Tuesday, November 6, 2012

मौन रतनपुर

इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया का होता है और किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ता का मुख्‍य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्‍यालय के साथ-साथ धार्मिक तीर्थस्थल भी हो तो वहां इतिहास-मार्ग और भी दुर्गम हो जाता है, रतनपुर की कहानी भी कुछ इसी तरह की है।

चतुर्युगों में राजधानी के गौरव से महिमामण्डित मान्यता, मूरतध्वज की नगरी और भगवान कृष्ण की पौराणिक कथाओं से रतनपुर को सम्बद्ध कर देखा गया। महामाया, भैरव और महादेव की उपासना का केन्द्र बना और शासकों की पीढ़ियां रतनपुर के अंक में पली-बढ़ी। कहा जाता है कि इतिहास घटित होते हुए उसकी रचना नहीं हो पाती और अगर होती भी है तो वह विषयगत हो जाती है। इतिहास संयोजन का आग्रह तभी तीव्र होता है जब वह मुट्ठी की रेत जैसा छीजता जा रहा हो। शायद उन्हीं स्थितियों में बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री ने उन बिखरते वैभव को कण-कण समेटने की कोशिश की। इस क्रम का अंतिम प्रयास, विक्रम संवत 2000 समाप्‍त होने के उपलक्ष में नियोजित श्री विष्णु महायज्ञ (रतनपुर) स्मारक ग्रंथ तथा यज्ञ आयोजन की प्रेरणा में देखा जा सकता है। इसके साथ गौरव गाथा गायक देवारों का स्मरण तो अपरिहार्य है ही।

तुमान खोल के प्राकृतिक सुरक्षा आवरण से सभ्यता के मैदानी विस्तार में आने की आकुलता का परिणाम रतनपुर है, जो आज लाचार सा इतिहास-पुरातत्व के अध्ययन के लिए विषय-वस्तु बना, निरपेक्ष सा है। घटनापूर्ण और सक्रिय आठ सौ सालों का लेखा, उसकी झलकियां मात्र हो सकती हैं, लेकिन रतनपुर की ऐसी एक झलक भी चकाचौंध कराने के लिए पर्याप्त है।

कहावत यह भी है कि जिस दिन पहला पेड़ कटा होगा सभ्यता का आरंभ उसी दिन हुआ होगा। मूरतध्वज और ब्राह्मण वेशधारी ईश्वर की कथा-भूमि मान कर इस क्षेत्र में आरे का प्रयोग निषिद्ध माना जाता है। इस पौराणिक कथा में तथ्य ढूंढना निरर्थक है, लेकिन उसकी सार्थकता इस दृष्टि से अवश्य है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्यकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के व्यावसायिक दोहन का साधन बनता है। मुझे इस कथा में पर्यावरण चेतना के बीज दिखाई देते हैं।

रतनपुर राज की जमाबंदी, भू-व्यवस्थापन कलचुरि राजा कल्याणसाय के हवाले से ज्ञात होता है। मुगलकाल में राजा टोडरमल का भू-राजस्व व्यवस्थापन आरंभिक माना जाता है, लेकिन तत्कालीन छत्तीसगढ़ का खालसा हिस्सा दाऊ-दीवान-गौंटिया, मालगुजारी और रैयतवारी में विभाजित ऐसा व्यवस्थित प्रबंधन था, जिसे अंगरेज अधिकारियों ने लगभग यथावत स्वीकार कर उसी आधार पर राजस्व व्यवस्थापन पूर्ण किया।
1995/1998? में प्रकाशित पुस्‍तक
(चित्र पुस्‍तक के चौथे संस्‍करण के मुखपृष्‍ठ का है)
के प्राक्‍कथन में 'रतनपुर का गहराता मौन'
शीर्षक से मेरी यह टिप्‍पणी है.

रतनपुर, जो कभी दरबार हुआ करता था, आज मूक साक्षी है, उन ऐतिहासिक घटनाओं का। रतनपुर किसी अदालत में जा नहीं सकता और कोई सहृदय मजिस्ट्रेट उसकी गवाही नहीं लेता, इसलिए रतनपुर का मौन गहराता जा रहा है। उसके सन्नाटे के पहले, चुप्पी तोड़ने का कोई भी संवेदनशील प्रयास इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें यह पूरे मन से मेरी कामनाओं के लिए आहुति है, यज्ञ-फल शुभ होगा, अपनी कामनाओं पर विश्वास है।

आज भारत के राष्‍ट्रपति जी छत्‍तीसगढ़ में नया रायपुर के मंत्रालय भवन 'महानदी' का लोकार्पण करेंगे।

रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'दशहरा' के अक्‍टूबर 2012 अंक में भी प्रकाशित।

13 comments:

  1. मौन कहाँ मौन रहता है, वह भी सभ्यताओं का।

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  2. आभार -
    आरे के उपयोग को, वर्जित कर इतिहास |
    वन रक्षा में दे रहा, योगदान है ख़ास ||

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. रतनपुर का मौन गहराता जा रहा है। उसके सन्नाटे के पहले, चुप्पी तोड़ने का कोई भी संवेदनशील प्रयास इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें यह पूरे मन से मेरी कामनाओं के लिए आहुति है, यज्ञ-फल शुभ होगा, अपनी कामनाओं पर विश्वास है।

    **मौन जब गहराता है संवादहीनता की स्थिति बनती और मेरे व्यक्तिगत मतानुसार संवादहीनता अंत में मृत्यु की स्थिति को जन्म देती है , मौन के पूर्व इतिहास के शेष साक्षियों से साक्ष्यों को सकलित करने का कार्य आप जैसे विद्वानों द्वारा पूर्व में भी किया गया है और अब कर लिया जाये तो क्या बुरा . तब मौन बतलायेगा अपनी जीवंत गाथा . आपके लेखन को प्रणाम**

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  5. सुंदर प्रस्तुति

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  6. "रतनपुर, जो कभी दरबार हुआ करता था, आज मूक साक्षी है, उन ऐतिहासिक घटनाओं का। रतनपुर किसी अदालत में जा नहीं सकता और कोई सहृदय मजिस्ट्रेट उसकी गवाही नहीं लेता, इसलिए रतनपुर का मौन गहराता जा रहा है। उसके सन्नाटे के पहले, चुप्पी तोड़ने का कोई भी संवेदनशील प्रयास इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें यह पूरे मन से मेरी कामनाओं के लिए आहुति है, यज्ञ-फल शुभ होगा, अपनी कामनाओं पर विश्वास है।"

    आपकी कामनाओं को मेरा भी नैतिक बल समर्थित है।

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  7. 'मौन' भी बोलता है। यह सुनाई पडता है आपके माध्‍यम से, आपकी ऐसी सर्वकालिक पोस्‍टों से।

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  8. वन संरक्षण का अपने जमाने का अबिनव प्रयोग ।
    जिस पुस्तक का कवर दिया है उसके बारे में भी थोडा विस्तार से बतायें कभी ।

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  9. रतनपुर ले चलने के लिए आभार

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  10. रतनपुर का मौन भी बहुत कुछ कहता है.

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  11. सिंह साहब, अपने उत्थान और पतन का कारण मनुष्य खुद ही है, कंक्रीट के वनों के चक्कर में हम असली चीजो से मुह मोड़ रहे है! अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद !

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  12. मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ,
    मैं शान्त बहुत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ
    यह सर सर यह खड़ खड़ सब मेरी है
    है यह रहस्य मैं इसको खोल रहा हूँ।

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