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Wednesday, March 25, 2020

काजल लगाना भूलना

गोया, भुलाना भी याद रखना होता है ... बहुतेरों को यह पता नहीं होता कि वे जो लिख-अभिव्यक्त कर रहे हैं वह साहित्य है, छपा-छापा, बिका और पढ़ा जा सकने वाला है। पुस्तकाकार न आ सके, वह नोट्स-डायरी में दर्ज साहित्य, दाखिल-खारिज हुआ करता है, लेकिन बहुत सारे ऐसे खारिज को मान्य किए जाने के पक्ष में खड़े व्योमेश का स्वागत है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो- ‘‘और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख ले।‘‘ अपने लिखे, अपनी बातों पर खुद को भरोसा आसानी से नहीं होता, आमतौर पर औरों की तस्दीक से हो पाता है, अन्य की प्रतिक्रिया बिना पैदा आत्मविश्वास देर से, अधिक प्रयास, अधिक धैर्य के परिणाम से उजागर होता है, जैसे यह महान क्रिया और पुस्तक का शीर्षक ‘काजल लगाना भूलना‘ है। मगर ये क्‍या बात हुई, भूलने की बात कुछ देर को भूल भी जाएं तो काजल कोई लगाता भी है क्‍या? काजल, आंखों में डाला जाता है, जैसे कजरा मोहब्‍बत वाला... या आंजा जाता है और दिठौना हुआ तो माथे या गाल पर टीका जाता है, फिर यह कौन सा काजल आ गया, लगाने वाला! खैर, अंदर के पूरे पेज पर अकेला संक्षिप्त सा वाक्य- ‘मैं बहुत खुश होकर रोने की दवाई बेचने लगा।‘ या ‘तब से मैंने कुछ नहीं कहा है।‘ तभी अपनी जगह बना पाता है, सार्थक होता है, जब वह किसी जाने-माने की कलम से निकले, भटके नहीं, बल्कि पुस्तक में शामिल हो।

भूलना, अकर्मक है? लेकिन जानबूझकर कर भूलना सकर्मक होगा, तो फिर भूल कर भूलना? और यह ‘भूलना‘ काजल लगाना के लिए, जिसका लगाना हुआ करता है, इसे न याद करना होता, न भूलना होता है, क्योंकि जो होता है, वह हुआ करता है, न हुआ तब भी हुआ, और हुआ तब तो हुआ ही। व्याकरण की क्रिया में छंद का फ़ाइलातुन, मफैलुन। फिसलन लापरवाह, चिकनी-चुपड़ी चापलूसी, तटस्थ माध्यम लुब्रिकेशन और आत्मीय स्नेहन के बीच सधे विनोद कुमार शुक्ल, खिड़की-दरवाजा हैं। गाड़ा वाला गड़हा ओंगन तेल के साथ चलता है, चक्का फंसे अस्कुर में तेल ओंगता और ओंगन पाठ देवता पर तेल चढ़ाता, कि गाड़ा (छत्तीसगढ़ में भैंसा जुता मालवाहक ‘गाड़ा‘ चलता है न कि बैल‘गाड़ी‘) अटके नहीं, सफर निर्विघ्न हो।

‘मैं रहा तो था‘ की सरपट में ‘सपना‘ है और उसमें ‘कलाई में दिल की धड़कन थी‘ ... ‘शरीर आत्मा पर फिदा हुआ जा रहा था‘ जैसी फिदा कर देने वाली, धड़कती पंक्तियां। व्योमेश की अन्य पुस्तक ‘कठिन का अखाड़ेबाज‘ लगभग साथ-साथ आई है, ‘लीलामय‘ इन दोनों में शामिल है। (इस पुस्तक ‘काजल लगाना भूलना‘ के शीर्षक में उर्फ कठिन का अखाड़ेबाज भी जोड़ा जा सकता था!) ‘लीलामय‘ गद्यमय होता जान पड़ता है, वैसे भी इसे ‘गद्य कविता‘ ही कहा गया है, इस पर किसी परिचित ने सवाल किया- क्यों नहीं ‘अगद्य‘? और महिमामंडित करना हो तो क्यों न इसे गद्यातीत कहा जाए। बहरहाल, ओझल सी कविता झलकती है- ‘यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यकीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है।‘ और मानों परिभाषित करने का इरादा हो- ‘लीला में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहां भगवान की, स्वरूपों की झांकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वह अभिनय नहीं करते।

‘चौथा दरवाजा‘ की कवितानुमा कविता या पद्य कविता पढ़कर विश्वास बना रह जाता है कि कविताओं के प्रति मेरी समझ सीमित थी, है और रुचि संकीर्ण ही रह जाने वाली है। तभी तो ‘कवि‘ भी मानों मेरे पक्ष में ‘कार्य-कारण‘ बताता है- ‘लिखता है कभी अपने छंद में और मुझ तक पहुंचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह।‘ लेकिन ‘पों...‘ में ‘‘कह रहे हों ‘की‘ हां‘‘ और ‘‘कह रहे हों ‘कि‘ हां‘‘ के ‘की‘, ‘कि‘ को कभी प्रयोग तो कभी प्रूफ की भूल की तरह मान कर पढ़ने का आनंद है। बहते-लुढ़कते अंत में ‘वक़्त का पहिया कि साइकिल का‘ नहीं बल्कि ‘का कि‘ प्रयोग वाला ‘‘वक़्त का कि साइकिल का पहिया‘‘ आता है। बात, कविता की भाषा के नामवरी विमर्श अंदाज में शुरू होती है, जमीन बनाने के लिए, जिस पर साइकिल के पहिये को घूमना, टेढ़ा होना, ठिठकना और फिर गद्य कविता में ढल जाना है।

सघन, जटिल, चकाचौंधक नाटककार, संश्लिष्ट चिंतनशील, मौलिकता-आग्रही साहित्यकार, सधे वक्ता, यह सब एलीट लेकिन प्रवक्ता ऐसे कि जब चाहें, किसी के, जनता-जनार्दन के मन तक राह बना लें, सहज उतर जाएं। रचना-कर्म और अभिव्यक्तियां ऐसी, जिसे देखकर संदेह नहीं रह जाता कि यह इस युवा का स्व-अर्जित मात्र नहीं, परम्परा और समष्टि का निमित्त बरताव है।

2 comments:

  1. "बहुतेरों को यह पता नहीं होता कि वे जो लिख-अभिव्यक्त कर रहे हैं वह साहित्य है, छपा-छापा, बिका और पढ़ा जा सकने वाला है।"

    सुन्दर सटीक आँकलन। शुभकामनाएं नवसम्वत्सर पर।

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  2. इस पाठकीय प्रतिक्रिया की बजाय "समीक्षा" को पढ़ने के लिये मुझे इसे "कॉपी" कर के वर्ड पेज पर "पेस्ट" कर के इसे 130 प्रतिशत जूम करना पड़ा। कारण, आँखों की ज्योति का कम होता जाना। बहरहाल। पढ़ कर आनन्द आ गया। नीर-क्षीर विवेचन आपकी विशिष्टता है। मैं कायल हूँ आपकी इस विशिष्टता का। आभार इस और इस तरह की कृतियों से परिचित कराने के लिये।
    आपका,
    हरिहर वैष्णव

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