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Thursday, February 28, 2013

विजयश्री, वाग्‍देवी और वसंतोत्‍सव

शुक्र मनाया जाता, यदि वसंत पंचमी शुक्रवार को न होती, लेकिन हर साल तो ऐसा नहीं हो सकता, इस साल भी नहीं हुआ, यानि वसंत पंचमी हुई 15 फरवरी, ऐन शुक्रवार को। ऐसा हुआ नहीं कि मालवा और पूरे देश की निगाहें धार की ओर होती हैं। यहां सरस्‍वती-पूजन और नमाज पढ़ने की खींचतान में हमारी विरासत के रोचक पक्ष ओझल रह जाते हैं।

मालवा के परमार राजाओं की प्राचीन राजधानी धारानगरी यानि वर्तमान धार के कमालमौला मस्जिद को प्राचीन भोजशाला की मान्‍यता मिली है। उल्लेख मिलता है कि राजा भोज द्वारा संस्कृत शिक्षा के लिए स्थापित केन्द्र के साथ सरस्वती मंदिर भी था। धार के पुराने महल क्षेत्र के मलबे से प्राप्त तथा ब्रिटिश म्यूजियम में संग्रहित वाग्देवी सरस्वती की अभिलिखित प्रतिमा की पहचान भोज की सरस्वती के रूप में हुई। यहां से व्याकरण नियम, वर्णमाला के सर्पबंध शिलालेख प्राप्त हुए हैं और यह भोज का मदरसा भी कहा जाने लगा।

सन 1902-03 में यहां कमालमौला मस्जिद के मेहराब से खिसककर निकले, औंधे मुंह लगे 5 फुट 8 इंच गुणा 5 फुट का अभिलिखित काला पाषाण खंड मिला। 82 पंक्तियों वाले संस्कृत और प्राकृत भाषा वाले शिलालेख में 76 श्लोक तथा शेष भाग गद्य है। लेख, वस्तुतः चार अंकों वाली नाटिका 'पारिजात मंजरी' या 'विजयश्री', जो दो पत्‍थरों पर अभिलिखित थी, का पहला हिस्‍सा है। इसके साथ ऐसा ही एक और शिलालेख मिला लेकिन वह इसका जोड़ा नहीं बल्कि 'कूर्मशतक' प्राकृत काव्‍य उकेरा पत्‍थर है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उदार अफसोस जताया था- ''अनुमान किया गया है कि बाकी के दो अंक भी निश्चय ही उसी इमारत में कहीं होंगे, यद्यपि मस्जिद के हितचिंतकों के आग्रह से उनका पता नहीं चल सका।'' बहरहाल, नाटिका 13 वीं सदी ईस्‍वी के राजगुरु मदन उर्फ बाल सरस्वती की रचना है।
शिलालेख के आरंभ और अंत की चार-चार पंक्तियां
नाटिका के पात्र सूत्रधार, नटी, राजा अर्जुनवर्मन, विदूषक विदग्ध, रानी सर्वकला, उसकी सेविका कनकलेखा, राजमाली कुसुमाकर, उसकी पत्नी वसंतलीला तथा नायिका पारिजात मंजरी या विजयश्री है। नाटिका में राजा, सूत्रधार और कुसुमाकर संस्कृत बोलते हैं, अन्य पात्र गद्य में प्राकृत-शौरसेनी एवं पद्य में महाराष्ट्री इस्‍तेमाल करते हैं। नेपथ्य गायन की भाषा प्राकृत, लेकिन अंतिम अंश में संस्‍कृत है। उल्लेख है कि नाटिका, वसंतोत्सव (चैत्रोत्सव, मधूत्सव, चैत्रपर्व) के अवसर पर धारा नगरी में सरस्वती मंदिर (शारदा देवी सदन, भारती भवन) में खेली गई। नाटिका के पहले अंक का शीर्षक 'वसंतोत्‍सव' तथा दूसरे का 'ताडंकदर्पण' है।

परमार वंश के शासक भोजदेव के वंशज अर्जुन को लेख में भोज का अवतार कहा गया है और वही नाटिका के नायक और इस प्रशस्ति के राजा अर्जुनवर्मन हैं। अर्जुनवर्मन द्वारा जयसिंह को पराजित करने की ऐतिहासिक घटना नाटिका का कथानक है। पराजित राजा गुजरात के चालुक्‍य भीमदेव द्वितीय का उत्‍तराधिकारी ऐतिहासिक जयसिंह, अभिनव सिद्धराज है। बताया गया है कि युद्ध में विजय प्राप्त गजारूढ़ अर्जुनवर्मन पर पुष्प वर्षा होती है और पारिजात मंजरी उन्हें छूते ही एक सुन्दर युवती में परिणित हो जाती है, आकाशवाणी होती है कि भोजतुल्य ओ धार के स्वामी इस विजयश्री को स्वीकार करो। यह युवती, चालुक्य राजा की पुत्री है, जो देवी जयश्री की अवतार है। नाटिका में नटी से कहलाया जाता है- कैसी दिव्य मानुषी कथा है।

अर्जुनवर्मन, इस नायिका विजयश्री को माली कुसुमाकर व उसकी पत्नी वसंतलीला की निगरानी में धारागिरि के आमोद उद्यान में रखता है। रानी सर्वकला द्वारा आयोजित आम वृक्ष और माधवी लता का विवाह आयोजन देखने राजा, विदूषक के साथ आमोद उद्यान में जाता है। वसंतलीला और नायिका पेड़ की आड़ से आयोजन देखते रहते हैं। रानी के कर्णाभूषण में राजा नायिका की छवि देखता है। रानी को संदेह होता है। वह आयोजन छोड़कर अपनी सेविका के साथ चली जाती है। इधर जाऊं या उधर जाऊं, मनोदशा में अपराध-बोधग्रस्‍त किंकतर्व्‍यविमूढ़ राजा को विदूषक सुझाता है ''एक हो या अधिक, अपराध तो अपराध है'' यह सुनकर राजा विदूषक के साथ नायिका के पास जाता है। कनकलेखा रानी के कर्णाभूषण सहित व्यंगात्मक संदेश लाती है। राजा नायिका को छोड़कर रानी के पास वापस लौटता है। नायिका प्राण त्‍यागने की बात कहती है। मध्‍यांतर।

संस्‍कृत साहित्‍य में चित्रकाव्य की लाजवाब समृद्ध परम्‍परा रही है। यहां भी श्लेष, रूपक, शब्‍द साम्‍य और संयोग के चमत्‍कृत कर देने वाले प्रयोग हैं। इतिहास और दंतकथाओं दोनों में एक समान महान और लोकप्रिय शायद राजा भोज जैसा कोई और नहीं। राजा भोज के साथ प्रयुक्‍त गंगू, माना जाता है कि उससे युद्ध में पराजित राजा गांगेयदेव है और तेली को कल्‍याणी के चालुक्‍य राजा तैल (तैलप) के साथ समीकृत किया जाता है। इस शिलालेख में भोज को कृष्‍ण और अर्जुन भी कहा गया है और गांगेय में श्‍लेष है, त्रिपुरी के कलचुरि राजा गांगेयदेव और अर्जुन से पराजित गंगा पुत्र भीष्‍म का। अर्जुनवर्मन अपने जिस मंत्री पर पूरा भरोसा करते हैं, उसका नाम (नर-) नारायण है। कवि मदन उर्फ बाल सरस्‍वती की रचना यह नाटिका सरस्‍वती मंदिर में, सरस्‍वती पूजा वाले वसंतोत्‍सव या मदनोत्‍सव पर खेली जा रही है। नाटिका के पात्रों में विदूषक विदग्ध है। रानी सर्वकला, कुंतल की है और उसकी सेविका का नाम कनकलेखा है। राजमाली कुसुमाकर है तो उसकी पत्नी का नाम वसंतलीला है। नायिका 'पारिजात मंजरी' (स्‍मरणीय- 'पारिजात' समुद्र मंथन का रत्‍न, दिव्‍य पुष्‍प है) या विजय से उपलब्‍ध गुर्जर 'विजयश्री' है। होयसल राजकुमारी सर्वकला और चालुक्‍य राजकुमारी विजयश्री का द्वंद्व और इनसे परमारों के राग-द्वेष के कई कोण उभरते हैं। लगता है कि पूरी नाटिका वसंत ऋतु, फूल-फुलवारी और मदनोत्‍सव का रूपक है। नटी का कथन पुनः उद्धरणीय- ''कैसी दिव्‍य-मानुषी कथा है।''

नाटक के क्‍लाइमेक्‍स जैसा मध्‍यांतर। आगे दो अंकों में क्‍या होगा, दूसरे पत्‍थर के मिलने तक थोड़ा सिर खुजाएं, सोचें-सुझाएं। शायद मान-मनौवल के साथ विजयश्री की स्‍वीकार्यता हो और फिर वसंत उत्‍सव के साथ सुखांत समापन। रचना, नाटिका है, प्रशस्ति भी, सूचना सहित कि यह 'नवरचित नाटिका की पहली प्रस्‍तुति है', इस तरह उसका प्रतिवेदन भी। शिलालेख के पहले भाग, इस पत्‍थर के अंतिम श्लोक 76 पर लेख है, जैसा आम तौर पर अभिलेखों के अंत में होता है, कि यह प्रशस्ति रूपकार सीहाक के पुत्र शिल्पी रामदेव द्वारा उत्कीर्ण की गई, मानों आशंका हो कि दूसरा पत्‍थर मिले न मिले। 

दर्शक कौन रहे होंगे इस नाटिका के? इसका जवाब मिल जाता है नाट्यशास्‍त्र से, जिसमें बताया गया है कि द्रष्‍टा को उहापोह में पटु (क्रिटिकल?), होना चाहिए। अच्‍छा प्रेक्षक सद्गुणशील, शास्‍त्रों और नाटक के छः अंगों का जानकार, चार प्रकार के आतोद्य वाद्यों का मर्मज्ञ, वेशभूषा और भाषाओं का ज्ञाता, कला और शिल्‍प में विचक्षण, चतुर और अभिनय-मर्मज्ञ हो तो ठीक है (बात शास्‍त्रों की है जनाब!) यह हिसाब लगा रहा हूं आधे से दूने का, कि नाटक अब छपे तो कितने पेज की पुस्‍तक होगी और खेला जाए तो उसकी अवधि कितनी होगी। न मिले उसे बैठै-ठाले खोजने का भी अपना ही आनंद होता है। कभी लगता है कि शिलाखंड पर उत्‍कीर्ण इस साहित्‍य को वैसा सम्‍मान नहीं मिला, शायद इसका जोड़ा, दूसरा हिस्‍सा इसीलिए अभी तक रूठा, मुंह छिपाए है। शिलालेख का पत्‍थर मिला था यहां के शिक्षाधिकारी 'के.के. लेले' को, यह नाम भी कम अनूठा नहीं।

इस नाटिका के बारे में पहले-पहल हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध से जाना, फिर एपिग्राफिया इण्डिका में प्रो. हुल्‍त्‍श का विस्‍तृत लेख और त्रिवेदी जी वाला कार्पस इंस्क्रिप्‍शनम इंडिकेरम देखा। इसकी फिर से चर्चा पिछले दिनों भिलाई-कोलकाता वाली डॉ. सुस्मिता बोस मजूमदार ने की, बताया कि वे इस पर गहन अध्‍ययन कर रही हैं, उन्‍हें संस्‍कृत-प्राकृत का अभ्‍यास भी है। मैंने पुराने संदर्भ फिर से खंगाले, कुछ मिला, कुछ नहीं। इस मामले में मैं पक्‍का खोजी हूं, जिसे सच्‍चा सुख खोजने में मिलता है, कुछ मिल जाए तो वाह, न मिले तो वाह-वाह। इससे संबंधित कुछ महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन और टीका सुस्मिता जी ने उपलब्‍ध करा दी। भोज विशेषज्ञ उज्‍जैन वाले डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित जी ने फोन पर बताया है कि पद्मश्री वि.श्री. वाकणकर के चाचा इतिहास अधिकारी श्री अनन्‍त वामन वाकणकर ने पारिजात मंजरी का हिन्‍दी अनुवाद किया था, जो वाकणकर शोध संस्‍थान से प्रकाशित है, इसकी प्रति अब तक मिली नहीं, प्रयास कर रहा हूं।

महीने में चार पोस्‍ट का अपना नियम टूटा, क्‍योंकि डेढ़ महीने से पारिजात मंजरी के साथ वसंत मना रहा हूं और फागुन तक जारी रखने का इरादा है। कुछ तो होंगे जो वसंत में मदन-दग्‍ध न हों, वे इस सूचना से ईर्ष्‍या-दग्‍ध हो कर वसंतोत्‍सव मना सकते हैं।
20 फरवरी 2013 को नवभारत के संपादकीय पृष्‍ठ 4 पर प्रकाशित 

Friday, February 1, 2013

बिग बॉस

अच्छा! आप नहीं देखते बिग बॉस। तब तो हम साथी हुए, मैं भी नहीं देखता यह शो। मत कहिएगा कि नाम भी नहीं सुना, पता नहीं क्या है ये, यदि आपने ऐसा कहा तो हम साथी नहीं रहेंगे। मैंने नाम सुना है और थोड़ा अंदाजा भी है कि इसमें एक घर होता है 'बिग बॉस' का, जिसमें रहने वालों की हरकत पर निगाह होती है, कैमरे लगे होते हैं और बहुत कुछ होता रहता है इसमें। मुझे लगता है कि ताक-झांक पसंद लोग इस शो से आकर्षित होते हैं फिर धीरे-धीरे पात्रों और उनके आपसी संबंधों में रुचि लेने लगते हैं। भारतीय और फ्रांसीसी इस मामले में एक जैसे माने जाते हैं कि वे सड़क पर हो रहे झगड़े के, अपना जरूरी काम छोड़ कर भी, न सिर्फ दर्शक बन जाते हैं, बल्कि मन ही मन पक्ष लेने लगते हैं और कई बार झगड़े में खुद शामिल हो जाते हैं। यह शायद मूल मानवीय स्वभाव है, मनुष्य सामाजिक प्राणी जो है।

बात थोड़ी पुरानी है, इतिहास जितनी महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन बासी हो कर फीकी-बेस्वाद भी नहीं, बस सादा संस्मरण। पुरातत्वीय खुदाई के सिलसिले में कैम्प करना था। बस्तर का धुर अंदरूनी जंगली इलाका। मुख्‍यालय, जो गाइड लाइन के लिए तत्पर रहता है, से यह भी बताया गया था कि हिंस्र पशुओं से अधिक वहां इंसानों से खतरा है। मौके पर पहुंच कर पता लगा कि एक सरकारी इमारत स्कूल है और इसी स्कूल के गुरुजी हैं यहां अकेले कर्ता-धर्ता, गांव के हाकिम-हुक्काम, सब कुछ। गुरुजी निकले बांसडीह, बलिया वाले। ये कहीं भी मिल सकते हैं, दूर-दराज देश के किसी कोने में। पूरा परिवार देस में, प्राइमरी के विद्यार्थी अपने एक पुत्र को साथ ले कर खुद यहां, क्या करें, नौकरी जो है। छत्तीसगढ़ का कोई मिले, कहीं, जम्मू, असम या लद्दाख में, दम्पति साथ होंगे, खैर...

गुरुजी ने सीख दी, आपलोग यहां पूरे समय दिखते रहें, किसी न किसी की नजर में रहें। कहीं जाएं तो गांव के एक-दो लोगों को, जो आपके साथ टीले पर काम करने वाले हैं, जरूर साथ रखें, अनावश्यक किसी से बात न करें। किसी की नजर आप पर हो न हो आप ओझल न रहें, एक मिनट को भी। रात बसर करनी थी खुले खिड़की दरवाजे वाले कमरे या बरामदे में, नहाना था कुएं पर, लेकिन हाजत-फरागत का क्या होगा, कुछ समय के लिए सही, यहां तो ओट चाहिए ही। गुरुजी को मानों मन पढ़ना भी आता था। कहा कि नित्यकर्म के लिए खेतों की ओर जाएं, किसी गांववासी को साथ ले कर और खेत के मेढ़ के पीछे इस तरह बैठें कि आपका सिर दिखता रहे। गुरुजी, फिर आश्रयदाता, उनकी बात तो माननी ही थी।

गुरुजी प्राइमरी कक्षाओं को पढ़ाते थे, उनके सामने हम भी प्राइमरी के छात्र बन गए, तब कोई सवाल नहीं किया, शब्दशः निर्देश अनुरूप आचरण करते रहे, लेकिन कैम्प से वापस लौटते हुए, गुरुजी को धन्यवाद देने, विदा लेने पहुंचे और जैसे ही कहा कि जाते-जाते एक बात पूछनी है आप से, उन्होंने फिर मन पढ़ लिया और सवाल सुने बिना जवाब दिया, आपलोग यहां आए थे जिस टीले की खुदाई के लिए, माना जाता था कि टीले पर जाते ही लोगों की तबियत बिगड़ने लगती है तो बस्ती में खबर फैल गई कि साहब लोग अपनी जान तो गवाएंगे नहीं, किसी की बलि चढाएंगे, काम शुरू करने में, नहीं तो बाद में। इसलिए ओझल रहना या ऐसी कोई हरकत, आपलोगों के प्रति संदेह को बल देता।

इस पूरे अहवाल का सार कि गुरुजी से हमने सीखा कि दिखना जरूरी वाला फार्मूला सिर्फ 'जो दिखता है, वो बिकता है' के लिए नहीं, बल्कि दिखना, दिखते रहना पारदर्शिता, विश्वसनीयता बढ़ाती है, नई जगह पर आपका संदिग्‍ध होना कम कर सकती है। यों आसान सी लगने वाली बात, लेकिन साधना है, हमने इसे निभाया 24×7, हफ्ते के सभी सातों दिन और दिन के पूरे 24 घंटों में यहां। फिर बाद में ऐसे प्रवासों के दौरान बार-बार। अवसर बने तो कभी आप भी आजमाएं और इस प्रयोग का रोमांच महसूसें।

दुनिया रंगमंच, जिंदगी नाटक और अपनी-अपनी भूमिका निभाते हम पात्र। ऊपर वाले (बिग बॉस) के हाथों की कठपुतलियां। नेपथ्‍य कुछ भी नहीं, मंच भी नहीं, लेकिन नाटक निरंतर। बंद लिफाफे का मजमून नहीं बल्कि सब पर जाहिर पोस्‍टकार्ड की इबारत। ऐसा कभी हुआ कि आपने किसी की निजी डायरी पढ़ ली हो या कोई आपकी डायरी पढ़ ले, आप किसी की आत्‍मकथा के अंतरंग प्रसंगों को पढ़, उसमें डूबते-तिरते सोचें कि अगर आपके जीवन की कहानी लिखी जाए। रील, रियल, रियलिटी। मनोहर श्याम जोशी की 'कुरु कुरु स्वाहा' याद कीजिए, उन्होंने जिक्र किया है कि ऋत्विक घटक कभी-कभी सिनेमा को बायस्कोप कहते थे। बहुविध प्रयोग वाले इस उपन्यास में लेखक ने 'जिंदगी के किस्से पर कैमरे की नजर' जैसी शैली का प्रभावी और अनूठा इस्तेमाल किया है। उपन्यास को दृश्य और संवाद प्रधान गप्प-बायस्कोप कहते आग्रह किया है कि इसे पढ़ते हुए देखा-सुना जाए। आत्‍मकथा सी लगने वाली इस रचना के लिए लेखक मनोहर श्याम जोशी कहते हैं- ''सबसे अधिक कल्पित है वह पात्र जिसका जिक्र इसमें मनोहर श्याम जोशी संज्ञा और 'मैं' सर्वनाम से किया गया है।''

क्लोज सर्किट टीवी-कैमरों का चलन शुरू ही हुआ था, बैंक के परिचित अधिकारी ने बताया था कि फिलहाल सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है, लेकिन हमने सूचना लगा दी है कि ''सावधान! आप पर कैमरे की नजर है'' और तब से छिनैती की एक भी घटना नहीं हुई। दीवारों के भी कान का जमाना गया अब तो लिफ्ट में भी कैमरे की आंख होती है। कैमरे की आंखें हमारे व्‍यवहार को प्रभावित कर अनजाने ही हमें प्रदर्शनकारी बना देती हैं। सम्‍मान/पुरस्‍कार देने-लेने वाले हों या वरमाला डालते वर-वधू, दौर था जब पात्र एक-दूसरे के सम्‍मुख होते थे, लेकिन अब उनकी निगाहें कैमरे पर होती हैं, जो उन पर निगाह रखता है। कैमरे ने क्रिकेट को तो प्रदर्शकारी बनाया ही है, संसद और विधानसभा में जन-प्रतिनिधियों के छोटे परदे पर सार्वजनिक होने का कुछ असर उनके व्‍यवहार पर भी जरूर आया होगा। मशीनी आंखों ने खेल, राजनीति और फिल्मी सितारों के साथ खेल किया है, उनके सितारे बदले हैं और ट्रायल रूम में फिट कैमरों के प्रति सावधान रहने के टिप्स संदेश भी मिलते हैं। कभी तस्‍वीर पर या पुतला बना कर जादू-टोना करने की बात कही जाती थी और अब एमएमएस का जमाना है और धमकी होती है फेसबुक पर तस्‍वीर लगाने की। बस जान लें कि आप न जाने कहां-कहां कैमरे की जद में हैं। बहरहाल, ताक-झांक की आदत कोई अच्छी बात नहीं, लेकिन शायद है यह आम प्रवृत्ति। दूसरी ओर लगातार नजर में बने रहना, ऐसी सोच, इसका अभ्यास, आचरण की शुचिता के लिए मददगार हो सकता है।
कभी एक पंक्ति सूझी थी- ''परदा, संदेह का पहला कारण, तो पारदर्शिता, विश्वसनीयता की बुनियादी शर्त है।'' बस यह वाक्य कहां से, कैसे, क्‍यों आया होगा, की छानबीन में अब तक काम में न आए चुटके-पुर्जियों और यादों के फुटेज खंगाल कर उनकी एडिटिंग से यानी 'कबाड़ से जुगाड़' तकनीक वाली पोस्‍ट।

पुछल्‍ला - वैसे भरोसे की बुनियाद में अक्‍सर 'संदेह' होता है फिर संदेह से बचना क्‍यों? ऐतराज क्‍या? स्‍थापनाएं, साखी-प्रमाणों से बल पाती हैं या फिर संदेह और अपवाद से।
'जनसत्‍ता' 11 मार्च 2013 के
संपादकीय पृष्‍ठ पर यह पोस्‍ट