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Sunday, October 18, 2020

टट्टी-1918

किस्सागोई के लिए हमारी प्रसिद्धि यों ही नहीं है। हुआ कुछ यूं कि विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब ‘सिटी ऑफ जिन्नस्‘ किताब के लिए महाभारत की ऐतिहासिकता के बारे में जानना चाहा और इसके लिए इंद्रप्रस्थ-हस्तिनापुर के उत्खननकर्ता पुराविद प्रो. बी.बी. लाल से मिलने का प्रयास किया। संयोगवश प्रो. लाल पुराना किला, दिल्ली के विश्राम गृह में रुके थे लेकिन उत्खनन प्रतिवेदन पूरा करने में व्यस्त थे, इसलिए समय न दे सके। फिर एक दोपहर फोन आया कि डेलरिम्पल, तुरंत पुराना किला पहुंच सकें तो प्रो. लाल कुछ मिनट का समय दे सकते हैं।

डेलरिम्पल, प्रो. लाल के सामने पहुंच कर समय-सीमा के कारण सीधे सवाल करते हैं- आपके विचार से महाभारत कितना ऐतिहासिक है? इसका सीधा जवाब देने के बजाय प्रो. लाल ने किस्से से बात शुरू की। यों कि, चालीसेक साल पहले 1955 में कलकत्ता से दिल्ली सफर कर रहा था। कुंभ मेला के दिन थे, इलाहाबाद स्टेशन पर अफरा-तफरी मची थी, पुलिस तैनात। पता लगा कि नागा साधु का हाथी बिगड़ गया, भगदड़ मच गई। सैकड़ों लोग कुचल कर मर गए। कई साल बाद इलाहाबाद के पास उत्खनन कराते हुए कैम्प की सांगीतिक संध्या में एक श्रमिक ने गाथा सुनाई, जिसमें 1955 वाली उस घटना का भी समावेश था, मिर्च-मसाला, अतिरंजना सहित। इस गाथा के दो अन्य स्वरूप प्रचलित मिले, किंतु मूल कथ्य में भगदड़ वाली घटना थी। इस तरह कुंभ मेला की कहानी चालीस साल में इतने रूप धर सकती है फिर महाभारत तो मोटे तौर पर घटना के 1300 साल बाद वर्तमान स्वरूप में आया है। यानि कुंभ मेला की घटना-गाथा की तरह महाभारत भी, ऐतिहासिक घटना का मसालेदार किस्सा है।

डेलरिम्पल-लाल संवाद में आया किस्सा, भूमिका है, यहां आगे आने वाले किस्से के लिए। लेकिन उस किस्से के पहले कुछ और बातें। खस की टट्टी, सुन कर लगता कि पानी डालने पर कैसी ठंडी-भीनी सुगंध आती है पर नाम टट्टी? तो याद किया कि टाट, टट्टा या टटरा जैसे शब्द भी प्रचलित हैं, जिनका आशय परदा, ओट है। बांस की खपच्चियों या अरहर के सूखे पौधों से बनी, कामचलाऊ दीवार, आड़ की तरह खड़ा कर दिया जाय या पटसन से बना मोटे कपड़े का बिछावन या डोरी से बुनी बिछाने वाली चटाई, परदे के लिए ऐसे मिलते-जुलते शब्द प्रयोग में आते हैं। तो फिर यह यानि टट्टी क्योंकर पाखाना का पर्याय हो गया। यह भी पता लगता है कि इस शब्द का एक पर्याय पाखाना/मल-त्याग, भाषा-बोली का अंतर लांघते पूरे देश में एक ही है।

अब किस्सा। हमारे एक परिचित ने बताया कि कभी रेल यात्रा में इलाहाबाद से गुजरते हुए उनकी जानकारी में अनूठा इजाफा हुआ था। इतिहास अपने को दुहरा रहा था, लेकिन इस बार कोई अफरा-तफरी नहीं थी। गाड़ी, किनारे वाले प्लेटफार्म पर खड़ी हुई और इस तरह रुकी रह गई थी, मानों यही उसका ठिकाना हो। सब कुछ ठहरा-ठहरा सा था। सहयात्री, हुलिये में ऐसा कुछ कि अपनी अधेड़ उम्र से बहुत आगे निकल चुके जान पड़ते थे, समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, की तरह शुरू हुए, बताने लगे- पुराने जमाने में कुंभ के दौरान देश भर से जुटने वाले विशाल जन समुदाय के अनुरूप व्यवस्थाएं नहीं होती थीं, फिर भी भगवान भरोसे सब निपट ही जाता था। सन 1906 में हैजा का प्रकोप हुआ। बतकही कि हैजा के लिए कहा जाता था ‘है-जा‘, यानि जिसे यह रोग हुआ है, उसे तो बस जाना है, इसके लिए छत्तीसगढ़ी शब्द है, तलाव-उछाल यानि टट्टी-उल्टी।

इसके बाद 1918 में अंगरेज सरकार ने मेले की सारी व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। सरकार ने पुरानी जानकारियों के आधार पर पाया कि मेले में सफाई-व्यवस्था का आलम बहुत बुरा होता है। खासकर मल-त्याग की कोई व्यवस्था न होने के कारण गंदगी और बीमारियां फैलती हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बड़ी संख्या में अस्थायी शौचालयों की व्यवस्था कराई। इसके लिए चार बांस गाड़ कर उसे टट्टी से घेर कर, परदा कर दिया जाता था और उसकी नियमित साफ-सफाई होती रहे, इसका ध्यान रखा जाता था। तो होता यह था कि व्यक्ति मल-त्याग के लिए कहता कि वह टट्टी में जा रहा है, या टट्टी जा रहा है। कुंभ मेले में पूरे देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। बस फिर क्या था, इस तरह कुंभ-1918 के बाद से टट्टी, इस अर्थ में एक साथ पूरे देश की जबान पर आ गया। इसी के साथ एक अन्य शब्द भी जुड़ा, लेकिन उसने अलग अर्थ पा लिया, वह शब्द था- ‘बमपुलिस या बंपुलिस‘ (बैम्बू पोल्स) यानि बांस के बड़े डंडे से बना सार्वजनिक शौचालय। यह सफाई कामगार, जिसके हाथ में बांस के डंडे वाला झाड़ू होता है, के अर्थ में भी प्रयोग होने लगा। बैठै-ठाले विचार के लिए, दूर की कौड़ी सही, लेकिन ‘ब्रह्मपुरीष‘ भी बमपुलिस के पास बैठता है, ब्रह्म-मुहूर्त या प्रातःकाल मल-विसर्जन।

यों तो किस्से को भी मौलिक कहना मुश्किल है फिर गूगल, विकीपीडिया के दौर में कुछ 'मौलिक' जानकारी वाली बात कहने की सोचना उसी के लिए संभव है, जो इन सबसे मुक्त है। इसलिए अब कोई सुना-गुना किस्सा भी मन में उपजे और अपनी जबान में कहना हो तो, कुछ कहने के पहले गूगल टटोल लेना होता है, कि काश! वहां न हो, तब मंगलाचरण किया जाए। जिज्ञासा हुई कि क्या ऐसा कुछ गूगल बता पा रहा है। वहां ऐसा कुछ न मिला, इसलिए किसी से किसी का सुनाया-सुना यह किस्सा। मगर फिर तलाशने लगा कि क्या 1918 के पहले टट्टी इस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता था। इसके लिए पुराने शब्दकोश देखने पर पता लगा कि-

सन 1884 में प्रकाशित जान टी प्लेट्स की डिक्शनरी में टट्टी के अन्य अर्थों के अलावा एक अर्थ, लैट्रिन, सामान्यतः बांस खपच्ची की चटाई से आड़ कर बनाया हो, दिया गया है। सन 1895 में बनारस से ई.जे. लजारस एंड कंपनी द्वारा प्रकाशित 'स्टूडेन्ट्स हिंदी-इंग्लिश डिक्शनरी' में टट्टी का अर्थ स्क्रीन, नेसेसरी, दिया है, वहां पाखाना या इसका समानार्थी कोई शब्द नहीं है। नागरीप्रचारिणी सभा के सन 1929 में प्रकाशित हिंदी शब्दसागर के परिवर्धित, संशोधित, सन 1995 के नवीन संस्करण में टट्टी का अर्थ 1. बांस की फट्टियों, सरकंडों आदि को परस्पर जोड़कर बनाया हुआ ढांचा... के पश्चात् टट्टी शब्द वाले मुहावरे दिए गए हैं। इस सब के बाद बहुत दूर जा कर, देर से अर्थ आते हैं- 2. चिक। चिलमन। 3. पतली दीवार जो परदे के लिये खड़ी की जाती है। के बाद 4. पाखाना तथा 5 व 6 भी तख्ता, फट्टी, छाजन आदि से संबंधित है। नागरीप्रचारिणी सभा के संवत 2008 में प्रकाशित संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर में भी इसी तरह विभिन्न अर्थों के साथ एक अर्थ पाखाना भी आया है।

सन 1950 में प्रकाशित डेढ़ लाख शब्द संख्या वाले ‘नालन्दा विशाल शब्द सागर‘ में टट्टी का पर्याय बांस की फट्टियों का पल्ला, परदा, चिक, छाजन, आड़ जैसे समानार्थी शब्दों के बीच, (मानों ओट लिए हुए) एक अर्थ पाखाना भी है। इसी तरह इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग से सन 1952 में प्रकाशित हिन्दी राष्ट्रभाषा कोश में चिक, चिलमन आदि समानार्थी के साथ बीच में (यहां भी मानों आड़ में) पाखाना आया है। ज्ञानमण्डल लिमिटेड, बनारस के 1952-53 में प्रकाशित ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में टट्टी का अर्थ इस प्रकार दिया गया है- छोटा टट्टर या पल्ला; पतला शीशा; ओट, परदा; पल्लेकी दीवार; अंगूर चढ़ानेके काम आनेवाली बांसकी फट्टियोंकी दीवार; शिकार खेलनेकी आड़; पाखाना; बारातमें निकाली जानेवाली फुलवारीका तख्ता।

कुछ अन्य स्थानों पर, यथा- 2009 में प्रकाशित प्रो. वी.रा. जगन्नाथन के जनेपा ‘छात्रकोश‘ में टट्टी जाना का अर्थ टट्टी की आड़ में मलत्याग करना दिया है, साथ ही नोट है कि- ‘अब टट्टी जाना ग्राम्य/अशिष्ट प्रयोग है, पाख़ाना ज्यादा शिष्ट प्रयोग है। 2010 में प्रकाशित प्रभात ‘बृहत् हिन्दी शब्दकोश‘ में पर्दा या बाड़ अर्थ वाले इस शब्द का प्राकृत मूल टट्टइआ, तट्टी या संस्कृत तटिका दिया गया है और अन्य अर्थों के साथ ‘शौच करने के लिए लगाया गया पर्दा (या की गई आड़) अथवा दीवारों से घिरा शौच-स्थान। शौचालय।‘ बताया गया है। 2011 में प्रकाशित ‘हिंदी पर्यायवाची कोश‘ में अन्य अर्थों के साथ गुह, गूँ, गू, गोबर, छी-छी (बच्चों के लिए), पाखाना, पुरीष, मल; ट्वाॅयलेट, जनसुविधा, पाखाना, बाथरूम, शौचालय, संडास अर्थ दिया गया है।

इससे कुछ और पीछे जाने पर संदर्भ मिला कि वैष्णव कृष्ण भक्ति के 16 वीं सदी के द्वैताद्वैतवादी संत स्वामी हरिदास थे, जिन्हें बैजू बावरा और तानसेन का गुरू माना जाता है। उनके द्वारा टट्टी संप्रदाय स्थापित किया गया था, यह संभवतः संतों-भक्तों द्वारा मोटा-झोंटा टाट वस्त्र धारण करने के कारण लोगों का दिया हुआ नाम था और समय के साथ टट्टी शब्द का ‘पाखाना‘ अर्थ प्रचलन में आ जाने के कारण इस संप्रदाय का नाम ‘सखी संप्रदाय‘ हो गया होगा।

इस तरह अनुमान होता है कि टट्टी शब्द का एक अर्थ प्रयाग कुंभ 1918 के पहले भी यदा-कदा ‘पाखाना‘ होता रहा है किंतु व्यापक प्रचलन में संभवतः किस्सागो मित्र की स्थापना के अनुरूप उसके बाद ही आया। यह भी स्पष्ट हुआ कि टट्टी ने पाखाना अर्थ ओट में जाने, किए जाने के कारण पाया। फिर भी यह नहीं पता लग सका कि इस अर्थ में पहली बार कहां और किस तरह, किसने प्रयोग किया। हां, 1988 में प्रकाशित भोलानाथ तिवारी और रिसाल सिंह द्वारा 11वीं से 16वीं सदी तक के आधार-साहित्य वाले ‘आदिकालीन हिन्दी शब्दकोश‘ में यह शब्द नहीं है।

इस किस्से की तरह यह शब्द और क्रिया ‘दस्त, पेश-आब‘ और 'चने के खेत में...' जैसी शायरी करने वाले 19वीं सदी के लखनवी शायर शेख बाकर अली ‘चिरकिन‘ का सहारा बना था। बहरहाल, इस्तेमाल के साथ शब्द, शायद इसी तरह नये-पुराने अर्थ ग्रहण करते रहते हैंं, प्रचलन में आते-जाते रहते हैं। जैसे यह शब्द टट्टी, जिसके लिए नंबर दो, मल-त्याग, दिशा-मैदान, तालाब, संडास, बाहर, हाजत-फरागत, जो अब लैट्रिन, पाखाना, बाथरूम, टायलेट होते हुए पाॅटी तक आ गई है, कारण साफ है कि अन्य अनेकों शब्दों की तरह, विशेषकर इस तरह की संज्ञा-क्रिया, नेचरकाॅल, नित्य-कर्म के लिए सभ्य जबान नये-नये शब्दों और शब्दों के अलग आशय-अभिप्राय विकसित-ग्रहण करती रहती है।

पुनश्च-
जानदार तो वही किस्सा, जो फले-फूले और जिसकी जड़ भी निकल आए। तो जिस तरह हाथी भगदड़ घटना के कई कथा-रूप बने, इस किस्से में एक और हिस्सा जोड़ा, हमलोगों के गंवई गूगल बबा, रिश्ते में मेरे पितामह, अकलतरावासी रवीन्द्र सिसौदिया यानि रवि बबा ने। वह इस तरह। बात उन्नीस सौ बासठ-पैंसठ की है। एक थे पंडित माधव प्रसाद चतुर्वेदी। किस्सा नहीं हकीकत। रायपुर के पुराने से पुराने कालेज, छत्तीसगढ़ महाविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया। दर्शन शास्त्र और अंगरेजी के जैसे तेज विद्यार्थी, इन परचों में वैसे ही बहुत अच्छे अंक भी आए। प्राचार्य जे. योगानंदम का आशीर्वाद मिला और आगे की पढ़ाई के लिए सागर जाने का परवाना, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के लिए। चतुर्वेदी जी अंगरेजी छोड़ हिंदी शरणागत हुए। चतुर्वेदी जी, सर से भैयाजी फिर अंतिम दिनों में बाबाजी बने, अविवाहित रहे, उनका उत्तरार्द्ध खरौद-शिवरीनारायण में बीता। भैयाजी द्वारा सिसौदिया जी को सुनाया किस्सा, जो सिसौदिया जी से मैंने सुना, वह कुछ ऐसा ही था, जिसे भैयाजी ने आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और रामविलास शर्मा की बातचीत में सुना था।

इस तरह किस्से पर अब कइयों, बड़े-बड़ों की मुहर भी लग गई। रवि बबा ने यह भी बताया कि ब्रह्मपुरीष, दूर की कौड़ी नहीं, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसका प्रयोग किया है, कब, कहा?, इसका जवाब फिर कभी, फिर कहीं।

Tuesday, September 29, 2020

राजस्थानी

राजस्थानी लोक-गद्य, बिज्जी-विजयदान देथा, साहित्य अकादेमी होते हुए ‘गवाड़‘ तक।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार, संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं और अंग्रेजी के अलावा राजस्थानी में दिया जाता है। अंग्रेजी के लिए कारण साफ है, इसमें कई अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में कहीं अधिक स्तरीय साहित्य प्रतिवर्ष रचा जाता है। किंतु राजस्थानी क्यों? के जवाब में यही सूझा कि कारण कोई भी रहा हो, एक प्रमुख कारक देथा का कथा-संसार ‘बातां री फुलवारी‘ अवश्य रहा होगा, जिसे 1974 में पहला राजस्थानी, साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया था।

पिछले दिनों पुस्तक हाथ में आई ‘गवाड़‘। साहित्य अकादेमी द्वारा सन 2015 के लिए पुरस्कृत राजस्थानी ‘उपन्यास‘। मधु आचार्य ‘आशावादी‘ की कृति का नीरज दइया द्वारा हिंदी में अनुवाद साहित्य अकादेमी से 2018 में प्रकाशित हुआ है। यह 42 शीर्षकों में बंटी 88 पेजी, चौबीस-पचीस हजार शब्दों वाली पुस्तक है।
 
गवाड़, यानि मुहल्ला, पुस्तक में पात्र की तरह है। ऐसा पात्र जिसे बोलचाल में ‘चार लोग‘ क्या कहेंगे या ‘समाज‘ क्या सोचेगा, कहा जाता है। पुस्तक के आरंभिक शीर्षकों में कोई नामजद पात्र नहीं है, ‘घर‘ में बिना नाम लिए शुनःशेप की कथा है। ‘पहचान लें!‘ का आरंभिक वाक्य है- ‘‘गवाड़ में ‘वह‘ रहता है। उसे नाम से कोई नहीं पुकारता था।‘‘ बाद के शीर्षकों के अंतर्गत नाम वाले पात्र रऊफ साहब, भूरा, रामली, भूरिया-भूराराम, जीवणिये, सनिये, हरिया, भोलिये, सुखिया, मगन, लक्की कुमार तक आते हैं।

बीच में शीर्षक ‘डर‘ जैसा व्यतिक्रम है, जहां गवाड़ बस नाम को है फिर ‘लेखक‘ शीर्षक के साथ अंतिम पांच में गवाड़ सिर्फ ‘विकलांगता‘ में ही और नाममात्र को आता है। तब लगता है कि कृति को वांछित ‘उपन्यास‘ आकार में लाने की निर्देश-पूर्ति किसी अनाड़ी द्वारा की गई हो, और उसने बेमन से काम पूरा कर दिया हो। पूरा लेखन अपने विवरण में आस्था-अनास्था के द्वंद्व से मुक्त तटस्थ, किंतु शुभाकांक्षी है। पढ़ते हुए लगता है किसी अखबार के लिए साफ्ट स्टोरी निकालनी हो, जिसमें पत्रकारिता वाले व्यंग-फतवा शैली की छौंक हो, का पालन किया गया है या रिपोर्टर को संपादकीय लिखनी हो और वह अखबार के आमोखास पाठक का ध्यान रखते हुए ज्यों खुलासा करता चले- ‘इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि ...‘। अनुवाद में राजस्थानी छांह रह गई है, इतनी कि इसे आंचलिकता के साथ न्याय कह सकते हैं या चाहें तो अनुवाद (कुछ स्थानों पर प्रूफ) की कमजोरी कह लें।

यह तो हुआ इस कृति का परिचय। इस पर मेरी टिप्पणी यह भी- पहली कि, जिस तरह संख्याओं के साथ यहां पुस्तक के बारे में बात शुरू की गई है, इस तरह किसी कृति का माप-तोल उचित न मानने के बावजूद भी इस ‘उपन्यास‘ के लिए यही उपयुक्त लगा।
दूसरी कि इस टीप को रचना के मूल्यांकन के बजाय साहित्य अकादेमी, दैनिक भास्कर, राजस्थानी साहित्य, मेरे लिए अब तक अनजान एक स्थापित लेखक और अनुवादक पर आक्षेप न माना जाय, क्योंकि इन किसी से मेरा कोई राग-द्वेष कतई नहीं है।
तीसरी कि क्या मेरे मन में विजयदान देथा और विवेकी राय बसे हुए हैं?
चौथी बात, कहने को तो और भी कुछ-कुछ है, लेकिन छोटी सी किताब पर और कितना कहा जाय, ‘बाबू ले बहुरिया गरू‘ होने लगेगा, इसलिए
अंतिम बात कि बतौर पाठक यह समझना मुश्किल है, और गवाड़ी अंदाज में ही पूछा जा सकता है, कि यह उपन्यास क्यों माना गया? और इसे यानि ‘गवाड़‘ को साहित्य अकादेमी पुरस्कार क्यों? राजस्थानी में 2015 में पुरस्कार लायक इससे बेहतर कुछ नहीं रचा गया, और प्रतिवर्ष पुरस्कार दिया जाना आवश्यक है?

हासिल, निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ‪मुझे साहित्य, उपन्यास की अपनी समझ को दुरुस्त करने की जरूरत है। साथ ही भाषा सम्मान, जो पुरस्कार को गैर-मान्यता प्राप्त भाषाओं में साहित्यिक रचनात्मकता के साथ ही शैक्षिक अनुसंधान को स्वीकार और बढ़ावा देने के लिए स्थापित है, और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए अब तक एकमात्र मंगत रवीन्द्र को सन 2003 में दिया गया था, इस पर जिज्ञासा कि क्या मंगत जी की किसी रचना का प्रकाशन साहित्य अकादमी ने किया है।

Monday, September 21, 2020

गांधीजी की तलाश

सदी बीत गई, सन् 1920, जब गांधीजी आए थे। इस साल 2 अक्टूबर के आगे-पीछे, गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रथम प्रवास के बताए जाने वाले माह, सितंबर-दिसंबर के बीच भटकते मन ने सत्य के प्रयोग करना चाहा, यहां उसका लेखा-जोखा है। विभिन्न स्रोतों से यहां एकत्र की गई जानकारियों का उद्देश्य यह कि गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास की तथ्यात्मक, असंदिग्ध जानकारी स्पष्ट हो सके, ताकि ‘सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय‘ तथा ऐसे अन्य प्रामाणिक स्रोतों में जहां यह सूचना दर्ज नहीं है, प्रविष्टि के लिए ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सके।

‘‘श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ‘‘ का प्रकाशन उनकी 79 वीं जन्म-तिथि पर अगस्त 1955 में हुआ था। सन 1920 में गांधीजी के रायपुर आने का संभवतः पहले-पहल उल्लेख यहीं हुआ है। इस ग्रंथ के जीवनी खंड में श्री रविशंकर शुक्ल के ‘मेरे कुछ संस्मरण‘ शीर्षक लेख में पेज 44 पर उल्लेख आया है कि ‘‘सन् 1920 की कलकत्ता की विशेष कांग्रेस से पूर्व महात्मा गांधी रायपुर आये थे।‘‘ इस पंक्ति के अलावा गांधीजी के रायपुर आगमन-प्रवास का कोई विवरण यहां नहीं दिया गया है। इसके पश्चात् ‘‘सन् 1920 में दिसम्बर मास में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ‘‘, उल्लेख आता है। आगे उनकी 1933 की यात्रा का विवरण पर्याप्त विस्तार से है। ध्यातव्य है कि सन 1920 में कलकत्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का विशेष अधिवेशन, गांधीजी की उपस्थिति में 4 से 9 सितंबर तक हुआ था, जिसमें असहयोग, हंटर कमेटी की रिपोर्ट तथा पंजाब में हुए अत्याचारों के संबंध में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के रुख पर प्रस्ताव पारित किये गये।

‘मध्यप्रदेश संदेश‘ के 30 जनवरी 1988 अंक में सितम्बर, 1920 की 20 एवं 21 तारीख को गांधीजी की छत्तीसगढ़ यात्रा, जिसमें रायपुर, धमतरी और जाने तथा यात्रा का कारण कंडेल नहर आंदोलन, उल्लेख आया है। इसी अंक में अन्य स्थान पर धमतरी से कुरुद और कन्डेल ग्राम जाने का भी लेख है। पुनः इस अंक में श्यामसुन्दर सुल्लेरे के लेख का उद्धरण है- ‘‘21 दिसंबर, 1920 को गांधी जी रायपुर से धमतरी होते हुए कुंडेल गांव भी गए और सत्याग्रहियों से मिलकर उनके साहस की सराहना की।

अक्टूबर 1969 में मध्यप्रदेश गांधी शताब्दी समारोह समिति के लिए सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय द्वारा ‘मध्यप्रदेश और गांधीजी‘ पुस्तक प्रकाशित की गई। प्रस्तावना में बताया गया है कि पुस्तक की सामग्री का संकलन, लेखन, सम्पादन तथा मुद्रण का कार्य श्री श्यामसुन्दर शर्मा ने किया है। पुस्तक के आरंभ में ‘‘दस ऐतिहासिक यात्राएँ‘‘ शीर्षक लेख है, जिसमें बताया गया है कि ‘‘सन् 1920 में रायपुर तथा धमतरी की यात्रा में भी मौलाना शौकतअली गांधीजी के साथ थे।‘‘ तथा ‘‘गांधीजी की रायपुर तथा धमतरी की प्रथम यात्रा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण कही जा सकती है कि धमतरी की जनता ने सत्याग्रह-युग के विधिवत् उद्घाटन के पहले ही असहयोग तथा बहिष्कार के मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त की थी। सन् 1920 में जब गांधीजी धमतरी गए तब तक वहां कण्डेल नहर सत्याग्रह द्वारा जनता विदेशी शासन से लोहा ले चुकी थी और उसे सफलता भी मिल चुकी थी।‘‘ यहां तिथि अथवा माह का उल्लेख नहीं है।

पुस्तक में ‘‘दूसरी यात्रा-1920 रायपुर तथा धमतरी में‘‘ लेख की उल्लेखनीय प्रासंगिक जानकारियां इस प्रकार है कि सितंबर 1920 कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन, इन दो ऐतिहासिक अधिवेशनों के बीच (पं. रविशंकर शुक्ल के संस्मरण में दी गई जानकारी से यह अलग है।) रायपुर नामक स्थान को इस बात का गौरव प्राप्त है कि उसने गांधीजी का स्वागत किया औैर उनके राजनीतिक विचारों का श्रवण तथा मनन किया। ... ... ... जुलाई के महीने में धमतरी के निकट कंडैल नामक गांव में नहर-सत्याग्रह आरंभ हो गया। गांधीजी की रायपुर की यह यात्रा इसी सत्याग्रह की पृष्ठभूमि में हुई थी। कंडैल नहर-सत्याग्रह के प्रमुख संचालक, पं. सुन्दरलाल शर्मा को गांधीजी से परामर्श के लिए कलकत्ता भेजा गया। किन्तु कलकत्ता में उन की गांधी से भेंट न हो सकी और दक्षिण भारत के किसी स्थान पर ही यह भेंट हुई। श्री शर्मा ने उन्हें कण्डैल नहर-सत्याग्रह का परिचय दिया तथा उनसे धमतरी आने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे पं. सुन्दरलाल शर्मा के साथ 20 अथवा 21 दिसम्बर 1920 को कलकत्ता से रायपुर पधारे। उनके साथ अली-बन्धुओं में मौलाना शौकत अली भी थे। ... ... ...

आज जो गांधी चौक है, उस स्थान पर एक विशाल सार्वजनिक सभा में उनका भाषण हुआ। इस समय गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। ... ... ... रायपुर से गांधी जी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये। ... ... ... धमतरी पहुंचने पर गांधीजी का बड़े उत्साह से स्वागत हुआ। कंडैल सत्याग्रह अब तक समाप्त हो चुका था ... ... ... उनके भाषण का प्रबंध जामू हुसैन के बाड़े में किया गया था ... ... ... श्री उमर सिंह नामक एक कच्छी व्यापारी ने उन्हें कंधे पर बिठाया और मंच तक ले गया ... ... ... श्री बाजीराव कृदत्त ने नगर तथा ग्राम-निवासियों की ओर से गांधीजी को 501 रु. की थैली भेंट की। लगभग 15000 लोगों की उपस्थिति में गांधीजी और मौलाना शौकत अली के भाषण हुए। गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग और सत्याग्रह की बात लोगों को समझाई। श्री शौकतअली ने अपने भाषण में सदा की तरह मजाकिया अंदाज में कहा- मैं तो हाथी जैसा हूं और गांधीजी बकरी जैसे हैं ... ... ...

धमतरी से गांधीजी कंडैल ग्राम भी गये। इस अवसर पर वे कुरुद गांव भी गये ... ... ... धमतरी में गांधीजी के ठहरने की व्यवस्था श्री नारायणराव मेघावाले के निवास-स्थान पर की गई थी जहां उन्होंने रात्रि विश्राम किया। प्रातःकाल वे पुनः रायपुर के लिये रवाना हो गये। ... ... ... धमतरी से लौटने के बाद गांधीजी ने रायपुर में महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया ... ... ... अनुमानतः दो हजार रुपयों के मूल्य के सोने चांदी के गहने और रुपये एकत्रित हो गये। ... ... ... इस सभा के पश्चात् बापू नागपुर की ऐतिहासिक-कांग्रेस के लिए रवाना हो गये।

सन 1970 में ‘‘छत्तीसगढ़ में गाँधीजी‘‘ का प्रकाशन, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से गांधी शताब्दी समारोह समिति द्वारा डॉ. ठा. भा. नायक के सम्पादकत्व में हुआ। इस पुस्तक में श्री हरि ठाकुर ने अपने लेख में लिखा है कि ‘‘देश को गांधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का मार्ग सुझाया। ... ... ... कन्डेल नामक ग्राम में नहर सत्याग्रह आरम्भ हुआ। इस सत्याग्रह के सूत्रधार थे पं. सुन्दरलाल शर्मा ... ... ... अन्त में इस सत्याग्रह के नेताओं ने गांधीजी से पत्र-व्यवहार किया। और गांधीजी ने इस सत्याग्रह का मार्गदर्शन करना स्वीकार किया। गांधीजी उस समय बंगाल का दौरा कर रहे थे। उन्हें बुलाने के लिये पं. सुन्दरलाल शर्मा गये। 20 दिसम्बर सन् 1920 को महात्मा गांधी का प्रथम बार रायपुर आगमन हुआ। उसी दिन उन्होंने गांधी चौक में अपार जनसमूह को संबोधित किया। रायपुर से गांधीजी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये।... ... ... गांधीजी के आगमन के साथ ही कंडेल सत्याग्रह स्थगित हो गया। ... ... ... इसलिये गांधीजी धमतरी से ही वापस लौट आये। धमतरी और कुरुद से वापस लौटने पर गांधीजी पुनः राययपुर में रुके और उन्होंने महिलाओं की एक विशाल सभा को संम्बोधित किया। महिलाओं से गांधीजी ने ‘तिलक स्वराज्य‘ फण्ड के लिए मांग की और उन्हें तुरन्त दो हजार रु. के मूल्य के गहने प्राप्त हुए।

इस पुस्तक में केयूर भूषण मिश्र ने अपने लेख में मात्र उल्लेख किया है कि ‘‘कन्डेल सत्याग्रह सन् 1917 में प्रारंभ हुआ और 1920 में इस सत्याग्रह ने सफलता प्राप्त की।‘‘ किंतु यहां सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं है। डॉ. शोभाराम देवांगन के लेख में ‘‘इस सत्याग्रह को व्यापक तथा सर्वदेशीय रूप प्रदान करने हेतु यहां से पं. सुन्दरलालजी शर्मा राजिम वाले को 2 दिसम्बर सन् 1920 ईं को महात्मा गांधीजी के पास कलकत्ता इस परिस्थिति का ज्ञान कराने तथा उन्हें धमतरी लाकर आशीर्वाद प्राप्त करने के अतिरिक्त इस सत्याग्रह का संचालन सूत्र उनके हाथ में देने की अपेक्षा कर रवाना किया गया।’’ ... ... ... इस तरह यह नहर सत्याग्रह, महात्मा गांधी के धमतरी आगमन के पूर्व ही पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।‘‘ यहां भी सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं है।

हरिप्रसाद अवधिया ने लिखा है कि ‘‘अपने आन्दोलन के सर्व प्रथम चरण में ही सन् 1920 में मौलाना शौकत अली को साथ लिये गांधीजी का रायपुर में आगमन हुआ। इस पुस्तक में डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र और घनश्याम सिंह गुप्त के संस्मरणों में सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ के प्रवास की चर्चा नहीं है।

अब्बास भाई का संस्मरण है कि सन् 1921 में महात्माजी और मौलाना शौकत अली का रायपुर में आगमन हुआ। उन्हें धमतरी जाना था परन्तु शासन और पुलिस के आतंक के कारण मोटर मिलना दुष्कर था। पं. शुक्लजी के आह्वान पर मैं महात्माजी, मौलाना शौकत अली और उनकी पार्टी को अपनी मोटर बस में ले जाने के लिए तैयार हुआ। समय पर पुलिस वालों ने मेरे मोटर ड्राइवर को वहीं रोक लिया। ... ... ... मैं महात्माजी और मौलाना सहित पं. शुक्लजी और दूसरे नेतागण को रायपुर ब्राह्मणपारा में जो लाइब्रेरी है, वहां सं बैठाकर धमतरी ले गया। ... ... ... रायपुर मोटर बस सर्विस, रायपुर के नामसे सर्विस चलती थी तथा प्रोप्रायटर वली भाई एण्ड ब्रदर्स। ... ... ... डिप्टी कमिश्नर श्री सी. ए. क्लार्क ने हमारी कंपनी का मोटर चलाने का लाइसेंस भी रद्द कर दिया।

प्रभूलाल काबरा ने लिखा है कि- राजनांदगांव में गांधीजी मौ. मोहम्मद अली, शौकत अली, जमनालाल बजाज, के साथ जब कलकत्ता जा रहे थे ... ... ... जिस समय वे कलकत्ता के खास अधिवेशन में जा रहे थे उसी ट्रेन में लोकमान्य तिलक, दादा साहब खापर्डे, डा. मुंजे भी प्रथम दर्जे के डब्बे में यात्रा कर रहे थे ... ... ... आखिर गांधीजी ने दरवाजा खोला। इसके पश्चात्, जब गांधीजी रायपुर आयेः- में बताया है कि ‘‘ज्योंही गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी, श्री शुक्ल आदि नेतागण ... ... ... इस विवरण के साथ सन् नहीं दिया गया है, लेकिन अनुमान होता है कि यह सन् 1933 का विवरण है। कन्हैया लाल वर्मा का संस्मरण भी बिना सन् के उल्लेख के है। अद्वैतगिरी जी ने लिखा है कि सन् 1920 में गांधीजी रायपुर आये। स्वर्गीय श्री सुन्दरलालजी शर्मा के भांजे कन्हैयालाल जी अध्यापक के निवासगृह में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई। संध्याकाल उन्होंने एक आमसभा को संबोधित किया। भाषण के मुख्य विषय देश की स्वतंत्रता, एकता और सत्याग्रह थे।

महंत लक्ष्मीनारायण दास जी ने लिखा है कि सन् 1921 की घटना है, जब महात्मा गांधी पहली बार रायपुर आये और उन्होंने जैतूसाव मठ को अपनी अविस्मरणीय भेंट दी। ... ... ... महात्मा गांधी के साथ उनके दो अनन्य मित्र और अनुयायी स्वर्गीय शौकत अली और स्वर्गीय मोहम्मद अली भी साथ थे।

डा. शोभाराम देवांगन ने लिखा है कि पं. सुन्दरलालजी शर्मा, राजिम वाले, महात्मा गांधी को धमतरी लाने के लिये 2 दिसम्बर, सन् 1920 को कलकत्ता गये थे किन्तु वहां उनसे भेंट न हो सकी। ... ... ... अंत में उनसे दक्षिण भारत के एक नगर में जहां महात्माजी का कार्यक्रम अधिक दिनों के निश्चित था, वहां भेंट होना संभव हुआ। वे गांधीजीको धमतरी तहसील के कंडेल गांव के नहर सत्याग्रह का पूर्ण परिचय कराकर धमतरी में लाने में सफल हुए। 21 दिसंबर, 1920 ई. को ठीक 11 बजे महात्मा गांधी मौलाना शौकत अली के साथ, रायपुर होते हुए यहां पधारे। ... ... ... महात्मा गांधीजी के भाषण का प्रबन्ध यहां के एक प्रसिद्ध सेठ हुसेन के वृहत बाड़े में निश्चित हुआ था ... ... ... गुरुर निवासी श्री उमर सेठ नामक, एक कच्छी व्यापारी झट महात्माजी को उठाकर और अपने कंधों पर बिठाकर ... ... ... मालगुजार श्रीमन बाजीराव कृदत्त महोदय के हाथ से 501/ रुपये की थैली भेंट कर उनका हार्दिक स्वागत किया गया। लेख में बताया गया है कि लगभग 1 घंटे का भाषण हुआ इसके पश्चात् लगभग साढ़े बारह बजे सभा का कार्य समाप्त हुआ। श्री नत्थूजी जगताप के भवन पर फलाहार और लगभग दो बजे दिन को यहां से रायपुर के लिए प्रस्थान किए। इस तरह तीन चार घंटे के लिये यह नगर महात्माजी के आगमन पर आनंद विभोर में मग्न रहा।

श्रीमती प्रकाशवती मिश्र ने लिखा है कि महात्माजी के दर्शन 1920 के दिसम्बर माह में हुए जब रायपुर में उनका आगमन हुआ। कलकत्ते में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। लाला लाजपतराय अध्यक्ष थे। उसके पश्चात अखिल भारतवर्षीय दौरे पर कांग्रेस का असहयोग आन्दोलन के प्रचारार्थ महात्माजी रायपुर पधारे। महात्माजी उस समय ठक्कर बैरिस्टर के बंगले में ठहरे थे। ... ... ... महात्माजी रायपुर के दौरे के समय कुरुद व धमतरी भी गये थे।

सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास के संबंध में 1973 में प्रकाशित रायपुर जिला गजेटियर में जानकारी दी गई है कि महात्मा गांधी, कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के ठीक पहले 20 दिसंबर 1920 को अली बंधुओं के साथ तिलक कोष और स्वराज्य कोष के सिलसिले में रायपुर आए। गांधी जी धमतरी तथा कुरुद भी गए। गजेटियर में कंडेल नहर सत्याग्रह की घटना का विवरण गांधीजी के साथ नहीं, बल्कि पृथक से हुआ है। उल्लेखनीय है कि उक्त जानकारी के मूल स्रोत-संदर्भ का हवाला भी यहां नहीं दिया गया है। इस दौर के अन्य स्रोतों से भी इसी से मिलती-जुलती जानकारी सामने आती है, इसलिए उनका उल्लेख यहां नहीं किया जा रहा है।

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 18, जुलाई 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसके पेज 229-230 पर, जुलाई से नवंबर 1920, ‘हमारी दैनन्दिनी‘ शीर्षक के अंतर्गत 10 अगस्त से 26 अगस्त तक का विवरण देते हुए लिखा है कि ‘‘हम लगातार 24 घंटे मद्रासके अतिरिक्त और किसी स्थानपर न रह सके और मद्रास भी इसी कारण रह पाए क्योंकि हम पहले-पहल वहीं गये थे। बादमें तो केन्द्रस्थान होनेके कारण हम आते-जाते दो-चार घंटे वहाँ रुकते। सेलमसे बंगलौर की 125 मीलकी यात्रा हमें मोटरमें तय करनी पड़ी थी। इस रफ्तार से यात्रा करना हमारे लिए कुछ अधिक हो जाता था; लेकिन निमन्त्रण बहुत जगहोंसे मिले थे। इनकार करना उचित नहीं लगता था और फिर यह लोभ भी था कि हम जितनी दूरतक अपना सन्देश पहुँचा सकें उतना ही अच्छा है।‘‘ इस दौरे में बम्बई और अहमदाबाद होते गांधीजी 3 सितंबर 1920 की रात में कलकत्ता पहुंचे थे। इसके पश्चात् 10 सितंबर तक कलकत्ता में, 17 सितंबर तक बंगाल में और 20 सितंबर को साबरमती आश्रम में होने की स्पष्ट जानकारी मिलती है। इस प्रकार कलकत्ता विशेष अधिवेशन के पूर्व गांधीजी के रायपुर आगमन की संभावना नहीं जान पड़ती।

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 19, नवंबर 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसमें नवंबर 1920 से अप्रैल 1921 में पेज 133 पर 16 दिसंबर 1920, गुरुवार को ढाका से कलकत्ता जाते हुए मगनलाल गांधी को लिखे पत्र की जानकारी है। पेज 143 पर 18 दिसंबर को नागपुर की सार्वजनिक सभा में भाषण की जानकारी है। पेज 151 पर 25 दिसंबर को नागपुर की बुनकर परिषद् में भाषण तथा पेज 152 पर नागपुर के अन्त्यज सम्मेलन में भाषण। पेज 161 पर 26 दिसंबर को नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन के उद्घाटन दिवस पर, गांधीजी द्वारा में भाषण, श्री विजयराघवाचार्य को कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया था।


सी. बी. दलाल की अंगरेजी पुस्तक ‘गांधीः 1915-1948‘ ए डिटेल्ड क्रोनोलाजी, गांधी पीस फाउंडेशन नई दिल्ली ने भारतीय विद्या भवन बम्बई के साथ मिलकर सन 1971 में प्रकाशित किया है। पुस्तक के पेज 35 पर माह दिसंबर, सन 1920 के गांधीजी के दैनंदिन का उल्लेख है, जिसके अनुसार गांधीजी ने 17 दिसंबर 1920 को कलकत्ता छोड़ा और 18 दिसंबर 1920 को नागपुर की आमसभा में रहे। इसके पश्चात दिनांक 19 से 23 तक नागपुर में तथा पुनः 31 दिसंबर तक नागपुर के विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए। एक अन्य अंगरेजी पुस्तक के. पी गोस्वामी की ‘‘महात्मा गांधी ए क्रोनोलाजी‘‘ मार्च 1971 में पब्लिकेशन डिवीजन से प्रकाशित हुई है। इसमें भी गांधीजी के प्रवास की तिथियां दलाल की पुस्तक की तुलना में संक्षिप्त, किंतु पुष्टि करने वाली हैं।


पं. सुंदरलाल शर्मा द्वारा सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ आने के संबंध में कोई उल्लेख न किया जाना संयोग-मात्र हो सकता है किंतु विसंगतियों तथा प्रामाणिक प्रकाशनों से मिलान करने पर छत्तीसगढ़ के लिए इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गौरव के प्रसंग पर तथ्यों, दस्तावेजों के साथ असंदिग्ध जानकारियों की आवश्यकता अब भी बनी हुई है। अपने संसाधनों की सीमा में जितनी जानकारी जुटा पाया, जानता हूं कि वह पर्याप्त नहीं है, सुधिजन के परीक्षण हेतु प्रस्तुत है। आशा है कि कुछ और पुष्ट जानकारी प्राप्त हो सकेगी, जिससे इतिहास के पन्नों में स्पष्टीकरण, संशोधन हो सके।

Saturday, September 19, 2020

असमंजस

The Social Dilemma पहली फुरसत में, फुरसत न हो तो भी समय निकाल कर देख लीजिए।

ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, गूगल खुद की हकीकत बयान करती डाक्यूमेंट्री। सावधान रहें, यह देख कर आप मामूली असमंजस से निकल कर बड़ी दुविधा-किंकर्तव्यता में पड़ सकते हैं। आशंका-अनुमान से कहीं आगे की सचाई। मोबाइल हाथ में लिये हमने दुनिया मुट्ठी में तो कर ली है, लेकिन खुद किस ‘चंगुल‘ में हैं, इसका ठीक अंदाजा शायद ही हमें हो।

हमारा सामाजिक संसार, विश्व-ग्राम वैसा होता जाने वाला है, जैसा हम शायद चाहते न हों, लेकिन जाने-अनजाने अपनी ढेरों पसंद और थोड़े अरमान प्रकट करते रहने के फलस्वरूप ऐसा होगा। यह हमारी देन गिना जाएगा, जिससे हम तार्किक तौर पर इन्कार नहीं कर सकेंगे। जिन विज्ञापन, फिल्मों, साहित्य, खबरों, सीरियल्स और यहां तक कि जिन जनप्रतिनिधियों से हमारी शिकायत बनी रहती है वे बहुमत, हमारे सरोकार और पसंद का ही नतीजा होते हैं। प्रजातांत्रिक सोच को भी कई बार लगने लगता है कि गनीमत है दुनिया ठीक वैसी नहीं, जैसी बहुमत की पसंद। शायद बहुमत को ठीक पता भी नहीं होता कि उसे क्या पसंद है और उसे जो पसंद आ रहा है, वह रोचक-आकर्षक मात्र है या समाज को उसी तरह बदलने पर भी वह मंजूरी देगा। अपने स्वयं की पसंद और ऐसी पसंदों का परिणाम, उससे बना बहुमत, जरूरी नहीं कि स्वान्तः सुखाय हो और अक्सर बहुजन हिताय भी नहीं हो पाता। सोशल मीडिया पर हम दुविधा में पड़े आजमाते रहते हैं, अनंत विकल्पों के बीच अपनी पसंद को। वह हम सौंप रहे हैं एआई को, जिसमें आदर्श, नैतिकता, मूल्य, भावना, संवेग, आस्था-विश्वास बेमानी है और है तो वहां उतनी ही पवित्रता से अंधविश्वास का भी महत्व है।

हम सबके लिए बहुत परिचित और आसान सी प्रक्रिया है, जहां नेक्स्ट, नेक्स्ट, नेक्स्ट का सिलसिला अंततः जब एग्री पर पहुंचता है तो मंजिल के लिए बेकरार मन-ऊंगली को बिल्कुल समय नहीं लगता, एग्री के बाक्स को चेक करने में। तब हमें यह ध्यान नहीं होता कि शर्तों के किस वैधानिक चौखट में कैद के लिए हम सहमत हो रहे हैं। पहले हम राजी हुए हैं और फिर ‘अबोध‘ हम खुद को टच-टिक में अभिव्यक्त करते गए हैं, यह सब एक दूसरे ‘अविवेकी बुद्धिमान‘ आपके एआई पुतले के पास जमा हो रहा है, जो कुछ समय बाद आपकी पसंद और चाहत तय करने लगता है, और आपके पास उस पर भरोसा कर लेना सहज होने लगता है। फिल्म ‘आराधना‘ का गीत ‘बागों में बहार है की तरह अंततः हां-ना डोलते, प्यार है? का जवाब बेसाख्ता ‘हां‘ के गिरफ्त में आ जाता है।

हमारी सोच, हमारा सामाजिक संसार हम खुद रच-गढ़ रहे हैं। अपनी अलग-बेहतर प्रतिकृति रचने की छूट हो तो गुड़-गोबर संभावना बराबर की रहेगी। इस तरह यह नये किस्म का अस्तित्ववादी दौर है, जहां पूरी सभ्यता में हर एक, आभासी अस्तित्व से रूबरू है, उससे निपटना है और  प्रामाणिक बने रहना है, साबित होना है। सोशल मीडिया का अंधाधुंध और अविवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हुए अपनी इस जिम्मेदारी से हम नहीं बच सकते कि अपना भविष्य हम खुद तय कर रहे हैं। हमारे मनो-मस्तिष्क को पढ़-जान लेने की इतनी छूट कभी किसी को नहीं थी, जितनी अब सोशल मीडिया के पास है। हम अपने बारे में जानना चाहते हैं कि हम कौन हैं? हमें क्या पसंद है? हमारे गुण-अवगुण क्या हैं? हम पिछले जन्म में क्या थे और अगले जन्म में क्या होंगे? और भी जाने क्या-क्या! हमारी रुचि-पसंद की हमसे ज्यादा खबर अब और किसी को है, पहले तो हमें यह पता नहीं होता, पता होता है तो विश्वास नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे भरोसा करने लगते हैं और अपनी बागडोर किसी और को अनजाने-अनचाहे सौंप देते हैं।

Saturday, August 22, 2020

छत्तीसगढ़ी दानलीला

छत्तीसगढ़ी की पहली काव्य रचना- ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘, पंडित सुंदरलाल शर्मा (1881-1940) की कृति है। समाज सुधारक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडितजी राजिम के निकट स्थित ग्राम चमसूर/चन्द्रसूर निवासी थे, उन्होंने राजिम में कवि समाज और पुस्तकालय की स्थापना की थी।

पं. सुंदरलाल शर्मा की कृतियों की अधिकृत जानकारी के लिए सन 1916 में प्रकाशित उनकी पुस्तिका ‘श्रीध्रुव-चरित्र-आख्यान‘ का संदर्भ महत्वपूर्ण है। इस पुस्तिका के अंत में ‘‘राजिमनिवासी-पं. सुन्दरलालजी शर्मा त्रिपाठी रचित‘‘ कुल 8 पुस्तकों की सूची दी गई है, जिनका नाम इस प्रकार आया है- 1-श्रीराजीवक्षेत्रमाहात्म्य 2-श्रीप्रह्लादचरित्र नाटक 3-श्रीध्रुव-चरित्र 4-श्रीकरुणा-पचीसी, 5-श्रीविक्टोरिया-वियोग 6-श्रीरघुराज-गुण कीर्तन 7-प्रलाप-पदावली 8-श्रीछत्तीस-गढ़ी दानलीला। इसके पश्चात् उल्लेख है कि ‘‘ग्रन्थकर्ता की अन्यान्य उत्तम पुस्तकों के लिये ठहरिये। शीघ्र प्रकाशित होंगी।‘‘

बाद के अध्येताओं द्वारा सामान्यतः पं. सुंदरलाल शर्मा की 9 प्रकाशित कृतियों का उल्लेख मिलता है। इस संदर्भ में ध्यान योग्य, उक्त सूची की आठ पुस्तकों में, ‘श्रीराजीवक्षेत्रमाहात्म्य‘ की गणना यहां और अन्य स्थानों पर भी पं. सुंदरलाल शर्मा की रचनाओं में है, किंतु उक्त पुस्तक ‘श्री राजीव क्षेत्र महात्म्य‘ पर कविवर पं. शिवराज का नाम रचयिता के रूप में है, जबकि ‘‘श्री सुन्दर लाल शर्मा त्रिपाठी मंत्री श्री राजीव क्षेत्र, कवि समाज‘‘ और ‘‘ठाकुर श्री सूर्योदय सिंह वर्मा‘‘ नाम सम्पादक के रूप में है। इन आठ पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य प्रकाशित पुस्तकों की सूची में सन 1903 में रचित ‘‘श्री भूषण कवि विश्वनाथ पाठक का जीवन चरित्र‘‘ पुस्तक का नाम नवीं प्रकाशित पुस्तक के रूप में शामिल किया जाता है। ऊपर आठ पुस्तकों की सूची सन 1916 में प्रकाशित पुस्तिका से है, जिसमें अन्यान्य पुस्तकों के शीघ्र प्रकाशित होने का लेख है, इसलिए श्री भूषण कवि ... पुस्तक का प्रकाशन सन 1916 के बाद की संभावना बनेगी, किंतु इसकी मुद्रित प्रति की जानकारी न मिल पाने से, प्रकाशित होने की पुष्टि का आधार अब पूर्व अध्येताओं द्वारा किया गया उल्लेख मात्र रह जाता है।

सन 2000 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से प्रकाशित पुस्तिका में हरि ठाकुर ने 22 ग्रन्थों की रचना का नामोल्लेख किया है, जिसमें से 16 का रचना काल, संवत् 1951 (1955 होना चाहिए?) से संवत् 1969 तक दिया हैै (आगे बताया गया है कि उनका सम्पूर्ण लेखन काल सन् 1898 से 1912 तक था। इन पन्द्रह वर्षों में ...) और अन्य 6 की ‘रचना तिथि अज्ञात‘ बताया है। ध्यातव्य है कि यहां 9 वीं प्रकाशित कृति का नाम अन्य अध्येताओं की सूची का ‘श्री भूषण कवि विश्वनाथ पाठक का जीवन चरित्र‘ नहीं, बल्कि ‘सतनामी भजन माला‘ (इसकी रचना तिथि अज्ञात, बताया गया है) आया है। पं. सुंदरलाल शर्मा की कृतियों, रचनाओं को विभिन्न उल्लेखों में ग्रंथ कहे जाने के कारण, स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि पुस्तिका के रूप में उनकी प्रकाशित कृतियों में ध्रुव-चरित्र, करुणा-पचीसी, विक्टोरिया-वियोग और श्रीरघुराज-गुण कीर्तन, यद्यपि साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण, किंतु आकार की दृष्टि से मात्र दो-ढाई सौ पंक्तियों की रचनाएं हैं। पं. सुंदरलाल शर्मा की रचनाओं के लिए यहां संक्षेप में इतना ही कि अलग-अलग स्रोतों को देखने पर जानकारी गड्ड-मड्ड होती है और तथ्य निकालना आसान नहीं है।

इनमें से छत्तीसगढ़ी दानलीला सन 1905 या इसके पूर्व लिखी गई, किन्तु इस संबंध में अन्य अपुष्ट हवाले भी मिलते हैं, जिनका उल्लेख यहां किया जा रहा है।

विचारणीय है कि इस काव्य के रचना-वर्ष के जितने संदर्भ मिले, उनमें पूर्व प्रकाशित अन्य जानकारियों का खंडन अथवा उन पर टिप्पणी नहीं की गई है। पंडित सुंदरलाल शर्मा पर शोध-प्रबंध, निबंध में भी इसके परीक्षण का प्रयास नहीं दिखा। अतएव इसके रचना-वर्ष तथा रचना का आधार/प्रेरणा पर कुछ विचार, उपलब्ध सामग्री अर्थात् छत्तीसगढ़ी दानलीला के सन 1915 में प्रकाशित द्वितीय और सन 1924 में प्रकाशित तृतीय संस्करण तथा बाद के प्रकाशनों के आधार पर किया गया है। सन 1906 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी दानलीला का प्रथम संस्करण अप्राप्त है और यथासंभव प्रयासों के बावजूद अब तक की स्थिति, निराशाजनक और अपनी धरोहर के प्रति सजगता पर बड़ा सवाल है। प्रथम संस्करण के प्रकाशन की जानकारी द्वितीय संस्करण से मिलती है। परीक्षण हेतु देखे गए अन्य शोध, प्रकाशन, पुस्तिका संस्करणों की जानकारी यथास्थान है।

छत्तीसगढ़ के सामान्य संदर्भ की लोकप्रिय दो पुस्तकों में पहली सन 1973 में प्रकाशित प्यारेलाल गुप्त की ‘प्राचीन छत्तीसगढ़‘ तथा सन 1996 में दो भाग में प्रकाशित मदन लाल गुप्ता की ‘छत्तीसगढ़ दिग्दर्शन‘ है। दानलीला संबंधी जानकारी के संदर्भ में अप्रत्याशित कि प्राचीन छत्तीसगढ़ में प्राचीन छत्तीसगढ़ी साहित्य का अध्याय तो है, जिसमें एक हजार वर्ष की साहित्यिक परम्परा को तीन भाग में बांटा गया है, जिसके तीसरे कालखंड, आधुनिक युग में आज तक, उल्लिखित है, किन्तु आगे इस के बजाय स्फुट रचनाएं शीर्षक के अंतर्गत गोपाल, माखन, रेवाराम और प्रह्लाद दुबे आदि का नाम है किन्तु पंडित सुंदरलाल शर्मा, पं. लोचन प्रसाद पांडेय आदि नामोल्लेख नदारद है। छत्तीसगढ़ दिग्दर्शन के द्वितीय भाग, पृष्ठ 194 पर उल्लेख है- ‘‘ठेठ छत्तीसगढ़ी में काव्य का सृजन करने वालों में पंडित सुन्दर लाल शर्मा का स्थान अद्वितीय है। सुन्दर लाल शर्मा की छत्तीसगढ़ी दान लीला की उपलब्ध प्रति में प्रकाशन वर्ष 1912 मुद्रित है और लोचन प्रसाद पान्डेय की छत्तीसगढ़ी कविता सन् 1909 की उपलब्ध है। ... ... किन्तु सुन्दरलाल शर्मा ने ही सर्वप्रथम छत्तीसगढ़ी को ग्राम्य भाषा के पद से उठाकर साहित्यिक भाषा के पद पर अधिष्ठित किया‘‘ तथा पुनः ‘‘छत्तीसगढ़ी के प्रथम महाकवि सुन्दरलाल शर्मा ...‘‘

सन 1981 में ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला: एक समीक्षा‘‘ पुस्तिका डॉ. चित्तरंजन कर के संपादन में हिंदी साहित्य परिषद्, शासकीय राजीवलोचन महाविद्यालय, राजिम से प्रकाशित हुई। संपादकीय में कहा गया है कि- ‘‘कोई कृति किस समय, किस स्थान पर, किस व्यक्ति के द्वारा प्रणीत हुई है, यह गौण है।‘‘ निसंदेह किसी कृति के साहित्यिक मूल्य का विवेचन करते हुए ऐसी जानकारी गौण हो सकती है, किंतु ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ का महत्व, उसके रचना काल के कारण ऐतिहासिक भी है, अतः इस संदर्भ में कृति का समय, गौण बताना उचित नहीं। संभव है कि संपादक ‘समय‘ के लिए आश्वस्त नहीं थे, इसलिए उन्होंने ऐसा विचार व्यक्त किया हो।

पुस्तिका के लेखों में पृष्ठ 3 पर भुवनलाल मिश्र ने इस अपूर्व काव्य की रचना सन 1912 में हुई बताया है और पृष्ठ 5 पर प्रकाशन वर्ष 1913 बताया है। पृष्ठ 6 पर पुरुषोत्तम अनासक्त ने बताया है कि- ‘‘प्रथम संस्करण 1913 में निकला 1915 में दूसरा और तृतीय संस्करण 1924 में।‘‘ इसके बाद संस्करण का उल्लेख किए बिना बताया है कि ‘‘उस समय दानलीला की कीमत चार आने थी‘‘ तथा ‘‘दानलीला को पं. अंबिका प्रसाद बाजपेयी द्वारा 159 बी, मछुआ बाजार स्ट्रीट, दी इंडियन नेशनल प्रेस- ‘‘स्वतंत्र‘‘ में मुद्रित किया गया है। इसमें मात्र चौबीस पृष्ठ हैं।‘‘ वस्तुतः यह 1924 वाले तीसरे संस्करण के अंतिम पृष्ठ पर ‘विज्ञापन‘ के नीचे प्रिंट लाइन में छपा है। सन 1924 ई. वाले इस ‘त्रितीय बार‘ प्रकाशित पुस्तक का मूल्य चार आना तथा प्रकाशक श्रीचन्द्रशेखर विद्याभूषण शर्म्मा जिमिन्दार छपा है। 1915 में द्वितीय बार प्रकाशित पुस्तक में भी मूल्य चार आना है। इसके प्रकाशक श्रीनीलमणि शर्म्मा जमिन्दार तथा नं. 201 हरिसन रोड, के ‘नरसिंह प्रेस‘ में बाबू रामप्रताप भार्गव द्वारा मुद्रित‘‘ छपा है। डॉ. चित्तरंजन कर ने अपने लेख में, संपादकीय में व्यक्त विचार के अनुसरण में इसकी रचना तिथि की चर्चा नहीं की है, किन्तु पुस्तिका में शामिल रवि श्रीवास्तव के लेख में पुनः उल्लेख है कि- ‘‘दानलीला‘‘ का प्रथम संस्करण 1913 में प्रकाशित होकर जनमानस के बीच आ चुका था।

छत्तीसगढ़ी दानलीला शीर्षक से सन 2000 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से प्रकाशित, हरि ठाकुर द्वारा संपादित पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर छपा है- ‘‘पं. सुन्दरलाल शर्मा द्वारा सन् 1903 में रचित छत्तीसगढ़ी प्रबंध काव्य‘‘। इसके पृष्ठ 6 पर डॉ. सुधीर शर्मा ने लिखा है कि- ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला जब 1912 में प्रकाशित हुई तब ...‘‘। इसी पुस्तिका में हरि ठाकुर ने लिखा है कि ‘‘इस प्रबंध काव्य की रचना उन्होंने 1903 में की थी किन्तु प्रकाशित बहुत बाद में हुई।‘‘ क्या यह लिखते हुए उन्हें जानकारी न थी कि इसका प्रथम संस्करण 1906 में प्रकाशित हो गया था या मात्र तीन साल बाद प्रकाशित होने को उन्होंने ‘बहुत बाद में‘ माना है। आगे लिखा है कि- यह छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रथम प्रबंध काव्य है। इसकी कथा श्रीमद्भागवत् के दशम स्कंध पर आधारित है।‘‘ इसके प्रबंध काव्य होने और, कथा श्रीमद्भागवत् के दशम स्कंध पर आधारित होने के संबंध में अन्य अध्येताओं की राय भिन्न है। एक अन्य संस्करण सन 2006 में वैभव प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, इसमें भी ऐसी ही जानकारी अर्थात् ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला पं. सुन्दरलाल शर्मा द्वारा सन् 1903 में रचित छत्तीसगढ़ी प्रबंध काव्य‘‘ वाला मुखपृष्ठ है।

ललित मिश्रा के संपादन में 2007 में प्रकाशित ‘‘युग-प्रवर्तकः पं. सुन्दरलाल शर्मा‘‘ के द्वितीय संस्करण में पृष्ठ 42 पर छत्तीसगढ़ी दानलीला नामक खंडकाव्य का सृजन सन 1904 में। इसी पुस्तक में पृष्ठ 112 पर इस खण्ड-काव्य को सन 1916 में शर्मा जी ने लगभग 34 वर्ष की आयु में (जन्म सन 1881) लिखा। पुनः छत्तीसगढ़ी दानलीला की प्रकाशन तिथि, पृष्ठ 113 पर 10.3.1906 तथा पृष्ठ 114 पर इसकी रचना सन 1905 में बताया है। साथ ही पृष्ठ 40 तथा पृष्ठ 179 पर प्रकाशित ग्रन्थ ‘‘हृदय तरंग‘‘ का नाम दिया है, जो उनकी इस पुस्तक में अन्यत्र दी गई सूचियों में अथवा अन्य अध्येताओं की सूची में नहीं है।

सन 2009 में प्रकाशित ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘ (संपादन- ललित मिश्रा और डॉ. सविता मिश्रा) के मुखपृष्ठ पर रचनाकाल - 1904 छपा है। इस पुस्तक के पृष्ठ 22 पर उल्लेख के अनुसार इस अपूर्व काव्य की रचना सन् 1904 में, मुद्रण 1906 में और उसका द्वितीय एवं तृतीय संस्करण क्रमशः सन् 1915 एवं सन् 1924 में प्रकाशित हुआ था।

सन 2017 में डॉ. चितरंजन कर की पुस्तक पं. सुंदरलाल शर्मा विरचित छत्तीसगढ़ी दानलीला (हिंदी अनुरचना) के पृष्ठ 11 पर ‘‘सन् 1903 में रचित ‘छत्तीसगढ़ी-दानलीला‘ छत्तीसगढ़ी की प्रथम प्रबंधात्मक रचना (खंडकाव्य) है‘‘ कहा गया है। इसी पृष्ठ का उद्धरण है कि ‘‘श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध से कृष्ण की दानलीला का सूत्र लेकर उन्होंने ... ... ‘छत्तीसगढ़ी-दानलीला‘ की रचना की।‘‘ जबकि दानलीला का कोई स्पष्ट सूत्र श्रीमद्भागवत में नहीं मिलता।

सन 2006 में वैभव प्रकाशन वाली ‘छत्तीसगढ़ी-दानलीला‘ के पृष्ठ 31 में डॉ. बलदेव के ‘छत्तीसगढ़ काव्य का मंगलाचरण‘ लेख में स्पष्ट किया गया है कि- ‘‘श्रीमद्भागवत् पुराण में दानलीला का कहीं उल्लेख नहीं हुआ है।‘‘ तथा ‘‘दानलीला पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी अर्थात् भक्तिकालीन आन्दोलन की उपज है।‘‘ किन्तु उन्होंने आगे यह भी लिखा है कि- ‘‘दानलीला और मानलीला के संकेत वेणुगीत, गोचारण, और रास प्रसंगों में खोज लेना कोई असंभव काम नहीं।‘‘ और ‘‘सूरदास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कन्ध के आधार पर सूरसागर की रचना की है। इसमें ब्रजलीला के अन्तर्गत दानलीला के करीब तीस पद मिलते हैं।

वैभव प्रकाशन वाली इसी पुस्तिका में आए छत्तीसगढ़ी दानलीला की रचना और प्रकाशन संबंधी विभिन्न पृष्ठों पर छपी जानकारी को एक साथ रखकर देखना आवश्यक है। पृष्ठ 47 पर- ‘‘पं. भुवनलाल मिश्र के अनुसार इसका रचनाकाल सन् 1905 और हरि ठाकुर के अनुसार 1903 है।‘‘ पृष्ठ 48 पर- ‘‘इसका पहली बार प्रकाशन सन् 1912 में हुआ था। दूसरा संस्करण सन् 1914 और 1915 के बीच होना चाहिए,‘‘ पृष्ठ 50 पर- ‘‘इसका चौथा संस्करण 1924 में हुआ था, जिसका पुनर्प्रकाशन डॉ. चित्तरंजन कर के संपादन में सन् 1981 में ... हुआ था।‘‘( डॉ. बलदेव का लेख)। पृष्ठ 53 पर- ‘‘पं. सुंदरलाल शर्मा ने ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के प्रथम संस्करण (1960 ई.)...।‘‘ (डॉ. चित्तरंजन कर का लेख)। पृष्ठ 56 पर- ‘‘सन् 1905 में लिखित इस अद्भुत कृति...‘‘। (मुकुंद कौशल का लेख)। पृष्ठ 59 पर- ‘‘पं. सुंदरलाल शर्मा 20 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में छत्तीसगढ़ के लोगों को ‘दानलीला‘ के माध्यम से...‘‘(डॉ. गोरेलाल चंदेल का लेख)।

डॉ. दयाशंकर शुक्ल की पुस्तक ‘‘छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन‘‘, प्रथम संस्करण 1969 प्रकाशित हुआ है, जिसके पृष्ठ 48 पर गोकुल प्रसाद की रायपुर रश्मि के पृष्ठ 83 का उद्धरण दिया है कि- ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा का पहिला पद्यात्मक ग्रन्थ राजिम के पं. सुन्दरलाल द्वारा रचा गया था।‘‘ किन्तु आगे इसी पुस्तक के पृष्ठ 50 पर लिखा है कि- ‘‘छत्तीसगढ़ी में प्रथम पद्य रचना 1907-08 में श्री लोचनप्रसाद पाण्डेय ने ‘कविता कुसुम‘ ...‘‘ पुनः इसी पृष्ठ पर लिखा है कि- सन 1942 में श्री सुन्दरलाल शर्मा ने ‘दानलीला‘ लिखकर ...‘‘ किन्तु पृष्ठ 56 पर लिखा है कि- ‘‘सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी पद्य के प्रवर्तक माने जाते हैं। सर्वप्रथम इन्होंने ही छत्तीसगढ़ी में ग्रंथ-रचना की ...‘‘ डॉ. दयाशंकर शुक्ल की पुस्तक के द्वितीय संस्करण, सन 2011, में भी ऐसा ही छपा है।

इस पुस्तक के पृष्ठ 50-51 पर रोचक जानकारी मिलती है कि छत्तीसगढ़ी कविता की अब तक प्रकाशित विशेष उल्लेखनीय पुस्तकों में दानलीला शीर्षक की अन्य पुस्तक 1913 में बैजनाथप्रसाद, 1936 में श्री नर्मदाप्रसाद दुबे का उल्लेख है। प्रसंगवश खरौद निवासी टेटकूराम कहरा की पंकज प्रकाशन, केशव पुस्तकालय, मथुरा से प्रकाशित ‘‘छत्तीसगढ़ी दान लीला‘‘, जिसे अंदर के पृष्ठ में ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा में श्री दानलीला‘‘ छापा गया है, की प्रति भी मिली है, इसमें प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है, किंतु यह अनुमानतः 25-30 वर्ष से अधिक पुरानी नहीं।

‘‘छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन‘‘ (प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं, संभवतः सन 1978-79) नंदकिशोर तिवारी की पुस्तक है, जिसके पृष्ठ 8 पर उल्लेख है कि- मौलिक छत्तीसगढ़ी कविताओं की परम्परा सन् 1904 से आरंभ हो जाती है। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इस परम्परा को जन्म दिया, तत्पश्चात् 1915 के आसपास पं. सुन्दरलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ी में कुछ कविताएं लिखीं। कुछ ही वर्षों के पश्चात् उनके द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी ‘दानलीला‘ प्रकाशित हुई। सन 1924 तक इसके 4 संस्करण निकले और बिक गए।‘‘ पुनः पृष्ठ 9 पर जोर दे कर कहा गया है कि- ‘‘पं. लोचनप्रसाद जी पाण्डेय को ही छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रथम प्रणेता और छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य का संस्थापक स्वीकार करना पड़ेगा।‘‘

सन 2006 में प्रकाशित नंदकिशोर तिवारी की अन्य पुस्तक ‘‘छत्तीसगढ़ी साहित्य दशा और दिशा‘‘ में पृष्ठ 11 पर छपा है कि- ‘‘इन्हीं दिनों 1915 में सुंदर लाल शर्मा ने कुछ कवितायें लिखीं। उनके द्वारा रचित ‘छत्तीसगढ़ी दान-लीला‘ प्रकाशित हुई। 1924 तक इसके चार संस्करण प्रकाशित हुए।‘‘ पृष्ठ 145-146 पर छत्तीसगढ़ी लेखन का ऐतिहासिक आंकलन करते हुए, सामने आई कृतियों के क्रम में भी पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय (1904) और पं. शुकलाल प्रसाद पाण्डेय (1919) के बीच पं. सुंदरलाल शर्मा (1915) को रखा गया है। इसी पुस्तक के भाषा-साहित्य खंड में एक पूरा अध्याय ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला के बहाने‘ है, जिसमें उल्लेख है कि- ‘‘पं. सुन्दर लाल शर्मा ने ‘दान लीला‘ की रचना सन् 1913 में की। पहली जिल्द इसी सन् में प्रकाशित हुई। ... उनके सामने भारतेन्दु और उनकी काव्य की चिंता का मनुष्य उपस्थित था। संभवतः इसी चिंता ने पं. सुन्दर लाल शर्मा को ‘दान लीला‘ लिखने की प्रेरणा दी।‘‘ फिर इसका अगला वाक्य है- ‘‘पं. सुन्दर लाल शर्मा ने ‘दान लीला‘ की कथा श्रीमद्भागवत से ली।‘‘ इसी क्रम में आगे व्याख्या है- ‘‘कृष्ण और गोपियों के अहैतुक प्रेम की यह कथा है। इससे अलग वृन्दावान से मक्खन, दूध, दही मथुरा जाने की कथा है। वास्तव में ‘पै धन विदेश चलि जात‘ की कथा को पं. सुन्दर लाल शर्मा ने ‘दान लीला‘ के मिथ से जोड़ा। वृन्दावन को भारत, मथुरा को इंग्लैंड और कंस को अंगरेजी हुकूमत ...।‘‘

सन 2011 में डाॅ. बलदेव के संपादन में ‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल‘ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के आरंभ में विश्वरंजन ने लिखा है कि ‘‘मुकुटधर पाण्डेय के अनुसार पंडित सुंदरलाल शर्मा ने 1906 में छत्तीसगढ़ी में ही दानलीला नामक खंड काव्य लिखा था। (इसका प्रथम बार प्रकाशन 1910 में हुआ था।)‘‘ संपादकीय में डाॅ. बलदेव ने 1850 से स्वतंत्रता प्राप्ति तक जिन नामी गिरामी कवियों का उल्लेख किया है, उसमें बिसाहूराम, वनमाली प्रसाद श्रीवास्तव, जगन्नाथ भानु के अलावा लोचन प्रसाद पाण्डेय और गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे अन्य कई नाम हैं, लेकिन इनमें पं. सुंदरलाल शर्मा का नाम नहीं है। इसके बाद उन्होंने लिखा है कि- ‘‘लोचन प्रसाद पाण्डेय हर छत्तीसगढ़ी म साहित्य सिरजन सुरू करिन। ... ... छत्तीसगढ़ी म काव्य लेखन बीसवीं सदी के सुरवाती दौर ले पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय अउ पं. सुंदरलाल शर्मा करत रहिन फेर वोकर ठोस प्रमान 1910 म छत्तीसगढ़ी दानलीला के प्रकासन ले ही मिलथे‘‘।

सन 2013 में प्रकाशित डाॅ. बलदेव की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी काव्य के कुछ महत्वपूर्ण कवि‘ विशेष उल्लेखनीय है। इसमें ‘छत्तीसगढ़ी काव्य का मंगलाचरण‘ पं. सुदरलाल शर्मा से, संवर्धन में क्रमशः पं. शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, प्यारेलाल गुप्त, पं. मुकुटधर पाण्डेय आदि का नाम है, किंतु पंडित लोचन प्रसाद पांडेय का नाम नहीं है। कहा गया है- ‘‘छत्तीसगढ़ी काव्य लेखन के मंगलाचरण भगवान कृष्ण के लीला गायन से होइस हवय।‘‘ इस दानलीला की चर्चा में लिखा है कि- ‘‘फेर श्रीमद् भागवत पुराण म वोकर कोनो तीर स्पस्ट उल्लेख नई मिलय।‘‘ पुनः ‘‘मान लीला अउ दान लीला जइसन नवा कथा के अवतरण हर पुष्टि मार्गी कवि मनके निज के कल्पना आय।‘‘ लेखक ने पर्याप्त विस्तार से सोदाहरण दिखाया है कि छत्तीसगढ़ी दानलीला पर सूरसागर और घनानंद का प्रभाव है।

यहां एक भ्रामक सूचना है कि- ‘‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण के लेखक काव्योपाध्याय हीरालाल हर ए किताब के भूमिका लिखे हावे।‘‘ वस्तुतः, सन 1915 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी दानलीला के दूसरे संस्करण में स्पष्ट उल्लेख है कि छत्तीसगढ़ी दानलीला पर टिप्पणी रायबहादुर हीरालाल ने की थी, न कि काव्योपाध्याय हीरालाल ने। यह विशेष उल्लेखनीय है. क्योंकि डाॅ. बलदेव सन 2011 वाली पुस्तक के पृष्ठ 36 पर कवि परिचय में दानलीला की भूमिका वाले विद्वान का नाम रायबहादुर हीर(ा)लाल उल्लेख करते हैं, जैसा कि वस्तुतः है। डाॅ. बलदेव ने बताया है कि- ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला ... न तो वो हर खंड काव्य आय अउ न मुक्तक ... न तो इहां कथा सीर्षक हे अउ न सर्ग। कोनो तीर सास्त्रीय विधि विधान के निर्वाह नई होय हे।‘‘ रचना और प्रकाशन काल के संबंध में कहा गया है कि- ‘‘ पं. भुवनलाल मिश्रा के अनुसार पं. सुन्दर लाल शर्मा हर छत्तीसगढ़ी दान लीला के रचना 1905 म कर डारे रहिस। ... प्रथम प्रकाशन सन् 1910 के बाद होय रहिस।‘‘ तथा ‘‘चौथा संस्करण सन् 24 म ही निकल गए रहिस।‘‘

सन 2017 में छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी के लिए डाॅ. ऋषिराज पाण्डेय ने पं. सुन्दरलाल शर्मा समग्र संकलन तैयार किया है, जिसमें पृष्ठ 122 पर उल्लेख है कि ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला की रचना सन् 1905 में हुई जबकि प्रकाशन सर्वप्रथम सन् 1906 में बाबू रामप्रताप भार्गव द्वारा...’’। वस्तुतः 1915 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी दानलीला के दूसरे संस्करण में ‘बाबू रामप्रताप भार्गव द्वारा ...‘ जानकारी आई है, किंतु प्रथम संस्करण भी यहीं से प्रकाशित हुआ था? यह किस आधार पर कहा गया है, स्पष्ट नहीं है, क्योंकि पहले संस्करण की प्रति संभवतः अब अप्राप्त है। इस संकलन में छत्तीसगढ़ी दानलीला संबंधी परिचय-जानकारियां पूर्व प्रकाशित स्रोतों, मुख्यतः दूसरे संस्करण और डाॅ. बलदेव के लेख से ली गई हैं।

श्रीमती रश्मि चौबे के शोध-प्रबंध 2005 में पृष्ठ 145 आदि पर इस काव्य की चर्चा है, शीर्षक है ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला (संवत् 1960)। पुनः ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम रचना करने वाले पंडित सुंदरलाल शर्मा ही थे।‘‘ किंतु पृष्ठ 148 पर शोधार्थी ने बिना टिप्पणी के डॉ. जीवन यदु को उद्धृत किया है कि- ‘‘पंडित सुंदरलाल शर्मा का ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘ नामक खंडकाव्य की रचना सन् 1912 में कर ली थी, किन्तु उसका प्रकाशन सन् 1913 में हो पाया। सन् 1924 तक उसके तीन संस्करण निकले।‘‘ इस शोध प्रबंध में पृष्ठ 145-146 के मध्य छपा चित्र विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें पूर्व के संस्करणों की तरह ‘‘चिटिक येहू ला तो बाँचो‘‘ के साथ ‘‘असली छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘, प्रकाशक हिन्दी पुस्तकालय मथुरा और मू. 50 न.पै. दर्शित है।

असली शब्द के प्रयोग से स्पष्ट अनुमान होता है कि अन्य दानलीला भी छप-बिक रही थीं। वैसे एक दौर रहा है जब पुस्तक शीर्षक के साथ असली, बड़ा, सचित्र विशेषण लगाए जाते थे। इसी तरह इसमें मूल्य न.पै. अर्थात् नये पैसे में है। नये पैसे का औपचारिक प्रयोग सन 1957 से 1964 तक रहा, किंतु उसके बाद भी आदतवश प्रयुक्त होता रहा, इससे स्पष्ट होता है कि सन 1924 और सन 1981 के बीच भी छत्तीसगढ़ी दानलीला के संस्करण प्रकाशित हुए हैं। साथ ही यहां उल्लेखनीय है कि सन 1955 में प्रकाशित श्री रविशंकर शुक्ल अभिनन्दन-ग्रन्थ में श्री काशीप्रसाद मिश्र ने लिखा है कि ‘‘हाल-हाल में कुछ लोगों ने कतिपय छोटी-छोटी पुस्तकें इस बोली में लिख डाली हैं, जिसमें से कुछ पर्याप्त लोकप्रिय भी हुई हैं। जैसे छत्तीसगढ़ी दानलीला।‘‘ ध्यातव्य कि यहां इस कृति के रचनाकार का नाम नहीं दिया गया है।

रचना वर्ष, संस्करण और प्रतियां- 
प्राथमिक स्रोत का आधार लें तो पं. सुन्दरलाल-शर्म्मा त्रिपाठी प्रणीत सन 1915 ई. में प्रकाशित छत्तीस-गढ़ी-दानलीला द्वितीय संस्करण (द्वितीय बार 4000 प्रति, उल्लेख है) में प्रथम संस्करण की भूमिका है, जिसमें 10.3.1906 तिथि अंकित है। यही उल्लेख है कि ‘‘आज आपकी उसी चिर अभ्यासित प्यारी मातृभाषामेंही, एक पहला पहल नूतन संस्कारका प्रसार करके...‘‘ तथा ‘‘चाहे यह पुस्तक इस भाषामें पहले पहलही निर्मित होनेके कारण...‘‘ तथा द्वितीय संस्करण की भूमिका में ‘‘एक वर्ष के भीतर ही एक हजार जिल्दों का समाप्त हो जाना ... प्रथमावृत्ति की 1000 प्रतियों के चुक जाने पर...‘‘ तथा एक धूर्तका कई आवृत्ति निकलवाकर 5, 6 हजार जिल्दें बेंच डालना...‘‘। इस संस्करण के अंत में ग्रंथ तैयार होने की प्रामाणिक तिथि स्वयं कवि द्वारा इस प्रकार बताई गई है-
सम्मत दृग रस अंक शशि, तिथि तृतिया गुरुबार।
कृष्णपक्ष आसौज मह, भयेउ ग्रन्थ तय्यार।।

उक्त दोहे के आधार पर ग्रन्थ तैयार होने का वर्ष, दृग-2 रस-6 अंक-9 शशि-1 मान अर्थ लगावें तो यह विक्रम संवत 1962 की तिथि होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त दृग का मान आंख के गोलक के कारण 0 की संभावना व्यक्त की जा सकती है, ऐसी स्थिति में यह विक्रम संवत 1960 होगा। रचना-प्रकाशन की तिथि की पुष्टि यों भी हो जाती है कि सन 1915 ई. में प्रकाशित छत्तीस-गढ़ी-दानलीला के द्वितीय संस्करण में ‘विद्वानों की कतिपय सम्मतियां‘ में पं. जगन्नाथप्रसादजी शुक्ल द्वारा शुक्रवार, 21 जून 1907 को ‘श्रीवेंङ्कटेश्वर समाचार’ पत्र का भी हवाला है।

यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि शब्दों के माध्यम से संख्याओं को अभिव्यक्त किए जाने की परंपरा बहुत पुरानी है, जिसे शब्दांक या भूतसंख्या (क्रोनोग्राम) कहा जाता है। इस पद्धति में ‘वाम-गति‘, जिसे ‘अंकानां वामतो गतिः‘ कहा गया है, होती है अर्थात् अंकों को दाहिने से बाएं व्यवस्थित किया जाता है। इस पद्धति में अंकों के लिए विभिन्न शब्द निर्धारित हैं, किंतु शब्दों के लिए मान्य अंकों से भिन्न प्रयोग कर, परंपरा के उल्लंघन के भी उदाहरण मिलते हैं। ऐसा प्रयोग सूरदास ने भी किया है, उनका प्रसिद्ध पद है, जिसमें- मंदिर अरध (पक्ष-15 दिन) अवधि बदि हमसौं, हरि अहार (मास-30 दिन) चलि जात ..., इसी पद में आगे नखत (नक्षत्र-27), वेद (4) और ग्रह (9) आता है।

पं. सुंदरलाल शर्मा ने इस पद्धति से रचना काल का उल्लेख ‘‘श्री करुणा-पचीसी अथवा उटका (उलाहना) पचीसी‘‘ में इस प्रकार किया है-
संवत् गुण रस निधि शशि तिथि सप्तमि शशिवार।
शुक्ल पक्ष बैशाख मॅंह भयो बिनय तैयार।। 
इस आधार पर रचना तैयार होने का वर्ष, गुण-9, रस-6, निधि-9, शशि-1, इस प्रकार संवत 1969 होना चाहिए, किंतु प्रकाशित पुस्तिका की मूल प्रति पर रचना काल 1959 अंकित है। संवत 1959 होने पर यह 14 मई 1902, दिन बुधवार होगा और संवत 1969 होने पर 23 अप्रैल 1912, मंगलवार होगा, जबकि यहां दिन शशिवार यानि चंद्र-सोमवार बताया गया है। उनकी अन्य कृति ‘‘विक्टोरिया-वियोग और ब्रिटिश-राज्य-प्रबंध-प्रशंसा‘‘ में रचना काल बताया गया है-
सम्वत गुण ९ सुर ५ खण्ड ९ शशि १ अष्टमि तिथि शशिवार।
शुक्ल पक्ष स्रावन सुभम वरण्यौ मति अनुसार।।
यहां शब्दों के साथ अंक भी दर्शा दिया गया है, जिससे किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रह जाती कि इस कृति का रचनाकाल 1959 (11 अगस्त 1902, सोमवार) है, जो प्रकाशित पुस्तिका में अलग से मुखपृष्ठ पर और ‘निवेदन‘ में भी उल्लिखित है।

प्रसंगवश, अंकों को वर्णों से निरुपित करने की अन्य प्रचलित प्राचीन पद्धति ‘कटपयादि‘ का परिचय पा लें या जानकार अपनी स्मृति दुहरा लें। नाम से स्पष्ट है कि नागरी वर्णमाला के वर्गों के प्रथम अक्षरों से यह शब्द बना है। दाशमिक प्रणाली में एक से नौ और शून्य को मिला कर दस अंक, तो क, च, ट, त और प वर्गों में उंगलियों की तरह पांच-पांच वर्ण हैं। कटपयादि पद्धति में क से ञ तक मान क्रमशः 1 से 9 और 0, यानि क-1, ख-2, ग-3 ... ... ज-8, झ-9, ञ-0 होता है। पुनः इसी प्रकार ट-1 और ... ... न-0 होगा प से म क्रमशः 1 से 5 और य, र, ल, व, श, ष, स, ह क्रमशः 1 से आठ होता है। वाम-गति यहां भी होती है, जैसे 1960 को न, च/त/ष, झ/ध, क/ट/प/य जोड़ते हुए मात्राओं का इस्तेमाल कर सार्थक शब्द यथा- नैषधीय का मान 0691 होगा, जिसका आशय इस प्रणाली से, संख्या 1960 माना जाएगा।

आसौज यानि क्वांर-आश्विन (27-28 नक्षत्रों में से प्रथम, अश्विनी या अश्व-युज से आसौज) मास, कृष्ण पक्ष तृतीया, दिन गुरुवार स्पष्ट है। किंतु विक्रम संवत 1962 के आसौज मास, कृष्ण पक्ष तृतीया को दिन शनिवार तथा रविवार (16 तथा 17 सितंबर 1905) है। इसके पूर्व के वर्षों में आसौज मास, कृष्ण पक्ष तृतीया को दिन गुरुवार विक्रम संवत 1960, यानि सन 1903 में 10 सितंबर को है (तथा इसके बाद आश्विन मास, कृष्ण पक्ष तृतीया को गुरुवार विक्रम संवत 1970, यानि सन 1913 में 18 सितंबर को है।) ऐसी स्थिति में दृग या शशि का मान 0 रख कर विक्रम संवत 1960 यानि सन 1903 माना जाय? प्रथम संस्करण की भूमिका में मार्च 1906 की तारीख है, इस आधार पर सामान्य अनुमान होता है कि ग्रंथ सितंबर सन 1905 यानि विक्रम संवत 1962 या इसके पूर्व सन 1903? में तैयार हो गई होगी। इस प्रकार इस ग्रंथ ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘ का अन्य कोई रचना काल तथ्य और तर्कसम्मत नहीं होगा।

प्रभाव-
द्वितीय संस्करण की भूमिका में अपनी इस रचना पर अश्लील शब्दों के आक्षेप का जवाब देते हुए पं. सुंदरलाल शर्मा ने विभिन्न महाकवियों के श्रृंगार रस संबंधी उदाहरणों में भक्त कवि सूरदास की ‘‘दान लैहौं सब अंगनिको। अति मद गलित ताल फलते गुरु इन युग उतंगको‘‘ पंक्ति उद्धृत की है। इससे अनुमान होता है कि छत्तीसगढ़ी दानलीला की रचना अष्टछापी महाकवि सूरदास सारस्वत की दानलीला के आधार पर की गई है, न कि अकबर दरबार वाले महाकवि सूरदास ब्रह्मभट्ट के आधार पर। महाकवि सूरदास सारस्वत की दानलीला की पंक्तियां, जिनका अंश पंडित सुंदरलाल शर्मा ने उद्धृत किया है, वह मूलतः इस प्रकार हैं-
लेहौं दान सबै अंगनि कौ।
अति मद गलित, ताल फल तैं गुरु, इन जुग उरज उतंगनि कौ।
खंजन कंज मीन मृग-सावक, भॅंवर जबर भुव-भंगनि कौ।
कुंदकली, बंधूक, बिंबफल, वर ताटंक तरंगनि कौ।
कोकिल कीर, कपोत, किस लता, हाटक, हंस, फनिंगन कौ। 
‘सूरदास‘ प्रभु हॅंसि बस कीन्हौ, नायक कोटि अनंगनि कौ।

उक्त पंक्तियों का मिलान छत्तीसगढ़ी दानलीला की निम्न पंक्तियों से-
सब्बो के जगात मड़वाहौं। अभ्भी एकक खोल देखाहौं।। 
रेंगब हर हांथी लुर आथै। पातर कन्हिया बाघ हराथै?।।
केंरा जांघ नख्ख है मोती। कहौ बांचि हौ कोनौ कोती?।। 
कंवल बरोबर हांथ देखाथै। छाती हंडुला सोन लजाथै।। 
बोड़री समुंद हबै पंड़की गर। कुंदरू ओठ दाँत दरमी-थर।। 
सूरुज चन्दा मुंहमें आहै। टेंड़गा भऊं अओ! कमठा है।।
तुर तुराय मछरी अस आंखी। हैं हमार संगी मन साखी।।
सूवा चोंच नाक ठौंके है। सांप सरिक बेणी ओरमे है।। 
अभ्भो दू-ठन बांचे पाहौ। फोर बताहौं सुनत लजाहौ।।

ध्यातव्य है कि महाकवि सूरदास ब्रह्मभट्ट जिनकी कम से कम तीन दानलीलाएं हैं, उनकी कुछ पंक्तियां यहां उद्धृत हैं, जिनसे पता लगता है कि इन दानलीलाओं से भी पं. सुदरलरल शर्मा अवश्य परिचित थे, पंक्तियां इस प्रकार हैं-
एक 
अब दधि-दान रचैं इक लीला। जुवतिनि संग करौ रस लीला।।
‘सूरस्याम‘ संग सखनि बुलायौ। यह लीला कहि सुख उपजायौ।।

दूसरा
नित प्रति जाति दूध-दधि बेंचन, आजु पकरि हम पाई।
‘सूरस्याम‘ कौ दान देहु, तब जैहौ, नंद-दुहाई।।

तीसरा कान्ह बिलग जिनि मानिए, राखि पछिलौ नेहु।
दूध दही की को गिनै, जो भावै सो लेहु।।
... ... ...
कुंज-केलि मन मैं बसी, गायौ ‘सूर‘ सुजान।।

जगात-
काव्य में पद आया है- ‘आगू मोर जगात दे, पाछू पाहौ जाय।।‘, पुनः ‘रोज रोज चोरी कर जावौ। मोला नहीं जगात पटावौ।।‘ फिर आया है- ‘दान दिए बिन जान-न पाहौ।‘ इस तरह जगात, दान और चुंगी कर के अर्थ में प्रयोग में आया है, जो ‘मंगथैं श्याम जगात जवानी‘ आते रास-श्रृंगार लीला रूप लेने लगता है। इस संदर्भ में जगात शब्द पर विचार करें तो अरबी शब्द ज़कात अर्थात् पाक या शुद्धि करने वाला, इसका छत्तीसगढ़ी रूप है जगात। जकात, इस्लाम में एक प्रकार का दान है, जिसे फ़र्ज़ की तरह और धार्मिक आयकर जैसा माना जा सकता है। इसकी राशि साल भर में होने वाली आमदनी या बचत का ढाई प्रतिशत अर्थात चालीसवां भाग होना चाहिए। छत्तीसगढ़ी दानलीला में इसी शब्द ‘जगात‘ का प्रयोग हुआ है। जगात, दान भी है और कर भी। हिन्दी में प्रचलित जकात का एक अर्थ आयात कर भी है। यहां दान-कर-जगात-लीला, शब्दों का अनुशीलन, कवि के शब्द चयन और भाषा सामर्थ्य की दृष्टि से विस्तार से किया जा सकता है। संक्षेप में, इस काव्य में कृष्ण गोपियों से कर-दान मांगते हैं। यह लीला प्रसंग बना है, क्योंकि दुहिताएं- राधा और गोपियां, दूध-दही बेचने के बहाने कृष्ण मिलन के लिए निकली हैं और कृष्ण अपने सखाओं संग रास्ते में जगात वसूलने, दूध-दही खाने और इस बहाने-लीला करते संयोग-श्रृंगार घटित कराने आ धमकते हैं। कृष्ण द्वारा जगात वसूलने की बात पर गोपियां उनके कर वसूलने के अधिकार पर सवाल उठाती हैं और कंस से शिकायत की बात कहती हैं। इस पर कृष्ण कंस की परवाह न करते और स्वयं कर वसूलने की बात कहते हुए मानों कंस को चुनौती भी देते हैं। बहरहाल, क्या यही तत्कालीन अंगरेजी हुकूमत के प्रतिरोध स्वर का स्वरूप है, जो आगे चल कर कार्य रूप में कंडेल नहर सत्याग्रह में प्रकट होता है।

फोटो पहचान-
आधार कार्ड और फोटो पहचान-पत्र के इस जमाने के लिए यह रोचक है कि पं. सुंदरलाल शर्मा को पुस्तक में प्रकाशित उनकी फोटो के आधार पर लोग ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के रचयिता के रूप में पहचान लेते थे। इस पर उन्होंने टिप्पणी की है- ‘‘हमारे देशमें भी चित्र-परिचय ज्ञानका भी खासा प्रचार हो रहा है, केवल चित्र देखकर ही एक अपरिचित व्यक्तिको पहचान लेना, यह कुछ सहज काम नहीं है।‘‘

आगे क्या-
छत्तीसगढ़ी दानलीला का रचना वर्ष, इस काव्य की प्रेरणा, प्रकाशन वर्ष सहित कुल संस्करण (इसे दो चरणों में देखा जाना उपयुक्त होगा- सन 1981 में राजीवलोचन महाविद्यालय के हिंदी साहित्य परिषद द्वारा प्रकाशन और उसके बाद यानि दूसरा चरण और उसके पहले यानि प्रथम प्रकाशन से 1981 के पहले तक, पहला चरण, पाइरेटेड संस्करणों सहित) और मुद्रित प्रतियों की संख्या, छत्तीसगढ़ के अन्य दानलीला काव्य-अनुरचना, दान-कर अर्थात् जगात (जकात) की परंपरा और उसका श्रृंगारिक लीला में बदल जाना, जैसे पक्षों पर अब भी ध्यान दिया जाना और खोजबीन रह गई है।

हुआ क्या था-
इंटरनेट पर कविता कोश, भारतीय काव्य का सबसे विशाल ऑनलाइन संकलन है। कोश में कुल पन्ने एक लाख चालीस हजार से भी अधिक हैं। इस पर छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार और उनकी कविताएं हैं, लेकिन ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘ की प्रविष्टि अब तक मात्र नाम की थी, पूरी रचना यहां उपलब्ध नहीं थी। छत्तीसगढ़ी की यह पहली गंभीर प्रकाशित रचना, इंटरनेट पर वहां या और कहीं भी नहीं मिली तो इस ओर ध्यान गया। मन खिन्न हुआ, किंतु शिकवा-शिकायत के बजाय नेट पर प्रकाशित करने के लिए स्वयं वर्ड फाइल तैयार किया, टेक्स्ट को दूसरे और तीसरे तथा बाद के दो संस्करणों से मिलान कर प्रूफ ठीक किया। यह अपनी जिम्मेदारी मानते और प्रायश्चित भाव से किया गया, कि छत्तीसगढ़ी का यह पहला काव्य अब तक नेट पर क्यों नहीं है और इस कारण ध्यान से पंक्ति दर पंक्ति दुहरा कर पढ़ना भी हो गया, जैसा पहले नहीं पढ़ा था। परिणाम हुआ कि अब यह कविता कोश पर सुलभ है। मेरा अकवि होना, शायद इस दृष्टि से भला हुआ कि कविता कोश पर मुझे अपनी किसी रचना के बजाय ‘‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘‘ होना जरूरी लगा। इसे कविता कोश के लिए उपलब्ध कराने और सामग्री का टंकण करने वाले के रूप में मेरा नाम भी दर्ज हो गया, मेरे लिए यह अपनी रचना के वहां होने से कहीं अधिक बड़ा सम्मान है।

इस क्रम में ध्यान गया कि तिथि-तथ्यों को लेकर सावधानी नहीं बरती गई है, तिथियों के आधार-कारण-तर्क नहीं बताए गए हैं और अन्य वक्तव्यों-स्थापनाओं पर टिप्पणी करने से बचा गया है, बल्कि बहुधा उल्लेख भी नहीं किया गया है। इसलिए आवश्यक उद्धरणों के साथ उन पर टिप्पणियों की भी आवश्यकता जान पड़ी, जिससे यह पोस्ट बनी। इसमें विशेषकर उन बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाने का प्रयास है, जिन जानकारियों-तथ्यों पर समीक्षात्मक दृष्टि की बातों का, अब तक मेरी नजर में आए लेखों और शोध में भी अभाव दिखा। जैसा उपर उल्लेख है, फिर भी कई ऐसे बिंदु रह गए हैं, जिन पर जांच-खोज होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ी दानलीला संबंधी जानकारियों और तथ्यों के माध्यम से हम अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा के सम्मान को पुष्ट कर आत्म-गौरव का एक ठोस आधार पा सकें, आशा है, अपेक्षा रहेगी। दूसरे और तीसरे संस्करण की साफ्ट कापी और यहां उल्लिखित प्रकाशनों की प्रति मेरे पास उपलब्ध है, जिसे साझा करने को सदैव सहर्ष तैयार हूं।

आभार सहित उल्लेखनीय कि जानकारियां जुटाने में श्री आशीष सिंह, डॉ. सुधीर शर्मा और श्री ललित मिश्रा का सहयोग मिला तथा संवत वाले दोहे के अन्यान्य आशय की रोचक चर्चा और समझने में कई परिचित अपनी राय सहित शामिल हुए।

Tuesday, June 23, 2020

पवन ऐसा डोलै


सन 2018 में छपी पुस्तक ‘पवन ऐसा डोलै...‘ 1953 में जन्मे राकेश तिवारी का संस्मरण है, जिसमें हिसाब-किताब उनके बीस बरस की उम्र से आरंभ होता है। पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ते 2010 तक पहुंचता है। यों किस्सा, लेकिन तिथिवार है तो कह लें इतिहास, यानि किस्सानुमा इतिहास या इतिहासनुमा किस्सा। वे कहते हैं- ‘‘एक जिन्दगी में पैंतीस बरस कम नहीं होते।‘‘ फिर ‘‘डगर, कु-डगर, बे-डगर डोलने-भटकने ... क्या पाने चले, किस दिशा में, क्या पाये, कहाँ पहुँचेंगे, क्या चाहा, नियति कहाँ ले आयी, अब किधर ले जाएगी? हर्ष-राग-विषाद के एक गुम्फन से निकलते दूजे में उलझ जाते।‘‘ और आगे यह भी कि ‘‘मासूम उमर भटकते-सॅंभलते फिसल गई। रुपहली रातों में प्रणय और रोमांच के धागे बुनने, बिखरने, सरझने के किस्से साझा करने के दिन उड़ते गये।‘‘ उस हिन्दुस्तानी संस्कृति में सराबोर, मानते हैं कि जिसका हिसाब चित्रगुप्त महराज के पास भी नहीं मिलेगा।

पुरातत्ववेत्ता, पुरातत्वविद जैसे भारी पद-पहचानधारी का काम पुराविद से भी चल जाता है। पुराविद से करीबी देशज शब्द बैठेगा पुरानिक, और कुछ आत्मीय सांचे में ढले तो ‘पुरनिया‘ (पुस्तक में यह शब्द सयानी समझ वाले पुराने-बुजुर्गों के लिए आया है)। तो इस कहानी का लेखक-पात्र, ‘पुरनिया‘ एक स्तर पर अपने सहेजे पैंतीसेक बरस के तरतीबवार लेखे की कहानी कहता है। दूसरे स्तर पर बात क्रमशः सर्वेक्षण से आरंभ होती है, उसका विवरण तैयार किया जाता है, प्रस्ताव बनता है, खुदाई-विश्लेषण और फिर व्याख्या के साथ ज्ञात इतिहास में ‘नयी‘ बात जोड़ते हुए ‘इति‘। यहां एक और स्तर मानव सभ्यता के विकास का है, गुफावासी आदिमानव, खेती-बस्तियां और इन पैंतीस सालों में ही बदल गई दुनिया, मानों सभ्यता के हजारों साल का गुटका संस्करण, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन में सिमट जाए। चुनांचे, इन तीनों स्तरों का ऐसा सधा और संतुलित गुम्फन कि कहीं उलझन नहीं होती। अध्याय और खंड का विभाजन सहज संयोजक बनकर प्रसंग-अंशों को आपस में जोड़ता चलता हैं। खुली निगाह से देखे, खुले मन से सुने को, पूरी तसल्ली से गुन पाता है वही इसे सहेजते, ऐसा दस्तावेज तैयार कर सकता है। यह पुस्तक बेयर ग्रिल्स के थ्रिल्स वाली, पुरनिया की आत्मकथा, सह यात्रा प्रतिवेदन, सह उत्खनन डायरी, सह उत्खनन प्रतिवेदन, और मौज की झूला-चकरी वाला आनंद भी। चित्रित शैलाश्रयों से बाहर आ कर, सभ्यता भी व्यतिक्रमित आगे बढ़ती है।

पुरातत्व वालों को पीठ पीछे और मौका देखकर सामने भी गड़े मुरदे उखाड़ने वाले, कबर खोदने वाले कहा जाता है और उन्हें भूत, जादू-टोना, रहस्य, गुफा, बीजक-खजाना, उत्खनन और कार्बन डेटिंग वाला जाना-माना जाता है। यह पुरनिया लेखक स्वयं को भू-सुंघवा कहता है। यों देखें तो सर्वेयर-एक्सप्लोरर, पुरातत्व के हों, भूगोल, भू-विज्ञान के या नक्शा बनाने वाले सर्वे के भू-सुंघवा ही होते हैं, सूंघते हैं, नाप-जोख कर, गंध पा कर ताड़ लेते हैं और ताड़े हुए तिल को फिर ताड़ बनाने में जुट जाते हैं। लेखक यहां घोड़ा, लोहा, मेगालिथ और आर्य, इन चार ‘आर्य प्रश्नों‘ के इर्दगिर्द घूमता है। साथ चलती है लोरिक चंदा, नल दमयंती, भरथरी और आल्हा उदल गाथाएं, आधुनिक गाथा चंद्रकांता का तो इलाका यह है ही। लोरिकायन मॉरिसस में भी मिल जाती है। फिर गाथाएं जतन से पिरो दी गई हैं, लोकगीत से बेगम अख्तर, कबीर और भिखारी ठाकुर से ग्रियर्सन तक। दंतकथा, लोककथा, पुराण कथाओं के साथ प्राचीन शिलालेख भी।

पूर्वाचार्यों राहुल सांकृत्यायन (वोल्गा से गंगा) और डा. भगवतशरण उपाध्याय (सवेरा-संघर्ष-गर्जन और पुरातत्व का रोमांस) को स्मरण-नमन करते हुए, पुराविदों के आत्मकथात्मक गद्य में ब्रजमोहन व्यास का ‘मेरा कच्चा चिठ्ठा‘, केके मोहम्मद का ‘मैं एक भारतीय‘ का अपना महत्व है। इसी तरह शरद कोकास की लंबी कविता ‘पुरातत्ववेत्ता‘ भी उल्लेखनीय है, लेकिन यह ‘पवन ...‘, निराली बयार है। यह उन पुस्तकों में से है, जिसे पढ़ कर, कुछ कहे बिना मन मचलता रहे, लगे कि कोई सुख चोरी-चोरी पा लिया है, जिसे न बांट पाए तो पाप के भागी। बांट कर पुण्य चाहे न मिले, बांटनवार रंगेगा ही। पुस्तक के बहुतेरे अंश ऐसे हैं, जिन्हें उद्धृत कर ही उसका रस संभव है, बानगी लेते चलें-

वनवासी 
पात्र है गुदरी, उसका हुलिया- ''लम्बी दाढ़ी, झुके बदन, गहरे काले वर्ण और मझोले कद-काठी वाले गुदरी की आवाज में शहद और आग्रह में गहराई, कोठरी छोटी लेकिन दिल बहुतै बड़ा। फटाफट बिछौना बिछाते, तो उनके बाँहों की मछलियाँ फिसलते दिखतीं।'' गुदरी खिस्सा सुनाता है- ''एक ठे कोल इहाँ बाघे से लड़ल रहल।'' और कोल के साहस का बखान इस छोटे से वाक्य में हो जाता है- ''जउने धरती-पानी-बतास पै बघवा पला रहा, ओही पर कोलवौ।'' नामकरण के साथ तथ्य और इतिहास आता है कि- ''एक समय एक बलवान अहीर यहीं टाँगी से एक ठे बाघ मरलस, एही से एके कहल गइल ‘अहिर मरवा‘। ओकरे बाद एक ठे बाघ कइयौ अहिरन के भख लेहलस तो ‘बघ मरवा‘ नाम चला।'' साथ ही परंपरा मजेदार ढंग से बताई गई है- ''कोलिन हारी, तो कोल के साथ गयी, कोल हारा तो कोलिन के गाँव चला।''

वनवासी सभ्यता के प्रति लेखक के भाव देखिए- ‘‘कैसा उल्टा खेल चल रहा है, एक असंतुष्ट, असभ्य व्यवस्था परम संतुष्ट वनवासियों को सभ्य बनाने चली है।‘‘ उनकी जीवन-शैली की खासियत रेखांकित हुआ है- ‘‘बनवासी टपते रह गये। रहे होंगे कभी जंगल-पहाड़ के बेताज बादशाह, उन पर उनका नाम तो लिखा नहीं था। उन्हें तो पता ही कब रहा कि जमीन किसी के नाम लिखी जाती है। जान भी जाते तो क्या करते, खेती-किसानी से ज्यादा वे जंगल-पहाड़ में मस्त विचरने में ही आनंद पाते।‘‘ मगर इसके साथ एक पात्र कह जाता है- ‘‘सामंती और बरतानवी दौर ने इन स्वतंत्र वनवासियों को पैंट-कमीज वालों के सामने जो ये झुकना सिखाया, वह आज के भारत में ज्यादा दिन चलै वाला नहीं।‘‘

लोक-वार्ता
भाषा-अभिव्यक्ति में लोकवार्ता और उसमें लेखक समाए-समोए हैं। जल कुंड की गहराई का नाप है- ‘‘सात माचा की डोरी, ओ सात बरातिन पगहा, ओ थाह नाहीं बा।‘‘ वहीं बनारसी बलम मिर्जापुर क्या गए, कचौड़ी गली सूनी कर गए, लेकिन शिकायत यह कि मिर्जापुर गुलजार किए हैं- ''कचौड़ी गली सून कइला, हो बलमू ऽऽऽ ओ ऽऽ, मिरजापुर गुलजार कइला ऽऽ, हो बलमू ऽऽऽ'' और प्रयोग कि ''बुलेट मोटर साइकिल’ से बढ़कर ‘रॉयल इन फील्ड‘ भला दूसरी कोई सवारी क्या होगी।'' वहीं ‘चउवन गली और बावन बज़ार‘ जैसे शीर्षक में ग्राम नाम व्युत्पत्ति का रोचक हवाला है।

सर्वे के दौरान प्राप्त सूचनाओं का आकर्षण और उनकी टोह लेने की चाहत की अभिव्यक्ति, 'दिल बहक गया' और टटोल आने' की बात, कुछ इस तरह- ''कउवा खोह से लौटानी में ‘गोछरा जंगल‘ में अटक गये कोटारों और नील-गायों को भागते देखकर। वहीं एक गयार के बताने पर दिल बहक गया दक्खिनी कगार की ‘कनछ तर‘ की बड़की मान तक टटोल आने को।'' मच्छरों की खून चूसने की क्रिया को काटना कहना लेखक को नहीं भाया है, वह लिखता है- ‘‘रात भर मच्छरों ने जी भर कर चोभा।‘‘ इसी तरह सजग-सूक्ष्म अवलोकन को समृद्ध भाषा के इस्तेमाल से पेश करने की बानगी- ‘‘पगुराते फेंचकुर फेंकते गाय-गोरू- ऊँट‘‘ और वहीं अगली पंक्तियों में ‘‘पगुराते ऊँटों के हिलते थूथन से झरते झाग।‘‘ और फिर से अनुप्रास सहित ‘‘हारे हुए हैरान कुत्तों की लाल-लाल लार चुआती जीभें बित्ता भर लटक गईं।‘‘ पुस्तक में सहयोगी-मित्रों और विशेषज्ञ-विद्वानों के नाम हैं, लेकिन जहां नाम आवश्यक नहीं, वहां किस अंदाज से बात कही गई है, देखिए- ‘‘किसका नाम लें और किसका छोड़ें- लाल, पाल, वर्मा, गोपाल, देव, जोशी, सिंह, मिश्रा, सिद्दीकी, श्रीवास्तव, बाजपेयी, त्रिपाठी, चतुर्वेदी, मिश्रा, पंत नामांतधारी एक से एक श्रीमंत।‘‘ और नाम से बचते-बचाते- ''तारणहार बनकर अवतरित हुए हमारे नये कैबिनेट मन्त्री जी।'' फिर मंत्री जी के प्रवास को जीवंत किया है, इस तरह- ‘‘और हवा में समायी वी.वी.आई.पी. विजिट की सरसराहट।‘‘

शब्द-सृष्टि
कुछ शब्दों पर चर्चा करते चलें- चारों ओर के लिए शब्द चलता है इर्द-गिर्द या कम प्रचलित है गिर्दागिर्द, लेकिन लेखक ने सहज-सार्थक शब्द गढ़ा है- 'चौगिर्द'। एक शब्द आया है डमरू बाघ, लेखक ने इसका अर्थ ‘बच्चों वाली बाघिन‘ बताया है, किन्तु छत्तीसगढ़ में डमरू या डमरुआ ‘बाघ के बच्चे‘ के लिए प्रयुक्त होता है। यहां एक पुरातात्विक स्थल का नाम डमरू है और यह मात्र संयोग नहीं होगा कि इस गांव के एक तालाब का नाम बघबुड़ा है। एक अभिव्यक्ति है- ‘अपनी कल्पना की ढीली लटाई‘, पतंग के साथ धागा लपेटने की चकरी के लिए के लिए शब्द चलता है, चरखी, घिरनी या परेता। पुस्तक में आया शब्द ‘लटाई‘ इसी का पर्यायवाची है, यहां प्रयोग भी कम मजेदार नहीं कि लटाई से कल्पना का धागा ढील दिया गया है। एक अंश है- ‘‘कुल बीझन अजवैं ना सरझ जाई। फीर, कल्हियाँ बदे का बची? ‘‘ अब इसे मिला कर देखें कृष्ण बलदेव वैद की कुकी और उसके एक प्रसंग से- ‘‘कभी कभी कुकी ऐसा आभास देती दिखाई देती है कि वे मेरी सारी साहित्यिक, मानसिक, सांसारिक आध्यात्मिक गुत्थियों को सुलझा सकती है लेकिन सुलझाती नहीं क्योंकि सोचती है अगर उसने यह कठिन काम कर दिया तो मैं क्या करूँगा।‘‘ अब पता नहीं कि इन दोनों लेखकों ने एक-दूसरे के इन अंशों को देखा या नहीं, मेरे देखने में आया, तो साथ रख दिया है।

एक बारीकी कि ‘‘फूल की थाली में पलाश के पत्ते पर खटाई‘‘। फूल यानि, फूल कांस, कांसे की थाली, जिसका प्रयोग भोजन के लिए प्रतिष्ठित है। (इसी तरह एक अन्य फूल, 'फूल पीतर' यानि पीतल, मुख्यतः अवध अंचल में प्रचलित है।) मिश्र-धातु कांसा, मिश्रण अनुपात के फर्क से ‘मस्केल‘ और ‘नेर‘ भी होता है, जो अन्य बर्तन या घंटी आदि बनाने के काम आता है। फूल कांस में सफेदी और चमक अधिक होती है। कांसे की थाली या बर्तन में दही-मही (मठा) की खटाई तो परोसी जाती है, लेकिन आम, इमली या नीबू की खटाई, कसाने-कसैली पड़ने लगती है, इसलिए फूल की थाली पर सीधे चटनी परोसने के बजाय पलाश का पत्ता इस्तेमाल होता है। इसी तरह 'विजयशाल' कहा गया है, बड़े ढोल जैसे वाद्य को। यह एक नया शब्द मिला। इसे समझने के लिए तुक्का लगाया कि यह बीजासार या बीजाशाल का सुधरा रूप हो। बीजा (छत्तीसगढ़ी एक उच्चारण बिजरा भी) मुख्यतः शाल वनों के बीच ही होता है, शायद इसलिए उसका नाम जोड़ा बना कर ‘बीजा-शाल‘ आता है। आगे, ढोल समूह के वाद्य, यानि ऐसे तालवाद्य, जिन्हें लकड़ी को खोखला कर बनाया जाता है, उनमें कटहल, आम, खम्हार-सिवना (कुरुसमरा), कदम्ब, भिर्रा, गोइंजा (गूंजा?) काठ भी प्रयुक्त होता है। कुछ लोगों की पसंद सिरीस है, किन्तु सबसे उपयुक्त लकड़ी यही यानि बीजा मानी जाती है। धान के भीतर डेढ़-दो महीना डाल देने पर उसकी गरमी से लकड़ी पक जाती है, फिर खोखला करते हुए इसमें दरार नहीं आता। इससे बने ढोल, तबला आदि की ध्वनि मधुर ठनकदार होती है। उसकी आवाज, रात के साथ गहराती, और-और ‘तान‘ होती जाती है।

पुस्तक में आए शब्द और उनकी इस तरह प्रवाहमयी, उन्मुक्त भाषा-अभिव्यक्ति तभी संभव हो सकती है, जब उसमें मन रचा-बसा हो, लिखने वाले को पाठकों की परवाह तो हो, लेकिन दबाव न हो। वही ऐसा ‘स्वान्तःसुखाय‘ रच पाता है जो हमखयाल ‘बहुजन रुचाय‘ हो सकता है। कला-साहित्य का कोई भी रूप हो, उसका अपना और सच्चा सुख तो सृजन-रियाज में ही निहित होता है, प्रदर्शन-आश्रित रचनाकार की संतुष्टि दूसरों, यानि श्रोता-दर्शक-पाठक (और आयोजक-प्रकाशक-वितरक) के पास गिरवी हो जाती है। यह पुस्तक, आत्मनिष्ठ साधक, खुद-मुख्तार रचना-सुखी, ‘सच्चे साहित्यकार‘ की कृति है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के शब्दों में- ‘‘सच्चे साहित्यकारों के लिए जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं।’‘ संक्षेप में, अभिव्यक्ति के गरिष्ठ-बेमेल छौंक के छद्म को सहज उजागर करने वाली, निरस्त कर सकने वाली सुपाच्य ‘कोदो-कुटकी‘ भाषाभिव्यक्ति परोसी गई है इस लेखन में।

पुरनिया निगाह
ऐसी बातें, पुरनिया जिनसे लगातार दो-चार होते रहते हैं, लेखक अपने पेशे पर टिप्पणियों का स्वयं आनंद लेता है- ''हाँ तो गीबड़ों सुनो! क्या कहते हो तुम सब, उहै- क्या कहते हैं तोहरे सब आर्कोलॉजिस्ट बनने चला है। इहै ककरा-पथरा, नरिया-खपरा बीनने चला है। ई कुल कै के जिनगी में कुच्छौ नहीं कर सकत्या। भला माई-बाबू तोके एही बदे पढ़ै भेजले रहलैं। सब झूठ है, फ्राड है। वेस्टर्न कंट्रीज के देखा-देखी इंडोलोजी पढ़ाता है। का करब्या जन ई कुल पढ़-लिखि कै। बहुत बन जाब्या तो मास्टर। औ, मास्टरै बन के का कै लेब्या, मास्टर होए दो जून खाए, लड़िकन के ननियौरे छोड़े जाय।‘‘ पात्र श्रीवास्तव जी से कहलाया गया है- ‘‘भारत में आर्किओलॉजी आयी है अंग्रेजों के साथ, इसलिए उन्होंने यह टर्मिनोलॉजी अंग्रेजी में ईजाद की, जिसे सारी दुनिया में समझा जाता है। वैसे पुरातत्व वाला यही सब ‘जॉरगन‘ बोल कर तो एक्सपर्ट कहलाता है ना, जो अगर सोझै भाषा में बोलब्या तो तोके के भाव देई बबुआ!‘‘ फिर ‘‘पुरान-धुरान गुनने की मेरी चाकरी‘‘ मानते हुए लेखक बताता है कि- ‘‘एम.ए. करके नौकरी की तलाश पूरी होने तक हमारे साथ खाक फाँकने का तजुर्बा हासिल करने के इरादे से आए थे।‘‘ या शोधार्थी के लिए- ‘‘एक अरसे से जवानी खपा रहे‘‘ लेकिन इसके साथ- ‘‘पोथी पढ़ै से जितना नहीं सीखा जाय सकत है ऊ से कहूँ ज्यादा ज्ञान मिलत है घूमै-सुनै ते।‘‘ और फिर ‘‘एक ने मन की बात खुलकर बतायी- ‘गुरु जी। दरजा में बैठ के पढे में कउनौ मजा नहिनी। न कुच्छो देखाय, ना समझै में अमाय। खेते, बने-पहाड़े में घूम-घूम के अइसने पढ़ावल जाय, जैसे आप लोग पढ़ावत हवै, तब ना आयी समझ में।‘‘

सर्वेक्षण में अवलोकन खुली निगाह से होता रहे तो इतिहास का क्रम अपने-आप उजागर होते चलता है, जैसे आदिम शैलाश्रय-गुफाओं की चित्रकला को देखते-देखते लेखक मानों स्वयं उस दौर में पहुंच जाता है- ‘‘नृत्य मूलतः अंतर्मन के आनंद से उद्भूत हुआ। श्यामल मेघों का घिराव देख मयूरो का थिरकना, हरियाले वन-प्रांतर में उल्लसित मृग-छौनों की किल्लोलें, मृगया से छके सिंह-शावकों की मस्त कलाबाजियाँ, विशिष्ट अवसरों पर चिड़ियों की चहकन-फुदकन की तरह किन्हीं अवसरों पर अंदर से उपजे उमंग के ज्वार ने आदिम मानव के अंग-अंग में चपलता भरकर उन्हें बाँहें और पैर फैलाकर, गरदन, कमर और सिर लचका कर नाचने के लिए उद्यत किया होगा। आखेट खेलने चले, तो सफल मृगया की कामना से नाचे, कबीले भर की भूख मिटाने लायक बडा पशु गिरा लिया, तो सफलता की उमंग में नाचे, अलाव पर अहेर भुनने लगा, तो सुस्वाद माँस की लालसा में नाचे। पवन, वर्षा, वन, नदी, गाछ, सूरज और चाँद जो भी पारलौकिक लगता या जिससे हित सधता या जिससे भय खाते, उन सबकी उपासना में नाचते। कमर, कंधे और बाँह में बाँह डाल कर नाचते।‘‘

पुरातत्व
बातों-बातों में प्राचीन स्थापत्य का सहज विवरण आता है- ‘‘नीचे पड़े द्वार-स्तंभ पर अंकित यू जो ऊपर से नीचे तक लपटे नाग बने आंय ना, एहिका कहत हैं नाग-शाखा, इसके अगल-बगल ऊपर से नीचे तक फूलों से सज्जित पुष्प या फुल्ल शाखा, आदमी-औरत के जोड़े वाली मिथुन-शाखा, किंकिणिका-शाखा और पत्तों से ढॅंके घड़े वाली घट-पल्लव शाखा। शाखाओं के नीचे एक बगल मकर पर सवार गंगा जी और दुसरे बगल कछुआ पर सवार जमुना जी, उनके बगल शिव जी के द्वारपाल गण।‘‘ और फिर मंदिर स्थापत्य की चर्चा- ‘‘याकु भिट्टी वाली छ्वाट क्यार जगती-पीठ पर बने एहि मंदिर केरी तलछंद योजना मां चतुरस्र (चौकोर) द्विअंग गर्भगृह और याकु छ्वाट कपिली अथवा अंतराल क्यार प्राविधान आय। औ ऊर्द्धवच्छंद योजना मां सबसे नीचे आय खुर, कुंभ, कलश और कपोत मोल्डिंग वाला बेदीबंध। ओहिके ऊपर बीचो-बीच रथिका से सज्जित तनुक उभरा भवा जंघा भाग। रथिका क्यार स्तंभ सजे आंय घट-पल्लव, कीर्तिमुख, किंकड़िका-घंटी, औ, खल्व औ पत्र-शाखा नामक अभिप्राय सेने। बगल मां नीचे द्याखी, नान्हे-नान्हे शिवलिंग। नीचे-ऊपर जालक-पैटर्न से सजा पट्ट औ ओहिके ऊपर तुला-दंड। फिर, अंतरपत्र के ऊपर शिखर, मानो एक के ऊपर एक शहतीर जस खमसे मोल्ड, एहिका कहा जात है पीढ़ा शिखर, ढाकी साहब नया नाम दिहिन है- फाँसना शिखर।‘‘ और अवसर पा कर जुड़ता है- ‘‘चारों कोनों से अंदर की ओर मुड़ते शिखर वाले (रेखा शिखर) क्रमशः ऊपर की ओर छोटे होते हुए पीढ़ों वाले शिखर (फाँसणा शिखर) और हाथी की पीठ की तरह गोल गजपृष्ठ शिखर वाले (वलभी शिखर)।‘‘

मूर्तियों की चर्चा करते हुए प्रतिमाशास्त्रीय लक्षणों का उल्लेख आता है और ‘‘भाँति-भाँति के केश-विन्यास अलकावलि, भ्रमरक, हनी काम्ब, चूड़ा-पाश, लम्बकेश, वलिभृतवलयक, त्रिशिख आदि आदि।‘‘ विभिन्न आकार-प्रकार विशिष्टता वाले मृदभांड-पॉटरीज- ‘‘एन.बी.पी., ब्लैक-एंड-रेड वेयर, ब्लैक-स्लिप्ड वेयर, पेंटेड ब्लैक-स्लिप्ड‘‘ और मनके-गुरिया- ‘‘एगेट, कारनेलियन, क्वार्ट्ज, चालसीडोनी, क्रिस्टल, जैसपर वगैरह। फिर, हर ढेरी में एक-एक किस्म की गुरियों को सजाया- लॉन्ग बैरेल (लम्बे बेलनाकार), सर्कुलर (गोल), व्हील-शेप्ड (पहिये के आकार के), बाई-कोन (दोनों सिरों पर कोणाकार), तिकोन, हेक्सागोनल (षड्कोणीय), चैकोर, पोलिश्ड, अन-पॉलिश्ड, फिनिश्ड-अनफिनिश्ड (पूर्ण-अपूर्ण), ट्यूब्यूलर (नलीदार), काली-सफेद-भूरी-लाल लहरिया वाले, लाल, सफेद, नीले, भूरे, बहुरंगी। देखते-परखते आँखें जुड़ा जातीं।‘‘

पुरातत्व जैसे क्षेत्र में नई खोज के तकनीकी पक्ष, खबरों के ख्याल से, सामान्य पाठक के लिए किसी रुचि के नहीं माने जाते। सामान्यतः मीडिया ऐसे समाचारों में चौंकाने वाली कोई बात- चमत्कार, दुर्लभ, प्राचीनतम, पहली बार जैसे विशेषण के लिए व्यग्र होता है। ऐसे एक मामले की चर्चा यहां भी है- ‘‘ईस्वी सन और ईसा पूर्व की गफलत से बचाने के लिए हमने अपने प्रेस नोट में 1200 ईसा पूर्व जगह आज से 3200 बरस के आस-पास का लोहा मिलने का जिक्र किया, लेकिन कुछ एक सुधी संपादकों ने उसे संशोधित करके 3200 ईसा पूर्व कर दिया। कहाँ तो हम 1200 ईसा पूर्व बताने में ही झिझक रहे थे और कहाँ 3200 ईसा पूर्व? ऐसे में चरिहूँ लंग से हंगामा बरपने को कौन बरज पाता।‘‘

बदलता जमाना
इतिहास में विचरते को परिवर्तन जिस तरह दिखता है, उसके नमूने- ‘‘उस जमाने तक के आदमी आज यहाँ, कल वहाँ डेरा डालते, फंदा गोफना तीर-कमान से चिरई-अहेर मारते, फल-फूल बटोरते, भूँजते-खाते, नदी-नाला, खोह-कंदरा में घूमते परम स्वतंत्र रहे। इन्हें ‘हंटर-गैदरर स्टेज‘ की सभ्यता के आखिरी पायदान पर चल रहे परम निर्द्वंद्व होमोसेपियन (आधुनिक मानव) माना जाता है। फिर अनाज उपजाने और जानवर पालने की जानकारी पाने के बाद सालो-साल बीज बोने, उगाने, फसल रखाने-काटने-दंवाने, सिरज-संभाल कर रखने, गाय-गोरू चराने और गोठ बना कर रखने के गोरखधंधे में ऐसा उलझे कि अपनी सारी आजादी गँवा कर एक जगह खूंटा गाड़ कर गाँव बसा कर रहने लगे। इस तरह उनकी महीन तकनीकी कारीगरी और ज्ञान की बढ़ोतरी ने जहाँ उन्हें आगे बढ़ाया, वहीं उनके पैरों में बेड़ियाँ भी डाल दीं।‘‘ यह बता कर पात्र अभय के माध्यम से मजेदार निष्कर्ष निकालते हैं- ‘‘मतलब आदमी ने पौधों और पशुओं को पालतू बनाया और उसी प्रक्रिया में स्वयं भी पशुओं और पौधों का पालतू बन गया।‘‘ परिवर्तन को आंकने के लिए हाय तौबा के बजाय सपाटबयानी है कि- ‘‘पवन ऐसी डोलती रेलगाड़ी ने मुनरी, चुटकी, चुनरी, कड़ा और कपड़ा सब दाँव पर लगवा दिया।‘‘ और एक नमूना- ‘‘मसीही स्कूल, अस्पताल, गिरजाघरों का फैलाव- ‘मसीहं शरणं गच्छामि‘ के मंत्रोच्चार के साथ।‘‘

विनम्र दायित्व
लेखक अपनी विनम्रता के साथ, दायित्व और उसकी गरिमा में संतुलन बनाए रखता है, इस तरह ‘‘लोग-बाग बड़का मेटलर्जिस्ट मान कर भासन झारने का बुलउवा भेजने लगे। किसको-किसको बताते- हम चन्द्रगुप्त मौर्य वाला इतिहास-पुराण, पुरवा-पाथर पढ़ने वाले बहल्ला विद्यार्थी रहे, मेटलरजी से हमारा सूँघने भर का भी वास्ता नहीं रहा। लेकिन लाज बचाने के लिए मॅंगनी वाले परिधान पहिर-ओढ़ कर, साथियों की मदद से तैयार प्रेजेंटेशन दिखाने निकल पड़े।‘‘ लेखक अपनी पद-गरिमा के प्रति सजग है- ‘‘तब कितनी फजीहत होगी, अपनी तो खैर बिसात ही क्या, ओहदे की ज्यादा होगी।‘‘ (इस पुस्तक के लेखक श्री राकेश तिवारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यानि सर्वोच्च पद पर आसीन रहे हैं।) लेखक की जिम्मेदार संतुलित वैज्ञानिक दृष्टि प्रकट होती है- ‘‘किसी नई प्रविधि के ईजाद होने का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक के लिए नपे-तुले तुक्के पर तुक्के ही चलेंगे।‘ और ''यह बताना भी कितना जरूरी है कि रिसर्च और न्याय के मसलों में सिक्के के दोनों पहलू ठीक से देख लिए जाएं।'' संरक्षण-विरूपण पर तटस्थ टिप्पणी का असर महसूस कर सकते हैं- ‘‘एक दृश्यांकन में... दूसरी ओर एक मगरमच्छ को घेर कर मारने का दृश्य। चित्रों के ऊपर कोलतार से लिखे चिरुई गाँव के रहने वाले ‘रामधनी‘ का नाम।‘‘ और मानों निचोड़ आता है- ‘‘इस मामले में एक बात ध्यान से सुनने और गॅंठिया लेने वाली भी है कि दर्शन-दिग्दर्शन की भावना के साथ यह सब किया जाय। अपनी धरती माँ, पुण्य पावन वन-प्रपात और सांस्कृतिक पहलुओं को बाजार का बिकाऊ माल समझ कर कतई नहीं। उनकी साफ-सफाई, रख-रखाव और अपनी जीविका-अर्जन में समुचित सन्तुलन बना रहना चाहिए वरना सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के सारे अण्डे एक ही बार में पा लेने का नतीजा तो सब केहू जनतै होब्या!‘‘ पुस्तक पर अंत की ओर आगे बढ़ते, साथ छूटने की धड़कन होने लगती है, तब आखिरी वाक्य आता है- ‘‘जिन्दगी रही तो फिर मिलेंगे।‘‘ इससे राहत होती है कि फिर मिलने, ऐसा कुछ और पढ़ने का रास्ता खुला हुआ है।

प्रसंगवश-पुस्तक पढ़ते हुए मन में हिन्दी भाषा-साहित्य और उसकी रवानी, बार-बार आती रही। पुस्तक के खंडों के शीर्षक ऐसे हैं, जिसे पढ़ते ही मुझ से देसी-गंवार का मन ललचा जाए। वैसे हिंदी के साथ कभी गॅंवारी बोली का विशेषण इतिहास-दर्ज है ही। यहां है, पूर्वी हिन्दी, अवधी, बैसवारी, भोजपुरी और उस पर बनारसी ठाट के साथ दृष्टि, अभिव्यक्ति और भाषा का संतुलित-समन्वय। पीछे मुड़कर परंपरा टोह लें तो इंशा अल्लाह खाँ और लखनवी सरशार जैसी यही ठाट-मौज भारतेन्दु और गुलेरी में दिखती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है- ''उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी लेखकों में एक विचित्र प्रकार की जिंदादिली थी'', (वे स्वयं अपने लेखन, खासकर निबंधों में सहज परिहास की आत्मीयता से लालित्य-पुट का अवसर बनाते रहे।) ‘हिन्दी का लोकवृत्त‘ पुस्तक के अनुवादक नीलाभ ने लिखा है- 1920-40 के बीच के काल में ... पत्रिकाएं भी भाषा और साहित्य को दिशा देने में जुटी हुई थीं। वैसी जीवन्तता फिर आगे के दशकों में देखने को नहीं आयी। बाद में हिन्दी साहित्य पर शुद्धता आग्रही अनुशासन-दंड के बहाने आंचलिक भाषा के विशिष्ट और तद्भव शब्दों से परहेज बरतते, छायावादी घनीभूत छाया का असर कि, परिनिष्ठ किताबी भाषा-शैली चल पड़ी और यही लिखने-पढ़ने की आदत बन गई। पिछले दिनों आई डॉ ओम निश्चल की आकर्षक शीर्षक वाली पुस्तक ‘भाषा की खादी‘, जिसमें सोंधी हिंदी-हिंदुस्तानी के बेधड़क देशज रूप को अब फिर सार्थक रेखांकित किया गया है।

भवानी प्रसाद मिश्र ने कवियों के लिए कहा है कि ‘‘लगभग सभी, कुछ बँधे-बँधाये ढंग से कुछ बँधी-बँधाई बातें कहते रहते थे। उन दिनों, उसे ‘छायावाद‘ कहा जाता था।‘‘ यह कमोबेश उस दौर के गद्य की भाषा-अभिव्यक्ति पर भी लागू होती है, जिसमें देसी ढब समानान्तर बना तो रहा, मगर हाशिये पर, बस हाजिर बतौर। रेणु और बिज्जी जैसे कुछेक इससे अलग दिखते रहे। ढर्रे वाली साहित्य-दृष्टि में भाषा, पाठ्यक्रम वाली और वृहत्तर लोक की अभिव्यक्ति दूरबीन से देखते, चलती गाड़ी की खिड़की से झांकते, ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है‘ वाली हो गई। केदारनाथ सिंह के शब्दों में ‘यह एक आधुनिक का/ आदिम प्रवास था/ अपने ही घर में‘ की हालत हो गई। इस व्यथा को रेखांकित करने और उबरने जैसे प्रयास का उदाहरण विद्यानिवास मिश्र का ‘हिन्दी की शब्द-सम्पदा‘ है।

प्रसंगानुकूल, परीक्षण-प्रमाण है कि लगभग 20 साल बेहद लोकप्रिय रही ‘आधुनिक भावबोध, कला संचेतना और नवीनता का प्रतिनिधि मासिक‘ कही जाने वाली ‘ज्ञानोदय‘ जैसी पत्रिका का सन 1970 में अवसान हुआ, तब उसके संपादक लक्ष्मीचन्द्र जैन ने महसूस किया था कि ‘भारतीय जीवन एक नये दशक में, एक नये युग में, प्रवेश कर रहा है। इसके बाद का समय ‘नवनीत‘ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ जैसी पत्रिकाओं और उनके समर्थ संपादकों नारायण दत्त और मनोहर श्याम जोशी का रहा, जो न केवल युगानुकूल सामग्री चयन के लिए सजग और प्रयासरत रहते थे, भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर साहित्य को समृद्ध कर सकने वाली जानी-अनजानी लेखनी के प्रति भी उत्सुक रहते थे।

इसी क्रम में ‘धर्मयुग‘ वाले धर्मवीर भारती यहां सीधे प्रासंगिक हैं। रचना से अन्यथा किसी परिचय, संपर्क के बिना 'गांव-गंवई के लेखक', विवेकी राय छपते रहे, और उन्होंने यथाअवसर स्पष्ट किया कि ''भारती जी व्यक्ति नहीं, रचना को देखते हैं और 'धर्मयुग' नए-नए लेखकों को प्रकाश में लाने का बेजोड़ ऐतिहासिक कार्य कर रहा है।'' इसी तरह 40 साल पहले, जब इन राकेश तिवारी का लेख, अपनी तरह के मौजी-किस्सागो अमृतलाल नागर के माध्यम से भारती जी के पास पहुंचा, ‘खोहों में खोया अतीत‘ शीर्षक से ‘धर्मयुग‘ में छपा और उन्होंने नागर जी से जानना चाहा- ‘यह लड़का है कौन? उससे और लेख लिखाने हैं।‘

और एक बात, भाषा-परंपरा ग्रंथ रामचरितमानस की। तुलसीदास कृत रामचरितमानस, मूल रामकथा वाल्मीकि रामायण की भाषा-टीका है किन्तु आमजन में रामायण का पर्याय यही है। धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित इस ग्रंथ का पाठ-पारायण अध्यात्म लक्षित होता है, लेकिन याद किया जाता है, उद्धृत होता है- प्रकृति, प्रवृत्ति, जीवन-मूल्य और सुभाषित के लिए। रामकथा, राम-रावण की युद्ध कथा है, लेकिन रामचरितमानस, तुलसी के शास्त्र और लोक-मन की मैत्री का भी दस्तावेज है, जिसमें भाव विष्णु, भाषा के उस गरुड़ पर गतिमान हैं, (कुबेरनाथ राय को आत्मसात करते हुए) ‘रथन्तर‘ और ‘वृहत्‘ यानि मार्गी और देशी, जिसके डैने हैं।

मानस-आस्था है कि पारायण के साथ राम शब्द उचार लेने से ही सारा काम बन जाता है, पाप धुल जाते हैं, मुक्ति मिल जाती है, ‘हरि नाम‘, ‘कलिजुग केवल हरि गुन गाहा‘ और ‘एक अधार राम गुन गाना‘ को मिलाते, सरल बनाते हुए ‘कलियुग केवल नाम अधारा‘ चल निकला। फिर भी मानस पाठ-पारायण, सुमिरन के साथ कहीं बसा रह जाता है, चिंतन-मनन में आ जाता है, खासकर तब, जब मिलता-जुलता शब्द-प्रसंग आ जाए। मानस की भाषा में तत्सम-तद्भव का और दृष्टि में लोक-शास्त्र का जैसा सहज समन्वय है, उसके चलते यह भाषा-साहित्य की पाठ्य पुस्तक की तरह चाहे न पढ़ा गया हो, प्रभाव वैसा ही छोड़ता है। विद्वानों ने कहा है कि तुलसी की भारतव्यापी सफलता का रहस्य उनकी भाषा में है। उनकी भाषा में जो ‘तद्भवता‘ है वह अपने पीछे ‘तत्सम‘ भाषिक संस्कृति का बल ले कर खड़ी है। सो, अपने भाषा संस्कारों और स्मृतियों को सहेज रखने की परवाह हो तो मानस पढ़ते रहना चाहिए। ‘इसलिए‘ रामचरितमानस के अभ्यास को लाभकारी मानते, हिंदी-प्रेमियों के लिए मनमौजी स्वच्छंद भाषाई प्रयोग वाली पुस्तकों के क्रम में यह ‘पवन ...‘ स्मृति डोलती रहेगी।

मुझ जैसे थोड़ा पढ़ने-लिखने वाले, अलेखकों के लिए लिखना वैसा ही मेहनत का काम है जैसे कसरत, जो करने की सोचें तो आलस हो, मन न करे, लेकिन करें तो आनंद भी आए। ऐसा आनंद इस पुस्तक के लिए महीने भर बना रहा। अक्सर 'साहित्य', सिद्धहस्तों के लिखे को ही माना जाता है, बोनाफाइड साहित्य-प्रेमी उसे पढ़ते हैं, आह-वाह करने के हकदार वही होते हैं। समीक्षक, उसकी समीक्षा करते हैं। वैसे तो यह टिप्पणी, समीक्षा के खाने में ही जाएगी, लेकिन है शुद्ध पाठकीय आनंद की अभिव्यक्ति के लिए। साहित्य-समाज में भी एक जनजातीय समुदाय है, मुख्य धारा उनके प्रति तटस्थ है और वे भी मुख्य धारा के प्रति उदासीन। यह पुस्तक ऐसे व्यक्ति की रचना है जो साहित्यकार होने के दबाव से मुक्त, बेपरवाह इसलिए उदासीन (न लिखने की व्य‍ग्रता, न छपाने की जल्दी) है, तो 'समीक्षा' की मर्यादा से मुक्त रहते, बस पाठक हो कर इसे लिख लेने के साथ, स्वयं को इस पुस्तक का सबसे उपयुक्त पाठक होने का दावा भी पेश है, इस नीयत से कि काश! मुझे कोई गलत साबित कर दे।

कैफियत, पहली कि पुस्तक के इतने उद्धरण यहां आ गए हैं, कोई चाहे तो बिना पुस्तक पढ़े, इसके बारे में साधिकार सविस्तार बता सकता है। दूसरी, जो पुस्तक न पढ़ पाएंगे, एकदम वंचित न रह जाएं, कम से कम इतना तो पढ़ रखें। तीसरी, जो न पढ़ पाएं हों, पूरी पुस्तक पढ़ने को मचल जाएं और चौथी, जिन्होंने पुस्तक पढ़ी है, उसका आनंद लिया है, उन्हें कुछ अलग, अतिरिक्त भी रस मिले।

इस पुस्तक का नाम पता चला तब एक शीर्षक याद आया था ‘मनपवन की नौका‘। कुबेरनाथ राय की ‘निषाद बांसुरी‘ इसके पहले आ चुकी थी। ‘मन पवन की नौका‘ पर सवार उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के दिक्-काल यात्रा की। इस ‘पवन ...‘ का लेखक, डगमग डोंगी में सशरीर, स्वहस्त चप्पू लेकर सफर कर चुका है। चंचल मन को यह भी याद आता है कि कभी ‘खैरा पीपर कबहुं न डोले‘, सुना तो सोचता था कि पीपर कैसे डोलेगा भैयाजी, अरे! डोलेगा तो पत्ता न डोलेगा, छत्तीसगढ़ी गीत के बोल हैं ‘पीपर पाना डोलत नइए, का हो गे टुरी ल बोलत नइए‘, लड़की का मन इतना कठुआ गया है। राम वनगमन प्रसंग में दशरथ का मन भी पीपर पात सरिस डोला था। पीपल के पत्ते का आकार और डंठल ऐसा होता है कि जब हवा न चल रही हो, अन्य सभी पेड़ के पत्ते थिर हों, तब भी डोलते-मचलते रहते हैं। इसीलिए पीपल को ‘चल-वृक्ष‘, ‘चल-दल‘ अथवा ‘चल-पत्र‘ कहा गया है। शास्त्र-वचनों की व्याख्या में मानव मन को कामना-कर्मरूपी वायु से प्रेरित, पीपल के पत्ते की तरह नित्य चंचल स्वभाव वाला भी कहा गया है। मेरे चलायमान मन को विराम देने के लिए सोचता हूं, कभी लेखक रूबरू हुए तो पूछूंगा कि महराज! पवन तो डोलाता है, खुद थोड़े डोलता है, आपने पवन को ‘ऐसा‘ कैसे डोला दिया।

Sunday, May 24, 2020

त्रिमूर्ति


बिलासा केंवटिन वाले बिलासपुर से अनाम शबरी वाले शिवरीनारायण के रास्ते में है, त्रिमूर्ति तिराहा या शायद चौराहा। पहले यह मस्ताना चौक के नाम से जाना जाता था। यह नाम क्यों रहा होगा, खुद सोचें, बता कर आपके मन की गुदगुदी कम नहीं करना चाहता। इतना जान लें कि मान-शान में मुकाबला हजरजगंज और लोकनाथ से। कितनी दूर और कितना समय लगेगा? सवाल पूछने वालों से यही कहा जा सकता है कि फिर तो आप न ही जाएं वहां। हिसाब-किताब से मुक्त जाएं, तभी आप उस त्रिमूर्ति तक पहुंच पाएंगे। फिर भी क्लू दिया जा सकता है, रिस्दा के बाद लीलागर नदी का पुल, कुटीघाट, मंगल मवेशी बजार का भांठा, शरणार्थी कैम्प और अब प्लांटेशन वाला, फिर दाहिनी ओर कोनार का गढ़ दिखने लगेगा और बाईं ओर दूर वाली चिमनी, बनाहिल पावर प्लांट की और पास वाली रेमंड, लाफार्ज, निरमा वालों का न्यूवोको, नाम बदलता रहा इस सीमेंट फैक्ट्री का। बस, अब तब है त्रिमूर्ति।

यह कहानी इसी त्रिमूर्ति के आसपास गढ़ी-बुनी गई है, रचयिता है समय, लोग और यह भू-खंड। वैसे भी दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास अधिकतर प्रयोजनमूलक होता है, जबकि सच्चा सांस्कृतिक इतिहास लोक स्मृतियों में ही जीवन्त रहता है, जो समूह-अस्मिता को गढ़ता है। तू कहता कागज की लेखी ..., लेकिन यह तो ठीक-ठीक आंखन देखी भी नहीं, कानन सुनी और कुछ मन में गुनी हुई है।

नरियरा-बनाहिल-झलमला, आरसमेटा-कोनार-कोसा, सोनसरी-रिस्दा-डोंडकी, मुड़पार-मलार, भैंसो-नंदेली-व्यासनगर और मुलमुला, जिस गांव में यह त्रिमूर्ति है। आसपास वीरान गांव मस्तुरीडीह, गोंदाडीह, रोझनडीह, तावनडीह, बोहारडीह और इन सब के बीच आबाद है यह गांव मुलमुला। इस इलाके पर कभी रीझ गई थीं अमृता प्रीतम और इनमें से कुछ गांवों का उल्लेख उनकी कहानी ‘लटिया की छोकरी‘, ‘गांजे की कली‘ में आता है। माना जाता है कि जिस अंदाज की छत्तीसगढ़ी इस आसपास बोली जाती है, वैसी मिठास और सौंदर्य और कहीं नहीं। यह खास तौर पर उल्लेखनीय इसलिए कि ऐसा इन गांवों के लोगों को कहते कभी नहीं सुना, मगर ऐसा ज्यादातर वे मानते हैं, जो इस क्षेत्र से दूर-दराज हैं, अड़ोसी-पड़ोसी कहते ही हैं, जिनमें एक अकलतरा निवासी मैं स्वयं भी हूं।

कुछ बातें त्रिमूर्ति की। तय किया गया कि इस मार्ग संगम पर आसपास की विभूतियों की मूर्ति लगेगी। सबसे पहले तीन निर्विवाद नाम आ गए, लेकिन पूरा अंचल प्रतिभाओं की खान है, इसलिए तय करने में देर होने लगी, किसी ने सुझाया कि दो-तीन मंजिला बना दिया जाए, जिससे हर जाति, वर्ग, दल के महापुरुष एकोमोडेट किए जा सकें। इस तरह तीन का तेरह होने लगा। बहरहाल, हल निकला समय के साथ। इन कुछ गांवों लिए कहा जाता है- नार-फांस नरियरा बसै, फंकट बसै कोनार, काट-कूट कोसा बसै, देवता बसै मलार। आज के कवि अधिकतर बिना तुक की कविताएं रचते हैं, बेतुकी? वे अपने शब्दों पर संदेह करते दिखते हैं और अपनी कविता पर खुद ही भरोसा नहीं कर पाते। सहज विश्वासी लोकमन पर पद्य में कही गई बात का भरोसा जल्दी बैठता है और यदि उसमें तुकबंदी भी हो, जो आमतौर पर बिठाई ही गई होती है तो फिर कहने क्या। इस तरह की पद्य-पंक्ति मानो पत्थर की लकीर। इन गांवों के लिए कही गई ये बातें, परिहास-उपहास का आधार बनती हैं तो इन्हीं से महिमामंडन भी किया जाता है। लोकमन अपनी सुविधा से शब्द और पंक्ति जोड़-घटा, बदल लेता है और व्याख्या भी प्रसंगानुकूल कर लेता है।

इन गांवों में से नरियरा, रिस्दा, कोनार और मुलमुला के क्रमशः ‘भैरो, भोला, भुसउ, भान, ते कर मरम न जानय आन‘ अर्थात् इन चार महानुभावों के मर्म को अन्य कोई नहीं जान सकता। कुछ लोग आन के बजाय भगवान जोड़ते हैं, यानि भगवान ही इनका मर्म जान सकता है ’मरम जानय भगवान‘ या वह भी इनका मर्म नहीं जान सकता ‘न जानय भगवान‘। कभी इरादा होता है, चार खंडों का ग्रंथ बना डालूं, लेकिन वह इन महापुरुषों की महिमा का अनुमान लगाने को भी पर्याप्त न होगा, सोच कर रुक जाता हूं। फिलहाल इनमें से भान सिंह जी का एक प्रसंग, ‘मामूली-सा‘। उन्होंने अपनी संतानों का जैसा विवाह संबंध संभव किया था, वह पूरे विश्व में ज्ञात एकमात्र उदाहरण है। उन्होंने अपनी छह संतानों का ऐसा रिश्ता तय किया कि पिता-पुत्र उनके समधी बने। छह विवाह की तीन पिता-पुत्र समधी जोड़ियां। भानसिंह की पुत्री गुलापी देवी और पुत्र जीतसिंह, जिनका विवाह क्रमशः सिंउढ के चिंता सिंह के पुत्र बोधन सिंह (पत्नी गुलापी देवी) से तथा चिंता सिंह के पुत्र गोलन सिंह की पुत्री कुमारी देवी (पति जीत सिंह) से हुआ। इसी तरह भानसिंह के पुत्र रूप सिंह और पुत्र धीर सिंह, जिनका विवाह क्रमशः हरप्रसाद सिंह की पुत्री कनकलता (पति रूपसिंह) से और हरप्रसाद सिंह के पुत्र केशव कुमार सिंह की पुत्री रंजना देवी (पति धीर सिंह) से हुआ। पुनः भानसिंह की पुत्री शकुंतला देवी और पुत्री करुणा देवी, जिनका विवाह क्रमशः कौशल सिंह के पुत्र हरिहर सिंह (पत्नी शकुंतला देवी) से तथा कौशल सिंह के पुत्र विशेसर सिंह के पुत्र बृजराज शरण सिंह (पत्नी करुणा देवी) से हुआ। इस तरह भान सिंह के समधी बने सिंउढ़ ग्राम के पिता-पुत्र चिंता सिंह और गोलन सिंह, अकलतरा के पिता-पुत्र हरप्रसाद सिंह और केशव कुमार सिंह तथा नरियरा के कौशल सिंह और विशेसर सिंह।

इस अंचल की प्रसिद्धि लीला-नाटक और संगीत के लिए भी रही है। नरियरा में गउद वाले रासधारी दादू सिंह, रायगढ़ घराने के कत्थक गुरू कार्तिकराम का डेरा रहता था। अब सन 1939 का ऐतिहासिक 52 वां कांग्रेस अधिवेशन का प्रसंग, जिसमें गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा कर सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए थे। इस अधिवेशन के लिए स्थान चयन में छत्तीसगढ़ की भी दावेदारी थी, किंतु अंततः त्रिपुरी (जबलपुर) का चयन किया गया, किन्तु कर्ता-धर्ता महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति और सेनापति, जीओसी यानि जनरल आफिसर कमांडिंग, छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल यानि अकलतरा वाले बैरिस्टर साहब थे।

इस अधिवेशन की शोभायात्रा उपसमिति के प्रभारी बैरिस्टर साहब के छोटे भाई कुंवर भुवन भास्कर सिंह थे। बताया जाता है कि शोभायात्रा में 52 हाथी थे, जिसमें सबसे आगे, पहले हाथी पर भास्कर सिंह के जुड़वा कुंवर भुवन भूषण सिंह उर्फ नक्की बाबू, गांधी जी की तस्वीर ले कर बैठे थे। इस शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने भेजे थे। नंदेली के पचकौड़ प्रसाद (इन हारमोनियम वादक को बाजा मास्टर नाम दिया था बैरिस्टर साहब ने, क्योंकि उनके पिता का नाम भी यही ‘पचकौड़‘ था।) संगीत उपसमिति के प्रमुख थे, जिनके नेतृत्व में वंदेमातरम गीत और अन्य सांगीतिक प्रस्तुतियां हुई थीं। चर्चा होती है कि इस दल में भिखारी ठाकुर भी थे, लेकिन बोलबाला इस अंचल के संगीतकारों तबला वादक भान सिंह, इसराज वादक सुखसागर सिंह, वायलिन-सितार वादक हजारी सिंह का था।

आगे कुछ बातें सीधे मुलमुला की माटी यानि आदरणीय भाई साहब रमाकांत सिंह जी उर्फ बाबू साहब वल्द जीत सिंह वल्द भान सिंह की कलम से, जस के तस। (यह मूल उनके फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।) बस नाममात्र को कतर-ब्योंत कर, उनकी अनुमति से प्रस्तुत-

मोर गुरु गटारन

हर युग में छला जाता है शिष्य यदि गुरु द्रोण हो। द्वापर में छला गया एकलव्य और कलियुग में सुखसागर। गुरु रामलखन दास जी वैष्णव, बनारस घराना। कण्ठे महाराज के परम और प्रिय शिष्य। वैष्णव जी का शायद प्रेम, झुकाव ज्यादा भान सिंह की ओर। सुखसागर ददा विनोदी स्वभाव संग स्मरण-कुशाग्र थे। वैष्णव जी के कलादान, ज्ञान के अंतिम वर्षों में मुलमुला में भान सिंह को एक शाम कुंआ के पाट पर बैठ तबला वादन की एक अतिरिक्त कला का गुप्त ज्ञान दे रहे थे। गुरु-शिष्य डूब गए थे, गोधूलि बेला में लय-सुर-ताल में।

ढाबों की पंक्तियां, जामुन, बिही, केला, सीताफल और बंधवा तालाब के पार पर अटी पड़ी गटारन झाड़ियां। जैसे-तैसे रात बीती, सुबह रियाज में भिड़ गये। भानसिंह गुनगुनाते हुए तबले पर चलाने लगे उंगलियां। अचानक इसराज पर वही लय-सुर-ताल झंकृत हो उठे। इधर भान सिंह की उंगलियां तबले पर नाचे, उधर इसराज के तार डोल उठे बोल पर बोल।

रामलखन दास जी मगन थे अपनी सिखाई विद्या पर, किन्तु अचानक बिजली सी कौंधी, माथा सन्न सन्न कर गया। अरे सुखसागर! ए धुन ल तैं कहाँ पाये रे? तो ला कोन सिखोइस?, तोर गुरु कोन? सुखसागर ददा बोले- मोर गुरु गटारन। ‘मोर गुरु गटारन‘, बन गई पहेली। वैष्णव जी बोले मैं समझा नहीं, जरा खुलकर बताओ तो। ये धुन, ये ताल मुलमुला में आखिर तुम्हें किसने सिखाया। सुखसागर ददा ने कहा, गुरुदेव आप भान भैया को ये ताल सिखला रहे थे। हां तो, तब मैं गटारन झाड़ी के नीचे दिशा-मैदान में बैठा था। क्या बोले, अरे भाई मैं दिशा फड़ाका में बैठा था। वैष्णव जी बोले मैं तो बहुत देर तक समझाता रहा ये ताल। तो क्या हुआ, मैं भी आखिरी तक सुनता रहा। मैं भूल गया कि मैं नित्य कर्म के लिए बैठा हूँ। धुन और ताल में इतना खो गया कि सब भूल गया। मुझे याद रहे तो बस वो ताल और धुन संग बोल। बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। और मुझे गटारन के नीचे आपके गुप्त ज्ञान की। अनायास सुखसागर ददा का विनोदी चंचल मन बोल उठा, मोर गुरु गटारन। ये कोई किस्सा नही जीवन के जीवंत पल साक्ष्य सहित। उनके हाथों लिखी पांडुलिपि, सुखसागर ददा के छोटे सुपुत्र भूलन सिंह के पास सुरक्षित है।

एक और संस्मरण। भैया क्रान्तिकुमार सिंह की जुबानी। बनारस घराने की सुप्रसिद्ध नर्तकी विद्याधरी, इसने जीवन पर्यन्त पूज्य कण्ठे महाराज की आराधना की। कण्ठे महाराज की मीरा थी विद्याधरी। घुंघरू बंधे तो बस कण्ठे महाराज के तबले की थाप पर और खुल गये तो फिर कभी बंधे ही नहीं। मोह, मौन और संकल्प भंग होता है। कण्ठे महाराज के शिष्य रहे श्री रामलखन दास वैष्णव जी। रामलखन दास जी के शिष्य रहे मुलमुला परिवार में भानसिंह ’तबला‘ और सुखसागर सिंह ’इसराज‘।

बनारस घराना ने बरसों कूटा और मांजा दोनों भाइयों को। रामलखन दास जी जब आश्वस्त हो गए, तब इन्होंने अपने शिष्यों से कहा बबुआ अब गंगा स्नान करेंगे। एक सुघर दिन गंगा स्नान कर गुरु कण्ठे जी को प्रणाम किया। एक संजोग इंतजार में बैठा था। विद्याधरी अपने घुंघरू उतार गुरु कण्ठे जी के पास बैठी थी। गुरु शिष्य का मिलन और वार्ता रहा होगा अलौकिक। रामलखन दास जी ने कण्ठे महाराज से मिलवाया, ये रहे मेरे शिष्य भान सिंह और सुखसागर सिंह। वैष्णव जी अपनी साधना, अपने गुरु को दिखाना चाहते थे। हठी बैरागी वैष्णव अपने शिष्यों को अँखिया चुका था, चूकना मत ये अवसर, आज नहीं तो कभी नहीं। रामलखन दास जी के मन रही होगी गांठ। विद्याधरी नाचे उसके शिष्यों की ताल और थाप पर। कारण भी ईश्वरीय महिमा ही कहें, विद्याधरी ने जब से होश सम्हाला था तो थिरकी थी गुरु कण्ठे जी की थाप पर, घुंघरू खुले तो उसकी थाप पर।

रामलखन दास जी का आदेश और उबलता खून दौड़ पड़ा। वैष्णव जी का आदेश हुआ, घुँघरु बंधे तो गुरु दक्षिणा पूरी हुई समझो, अन्यथा मेरी गंगा समाधि, मेरा हठ या भाग्य मानो। शुरू करो आठ गुना से, फिर करो सोलह गुना। सोलह गुना पर थोड़ा दौड़ाओ और बत्तीस गुना पर नचाओ। ताल और थाप का ऐसा संगम हुआ कि विद्याधरी के हाथ पड़े हर थाप पर, जांघ पर। पैरों में न जाने कब घुंघरू बंधे। कौन जाने कब पैरों ने थिरकना शुरू किया और कब किसके ताल-लय पर, कौन थिरका, थमा। उस संस्मरण की गूंज आज भी थिरकती है कानों में। कण्ठे महाराज को गुरु दक्षिणा मिली वैष्णव जी से। और वैष्णव जी भर पाए गुरु दक्षिणा मुलमुला से। रामलखन दास जी बोले कण्ठे महाराज जी से महाराज जी! ये ससुर हमको मलमल का धोती आउ कुर्ता दिए थे। फिन भुछि दक्षिना नहीं दिए थे न, आज मन गदगदा गया, मिल गया सब्बे कुछउ।