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Friday, October 7, 2016

पोंड़ी


पूर्वजों के गांव पोंड़ीशंकर और अपने मूल निवास अकलतरा से करीबी गांव, पोंड़ी दल्हा नाम के चलते ‘पोंड़ी‘ के फेर में पड़ा हूं। टोहने-टटोलने की जरूरत न होती, इतनी मशक्कत की गुंजाइश ही कहां, जो भाषाविज्ञान आता, चुटकियों में बात बन जाती। लेकिन किसी खास सहारे बिना भेदने-बूझने की जहमत में ही तो नये रास्ते खुलते हैं।

इस तरह राह चलते किसी पोंड़ी से गुजरता या सुनता, नाम जमा कर लेता, हिसाब लगाया कि कोरिया, सरगुजा, जशपुर, रायगढ, कोरबा़, जांजगीर, बिलासपुर, कवर्धा, राजनांदगांव क्षेत्र, यानि उत्तर-मध्य छत्तीसगढ़ में पोंड़ी नामक गांवों की संख्या लगभग दो कोरी तक है। इनमें पोंड़ी-उपरोड़ा तो है ही, लुंड्रा में उपरपोंड़ी और खालपोंड़ी (खाल या खाल्ह-खाल्हे यानि नीचे) है। इसके अलावा आधा दर्जन से अधिक गांवों के नाम पोड़ी (पोंड़ी के बजाय) उच्चारण वाले हैं। छत्तीसगढ़ से बाहर निकलें तो बगल में चिल्फी घाटी के साथ एक पोंड़ी है फिर हर की पौड़ी और पौड़ी गढ़वाल का नाम किसने नहीं सुना।

पौड़ी या पौरी (ड्योढ़ी) या पोंड़ी अर्थ देता है दहलीज का यानि उदुम्बर (जिसका एक अर्थ दो तोले की तौल भी है)। एक करीबी शब्द पौढ़ना है, जिसका तात्पर्य शयन मुद्रा/लेटना या क्षैतिज होना है। उदुम्बर या उडुम्बर यानि गूलर, जिसकी लकड़ी इस काम के लिए इस्तेमाल होती थी। सामान्यतः गूलर की लकड़ी इमारती काम में नहीं आती, लेकिन इस वर्ग में भुंइगूलर (Drooping fig या Ficus semicordata), गूलर (Indian fig या Ficus Glomerata or Ficus racemosa) और खुरदुरे पत्ते वाला कठगूलर (Hairy fig या Ficus hispida) जाने जाते हैं, जिनमें से संभवतः कठगूलर ही इस इमारती काम में इस्तेमाल होता है।

उदुम्बर, शाब्दिक चौखट का वह भाग, जिसके लिए चौखट शब्द रूढ़ हो गया है, जो जमीन पर क्षैतिज टिका होता है। यही देहली और देहरी या छत्तीसगढ़ी में डेहरी हो जाता है। उडुम्बर के उ का छत्तीसगढ़ी में लोप होकर बाकी बचे डुम्बर से सीधे डूमर बन जाता है। ड्योढ़ी, (ड्योढ़ा या डेढ़) समतल-एक तल से कुछ अधिक, ऊपर उठा हुआ, अर्थ देता है। जैसे सामान्य से कुछ अधिक होशियार बनने को ‘डेढ़ होशियार‘ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी में डेढ़ का खास प्रयोग रिश्ते के लिए है, डेढ़ साला। पत्नी के छोटे भाई सारा (साला) हैं और बड़े भाई डेढ़ सारा। लेकिन मजेदार कि पत्नी की छोटी बहनें तो सारी होती हैं पर पत्नी से बड़ी बहनें डेढ़ सारी नहीं, बल्कि डेढ़ सास कही जाती हैं।

माना जाता है कि शब्द के मूल की ओर बढ़ते हुए पोंड़ी-पौड़ी-पौरी या पउरी (पांव?)-पउली-पओली-प्रतोली से आता है। ‘प्रतोली‘ का अर्थ मिलता है रथ्या, यानि रथ चलें ऐसा मार्ग, चौड़ा, प्रशस्त राजमार्ग, नगर की मुख्य सड़क आदि। लेकिन कुछ अन्य पुराने विवरणों से अनुमान होता है कि प्रतोली का करीबी अर्थ होगा- उंचाई लिए, दो-तीन मंजिला, मुख्य प्रवेश द्वार जैसा कुछ। अर्थ की यह ‘भिन्नता‘ अमरकोश और रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र के उद्धरणों में है। आइये देखें, कोई समाहार-समाधान संभव है।

वापस पौरी पर आएं और मूल शब्द के साथ थोड़ी जोड़-तोड़ करें तो प्रतोली में ‘प्र‘ उपसर्ग आगे, सामने का अर्थ देगा और तोली- तुलना, तोलना या तौलना, जिसका अर्थ उठाना, ऊपर करना भी होता है। पौरी के करीबी पोर का अर्थ संधि यानि जोड़ ही होता है और पोल का मतलब छेद होने के कारण यह दीवार के बीच खोले गए दरवाजे के लिए प्रयुक्त होता है जैसे जयपुर का त्रिपोलिया या दूसरे पोल (दरवाजे)। छत्तीसगढ़ी में यही पोल, पोला, पोळा होते पोंडा बन जाता है। इसी तरह पोर, फोर (फूटा हुआ) बनता है, जैसे सरगुजा के रामगढ़ का हथफोर, ऐसी सुरंग जिससे हाथी गुजर जाए।

अब समेटें तो पोंड़ी के प्रतोली का ‘प्र‘ हुआ रास्ता जिसमें ऊपर उठा होने का आशय जुड़ा है, जो रास्ते के बीच बने स्थापत्य (द्वार पर) के साथ ऊंचाई का अर्थ देगा। माना भी गया है- जैसा दक्षिण भारत में ‘गोपुर‘ वैसा उत्तर भारतीय स्थापत्य में ‘प्रतोली‘। और तोलने में ऊपर उठाना तो होता ही है, चाहे वह तराजू हो या किसी वस्तु का भार अनुमान करने के लिए उसे हाथ में ले कर ऊपर उठाना। इसके साथ यह ऊंचाई (पहाड़ी) की ओर जाने का मार्ग भी संभव है। अब एक बार फिर से यहां आए शब्दों को दुहरा कर देखिए, इस रास्ते पर चल कर कहां तक पहुंच पाते हैं। यहां कुछ दाएं-बाएं के संकेत भी छोड़े गए हैं, आपके भटकने की पसंद और सुविधा का ध्यान रखते हुए। मेरे पूर्वजों ने पोंड़ीशंकर से अकलतरा तक का रास्ता नापा, और उसके पार है पोंड़ी गांव हो कर दल्हा पहाड़ पर चढ़ने का रास्ता।

यह पोस्‍ट, शोध पत्रिका 'ज्ञान प्रवाह' के एक अंक में छपे ए.एल. श्रीवास्‍तव जी का लेख पढ़कर, बहुत दिनों में मन में खुदबुदा रही बातों का लेखा है।

Saturday, October 1, 2016

हीरालाल


डेढ़ सौ साल पहले पैदा हुए व्यक्ति को क्योंकर याद करना जरूरी हो जाता है, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह पितरों में है, फिर भी पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ। 150 वीं जयंती के अवसर पर मुड़वारा-कटनी वाले रायबहादुर डा. हीरालाल की जन्मतिथि 1 अक्टूबर 1867 तक लौटते हुए देखा जा सकता है कि वे किस तरह इतिहास, पुरातत्व, जाति-जनजातियों से जुड़े, इस माध्यम से पूरे समाज की परम्परा, संस्कृति और उसकी भाषा-बोलियों में सराबोर हो कर अस्मिता, आत्म-गौरव की अभिव्यक्ति का नित-नूतन रस-संसार रचा। 67 वर्ष के जीवन सफर में इतिहास-परम्परा के न जाने कितने अनजाने-अनचीन्हे रास्तों को नाप लिया, शिक्षक से डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) बनते तक अपने समकालीन परिवेश और समाज के दैनंदिन कल्याण के समानांतर, भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हुए। अब यह मौका है देखने का, कि उनके इंगित राह पर उनकी स्मृतियों को उंगली पकड़े हम कहां पहुंच पाए हैं।

रामकथा और मानस, भारतीय समाज में धर्म-अध्यात्म का सर्वप्रिय साधन है साथ ही साहित्य और ज्ञान-प्रकाश का स्तंभ बन कर कथावाचकों-टीकाकारों के माध्यम से 'सुराज', स्वाधीन और पराधीन के व्यापक अर्थ भी रचता है। महोबा के पास सूपा गांव की एक कलवार बिरादरी व्यापार के लिए बिलहरी आ बसी। इनमें एक, नारायणदास रामायणी हो कर पाठक कहलाए, मुड़वारा-कटनी आ बसे। इनके वंश क्रम में आगे मनबोधराम, ईश्वरदास और फिर हीरालाल हुए। शिवरीनारायण में तहसीलदार रहे 'श्यामा-स्वप्न' के रचयिता ठाकुर जगमोहन सिंह मुड़वारा मिडिल स्कूल में आए और तब तीसरी कक्षा के विद्यार्थी हीरालाल की प्रतिभा को पहचान कर बालक को संस्कृत पढ़ाने की बात शिक्षक से कही और चले गए। विद्या-व्यसनी बालक हीरालाल ने संस्कृत पढ़ने की जिद ठान ली, शिक्षक ने किसी तरह अपना पिंड छुड़ाया, लेकिन बालक हीरालाल के मन में पड़ा यह बीज आगे चलकर वट-वृक्ष बना।

शासकीय सेवा में विभिन्न दायित्वों के निर्वाह में उनकी विशेष योग्यता के अनुरूप कार्यों में संलग्न किया गया। उन्होंने शिक्षा और अकाल संबंधी काम तो किया ही, भाषा सर्वेक्षण, जाति-जनजाति अध्ययन, जनगणना और गजेटियर के लिए तैयारी करते हुए उन्होंने भाषा-साहित्य, प्राचीन इतिहास और परम्पराओं पर अतुलनीय कार्य किया। आपके सहयोग से आर.वी. रसेल ने चार खंडों में 'द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आफ द सेन्ट्रल प्राविन्सेस आफ इंडिया' (सन 1916) तैयार किया, इसकी जानकारियां और तथ्य, प्रामाणिकता की मिसाल है। एक पुराने ताम्रपत्र के अपरिचित अक्षरों में खुदी लिपि को स्वयं के प्रयास से पहले-पहल समझ कर उसका संपादन किया, जो प्राचीन अभिलेखों की सबसे प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'एपिग्राफिया इंडिका' में प्रकाशित हुआ। फिर तो यह सिलसिला बन गया और वे इस शोध-पत्रिका के विशिष्ट व्यक्ति बन गए, इस क्रम में उन्होंने सन 1916 में 'डिस्क्रिप्टिव लिस्ट्स आफ इन्स्क्रिप्शन्स इन द सेन्ट्रल प्राविन्सेस एंड बरार' पुस्तक में छत्तीसगढ़ सहित मध्यप्रान्त और बरार के तब तक ज्ञात सभी प्राचीन अभिलेखों की सूची तैयार कर प्रकाशित कराया।

मैदानी छत्तीसगढ़ में नांगा बइगा-बइगिन के अलावा विभिन्न बइगा ग्राम देवता यथा- सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजउ, ठंडा, लतेल आदि हैं, इन्हीं में एक सुखेन भी हैं, जिनकी पूजा-स्थापना, अब कौशिल्या माता मंदिर के लिए प्रसिद्ध ग्राम चंदखुरी में है, इस जानकारी को सुषेण वैद्य से रोचक ढंग से जोड़कर आपने शोध लेख लिखा। इसी तरह लोकनायक नायिकाओं सुसकी, मुरहा, न्यौता नाइन, गंगा ग्वालिन, राजिम तेलिन, किरवई की धोबनिन, धुरकोट की लोहारिन और बहादुर कलारिन की तरह बिलासा केंवटिन के बारे में जाना तो देवार गीत- 'छितकी कुरिया मुकुत दुआर, भितरी केंवटिन कसे सिंगार। खोपा पारे रिंगी चिंगी, ओकर भीतर सोन के सिंगी।...' का अभिलेखन कर अंगरेजी अनुवाद करते हुए शोध लेख लिखा। बीसवीं सदी के पहले दशक में प्राचीन अभिलेखों संबंधी उनके शोध लेखों से छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर का प्राचीन गौरव उजागर हुआ।

हिन्दी गजेटियर की पहल के साथ हिन्दी-सेवा का मानों मौन संकल्प आपने दुहराया। इस काम में औरों को भी जोड़ते हुए बिलासपुर जिला के सन 1910 के गजेटियर का संक्षिप्त हिन्दी स्वरूप 'बिलासपुर वैभव' के लिए प्यारेलाल गुप्त को प्रेरित किया। इसी क्रम में गोकुल प्रसाद, धानूलाल श्रीवास्तव, रघुवीर प्रसाद जैसे नाम भी जुड़े। जबलपुर से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'हितकारिणी' के लिए 1915-16 में ग्रामनामों पर आपके लिखे लेख 1917 में 'मध्यप्रदेशीय भौगोलिक नामार्थ-परिचय' प्रकाशित पुस्तक, स्थान नामों की पहली हिन्दी पुस्तक है, जिसमें छत्तीसगढ़ के स्थान नामों पर रोचक और सुबोध चर्चा है। वह 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी' के अध्यक्ष रहे। ''मध्यप्रान्त में संस्कृत एवं प्राकृत पाण्डुलिपियों की विवरणात्मक ग्रंथ-सूची'' संकलित की जिससे 8,000 से अधिक पाण्डुलिपियां प्रकाश में आईं। साथ ही नागपुर विश्वविद्यालय में 'हिन्दी-साहित्य परिषद' का गठन तथा स्नातकोत्तर तक के पाठ्यक्रम में हिन्दी को मान्यता दिलाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ ने आपके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुआ रचा- 'हीरा मध्यप्रदेश के, भारत के प्रिय लाल, कीर्ति तुम्हारी अमर है, पंडित हीरालाल।' और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘सरस्वती‘ के लिए लिखा- 'अयि अतीत तेरे ढेले भी, दुर्लभ रत्न तुल्य चिरकाल, पर तेरा तत्वज्ञ स्वयं ही, एक रत्न था हीरालाल।'

आपकी स्मृति में 31.12.1987 को डाक टिकट जारी हुआ।

Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी का तुक


समय-समय पर और खासकर हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के साथ तुक मिला कर बिन्दी-चिन्दी जैसे शीर्षकों वाले लेख छपते हैं, इनमें भाषा-साहित्य की बखिया भी उधेड़ी जाती रहती है। आज रायपुर के अखबारों में एक शीर्षक है 'बाजार के जरिये विश्व भाषा बन रही है हिंदी'। हिन्दी दिवस पर 'अविरल व्यक्तित्व के धनी क्रान्तदृष्टा साहित्यकार-पत्रकार श्री रावलमल जैन 'मणि' की 108वीं कृति के प्रकाशन अवसर पर दो पेज में फैला 'विशेष' भी है। और विनोद कुमार शुक्ल से बातचीत छपी है, जिसका शीर्षक है- 'हिन्दी जनता की भाषा है' - 'और जनता से बड़ा ग्राहक कौन होगा?' इसी तारतम्य में दो बातें याद आ रही है, सैकड़ों हिन्दीे पुस्तकों के लेखक-बेस्ट सेलर सुरेन्द्र मोहन पाठक, जिनके एक उपन्यास की लगभग ढाई करोड़ प्रतियां बिकने की चर्चा दुनिया भर में हुई थी, पिछले माह एक कार्यक्रम में रायपुर आए थे और इसके साथ बेतुकी सी लग सकने वाली बात कि-

विनोद जी के चर्चित उपन्या‍स 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्त‍कें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल‍ चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्यी पर खरीदे जाने की व्यवस्था कर सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है।

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं, पुनर्प्रकाशित हो रहे हैं। सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और कथित लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

इस तारतम्य में याद आता है कि बिलासपुर के एक महानुभाव ने अपनी आत्मकथा लिख डाली और उसे छपाने का इरादा कर बैठे। कुछ दिन भटकने के बाद पाकेट बुक छापने वाली एक लोकप्रिय प्रकाशन संस्था तैयार हुई, अपनी तर्ज, शर्त-खर्च के साथ। बाजार की नब्ज समझने वाले इन लेखक को सभी शर्तें सहज-स्वाभाविक लगीं, बात तय होने को थी तभी उन्होंने इस बात की चर्चा मुझसे की। वे पांडुलिपि मुझे पढ़ा चुके थे, मैंने उनसे कहा कि इन शर्तों पर तो कोई अच्छा, प्रतिष्ठित प्रकाशक भी इसे छापने को तैयार हो सकता है। इस पर उन्होंने कहा कि स्वयं की गणना साहित्यकार में कराने की उनकी कोई रुचि नहीं है, वे तो बस यह चाहते हैं कि लोग इसे खरीदें, बस स्टैंड और रेल्वे स्टेशनों पर, सफर में पढ़ें और अपनी जिंदगी के साथ कुछ समानता पा कर थोड़ा मन बहला लें। पता चला कि कुछ महीनों बाद इस किताब का संस्करण छपने वाला है और उस प्रकाशक की फरमाइश पर वे अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिख रहे हैं।

पुनश्चः और अब साहित्य नोबल पुरस्कार के लिए बाब डिलन का नाम, इस तारतम्य में उल्लेखनीय है।