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Monday, March 30, 2020

कौन हूँ मैं


मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कौन हूँ मैं‘, सन 2006 में उनके निधन के बाद आया। 450 से अधिक पेज, शायद उनकी सबसे भारी-भरकम कृति। कथा, प्रसिद्ध और चर्चित भवाल संन्यासी केस की है, जिस पर कई किस्से-कहानी हैं, फिल्में भी बनीं, जिनमें ताजी उल्लेखनीय और पुरस्कृत श्रेष्ठ बंगला फिल्म ‘एक जे छिलो राजा‘ है। जोशी जी अपनी इस कृति को अंतिम स्वरूप दे पाए थे अथवा नहीं? यों कमी कहीं नहीं फिर भी लगता है, विवरण देने का अनन्य धीरज, किस्सागोई पर हावी है। सो, बारीकी और विस्तार की सफाई, बावजूद कुछ अपवाद दुहराव के, लाजवाब है। पुस्तक का प्राक्कथन ‘के? आमि‘ खास जोशी जी वाली शैली में है और यहीं वे इस उपन्यास को लिखने के पीछे अपनी मंशा तरुण भट्टाचार्ज्या से कहलाते हैं कि ‘आपसे अनुमति लिए और परामर्श बगैर अनगिनत छोटी-मोटी पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं पिछले कुछ वर्षों से। मेरी इच्छा है कि आपकी सहायता से इस बार मैं कोई प्रामाणिक और साहित्यिक कृति तैयार करूँ।‘ अदालत में साबित होने वाले ‘सच-झूठ‘ के उल्लेख सहित कि ‘मेरे झूठ के साथ बिभा देबी का झूठ भी सुनते रहिएगा।‘ साथ ही पुस्तक का शीर्षक तय करते हुए योग वशिष्ठ का 'राम स्वात्मविचारोऽयं कोऽहं स्यामितिरूपकः। चित्तदुर्दुमबीजस्य दहते दहनः स्मृतः॥' अर्थात् हे राम! 'मैं कौन हूँ' इस प्रकार निजस्वरूप का अनुसन्धान वासनारूप चित्तबीज को दग्ध कर देता है। चित्त ही सब दुःखों का हेतु है। या 'किमिदं विश्वमखिलं किं' अर्थात् यह जगत् क्या है? मैं ही कौन हूँ ... संभवतः उनके ध्यान में रहा होगा।

हिन्दी साहित्य की इस उल्लेखनीय कृति में कुछ अलग-सी बात यह भी है कि पैराग्राफ, अधिेकतर आधे-पौने पेज के हैं और कई तो भर पेज के। वाक्यों की लंबाई पर भी ध्यान जाता है, नमूना है यह एक असामान्य लंबा वाक्य- ‘इसलिए छोटोदी से सारा वृत्तान्त सुन लेने के बाद भी मेरे मन के लिए यह मान पाना कठिन हुआ कि स्वभाव से सर्वथा भीरु और अहिंसक साला बाबू ने प्रजाजन का रक्त चूसने वाले मुझ विलासी सामन्त की देह पर फूटते सिफलिस के घावों का अवलोकन करते हुए अपनी बहन को रोग की आशंका से मुक्ति दिलाने के लिए मुझे मृत्युदण्ड देने की बात न केवल सोची होगी बल्कि आशु डॉक्टर की सहायता से उसे मनसा के स्तर से कर्मणा के स्तर पर पहुँचाने का प्रयास भी किया होगा।‘

भवाल संन्यासी मामले का प्लाट उनके लिए एकदम मुआफिक था। एक व्यक्ति, दो किरदार, पहचान की समस्या, मैं कौन? जैसा विचार, इन सब पर सोचना और लिखना उन्हें बहुत भाता, दिखता है। उनके रचे (और अक्सर बातों) में बेलाग निर्ममता 'शैतानियत' आती रही है, जिसके चलते अश्लील,¬ घटिया और बकवास, जैसी प्रतिक्रियाओं को उन्होंने अपेक्षित ही माना, अप्रभावित रहे, शायद रस भी लेते रहे। उनके लेखन में आमतौर पर रेखांकित होते दिखता है, न इस पार, न उस पार, 'मज्झिम पटिपदा'। दुविधा की फांक में ही कहीं सच झलकता है। आशा-आकांक्षा से मुक्त, खारिज की आशंका से बेपरवाह, यों निरस्त हो कर भी जो कुछ बचा रहे, अमूर्त ही सही, वही हासिल है। लालसा की हम पुतलियों की हरकतें, आरोपित भूमिका का निर्वाह-मात्र होती है। इसलिए सारे संदेहों के बावजूद अविचलित, अपनी स्वीकृत, मान्य, धारित पहचान को खारिज करने का साहस ही सार्थक हो सकता है। उन्हें मानों ऐसे ही किसी पात्र की तलाश थी।

उनकी कृतियों में 'कसप' का डीडी कितना बदल जाता है और बेबी क्या से क्या हो जाती है। हमजाद, कुरु कुरु स्वाहा, हरिया हरक्यूलिस और यहां भी, अलग अलग ढंग से यही बहुरूप या उसका भ्रम-अनिश्चय है। यहां वे लिखते हैं- ‘सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक दो जीवन सर्वथा एक-से नहीं हुए हैं. और इसीलिए किन्हीं दो जनों की स्मृतियाँ एक सी नहीं हो सकतीं।‘ लेकिन एक ही व्यक्ति की स्मृति अलग-अलग हो सकती है, व्यवहार और व्यक्तित्व इतना भिन्न हो सकता है कि वह अलग मान लिया जाए, इसे वह उस आध्यात्मिक स्तर तक ले जाते हैं, जहां उसे 'उत्तर-आधुनिक विमर्श' की तरह भी देखा जा सकता है। लिखते हैं- ’आप जिसे आप कहते हैं वह आपकी अब तक की राम कहानी की स्मृतियों का समग्र प्रभावभर होता है।‘ या ‘स्मृति माया है और स्मृतिहीनता मोक्ष।' या 'संन्यासी को न कब की चिन्ता होती है और न कहाँ की परवाह।‘ या ‘इस मुकदमे में सबका ही चरित्र-हनन किया जा रहा है। उसके अतिरिक्त क्या उपाय बचता है सांसारिक मामलों में।‘

जोशी जी को सच-झूठ का खेल सदा लुभाता है। याद कीजिए ‘कुरु-कुरु स्वाहा‘, जिसमें वे बताते हैं कि ‘स्व. हजारीप्रसाद द्विवेदी मौज में आकर ‘गप्प‘ को गल्प का पर्याय बता देते थे। उनकी इच्छा थी कभी सुविधा से कोई ‘मॉडर्न गप्प‘ लिखने की।‘ या ‘कसप‘ में कहते हैं कि ‘तुम्हें जो कुछ लग रहा है, ठीक इन शब्दों में नहीं। सच तो यह है कि वह तुम्हें शब्दों में लग ही नहीं रहा है। शब्द मैं तुम पर थोप रहा हूं। कथा-वाचक की मजबूरी है। मेरे शब्द ही तुम्हारी व्याख्या करते हैं पाठकों से और नितांत भ्रामक है यह व्यवस्था।‘ और यहां- ‘सच होना और युक्तियुक्त होना सदा पर्यायवाची नहीं होते‘ या ‘किसी एक का सच अनिवार्य रुप से किसी और के लिए झूठ ही होता है।‘ या ‘विश्वसनीय सच कौन-सा होता है जो सर्वथा तर्कसंगत हो अथवा वह जिसमें दाल में नमक बराबर विसंगतियाँ भी उपस्थित हों।‘ या ‘सत्य बहुधा गल्प से भी अधिक अद्भुत होता है।‘ या ‘इस कथा को मात्र इस आधार पर नहीं ठुकराया जा सकता कि यह अत्यंत विचित्र और अविश्वसनीय लगती है।‘

लंबे समय बाद कोरोना ने अवसर दिया इतना बड़ा उपन्यास हाथ में लूं और दो-तीन दिन में पढ़ लूं, खुद को अपने में तलाश करने के दिन हैं ये, और तलाश स्थगित हो जाने के भी। 7/8 मई 1909 को मर कर, जी उठने वाले भवाल संन्यासी की लंबी कहानी बिभा देबी को सुहाग-दुविधा से मुक्ति देते समाप्त हुई थी 3 अगस्त 1946 को, पर फिर-फिर कहानियों को जन्म दिया और इस पूरी-अधूरी कृति, बिना प्रश्नवाचक चिह्न के ‘कौन हूँ मैं‘ शीर्षक, के साथ बहुतेरे सवालों पर जवाब के पूर्ण विराम की तरह जोशी जी अमर हुए।

30 मार्च, मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि है। यह टिप्पणी  जानकीपुल पर भी है।

Sunday, March 29, 2020

छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठ


कुछ वर्ष पहले ‘छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठ‘ पुस्तिका छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा, आलेख डॉ. मन्नूलाल यदु, प्रकाशित की गई थी। अपनी सीमाओं के बावजूद पुस्तिका में आई जानकारी महत्वपूर्ण है, समय-समय पर तलाशी जाती है। पुस्तिका की मुख्य जानकारियां यहां सुलभ कराने के लिए प्रस्तुत है।

पुस्तिका के आरंभिक परिचय में सूची इस प्रकार है-
छत्तीसगढ़ की देवी शक्तियाँ- महामाया, महामाई, मनकादाई, बमलेश्वरी, सम्लेश्वरी, दन्तेश्वरी, बूढ़ीमाता, घूमामाता, मावलीमाता, तुलजा भवानी, खल्लारी माता, बंजारी माता, बगदेई माता, सरई श्रृंगारिणी, चंडी दाई, डिंडेश्वरी, सरंगढ़िन, सरगुजहिनदाई, मरही माता, चन्द्रसेनी, नाथन दाई, अम्बिकादाई, कुंवर अछरिया दाई, अष्टभुजी माता (अड़भार), कोसगईदाई, मंड़वारानी, सर्वमंगला, पतईदाई, लखनी देवी, शभरीनदाई, करमामाता, राजिम तेलीन दाई, कालीमाता, जरहीमाता, माताचैरा, गरवाईन दाई, बैंजिन डोकरी, सती चैरा, सतबहिनिया दाई, बिलाईमाता, कंकाली माता, गंगाजमुना देवी (झलमला), संतोषी माता, गायत्री माता, बीसो भवानी देवीदाई (लिमतरा), शंखनी, डंकनी, तुरतुरिया दाई, शारदा माता (परसदा), पद्मसेनी (पद्गपुर), कोसलाई (सरसीवां), घाठादुवारिन समलाई, सतिमाई (रायगढ़), लालादाई (कुटरा-जांजगीर), मनकेशरी देवी (तरौद अकलतरा)। छत्तीसगढ़ में शक्तिपीठ के रूप में माँ बम्लेश्वरी, शीतला, महामाया, दंतेश्वरी, सम्लेश्वरी, खल्लारी माता, बिलाईमाता, चंद्रहासिनी, गंगामैय्या, सीयादेवी, बजारी माता व कंकाली रुप मान्यता है। इन प्राचीन शक्तिपीठों में माँ बम्लेश्वरी प्रमुख है।

साथ ही//मां बम्लेश्वरी देवी, डोंगरगढ़//मां दंतेश्वरी देवी, दंतेवाड़ा (बस्तर)//मां महामाया देवी, रतनपुर//मां महामाया देवी, रायपुर//छत्तीसगढ़ के अन्य शक्तिपीठ एवं प्रमुख देवियों का उल्लेख है। मां बम्लेश्वरी देवी, डोंगरगढ़ के साथ मां रणचंडी देवी (टोनही बमलाई) और इस क्षेत्र के दंतेश्वरी मंदिर का उल्लेख है। मां दंतेश्वरी देवी, दंतेवाड़ा के साथ फागुन मड़ई की जानकारी है। मां महामाया देवी, रतनपुर के साथ धार्मिक, ऐतिहासिक जानकारियां हैं। इसी प्रकार मां महामाया देवी, रायपुर के साथ बंजारी धाम, कंकाली माता मंदिर और शीतला माता मंदिर की जानकारी है।

छत्तीसगढ़ के अन्य शक्तिपीठ एवं प्रमुख देवियां शीर्षक अंतर्गत जानकारी संक्षेप में इस प्रकार है-
महासमुंद से 10 किलोमीटर उत्तर में आदि शक्ति मां चंडी सिद्ध शक्ति पीठ, बिरकोना में है। चन्दरपुर की चंद्रहासिनी देवी महानदी और मांद (पुस्तिका में केलो) नदी के संगम पर स्थित है। सरगुजा, रमकोला के पास पिंगला नदी के पास झरिया देवी हैं। अंबिकापुर में महामाया मंदिर है। बागबहरा के पास खल्लारी (प्राचीन खल्वाटिका) ग्राम में खल्लारी माता का मंदिर है, यहीं लखेश्वरी गुड़ी भी है।

सरगुजा में पहाड़ी पर मां बागेश्वरी, कुदरगढ़ी देवी है। जशपुर, बगीचा में कोरवा जनजाति में विशेष मान्य खुड़िया रानी है। धर्मजयगढ़ में मांद नदी के किनारे अम्बे टिकरा मंदिर है। चांपा और कोरबा के बीच पहाड़ी पर मड़वा रानी हैं। चांपा में समलेश्वरी देवी का मंदिर है। चांपा-बम्हनीडीह के पास ग्राम लखुर्री में भूरी ठकुराइन देवी का मंदिर है। जांजगीर-चांपा जिले से दक्षिण में 52 किलोमीटर दूर महानदी के तट पर देवरी मठ गांव में मां शीतला देवी का मंदिर है। बलौदा-कोरबा मार्ग पर डोंगरी गांव में सरई सिंगार देवी की मान्यता है। सक्ती से 15 किलोमीटर दूर दमउदहरा महामाई मंदिर है। सक्ती से 11 किलोमीटर दूर अड़भार में अष्टभुजी देवी का प्राचीन मंदिर है। चांपा से 5 मील दूर मदनपुर में मनकादाई मंदिर है। चांपा से 5 किलोमीटर दूर खोखरा में मनकादाई एवं मां शारदा देवी मंदिर है। चांपा से 5 किलोमीटर दूर पिसौद में अन्न धन्वंतरी मां का मंदिर है।

दुर्ग से 35 किलोमीटर दूर धमधा में त्रिमूर्ति महामाया देवी मंदिर है। बालोद के पास ग्राम झलमला में गंगा मैया मंदिर है। सिंगारपुर-भाटापारा में मौलीमाता मंदिर है। धमतरी में विंध्यवासिनी देवी, बिलईमाता का मंदिर है। कांकेर में कंकालिन देवी का मंदिर है। रायपुर से 55 किलोमीटर दूर कुरुद में मां काली छत्तीसगढ़ महतारी का मंदिर है। रायपुर से 175 किलोमीटर दूर राजमार्ग पर उड़ीसा सीमा के पास सिंघोड़ा में मां रूद्रेश्वरी देवी का मंदिर है। पुस्तिका के अंत में बिलासपुर जिले के प्रसिद्ध पुरास्थल ताला का उल्लेख तारादेवी शक्तिपीठ के रूप में है।

टीप - छत्तीसगढ़ की देवियों में समलई, बमलई के अलावा खमदेई, बगदेई जैसे कई नाम मिलते हैं। पुस्तिका में चंदखुरी का कौशिल्या माता मंदिर, कोमाखान-सुअरमार की पाटमेश्वरी या पटनेश्वरी, गरियाबंद जिले की जतमई और घटारानी देवी, सरायपाली की घंटेश्वरी और रूदेश्वरी, अंजनी-कांकेर की ढुटमुहिन, गंडई की भांवर देवी, कोरबा की सर्वमंगला देवी, देवभोग की लंकेश्वंरी देवी, केसकाल की भंगाराम देवी, सुकमा की रामाराम चिटमटिन दाई, कोरिया जनकपुर की चांग देवी जैसे अन्य कई स्थलों का उल्लेख नहीं हो पाया है, किन्तु पुस्तिका में आई जानकारी आधारभूत सूचना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Wednesday, March 25, 2020

काजल लगाना भूलना

गोया, भुलाना भी याद रखना होता है ... बहुतेरों को यह पता नहीं होता कि वे जो लिख-अभिव्यक्त कर रहे हैं वह साहित्य है, छपा-छापा, बिका और पढ़ा जा सकने वाला है। पुस्तकाकार न आ सके, वह नोट्स-डायरी में दर्ज साहित्य, दाखिल-खारिज हुआ करता है, लेकिन बहुत सारे ऐसे खारिज को मान्य किए जाने के पक्ष में खड़े व्योमेश का स्वागत है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो- ‘‘और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख ले।‘‘ अपने लिखे, अपनी बातों पर खुद को भरोसा आसानी से नहीं होता, आमतौर पर औरों की तस्दीक से हो पाता है, अन्य की प्रतिक्रिया बिना पैदा आत्मविश्वास देर से, अधिक प्रयास, अधिक धैर्य के परिणाम से उजागर होता है, जैसे यह महान क्रिया और पुस्तक का शीर्षक ‘काजल लगाना भूलना‘ है। मगर ये क्‍या बात हुई, भूलने की बात कुछ देर को भूल भी जाएं तो काजल कोई लगाता भी है क्‍या? काजल, आंखों में डाला जाता है, जैसे कजरा मोहब्‍बत वाला... या आंजा जाता है और दिठौना हुआ तो माथे या गाल पर टीका जाता है, फिर यह कौन सा काजल आ गया, लगाने वाला! खैर, अंदर के पूरे पेज पर अकेला संक्षिप्त सा वाक्य- ‘मैं बहुत खुश होकर रोने की दवाई बेचने लगा।‘ या ‘तब से मैंने कुछ नहीं कहा है।‘ तभी अपनी जगह बना पाता है, सार्थक होता है, जब वह किसी जाने-माने की कलम से निकले, भटके नहीं, बल्कि पुस्तक में शामिल हो।

भूलना, अकर्मक है? लेकिन जानबूझकर कर भूलना सकर्मक होगा, तो फिर भूल कर भूलना? और यह ‘भूलना‘ काजल लगाना के लिए, जिसका लगाना हुआ करता है, इसे न याद करना होता, न भूलना होता है, क्योंकि जो होता है, वह हुआ करता है, न हुआ तब भी हुआ, और हुआ तब तो हुआ ही। व्याकरण की क्रिया में छंद का फ़ाइलातुन, मफैलुन। फिसलन लापरवाह, चिकनी-चुपड़ी चापलूसी, तटस्थ माध्यम लुब्रिकेशन और आत्मीय स्नेहन के बीच सधे विनोद कुमार शुक्ल, खिड़की-दरवाजा हैं। गाड़ा वाला गड़हा ओंगन तेल के साथ चलता है, चक्का फंसे अस्कुर में तेल ओंगता और ओंगन पाठ देवता पर तेल चढ़ाता, कि गाड़ा (छत्तीसगढ़ में भैंसा जुता मालवाहक ‘गाड़ा‘ चलता है न कि बैल‘गाड़ी‘) अटके नहीं, सफर निर्विघ्न हो।

‘मैं रहा तो था‘ की सरपट में ‘सपना‘ है और उसमें ‘कलाई में दिल की धड़कन थी‘ ... ‘शरीर आत्मा पर फिदा हुआ जा रहा था‘ जैसी फिदा कर देने वाली, धड़कती पंक्तियां। व्योमेश की अन्य पुस्तक ‘कठिन का अखाड़ेबाज‘ लगभग साथ-साथ आई है, ‘लीलामय‘ इन दोनों में शामिल है। (इस पुस्तक ‘काजल लगाना भूलना‘ के शीर्षक में उर्फ कठिन का अखाड़ेबाज भी जोड़ा जा सकता था!) ‘लीलामय‘ गद्यमय होता जान पड़ता है, वैसे भी इसे ‘गद्य कविता‘ ही कहा गया है, इस पर किसी परिचित ने सवाल किया- क्यों नहीं ‘अगद्य‘? और महिमामंडित करना हो तो क्यों न इसे गद्यातीत कहा जाए। बहरहाल, ओझल सी कविता झलकती है- ‘यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यकीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है।‘ और मानों परिभाषित करने का इरादा हो- ‘लीला में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहां भगवान की, स्वरूपों की झांकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वह अभिनय नहीं करते।

‘चौथा दरवाजा‘ की कवितानुमा कविता या पद्य कविता पढ़कर विश्वास बना रह जाता है कि कविताओं के प्रति मेरी समझ सीमित थी, है और रुचि संकीर्ण ही रह जाने वाली है। तभी तो ‘कवि‘ भी मानों मेरे पक्ष में ‘कार्य-कारण‘ बताता है- ‘लिखता है कभी अपने छंद में और मुझ तक पहुंचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह।‘ लेकिन ‘पों...‘ में ‘‘कह रहे हों ‘की‘ हां‘‘ और ‘‘कह रहे हों ‘कि‘ हां‘‘ के ‘की‘, ‘कि‘ को कभी प्रयोग तो कभी प्रूफ की भूल की तरह मान कर पढ़ने का आनंद है। बहते-लुढ़कते अंत में ‘वक़्त का पहिया कि साइकिल का‘ नहीं बल्कि ‘का कि‘ प्रयोग वाला ‘‘वक़्त का कि साइकिल का पहिया‘‘ आता है। बात, कविता की भाषा के नामवरी विमर्श अंदाज में शुरू होती है, जमीन बनाने के लिए, जिस पर साइकिल के पहिये को घूमना, टेढ़ा होना, ठिठकना और फिर गद्य कविता में ढल जाना है।

सघन, जटिल, चकाचौंधक नाटककार, संश्लिष्ट चिंतनशील, मौलिकता-आग्रही साहित्यकार, सधे वक्ता, यह सब एलीट लेकिन प्रवक्ता ऐसे कि जब चाहें, किसी के, जनता-जनार्दन के मन तक राह बना लें, सहज उतर जाएं। रचना-कर्म और अभिव्यक्तियां ऐसी, जिसे देखकर संदेह नहीं रह जाता कि यह इस युवा का स्व-अर्जित मात्र नहीं, परम्परा और समष्टि का निमित्त बरताव है।

Wednesday, March 4, 2020

पितृ-वध

‘पितृ-वध‘ शीर्षक, आशुतोष भारद्वाज की उस पहचान के अनुरूप है, जिसमें उनकी पैनी, स्पष्ट असहमतियां और स्थापनाएं एकबारगी चौंकाती हैं। अपनी स्थापनाओं के पक्ष में वे किसी मनोवैज्ञानिक के बजाय दोस्तोयवस्की के लेखन से ले कर शास्त्र वाक्य ‘‘पुत्र और शिष्य से पराजय की इच्छा रखता हूं।‘‘ तक उद्धृत करते हैं। ‘‘वध में वैधानिकता का भाव है‘‘ कहते हुए भीष्म, शंबूक और जयद्रथ वध के क्रम में नाथूराम गोड़से द्वारा अपने कृत्य को ‘गांधी-वध‘ कहे जाने का उल्लेख करते हैं। ‘‘एक पुरुष का अपने पिता के साथ जो द्वन्द्वात्मक संबंध होता है वह शायद मां के साथ नहीं है, और चूंकि मैं हूं तो पुरुष ही इसलिए अपने पूर्वजों के साथ रचनात्मक संघर्ष मेरे भीतर पिता के रूपक में ही दर्ज हुआ है?‘‘ का सवाल भी उठाते हैं, जिसका जवाब ‘नहीं‘ पुस्तक में आगे आ जाता है।

स्वर, स्मृति, संवाद और समय शीर्षक खंडों में से ‘एक: स्वर‘ में श्रीकांत वर्मा हैं, जिनकी रचनाधर्मिता के लिए कही गई बात खुद कवि पर लागू हो सकती है- ‘‘जो कविता खुद अपना विषय भी हो, पूरक, विलोम और शत्रु भी, वह न सिर्फ आत्म-रत है, बल्कि आत्म-हन्ता भी।‘‘ मुक्तिबोध में स्त्री की अनुपस्थिति रेखांकित करते हुए आशुतोष, एकाकीपन की भूमिका बनाते दिखते हैं। वे अशोक बाजपेयी के लिए उदार हैं तो अज्ञेय के प्रति निर्मम। ‘‘एक लेखक और सामान्य पाठक के पाठ में शायद गहरा फर्क है।‘‘ कहते हुए निर्मल वर्मा की कड़ी के साथ आशुतोष, अज्ञेय को 'मेरे पितामह' मानते हैं, लेकिन पितृ-वध का खास खुलासा यहां होता है, जब वे बिना पूर्वाग्रह के चाहते हैं कि ‘‘इस कथाकार से कोई, दूर का ही सही, संबंध जोड़ पाऊं, लेकिन नहीं।‘‘ संदेह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति पितृ-वध को सूक्ष्म, किसी न किसी रूप में न सिर्फ स्वयं में घटित होता महसूस करता है, औरों को भी दिखता है, उम्र के साथ खुद में खुद को मरते और पिता को पनपते देखना, अनहोनी नहीं है।

‘स्वर‘ खंड के अन्य चार निबंध, भारतीय साहित्य की स्त्री पर हैं। आमतौर पर स्त्री की योनिगत भिन्नता, मातृत्व, यौनिकता जनित लाचारी और उससे जुड़कर कभी शोषण, कभी अधिकार ही ’विमर्श’ में होता है। ‘केवल श्रद्धा‘, ‘आंचल में दूध, आंखों में पानी‘, अबला-सबला, दुर्गा-चंडी, होते हुए ‘तिरिया जनम झनि दे‘ तक रह जाता है। किन्तु यहां इन निबंधों में, जैसा अपेक्षित था, थोथी ‘विमर्श-पूर्ति‘ नहीं है, व्यापक सर्वेक्षण और विश्लेषण-चिंतन करते स्त्री को बीसवीं-इक्कीसवीं सदी की संवेदनायुक्त होमो सेपियंस की तरह देखा गया है। नर से उसकी लैंगिक भिन्नता को नजरअंदाज कर, समग्र जीव मानते। एकदम अलग लेकिन सच को उजागर करने का वह पहलू, जिसे अब तक शायद ठीक से स्पर्श भी नहीं किया गया था। यहां उससे अलग बहुत कुछ है, उसका भय, उदासी, चिंता, भाव में कायिक कारक न के बराबर हैं, इससे स्त्री का भिन्न आयाम उभरा है, उसका फलक विस्तृत हुआ है।

इस दौर का खासकर गद्य का युवा पाठक-लेखक प्रेमचंद, छायावाद और बांग्ला लेखकों को पढ़ता है, संदर्भ के लिए इस्तेमाल भी करता है, लेकिन अधिकतर प्रभावित होता है मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा और कृष्णा सोबती से। ऐसा यहां भी है। खंड ‘दो: स्मृति‘ में आशुतोष का निर्मल वर्मा से मिलना, बात करते हुए उन्हें पढ़ा होना और याद करना, लेखक-पाठक को पूरा करने में किस तरह भूमिका निभाता है, देखने लायक है। हिन्दी पाठकों के बीच अनजान से, समकालीन दार्शनिक रामचन्द्र गांधी ‘‘एक ऐसा अनुभव जो अपने मिथकीय व्योम में महाकाव्य हो जाना चाहता है।‘‘ से लेखक का संपर्क-संस्मरण, महाकाव्य के व्यापक संदर्भों से आत्मीय परिचित होने और आत्मसात करने के लिए आकर्षित करता है।

‘‘किसी लेखक को समझने के लिए उससे मिलना जरूरी थोड़े है‘‘ उद्धृत कर, खंड ‘तीन: संवाद‘ में कृष्ण बलदेव वैद और कृष्णा सोबती से अपनी मुलाकात-बात को गंभीर इन्द्राज बना कर, इस उद्धरण का नकार, रोचक है। खंड ‘चार: समय‘ डायरी है। रचनाकार की डायरी, दैनंदिनी से अलग और अधिक, वह नोटबुक, जो पाठक, प्रकाशक, बाजार से अपेक्षा-मुक्त है। वैद फेलो आशुतोष की डायरी के साथ, वैद की प्रकाशित डायरी-पुस्तकें याद आती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगता कि मैं यह क्यों पढ़ रहा हूं, लेकिन छोड़ नहीं पाता। वहीं मैं ‘कुकी‘ जैसे अनूठे चरित्र से परिचित हुआ, ‘दिल एक उदास मेंडक‘ जैसा दुर्लभ वाक्य वहां मिला, और वैद की स्वीकारोक्ति कि ‘‘यह सम्पादन इसलिए भी कि सब कुछ किसी को भी बताया नही जा सकता, अपने आपको भी नहीं।‘‘ आशुतोष की डायरी का 19 मार्च 2015, जो मेरे लिए खास है, वह अंश- ‘‘आज राहुल सिंहजी से उनके दफ्तर में मिला। बड़े कमजोर से लगे। उनके चेहरे की चमक और आवाज में चहक गायब थी। उनसे पूछा तो वे बोले‘ ‘जब मैं किसी मंत्री से मिलने जाता हूं, हारा और पिटा हुआ दिखने की कोशिश करता हूं, दासता के बोझ से दबा। गुलामी का भाव। ... ... ...‘‘ यहीं उन्होंने मेरी पुस्तक में मेरे परिचय का अंश, ‘‘सरकारी मुलाजिम, नौकरी के चौथे दशक में मानते हैं कि इससे स्वयं में दासबोध जागृत करने में मदद मिली है।‘‘ भी उद्धृत किया है। संयोग ही है कि लगभग डेढ़ साल पहले उपजी और साल भर पहले छपी मेरी रचना ‘एक थे फूफा‘, जिसमें यह परिचय है, का नायक भी अपने तरह से पितृ-वध करता है।

समग्रतः परम्परा की समष्टि में समाहित होते स्व को बचाए रखने का उद्यम है ‘पितृ-वध‘, जिसमें लेखक अपनी जगह तलाशते हुए पितर में मातर-स्त्री को शामिल कर, संवाद करते हुए एकाकी-एकांत ढ़ूंढ़ता है, अलग तरह का ‘सन्नाटा बुनता‘ है और पाठक को अपने नितांत निजी ‘डायरी‘ तक ले आता है। अस्तित्ववादी घोषणा ‘ईश्वर-परमपिता मर चुका है, हम लोगों ने उसे मार डाला है‘ जैसा ही कुछ-कुछ है यह ‘पितृ-वध‘, जिसमें सारे मुकाबले, अकेले हमारे हैं, इसलिए अब ‘उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता‘ में कोई महेश्वर नहीं है, द्रष्टा-कर्ता-भोक्ता, सारी जवाबदारी अपनी है।

आलोचना के लिए जरूरी पैनापन, समृद्ध संदर्भ और अंतर्दृष्टि तो लेखक में है, उसकी सजगता में सूझ है, लेकिन कहीं बूझ के लिए आंखें बंद करना जरूरी होता है, वह गुडाकेशी आशुतोष को मंजूर नहीं दिखता। यह पुस्तक, लेखक के भारतीय उपन्यास, आधुनिकता और राष्ट्रवाद पर आने वाले मोनोग्राफ के लिए अपेक्षा जगाने वाली है, जिसमें उम्मीद है, अधिक गहरी अंतर्दृष्टि सहजता से तल पर उभरेगी। बहरहाल राजकमल प्रकाशन प्रा.लि. और रज़ा फ़ाउण्डेशन के सह-प्रकाशन वाली आशुतोष भारद्वाज की यह आलोचना पुस्तक, सोचने के लिए ऐसी जमीन बना कर देती है, जिसे समय-समय याद करते, खोलते रहना हो, इसलिए बुक-शेल्फ वाली जरूरी पुस्तक है। डेविड अल्तमेज्द के चित्र को आवरण पर महेश वर्मा ने संजोया है, जिसमें पुस्तक की तरह परम्परा की मिट्टी का वजन है, तो मौलिकता की ताजी सार्थक लकीरें भी।