द्वैत को साध सकने में माहिर हैं। हर बार अगली मुलाकातों के लिए योजना बनाते, उनकी ‘आपस-दारियां‘ कब दूरियां बन जाए, वे भी नहीं जानते।

उन्हें ज्यादातर लोग, मेरी तरह ‘आगे नाथ न पीछे पगहा‘ जानते हैं, उनसे अपने परिवार, रिश्तेदार, विवाह-जन्म-मृत्यु की बातें शायद ही किसी ने सुनी हों, लेकिन कुछ, खासकर एक प्रसंग को बस ‘छू‘ रहा हूं कि वे विवाह कर रायपुर से लौटने वाले थे तब टिकरापारा के अभ्यंकर बाड़ा में मैं नवविवाहित दम्पति के स्वागत की प्रतीक्षा कर रहा था और बाद में श्रीमती जायसवाल के हाथों की चाय भी पी है। यहां चर्चा सिर्फ इसलिए कि वे अपने रागात्मक संबंधों को साहित्यिंक परदे और अतिशयोक्ति के साथ उजागर करने को जितने बेताब रहते हैं, अपने विवाह की चर्चा के प्रति उतने ही संकोची।

वे मदद-सहयोग तो ले सकते हैं, लेकिन स्वाभिमान बनाए रखते हुए। सहानुभूति उन्हें बरदाश्त नहीं। उनकी यह खुद्दारी और स्वयंभू-सा चरित्र। जब वे सेल्यूलाइटिस की चपेट में आए, तो इसकी खबर भी कम लोगों को होने दी, कोई उन्हें बेबस और लाचार समझ सहानुभूति प्रकट करे, यह उन्हें मंजूर नहीं होता। अपने इलाज के बाद वे मंगला में रहे, तब पता लगा कि बिलासपुर में उनके लिए एक ऐसा भी घर है। ठंड के दिन थे और वे खुद को घर से अलग, अधिकतर छत पर स्थापित रखते थे। उस दौरान प्रकट नहीं करें, पर सबसे मिलना-जुलना पसंद नहीं कर रहे थे। मेरी लगभग नियमित मुलाकात उनसे होती, हर मुलाकात पर अगला एजेंडा तय कर देते थे, शायद इसलिए कि मैं बेतकल्लुफ बना रहा, उनके सामने उनके तबियत की परवाह कभी नहीं की। स्वाभाविक-सहजता को इस तरह बेलाग स्वीकार कर सकने वाले वे दुर्लभ व्यक्तित्व हैं।

श्यामलाल चतुर्वेदी, श्रीकांत वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और शंकर शेष, बिलासपुर के इन पांच ‘एस‘ के बाद यही नाम सतीश जायसवाल ध्यान में आता है। एक ऐसी खास बात जो शायद सिर्फ मेरे साथ है- उनकर कर बाता-चिती होथन, गोठ-बात होथे अउ कइ पइत नइ भी होवय, फेर जब भी होथे छत्तीसगढ़ी म ही होथे। उनसे जुड़े लोगों में मैं शायद एक अकेला हूं, कि हमारी बातचीत हमेशा छत्तीसगढ़ी में होती है, हिन्दी में एक बार भी, कभी भी नहीं। आत्मीयता महसूस कराने के लिए वे बहुत सजग और तत्पर रहते हैं, यथासंभव परिचितों को घरूनाम से याद करते और पुकारते हैं, मैं उनके लिए मुन्ना हूं।

पत्रिका का अंक,
जिसमें यह लेख छपा है.
सतीश जी कई मायनों में खुद रोचक मुसलसल कहानी की तरह हैं, इसलिए यह जो, जैसा याद है, वही लिखने का प्रयास है। पहले-पहल जब लिखने की बात आई तो हफ्ते भर यही लगता रहा कि खेद व्यक्त करना पड़ेगा, लेकिन सुधीर-सतीश जी ‘एस-द्वय‘ के लिहाजवश, अनिच्छापूर्वक नोट्स लेना शुरु किया, तो पता ही नहीं चला कि दिन कैसे बीते और यह लिखना मेरे लिए कितना मजेदार अनुभव रहा। अब जब समय-सीमा के कारण इस अधूरे को पूरा बनाकर प्रस्तुत कर रहा हूं, मानता हूं कि उन पर कभी शोध होगा तो मैं सबसे जरुरी रिसोर्स पर्सन्स में एक नाम मेरा भी होगा। 

आमतौर पर कृतित्व-व्यक्तित्व वाला पत्रक साथ आ जाता है कुछ बचे तो गूगल-नेट किसी भी किस्से को इतिहास बनवा डालते हैं। इस अंक की तैयारी की जानकारी के साथ ऐसा कुछ नहीं आया, इसलिए भी लिखना मजेदार रहा। इस कहानी ‘सतीश जायसवाल‘ में तथ्य-इतिहास की अपेक्षा न करें, इसे संस्मरण भी न मानें। कहानी भी मानने लायक यह न हो तो इस लेखन को उद्देश्य में सफल मानूंगा। बहरहाल, शीर्षक सोचा है- एक अधूरी कहानी, असमाप्त कविता, ‘तीर्थ नहीं केवल यात्रा ...‘

Monday, August 19, 2019

साहित्य वार्षिकी

इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी के रचना उत्सव एवं सम्मान समारोह के इस आयोजन में आज प्रस्तुति देने वाले कलाकारों, सभा में पधारे गुणीजन और इंडिया टुडे परिवार के सदस्य, यों मेजबान लेकिन हमारे मेहमान, आप सभी का सादर अभिवादन।

हिंदी साहित्य और उसके प्रतिनिधि लेखकों को मुख्य धारा के पाठकों तक पहुंचाने में साहित्य वार्षिकी ने अहम् भूमिका निभाई है साथ ही हिंदी की अपनी जमीन के अलावा दूसरी भाषाओँ के प्रतिनिधि लेखकों तक भी पहुंच बनाई है। साहित्य वार्षिकी में रचनाओं की गुणवत्ता के साथ देश के प्रमुख चित्रकारों की भागीदारी, इसका उल्लेखनीय पक्ष है। 2002 में वार्षिकी का सिलसिला रुक जाने के बाद 2017 में यह फिर से शुरू हुआ। इस दौर में नई टेक्नोलॉजी के साथ पाठकों की रुचियां बदलीं, पर डेढ़ दशक के बाद प्रकाशित साहित्य वार्षिकी के अंक को दोबारा छापने की जरूरत हुई। वार्षिकी की यह सफलता, स्वयं अपना प्रतिमान है और आश्वस्त करती है कि साहित्य के पाठक उसी अनुपात में आज भी हैं।

इंडिया टुडे ने यहां आठ सौ बरस निर्विघ्न राज्य करने वाले कलचुरियों के वंशजों की खोज-खबर ली थी। संगीत-तीर्थ रायगढ़ की परंपरा और राज परिवार के हालात को टटोला। विश्वदाय स्मारक सूची की तैयारी वाले प्राचीन राजधानी-नगर सिरपुर की कहानी कही। मिसाल-बेमिसाल में छत्तीसगढ़ के अनूठे और अल्पज्ञात तथ्यों, चरित्रों को रेखांकित किया और कला-साहित्य की हलचल से हमेशा बाखबर रखा है। इस पत्रिका ने समाचार के दायरे को राजनीति, अपराध, भ्रष्टाचार, दुर्घटना से आगे विस्तृत कर सामाजार्थिक सरोकार को भी जोड़ा। स्वास्थ्य, शिक्षा, नवाचार और उद्यम की रोचक-प्रेरक कहानियों के साथ सोच-समझ को साफ और विकसित करने का मसौदा उपलब्ध कराया। पिछले साल यहां इंडिया टुडे का ‘कान्क्लेव छत्तीसगढ़‘ हुआ था और अब यह रचना उत्सव, इसकी कड़ियां हैं।

छत्तीसगढ़ के इतिहास में रचना का सतत उत्सव घटित होता रहा है। कालिदास के मेघदूत की रचना स्थली और प्राचीनतम नाट्यशाला की मान्यता वाले रामगढ़ में अजंता और बाघ से भी पुराने चित्र हैं, बाइस सौ साल पहले सुतनुका-देवदीन की प्रेम-अभिव्यक्ति गुफा की दीवार पर उत्कीर्ण है तो दूसरी तरफ हजारों साल से चली आ रही वाचिक परंपरा के मौखिक साहित्य का विपुल भंडार भी छत्तीसगढ़ में है। भरथरी और पंडवानी गायन में महिलाएं आगे हैं तो धनकुल जगार गाथा गायन पर ‘गुरुमाएं‘ महिलाओं का एकाधिकार है। गौर सींग, करमा, ददरिया, पंथी, सुआ, राउत, सैला महज नृत्य-गीत शैली और मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं, लोक जीवन का समवाय हैं। राजनांदगांव की सौगात, कोई डेढ़ सौ साल पहले, निजी पहल से देश का पहला संग्रहालय आरंभ हुआ तो सन 1956 में खैरागढ़ में एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय स्थापित हुआ। रायगढ़ की सांगीतिक परंपरा ने कत्थक को विशिष्ट आयाम दिया। नाचा-गम्मत का लोक ‘नया थियेटर‘ के माध्यम से विश्व मंच पर थिरकता रहा।

सत्रहवीं सदी इस्वी में गोपाल मिश्र के ‘खूब तमाशा‘ से आरंभ परंपरा में यहां ठाकुर जगमोहन सिंह की फैंटेसी ‘श्यामा स्वप्न‘ उपन्यास में साकार हुई। जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ ने हिन्दी साहित्यशास्त्र की बुनियाद रखी। माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ पत्रिका और ‘एक टोकरी भर मिट्टी‘ कहानी से इतिहास गढ़ा। सरस्वती संपादन की परंपरा संवाहक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने ‘क्या लिखूं‘, 'क्यों लिखूं' और 'मैं क्या पढ़ूं' जैसे शीर्षक निबंधों के साथ, क्या लिखें-पढ़ें का दस्तावेज रचा। मुकुटधर पांडेय के छायावादी मन ने प्रवासी कुररी की व्यथा सुनी और मेघदूत को छत्तीसगढ़ी में आत्मसात-अभिव्यक्त किया। मुक्तिबोध का यहां कभी ‘अंधेरे में‘ होना, अब भी प्रकाश-स्तंभ है।

हम धान का कटोरा, सिर्फ इसलिए नहीं हैं कि यहां धान अधिक उपजता है, इसलिए भी नहीं कि यहां का मुख्य भोजन चावल है, बल्कि इसलिए भी कि हमने साढ़े तेइस हजार धान-प्रकारों को इकट्ठा करने का जतन किया है, बचाया है और सिर्फ बचा कर नहीं रखा, उनके गुण-धर्म पर शोधपूर्ण जानकारी जुटाई है। इनके राम-लक्ष्मण जैसे स्थानीय नाम को भी सहेजा है। हम 44 प्रतिशत वन आच्छादित प्रदेश हैं, यह महज आंकड़ा नहीं, इसके पीछे वन संरक्षण और प्रबंधन की परंपरा, पवित्र वन खंड ‘सरना‘ हैं, प्रकृति और पर्यावरण के सम्मान के ‘पंडुम‘ हैं, वनों के व्यावसायिक दोहन के सामने आरे के निषेध को मोरध्वज की पौराणिक कथा से जोड़ कर अपनाया है, अपनी परंपरा का अंग बनाया है। बस्तर दशहरा का रथ आज भी बिना आरा के बनता है।

बस्तर का दशहरा पचहत्तर दिन का देवी का अनुष्ठान है न कि राम-रावण का उत्सव। उत्तर-पूर्वी छत्तीसगढ़ में गंगा दशहरा महत्वपूर्ण है। यह विजयादशमी तो है ही, कुछ इलाकों में गढ़ जीतने की परंपरा का त्यौहार है। यहां रावण भांठा और रावण की मूर्तियां हैं और अन्य ग्राम देवताओं के साथ रावण को समभाव से पूजा दी जाती है। जाति-जनजाति, धर्म-संप्रदाय पर प्रभावी सौहार्द की ऐसी समावेशी सतरंगी संस्कृति की भावभूमि है यह प्रदेश।

यहां ‘अरपा पैरी के धार...‘ है, महानदी, शिवनाथ, इंद्रावती, रेणु, मांद का प्रवाह है, तो जोड़ा तालाबों की संख्या भी कम नहीं। फिर ऐसे भी गांव हैं जहां सात आगर सात कोरी यानि 147 तालाब हैं, जल प्रबंधन की समझ, हमारी समष्टि चेतना में दर्ज है।

वन और धान की हरियाली हमारी समृद्धि है तो सोनाखान के स्वर्ण भंडार और उत्तरी छत्तीसगढ़ का काला कोयला, मध्य का सफेद चूना और दक्षिण का लाल लोहा इस राज्य की सुनहरी तकदीर रचते हैं, जिसके साथ टिन की चमक है और अलेक्जेंड्राइट के नगीने भी जड़े हैं। 

संस्कृति-समृद्ध छत्तीसगढ़ में इंडिया टुडे समूह के इस रचना उत्सव में कला-संस्कृति के विविध पक्षों को संयोजित किया गया है, मानों मार्कंडेय-वज्र के उस प्रसिद्ध पौराणिक संवाद को मूर्त किया जा रहा हो, जिसमें मूर्तिशिल्प-चित्रकला के साथ नृत्य, वाद्य, साहित्य और गीत को जरूरी बताते, कला की समग्रता प्रतिपादित है। इस आयोजन के उद्घाटन में आप सबके समक्ष अपनी माटी का गुणगान करते हुए बांटनवारे के रंग में रंगा हूं। पुनः अभिवादन और सादर आभार।

22 जून 2019 को रायपुर में इंडिया टुडे साहित्य वाषिकी का आयोजन हुआ। इसमें उद्घाटन वक्तव्य का जिम्मा मेरा था, वह प्रस्तुत आलेख के आधार पर था।


इसी कार्यक्रम में तीजनबाई, विनोद कुमार शुक्ल (चित्र में चि. शाश्वत), अरुण कुमार शर्मा, मिर्जा मसूद जैसे संतों के साथ संस्कृति सम्मान के लिए पांचवां नाम मेरा था।

Friday, July 5, 2019

खुमान साव


पचासेक साल पहले हम किशोर वय साथियों के लिए फिल्मी परदे के नायकों से कहीं बड़ी छवि मंच के, रामचन्द्र देशमुख, लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, भैयाराम हेड़उ जैसे नामों की थी और चंदैनी गोंदा हमारे लिए एक पवित्र नाम रहा। इस सूची में एक अलग नाम खुमान साव का भी था, क्योंकि हम सिर्फ इस नाम से परिचित थे, न चेहरा पहचानते न ही उनके कद को जानते थे। यह नाम मेरी स्मृति में उतनी ही गहराई से दर्ज रहा और इस नाम का आकर्षण भी शायद अधिक ही रहा।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात् राजिम मेला के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन था, जिसमें चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति को लेकर संवादहीनता की स्थिति बनी और खुमान साव जी से आमने-सामने पहली मुलाकात हुई। वे आम गंभीर से अधिक खिंचे हुए थे। मैं दुविधा में रहा, अपने विभागीय दायित्वों की सीमा और प्रशंसक होने के बीच तालमेल बिठाना था। वे तमतमाए रहे, लेकिन कार्यक्रम की प्रस्तुति शानदार रही। तब से बाद तक उनसे नरम-गरम, तीखी-मीठी होती रही।

वे लगभग हर महीने रायपुर आते और मुझसे मुलाकात होती, मेरे कक्ष में पहुंचते ही उनके बिना बोले चाय का ध्यान करना होता। इसके बाद धूम्रपान के लिए कमरे से बाहर निकल जाते। तबियत ठीक न होने पर अपनी गाड़ी में ही बैठे रहते, वहीं चाय पीते और हम सबसे मिल कर वापस लौटते।

छत्तीसगढ़ के लोक संगीत के लिए उनका एक प्रसंग मेरे लिए अविस्मरणीय है। मैंने किसी लोक कलाकार के धुन की आलोचना की, कि वह फिल्मी धुन की नकल है। इस पर उन्होंने डांटते हुए कहा- ए हमर पारंपरिक धुन आय, तैं का जानबे, फिलम वाला मन नकल करे हें, हमर धुन के। उनके पास पुराने समय में राजनांदगांव में आने वाले बंबइया कलाकारों के भी संस्मरणों का खजाना था।

सन 2005 में किन्हीं कारणों से मुझसे खफा हुए थे। मेरी तबियत खराब हुई और मैं लंबी छुट्टी पर रहा। वापस काम पर लौटा, मुझे पता नहीं था कि वे इस बीच मेरे स्वास्थ्य की जानकारी लेते रहे थे। पूछा- कहां गए रहे अतेक दिन ले, उनकी गंभीरता और उपरी सख्ती के बावजूद मैं उनसे ठिठोली की छूट ले लेता था। मैंने मजाकिया जवाब दिया- घूमे गए रहें। इस पर भावुक हो गए और नारियल का टुकड़ा दे कर बोले, परसाद झोंक, तोर बर नरियर बदे रहें। उनकी अस्वस्थता का समाचार पाकर उनके स्वास्थ्य की कामना मैंने भी की, लेकिन उन्हें वापस स्वस्थ पा कर प्रसाद नहीं खिला सका। उनकी इन स्मृतियों के साथ मेरे भाव वे महसूस कर पाए होंगे, मेरा अटल विश्वास है।

छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के पुरोधा खुमान साव का जन्म 5 सितंबर 1929 को हुआ। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकधुनों को उन्होंने परिमार्जित किया साथ ही समकालीन छत्तीसगढ़ी काव्य को लोकधुनों में बांधा। छत्तीसगढ़ की सबसे प्रतिष्ठित लोकमंच संस्था ‘चंदैनी गोंदा‘ के वे एक आधार स्तंभ थे। सन 2016 में संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हुए। 9 जून 2019 को उनके निधन के पश्चात् संस्कृति विभाग के सहयोग से स्मारिका ‘श्रद्धांजलि खुमान साव‘ 18 जून को प्रकाशित की गई, जिसमें मेरा यह संस्मरण भी शामिल है।