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Sunday, December 30, 2012

छत्तीसगढ़ वास्तु - II

छत्तीसगढ़ में वास्तु कला का स्पष्ट और नियमित इतिहास भव्य कलात्मक देवालयों में झलकता है। पांचवीं-छठी सदी ईस्वी से आरंभ होने वाले इस क्रम की रचनात्मक गतिविधियां क्षेत्रीय विभिन्न राजवंशों से जुड़ी हुई हैं। आरंभिक क्रम में नल, शरभपुरीय और सोम-पाण्डु कुल हैं। राजनैतिक इतिहास के इसी कालक्रम में छत्तीसगढ़ अंचल में वास्तु प्रयोगों का स्वर्णिम युग घटित हुआ है। पत्थर और ईंटों पर ऐसी बारीक-सघन पच्चीकारी उकेरी गई है, उनका ऐसा सुसंहत संयोजन हुआ है कि देखते ही बनता है। वास्तुशास्त्र के निर्देश और प्रतिमा विज्ञान का मूर्तन, धार्मिकता से ओत-प्रोत है तो उसमें स्थापत्य विज्ञान और तकनीक का चमत्कार भी है और इसका संतुलित स्वरूप-आकार ही पूरी दुनिया को आकृष्ट करता है, हमें सिरमौर स्थापित कर देता है।

राजिम के रामचन्द्र मंदिर में प्रयुक्त स्थापत्य खंड और राजीव लोचन मंदिर, छत्तीसगढ़ के आरंभिक वास्तु की झलक युक्त हैं, जो नलवंशी/शरभपुरीय वास्तुकला से संबंधित माने जाते हैं। नल वंश की कला पर भौगोलिक और राजनैतिक कारणों से वाकाटक सम्पर्कों का प्रभाव रहा है। इसी वंश की अन्य स्थापत्य गतिविधियों में बस्तर के गढ़ धनोरा के वैष्णव और शैव मंदिर तथा भोंगापाल के मंदिर और बौद्ध चैत्य हैं। बस्तर तथा उससे संलग्न विशेषकर महाराष्ट्र की सीमा में तथा उड़ीसा और आंध्रप्रदेश की सीमाओं पर भी नल वास्तु के अन्य केन्द्र उद्‌घाटित हो सकते हैं।

शरभपुरीय शासकों के काल की रचनाओं के कुछ अवशेष उड़ीसा की सीमा और रायपुर क्षेत्र से ज्ञात हुए हैं किन्तु इनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र ताला स्थित लगभग छठी सदी ईस्वी के दो मंदिर हैं। मंदिर वास्तु के अपेक्षाकृत सुरक्षित अवशेषों में क्षेत्रीय इतिहास के ये प्राचीनतम उदाहरण हैं। जिठानी और देवरानी नाम से अभिहित इन मंदिरों में देवरानी अधिक सुरक्षित व पूर्वज्ञात है, जबकि जिठानी मंदिर की संरचना कुछ वर्षों पूर्व राज्य शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा कराये गए कार्यों से स्पष्ट हुई और इसी दौरान देवरानी मंदिर के प्रांगण से प्रसिद्ध, बहुचर्चित रूद्रशिव की प्रतिमा प्राप्त हुई, जो अब विश्व विख्‍यात है, लेकिन वास्तु शास्त्र के अध्येताओं के लिए आज भी ताला के मंदिर प्रबल जिज्ञासा और आकर्षण के केन्द्र हैं। डोनाल्ड स्टेड्‌नर, जोना विलियम्स, माइकल माएस्टर जैसे विदेशी अध्येताओं के अतिरिक्त देश के प्राचीन वास्तु के शीर्ष अधिकारी ज्ञाताओं डाक्टर प्रमोदचंद्र, कृष्णदेव और एम.ए. ढाकी ने ताला की वास्तु कला को देखा-परखा और सराहा है। डा. के.के. चक्रवर्ती के शोध का प्रमुख हिस्सा ताला पर केन्द्रित है, जिसमें स्थल की वास्तु कला का सांगोपांग अध्ययन किया गया है।

शिखरविहीन देवरानी मंदिर विस्तृत जगती पर निर्मित है, किंतु गर्भगृह, अन्तराल-मण्डप, अर्द्धमण्डप, सोपानक्रम तथा विभिन्न प्रतिमाओं की विशिष्टता रोचक है। सुदीर्घ वास्तु कला परम्परा से विकसित उच्च प्रतिमान, पूरी संरचना को भव्य आकर्षक बना देता है। दक्षिणाभिमुख विलक्षण जिठानी मंदिर में पूर्व तथा पश्चिम सोपानक्रम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। इस मंदिर का तल विन्यास असमान सतह वाला और स्तंभों से कोष्ठकों में विभक्त है, निश्चय ही ऐसी संरचनाएं स्थानीय शास्त्रीय वास्तु ग्रंथों के निर्देशों का परिणाम हैं। दोनों मंदिर मूलतः विशाल पाषाण खंडों से निर्मित हैं, किंतु संभवतः परवर्ती परिवर्धन में ईंटों का प्रयोग किया गया है। देवरानी मंदिर का पूरा चबूतरा, मूल संरचना के निचले हिस्से को ढंकते हुए ईंट निर्मित कोष्ठकों को पूर कर बनाया गया है।

इसके पश्चात्‌ पाण्डु-सोमवंशी स्थापत्य उदाहरणों की भरमार छत्तीसगढ़ में है, जिनमें मल्हार के देउर मंदिर के अतिरिक्त सभी महत्वपूर्ण सुरक्षित संरचनाएं ईंटों से निर्मित हैं। इस क्रम का आरंभिक चरण सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर है, जो हर्षगुप्त की विधवा महारानी वासटा द्वारा बनवाया गया है। लगभग सातवीं सदी का यह मंदिर, ईंटों पर मूर्त, छत्तीसगढ़ के वास्तु सौन्दर्य का अग्रगण्य उदाहरण है। बारीक नक्काशी, चैत्य गवाक्ष अलंकरण, कीर्तिमुख आदि मंगल लक्षणों के साथ तीनों दिशाओं में उकेरे गए कूट गवाक्ष सिद्धहस्त कारीगरों की प्रतिभा के प्रमाण हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार, पाषाण निर्मित है और सामने का भाग स्तंभों पर आधारित मण्डप था, जो मंदिर संरक्षण के पूर्व ही मलबे का ढेर बन चुका था।

मल्हार का पश्चिमाभिमुख देउर महत्वपूर्ण और विशाल है, जिसके वास्तु विन्यास में ताला के स्थापत्य की स्मृति सुरक्षित जान पड़ती है। यहां गर्भगृह, अन्तराल-मण्डप तथा अर्द्धमण्डप की भित्तियां कुछ ऊंचाई तक सुरक्षित हैं, लेकिन मंदिर शिखर विहीन है। गर्भगृह में लिंग पीठिका अवशिष्ट है। मंदिर की वाह्य भित्तियों में आरंभिक दक्षिण भारतीय वास्तु शैली का प्रभाव झलकता है। इसके पश्चात्‌ खरौद, पलारी, धोबनी, सिरपुर आदि स्थानों पर विशेष प्रकार के तारकानुकृति योजना पर ईंटों से निर्मित मंदिर हैं। खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर पुनर्संरचित है। इन्दल देउल ऊंची जगती पर पश्चिमाभिमुख निर्मित है और सौंराई या शबरी मंदिर मंडप युक्त है। पलारी का मंदिर अत्यंत सुरक्षित स्थिति में नयनाभिराम रूप में है और धोबनी के मंदिर का अग्रभाग क्षतिग्रस्त है। इसी प्रकार सिरपुर का राम मंदिर व कुछ अन्य अवशेष तारकानुकृति ईंट निर्मित संरचनाएं हैं। सिरपुर उत्खनन से उद्‌घाटित आनंदप्रभकुटी विहार और स्वस्तिक विहार साम्प्रदायिक समन्वय और सहजीवन की तत्कालीन भावना को तो उजागर करते ही हैं, छत्तीसगढ़ में मंदिर-इतर वास्तु प्रयोगों के भी उदाहरण हैं। अड़भार के ध्वस्त मंदिर की भू-योजना व अवशेष ही प्राप्त हैं, किन्तु यहां अष्टकोणीय योजना व दोहरा प्रवेश द्वार, क्षेत्रीय वास्तु विशिष्टता को रेखांकित करता है।

रायगढ़ के देउरकोना और पुजारीपाली में तथा सरगुजा अंचल के मुख्‍यतः डीपाडीह, बेलसर, सतमहला, भदवाही आदि स्थानों में भी तत्कालीन स्थापत्य उदाहरण मंदिर व मठ प्रकाश में आए हैं। देउरकोना का मंदिर पाषाण निर्मित है, किन्तु इसका दृश्य प्रभाव ईंटों की संरचना जैसा है। इस मंदिर में कालगत सभी विशेषताओं का दिग्दर्शन होता है। पुजारीपाली के अधिकांश अवशेष काल प्रभाव से नष्टप्राय हैं, किन्तु यहां भी तत्कालीन वास्तु शैली में ईंटों की संरचनाओं के प्रमाण सुरक्षित हैं। डीपाडीह में अधिकांश मंदिर परवर्तीकालीन हैं, किन्तु समकालीन स्मारकों में उरांव टोला का शिव मंदिर महत्वपूर्ण है। यह मंदिर भी विशिष्ट कोसलीय शैली का तारकानुकृति योजना पर निर्मित मंदिर है, जिसके समक्ष विशाल मण्डप के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। बेलसर का मुख्‍य मंदिर, देवटिकरा के देवगढ़ का मंदिर समूह व छेरका देउल, भदवाही स्थित सतमहला के मंदिरों में तत्कालीन ईंट-पाषाण मिश्रित प्रयोग, तारकानुकृति योजना और वास्तु कला साधना की पुष्ट परम्परा के दर्शन होते हैं।

इसके पश्चात्‌ का कालखंड लगभग ग्यारहवीं सदी ईस्वी से तेरहवीं सदी ईस्वी का है। इस काल में रायपुर-बिलासपुर में प्रमुखतः कलचुरि, दुर्ग-राजनांदगांव में फणिनाग, बस्तर में छिन्दक नाग, कांकेर के परवर्ती सोमवंश और रायगढ़ अंचल में कलचुरि-कलिंग सोम मिश्रित राजवंशों की वास्तु गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विस्तृत क्षेत्र रत्नपुर के कलचुरियों के अधीन रहा। कलचुरियों की रत्नपुर शाखा की वास्तु कला का प्रभाव शहडोल जिले के सीमावर्ती और अन्दरूनी हिस्सों के कुछ स्थलों तक दृष्टिगोचर होता है।

रत्नपुर कलचुरि शाखा का आरंभिक सुरक्षित उदाहरण तुमान से ज्ञात हुआ है। मूलतः तुम्माण संज्ञा वाला यह स्थल, रत्नपुर कलचुरियों की आरंभिक राजधानी भी था। यहां मुख्‍य मंदिर पश्चिमाभिमुख तथा शिव को समर्पित है। भू सतह पर आधारित संरचना-मूल से उन्नत विशाल मण्डप संलग्न है। खुले मण्डप में पहुंचने के लिए पश्चिम, उत्तर व दक्षिण तीन दिशाओं में सोपान व्यवस्था है। इस स्थापत्य विशिष्टता में उड़ीसा शैली के जगमोहन का साम्य दृष्टिगत होता है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार शाखों पर विष्णु के दशावतारों का अंकन रोचक और विशिष्ट है।

पाली का पूर्वाभिमुख महादेव मंदिर मूलतः बाणवंशी शासक मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा निर्मित कराए जाने की सूचना प्रवेश के सिरदल पर अभिलिखित है। जाजल्लदेव प्रथम के काल में मंदिर का कलचुरि शैली में पुनरुद्धार हुआ। जांजगीर का शिखर विहीन विष्णु मंदिर विशाल व ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर की अवशिष्ट मूल जगती पर आदमकद प्रतिमाएं व शास्त्रीय मान की अलंकरण योजना अनूठी और अपने प्रकार का एकमात्र उदाहरण है। इस चतुरंग-सप्तरथ मंदिर का मंडप वर्तमान में नहीं है। उत्सेध में भिट्‌ट, पीठ, जंघा, वरंडिका और शिखर मूल और शिखर शीर्ष का निचला भाग ही अवशिष्ट है। यह मंदिर कलचुरि वास्तु कला का सर्वाधिक विकसित और उन्नत उदाहरण है।

महानदी के दाहिने तट पर स्थित नारायणपुर के दो मंदिरों में जांजगीर के आस-पास स्थित विष्‍णु मंदिर और शिव मंदिर की साम्‍यता है। पूर्वाभिमुख मुख्‍य मंदिर विष्‍णु का है, किन्‍तु इसके गर्भगृह में मूल प्रतिमा नहीं है। प्रवेश द्वार पर शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर की भांति विष्‍णु के 24 स्‍वरूप हैं। ऐसा अंकन जांजगीर के विष्‍णु मंदिर की वाह्य भित्ति पर है। इस मंदिर की जंघा पर पश्चिम में नृसिंह व बुद्ध, उत्‍तर में वामन व कल्कि तथा दक्षिण में वराह व बलराम प्रतिमा है। साथ ही कृष्‍ण लीला के पूतना वध और धेनुकासुर वध के अतिरिक्‍त मिथुन प्रतिमाएं भी हैं। इसके साथ की संरचना जांजगीर के शिव मंदिर तुल्‍य छोटी व सादी, पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर है, जिसके प्रवेश द्वार पर द्वादश आदित्‍य का अभिकल्‍प है।

मल्हार का स्थानीय प्रचलित पातालेश्वर नामक मंदिर, यहां प्राप्त अभिलेख के आधार पर बारहवीं सदी ईस्वी का केदारेश्वर मंदिर, पश्चिमाभिमुख तथा निम्नतलीय गर्भगृह वाला है, किन्तु मंडप की योजना तुमान के सदृश्य है, जिसमें तीन दिशाओं से प्रवेश किया जा सकता है। गर्भगृह में काले पत्थर की लिंगपीठिका के त्रिकोणीय विवर में लिंग स्थापना है। आरंग का भाण्ड देउल जगती पर निर्मित भूमिज शैली का, तारकानुकृति योजना वाला जैन मंदिर है।

सरगुजा के त्रिपुरी कलचुरि काल के वास्तु अवशेष मुख्‍यतः डीपाडीह और महेशपुर से प्राप्त हुए हैं, जिनमें मध्ययुग के आरंभिक चरण की पुष्टता और सफाई दिखाई देती है। बस्तर में छिंदक नागवंशियों का केन्द्र बारसूर रहा, जहां विशाल गणेश प्रतिमाएं एवं चन्द्रादित्य, मामा-भांजा, बत्तीसा, बारा खंभा मंदिर तथा पेदम्मा गुड़ी महत्वपूर्ण स्मारक हैं। इस वास्तु शैली में सेउण देश, परमार और काकतीय वास्तु का साम्य दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार नारायणपाल, ढोंडरेपाल और छिन्दगांव के मंदिर भी उल्लेखनीय हैं, जबकि दन्तेवाड़ा, बस्तर गांव और गुमड़पाल के मंदिर स्पष्टतः द्रविड़ शैली के और काकतीयों से संबंधित माने जा सकते हैं।

कवर्धा के निकट भोरमदेव मंदिर स्पष्टतः भूमिज शैली का फणिनाग वंश से संबंधित अपने प्रकार का सर्वोत्कृष्ट नमूना है, यह परिसर और निकटस्थ क्षेत्र इस वंश के सुदीर्घकालीन गतिविधियों का केन्द्र रहा। ग्राम चौरा स्थित मड़वा महल और छेरकी महल तथा आसपास ही गण्डई, सिली-पचराही, बिरखा-घटियारी, देवरबिजा, धमधा और अन्य स्‍मारक-अवशेष देव बलौदा तक फैले हैं। कांकेर सोमवंश से संबंधित दुधावा बांध के डूब में आया देवखूंट शिव मंदिर, सिहावा का कर्णेश्वर मंदिर तथा रिसेवाड़ा और देवडोंगर के स्थापत्य अवशेष उल्लेखनीय प्रतिनिधि स्मारक हैं।

किरारी गोढ़ी, गनियारी, नगपुरा, शिवरीनारायण आदि स्थानों में भी समकालीन वास्तु कला के महत्वचूर्ण उदाहरण शेष हैं। कुटेसर नगोई, पंडरिया, भाटीकुड़ा, वीरतराई, कनकी आदि स्थानों में भी स्फुट अवशेष प्राप्त होते हैं। वास्तु कला के परवर्ती उदाहरण सरगांव, बेलपान, रतनपुर, चैतुरगढ़, डमरू, मदनपुर, चन्दखुरी, सहसपुर, आमदी-पलारी, खल्‍लारी आदि स्थलों के स्मारकों और अवशेषों में दृष्टिगोचर होता है। छत्तीसगढ़ में इस क्रम का परवर्ती चरण मराठाकाल में घटित हुआ, जिसके महत्वपूर्ण उदाहरण रतनपुर का कंठी देउल, रामटेकरी मंदिर और रायपुर का दूधाधारी मंदिर है।

छत्तीसगढ़ का विस्तृत उपजाऊ मैदानी क्षेत्र लगभग चारों ओर से पहाड़ियों, नदियों से घिरकर प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित देश का मध्यस्थ हिस्सा है, इसलिए विभिन्न राजवंशों का कालक्रम में स्थायित्व व निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रभाव संचार लगातार बना रहा, इसलिए इस क्षेत्र में राष्ट्रीय धारा के मूल तत्वों का प्रतिबिम्ब तो दिखाई देता ही है, अपनी मौलिकता और विशिष्टता भी सुरक्षित रही है, यही प्रवृत्ति छत्तीसगढ़ के वास्तु कला के विकसित होते, विभिन्न चरणों में देखी जा सकती है और सामान्य धारा की अनुभव सम्पन्न विशेषताओं में क्षेत्रीय और स्थानीय विचारधारा के साथ प्रयोगों का रंग घोलकर, परिणाम में हमारे समक्ष वास्तु कला का भव्य और चमत्कारिक किन्तु आकर्षक और आत्मीय प्रमाण, आज भी विद्यमान है।

(तस्वीर, एक भी नहीं, यह सब तो यहां आ कर और मौके पर जा कर देखें.)

लगभग 15 वर्ष पहले लिए गए मेरे नोट्स पर आधारित लेख का उत्तरार्द्ध, जिसका पूर्वार्द्ध यहां है.

Monday, December 24, 2012

छत्तीसगढ़ वास्तु - I

अनादि, अनंत, असीम और गूढ़। रहस्यगर्भा सृष्टि में प्रकृति- नदी, जंगल और पहाड़, हमारा परिवेश- पूरा दृश्य संसार और जन्मी है मनु की संतान। सृजन की संभावनायुक्त, रचना का बीज जाने कब से पल्लवित-पुष्पित हो रहा है। विचारशील मानव की इसी सृजनात्मकता ने अपनी सहोदरा दृश्‍य-प्रकृति की पृष्ठभूमि के साथ पूरी दुनिया में रचे-गढ़े हैं अपनी विरासत के निशान। अजूबे और विचित्र, कभी कलात्मक तो कभी कल्पनातीत। आदिमानव-पूर्वजों की यही अवशिष्ट वसीयत आज विरासत है, धरोहर है, मनु-संतान की सम्पन्नता है।

हमारे पूर्वज- आदि मानव ने यही कोई चालीस-पचास हजार साल पहले अपने निवास के लिए, प्रकृति के विस्तृत अंक में सुरक्षित और निजी कोष्ठ की तलाश की। पेड़ों पर, पेड़ के नीचे तलहटी में रात बिताने-सुस्ताने वाले मानव को पहाड़ियों की कोख-कन्दरा अत्यंत अनुकूल प्रतीत हुई, और मौसम की भिन्नता से बच कर, सुरक्षित निवास और परिग्रह केन्द्र की पहचान बन कर उसके लिए पहाड़ी गुफाएं अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी साबित होने लगीं, हजारों साल तक यही गुफाएं आखेटजीवी मानव का निवास बनी रहीं। मानव चेतना में वास्तु अथवा स्थापत्य का अभिकल्प, इसी रूप में पूरी दृढ़ता से अंकित है।

कृषिजीवी और पशुपालक मानव पहाड़ी-तलहटी से उतर कर मैदान की ओर बढ़ने लगा, तब उसे वापस अपने निवास- गुफाओं तक लौट कर जाना और पुनः जीवनचर्या के लिए मैदान में आना निरर्थक प्रतीत हुआ, इसीलिए तब आवश्यकता हुई मैदान पर ही अपने निवास रचने-गढ़ने की। आरंभ में लकड़ी, घास-फूस, पत्थर, मिट्‌टी प्राकृतिक रूप से प्राप्त सहज उपादानों का उपयोग कर उसने वास्तु-आवास की नींव रखी। कन्दरावासी मानव के आरंभिक मैदानी आवास, गुफाओं से मिलते-जुलते सामान्य प्रकोष्ठ रहे होंगे। वर्तमान में भी इसी आदिम शैली में जीवन निर्वाह करने वाली 'सबरिया' जाति के कुन्दरा में प्राकृतिक पहाड़ी कन्दरा की स्मृति विद्यमान है।

आरंभिक वास्तु परम्परा के स्फुट प्रमाण ही हमारे देश में उपलब्ध हैं, किन्तु इसका उत्स हड़प्पायुगीन सभ्यता में देखने को मिलता है, जहां व्यवस्थित नगर-विन्यास में ईंटों से निर्मित पक्की बहुमंजिली इमारतें, चौड़ी समकोण पर काटती सड़कें, स्नानागार, अन्नागार का सम्पूर्ण विकसित वास्तुशास्त्रीय उदाहरण- अवशेष प्रकाशित हुआ है। वैदिक ग्रंथों में ज्यामितीय नियमों के साथ देवालयों, प्रासादों का उल्लेख तो आता है, किन्तु इस काल में सभ्यता का व्यतिक्रम है, फलस्वरूप विकसित नगरीय सभ्यता के स्थान पर अपेक्षाकृत अस्थायी वास्तु संरचनाओं वाली सामूहिक निवास की ग्रामीण रीति की सभ्यता का अनुमान होता है।

तत्पश्चात्‌ लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व भारतीय मनीषियों ने वास्तुशास्त्र के अधिभौतिक और भौतिक सिद्धांतों पर सूक्ष्मता से गूढ़ विचार कर रचनाएं आरंभ कर दी थीं फलस्वरूप वैदिक साहित्य की पृष्ठभूमि पर पुराण, आगम, तंत्र, प्रतिष्ठा ग्रंथ, ज्योतिष और नीति ग्रंथों के प्रणयन में वास्तु कला संबंधी निर्देश विस्तार से मिलते हैं। साथ ही अपराजितपृच्‍छा, भुवन प्रदीप, मानसार, मानसोल्लास, मयमत, रूपमण्डन, समरांगण सूत्रधार, शिल्पशास्त्र, वास्तुपुरुष विधान, वास्तु शास्त्र, विश्वकर्मा विद्या प्रकाश आदि चौबीस प्रमुख शुद्ध वास्तुशास्त्रीय ग्रंथों का प्रणयन हुआ। इसके अतिरिक्त सैकड़ों अन्य महत्वपूर्ण तथा क्षेत्रीय ग्रंथ हैं। इस काल में वास्तु प्रयोगों और उदाहरणों की उपलब्ध जानकारी में अधिकांश स्मारक रचनाएं हैं, जिनमें स्तंभ या लाट और स्तूप प्रमुख हैं।

ईस्वी सन्‌ के पूर्व और पश्चात्‌ के लगभग दो सौ साल, भारतीय इतिहास का अंधकार युग है और इसी काल तारतम्य में संरचनात्मक के बजाय शिलोत्खात वास्तु प्रयोगों के उदाहरण मुख्‍यतः ज्ञात हैं, जिनमें चैत्य, गुहा, विहार की प्रधानता है। वास्तु-शिल्प विकास की वास्तविक प्रक्रिया का नियमित आरंभ, स्वर्ण युग- गुप्त काल में हुआ, जब वैचारिक धरातल पर अत्यंत सुलझे और प्रयोग के स्तर पर व्यवस्थित व सुगठित वास्तु प्रयोगों के परिणाम दिखने लगे, तबसे वस्तुतः वास्तु कला का इतिहास, मंदिरों के निर्माण का ही इतिहास है, जो मध्ययुग तक लगातार विकसित होता रहा।

छत्तीसगढ़ में भी वास्तु कला के स्फुट अवशेष लगभग सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी पूर्व के हैं, जिनमें मल्हार उत्खनन से उद्‌घाटित संरचनाएं हैं। संभवतः राजिम और आरंग के अवशेष भी इसके समकालीन हैं। इसके पश्चात्‌ छत्तीसगढ़ की विशिष्टता मृत्तिका दुर्ग यानि मिट्‌टी के परकोटे वाले गढ़ हैं, किन्तु इन गढ़ों का विस्तृत और गहन अध्ययन अब तक न होने से तथा वैज्ञानिक रीति से उत्खनन के अभाव में इनके कालगत महत्व को प्रामाणिक रूप से स्थापित नहीं किया जा सका है, तथापि वास्तु कला की दृष्टि से वर्तमान में उपलब्ध अवशेष ही तत्कालीन वास्तु प्रयास और मानवीय श्रम की गाथा गढ़ने के लिए पर्याप्त हैं। छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में ऐसे गढ़ संख्‍या में, छत्तीस से कहीं अधिक हैं, जो विस्तृत उपजाऊ क्षेत्र हैं। इनमें कही विशाल और ऊंचे प्रकार हैं तो कहीं ये प्राकार रहित हैं और कहीं-कहीं दोहरे प्राकार के प्रमाण भी हैं। कहीं ये वृत्ताकार, कहीं चतुर्भुज, कहीं अष्टकोणीय, कहीं दो द्वार वाले कहीं-कहीं आठ द्वार अथवा बारह द्वार वाले भी हैं, प्रसंगवश अड़भार को अष्टद्वार और बाराद्वार को द्वादश द्वार का अपभ्रंश माना जाता है। परिखा अथवा खाई, इन गढ़ों की सामान्य पहचान है, जिनमें खतरनाक जल-जन्तु छोड़े गए होंगे, आज भी ऐसे कई स्थानों की खाई और तालाबों में मगर पाए जाते हैं।

लगभग 15 वर्ष पहले लिए गए मेरे नोट्स पर आधारित लेख का पूर्वार्द्ध, जिसका उत्‍तरार्द्ध यहां है.

Friday, December 14, 2012

बुद्धमय छत्तीसगढ़

सोलहवें नक्षत्र विशाखा के मास में, षोडश कला युक्त चन्द्रमा की तिथि- वैशाख पूर्णिमा; बुद्ध के जन्म के साथ-साथ, सम्बोधि और निर्वाण की तिथि भी मानी गई है। इस तिथि पर आज हम बुद्ध का सामूहिक स्मरण करने के लिये एकत्र हैं। समाप्ति-आसन्न इस शताब्दी की परिस्थितयां, आशा और उल्लास के बदले गहन तिमिर निशा को उन्मुख हैं, तब इस बुद्ध पूर्णिमा की निर्मल, शीतल आभा, प्रेरणा की ऐसी किरण बन सकती है, जिसने पचीस सौ साले पहले भी मानव सम्यता का मार्ग प्रशस्त किया था।

गौतम बुद्ध के लिये एक प्राच्य अध्येता की टीप है- ''यदि उनके मरणोपरान्त, उनके वैश्विक प्रभावों का ही मूल्यांकन किया जाय, तब भी वे निश्चय ही भारत में जन्मे महानतम व्यक्ति थे।'' इस प्रभाव के आंकलन हेतु छत्तीसगढ़ अंचल से प्रकाश में आये पुरावशेष सक्षम हैं, किन्तु इसके पूर्व बुद्ध समग्र के प्रति बट्रेंड रसेल और अल्बर्ट आईन्सटीन के कथन उल्लेखनीय हैं। रसेल के शब्दों में- बुद्धिमता और गुणवत्ता की जिस ऊंचाई पर क्राइस्ट हैं, क्या इतिहास में वहां कोई और है - मुझे बुद्ध को इस दृष्टि से, क्राइस्ट से ऊपर रखना होगा। आइन्सटीन का विचार है कि यदि कोई धर्म आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय स्थापित कर सकता है, तो वह बौद्ध धर्म ही है। यही दृष्टिकोण आज बुद्ध स्मरण की वास्तविक प्रासंगिकता है।

बौद्ध पुरावशेष, विशेषकर बुद्ध प्रतिमाएं, आरंभिक काल में और हीनयान सम्प्रदाय में तो संभव नहीं हुई, किन्तु महायान और वज्रयान से लेकर जेन और नव-बौद्ध तक, जो कहीं न कहीं बुद्ध शिक्षा की मूल परम्परा का ही विकास है, इन सभी ने अपनी रचनात्मकता से भारतीय कला और परंपरा को सम्पन्न बनाया है। इसलिये बौद्ध प्रतिमाएं मात्र कलावशेष न होकर बौद्ध धर्मशास्त्र को भी रूपायित करती है। इनका निर्माण बौद्ध दर्शन और सम्प्रदाय के विचारों पर आधारित और विकसित बौद्ध प्रतिमा शास्त्र के मानदण्डों के अनुरूप हुआ है।

छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा का आरंभ नेपाली परम्परा के एक अपेक्षाकृत परवर्ती ग्रन्थ ''अवदान शतक'' के उल्लेख से किया जाना उपयुक्त होगा, जिसके अनुसार बुद्ध की चरण-धूलि से दक्षिण कोसल अर्थात्‌ वर्तमान छत्तीसगढ़ की भूमि भी पवित्र हुई है। एक अन्य महत्वपूर्ण विवरण प्रसिद्ध चीनी यात्री युवान-च्वांग (व्हेनसांग) का है, जिसने सातवीं सदी ईस्वी में सोलह वर्ष भारत में व्यतीत करते हुये प्रमुख बौद्ध केन्द्रों का भ्रमण किया था। उसने कलिंग (उड़ीसा) होते हुए उत्तर-पश्चिमी दिशा में पहाड़ों और जंगलों के रास्ते किआओ-सा-लो अर्थात्‌ (दक्षिण) कोसल में प्रवेश किया। वह लिखता है कि यहां के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और ऐसे भी लोग हैं जो बौद्ध धर्म को नहीं मानते। आगे विवरण मिलता हे कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता है। उसके आंकड़ों के अनुसार यहां के सौ बौद्ध विहारों में महायान सम्प्रदाय के लगभग दस हजार भिक्षु निवास करते हैं। उसने करीब सत्तर देव मंदिर भी देखे, जिनमें भक्तों की बड़ी भीड़ होती थी। तत्कालीन पुरावशेषों और इतिहास का उल्लेख करते हुये उसका कथन है कि राजधानी की दक्षिण दिशा में एक प्राचीन स्तूप था, जिसे अशोक ने निर्मित कराया था, इस स्थान पर तथागत ने अविश्वासियों को चमत्कार दिखाकर वश में किया था। बाद में इस विहार में नागार्जुन ने निवास किया था, तब इस देश का राजा सातवाहन था। युवान-च्वांग कोसल से आंध्र, कांचीपुरम्‌ की ओर आगे बढ़ा। वैसे तो युवान-च्वांग के कोसल और उसकी राजधानी पर विद्वानों का मतैक्य नहीं है, किन्तु सिरपुर के पुरावशेषों से उसके विवरण का सर्वाधिक साम्य प्रतीत होता है। प्रसंगवश सिरपुर की खुदाई से आठवीं सदी ईस्वी के चीनी शासक काई-युवान के सिक्के की प्राप्ति भी उल्लेखनीय है।
सिरपुर स्‍तूप

लगभग सातवीं सदी ईस्वी के शासक भवदेव रणकेसरी के भांदक (?) शिलालेख में शाक्य मुनि बुद्ध के मंदिर निर्माण की जानकारी है। इसी पाण्डुवंश के प्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के मल्हार ताम्रलेख में बौद्ध संघ को कैलासपुर नामक गांव दान में दिये जाने का उल्लेख है। बालार्जुन के काल में ही बौद्ध विहार, मंदिर और भिक्षुओं का उल्लेख सिरपुर से प्राप्त एक शिलालेख में आया है। युवान-च्वांग का कथन कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता था, शैव धर्मावलम्बी बालार्जुन के अभिलेखों और तत्कालीन निर्माण से मेल खाता है और उसकी धार्मिक उदारता और सहिष्णुता के परिचायक हैं।

कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम के रतनपुर शिलालेख के अनुसार रूद्रशिव स्वयं के व अन्य धर्म सिद्धातों के अतिरिक्त दिग्नाग के प्रामाणिक कार्य का भी ज्ञाता था। पृथ्वीदेव द्वितीय के कोनी शिलालेख प्रशस्ति का रचयिता काशल बौद्ध आगमों का ज्ञाता था। इन उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि बारहवीं सदी ईस्वी तक निश्चय ही छत्तीसगढ़ अंचल में बौद्ध धर्म का अध्ययन व उसका पर्याप्त सम्मान होता था। इसीलिये बौद्ध धर्म का ज्ञान किसी व्यक्ति के गुणों में विशेष रूप से उल्लेख किये जाने योग्य कारक होता था।

बौद्ध स्थापत्य अवशेषों की दृष्टि से अंचल के सिरपुर, मल्हार तथा भोंगापाल (बस्तर, नारायणपुर से 30 किलोमीटर) महत्वपूर्ण स्थल है। सिरपुर में 1954-55 में आरंभ हुई खुदाई से मुख्‍यतः आनंदप्रभकुटी विहार, स्वस्तिक विहार एवं कुछ अन्य बौद्ध विहार अवशेष प्रकाश में आये। आनंदप्रभकुटी विहार में मुख्‍य संरचना के साथ संलग्न पक्के धरातल वाले विशाल प्रांगण के चारों ओर कोठरियों की क्रमहीन पंक्तियां हैं। मुख्‍य संरचना की योजना वर्गाकार है, जिसमें उत्तर की ओर नक्काशीदार तोरण द्वार तथा द्वारपाल, यक्षों की प्रतिमाओं का स्थान निर्धारित है। सभामण्डप सोलह स्तंभ पीठिकायुक्त है। पृष्ठवर्ती कोठरियों की पंक्ति के मध्य भूस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की अतिमानवाकार प्रतिमा स्थापित है।

स्वस्तिक विहार का नामकरण उसकी विशिष्ट आकार की योजना के कारण निर्धारित हुआ। यहां मध्य में खुले आंगन के चारों ओर तीन-तीन कोठरियों की पंक्ति के साथ प्रमुख कक्ष में विशाल आकार की भूस्पर्श बुद्ध प्रतिमा है। दोनों विहारों में बुद्ध के साथ पद्‌मपाणि भी स्थापित हैं, जबकि स्वस्तिक विहार की खुदाई से लाल बलुए पत्थर की हारीति प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी। स्वस्तिक विहार के निकट ही पांच अन्य विहारों के अवशेष भी उद्‌घाटित हुए, जिनमें सामान्यतः खुला आंगन, चारों ओर कोठरियां और मध्य में उपास्य देव की स्थापना के लिये प्रधान कक्ष की योजना होती थी। इनमें से एक विशेष उल्लेखनीय विहार में विशाल मात्रा में कांच एवं सीप की चूड़ियां प्राप्त हुई हैं, जिससे अनुमान होता है कि यह भिक्षुणियों का विहार रहा होगा। इन्हीं विहारों में एक लघु स्फटिक स्तूप, सुनहला वज्र तथा बौद्ध मंत्र लेख युक्त मिट्‌टी की पकी मुहरों के साथ अभिलिखित बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

मल्हार में 1975 से आरंभ हुए उत्खनन के तृतीय काल (ईस्वी 300 से ईस्वी 650 तक) स्तर में शिव मंदिर, आवासीय अवशेषों के साथ वज्रयान सम्प्रदाय का बौद्ध मंदिर और चैत्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मंदिर के बीच ईंट रोड़े का धरातल बनाकर, उस पर पकी ईंटों का फर्श है। यहां हेवज्र की प्रतिमा स्थापित थी। मंदिर की योजना में प्रदक्षिणा पथ, बरामदा और पांच कक्षों का भी प्रावधान है। मल्हार उत्खनन की एक अन्य संरचना के पश्चिमी भाग में अर्द्धवृत्ताकार ऊंचे चबूतरे के संकेत मिले, जिस पर मुख्‍य प्रतिमा स्थापित रही होगी। यहीं चार द्वार स्तंभ, एक बड़े स्तूप संरचना की संभावना और बौद्ध प्रतिमाओं के साथ ही बौद्ध मंत्र अंकित विविध मृण्मुद्राएं तथा स्तूपाकार स्फटिक खंड भी प्राप्त हुआ।

बस्तर में बौद्ध स्थापत्य अवशेषों-स्तूप आदि का अनुमान पूर्व से किया जाता रहा, किन्तु बौद्ध स्थापत्य के पुष्ट प्रमाण 1990 की खुदाई से उजागर हुये। भोंगापाल नामक ग्राम में लगभग पांचवीं-छठी सदी ईस्वी के शैव व शाक्त मंदिरों के साथ एक विशाल आकार (36×34×5.5 मीटर) के टीले से ईंट निर्मित चैत्य के अवशेष प्रकाश में आए, जिस पर पूर्व से ही पद्‌मासन ध्यानी बुद्ध की प्रतिमा अवस्थित थी। अर्द्धवृत्ताकार पृष्ठ वाले सर्वांग चैत्य की योजना में चबूतरा, मंडप, प्रदक्षिणा पथ, गर्भगृह, बरामदे एवं पार्श्वकक्ष है। दुर्गम महाकान्तार की तत्कालीन स्थितियों में नल शासकों के काल में हुए इस चैत्य का निर्माण धार्मिक समन्वय व सद्‌भाव के साथ बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का प्रबल प्रमाण है।

हीनयान की मूर्तिकला में मुख्‍यतः जातक कथाओं, यक्ष-यक्षिणियों और लोक जीवन के दृश्यों के साथ बुद्ध को उनके प्रतीकों, यथा- चक्र, छत्र, बोधिवृक्ष, चरण चिन्ह आदि अंकनों से प्रदर्शित किया गया है, जबकि महायान और वज्रयान की कला के माध्यम से बौद्ध देवकुल के ध्यानी बुद्ध मानुषी बुद्ध, शाक्य मुनि गौतम और बोधिसत्वों के साथ ही बुद्ध और बोधिसत्वों की शक्तियां तारा की अवधारणा और प्रतिमा शास्त्र के अनुरूप प्रतिमाओं का निर्माण आरंभ हुआ। ध्यानी बुद्धों में अमिताभ, अक्षोम्य, वैरोचन, अमोघसिद्धि और रत्नसंभव क्रमशः पांच अधिभौतिक तत्वों संज्ञा, विज्ञान, रूप, संस्कार और वेदना का रूपांकन है। शाक्य मुनि गौतम को मुख्‍यतः ध्यान, भूस्पर्श और धर्मचक्र मुद्रा में प्रदर्शित किया जाता है। बोधिसत्वों में प्रमुख मैत्रेय, पद्मपाणि अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और वज्रपाणि हैं। इनमें मैत्रेय, भावी बोधिसत्व होते हुए भी बोधिसत्व के रूप में मान्य हैं। पद्मपाणि, बोधिसत्वों में प्रधान और दयापूर्ण है। मंजुश्री, बुद्धि को प्रखर कर, मूल और मिथ्या का नाश करने के लिये खड्‌ग धारण करते हैं और अपेक्षाकृत कठोर बोधिसत्व, वज्रपाणि पाप और असत्‌ के शत्रु हैं। तारा के साथ अन्य देवियों, व्यन्तर देवताओं और हिन्दू देवताओं के वज्रयानी स्वरूप की निर्माण परम्परा भी ज्ञात होती है।

छत्तीसगढ़ अंचल से प्राप्त बौद्ध प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिरपुर की धातु प्रतिमाएं हैं। लगभग सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी में सिरपुर धातु प्रतिमा निर्माण का केन्द्र था। यहां प्रतिमाओं को टुकड़ों में अलग-अलग ढालकर जोड़ लिया जाता था इसके वस्त्राभूषण गढ़कर उस पर सोने का मुलम्मा कर, आंखों में चांदी का जड़ाव, बालों में काला रंग, ओंठ पर ताम्बे का रंग चढ़ाकर अंत में असली रत्नों सहित आभूषण से अलंकृत किया जाता था। सिरपुर से लगभग 25 धातु प्रतिमा की दुर्लभ निधि 1939 में अनायास श्रमिकों के हाथ लगी (कहीं कहीं यह संखया 44 और 60 भी बताई गई है), जिसमें से छः मूर्तियां तत्कालीन मालगुजार ने विभिन्न लोगों को भेंट में दे दी। दो प्रतिमाएं मुनि कांतिसागर को प्रदान की गई, उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली तारा की प्रतिमा को मुनि ने भारत विद्या भवन, मुम्बई को सौंप दिया, किन्तु यह प्रतिमा आजकल लास एंजिलिस, अमरीका के काउन्टी म्यूजियम में प्रदर्शित है। इस निधि की ग्यारह प्रतिमाएं रायपुर संग्रहालय में है जिसमें तीन प्रतिमाएं बुद्ध की, चार पद्मपाणि की, एक वज्रपाणि की, दो मंजुश्री की तथा एक तारा की है। इसके साथ ही खुदाई से प्राप्त भूस्पर्श बुद्ध की लघु प्रतिमा कला प्रतिमान की दृष्टि से उच्च कोटि की है। सिरपुर की यह निधि न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि संपूर्ण भारतीय कला की अनुपम निधि है।

सिरपुर से प्राप्त पाषाण बौद्ध प्रतिमाओं में कनिंघम को प्राप्त विशाल प्रतिमा शीर्ष, विहारों से प्राप्त प्रतिमाओं के अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर की भूस्पर्श बुद्ध की लगभग डेढ़ मीटर ऊंची प्रतिमा उल्लेखनीय है। प्रतिमा पार्श्व में पारंपरिक सिंह व्याल के स्थान पर मेष व्याल का अंकन है। प्रतिमा के साथ मोर व सर्प का भी अंकन है अतएव इसकी पहचान अक्षोभ्य से भी की गई है। गंधेश्वर मंदिर की एक अन्य प्रतिमा पर उड़ीसा कला शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है इस प्रतिमा के उष्णीश-शीर्ष पर बौद्ध मंत्र अभिलिखित है। प्रतिमा का सौम्य भाव मुग्ध करने में सक्षम है। रायपुर संग्रहालय में भी सिरपुर से प्राप्त बौद्ध पाषाण प्रतिमाएं सुरक्षित है, जिनमें पद्मपाणि एवं तारा के साथ स्थानक बुद्ध प्रतिमा महत्वपूर्ण है। कमलासन पर स्थित तीनों प्रतिमाएं लय और भंगिमा की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक है, जिसमें कलाकार के सुदीर्घ कलाभ्यास से विकसित उत्कर्ष के सहज दर्शन होते हैं। इसके अतिरिक्त सिरपुर के स्थानीय संग्रह में भी कुछ आकर्षक बौद्ध प्रतिमाएं सुरक्षित हैं।

मल्हार में बुद्ध की भूस्पर्श प्रतिमा, ध्यानी बुद्ध, हेवज्र, पद्मपाणि, तारा तथा विशेष उल्लेखनीय बोधिसत्व प्रतिमा है। इस चतुर्भुजी आसनस्थ प्रतिमा का अलंकरण चक्राकार कुंडल, ग्रैवेयक, कटिबंध, केयूर आदि से किया गया है। प्रतिमा के ऊपरी भाग में विभिन्न मुद्राओं में पांच ध्यानी बुद्ध तथा तारा व मंजुश्री अंकित है। मल्हार स्थानीय संग्रहालय के एक स्तंभ पर बुद्ध के जीवन चरित का अंकन किया गया है। ग्राम के एक निजी भवन में प्रयुक्त, प्राचीन अलंकृत स्तंभ भी उल्लेखनीय है, जिस पर कच्छप और उलूक जातक के कथानकों का दृश्यांकन है। मल्हार से संलग्न ग्राम जैतपुर से विविध बौद्ध प्रतिमाएं ज्ञात हैं। मल्हार के स्थानीय संग्रह तथा ग्राम में विभिन्न स्थानों पर भी बौद्ध प्रतिमाएं देखी जा सकती है। कला शैली के आधार पर यह स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है कि मल्हार सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी से बारहवीं सदी ईस्वी तक बौद्धों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है और यहां हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों का जैन और बौद्ध सम्प्रदाय के साथ सह-अस्तित्व था। तत्कालीन यह वातावरण वर्तमान के लिये प्रेरक होकर अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल के अन्य स्थलों, यथा-हथगढ़ा (रायगढ़), राजिम, आरंग, तुरतुरिया आदि से भी महत्वपूर्ण बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। एक विशेष प्रतिमा खैरागढ़ विश्वविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षित है। इस मानवाकार बुद्ध प्रतिमा के परिकर में बुद्ध के जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा परिनिर्वाण का दृश्यांकन है। रतनपुर से प्राप्त बुद्ध की भूस्पर्श मुद्रा की एक प्रतिमा, बिलासपुर संग्रहालय के संग्रह में है। छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों के साथ अंचल की परम्परा का संक्षिप्त उल्लेख समीचीन होगा। जिला गजेटियर की सूचना के अनुसार तुरतुरिया में बौद्ध भिक्षुणियों का मठ था। सरगुजा के मैनपाट की आधुनिक संरचनाओं में विद्यमान वहां के धार्मिक वातावरण को आत्मसात करते ही बौद्ध धर्म की काल निरपेक्ष पवित्रता का आभास सहज सुलभ हो जाता है और अन्ततः बिलासपुर में भी वार्ड क्रमांक 33 में एक आधुनिक किन्तु उपेक्षित मंदिर है, जहां बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है।

बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा करते हुए यह स्वाभाविक स्मरण होता है कि इस भूमि से प्रारंभ और विकसित यह धर्म देश में पुरावशेषों के अनुपात में अत्यल्प अवशिष्ट रह गया था। 1951 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 2487 बौद्ध मतावलम्बी थे, किन्तु 1961 की जनगणना में बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्‍या 32,50,227 हो गई। निश्चय ही यह बौद्ध धर्म के पुनरूद्धार का दौर है। आज के इस वक्तव्य को रंजीत होसकोटे के उद्धरण से विराम देता हूं। धर्म-दर्शन विषय के टीकाकार होसकोटे ने हाल के वर्षों में बौद्ध धर्म के नैतिक एवं राजनैतिक पक्षों पर भारत के दलित वर्ग के विशेष संदर्भ में व्यापक कार्य किया है। होसकोटे का बुद्धवचन का निरूपण है- ''बुद्ध के लिये आनंद हमसे घृणा करने वालों से घृणा करने में नहीं अपितु ऐसी भावनाओं से दूषित होने के नकार में है- जो घातक सोच के दबाव से मुक्ति है।''

सम्यक विचार मंच, बिलासपुर द्वारा बुद्ध जयंती दिनांक 30 अप्रैल 1999 को ''अतीत-वर्तमान'' श्रृंखलान्तर्गत प्रेस क्लब बिलासपुर में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुत मेरा आलेख। यह व्याख्‍यान, आधार वक्तव्य बन गया और इसके बाद बौद्ध परम्परा पर लंबी चर्चा हुई थी, जिसमें भाग लेने वाले चित्र में दिखाई दे रहे हैं- आयोजक सर्वश्री कपूर वासनिक, राजेश तिवारी, डा. चन्द्रशेखर रहालकर, आनंद मिश्र, नंद कश्यप, प्रदीप पाटिल, शाकिर अली, सी के खाण्‍डे, रत्‍नाकर पहाड़ी, डा. हेमचन्‍द्र पांडे, डा. आर जी शर्मा, उदय प्रताप सिंह चंदेल, रोहिणी कुमार बाजपेयी आदि।

हाल के वर्षों में, जिसका विवरण यहां नहीं है, मुख्‍यतः सिरपुर उत्‍खनन से महत्‍वपूर्ण बौद्ध अवशेष, यहां विहार व स्‍तूप के चित्र लगाए गए हैं, प्रकाश में आए हैं।

Friday, December 7, 2012

ब्‍लागरी का बाइ-प्रोडक्‍ट

आप सभी वेब परिचित, प्रत्‍यक्ष मुलाकात तक अन्‍तरिक्षीय देवों की तरह होते हैं, इसलिए यहां, आपके 'सामने' ईमानदार बना रह सकना आसानी से संभव हो जाता है, ज्‍यों कन्‍फेशन बाक्‍स की सचबयानी।

पड़ोसी और अजनबी-परदेसी से बात छुपाने का औचित्‍य नहीं होता, पड़ोसी को पता चलनी ही है, अजनबी को क्‍या लेना-देना बातों से और उसके साथ सब बातों को परदेसी हो जाना है। आप सब तो बगल में होकर भी परदेसी हैं, फिर आपसे क्‍या दुराव-छिपाव।

माना कि दीवारों के भी कान होते हैं मगर 'आनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पालिसी' ... कभी सच भी तो सर चढ़कर बोलने लगता है, प्रियं ब्रूयात से अधिक जरूरी सत्‍यं ब्रूयात हो जाता है।

वैसे सच और ईमानदारी के पीछे अगर कोई कारण होते हैं, वह सब लबार के लिए भी लागू हो जाते हैं, ज्‍यों शराबी बाप के दो बेटों में एक शराब पीने लगा, क्‍योंकि उसका बाप शराबी था और दूसरा शराब से नफरत करता, कारण वही कि उसका बाप शराबी था। या दार्शनिक वाक्‍य- 'जो सुख का कारण है, वही दुख का कारण बनता है।' बहादुरशाह ज़फर की कही-अनकही है-
कहां तक चुप रहूं, चुपके रहे से कुछ नहीं होता,
कहूं तो क्‍या कहूं उनसे, कहे से कुछ नहीं होता।

परोक्ष मुलाकात की धूमिल ही छवि है स्‍मृति में। चलिए आपसे प्रत्‍यक्ष होने के अवसर की प्रतीक्षा रहेगी। आपकी टिप्‍पणी में प्रशंसा है, अस्‍वीकार कैसे करूं, लेकिन सचाई यह है कि साहित्‍य से सीधा कुछ रिश्‍ता रहा नहीं। कभी लिपि की दिशा से, कभी संस्‍कृति तो कभी इतिहास-पुरातत्‍व के माध्‍यम से लिखना-पढ़ना साधने की कोशिश करता हूं, मुझे पता है जैसा चाहता हूं वैसा ठीक सधता नहीं, लेकिन मैं भी पीछा छोड़ता नहीं। 

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लेकिन कुछ समय के लिए तुम्‍हें सचमुच नास्तिक मान बैठा था, तुम तो पक्‍के आस्तिक निकले, साम्‍यवाद पर ऐसी आस्‍था, चकित हूं मैं।

मैं तो मंदिर जाता हूं, कुछ कर्मकाण्‍डों का अनुकरण भी कर लेता हूं मन नहीं रमता उसमें, लेकिन लगता है कि कुछ चीजें जिनसे न लाभ न हानि, उनसे सहमति-असहमति से निरपेक्ष रह कर नकल निभा लेने में हर्ज नहीं, क्‍योंकि गांठ बांधकर विरोध भी तो एक तरह का आकर्षण है, आसक्ति है, वह सिर्फ विरोधी नहीं रह जाता। निरासक्‍त रहना ही सच्‍ची नास्तिकता है और तभी वह आस्तिकता जैसी पवित्र और सम्‍मानजनक है। हां, मैं ताबीज, गंडा नहीं बांधता, भौतिक या वैचारिक दोनों तरह के, अंगूठी, नग-पत्‍थर नहीं धारण करता और नाम जपन, नियमित दीप-धूप-अगरबत्‍ती भी नहीं करता यह सूचना के बतौर बता रहा हूं, क्‍योंकि इसकी घोषणा भी आसक्ति और आस्तिकता ही है, ''न के प्रति आसक्ति।''

कुछ संस्‍थाएं हैं आसपास, एक सद्यजात छोड़े बच्‍चों को पालती है, एक मानसिक विकलांग महिलाओं की देखरेख करती है और एक बुजुर्गों का जतन। जब भी मन खिन्‍न होता है, कमजोर होता है या किसी भौतिक, मानसिक जीत का जश्‍न मनाने का उत्‍साह बेकाबू होता है तो इन्‍हीं तीन का स्‍मरण करता हूं या अवसर निकाल कर स्‍वयं जाता हूं। मंदिर जा कर या भगवान को याद कर वैसा नहीं महसूस कर पाता, जैसा औरों से सुनता हूं, पढ़ा है। यह भी स्‍पष्‍ट कर दूं कि इनमें पहली हिन्‍दू संस्‍था द्वारा, दूसरी इसाईयों की और तीसरी नाम ध्‍यान न रही संस्‍था, वहां के एक सक्रिय मुस्लिम सदस्‍य का जिक्र हुआ था, द्वारा संचालित है, संयोगवश। 

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पत्रकार अक्‍सर 'खोजी' होते हैं और उनकी खोज अपने-अपने 'सत्‍य की खोज' की तरह नित नूतन पहली बार ही होती है यानि जिसे उसने पहली बार जाना, वह पहली बार ही जाना गया है और वही इसे उजागर कर यह 'सत्‍यार्थ प्रकाश' फैला रहा है। अखबारों का 'दुर्लभ', 'पहली बार', 'नया', 'एक्‍सक्‍लूसिव-बाइलाइन' और अब तक अनजाना- 'रहस्‍योद्घाटन' अक्‍सर ऐसा ही होता है, लेकिन शायद यही शोध और खोज का फर्क है। यह पत्रकारों की मेहनत को कमतर आंकना नहीं है, लेकिन आम प्रवृत्ति लगभग इसी तरह प्रकट होती रहती है, यह मीडिया की विश्‍वसनीयता को कम करती है। इन सबके पीछे समय सीमा का तर्क होता है यानि अखबार, जो रोज छपते हैं और चैनल, जिन्‍हें 24 घंटे कुछ न कुछ परोसना है और सबसे पहले। 'एक-दिवसीय इतिहास बन रहा है और अखबार क्‍या तवारीख भी रद्दी में बिक रहा है।'

इम्‍पैक्‍ट फीचर, साफ्ट स्‍टोरी और पेड न्‍यूज के बीच की क्षीण सी रेखा कभी आभासी मात्र जान पड़ती है। रील-रियल से रियलिटी शो और लाइव का गड्ड-मड्ड... ठीक-ठाक प्रूफ (रीडिंग) न होने से भी एडवरटोरियल, एडिटोरियल हो सकता है। 'जब मिल बैठेंगे तीन यार...', जैसे उद्घोष के साथ शराब निर्माता मिनरल वाटर और सोडा भी बनाते-बेचते हों तो शराबी को थोड़ी आसानी हो जाती है लेकिन पानी के ग्राह‍क को शराबी समझ लेने की गलती भी आसानी से हो सकती है।

समाचार-पत्र/मीडिया, पत्रकारों की छवि और चरित्र, उनके आक्रामक तेवर और आतंक के लिए 'पीपली लाइव' का हवाला देने वालों के ध्‍यान में नवम्‍बर, 1894, वाशिंग्‍टन में स्‍वामी विवेकानंद की लेखी का यह उद्धरण भी रहे- ''भारत में मेरे नाम पर काफी हो-हल्‍ला हो चुका है। आलासिंगा ने लिखा है कि देश भर का प्रत्‍येक गांव अब मेरे विषय में जान चुका है। अच्‍छा, चिर शान्ति सदा के लिए समाप्‍त हुई और अब कहीं विश्राम नहीं है। मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि भारत के वे समाचार-पत्र मेरी जान ले लेंगे। अब वे लिखेंगे कि मैं किस दिन क्‍या खाता हूं, कैसे छींकता हूं। भगवान उनका कल्‍याण करे।'' 

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मेल, टिप्‍पणी और प्रति-टिप्‍पणियों का बचा-खुचा, प्रयोग है एक पोस्‍ट यह भी।

Wednesday, November 28, 2012

तालाब परिशिष्‍ट

वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डा. के.के. चक्रवर्ती जी के साथ दसेक साल पहले रायपुर से कोरबा जाने का अवसर बना। रास्ते में तालाबों पर चर्चा होने लगी। अनुपम मिश्र की पुस्तकों का भी जिक्र आया। छत्तीसगढ़ में तालाबों के विभिन्न पक्षों पर मेरी बातों को वे ध्यान से सुनते रहे, फिर रास्ते में एक तालाब आया, वहां रुक कर उन्होंने तालाब के स्थापत्य पर सवाल किया और बातों का सार हुआ कि मैं जितनी बातें कह रहा हूं वह सब एक नोट बना कर उन्हें दिखाऊं, मैंने हामी भरी, लेकिन मुझे लगता रहा कि इसमें लिखने वाली क्या बात है, लिख कर क्या होगा। मेरी ओर से बात आई-गई हुई। कोरबा पहुंच कर उन्होंने फिर याद दिलाई, कहा रात को ही लिख लूं और दिखा दूं। बचने का कोई रास्ता नहीं रहा तो मैंने अगली सुबह तक मोहलत ली और कच्चा मसौदा, जो पिछली पोस्‍ट तालाब में आया है, उन्हें दिखाया, चक्रवर्ती जी ने इसमें रुचि ली। काफी समय बाद स्वयं इसे फिर से देखा तो लगा कि यह औरों की रुचि का भी हो सकता है। बहरहाल, इस तरह लगभग बिना सोचे शुरुआत हुई। अब सचेत समझ पाता हूं कि मेला, ग्राम देवता और तालाब तीन ऐसे क्षेत्र हैं, जिसमें निहित सामुदायिक-सांस्‍कृतिक जीवन लक्षण के प्रति मुझे आरंभ से आकर्षण रहा है। यहां तालाब पर कुछ और बातें-

• तालाबों के विवाह की परम्‍परा के साथ स्‍मरणीय है कि इस तरह का विवाह अनुष्‍ठान फलदार वृक्षों के लिए भी होता है, जिसके बाद विवाहित वृक्ष के फल का उपयोग आरंभ किया जाता है। तालाबों का विवाह, अवर्षा की स्थिति होने पर या जल-स्रोतों को सक्रिय करने के लिए किया जाने वाला अनुष्‍ठान है। तालाबों के कुंवारे रह जाने की तरह एक उदाहरण जिला मुख्‍यालय धमतरी के पास करेठा का है, जहां के ग्राम देवी-देवता अविवाहित माने जाते हैं, इस गांव को कुंआरीडीह भी कहा जाता है। बहरहाल, सन 2011 में 12-13 जून को जांजगीर-चांपा जिले के केरा ग्रामवासियों द्वारा राजापारा के रनसगरा तालाब का विवाह विधि-विधानपूर्वक कराया गया, जिसमें वर, भगवान वरुण और वरुणीदेवी को वधू विराजित कराया गया। इस मौके पर लोगों ने अस्सी साल पहले गांव के ही 'बर तालाब' के विवाह आयोजन को भी याद किया।




• सन 1900 में पूरा छत्तीसगढ़ अकाल के चपेट में था। इसी साल रायपुर जिले के एक हजार से भी अधिक तालाबों को राहत कार्य में दुरुस्त कराया गया। रायपुर के पास स्थित ग्राम गिरोद में ऐसी सूचना अंकित शिलालेख सुरक्षित है।




• 18 मई 1790 को अंगरेज यात्री जी.एफ. लेकी रायपुर पहुंचा था। उसने यहां के विशाल, चारों ओर से पक्‍के बंधे तालाब (संभवतः खो-खो तालाब या आमा तालाब) का जिक्र करते हुए लिखा है कि तालाब का पानी खराब था। 'नागपुर डिवीजन का बस्‍ता', दस्‍तावेजों में रायपुर और रतनपुर के तालाबों का महत्‍वपूर्ण उल्‍लेख मिलता है। प्रसिद्ध यात्री बाबू साधुचरणप्रसाद, अब जिनका नाम शायद ही कोई लेता है, 1893 में छत्‍तीसगढ़ आए थे। उन्‍होंने रायपुर के कंकाली तालाब, बूढ़ा तालाब, महाराज तालाब, अंबातालाब, तेलीबांध, राजा तालाब और कोको तालाब का उल्‍लेख किया है। इसी प्रकार पं. लालाराम तिवारी और श्री बैजनाथ प्रसाद स्‍वर्णकार की रचना 'रतनपुर महात्‍म्‍य' में भी रतनपुर के तालाबों का रोचक उल्‍लेख है।

• छत्तीसगढ़ की प्रथम हिंदी मासिक पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र' के सन्‌ 1900 के मार्च-अप्रैल अंक का उद्धरण है- ''रायपुर का आमा तलाव प्रसिद्ध है। यह तलाव श्रीयुत सोभाराम साव रायपुर निवासी के पूर्वजों ने बनवाया था। अब उसका पानी सूख कर खराब हो गया है। उपर्युक्त सावजी ने उसकी मरम्मत में 17000 रु. खर्च करने का निश्चय किया है। काम भी जोर शोर से जारी हो गया है। आपका औदार्य इस प्रदेश में चिरकाल से प्रसिद्ध है। सरकार को चाहिए कि इसकी ओर ध्यान देवे।''

• शुकलाल प्रसाद पांडे की कविता 'तल्लाव के पानी' की पंक्तियां हैं -
''गनती गनही तब तो इहां ल छय सात तरैया हे,
फेर ओ सब मां बंधवा तरिया पानी एक पुरैया हे।
न्हावन छींचन भइंसा-मांजन, धोये ओढ़न चेंदरा के।
ते मा धोबनिन मन के मारे गत नइये ओ बपुरा के॥
पानी नीचट धोंघट धोंघा, मिले रबोदा जे मा हे।
पंडरा रंग, गैंधाइन महके, अउ धराउल ठोम्हा हे।
कम्हू जम्हू के साग अमटहा, झोरहातै लगबे रांधे,
तुरत गढ़ा जाही रे भाई रंहन बेसन नई लागे।''

• पानी-तालाब के वैदिक संदर्भ पर भी दृष्टिपात करते चलें। वैदिक साहित्य में छोटे गड्‌ढे का जल- स्रुत्य, नदी का जल- नादेय और तराई की नदियों का जल- नीप्य, कुएं का जल कूप्य तो छोटे कुएं का जल अवट्‌य कहा गया है। दलदली भूमि का जल सूद्य तो नहर का जल कुल्य है। अनूप्य और उत्स्य, जलीय स्थानों और जलस्रोतों से निकलने वाला जल है। बावड़ी का जल वैशंत, झील का जल हृदय तो तालाब के जल के लिए सरस्य शब्द प्रयुक्त हुआ है।

• तालाब, उनसे जुड़ी मान्‍यताएं और एक-एक शब्‍द के साथ पूरी कथा है, नमूने के लिए 'मामा-भांजा', 'सागर', 'बालसमुंद' और 'सरगबुंदिया'। तालाब के 'मामा-भांजा' नामकरण का कारण बताया जाता है कि किसी भांजे ने अपने नाम से तालाब खुदवाने के लिए अपने मामा को विश्‍वासपूर्वक जिम्मा दिया था, मामा ने साथ-साथ अपने नाम से भी एक तालाब खुदवा लेने के लिए भांजे का सहयोग चाहा, भांजे ने इसके लिए हामी भरी, तब मामा ने छलपूर्वक तालाब खुदवाने के लिए निचले हिस्से में, जहां पानी की अधिक संभावना थी, अपने नाम से और भांजे के लिए उथले स्थान का निर्धारण कर लिया। मौके पर पहुंचने से भांजे को स्थिति का पता लगा, उसने इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया, लेकिन काम पूरा होने के बाद ऊंचाई पर खुदे 'भांजा' तालाब में लबालब पानी भरा, लेकिन निचले हिस्से के 'मामा' तालाब सूखा रह गया, क्योंकि इसमें कोई प्राकृतिक जल-स्रोत नहीं था। बिलासपुर के मामा-भांजा तालाब जोड़े के भांजा तालाब पर अब आबादी बस गई है और मामा तालाब को ही मामा-भांजा तालाब कहा जाने लगा है, जिसमें आसपास के घरों के निकास का गंदा पानी जमा होता है।साथ ही खल्‍लारी, महासमुंद के पास एक गांव का नाम ही मामा भांचा है। इस गांव के एक छोर पर अंगारमोती देवता वाला गधिया तरिया है, जिसके पास देवता मामा-भांचा की मान्‍यता वाला उकेरा जोड़ा-पत्‍थर है। बताया जाता है कि भूलवश मामा का बाण लग जाने से भांजे की मौत हो गई, ग्‍लानिवश मामा ने भी अपनी इहलीला समाप्‍त कर ली, वही मामा-भांचा देवता हुए, अब पूजित हैं।

सागर, नरियरा ग्राम का विशाल तालाब है। इस तालाब में पारस पत्‍थर होने की किस्‍सा बताया जाता है- एक बरेठिन सागर तालाब में नहाने गई, वहां पैर के आभूषण, पैरी को दुरुस्‍त करने की जरूरत हुई, उसने घाट पर पड़ा पत्‍थर ले कर ठोंक-पीट किया और वापस घर आ गई। घर में ध्‍यान गया कि उस पैरी में सुनहरी चमक है। पूछताछ होने लगी। बरेठिन को तालाब वाली बात याद आई और यह बताते ही खबर जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई कि नरियरा के सागर तालाब में पारस पत्‍थर है, खोज होने लगी, लेकिन सब बेकार। बात अंगरेज सरकार तक पहुंची। कुछ ही दिनों में अंगरेज अधिकारी नरियरा आए, उनके साथ दो हाथी और तालाब की लंबाई की लोहे की जंजीर थी। हाथियों के पैर में जंजीर बांधी गई और दोनों हाथियों को तालाब के आर-पार जंजीर को डुबाते हुए, तालाब की परिक्रमा कराई गई। जंजीर बाहर आई तो उसकी ढाई कड़ी सोने की थी, लेकिन इसके बाद भी उस पारस पत्‍थर को नहीं मिलना था तो वह नहीं मिला और अब भी यह आस-विश्‍वास बना हुआ है। वैसे इस तालाब आबपाशी से खेतों से धान और बरछा से गन्‍ना, सब्जियां सोना ही उगलती हैं। पारस पत्‍थर की इससे मिलती-जुलती कहानी सिरपुर के रायकेरा तालाब के साथ भी जुड़ी है।

पलारी का बालसमुंद देखकर, उसके नामकरण का स्‍वाभाविक अनुमान होता है कि तालाब का विशाल आकार इसका कारण है। लेकिन यहां एक रोचक किस्‍सा है कि इसे नायक सरदार ने छैमासी रात में शोध-विचार कर खुदवाया, परन्तु तालाब सूखा का सूखा रहा। नायक सरदार ने जानकारों से राय की और उनके बताये अनुसार लोक-मंगल की कामना करते अपने नवजात शिशु को सूखे खुदे तालाब में परात में रख कर छोड़ दिया। देखते ही देखते रात बीतते में तालाब लबालब हो गया और नवजात परात सहित पानी पर उतराने लगा। इसी वजह से तालाब का नाम बालसमुंद हुआ। प्रसंगवश, जल-स्रोत और उसके लोकोपयोग से जुड़ी एक वास्‍तविक प्रसंग है, बिलासपुर जिले के गनियारी का। इस गांव में पीने के पानी की कमी को देखकर गांव के प्रमुख दिघ्रस्‍कर-शास्‍त्री परिवार ने कुआं खुदवाया, इसी दौरान गांव की चर्चा उनके कान में पड़ी कि यह कुआं तो वे अपने लिए खुदवा रहे हैं और यश पाना चाह रहे हैं कि जन-कल्‍याण का काम कर रहे हैं। जिस दिन कुएं का पूजन-लोकार्पण हुआ, परिवार प्रमुख ने घोषणा कर दी कि अब वे इस कुएं का क्‍या, इस गांव का भी पानी नहीं पिएंगे, और दिघ्रस्‍कर परिवार के लोग आज भी गनियारी जाते हुए पीने का पानी अपने साथ ले जाते हैं।

अब सरगबुंदिया, यानि? मतलब एकदम साफ है, सरग+बुंदिया, सरग=स्‍वर्ग और बुंदिया=बूंदें, यानि स्‍वर्ग की बूंदें, अमृतोपम जल, ऐसा तालाब जिसका पानी साफ, मीठा हो। भाषाशास्‍त्र में हाथ आजमाते और तालाबों की खोज-खबर लेते यह मेरे लिए मुश्किल नहीं रह गया है। तालाबों की बात करते हुए अब मैं लोगों को अपनी इस स्‍थापना को मौका बना कर सगर्व बताता, सरगबुंदिया यानि पनपिया यानि जिस तालाब का पानी, पीने के लिए उपयोग होता है। एक दिन मेरी बातें सुनकर किसी बुजुर्ग ने धीरे से बात संभाली और मुझे बिना महसूस कराए सुधारा कि सरगबुंदिया में पानी का कोई सोता नहीं है, न भराव-ठहराव न रसन-आवक, बस स्‍वर्ग की बूंदों, बरसात के भरोसे है। देशज भाषा का सौंदर्य। जान गया कि अभी तालाबों पर जानकारियां ही जुटाना है, मेरी समझ इतनी नहीं बनी है कि उन‍की साधिकार व्‍याख्‍या करने लगूं।

• डॉ. महेश कुमार चंदेले ने रायपुर के नगरीय भूगोल के अपने अध्‍ययन में बताया है कि नगर के कुल क्षेत्रफल का 7.90 प्रतशित यानि 308.89 हेक्‍टेयर क्षेत्र तालाबों का है। रायपुर के भूगोलविद, प्रो. एन.के. बघमार के रायपुर जिले के जल-संसाधन पर शोध प्रबंध में तत्‍कालीन (1988) जिले में 25935 तालाब आंकड़ा है। वे स्‍पष्‍ट करते हैं कि छत्‍तीसगढ़ में 35000 तालाब बताए जाते हैं, जबकि रिमोट सेंसिंग से लगभग 64000 तालाबों का पता चलता है। उनके निर्देशन में श्री जितेन्‍द्र कुमार घृतलहरे ने 'रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्‍ययन' शीर्षक से सन 2006 में शोध किया है।

• छत्‍तीसगढ़ में लोक स्‍वास्‍थ्‍य यांत्रिकी विभाग में रहे रामनिवास गुप्ता जी इन दिनों इंडियन वाटर वर्क्‍स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष हैं (मुझे अजीब लगा कि डा. बघमार और श्री गुप्‍ता की आपस में कोई मेल-मुलाकात नहीं है, दोनों रायपुर में ही रहते हुए, एक-दूसरे के काम से क्‍या नाम से भी परिचित नहीं), उन्‍होंने 'छत्‍तीसगढ़ में ताल-तलैये और देवालय, 21 वीं सदी में जल', ''कटघरे में हम'' शीर्षक से पुस्तिका सन 2005 में प्रकाशित कराई है। इस पुस्तिका में तत्‍कालीन बिलासपुर संभाग के तालाबों की जल संग्रहण क्षमता का अध्‍ययन के साथ मंदिर एवं वृक्षों की तालिका बनाई गई है, यद्यपि कई स्‍थानों पर आंकड़ों का जोड़ न होने और विसंगति से लगता है कि ये अनंतिम संख्‍या है, किन्‍तु अनुमान के लिए ये आंकड़े पर्याप्‍त हैं। पुस्तिका के अनुसार 7802 ग्रामों में निर्मित 13381 तालाबों के जल भराव में 30 से 45 प्रतिशत तक कमी आई है। पुनः 13662 तालाबों पर स्थित कुल 70964 वृक्षों में, आम-42916, पीपल-4200, बरगद-3539, नीम-3570, बबूल-3381, जामुन-589, खम्‍हार-400, सेमर-683, तेंदू-2775, महुआ-2929, अन्‍य-5982 हैं। 13662 तालाबों के पर स्थित कुल 6167 मंदिरों में 3791 शिव मंदिर, 1881 हनुमान मंदिर और 495 अन्‍य मंदिरों के तत्‍कालीन जिलेवार आंकड़े दिए गए हैं। श्री गुप्‍ता ने बताया कि उन्‍होंने पूरे छत्‍तीसगढ़ के तालाबों के आंकड़े भी इकट्ठे कराए हैं और स्‍वयं ने रतनपुर के तालाबों का व्‍यापक सर्वेक्षण-अध्‍ययन किया है, यद्यपि यह अब तक कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है।

• स्वच्छ जल के लिए निर्धारित मानक में पानी का रंग, कठोरता, अम्लता, घुलनशील ठोस के अलावा उसमें लौह, क्लोराइड, मैगनेशियम, मैगनीज, फ्लोराइड, मरकरी, जिंक की मात्रा आदि बिंदुओं पर परख की जाती है। अक्‍सर यह देखा गया है कि तालाबों का सौन्दर्यीकरण उनके लिए अनुकूल साबित नहीं होता और ऐसे प्रयासों में तालाब के स्‍थापत्‍य का ध्‍यान न रखा गया तो स्‍वच्‍छता का स्तर घटता जाता है। ऐसे उदाहरणों की भी चर्चा होती है, जिसमें सौन्दर्यीकरण के चलते निकास प्रभावित होने से अशुद्धि बढ़ी, तालाब का प्रयोग कम होने लगा, उपेक्षा हुई, साथ ही स्रोत प्रभावित होने के फलस्‍वरूप तालाब का अस्तित्‍व ही समाप्‍त हो गया। निसंदेह, नये तालाबों के निर्माण या तालाबों के मनमाने सौंदर्यीकरण के बजाय विद्यमान को यथावत बनाए रखना ही पर्याप्‍त होगा। ज्‍यों ज्‍यादातर कुएं उपयोग न होने से बड़े कूड़ादान बन जाते हैं, उसी तरह उपयोगिता और अनुशासन कायम न रहे तो तालाबों का अघोषित 'सालिड वेस्‍ट डंपिंग स्‍टेशन' बन कर, नई बसाहट के लिए प्‍लाट में तब्‍दील होते देर नहीं लगती। उदाहरण है- रायपुर नगर के मध्‍य का रजबंधा तालाब, जो कुछ दिन पहले तक रजबंधा मैदान रहा फिर अब यहां स्‍वतंत्रता सेनानियों का शहीद स्‍मारक भवन और प्रेस काम्‍प्‍लेक्‍स वाला रजबंधा व्‍यावसायिक परिसर है।

पारम्‍परिक सामुदायिक जीवन का केन्‍द्र और प्रतिबिम्‍ब तालाबों, उनकी पनीली यादों में अब आधुनिक जीवन-शैली की जरूरतें परिलक्षित होने लगी हैं।

Wednesday, November 14, 2012

तालाब

छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती पहाड़ियां उच्चता, प्राकृतिक संसाधनयुक्त रत्नगर्भा धरती सम्पन्नता, वन-कान्तार सघनता का परिचय देती हैं तो मैदानी भाग उदार विस्तार का परिचायक है। इस मैदानी हिस्से की जलराशि में सामुदायिक समन्वित संस्कृति के दर्शन होते हैं, जहां जल-संसाधन और प्रबंधन की समृद्ध परम्परा के प्रमाण, तालाबों के साथ विद्यमान है और इसलिए तालाब स्नान, पेयजल और अपासी (आबपाशी या सिंचाई) आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष पूर्ति के साथ जन-जीवन और समुदाय के वृहत्तर सांस्कृतिक संदर्भयुक्त बिन्दु हैं।

अहिमन रानी और रेवा रानी की गाथा तालाब स्नान से आरंभ होती है। नौ लाख ओड़िया, नौ लाख ओड़निन के उल्लेख सहित दसमत कइना की गाथा में तालाब खुदता है और फुलबासन की गाथा में मायावी तालाब है। एक लाख मवेशियों का कारवां लेकर चलने वाला लाखा बंजारा और नायकों के स्वामिभक्त कुत्ते का कुकुरदेव मंदिर सहित उनके खुदवाए तालाब, लोक-स्मृति में खपरी, दुर्ग, मंदिर हसौद, पांडुका के पास, रतनपुर के पास करमा-बसहा, बलौदा के पास महुदा जैसे स्थानों में जीवन्त हैं।

गाया जाता है- 'राम कोड़ावय ताल सगुरिया, लछिमन बंधवाय पार।' खमरछठ (हल-षष्ठी) की पूजा में प्रतीकात्मक तालाब-रचना और संबंधित कथा में तथा बस्तर के लछमी जगार गाथा में तालाब खुदवाने संबंधी पारम्परिक मान्यता और सुदीर्घ परम्परा का संकेत है। रतनपुर का घी-कुडि़या तालाब राजा मोरध्‍वज के अश्‍वमेध यज्ञ आयोजन में घी से भरा गया था, माना जाता है। सरगुजा अंचल में कथा चलती है कि पछिमहा देव ने सात सौ तालाब खुदवाए थे और राजा बालंद, कर के रूप में खीना लोहा वसूलता और जोड़ा तालाब खुदवाता, जहां-जहां रात बासा, वहीं तालाब। उक्ति है- ''सात सौ फौज, जोड़ा तलवा; अइसन रहे बालंद रजवा।'' विशेषकर पटना (कोरिया) में कहा जाता है- सातए कोरी, सातए आगर। तेकर उपर बूढ़ा सागर॥

तालाबों की बहुलता इतनी कि 'छै आगर छै कोरी', यानि 126 तालाबों की मान्यता रतनपुर, मल्हार, खरौद, महन्त, नवागढ़, अड़भार, आरंग, धमधा जैसे कई गांवों के साथ सम्बद्ध है। सरगुजा के महेशपुर और पटना में तथा बस्तर अंचल के बारसूर, बड़े डोंगर, कुरुसपाल और बस्तर आदि ग्रामों में 'सात आगर सात कोरी'- 147 तालाबों की मान्यता है, इन गांवों में आज भी बड़ी संख्‍या में तालाब विद्यमान हैं। 'लखनपुर में लाख पोखरा' यानि सरगुजा की लखनपुर जमींदारी में लाख तालाब कहे जाते थे, अब यह गिनती 360 तक पहुंचती है। छत्तीसगढ़ में छत्तीस से अधिक संख्‍या में परिखा युक्त मृत्तिका-दुर्ग यानि मिट्‌टी के किले या गढ़ जांजगीर-चांपा जिले में ही हैं, इन गढ़ों का सामरिक उपयोग संदिग्ध है किन्तु गढ़ों के साथ खाई, जल-संसाधन की दृष्टि से आज भी उपयोगी है।

भीमादेव, बस्तर और जनजातीय मान्‍यताओं में पाण्डव नहीं, बल्कि पानी-कृषि के देवता हैं। जांजगीर और घिवरा ग्राम में भी भीमा नामक तालाब हैं। बस्तर में विवाह के कई नेग-चार पानी और तालाब से जुड़े हैं। कांकेर क्षेत्र में विवाह के अवसर पर वर-कन्या तालाब के सात भांवर घूमते हैं और परिवारजन सातों बार हल्दी चढ़ाते हैं। दूल्हा अपनी नव विवाहिता को पीठ पर लाद कर स्नान कराने जलाशय भी ले जाता है और पीठ पर लाद कर ही लौटता है।
यह रोचक है कि आमतौर पर समाज से दूरी बनाए रखने वाले नायक, सबरिया, लोनिया, मटकुड़ा, मटकुली, बेलदार और रामनामियों की भूमिका तालाब निर्माण में महत्वपूर्ण होती है और उनकी विशेषज्ञता तो काल-प्रमाणित है ही। छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के समय किसी अंग्रेज अधिकारी, संभवतः एग्रीकल्‍चर एंट हार्टिकल्‍चर सोसायटी आफ इंडिया के 19 वीं सदी के अंत में सचिव रहे जे. लेंकेस्‍टर, की पहल पर खुदवाए गए उसके नाम स्मारक बहुसंख्‍य 'लंकेटर तालाब' अब भी जल आवश्यकता की पूर्ति और राहत कार्य के संदर्भ सहित विद्यमान हैं।

छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा भी है, जिस अनुष्ठान (लोकार्पण का एक स्वरूप) के बाद ही उसका सार्वजनिक उपयोग आरंभ होता था। विवाहित तालाब की पहचान सामान्यतः तालाब के बीच स्थित स्तंभ से होती है। लकड़ी के इन स्‍तंभों का स्‍थान अब सीमेंट लेने लगा है और सक्ती के महामाया तालाब में उल्‍लेखनीय लोहे का स्तंभ स्थापित है, स्तंभ से घटते-बढ़ते जल-स्तर की माप भी हो जाती है। किरारी, जांजगीर के हीराबंध तालाब से प्राप्त स्तंभ पर खुदे अक्षरों के आधार पर यह दो हजार साल पुराना प्रमाणित है। इस प्राचीनतम काष्ठ उत्कीर्ण लेख से तत्कालीन राज पदाधिकारियों की जानकारी मिलती है। कुछ तालाब अविवाहित भी रह जाते हैं, लेकिन चिन्त्य या पीढ़ी पूजा के लिए ऐसे तालाब का ही जल उपयोग में आता है।
बिलासपुर के पास बिरकोना का कपुरताल
सूखे तालाब में पुराने लकड़ी के स्‍तंभ का अंश
तथा बाद में बना सीमेंट का स्‍तंभ
तालाबों के स्थापत्य में कम से कम मछन्दर (पानी के सोते वाला तालाब का सबसे गहरा भाग), नक्खा या छलका (लबालब होने पर पानी निकलने का मार्ग), गांसा (तालाब का सबसे गहरा किनारा), पैठू (तालाब के बाहर अतिरिक्त पानी जमा होने का स्थान), पुंछा (पानी आने व निकासी का रास्ता) और मेढ़-पार होता है। तालाबों के प्रबंधक अघोषित-अलिखित लेकिन होते निश्चित हैं, जो सुबह पहले-पहल तालाब पहुंचकर घटते-बढ़ते जल-स्तर के अनुसार घाट-घठौंदा के पत्थरों को खिसकाते हैं, घाट की काई साफ करते हैं, दातौन की बिखरी चिरी को इकट्ठा कर हटाते हैं और इस्तेमाल के इस सामुदायिक केन्द्र के औघट (पैठू की दिशा में प्रक्षालन के लिए स्थान) आदि का अनुशासन कायम रखते हैं। घाट, सामान्‍यतः पुरुषों, महिलाओं के लिए अलग-अलग, धोबी घाट, मवेशी घाट (अब छठ घाट) और मरघट होता है। तालाबों के पारंपरिक प्रबंधक ही अधिकतर दाह-संस्कार में चिता की लकड़ी जमाने से लेकर शव के ठीक से जल जाने और अस्थि-संचय करा कर, उस स्थान की शांति- गोबर से लिपाई तक की निगरानी करते हुए सहयोग देता है और घंटहा पीपर (दाह-क्रिया के बाद जिस पीपल के वृक्ष पर घट-पात्र बांधा जाता है) के बने रहने और आवश्यक होने पर इस प्रयोजन के वृक्ष-रोपण की व्यवस्था भी वही करता है। अधिकतर ऐसे व्यक्ति मान्य उच्च वर्णों के होते हैं।

तालाबों का नामकरण सामान्यतः उसके आकार, उपयोग और विशिष्टता पर होता है, जैसे पनपिया या पनखत्‍ती, निस्तारी और अपासी (आबपाशी) और खइया, नइया, पंवसरा, पंवसरी, गधियाही, सोलाही या सोलहा, पचरिहा, सतखंडा, अड़बंधा, छुइखदान, डोंगिया, गोबरहा, खदुअन, पुरेनहा, देउरहा, नवा तलाव, पथर्रा, टेढ़ी, कारी, पंर्री, दर्री, नंगसगरा, बघबुड़ा, गिधवा, केंवासी (केंवाची)। बरात निकासी, आगमन व पड़ाव से सम्बद्ध तालाब का नाम दुलहरा पड़ जाता है। तालाब नामकरण उसके चरित्र-इतिहास और व्यक्ति नाम पर भी आधारित होता है, जैसे- फुटहा, दोखही, भुतही, करबिन, काना भैरा, छुइहा, टोनही डबरी, सोनईताल, फूलसागर, मोतीसागर, रानीसागर, राजा तालाब, रजबंधा, गोपिया आदि। जोड़ा नाम भी होते हैं, जैसे- भीमा-कीचक, सास-बहू, मामा-भांजा, सोनई-रूपई। 'पानी-पोखर' दिनचर्या का तो 'तलाव उछाल' जीवन-मरण का शब्‍द है।
रानी पोखर, डीपाडीह, सरगुजा
पानी और तालाब से संबंधित ग्राम-नामों की लंबी सूची हैं और उद, उदा, दा, सर (सरी भी), सरा, तरा (तरी भी), तराई, ताल, चुआं, बोड़, नार, मुड़ा, पानी आदि जलराशि-तालाब के समानार्थी शब्दों के मेल से बने हैं। उद, उदा, दा जुड़कर बने ग्राम नाम के कुछ उदाहरण बछौद, हसौद, तनौद, मरौद, रहौद, लाहौद, चरौदा, कोहरौदा, बलौदा, मालखरौदा, चिखलदा, बिठलदा, रिस्दा, परसदा, फरहदा हैं। सर, सरा, सरी, तरा, तरी, के मेल से बने ग्राम नाम के उदाहरण बेलसर, भड़ेसर, लाखासर, खोंगसरा, अकलसरा, तेलसरा, बोड़सरा, सोनसरी, बेमेतरा, बेलतरा, सिलतरा, भैंसतरा, अकलतरा, अकलतरी, धमतरी है। तरई या तराई तथा ताल के साथ ग्राम नामों की भी बहुलता है। कुछ नमूने डूमरतराई, शिवतराई, पांडातराई, बीजातराई, सेमरताल, उड़नताल, सरिसताल, अमरताल हैं। चुआं, बोड़ और सीधे पानी जुड़कर बने गांवों के नाम बेंदरचुआं, घुंईचुआं, बेहरचुआं, जामचुआं, लाटाबोड़, नरइबोड़, घघराबोड़, कुकराबोड़, खोंगापानी, औंरापानी, छीरपानी, जूनापानी जैसे ढेरों उदाहरण हैं। स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है तो जलराशि सूचक बंद के मेल से बने कुछ ग्राम नाम ओटेबंद, उदेबंद, कन्हाइबंद, हाड़ाबंद, बिल्लीबंद जैसे हैं। ऐसा ही एक नाम अब रायपुर का मुहल्ला टाटीबंद है। वैसे टाटा और टाटी ग्राम नाम भी छत्तीसगढ़ में हैं, जिसका अर्थ छिछला तालाब जान पड़ता है।

संदर्भवश, छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी का नाम महानदी है तो सरगुजा में महान नदी और यहीं एक मछली नदी भी है, इसी तरह मेढकी नदी कांकेर में है। सरगुजा में ही सूरजपुर-प्रतापपुर के गोविंदपुर के पास नदी 'रजमेलान' के एक तट-स्थान को पद्मश्री राजमोहिनी देवी के ज्ञान-प्राप्ति का स्थाान माना जाता है, रोचक यह कि रजमेलान, वस्तुूतः नदी नहीं बल्कि 'रज' नामक नदी में एक छोटी जलधारा 'सत्' के मिलान यानि संगम का स्थान है। इसी अंचल की साफ पानी वाली बारहमासी पिंगला नदी ने तमोर पहाड़ी के साथ 'तमोर पिंगला' अभयारण्यऔ को नाम दिया है। कांकेर में दूध नदी और फिंगेश्‍वर में सूखा नदी है तो एक जिला मुख्‍यालय का नाम महासमुंद है और ग्राम नाम बालसमुंद (बेमेतरा) भी है लेकिन रायपुर बलौदा बाजार-पलारी का बालसमुंद, विशालकाय तालाब है। जगदलपुर का तालाब, समुद्र या भूपालताल बड़ा नामी है। बारसूर में चन्‍द्रादित्‍यसमुद्र नामक तालाब खुदवाए जाने के अभिलेखीय प्रमाण है। इसी तरह तालाबों और स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है। तालाब अथवा जल सूचक स्वतंत्र ग्राम-नाम तलवा, झिरिया, बंधवा, सागर, रानीसागर, डबरी, गुचकुलिया, कुंआ, बावली, पचरी, पंचधार, सरगबुंदिया, सेतगंगा, गंगाजल, नर्मदा और निपनिया भी हैं। जल-स्रोत या उससे हुए भराव को झिरिया कहा जाता है, इसके लिए झोड़ी या ढोढ़ी, डोल, दह, दहरा, दरहा और बहुअर्थी चितावर शब्द भी हैं।

कार्तिक-स्नान, ग्रहण-स्नान, भोजली, मृतक संस्कार के साथ नहावन और पितृ-पक्ष की मातृका नवमी के स्नान-अनुष्ठान, ग्राम-देवताओं की बीदर-पूजा, अक्षय-तृतीया पर बाउग (बीज बोना) और विसर्जन आदि के अलावा पानी कम होने जाने पर मतावल, तालाब से सम्बद्ध विशेष अवसर हैं। सावन अमावस्या पर हरेली की गेंड़ी, भाद्रपद अमावस्या पर पोरा के दिन, तालाब का तीन चक्कर लगाकर पउवा (पायदान) विसर्जन और चर्मरोग निदान के लिए तालाब-विशेष में स्‍नान, लोक विधान है। विसर्जित सामग्री के समान मात्रा की लद्‌दी (गाद) तालाब से निकालना पारम्परिक कर्तव्य माना जाता है। ग्रामवासियों द्वारा मिल-जुल कर, गांवजल्ला लद्‌दी निकालने के लिए गांसा काट कर तालाब खाली कर लिया जाता है। बरसात में, नदी-नाले का पुराना छूटा प्रवाह मार्ग-सरार, तालाब बन जाता है। गरमियों में पानी सूख जाने पर तालाब में पानी जमा करने के लिए छोटा गड्‌ढ़ा- झिरिया बना कर पझरा (पसीजे हुए) पानी से आवश्यकता पूर्ति होती है। खातू (खाद) पालने के लिए सूखे तालाब का राब और कांपू मिट्‌टी निकालने की होड़ लग जाती है।

तालाब की सत्ता, उसके पारिस्थितिकी-तंत्र के बिना अधूरी है जिसमें जलीय वनस्पति- गधिया, चीला, रतालू (कुमुदनी), खोखमा, उरई, कुस, खस, पसहर, पोखरा (कमल), पिकी, जलमोंगरा, ढेंस कांदा, कुकरी कांदा, सरपत, करमता, सुनसुनिया, कुथुआ, जलीय जन्तु सीप-घोंघी, जोंक, संधिपाद, चिड़िया (ऐरी), उभयचर आदि और कभी-कभार ऊद व मगर भी होते हैं। मछलियों के ये नाम छत्तीसगढ़ में सहज ज्ञात हैं- डंडवा, घंसरा, अइछा, सोढ़िहा या सोंढ़ुल, लुदू, बंजू, भाकुर, पढ़िना, भेंड़ो, बामी, काराझिंया, खोखसी या खेकसी, झोरी, सलांगी या सरांगी, डुडुंग, डंडवा, ढेंसरा, बिजरवा, खेगदा, रुदवा, तेलपिया, ग्रासकाल। तालाब जिनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी जबान पर कटरंग, सिंघी, लुडुवा, कोकिया, रेछा, कोतरी, खेंसरा, गिनवा, टेंगना, मोहराली, सिंगार, पढ़िना, भुंडी, सांवल, बोलिया या लपची, केउ या रुखचग्घा, केवई, मोंगरी, पथर्री, चंदैनी, कटही, भेर्री, कतला, रोहू और मिरकल मछलियों के नाम भी सहज आते हैं।
बड़े कछुए और मछलियों वाला सरोना का तालाब
जलीय जन्तुओं को देवतुल्य सम्मान देते हुए सोने का नथ पहनी मछली और लिमान (कछुआ) का तथ्य और उससे सम्बद्ध विभिन्न मान्यताएं रायपुर के निकट ग्राम सरोना और कोटगढ़-अकलतरा के सतखंडा तालाब जैसे उदाहरणों में उसकी पारस्थितिकी, सत्ता की पवित्रता और निरंतरता की रक्षा करती हैं। इसी तरह 'तरिया गोसांइन' और 'अंगारमोती' जैसे ग्राम देवता खास तालाबों के देवता हैं, जो ग्राम के जल-आवश्यकता की पूर्ति का ध्यान रखते है, जिन तालाबों में ऐसे देवता वास हो, उनके जल का शौच के लिए इस्‍तेमाल नहीं किया जाता, कोई अन्‍जाने में ऐसा कर बैठे तो देवता उसे माफ तो करता है, लेकिन सचेत करते हुए आभास करा देता है कि भविष्‍य में भूल न हो, और फिर भी तालाब के पारम्परिक नियमों की उपेक्षा या लापरवाही हो तो सजा मिलती है।

सामुदायिक-सहकारी कृषि का क्षेत्र- बरछा, कुसियार (गन्ना) और साग-सब्जी की पैदावार के लिए नियत तालाब से लगी भूमि, पारंपरिक फसल चक्र परिवर्तन और समृद्ध-स्वावलंबी ग्राम की पहचान माना जा सकता है। बंधिया में अपाशी के लिए पानी रोका जाता है और सूख जाने पर उसका उपयोग चना, अलसी, मसूर, करायर उपजाने के लिए कर लिया जाता है। आम के पेड़ों की अमरइया, स्नान के बाद जल अर्पित करने के लिए शिवलिंग, देवी का स्थान- माताचौंरा या महामाया और शीतला या नीम के पेड़, अन्य वृक्षों में वट, पीपल (घंटहा पीपर) और आम के पेड़ों की अमरइया भी प्रमुख तालाबों के अभिन्न अंग हैं।

झिथरी, मिरचुक, तिरसाला, डोंगा, पारस-पत्थर, हंडा-गंगार, पूरी बरात तालाब में डूब जाना (नाउ बरात, बरतिया भांठा) या पथरा जाना जैसी मान्यता, तालाब के चरित्र को रहस्यमय और अलौकिक बनाती है तो पत्थर की पचरी, मामा-भांजा की कथा, राहगीरों के उपयोग के लिए तालाब से बर्तन निकलना और भैंसे के सींग में जलीय वनस्पति-चीला अटक जाने से किसी प्राचीन निर्मित या प्राकृतिक तालाब के पता लगने का विश्वास, जन-सामान्य के इतिहास-जिज्ञासा की पूर्ति करता है।

दसेक साल पहले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डा. के.के.चक्रवर्ती जी से हुई चर्चा के बाद उनके निर्देश पर मेरे द्वारा तैयार मूल नोट के आधार पर, बाकी कुछ बातें और चित्र अगली पोस्ट 'तालाब परिशिष्ट' में।

Sunday, November 11, 2012

गेदुर और अचानकमार

छत्‍तीसगढ़ में शिवनाथ नदी के किनारे नये जिले बलौदाबाजार के एक गांव में 'गेदुरपारा' यानि गेदुर मुहल्‍ला सुन कर इस शब्‍द 'गेदुर' के बारे में जानना चाहा, अर्थ बताया गया चमगादड़ या चमगीदड़ (चेहरा, गीदड़ की तरह होने के कारण? चम+गीदड़)। यह 'उड़ने वाली, लेकिन चिडि़या नहीं' स्‍तनधारी आम बोलचाल की छत्‍तीसगढ़ी में चमगिदरी, चमगेदरी या चमरगिदरी भी कही जाती है, तो स्‍पष्‍ट किया गया कि छोटे आकार की, जो आमतौर पर पुराने भवनों में रहती है वह चमगिदरी (या धनगिदरी भी, जिसे शुभ माना जाता है) और बड़े आकार की, जो पेड़ों पर उल्‍टे लटकती है, जिसके पीठ पर भूरे-सुनहरे रोएं होते हैं वह गेदुर है। आगे चर्चा में पता लगा कि छत्‍तीसगढ़ के मध्‍य-मैदानी क्षेत्र के लोग, अच्‍छे जानकार भी इस शब्‍द से एकदम अनभिज्ञ हैं, लेकिन बस्‍तर का हल्‍बी और उससे प्रभावित क्षेत्र, जशपुर सादरी क्षेत्र, पेन्‍ड्रा बघेली प्रभावित क्षेत्र (रीवां अंचल में गेदुरहट नामक गांव है) और जनजातीय समुदाय के लिए यह शब्‍द अपरिचित नहीं है। पट्ट (ठेठ) मैदानी छत्‍तीसगढ़ में 'गेदुर' शब्‍द से अनजान व्‍यक्ति इस शब्‍द को दुहराए तो कहेगा 'गेन्‍दुर'।

मंगत रवीन्‍द्र की छत्‍तीसगढ़ी कहानी अगोरा के आरंभ में- ''थुहा अउ पपरेल के बारी भीतर चर-चर ठन बिही के पेड़ ..... गेदुर तलक ल चाटन नई देय'' गेदुर शब्‍द इस तरह, बिही (अमरूद) के साथ प्रयुक्‍त हुआ है। इसका प्रिय खा्द्य अमरूद और शरीफा है। आम मान्‍यता है कि इसके शरीर में मल-उत्‍सर्जन छिद्र नहीं होता और यह (शापग्रस्‍त होने के कारण) उत्‍सर्जन क्रिया मुंह के रास्‍ते करती है, 'गुह-गादर' इस तरह भी शब्‍द प्रयोग प्रचलित है। संभवतः ऐसी मान्‍यता के पीछे कारण यह है कि यह फल खाने के बाद रस चूसकर ठीक उसी तरह उगल देती है, जैसा हम गन्‍ने के लिए करते हैं। छत्‍तीसगढ़ी में अशुचिता, गलीचपन के लिए गिदरा-गिदरी शब्‍द प्रयुक्‍त होता है, स्‍वयं गंदा और गंदगी फैलाने वाला जैसा तात्‍पर्य होता है। यहां शब्‍द और अर्थ साम्‍य देखा जा सकता है। माना जाता है कि पेड़ से गिरे गेदुर को खाने वाले की आयु लंबी होती है और ऐसे व्‍यक्ति की जबान से निकली बात फलीभूत होती है। दमा, श्‍वास-रोगियों को भी गेदुर खिलाया जाता है साथ ही कुछ अन्‍य गुह्य उपयोग और मान्‍यताएं गेदुर के साथ जुड़ी हैं।

गेदुर शब्‍द के साथ मिलते-जुलते शब्‍द इंदूर और उंदुर यानि चूहा का ध्‍यान (बस तुक मिलाने को दादुर, मेढक सहित) आता है और बंदर शब्‍द भी अधिक दूर नहीं। प्रसंगवश, बानरो और उंदरा को जोड़ी बना कर 'बांदरो-उंदरो' बोल दिया जाता है। स्‍तनधारियों में सबसे छोटे, 2 ग्राम तक के जीव चमगादड़ों में ही होते हैं। गादर और गेदुर के चमड़े के डैने के कारण गादड़ में 'चम' जुड़ कर सीधा रिश्‍ता बनता दिखता है, लेकिन क्‍या यह बंदर (वानर, वा+नर में नर का अभिप्राय पुरुष नहीं, मानव है, जो चूहा या चमगादड़ की तरह स्‍तनधारी है) तक भी जाता है?

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बिलासपुर से अमरकंटक के रास्‍ते में है- 'अचानकमार'। इस शब्‍द के लिए पहले जितनी बातें सुनी थीं, उनसे खास अलग कुछ पता नहीं लगा। मुझे यह संतोषजनक नहीं लगता क्‍योंकि यह शब्‍द मूलतः छत्‍तीसगढ़ी, बइगानी या अन्‍य किसी जनजातीय जबान में इस्‍तेमाल होने की जानकारी नहीं मिलती फिर अचानक का अर्थ उसी तरह लिया जाय, जैसी हमारी रोजमर्रा की भाषा में हैं, तब मानना होगा कि यह नाम काफी बाद में आया है, और किसी पुराने नाम पर आरोपित हो गया है, यदि ऐसा हो तो इस नाम का अधिक महत्‍व नहीं रह जाता।

अचानकमार शब्‍द स्‍पष्‍टतः 'अचानक' और 'मार', इन दो शब्‍दों से मिल कर बना है। अचानक के साथ पुर जुड़कर छत्‍तीसगढ़ में जंगली इलाकों में ग्राम नाम बनते हैं- अचानकपुर। ऐसा ग्राम नाम कसडोल, सिरपुर और बलौदा के पास याद आता है। ध्‍यान देने योग्‍य है कि पुर शब्‍द भी यहां पुराने प्रचलन का नहीं है। अब दूसरे शब्‍द 'मार' के बारे में सोचें। मार या इससे जुड़े एकदम करीब के शब्‍द हैं- सुअरमार या सुअरमाल, बाघमड़ा, भालूमाड़ा, अबुझमाड़ (अबुझ भी अचानक की तरह ही अजनबी सा शब्‍द लगता है), जोगीमारा (सरगुजा), प्राचीन स्‍थल माड़ा (सीधी-सिंगरौली में कोरिया जिले की सीमा के पास)। इन पर विचार करने से स्‍पष्‍ट होता है कि 'मार' या इसके करीब के शब्‍द पहाड़, पहाड़ी गुफा, स्‍थान (जिसे ठांव, ठांह या ठिहां भी कहा जाता है) जैसा कुछ अर्थ होगा, मरने-मारने से खास कुछ लेना-देना नहीं है इस शब्‍द का। यह भी विचारणीय होगा कि कुछ लोग इसका उच्चारण अचान-कमार करते हैं लेकिन अचान शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता और कमार (गरियाबंद वाली जनजाति) का इस क्षेत्र से कोई सीधा तालमेल नहीं है।

भाषा विज्ञान की मदद लें तो र-ल-ळ-ड़-ड-द आसपास की ध्‍वनियां हैं। इस दृष्टि से 'शेर की मांद' और मराठी, तमिल-तेलुगु का मलै या माला (मराठी में फ्लोर या मंजिल के लिए माला शब्‍द या दक्षिण भारत में अन्‍नामलई, तिरुमलई) इसी तरह का अर्थ देने वाले शब्‍द हैं। माड़ना, मंडित करना, मड़ई जैसे शब्‍द भी इसके करीब जान पड़ते हैं। संभव है कि भाषा विज्ञान में इतनी खींचतान मंजूर न हो, लेकिन सहज बुद्धि, भटकती तब रास्‍ता पाती है।

इन शब्‍दों के लिए 'शब्‍द चर्चा' का विचार आया फिर अजीत वडनेरकर जी से फोन पर बात हुई, लगा कि भाषाई जोड़-तोड़ में आजमाया हाथ, पोस्‍ट क्‍यों न कर दिया जाय।

Tuesday, November 6, 2012

मौन रतनपुर

इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया का होता है और किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ता का मुख्‍य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्‍यालय के साथ-साथ धार्मिक तीर्थस्थल भी हो तो वहां इतिहास-मार्ग और भी दुर्गम हो जाता है, रतनपुर की कहानी भी कुछ इसी तरह की है।

चतुर्युगों में राजधानी के गौरव से महिमामण्डित मान्यता, मूरतध्वज की नगरी और भगवान कृष्ण की पौराणिक कथाओं से रतनपुर को सम्बद्ध कर देखा गया। महामाया, भैरव और महादेव की उपासना का केन्द्र बना और शासकों की पीढ़ियां रतनपुर के अंक में पली-बढ़ी। कहा जाता है कि इतिहास घटित होते हुए उसकी रचना नहीं हो पाती और अगर होती भी है तो वह विषयगत हो जाती है। इतिहास संयोजन का आग्रह तभी तीव्र होता है जब वह मुट्ठी की रेत जैसा छीजता जा रहा हो। शायद उन्हीं स्थितियों में बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री ने उन बिखरते वैभव को कण-कण समेटने की कोशिश की। इस क्रम का अंतिम प्रयास, विक्रम संवत 2000 समाप्‍त होने के उपलक्ष में नियोजित श्री विष्णु महायज्ञ (रतनपुर) स्मारक ग्रंथ तथा यज्ञ आयोजन की प्रेरणा में देखा जा सकता है। इसके साथ गौरव गाथा गायक देवारों का स्मरण तो अपरिहार्य है ही।

तुमान खोल के प्राकृतिक सुरक्षा आवरण से सभ्यता के मैदानी विस्तार में आने की आकुलता का परिणाम रतनपुर है, जो आज लाचार सा इतिहास-पुरातत्व के अध्ययन के लिए विषय-वस्तु बना, निरपेक्ष सा है। घटनापूर्ण और सक्रिय आठ सौ सालों का लेखा, उसकी झलकियां मात्र हो सकती हैं, लेकिन रतनपुर की ऐसी एक झलक भी चकाचौंध कराने के लिए पर्याप्त है।

कहावत यह भी है कि जिस दिन पहला पेड़ कटा होगा सभ्यता का आरंभ उसी दिन हुआ होगा। मूरतध्वज और ब्राह्मण वेशधारी ईश्वर की कथा-भूमि मान कर इस क्षेत्र में आरे का प्रयोग निषिद्ध माना जाता है। इस पौराणिक कथा में तथ्य ढूंढना निरर्थक है, लेकिन उसकी सार्थकता इस दृष्टि से अवश्य है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्यकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के व्यावसायिक दोहन का साधन बनता है। मुझे इस कथा में पर्यावरण चेतना के बीज दिखाई देते हैं।

रतनपुर राज की जमाबंदी, भू-व्यवस्थापन कलचुरि राजा कल्याणसाय के हवाले से ज्ञात होता है। मुगलकाल में राजा टोडरमल का भू-राजस्व व्यवस्थापन आरंभिक माना जाता है, लेकिन तत्कालीन छत्तीसगढ़ की व्यवस्था, जमींदारियों, ताहुतदारियों और खालसा में मालगुजारी और रैयतवारी में विभाजित कर ऐसा व्यवस्थित प्रबंधन था, जिसे अंगरेज अधिकारियों ने लगभग यथावत्‌ स्वीकार कर उसी आधार पर राजस्व व्यवस्थापन पूर्ण किया।
1995/1998? में प्रकाशित पुस्‍तक
(चित्र पुस्‍तक के चौथे संस्‍करण के मुखपृष्‍ठ का है)
के प्राक्‍कथन में 'रतनपुर का गहराता मौन'
शीर्षक से मेरी यह टिप्‍पणी है.

रतनपुर, जो कभी दरबार हुआ करता था, आज मूक साक्षी है, उन ऐतिहासिक घटनाओं का। रतनपुर किसी अदालत में जा नहीं सकता और कोई सहृदय मजिस्ट्रेट उसकी गवाही नहीं लेता, इसलिए रतनपुर का मौन गहराता जा रहा है। उसके सन्नाटे के पहले, चुप्पी तोड़ने का कोई भी संवेदनशील प्रयास इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें यह पूरे मन से मेरी कामनाओं के लिए आहुति है, यज्ञ-फल शुभ होगा, अपनी कामनाओं पर विश्वास है।

आज भारत के राष्‍ट्रपति जी छत्‍तीसगढ़ में नया रायपुर के मंत्रालय भवन 'महानदी' का लोकार्पण करेंगे।

रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'दशहरा' के अक्‍टूबर 2012 अंक में भी प्रकाशित।

Wednesday, October 31, 2012

राजधानी रतनपुर

इतिहास में राजधानी-नगरों की कहानी बड़ी अजीब होती है, कहीं तो उनका वैभव धुंधला जाता है और कभी-कभी उनकी पहचान खो जाती है। छत्तीसगढ़ या प्राचीन दक्षिण कोसल के दो प्रमुख नगरों- राजधानियों शरभपुर और प्रसन्नपुर की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। शरभपुर का समीकरण सिरपुर, मल्हार, सारंगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ स्थलों से जोड़ा गया, किन्तु प्रसन्नपुर की चर्चा भी नहीं होती। इसी प्रकार इस अंचल में कोसल नगर और 'गामस कोसलीय' नाम के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, किंतु यह स्‍थान 'कोसल' राजधानी था अथवा नहीं; या कहां स्थित था, निश्चित तौर पर यह भी नहीं तय किया जा सका है। अंचल के सर्वाधिक अवशेष सम्पन्न पुरातात्विक स्थल मल्हार का राजनैतिक केन्द्र या राजधानी होना, अभी तक अनिश्चित है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक राजधानी रतनपुर के संबंध में ऐसा कोई सन्देह नहीं है, किन्तु जैसा कि प्रत्येक राजधानी के साथ होता है, राजनैतिक आपाधापी और उलट-फेर में राजधानी-नगरों का वास्तविक सांस्कृतिक वैभव धुंधलाने लगता है। पौराणिक मान्यता है कि रतनपुर चतुर्युगों में राजधानी रहा है और लगभग हजार वर्ष का इतिहास तो ठोस प्रमाण-सम्मत है। एक हजार वर्ष की सुदीर्घ काल अवधि में कुछ घटनाओं के संकेत मिलते हैं, जिनमें चैतुरगढ़-लाफा, कोसगईं आदि स्थान भी राजसत्ता के केन्द्र बने और रतनपुर राज पर जनजातीय आक्रमणों का संकट पड़ा, किन्तु अट्ठारहवीं सदी के मध्य में मराठों के आगमन के पश्चात्‌ घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा, फलस्वरूप एक सहस्राब्दी के सम्पन्न वैभव की झांकी, आज रतनपुर में न हो, लेकिन उसका स्पन्दन वहां अवश्य महसूस किया जा सकता है।

कलचुरियों की आंचलिक प्रथम राजधानी तुम्माण का स्थानान्तरण रतनपुर को इस दृष्टिकोण से देखा जाना भी समीचीन होगा, कि यह काल कबीलाई छापामारी से विकसित होकर खुले मैदान में विस्तृत हो जाने का था और इतिहास गवाह है कि इसी के पश्चात्‌ पूरे दक्षिण कोसल क्षेत्र का पहली बार नियमित व्यवस्थापन रतनपुर राजधानी से हुआ। छत्तीस गढ़ यानि छत्तीस प्रशासनिक केन्द्रों में क्षेत्र को बांट कर राजस्व इतिहास में पहली जमाबंदी रतनपुर केन्द्र से की गई। शासन और शासित के संबंधों का निरूपण, कर वसूलने वाले और करदाता के रूप में किया जाता है, छत्‍तीसगढ़ में इस नियमित व्यवस्था की शुरुआत रतनपुर से हुई, जिसका अनुसरण बाद में अंगरेज प्रशासनिकों ने किया।

रतनपुर के वैभव और इतिहास को उजागर करने का पुनीत कार्य बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री गौरहा, अंगरेज अधिकारीगण, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, राय बहादुर हीरालाल, महामहोपाध्याय वा.वि. मिराशी, डॉ. सुधाकर पाण्डेय, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम, श्री प्यारेलाल गुप्त प्रभृत विद्वानों ने किया है लेकिन जिनका नामोल्लेख यहां नहीं है उनके प्रति और विशेषकर देवार जाति के अनाम कवि गायकों के प्रति भी श्रद्धावनत हूं, जिन्होंने परम्परागत रतनपुर राजधानी, गोपल्ला वीर, घुग्घुस राजा, रत्नदेव और बिलासा केंवटिन जैसे कितने ही पात्रों और घटनाओं को निरपेक्ष रहकर जीवन्त रखा है, जिनका उपयुक्त हवाला इतिहास में नहीं मिलता।

सन्‌ 1999 में प्रकाशित पुस्‍तक में
'सम्‍मति' शीर्षक से मेरी टिप्‍पणी से.

अतः और अंततः धन्य है ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो इतिहास में झांककर समाज के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा बनाता है, निर्जीव इतिहास से जीवन में प्रेरक आशा का उत्साह संचारित कराता है, इसलिए किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं बल्कि इस विशेष भाव का उल्लेख यहां अधिक प्रासंगिक मानता हूं। ब्रजेश श्रीवास्तव की प्रस्तुत कृति 'रतनपुर दर्शन' यहां के प्राचीन वैभव को उद्‌घाटित करने में सफल होगा, ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।  

हार्दिक शुभकामनाओं सहित...

Sunday, October 28, 2012

लहुरी काशी रतनपुर

बाबू रेवाराम से गौरवान्वित लहुरी काशी रतनपुर के काशीराम साहू (लहुरे) के माध्यम से यहां की पूरी सांस्कृतिक परम्परा सम्मानित हुई, जब इसी माह 9 तारीख को छत्तीसगढ़ के लोक नाट्‌य के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार-2011 मिला।
आठ सौ साल तक दक्षिण कोसल यानि प्राचीन छत्तीसगढ़ की राजधानी का गौरव रतनपुर के नाम रहा। इस दौरान राजवंशों की वंशावली के साथ यहां कला-स्थापत्य के नमूनों ने आकार लिया। अब यह कस्बा महामाया सिद्ध शक्तिपीठ के लिए जाना जाता है। कभी इसकी प्रतिष्ठा लहुरी काशी की थी।

तासु मध्य छत्तिसगढ़ पावन। पुण्य भूमि सुर मुनि मन भावन॥
रत्नपुरी तिनमें है नायक। कांसी सम सब विधि सुखदायक॥
जोजन पांच तासु ते छाजै। अमर कंठ रेवा तहं राजै॥

राजधानी वैभव के अंतिम चरण में उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक बाबू रेवाराम का जन्म अनुमानतः संवत 1870, यानि उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ। लगभग 60 वर्षों के जीवन काल में उनके रचित 13 ग्रंथों में एक 'कृष्ण लीला के गीत' है। इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियों पर श्री कृष्ण लीला भजनावली, रत्नपुरी चाल (संग्रहीत) और रासलीला गुटका भी लिखा गया है। गुटके की प्रतियों में उल्लेख मिलता है- 'कृष्ण चरित यह मह है जोई। भाषित रेवाराम की सोई॥' वैसे तो छत्तीसगढ़ में प्रचलित रहंस या रास और नाचा-गम्मत, इस गुटका से अलग अलग दो अन्य विधाएं हैं, लेकिन रतनपुर में कहीं घुल-मिल सी जाती हैं। बोलचाल में रतनपुरिया भजन, भादों गम्मत या सिर्फ गुटका कह दिये जाने का आशय सामान्यतः बाबू रेवाराम की उक्त परम्परा से संबंधित होता है, जो रहंस और नाचा-गम्मत से कहीं अलग है।
बाबू रेवाराम की परम्परा वाले गुटका यानि कृष्ण लीला भजनावली में वंदना, आरती, ब्यारी, गारी, जन्म लीला, पालना लीला, पूतना वध, श्रीधर लीला, गर्ग लीला, कागासुर लीला, विप्र लीला, मृत्तिका लीला, मथन लीला, दधि चोरी लीला, यमलार्जुन लीला, वच्छ चरावन लीला, वच्छ हरण लीला, गेंदलीला नागलीला, जल+पनघट+गगरी लीला, जादू लीला, वस्त्र हरण लीला, वंशी लीला, दधि-दान लीला, ओरहन लीला, मान लीला, महारास, अन्तर्ध्यान, विरह-भजन, कृष्ण मिलन, मंगल आरती जैसे तीस भागों में ढाई सौ पद-श्लोक हैं। रतनपुर में अब भी गणेश चतुर्थी और शरद पूर्णिमा के अवसर पर गम्मत आयोजित होते है, बाबूहाट, करैहापारा में 2007 में भादों गम्मत आयोजन का 127 वां वर्ष था।
रतनपुर में लीला संस्कारित पीढ़ी अभी भी जीवंत है। नवरात्रि पर देवी भजन गुटका के माता सेवा के गीत और होली के दौर में फागुन गुटका का फाग भजन-गीत होता है। यहां परम्परा का असर दिनचर्या में, आचरण-व्यवहार में, पूजा-पाठ, पीताम्बर धारण करना, यों कहें- पूरी जीवनचर्या की अन्तर्धारा में लीला आज भी विद्यमान है। आसपास मदनपुर, खैरा, रानीगांव, भरारी, मेलनाडीह, पोंड़ी, बापापूती, चपोरा, सरवन देवरी और कर्रा जैसे कई गांवों में यह धारा प्रवाहित है। रतनपुरिया भजन से संबंधित कुछ ऐसे लोगों के चित्र, जिनमें निहित लीला-विस्तार को सुन-देख कर समझने का प्रयास करता रहा-

भंगीलाल तिवारी - काशीराम साहू (लहुरे) - दाऊ लक्ष्मीनारायण

दुर्गाशंकर कश्यप - दाऊ बद्री विशाल - बलदेव प्रसाद मिश्र

शिव प्रसाद तंबोली - ईश्वरगिर गोस्वामी - रामकुमार तिवारी

हरिराम साहू - रामकृष्ण पांडेय - काशीराम साहू (जेठे)

रामकिशोर देवांगन - रामप्रसाद साहू - किशन तंबोली
रहंस में पूरा गांव लीला-भूमि और लीला के आयोजन में गांव का गांव कैसे इसका अभिन्‍न हिस्‍सा हो जाता है यह कुछ हद तक कैमरा ही देख सकता है, व्यक्ति के लिए सिर्फ दर्शक बना रहना संभव नहीं हो पाता, दृश्‍य घुल कर कैसे रस बन जाते हैं, तभी पता लगता है, जब लीला पूरी हो जाती है। ''श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभं, जानकी नायकं रामचंद्रं भजे। बोलो श्री राधाकृष्ण की जै। श्री वृन्दावन बिहारी की जै।'' इन अंतिम पंक्तियों के बाद लेकिन, असर बच जाता है- लीला अपरम्पार।

Friday, October 19, 2012

रविशंकर

छत्तीसगढ़ के सजग जोड़ा शहर दुर्ग-भिलाई से पत्रकार कानस्कर जी का फोन आया, रविशंकर जी नहीं रहे। मेरे कानों में कुछ देर स्मृति में दर्ज उनकी खिलखिलाहट बजती रही। उनसे आमने-सामने का संपर्क बहुत पुराना नहीं था, मगर अपेक्षा-रहित उनके भरोसे का संबल मुझे अनायास मिलता रहा। ऐसे निरपेक्ष विश्वासी कम ही होते हैं।
पं. रविशंकर शुक्‍ल
21.01.1927-10.10.2012
उनका निवास भिलाई के सेक्टर-5 में था। पहली बार उनके घर गया। बात होने लगी, 'घर ढूंढने में कोई अड़चन तो नहीं हुई', मैंने कहा- आपने अपने घर के रास्ते का नामकरण जीते-जी करा लिया है 'पं. रविशंकर शुक्ल पथ' (वस्तुतः उनके हमनाम पूर्व मुख्‍यमंत्री)। धीर-गंभीर, प्रशांत, लगभग भावहीन चेहरा और खोई सी आंखें, लेकिन देखकर सहज पता लग जाता कि उनके मन में लगातार कुछ चल रहा है, रचा जा रहा है, मेरा जवाब सुनकर, थोड़ा ठिठके फिर खिलखिला पड़े थे, बालसुलभ-दुर्लभ अविस्मरणीय हंसी। उदार इतने कि आपके रुचि की पुस्तक या ऐसी कोई वस्तु उनके पास हो तो सौंपने को उद्यत होते।

छत्तीसगढ़ का पारम्परिक नाचा-गम्मत पचासादि के दशक में 'लोकमंच' में बदलने लगा। श्वसुर डॉ. खूबचंद बघेल और पृथ्वी थियेटर के नाटकों से प्रेरित दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 1950 में 'छत्तीसगढ़ी देहाती कला विकास मंडल' स्थापना की, आरंभिक दौर में नाटक मंचित करते, लेकिन बड़ी और विशेष उल्लेखनीय प्रस्तुति 26 और 27 फरवरी 1953 को पिनकापार में हुई। यही मंच ऐतिहासिक 'चंदैनी गोंदा' की पृष्ठभूमि बना, जिसकी स्थापना 7 नवंबर 1971 को हुई।

दाऊजी के शब्दों में- ''भटकने की नियति आरंभ हुई। रात-रात भर गाड़ी में, कड़कती हुई धूप में, धूल भरे कच्चे रास्तों पर भटकना, गांवों में कलाकार ढूंढना ...।'' प्रतिभाएं तलाशी-तराशी गईं। लाला फूलचंद, लक्ष्मण दास, ठाकुरराम, भुलवा, मदन, लालू जुड़े। बांसुरी-संतोष टांक, बेन्जो-गिरिजा सिन्हा, तबला-महेश ठाकुर, मोहरी-पंचराम देवदास पर्याय बनते गए। टेलर मास्टर, कवि-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया, राजभारती आर्केस्ट्रा के गायक-अभिनेता भैयालाल हेड़उ, कविता हिरकने-वासनिक, केदार यादव, अनुराग ठाकुर साथ हुए।

दाऊजी और संगीतकार खुमान साव के साथ कवि-गायक रविशंकर शुक्ल की त्रयी, चंदैनी गोंदा की सूत्रधार बनी। शुक्ल जी का रचा शीर्षक गीत- 'देखो फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे। एखर रंग रूप हा जिउ मा, मिसरी साही घुर गे।' छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन के मिठास का प्रतिनिधि गीत बन गया।

रविशंकर जी की ज्यादातर रचनाएं लोकप्रिय हुई, इनमें से कुछ खास, जिन्होंने सभी के कानों में मिसरी घोली- 'झिमिर झिमिर बरसे पानी। देखो रे संगी देखो रे साथी। चुचुवावत हे ओरवांती। मोती झरे खपरा छानी।' फगुनाही गीत है- 'फागुन आ गे, फागुन आ गे, फागुन आगे, संगी फागुन आ गे, देखौ फागुन आ गे। अइसन गीत सुनाइस कोइली, पवन घलो बइहा गे।' और 'धरती मइया सोन चिरइया। देस के भुइयां, मोर धरती मइया।' जैसा गौरव-बोध का गीत। उनके रचे-गाए गीत बनारस की सरगम रिकार्ड कंपनी से बने पर स्‍वाभिमानी ऐसे कि गीत के बोल पसंद न आए, तो गीत गाने के फायदेमंद प्रस्‍ताव की परवाह नहीं करते।

आपने 'तइहा के बात ले गे बइहा गा' / 'फुगड़ी फू रे फुगड़ी फू' / 'सुन सुवना' / 'घानी मुनी घोर दे, पानी दमोर दे' जैसी पारम्परिक पंक्तियों को ले कर भी कई गीत रचे। उनकी लोरी 'सुत जा ओ बेटी मोर, झन रो दुलौरिन मोर। फेर रतिहा पहाही, अउ होही बिहनिया। आही सुरुज के अंजोर। सुत जा ...' में रात के मीठे सपने नहीं, बल्कि सुबह की आस का अनूठा प्रयोग है।
निधन के तीन दिन पूर्व का चित्र
सम्‍मानित हुए और इस अवसर पर गीत भी सुनाया
चित्र सौजन्‍य - आरंभ वाले श्री संजीव तिवारी, भिलाई

उनका पहला संग्रह 'धरती मइय्या' 2005 में चौथेपन में आया। अपनी बात में उन्होंने लिखा- ''चन्दैनी गोंदा, दौना पान, नवा बिहान व अनेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए मैंने गीत लिखे, किन्तु अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार न दे सकने का दुख छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन, दुर्ग द्वारा मानस भवन में अपने साहित्य सम्मान के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मैंने व्यक्त किया था। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के छोटे आर्थिक सहयोग से इस दुख से मुक्ति पा सका और यह संग्रह प्रस्तुत कर सका।'' इसी पुस्तक का अंतिम गीत है-

चल मोर संगी उसल गे बजार।
का बेंचे तॅंय हा अउ का बिसाये।
बड़े मुंधेरहा ले लेड़गा तॅंय आये॥

पिंजरा के धंधाये सोन चिरइ उड़ि गे।
माटी के चोला हा माटी म मिलि गे॥

तॅंय बइठे का देखत हावस आंखी फार-फार।
चल मोर संगवारी उसल गे बजार॥

एक दिन आए, बताया, अस्पताल से आ रहे हैं। कहा- तबियत ठीक है, बस एक कागज बनवाने गया था, आप भी इसकी प्रति अपने पास रखें, बिना कागज देखे मैंने अफसरी सवाल किया, ये बताइए कि करना क्या है, उन्होंने कहा, कुछ नहीं, बस अपने पास रखिए। तब मैंने कागज पर नजर डाली, वह था वसीयतनामा (मृत्‍योपरांत शरीर दान का घोषणा पत्र), मेरे और कुछ कहने से पहले रवानगी को तैयार हो गए।

अंतिम दिनों में अशक्त होने पर भी श्री जी संस्था के लिए सक्रिय रहे। भिलाई आ कर उनसे मिलने की बात हुई तो पते के लिए खास किस्‍म का 'विजिटिंग कार्ड' दिया। छपे हुए पते को 'बदल गया है' कहते हुए काट कर सुधारा।

अब उनका पता फिर बदल गया, लेकिन अपने गीतों में वे अभी भी हम सब के साथ हैं।

Monday, October 8, 2012

शेष स्मृति

2 अक्टूबर, नाटक और खास कर बिलासपुर से जुड़े लोगों के लिए, डॉ. शंकर शेष की जयंती के रूप में भी याद किया जाता है (यही यानि 2 अक्‍टूबर डॉ. शेष की पत्‍नी श्रीमती सुधा की जन्‍मतिथि है) और यह बीत जाए तो अक्टूबर की ही 28 तारीख उनकी पुण्यतिथि है। डॉ. शेष (1933-1981) के साथ बिलासपुर के नाटकीय इतिहास-थियेटर की यादें भी दुहराई जा सकती हैं।
डॉ. शंकर शेष
भागीरथी बाई शेष
बिलासपुर से जुड़ा बिलासा का किस्सा इतिहास बनता है, भोसलों और भागीरथी बाई शेष (1857-1947) के नाम के साथ। पति पुरुषोत्तम राव के न रहने पर निःसंतान मालगुजारिन भागीरथी बाई को उत्तराधिकारी की तलाश थी। बात आसान न थी लेकिन पता लगा कि उन्हीं के परिवार के भण्डारा निवासी विनायक राव पेन्ड्रा डाकघर में कार्यरत हैं। वसीयतनामा तैयार हो गया। कहानी, इतिहास बनी।

1861 में पृथक जिला बने बिलासपुर में रेल्वे के लिए जमीन की जरूरत हुई। उदारमना भागीरथी बाई जमीन दान देने को तैयार हुई, किन्तु अंगरेजों को 'देसी का दान' मंजूर नहीं हुआ और बताया जाता है कि 1885 में तत्कालीन मध्यप्रान्त के चीफ कमिश्नर सर चार्ल्स हाक्स टॉड ने बिलासपुर रेलवे स्टेशन और रेलवे कालोनी के लिए 139 एकड़ जमीन के लिए 500 रुपए मुआवजा दे कर बिक्रीनामा लिखाया।

विनायक राव की पत्नी सीताबाई थीं, उनके तीन पुत्रों में बड़े नागोराव हुए, जो उसी बिक्रीनामा के आधार पर भू-वंचित माने जा कर रेलवे में क्लर्क नियुक्त हुए। नागोराव की पहली पत्नी जानकीबाई और दूसरी पत्नी सावित्री बाई थीं।
सावित्री बाई नागोराव शेष
दूसरी पत्नी के पुत्रों में बड़े बबनराव, फिर बालाजी, तीसरे (डॉ.) शंकर (शेष), उसके बाद विष्णु और सबसे छोटे गोपाल हुए। नागोराव (निधन- 17 दिसम्‍बर 1960), जिनके नाम पर जूना बिलासपुर का पुराना स्कूल है, रेलवे में क्लर्क रहे, लेकिन सोहराब मोदी का थियेटर अपने शहर में देखने-दिखाने की धुन थी, नतीजन 1929 में श्री जानकीविलास थियेटर बना, जिसके लिए हावड़ा की बर्न एंड कं. लि. से सन '29 तिथि अंकित नक्शा बन कर आया था।
पारसी नाटकों, मूक फिल्मों और फिर बिलासपुर फिल्म इतिहास के लंबे दौर का साक्षी, दसेक साल से बंद यह थियेटर मनोहर टाकीज कहलाता है। हुआ यह कि पेन्‍ड्रा के जाधव परिवार के मंझले, मनोहर बाबू वहां सिनेमा का काम करते रहे, छोटे डिगू बाबू ने दुर्ग में तरुण टाकीज का काम संभाला और बड़े भाई, दत्‍तू बाबू बिलासपुर आ कर इसका संचालन करने लगे। इस तरह श्री जानकीविलास थियेटर का नया नाम 'मनोहर' भी पेन्‍ड्रा से आया और पेन्‍ड्रा वाले ही विनायक राव के पुत्र, बिलासपुर में थियेटर के पितृ-पुरुष नागोराव शेष हुए और हुए उनके पुत्र डॉ. शंकर शेष।
मनोहर टाकीज - श्री जानकी विलास थियेटर के साथ डॉ. गोपाल शेष
तब 'सारिका' में डॉ. शेष का कथन छपा था- ''सन 1979 की बात है। मैं भोपाल में था। उन दिनों विनायक चासकर ने मेरा नाटक 'बिन बाती के दीप' उठाया था। मुझे भी नाटक में एक भूमिका दी गई। कैप्टन आनंद की भूमिका। दो दिन रिहर्सल हुई फिर चासकर को लगा कि अगर शेष को कैप्टन आनंद बनाया गया तो और कुछ हो या ना हो, नाटक पिट जाएगा। तो लेखक की नाटक से छुट्‌टी हो गई। इस घटना के बाद मुझे एहसास हुआ और मैंने नियति की तरह इसे स्वीकार किया कि अभिनय करना मेरे बस की बात नहीं।'' यह संक्षिप्त किन्तु रोचक अंश डॉ. शेष की भाषा-शैली सहित उनकी प्रभावी सपाटबयानी का समर्थ उदाहरण है।
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डॉ. शंकर शेष की रचनाओं की व्यवस्थित सूची-जानकारी मिली नहीं, अलग-अलग स्रोतों से एकत्र कर डा. शेष की कृतियों को विधा और रचना वर्ष के क्रम में रखने का प्रयास किया है, जिसमें संशोधन संभावित है, इस प्रकार है-

नाटक
1955- मूर्तिकार, रत्नगर्भा, नयी सभ्यताःनये नमूने, विवाह मंडप (एकांकी)
1958- बेटों वाला बाप, तिल का ताड़, हिन्दी का भूत (एकांकी)
1959- दूर के दीप (अनुवाद)
1968- बिन बाती के दीप, बाढ़ का पानीःचंदन के दीप, बंधन अपने-अपने, खजुराहो का शिल्पी, फन्दी, एक और द्रोणाचार्य, त्रिभुज का चौथा कोण (एकांकी), एक और गांव (अनुवाद)
1973- कालजयी (मराठी व हिन्दी), दर्द का इलाज (बाल नाटक), मिठाई की चोरी (बाल नाटक), चल मेरे कद्‌दू ठुम्मक ठुम (अनुवाद)
1974- घरौंदा, अरे! मायावी सरोवर, रक्तबीज, राक्षस, पोस्टर, चेहरे
1979- त्रिकोण का चौथा कोण, कोमल गांधार, आधी रात के बाद, अजायबघर (एकांकी), पुलिया (एकांकी), पंचतंत्र (अनुवाद), गार्बो (अनुवाद), सुगंध (एकांकी), प्रतीक्षा (एकांकी), अफसरनामा (एकांकी)

पटकथा
1978- घरौंदा,1979- दूरियां, सोलहवां सावन (संवाद)

कहानी
1979 से 1981- ओले, एक प्याला कॉफी का, सोपकेस

उपन्यास
1956- तेंदू के पत्ते 1971- चेतना, खजुराहो की अलका, धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे (अपूर्ण)

अनुसंधान
1961- हिन्दी और मराठी तथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन
1965- छत्तीसगढ़ी का भाषाशास्त्रीय अध्ययन
1967- आदिम जाति शब्द-संग्रह एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन

डॉ. शेष नाटक प्रेमियों में जिस तरह स्‍वीकृत थे, फिर उनके सम्‍मान-पुरस्‍कार का उल्‍लेख बहुत सार्थक नहीं होगा, लेकिन एक जिक्र यहां आवश्‍यक लगता है- नागपुर के प्रसिद्ध धनवटे नाट्य गृह का शुभारंभ 1958 में डॉ. शेष के नाटक 'बेटों वाला बाप' से(?) होने की सूचना मिलती है।
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''इस बार तुमको अरपा नदी दिखाएंगे और अरपा नदी के पचरी घाट,'' बम्बई से चलने के पहले डॉ. शंकर शेष ने तय किया कि अपनी पत्नी को अपने पुराने शहर के सारे ठिकाने, जिनके साथ उनका पूरा बचपन और बचपन की कितनी-कितनी कथाएं जुड़ी हैं, जरूर दिखाकर लाएंगे।

उपरोक्त अंश पैंतीसेक साल पहले 'रविवार' में छपी, सतीश जायसवाल की कहानी ''मछलियों की नींद का समय'' का है। कहानी के नायक डॉ. शंकर शेष हैं और एक पात्र सतीश (कहानी के लेखक स्वयं) भी है। पूरी कहानी डॉ. शेष के बिलासपुर, समन्दर-नदी-तालाब-हौज के पानी, जलसाघर-थियेटर-संग्रहालय-किला-मछलीघर और मछलियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। पंचशील पार्क की अहिंसक मछलियां। मामा-भानजा तालाब (शेष ताल) की बड़ी-बड़ी मछलियां। कहानी में वाक्य है- ''श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष के इस शहर में कुछ भी गैर-सांस्कृतिक नहीं हो सकता।'' और यह भी- ''डॉ. साहब, अरे मायावी सरोवर और अपने मामा-भानजा तालाब के बीच क्या कोई संबंध है?''

सतीश जी की इस कहानी के बहाने कुछ और बातें। बिलासपुर के साथ मछुआरिन बिलासा केंवटिन का नाम जुड़ा है।... ... ... श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष, बिलासपुर के चार ''एस'' कहे जाते हैं। ... ... ... आंखों पर पट्‌टी बांधी गांधारी का डॉ. शेष का नाटक 'कोमल गांधार' और सत्यदेव दुबे के 'अन्धा युग' की अदायगी के साथ यहां संयोग बनता है कि डॉ. शंकर तिवारी ने 1958-59 में खोजा कि कांगेर घाटी, बस्तर की कुटुमसर गुफाओं में दो-ढाई इंच लंबी बेरंग मछलियां हैं, उजाले के अभाव में इनकी आंखों पर झिल्लीनुमा पर्दा भी चढ़ गया है। साथ ही उनके द्वारा 15-20 सेंटीमीटर मूंछों वाले अंधे झींगुर 'शंकराई कैपिओला' Shankrai Capiola की खोज प्रकाशित की गई। यह भी कि इस कहानी के बाद सतीश जी यदा-कदा बिलासपुर के पांचवें ''एस'' गिने गए।

कहानी ''मछलियों ...'' का अंतिम वाक्य है- इस बार, बम्बई से साथ आई हुई पत्नी ने पहली बार आपत्ति की, ''यह मछलियों की नींद का समय है और लोग शिकार पर निकले हैं।''
थियेटर के भीतर अब अंधेरा-परदा
प्रमिला काले, जिनका शोध (1986) है
''नव्‍य हिन्‍दी नाटकों के संदर्भ में
डॉ. शंकर शेष के नाटकों का शिल्‍पगत अनुशीलन
सभी ऐतिहासिक पात्र, नामों के प्रति आदर।