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| बुल्के जी की हस्तलिपि का नमूना
21-12-60 को रामवन, सतना के
बाबू शारदाप्रसाद जी को लिखा पत्र,
जिसमें 'भक्त शबरी' व रामकथा
संबंधी अन्य पुस्तकों का उल्लेख है।
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दूसरे, देवकीनंदन-दुर्गाप्रसाद खत्री याद आ रहे हैं, चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, रोहतास मठ और विज्ञान फंतासियों वाले। यह वह दौर था जब भारतीय भाषाओं के नाम पर बांगला का ही प्रचार था और इसी भाषा में ढेरों मौलिक साहित्य और अनुवाद उपलब्ध होता था। कहा जाता है कि खत्री जी की इन किताबों को पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी। उन्होंने शायद कभी हिन्दी सेवा का दंभ नहीं भरा और उन्हें इस तरह से याद भी कम ही किया जाता है। बरेली वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक का राधेश्यामी रामायण और उनके नाटक, मुंशी सदासुखलाल का सुखसागर, सबलसिंह चौहान का महाभारत और गीता प्रेस, गोरखपुर की पत्रिका 'कल्याण' के नामोल्लेख के बिना बात अधूरी होगी।
इसके बाद पचास के दशक से आरंभ होने वाला पूरा दौर रहा है इलाहाबाद से छपने वाली किताबों का, जब उर्दू जासूसी दुनिया का बांगला और हिन्दी उल्था होता। लेखक इब्ने सफ़ी (सफ़ी के बेटे- असली नाम असरार अहमद), बीए और हिन्दी अनुवादक प्रेमप्रकाश, बीए। जासूसी दुनिया प्रेमियों को खबर जरूर होगी कि ये किताबें आजकल मद्रास से रीप्रिंट हो कर एएचव्हीलर पर 60 रु. में मिल जा रही हैं। जासूसी साहित्य में ओमप्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक की भी लंबी पारी रही है। दूसरा महत्वपूर्ण नाम याद आता है कुसुम प्रकाशन, जिसमें भयंकर जासूस सीरीज के लेखक नकाबपोश 'भेदी' और प्रमुख पात्र इंस्पेक्टर वर्मा-सार्जेन्ट रमेश होते। इसी तरह भयंकर भेदिया सीरीज के लेखक सुरागरसां होते और जासूस जोड़ी बैरिस्टर सुरेश-सहकारी कमल कहलाती।
इसके अलावा सामाजिक उपन्यास कुसुम सीरीज में छपते जिनके लेखकों में एक खरौद, छत्तीसगढ़ के श्री एमएल (मनराखनलाल) द्विवेदी भी होते। जासूस महल की किताबें होतीं और अंगरेजी से अनूदित मिस्टर ब्लैक, टिंकर की जासूसी होती तो दूसरी ओर बहराम चोट्टा। इस दौर में हिंदी किताब का लगभग अर्थ जासूसी पुस्तक ही होता। जासूसी उपन्यासों की महिमा के कुछ उल्लेख प्रासंगिक होंगे- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीे 'चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति को निःसंकोच सबसे प्रिय उपन्यास कहते और पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर आग लग जाए तो आप अपनी कौन सी किताब बचाना चाहेंगे, जवाब था मेरी कृतियों के बजाय मैं उन जासूसी कहानी संग्रह को पहले बचाना चाहूंगा, जो मेरा अधिक मनोरंजन करती हैं। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, अमृतलाल नागर के भी प्रिय रहे वहीं मुक्तिबोध, स्टेनली गार्डनर और अगाथा क्रिस्टी को भी पढ़ना पसंद करते थे।
इसके अलावा सामाजिक उपन्यास कुसुम सीरीज में छपते जिनके लेखकों में एक खरौद, छत्तीसगढ़ के श्री एमएल (मनराखनलाल) द्विवेदी भी होते। जासूस महल की किताबें होतीं और अंगरेजी से अनूदित मिस्टर ब्लैक, टिंकर की जासूसी होती तो दूसरी ओर बहराम चोट्टा। इस दौर में हिंदी किताब का लगभग अर्थ जासूसी पुस्तक ही होता। जासूसी उपन्यासों की महिमा के कुछ उल्लेख प्रासंगिक होंगे- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीे 'चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति को निःसंकोच सबसे प्रिय उपन्यास कहते और पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर आग लग जाए तो आप अपनी कौन सी किताब बचाना चाहेंगे, जवाब था मेरी कृतियों के बजाय मैं उन जासूसी कहानी संग्रह को पहले बचाना चाहूंगा, जो मेरा अधिक मनोरंजन करती हैं। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, अमृतलाल नागर के भी प्रिय रहे वहीं मुक्तिबोध, स्टेनली गार्डनर और अगाथा क्रिस्टी को भी पढ़ना पसंद करते थे।
तीसरे, हिन्दी फिल्में हैं, जिसने हिन्दी को न सिर्फ फैलाया, बल्कि प्रचलित रखने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है और रहेगी, क्योंकि भाषा के लिए गंभीर साहित्य के साथ उसका प्रचलन में रहना जरूरी है। यदि आमतौर पर भारत की सम्पर्क भाषा अंगरेजी मानी जाती है तो इसके समानांतर आमजन की वास्तविक सम्पर्क भाषा, उत्तर से दक्षिण तक हिन्दी है और वह अधिकतर फिल्मों के कारण ही है। हिन्दी साहित्यकारों में ज्यादातर ने अपने नाम से या नाम छुपा कर हिन्दी फिल्मों के लिए काम किया है। राही मासूम रजा, कमलेश्वर और बाद में मनोहर श्याम जोशी, फिल्मों-सीरियल से जुड़े सबसे ज्यादा उजागर नाम रहे। इस संदर्भ में आनंद बक्षी जैसे गीतकार और फिल्मी गीत भी याद आ रहे हैं। ''सुनो, कहो, कहा, सुना, कुछ हुआ क्या, अभी तो नहीं, कुछ भी नहीं, चली हवा, उठी घटा...'' जैसे गीतों से ले कर मेरे नैना सावन भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा, तक जैसे गीत। और फिर सलीम-जावेद जोड़ी के फिल्मी संवाद- ‘कितने आदमी थे‘, ‘मेरे पास मां है‘, या ‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता‘। यह सब चाहे व्यावसायिक-बाजारू, हल्का-फुल्का और मनोरंजन के लिए गिना जाए, मगर हिन्दी की लोकप्रियता, लोगों की जबान पर चढ़ने के लिए कम महत्व का नहीं।
हिन्दी की पृष्ठभूमि मजबूत मानी जा सकती है, वैदिक-लौकिक संस्कृत से प्राकृत-पालि और अपभ्रंश हो कर खड़ी बोली तक, लेकिन उसका इतिहास पुराना नहीं है और यही कारण है कि हिन्दी के विद्वानों को याद करें तो वे और उनकी पृष्ठभूमि में या कहें अधिकार की मूल भाषा उर्दू(अरबी-फारसी), संस्कृत या अंगरेजी होती है। यहीं राजाजी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ तमिलभाषी रांगेय राघव और कन्नड़भाषी नारायण दत्त की हिन्दी साधना भी स्मरणीय हैं। आशय यह कि हिन्दी सेवा के लिए लगातार सहज भाव से उद्यम आवश्यक है और इसमें वक्त भी लगना ही है। भाषाएं यों ही खड़ी नहीं हो जातीं। हां, हिन्दी की पृष्ठभूमि और इतिहास पर मेरी दृष्टि में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की दो पुस्तकें, हिन्दी साहित्य का आदिकाल और हिन्दी साहित्य की भूमिका के साथ उनके कुछ निबंध सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।
हम में से अधिकतर, बच्चों के सिर्फ अंगरेजी ज्ञान से संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसकी फर्राटा अंगरेजी पर पहले चमत्कृत फिर गौरवान्वित होते हैं। चैत-बैसाख की कौन कहे हफ्ते के सात दिनों के हिन्दी नाम और 1 से 100 तक की क्या 20 तक की गिनती पूछने पर बच्चा कहता है, क्या पापा..., पत्नी कहती है आप भी तो... और हम अपनी 'दकियानूसी' पर झेंप जाते हैं। आगे क्या कहूं आप सब खुद समझदार हैं।
मैं सोचने लगा कि क्या हम भाषा में सोचते हैं और हां तो मैं किस भाषा में सोचता हूं। लगता है, रोजमर्रा काम-काज को हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में, गंभीर अकादमिक विषय-वस्तु, अंगरेजी और हिन्दी (उर्दू शामिल) में कभी संस्कृत में भी और किसी विद्वान का सहारा हो तो इंडो-आर्यन और इंडो-यूरोपियन तक। मन की ठाट, अपनी पहली जबान, सिर्फ छत्तीसगढ़ी में (सरगुजिया, हल्बी शामिल) और कभी इससे अलग तो भोजपुरी या बुंदेली में। बोलने में सबसे सहज छत्तीसगढ़ी, फिर हिन्दी को पाता हूं, कभी लंबी सोहबत रही तो जबान पर भोजपुरी और बुंदेली भी आ जाती है। कोई जर्मन, फ्रेंच या इटैलियन मिल जाए सिर्फ तभी अंगरेजी। पढ़ने में हिन्दी सहजता से, अंगरेजी सुस्ती से और छत्तीसगढ़ी (बचपन में बांगला) कठिनाई से। मैं हिन्दी का प्रबल पक्षधर, क्योंकि जिसे जो भी और जितनी भी आती है, हिन्दी ही आती है। जी हां, मेरे सहज लिख पाने की भाषा सिर्फ और सिर्फ हिन्दी है।
सवाल होता है, हिन्दी दिवस मनाने से क्या होगा? पता नहीं, लेकिन जवाब मैं इस सवाल से मिला कर ढूंढने का प्रयास करता हूं, क्या जन्म दिन मनाने से आयु बढ़ जाती है?
यहां आई अधिकांश बातें आशय मात्र हैं, तथ्य की दृष्टि से भिन्न हो सकती हैं। कभी टिप्पणी, कभी मेल पर या यहां-वहां लिख चुका हूं, वही तरतीबवार जोड़ने का प्रयास है। किसी का नाम लेने-छोड़ने या सूची बनाने का प्रयास यहां कतई नहीं है। सभी, खासकर अज्ञात, अल्पज्ञात हिन्दी सेवियों को नमन।

