# शहर # इमर # पोंड़ी # हीरालाल # हिन्दी का तुक # त्रयी # अखबर खान # स्थान-नाम # पुलिस मितानी # रामचन्द्र-रामहृदय # अकलतराहुल-072016 # धरोहर और गफलत # अस्सी जिज्ञासा # अकलतराहुल-062016 # सोनाखान, सोनचिरइया और सुनहला छत्‍तीसगढ़ # बनारसी मन-के # राजा फोकलवा # रेरा चिरइ # हरित-लाल # केदारनाथ # भाषा-भास्‍कर # समलैंगिक बाल-विवाह! # लघु रामकाव्‍य # गुलाबी मैना # मिस काल # एक पत्र # विजयश्री, वाग्‍देवी और वसंतोत्‍सव # बिग-बॉस # काल-प्रवाह # आगत-विगत # अनूठा छत्तीसगढ़ # कलचुरि स्थापत्य: पत्र # छत्तीसगढ़ वास्तु - II # छत्तीसगढ़ वास्तु - I # बुद्धमय छत्तीसगढ़ # ब्‍लागरी का बाइ-प्रोडक्‍ट # तालाब परिशिष्‍ट # तालाब # गेदुर और अचानकमार # मौन रतनपुर # राजधानी रतनपुर # लहुरी काशी रतनपुर # रविशंकर # शेष स्‍मृति # अक्षय विरासत # एकताल # पद्म पुरस्कार # राम-रहीम # दोहरी आजादी # मसीही आजादी # यौन-चर्चा : डर्टी पोस्ट! # शुक-लोचन # ब्‍लागजीन # बस्‍तर पर टीका-टिप्‍पणी # ग्राम-देवता # ठाकुरदेव # विवादित 'प्राचीन छत्‍तीसगढ़' # रॉबिन # खुसरा चिरई # मेरा पर्यावरण # सरगुजा के देवनारायण सिंह # देंवता-धामी # सिनेमा सिनेमा # अकलतरा के सितारे # बेरोजगारी # छत्‍तीसगढ़ी # भूल-गलती # ताला और तुली # दक्षिण कोसल का प्राचीन इतिहास # मिक्‍स वेज # कैसा हिन्‍दू... कैसी लक्ष्‍मी! # 36 खसम # रुपहला छत्‍तीसगढ़ # मेला-मड़ई # पुरातत्‍व सर्वेक्षण # मल्‍हार # भानु कवि # कवि की छवि # व्‍यक्तित्‍व रहस्‍य # देवारी मंत्र # टांगीनाथ # योग-सम्‍मोहन एकत्‍व # स्‍वाधीनता # इंदिरा का अहिरन # साहित्‍यगम्‍य इतिहास # ईडियट के बहाने # तकनीक # हमला-हादसा # नाम का दाम # राम की लीला # लोक-मड़ई और जगार # रामराम # हिन्‍दी # भाषा # लिटिल लिटिया # कृष्‍णकथा # आजादी के मायने # अपोस्‍ट # सोन सपूत # डीपाडीह # सूचना समर # रायपुर में रजनीश # नायक # स्‍वामी विवेकानन्‍द # परमाणु # पंडुक-पंडुक # अलेखक का लेखा # गांव दुलारू # मगर # अस्मिता की राजनीति # अजायबघर # पं‍डुक # रामकोठी # कुनकुरी गिरजाघर # बस्‍तर में रामकथा # चाल-चलन # तीन रंगमंच # गौरैया # सबको सन्‍मति... # चित्रकारी # मर्दुमशुमारी # ज़िंदगीनामा # देवार # एग्रिगेटर # बि‍लासा # छत्‍तीसगढ़ पद्म # मोती कुत्‍ता # गिरोद # नया-पुराना साल # अक्षर छत्‍तीसगढ़ # गढ़ धनोरा # खबर-असर # दिनेश नाग # छत्तीसगढ़ की कथा-कहानी # माधवराव सप्रे # नाग पंचमी # रेलगाड़ी # छत्‍तीसगढ़ राज्‍य # छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म # फिल्‍मी पटना # बिटिया # राम के नाम पर # देथा की 'सपनप्रिया' # गणेशोत्सव - 1934 # मर्म का अन्‍वेषण # रंगरेजी देस # हितेन्‍द्र की 'हारिल'# मेल टुडे में ब्‍लॉग # पीपली में छत्‍तीसगढ़ # दीक्षांत में पगड़ी # बाल-भारती # सास गारी देवे # पर्यावरण # राम-रहीम : मुख्तसर चित्रकथा # नितिन नोहरिया बनाम थ्री ईडियट्‌स # सिरजन # अर्थ-ऑवर # दिल्ली-6 # आईपीएल # यूनिक आईडी

Saturday, April 8, 2017

शहर

शहर में शहर रहता है
शहर में सिर्फ शहर होता है
हर शहर का अपना वजूद है
उसका अपना वजूद, अपने होने से

चिरई-चुरगुन, तालाब-बांधा, मर-मैदान
गुड़ी-गउठान, पारा-मुहल्ला
बाबू-नोनी, रिश्ते-नाते
शाम-ओ-सहर सब
या समाहित या शहर बदर
अब शहर में बस शहर ही शहर

Saturday, February 4, 2017

इमर

छत्तीसगढ़ में हाथी के पुराने संदर्भों से वाकिफ हूं, एक नाम आठवीं सदी ईस्वी का उद्योतनसूरिकृत ग्रंथ 'कुवलयमाला' है, जिसमें छत्तीसगढ़ के हाथियों का पहला और रोचक उल्लेख मिलता है। मुगल काल में कलचुरियों द्वारा और देशी रियासतों के दौर में राजाओं द्वारा छत्तीसगढ़ के हाथी उपहार में दिए जाने की जानकारी मिलती है। कैप्टन जे फारसिथ की पुस्तक में छत्तीसगढ़ के हाथियों से जुड़े तथ्य और ढेरों रोचक जानकारियां हैं।

अपने सरगुजा प्रवासों में कुछ साल पहले डीपाडीह-कुसमी के रास्ते पर हाथियों का पूरा झुंड हमारे बगल में था और पिछले साल महेशपुर में अकड़ा आमने-सामने मिल गया था। हाथी वालों में समकालीन शरद वर्मा जी, जगदलपुर-बिलासपुर वाले को सपरिवार जानता हूं, माइक पांडेय से मिल चुका हूं, पार्वती बरुआ के नाम और काम से परिचित हूं, अंबिकापुर के अमलेन्दु मिश्र, प्रभात दुबे से भी बातें हुई हैं, वन विभाग के डीएफओ, सीसीएफ साहबान को भी जानता हूं। अपनी इन जानकारियों-सूचनाओं-संपर्कों के बावजूद ठिठका हूं...

पता लगा कि जशपुर-सरगुजा में अब भी, खासकर तपकरा के लोग हैं, जिनका हाथियों से पुश्तैनी रिश्ता है, जो हाथी को रास्ता दिखा देते हैं, बिना झिझक खदेड़ सकते हैं, और अब मुलाकात हुई अंबिकापुर को जल-आपूर्ति करने वाले बांकी बांध पर बसे पहाड़ी गांव गंझाडांड़ निवासी 22 वर्षीय युवक से, लगा कि इसका नाम एंथनी गोंजाल्विस से कुछ कम न होगा, पता लगा कि पिछले दिनों अंबिकापुर शहर में आ गए हाथियों को इन्होंने खदेड़ा था। बाप-दादा को देख-सुन कर सीखा है, हाथी खदेड़ना, हाथी से डर नहीं लगता उसे। हमलोग चर्च के पास खड़े बात कर रहे हैं।

मैं उसका नाम नोट कर रहा हूं, वह दुरुस्त कराता है कि उसके नाम खलखो में ल आधा नहीं पूरा है और वह स्पेलिंग केएच के बदले एक्स यानि एक्सएएलएक्सओ लिखता है, पूरा नाम इमर वल्द श्री रामधनी खलखो (उरांव)। इसका नाम मैंने अब तक किसी से नहीं सुना था, लेकिन वह जोड़ता है कि उसके साथ 26 वर्षीय भीखम वल्द श्री चोनहास तिर्की भी थे। इमर, दसवीं तक पढ़े हैं, शायद पास, शायद फेल।

थोड़ी बात 'खलखो' के साथ कुडुख-उरांव बोली पर। खलखो का अर्थ एक पक्षी है, और इसमें ख नुक्‍ता लगाकर लिखा जाता है। थोड़े उच्‍चारण भेद से पित्‍ताशय का अर्थ देने वाला शब्‍द, जो लगभग खळखो उच्‍चारित होता है, बन जाता है, लेकिन इन दोनों में ल और ळ की तरह ख के उच्‍चारण में भी फर्क है तथा लिखने में सामान्‍यतः पक्षी अर्थ वाला ख नुक्‍ता सहित और पित्‍ताशय वाला 'खर्च' में बिना नुक्‍ता उच्‍चारित होने वाले ख की तरह है। एक और सरनेम शब्‍द है 'खेस्‍स', यानि धान, जिसे अंगरेजी में केएचइएसएस के बजाय एक्‍सइएसएस लिखा जाता है, इसी तरह के दूसरे शब्‍द 'खेंस' (खून) से समझने में मदद मिल सकती है, जो नुक्‍ता लगा कर लिखा और लगभग 'खबर' वाले ख की तरह उच्‍चारित होता है।

इस तर‍ह 'खलखो' और 'खेस्‍स' का ख (जो खळखो और खेंस के ख से भिन्‍न है), संभवतः भाषाविज्ञान में काकल्‍य स्‍पर्श यानि Glottal stop कही जाने वाली ध्‍वनि वाला है, जिसे 'क्‍स' (एक्‍स वाले) जैसे उच्‍चारण, जिसमें ह जैसी स्पर्शरहित कण्ठोष्ठ्य ध्वनि भी है, से बेहतर स्‍पष्‍ट किया जा सकता है, इसलिए अंगरेजी में 'खलखो' और 'खेस्‍स' जैसे शब्‍दों को लिखने के लिए यह केएच के बजाय एक्‍स अधिक संगत होता है। यह जोड़ना आवश्‍यक होगा कि कुडुख को भी केयूआरयूएक्‍स भी लिखा जाता है और झारखंड के डा. नारायण ओरांव द्वारा कुडुख के लिए बनाई गई लिपि तोलोंग सिकी (कुँड़ुख़ और तोलोङ सिकि, लिखा जाता है) में भी दो ख हैं, बिना नुक्‍ता वाला ख, जिसे केएच लिखा जाता है और दूसरा नुक्‍ता वाला, जिसे एक्‍स लिखा जाता है। कहा जा सकता है कि वस्तु्तः कुडुख की इस लिपि का नुक्ता सहित लिखा जाने वाला ख, जो अगरेजी के एम की तरह लिखा जाता है, की ध्वनि ही एक ऐसी है, जो नागरी में संभव नहीं है और जिसके कारण अलग लिपि की आवश्यकता महसूस की गई होगी।

मेरे साथ जगदेवराम भगत हैं, उरांव भाईचारा पनप गया, इमर अधिक सहज हो गए हैं। वे यह भी बताते हैं कि गंझाडांड़ के लगभग सभी निवासी उरांव और कोरवा इसाई बदल गए हैं, लेकिन वे और उनका परिवार नहीं। जाने कैसे दोनों ने बिना किसी प्रसंग, जान लिया है कि दोनों अनबदले उरांव हैं। प्रकृति और परम्परा से जुड़े, जल-जंगल-जमीन से अभिन्न।

हाथी का सामना होने पर हमने अपने लिए टिप्‍स मांगे, इमर ने कहा, बहुत आसान। अक्‍सर होता यह है कि हाथी पीछे पड़ जाए तो लोग उससे दूरी बनाने के लिए सरपट दौड़ लगाते दूरी बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन ऐसा करके हाथी से नहीं बचा जा सकता, जबकि करना बस यह होता है कि सीधे भागने के बजाय एकदम दायें या बांयें भागें, नब्‍बे अंश पर मुड़कर। हाथी ऐसे नहीं मुड़ पाता, आप तक नहीं पहुंच सकता और आप सुरक्षित रह सकते हैं।

इमर, बांध से मछली पकड़ते हैं। अफसोस सहित बताते हैं कि एक बार इसी जाल में बदक फंस गई थी, कैसी थी पूछने पर जेब से स्मार्ट फोन निकाल कर 'रेड क्रेस्टेड पोचर्ड' की तस्वीर दिखा देते हैं। अब तक जमा की गई सूचनाओं की गठरी इन बातों के बाद बोझ लग रही है। घंटे भर के साथ में इमर के बोले गए 20-25 वाक्यों से कितना कुछ सुन-जान लिया है। उम्मीद है चुप्पे-से इमर, अगली किसी लंबी मुलाकात में मुखर होंगे और वह मेरे लिए अपनी समझ झाड़-पोंछ करने का बेहतर अवसर होगा।

Friday, October 7, 2016

पोंड़ी


पूर्वजों के गांव पोंड़ीशंकर और अपने मूल निवास अकलतरा से करीबी गांव, पोंड़ी दल्हा नाम के चलते ‘पोंड़ी‘ के फेर में पड़ा हूं। टोहने-टटोलने की जरूरत न होती, इतनी मशक्कत की गुंजाइश ही कहां, जो भाषाविज्ञान आता, चुटकियों में बात बन जाती। लेकिन किसी खास सहारे बिना भेदने-बूझने की जहमत में ही तो नये रास्ते खुलते हैं।

इस तरह राह चलते किसी पोंड़ी से गुजरता या सुनता, नाम जमा कर लेता, हिसाब लगाया कि कोरिया, सरगुजा, जशपुर, रायगढ, कोरबा़, जांजगीर, बिलासपुर, कवर्धा, राजनांदगांव क्षेत्र, यानि उत्तर-मध्य छत्तीसगढ़ में पोंड़ी नामक गांवों की संख्या लगभग दो कोरी तक है। इनमें पोंड़ी-उपरोड़ा तो है ही, लुंड्रा में उपरपोंड़ी और खालपोंड़ी (खाल या खाल्ह-खाल्हे यानि नीचे) है। इसके अलावा आधा दर्जन से अधिक गांवों के नाम पोड़ी (पोंड़ी के बजाय) उच्चारण वाले हैं। छत्तीसगढ़ से बाहर निकलें तो बगल में चिल्फी घाटी के साथ एक पोंड़ी है फिर हर की पौड़ी और पौड़ी गढ़वाल का नाम किसने नहीं सुना।

पौड़ी या पौरी (ड्योढ़ी) या पोंड़ी अर्थ देता है दहलीज का यानि उदुम्बर (जिसका एक अर्थ दो तोले की तौल भी है)। एक करीबी शब्द पौढ़ना है, जिसका तात्पर्य शयन मुद्रा/लेटना या क्षैतिज होना है। उदुम्बर या उडुम्बर यानि गूलर, जिसकी लकड़ी इस काम के लिए इस्तेमाल होती थी। सामान्यतः गूलर की लकड़ी इमारती काम में नहीं आती, लेकिन इस वर्ग में भुंइगूलर (Drooping fig या Ficus semicordata), गूलर (Indian fig या Ficus Glomerata or Ficus racemosa) और खुरदुरे पत्ते वाला कठगूलर (Hairy fig या Ficus hispida) जाने जाते हैं, जिनमें से संभवतः कठगूलर ही इस इमारती काम में इस्तेमाल होता है।

उदुम्बर, शाब्दिक चौखट का वह भाग, जिसके लिए चौखट शब्द रूढ़ हो गया है, जो जमीन पर क्षैतिज टिका होता है। यही देहली और देहरी या छत्तीसगढ़ी में डेहरी हो जाता है। माना जाता है कि गंगा-यमुना दोआबे के मैदान में प्रवेश का दहलीज होने से ही देहली हो कर दिल्ली नाम आया है। उडुम्बर के उ का छत्तीसगढ़ी में लोप होकर बाकी बचे डुम्बर से सीधे डूमर बन जाता है। ड्योढ़ी, (ड्योढ़ा या डेढ़) समतल-एक तल से कुछ अधिक, ऊपर उठा हुआ, अर्थ देता है। जैसे सामान्य से कुछ अधिक होशियार बनने को ‘डेढ़ होशियार‘ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी में डेढ़ का खास प्रयोग रिश्ते के लिए है, डेढ़ साला। पत्नी के छोटे भाई सारा (साला) हैं और बड़े भाई डेढ़ सारा। लेकिन मजेदार कि पत्नी की छोटी बहनें तो सारी होती हैं पर पत्नी से बड़ी बहनें डेढ़ सारी नहीं, बल्कि डेढ़ सास कही जाती हैं।

माना जाता है कि शब्द के मूल की ओर बढ़ते हुए पोंड़ी-पौड़ी-पौरी या पउरी (पांव?)-पउली-पओली-प्रतोली से आता है। ‘प्रतोली‘ का अर्थ मिलता है रथ्या, यानि रथ चलें ऐसा मार्ग, चौड़ा, प्रशस्त राजमार्ग, नगर की मुख्य सड़क आदि। लेकिन कुछ अन्य पुराने विवरणों से अनुमान होता है कि प्रतोली का करीबी अर्थ होगा- उंचाई लिए, दो-तीन मंजिला, मुख्य प्रवेश द्वार जैसा कुछ। अर्थ की यह ‘भिन्नता‘ अमरकोश और रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र के उद्धरणों में है। आइये देखें, कोई समाहार-समाधान संभव है।

वापस पौरी पर आएं और मूल शब्द के साथ थोड़ी जोड़-तोड़ करें तो प्रतोली में ‘प्र‘ उपसर्ग आगे, सामने का अर्थ देगा और तोली- तुलना, तोलना या तौलना, जिसका अर्थ उठाना, ऊपर करना भी होता है। पौरी के करीबी पोर का अर्थ संधि यानि जोड़ ही होता है और पोल का मतलब छेद होने के कारण यह दीवार के बीच खोले गए दरवाजे के लिए प्रयुक्त होता है जैसे जयपुर का त्रिपोलिया या दूसरे पोल (दरवाजे)। छत्तीसगढ़ी में यही पोल, पोला, पोळा होते पोंडा बन जाता है। इसी तरह पोर, फोर (फूटा हुआ) बनता है, जैसे सरगुजा के रामगढ़ का हथफोर, ऐसी सुरंग जिससे हाथी गुजर जाए।

अब समेटें तो पोंड़ी के प्रतोली का ‘प्र‘ हुआ रास्ता जिसमें ऊपर उठा होने का आशय जुड़ा है, जो रास्ते के बीच बने स्थापत्य (द्वार पर) के साथ ऊंचाई का अर्थ देगा। माना भी गया है- जैसा दक्षिण भारत में ‘गोपुर‘ वैसा उत्तर भारतीय स्थापत्य में ‘प्रतोली‘। और तोलने में ऊपर उठाना तो होता ही है, चाहे वह तराजू हो या किसी वस्तु का भार अनुमान करने के लिए उसे हाथ में ले कर ऊपर उठाना। इसके साथ यह ऊंचाई (पहाड़ी) की ओर जाने का मार्ग भी संभव है। अब एक बार फिर से यहां आए शब्दों को दुहरा कर देखिए, इस रास्ते पर चल कर कहां तक पहुंच पाते हैं। यहां कुछ दाएं-बाएं के संकेत भी छोड़े गए हैं, आपके भटकने की पसंद और सुविधा का ध्यान रखते हुए। मेरे पूर्वजों ने पोंड़ीशंकर से अकलतरा तक का रास्ता नापा, और उसके पार है पोंड़ी गांव हो कर दल्हा पहाड़ पर चढ़ने का रास्ता।

यह पोस्‍ट, शोध पत्रिका 'ज्ञान प्रवाह' के एक अंक में छपे ए.एल. श्रीवास्‍तव जी का लेख पढ़कर, बहुत दिनों में मन में खुदबुदा रही बातों का लेखा है।