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Friday, October 24, 2025

भो-रम-देव

‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ कहे जाने वाले भोरमदेव में शब्दों के साथ भटक रहा हूं। यह भटकना, रास्ता भूलना नहीं, रास्ते की तलाश भी नहीं, बल्कि मनमौजी विचरण है। भोरमदेव, शब्द पर बहुत सी बातें कही-लिखी गई हैं, भोरमदेव, बरमदेव है, ब्रह्म, बूढ़ादेव, बड़ादेव, इतने मत-मतांतर कि भरम होने लगे। अलेक्जेंडर कनिंघम 1881-82 में गजेटियर के हवाले से कहते हैं- The Great Temple of Boram Deo or Buram Deo। छत्तीसगढ़ में भिर्रा या भिरहा (Chloroxylon swietenia) कहे जाने वाले पेड़ को पड़ोसी पश्चिमी ओडिशा में ‘भोरम‘ कहा जाता है, इससे कोई रिश्ता बने न बने, शाब्दिक ही सही, मेल बनता है। भोरम के करीब का छत्तीसगढ़ी शब्द है, भोरहा यानी भ्रम, संदेह या भूल। शायद इसी भूल-भटक में राह सूझे, इसलिए फिलहाल इसे यहीं छोड़कर, उसके आसपास, अगल-बगल। कुछ नादान तोड़-फोड़ करनी हो तो ‘भो!रम देव‘, ‘भोर-म-देव‘, हे देव, भोर होते ही तुझमें मेरा मन रमा रहे।
भोरमदेव मंदिर
भोरमदेव, स्मारक का नाम है न कि गांव का। इस स्मारक के साथ मड़वा महल और छेरकी महल भी हैं, गांव हैं- छपरी और चौंरा। इनमें छपरी का छापर, छावनी या छप्पर नहीं, बल्कि सलोनी मिट्टी से से आया होगा। चौंरा का संदर्भ फणिनागवंशी शासक रामचंद्र के मड़वा महल शिलालेख, विक्रम संवत 1406 में है, जहां चतुरापुर या चवरापुर का उल्लेख है। ‘चंवरा‘ शब्द यज्ञ वेदी के लिए तैयार की गई चौकोर समतल भूमि, ‘चत्वरक‘ तद्भव रूप चउंक-चांतर से आता है। सती चौरा या माता चौंरा जेसे शब्दों में इस शब्द का आशय छोटा मंदिर या देवस्थान, निहित है। चौरा का ताल्लुक अब कबीरपंथी मान्यताओं से भी जुड़ गया है। एक गांव लाटा है, जिसे लाटा-बूटा या लता-नार से संबंधित माना जाना है, मगर यह भी ध्यान रहे कि लाटा, गुफा, सुरंगनुमा, संकरे-बंद घिरे स्थान का- जहां लेट कर, सरक कर, रेंग कर जाना पड़े, का भी पर्यायवाची होता है। भोरम और हरम शब्द आसपास हैं, पास ही गांव है ‘हरमो‘, ईंटों वाली महलनुमा संरचना ‘सतखंडा हवेली‘ के कारण यह गांव चर्चित है। इसे कुछ ‘हरम‘ से जोड़ कर देखते हैं तो दूसरी ओर एक आस्था ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य‘ से जुड़ी है, जिससे संबद्ध कर हरमो को ‘हरि-नू‘, गुजराती ‘हरि का‘ भी मानने वाले हैं। इतिहास में काल-निर्धारण की दृष्टि से यह क्षेत्र फणिनाग, कलचुरि वंशजों, मंडला के गोंड़ तथा मराठों से जुड़ता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में योद्धा स्मारक और सती स्मारक प्रतिमाएं शक्ति संतुलन के लिए होने वाले युद्धों का प्रमाण हैं।
सतखंडा हवेली, हरमो 

यह कछारी जमीन वाला इलाका है। जंगल-पहाड़ नदी-नाले और बांध-तालाब से बची रेतीली जगह- कछार, जिस पर छोटी और कंटीली झाड़ियों वाली वनस्पति, कछार में टिकने के लिए जड़ें मजबूत होनी चाहिए। कछार, धान के लिए उपयुक्त नहीं, लेकिन धान से ही तो काम नहीं चलता। जलधाराओं के नजदीक और पानी उतर जाने पर पाल कछार और उससे दूर पटपर कछार। यहां एक और कछार है- सरकी कछार, इस नाम की कई शास्त्रीय व्याख्या होती है, यह भी माना जाता है कि छेरकी ही सरकी बन गया, संभव है, क्योंकि स-द, छ-स होता रहता है, ज्यों रायपुर के पास का गांव छेरीखेड़ी-सेरीखेड़ी। सरकी का जोड़ सरकना है यानी रेंगना या खिसकना, छत्तीसगढ़ी का सलगना- पेट के बल सरक-सरक कर चलना, सरीसृप की तरह। मगर यह भी संभव जान पड़ता है कि यह सरकी-चटाई या टाट (ज्यों टाट-पैबंद या टाटीबंद) यानि समतल-पटपर का समानार्थी है मगर ‘दादर‘ से कुछ अलग।

संकरी नदी पर दुरदुरी आता है, जो तुरतुरिया, खरखरा, सुरसुरी की तरह पानी के बहाव से होने वाली ध्वनि से बना शब्द है। मगर यह सोचने का रास्ता दिखाता है कि जलधारा का बहाव कैसा है, स्थान पथरीला, रेतीला, चौड़ा-संकरा, छोटा-लंबा, कम-अधिक ऊँचाई वाला, धाराओं में बंटा हुआ या अन्य कुछ। जिस तरह का नाम है, यानि नामानुरूप ही ध्वनि सबको सुनाई देती है या इस पर सुनने वाले और आंचलिक भाषा का भी प्रभाव होता है। जलधाराओं की बात हो तो गंगा का स्मरण होता ही है और गंगा के लिए कहा जाता है- ‘गं गं गच्छति गंगा‘।

बजरहा यादव जी ठेठवार मिले, मैं पूछता हूं- देसहा, कनौजिया, कोसरिया, झेरिया, बरगाह, महतो? मुस्कुरा कर छोटा सा ‘पॉज‘ देते मेरे इस ‘ज्ञान‘ को ध्वस्त करते हुए गर्व से बताते हैं-दुधकौंरा। दुधकौंरा सुनकर पहले तो रायपुर का मठ, दूधाधारी-दुग्धआहारी याद आया फिर ठेठवारों के ‘कौंराई‘ का। मैं भी हार मानने को तैयार नहीं, कभी पाली-कटघोरा की ओर किसी कौंराई ठेठवार से मिला था, कौंराई से तुक जमाने की कोशिश करता हूं, वे टस से मस नहीं होते। मड़वा महल में बैठे हैं, आसपास छेरी चराते हैं। अब इन दोनों महलों मड़वा और छेरकी की ओर ध्यान जाता है। महल, पत्थरों वाली पक्की इमारत के कारण नाम पड़ा होगा और मड़वा, इस मंदिर के साथ जुड़ी रोचक बात कि मंदिर के सामने का स्तंभयुक्त मंडप, शादी के मड़वा जैसा है साथ ही इस स्मारक का एक नाम ‘दूल्हादेव’ मंदिर प्रचलित रहा है। इस मंदिर की बाहिरी दीवार पर जंघा में विभिन्न मिथुन मूर्तियां हैं, कुछ अजूबी भी। गर्भगृह के सामने से बाईं ओर परिक्रमा शुरू करें तो, काम-कला वाली मिथुन प्रतिमाओं का ‘अजीबपन‘ बढ़ता जाता है और आखिरी पहुंचते तक शिशु को जन्म देती नारी प्रतिमा है। मिथुन प्रतिमाओं के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ के नाम से इसकी ख्याति रही, खजुराहो काम-कला वाली मिथुन मूर्तियों का पर्याय बन गया। मंडपयुक्त संरचना, मड़वा वाले इस महल की मूर्तिकला से यह मान लिया गया है कि इस मंदिर की दीवार पर विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन के काम पुरुषार्थ के लिए ‘कामसूत्र‘ का शिल्पांकन किया गया है, जो नर-नारी समागम-संसर्ग से संतानोत्पत्ति करते वंशवृद्धि के ज्ञान देने वाली मूर्तियों में जीवंत प्रशिक्षण वाली पाठशाला जैसा है। कहा जाता है, यहां भाई-बहन का साथ जाने का निषेध है, मगर ऐसा अब तक नहीं सुना कि विवाह के बाद इस मंदिर के दर्शन और परिक्रमा करने का नियम है।
पश्चिमाभिमुख मडवा महल मंदिर
दक्षिणी जंघा पर प्रतिमाएं

कछार और छेरकी या छेरी यानि बकरी-बकरे को जोड़ कर सोचने का प्रयास करता हूं। छेरकी महल के लिए कहा जाता है कि छेरी चराते हुए, बरसात हो जाने पर बकरी चराने वाले चरवार इस मंदिर में शरण लिया करते थे, संभव है मगर लगता है कि इस कछारी इलाके में गोपालक भी बड़ी तादाद में बकरा-बकरी पालन करते हैं इसलिए छेरी-चरवार हैं। फिर बात आती है कि क्या कछार और छेरी का रिश्ता शब्द ‘छ-र‘ से आगे भी कुछ है। गोवंश और अजवंश के एक खास अंतर की ओर ध्यान जाता है। अजवंश की उपरी और निचली, दोनों दंतपंक्तियां होती हैं, जबकि गोवंश की उपरी दंतपंक्ति नहीं होती, इसलिए दोनों की चराई में अंतर होता है। संभव है कि सामान्य मैदानी घास-पात गोवंश के चरने भरण-पोषण के लिए अधिक उपयुक्त होता हो और कछारी भूमि की वनस्पति अजवंश, बकरे, घोड़े और हिरण परिवार के जीवों के लिए। इस क्षेत्र में देसी बकरे ही पाले जाते हैं जो बौनी-नीची झाड़ियों और घास वाली चराई क्षेत्र में graze करते हैं लंबे और लटके कान वाले जमनापारी बकरे, जो graze के बजाय browse करते हैं, ऐसे चराई क्षेत्र के लिए अनुकूल साबित नहीं होते। ‘हरिन छपरा‘ गांव भी दूर नहीं है। उल्लेखनीय कि यहां नाम छेरी-छेरकी है, इसी तरह सरगुजा में प्राचीन मंदिर ‘छेरकी नहीं छेरका‘ हैं। खैर! अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र न हो तो उस पर बहुत बातें करना अपनी जांघ उघाड़ने जैसा है, फिर भी इतना तो मुंह मारा ही जा सकता है।
छेरकी महल मंदिर


यहां एक परत और है, छेरकी महल के आसपास लीलाबाई यादव जी मिल जाया करती थीं और पूछने पर धाराप्रवाह कहानी सुनाती थीं- ‘देवांसू राजा बिना महल के राखय छेरिया, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरी-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाये। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आही अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हियाय हे। त आघू छेरी के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भुईयां म गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरी लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे।‘

मैदानी छत्तीसगढ़ के गांवों में गुड़ बनाने के लिए सामुदायिक गन्ने की पैदावार, सामुदायिक रूप से बरछा में ली जाती थी। बरछा, तालाब के नीचे की भूमि होती थी। अब भोरमदेव, कवर्धा क्षेत्र की एक पहचान शक्कर कारखाना और गन्ना उपजाने वाले इलाके की भी है। यहां संकरी नदी है। छत्तीसगढ़ में सांकर, संकरी जैसी संज्ञाधारी कई-एक हैं, जिनमें ओड़ार संकरी, संकरी-भंइसा, संकरी-कोल्हिया जैसे ग्राम नाम और संकरी नदी को इन सब के साथ जोड़ कर देखना होगा। संकरी, वर्णसंकर है? सांकर यानी संकल-जंजीर है? संकरा यानी कम चौड़ा है? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘अलकर सांकर‘। संकरी नदी के करीब का एक नाम चैतुरगढ़-कटघोरा-कोरबा वाली शंकरखोला की जटाशंकरी-अहिरन। इस तरह संकरी, शिव-शंकर के पास भी है। और क्या इसका शर्करा-शक्कर से जुड़ा होना संभव है। पुराने अभिलेखों में शर्करापद्रक, शर्करापाटक, शर्करामार्गीय, गुड़शर्कराग्राम जैसे स्थान-क्षेत्र नाम आते हैं, ये नाम क्या शक्कर से संबंधित हैं या नदी के रेत-कण को महिमामंडित किया गया है- बुझौवल तो है ही, ‘बालू जैसी किरकिरी, उजल जैसी धूप, ऐसी मीठी कुछ नहीं, जैसी मीठी चुप।‘

जेन अभ्यास होता है, जिसमें सारे विचार ‘मू‘ के अव्यक्त में पहुंचकर मौन हो जाते हैं, ‘चुप‘।

Wednesday, January 4, 2023

किस्सा भोरमदेव

आस्था, विश्वास, मान्यता और उससे उपजी जिज्ञासा-पूर्ति कथाएं, इतिहास-पुरातत्व की पूरक हैं। पुरातात्विक-प्राप्तियों के साथ उनकी पृष्ठभूमि, परिवेश-संदर्भ जितना आवश्यक होता है, उतना ही आवश्यक किसी पुरातात्विक-ऐतिहासिक स्थल-स्मारक के साथ जुड़ी कथाओं को दर्ज किया जाना। इतिहास के ‘वैज्ञानिक‘ अध्ययन के साथ कथाएं, रिक्त स्थान की पूर्ति करती हैं और शोध के लिए अलग दृष्टि, नई संभावना का अवसर देती हैं।

अजय चंद्रवंशी ने अपनी पुस्तक ‘भोरमदेव क्षेत्र‘ पेज-18 पर उल्लेख किया है कि- अपने अध्ययन के दौरान हमें भोरमदेव की एक वृद्ध निरक्षर महिला, जो छेरकी महल में बैठती है, ने लगभग यही कहानी (मिथिला-शेषनाग का पुत्र अहिराज, फणिनागवंश का संस्थापक प्रथम शासक) सुनाई और बताया कि मिथिला के दोनों भाइयों को गर्भ के प्रति जो भरम (भ्रम) था उसी के कारण मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा। अजय जी ने वह किस्सा रिकॉर्ड भी किया है।

यहां भोरमदेव का वही किस्सा है, जिसे संस्कृति एवं पुरातत्व के विभागीय सहयोगी श्री रायकवार के साथ श्री जे.आर. भगत ने रिकॉर्ड किया और मेरे द्वारा श्री प्रभात सिंह की मदद से इसका लेख तैयार किया गया, यथासंभव, यथावत-

एखर ले बताहूं एही मेर ले - देवांसू राजा छेरिया राखे राहय ना त महल नई बनावय। बिना महल के राखय छेरिया ला देव ह, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरि-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाये। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आहि अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं, बिन महल के राखथस। अभी हमर देव-देव के पहर हे, कोई समय मा मनखे के पहर आही, तेन देखे-घुमे ल आहि अइसे कइके। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हिआय हे। त आघू छेरि के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भूईयां म भूईयां गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरि लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। 

अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे। देव मन ह, दू भाई एक बहिनी राहय। त देव के बहिनी गरभती म रई गे। त कइसे गरभती में भगवान। गांव-गोठन अदमी के तदमी हमर देव-देव के पहर भगवान कही, बड़े देव सोचे रोज कन। सोचते-सोचते एकात महीना सोचिस त छोटे देव ला सक करे अपने बहनीच संग, बड़े देव हर। ओ कथे - तोरो बहिनी मोरो बहिनी ए। अउ एके म खाना पिना होके रात बसे बर बहिनी के कुटिया मड़वा महल अतका रहय, दूनो भाई के कुटी छेरकी महल रहय। त तैं बहिनी ल परसों ले के देखबे देव। मोला झगरा झन कर देव रात म दूरिहा ले (अइसे कहिस)। त बहिनी के कुटिया रात बसे बर मड़वा महल अतका रहय। दूनो भाई के कुटी छेरकी महल रहय। त पचमुखी सेसनाग हर दिनमान सेसनाग बनय रात म राजकुमार बम्हन-रासपूत लड़का बनके फेर बहिनी के कुटिया म जावय। त परसों लिस त हिसाब जमीस ओला। अब बिहना होइस त देव पूछते - कइसे नोनी, हमर देवता-देवता के पहर तोर कुटिया म बम्हन-रासपूत लईका देखे हन अउ दिनमान नई देखउल दे हमर। कइसे भई कहिके। त ओ पचमुखी सेसनाग ए भईया। दिनमान सेसनाग बनथे, रात म राजकुमार बम्हन- रासपूत लड़का बन जाथे भई, अइसे कहिस, तउने मेर ले सोच-विचार लिस, देख-ताक लिस। त भोरमदेव ला न भरमाभूति में बनाए हे। तेखर सेती भोरमदेव कथे। नई त बहिनी संग भाई संग सक कर लिस, बहिनी ल। 

अब भोरमदेव ल बना के अपन मड़वा महल के सुरू करिस त देव के बहिनी फेर कथे - कइसे भईया अउ भउजी सब मंदिरे मूरति बनाथो। महूं जाहूं देखे-घूमे ला कहिके। त अनेक परकार के चीज बनाबो नोनी तोर भउजी संग, तोर जाय के नो हे। बन लिही त एके दारी भेजबो, हमन देखे बर तोला। तोर जाय के नो हे। मड़वा महल के सुरू करे हांव। तें आबेच झन कहे रहिस अउ आईच जाबे त बेगर घंटी बजाय मत खुसरबे, कहे रहिस देव ह। त देव के बहिनी, हरू करिन चुपे काल चल दिस, मड़वा महल देखे बर। ओमन ह जांवर-जोड़ी मूरति ल बनाय, बिना ओन्हा कपड़ा के। तो घंटी ला बजाय रतिस ओखर बहिनी, त ओमन कपड़ा पहिने रतिन। त देव रहाय तेन मूरति ल बनाते-बनाते रूख अन भाग गे। अउ बहिनी लजा गे, भाई लजा गे। त झन भाग भाई, झन भाग भाई, मोर से गलती होगे। भईया तैं झन आबे कहे रहे त आ पारें। भईया तैं घंटी बजाबे कहे त नइ बजाएं पाएं भईया लहुट जा भाई। लहुट कहिस त नइ लहुटिस। देव भागिस तेन ह त बहिनी लहुटाय ल गिस। तभो नइ लहुटिस। त भाई के कनिहा ला बहिनी पकड़े, भाई-बहिनी जंगल भाग गे। दूनो भाई-बहिनी तेन जाके पथरा लहुट गे, दूनो भाई-बहिन ह। 

देवता के मउर-मटुक, पर्रा-बिजना ओखर संग म भाग गे। सहसपुर ले आए रतिस मगरोहन मड़वा महल म। सुवासा-सुवासी मगरोहन बर रेंगे बर रेंग दिन, कुकरा ल नइ नेवतन पाइस। कुकरा ल नेवत दे रतिस आज राते के कि मगरोहन ल कुकरा ते झन पासबे न, त कुकरा नइ पासे रतिस। कुकरा राहय तेन भिनसरहा पहर रोज पासथों कहिके कुकरुस-कूं अइसे पास गे। त कुकरा के आवाज ल सुनके सुवासा-सुवासिन सहसपुर मनसफ होए हें। अउ देव मन के बनाय मगरोहन कुंदे-कुंदाय सहसपुर बांधा म पेनाय रतिस त मड़वा म सादी-बिहाव होय रतिस। त मगरोहन नइ आन पाय हे, सहसपुर बांधा ले। अइसे कहानी हे। ए चौरागांव ए अउ ए छेरकी कछार गांव ए, ए देवता सब चौरा खार ए, ओ चौरागांव ए, ओहिदे। अब अतके धुर ले कहानी ह।