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Sunday, August 5, 2018

मितान-मितानिन


फ्रेन्डशिप डे वाली दोस्तियां बहुधा एक दिन का मामला होती हैं और फेसबुक का तो ढांचा ही फ्रेन्डबुक जैसा है, जिसने हर रिश्ते को दोस्ती में बदलकर, इसके बनने-बिगड़ने को एक क्लिक पर ला दिया है। आभासी दुनिया पर दोस्ती वस्तुतः एक फलता-फूलता व्यापार है। इस दौर-दौरे में छत्तीसगढ़ में प्रचलित मित्रता की परंपरा के सौहार्द और समरस सद्भाव का स्मरण आवश्यक है। यहां पारम्परिक मितान-मितानिन, ऐसी मित्रता है जो न सिर्फ आजन्म बल्कि पीढ़ियों के लिए रिश्ते में बदल जाती है।इसका रोचक पहलू यह भी कि मितानी बदने के लिए सहज से ले कर विधि-विधान वाले कई तरीके हैं, किन्तु मितानी तोड़ने-छोड़ने का कोई प्रावधान, किसी भी तरीके की मितानी में नहीं है।

मितान बदने या गियां-गांठी की परम्परा पूरे छत्तीसगढ़ में है। पुरुष आपस में मितान होते हैं तो महिलाएं मितानिन। मितान बदना यानि मिताई या मित्रता में बद्ध होना, बंधना। इसी प्रकार गियां-गांठी का तात्पर्य गियां, गुइयां या गोई और गांठी अर्थात दो व्यक्तियों के बीच अटूट संबंधों की गांठ। इस तरह छत्तीसगढ़ी में बदना, वस्तुतः बंधना या गांठ बांध लेना है जिसमें शपथ, सौगंध और संकल्प आशय भी निहित है। मित्र बनाने की इस परम्परा में जाति, धर्म जैसी कोई असमानता बाधक नहीं होती, बल्कि कई बार तो इसी भेद-भाव में सांमजस्य के लिए मितानी होती है। गांव में अल्पसंख्यक समुदाय या जाति का व्यक्ति, गांव के अन्य लोगों से मितान बद कर भाईचारा बना लेता है। ऐसा नहीं कि मितानी एक-दूसरे के मन मिलने पर ही होती है, कई बार कद-काठी, चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल में समानता देख कर या एक ही नाम वाले सहिनांव-हमनाम के लिए लोग सुझाते हैं कि ‘गियां बने फभिही‘ और मितानी बद ली जाती है। इससे एक कदम आगे, दो व्यक्तियों के बीच लगातार किन्तु अकारण मनमुटाव होता रहे तो इसके निवारण के लिए उनकी मितानी करा दी जाती है और इसके बाद उनके संबंध बहुधा मधुर मैत्रीपूर्ण बन जाते हैं।

मितानी परम्परा में महापरसाद (महाप्रसाद) का सर्वाधिक महत्व है, यह मित्रता में सबसे बड़ा रिश्ता माना जाता है। महापरसाद अर्थात् जगन्नाथपुरी का सूखा चांवल, भगवान जगन्नाथ जी पर चढ़ाया गया भोग, जिसे विधि-विधानपूर्वक दो वयस्क व्यक्ति आपस में एक-दूसरे को खिलाकर मितान बदते हैं। इस अवसर पर एक-दूसरे को नारियल, सुपारी, धोती-साड़ी भेंट कर, सीताराम महापरसाद बोलकर मैत्री संबंध स्थापित किया जाता है। इसी प्रकार की मितानी गजामूंग भी है। आषाढ़ मास की द्वितीया, अर्थात रथयात्रा-गोंचा पर्व का प्रसाद, गजामूंग यानि बड़ा मूंग (मोठ), चना दाल और गुड़, एक-दूसरे को खिलाकर आजीवन मैत्री संबंध निर्वाह के लिए संकल्प लिया जाता है। इसके बाद यह खून के रिश्ते की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जाता है, मितान बिरादर-हंड़िहरा जैसा हो जाता है, एक दूसरे के घर की गमी में सिर मुड़ाना, सूतक का पालन करने लगता है। विवाह के अवसर पर परिवार की तरह ही पंचहड़ (पांच बर्तन) दिये जाने की रस्म भी मितान पूरी करता है। मितान के बाद एक-दूसरे के सभी रिश्ते आपस में उसी सम्मान के साथ निभाए जाते हैं, किन्तु रोटी-बेटी की मर्यादा का निर्वाह किया जाता है साथ ही इसका नाजुक पक्ष है कि पुरुष मितानों की पत्नियां अपने पति के मितान को कुंअरा ससुर (जेठ)जैसा मानकर उससे परदा करती है।

मीत-मितानी का संबंध सिर्फ तीज-त्यौहार और खाने-पीने का नहीं, बल्कि दार्शनिक भाव के साथ आध्यात्मिक उंचाइयों तक पहुंच जाता है, जहां मित्रता के बंधन को तीर्थ का दरजा दिया गया है। ‘मितान-मितानीन दया-मया मा बंधाय, तीज तिहार मा जेवन बर जोरा अमराय।‘ ‘दस इन्दरी के महल जर जावै, मितानी झन झूटै, दिन दूभर हो जावै।‘ ‘मीत बंधन ले जनम भर के पिरीत, घर-दुवार बन जाथे दूनो के तिरीथ।‘ एक सरगुजिहा गीत में महापरसाद रिश्ते की महत्ता गाई जाती है कि कठिन समय के लिए, विपत्ति के दिनों का सामना करने के लिए महापरसाद बद लो। लड़कियां फूल बदती हैं, जो उनके विवाह के बाद निभ पाना संभव नहीं होता, लेकिन पुरुषों में बदा महापरसाद जीवन भर का साथ है-

ओह रे, बद ले महापरसाद, बड़े कठिना में बद ले।
कोन तो बदे फूल फुलवारी, कोन तो बदे महापरसाद।
लड़की मन तो बदें फूल फुलवारी, लइका बदे महापरसाद।
कै दिन रहय तोर फूल फुलवारी, कै दिन रहय महापरसाद।
दुइ दिन रहय तोर फूल फुलवारी, जियत भर रहय महापरसाद।
बड़े कठिना में...

इसी प्रकार मितानी के नाजुक रिश्तों का मजबूत और अटूट बंधन है- तुलसीदल, गंगाबारू, गंगाजल। इनमें मितानी का माध्यम क्रमशः तुलसी का पत्ता, गंगा की रेत और गंगाजल होता है, जिसे एक-दूसरे को ग्रहण करने को दिया जाता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि महापरसाद की तरह तुलसीदल, गंगाजल और गंगाबारू ऐसी पवित्र वस्तुएं हैं, जो भागवत की वेदी और मृत्यु के समय प्रयुक्त होती हैं। इन माध्यमों से मितानी में भावना होती है कि यह पवित्र रिश्ता जीवन-मरण का है। हर संकट और दुख की घड़ी में साथ निभाने वाला है। यह बस्तर अंचल के मरई-बदने की परम्परा में अधिक उजागर है, जो श्मशान घाट में तय हुआ मित्रता का रिश्ता है। कहा जाता है- ‘तुलसीदल, महापरसाद, जगन्नाथ के आसिस, सुरुज-आगी के साखी मा जियव लाख बरीस। यानि ऐसे संबंधों में भगवान जगन्नाथ का आशीष है, सूर्य, अग्नि और ध्रुव तारा इसके साक्षी है। और इसका निर्वाह विशेष पर्व-त्यौहारों दीवाली, दशहरा और राखी पर अवश्य निभाया जाता है। ‘मीत बदै सुरुज, आगी, धुरुतारा के साखी मा, जेमन मितानी निभावै देवारी, दसराहा, राखी मा।

सरगुजा अंचल में मितानी के लिए अधिक प्रचलित शब्द हैं- सखी जोराना या फूल जोराना। जोराना, यानि जुड़ना या जोड़ना। वैसे सखी जोराने या बदने का चलन पूरे छत्तीसगढ़ में है। यह मुख्यतः दो विवाहित, बाल-बच्चेदार महिलाओं के बीच होता है। रोचक यह है कि इस मित्रता का आधार संतति और उनका जन्म-क्रम होता है। यानि किसी महिला की पहली लड़की और उाके बाद दो पुत्र हैं तो वह वैसी ही महिला से सखी संबंध बनाएगी, जिसके लड़की, लड़का का जन्मक्रम और संख्या वैसी ही हो। इस तरह सखी बन गई महिलाओं में से किसी की संतान की मृत्यु होने पर या अन्य संतान हो जाने पर संख्या घट-बढ़ होने पर नई मितानी का रास्ता बन जाता है। कई बार मन मिल जाने पर जन्मक्रम के बजाय मात्र संतानों, पुत्र-पुत्री की कुल संख्या को आधार मानकर भी सखी जोराते हैं।

सखी जोराने में दोनों परिवार के प्रमुख की उपस्थिति होती है। दोनों पक्ष के लोग आंगन में इकट्ठे होते हैं। दोना में चावल, फूल ले कर बैठते हैं, गौरी-गणेश की पूजा होती है और एक दूसरे के कंधे पर साड़ी रखकर, कान में फूल खोंस देते हैं और एक दूसरे का पैर छू कर अभिवादन करते हैं। इसके बाद पूरे परिवार के लोग जोहार भेंट होते हैं, एक दूसरे परिवार को भोज, उपहार-भेंट दिया जाता है। सखी का रिश्ता जुड़ जाने के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रति आत्मीय और सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग करते हैं- जैसे सखी दाई, सखी दाउ, सखी भाई या सखी बहिनी। सरगुजा अंचल में गेंदा या अन्य फूलों के माध्यम से और कई बार गौरा पत्ता (चमकदार कागज-सनफना) को भी माध्यम बनाकर मितानी बना ली जाती है। एक अन्य मितानी जलीय वनस्पति गेल्हा है। सरगुजा के एक अधरतिया किसुन खेल करमा गीत में गेल्हा की बात, आभूषणों का विवरण देते हुए, पूरे लालित्य के साथ संग-सहेली न हो पाने की व्यथा बन कर उभरती है-

ओह रे ए रे
काकर जग मैं बदों गेल्हा, संग सहली होइ गे डोल्हा।
उंगरी के चुटकी उंगरी ला विराजे, पांव के पैरी हर होय गे डोल्हा।
जाग के जंगहिया हर जाग ला विराजे, कनिहा के करघनिया हर होय गे डोल्हा।
छाती के हंसली हर छाती ला विराजे, मांग के मघोटी हर होय गे डोल्हा।
हाथ के चुरी हर हाथ ला विराजे, बांह कर बाजू हर होय गे डोल्हा।
कान के तरकी हर कान ला विराजे। नाक के नथिया होय गे डोल्हा।
काकर जग मैं बदों गेल्हा।

बस्तर अंचल में भी दशहरा के अवसर पर सोनपत्ती के माध्यम से मितानी बदी जाती है। महिलाएं, कुड़ई फूल और संगात बदती हैं। लड़कियां एक दूसरे के बालों-जूड़े में हजारी फूल खोंसकर, बाली फूल रिश्ता बनाती हैं। इसी प्रकार देवता और बड़े-बुजुर्गों के समक्ष चम्पाफूल बदा जाता है। दोने में चावल की अदला-बदली कर पुरुष या महिला दोनिया सखी बन जाते हैं। केंवरा, बदना अविवाहित युवकों और युवतियों में होता है। एक अन्य मितानी, सामान्यतः दो परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के बीच होता है, त्रिनाथ मेला बंधन है। यह किसी धार्मिक स्थल या पीपल-बरगद के पास बड़े आयोजन के साथ सम्पन्न होता है। माटी हांडी की मितानी यादव समाज में अधिक प्रचलित है।

वानस्पतिक फूल-पत्तियों के माध्यम से मितान बदना प्रचलित है। सामान्यतः अविवाहित युवतियां रक्षाबंधन के अगले दिन भोजली पर्व पर एक-दूसरे के कान में भोजली लगाकर भोजली देवी के समक्ष संकल्प करते हुए गियां बदती है। अन्य सभी एक-दूसरे को भोजली दे कर अभिवादन-भोजली भेंट करते हैं। इसी तरह दौना और केंवरा, सुगंधित वनस्पतियां हैं, जिनके माध्यम से मितान बदा जाता है। इनमें दौना (नगदौना) की विशेषता है कि सांप इसकी गंध के पास नहीं फटकता जबकि केंवरा की महक सांपों को आकर्षित करती है। दोनों नवरात्रि के अवसर पर अंतिम दिन जंवारा विसर्जन के पश्चात ‘जंवारा मितानी’ बदी जाती है, जिसमें मितान बदने वाले दोनों पात्र, चंउक पर रखे पीढ़ा पर खड़े होकर एक-दूसरे से नारियल की अदला-बदली करते हैं। उल्लेखनीय है कि कहीं-कहीं जंवारा विसर्जन अभिभावकों की निगरानी में युवक-युवती परिचय सम्मेलन की तरह भी होता है। युवा लड़के-लड़कियों के बीच भी जंवारा का संबंध होता है, जो मित्रता का और कभी-कभी विवाह संबंध में भी बदल जाता है। इसी प्रकार गोदना बदने में दो व्यक्ति एक-दूसरे का नाम गुदवाकर मैत्री संबंध स्थापित करते हैं। सावन में दुबी अर्थात् दुर्वा जैसे तृण को भी माध्यम बनाकर मितानी होती है। दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा से प्राप्त गोबर का एक-दूसरे के माथे पर लगाकर गोबरधन बदते हैं, जिसमें गले मिलकर एक-दूसरे को नारियल, यथाशक्ति वस्त्र आदि भी भेंट करते हैं। जब मितान मिलते है तो सीताराम गोबरधन बोलते हैं। महिलाएं एक दूसरे का पैर छूती है। इसी प्रकार किसी पर्व, रामायण, कीर्तन, सत्यनारायण कथा या भागवत के अवसर पर मितानी बदने के लिए उपयुक्त अवसर माना जाता है।

छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट और समृद्ध परम्परा लोक-जीवन में कितनी और किस तरह से घुली-मिली है, यह प्रचलित कथनों में परिलक्षित होता है। लोकप्रिय कहावत है- ‘मितानी बदै जान के, पानी पीयव छान के।‘ लेकिन मित्रता करते हुए पात्र चयन में सावधानी रखना आवश्यक होता है, इसके लिए नसीहत दी जाती है- ‘भले मनसे ले मीत बदै जिंगनी हा सधे, खिटखिटहा ल मीत बनाय बोझा मा लदे।‘ लेकिन मितानी में जात-पांत का भेद नहीं होता, यह देख कर पड़ोसी को भी ईर्ष्या हो सकती है और मित्र की बातें मीठी लगती हैं, जबकि पड़ोसी की सीठी, कुछ यों- ‘मितान के मितानी देख परोसी ल होवै ईरखा, जात-पांत भुला जावै, गांड़ा सईस दिरखा।‘ और- ‘मितानी के गोठ मीठ-मीठ, परोसी के सीठ-सीठ।‘ संक्षेप में कहें तो छत्तीसगढ़ में मीत-मिठास का यह लोक-संस्कार, सोलह संस्कारों जैसा ही मान्य और प्रतिष्ठित है।

छत्तीसगढ़, सांस्कृतिक समृद्धि का ऐसा सागर है, जिसमें हर डुबकी के साथ हाथ आई सीप हमेशा आबदार मोती वाली ही निकलती है। ऐसा ही एक मोती 'मितान-मितानिन' की मिताई है।

Friday, July 27, 2018

एक थे फूफा


‘बिड़ी जलइ ले' और 'हर फिक्र को धुएं...‘ के अलावा बात, उन दिनों की जब धूम्रपान बिना वैधानिक चेतावनी के होता था।

एक थे फूफा, बड़े-छोटे सबके, जगत फूफा। मानों फूफा रिश्ता नहीं नाम हो, इस हद तक फूफा। अधेड़पन के पहले ही विधुर हो चुके ऐसों के भी फूफा, जिन्होंने बुआ को जाना ही नहीं था। अपने ही घर में फूफा बन जाने का कारण बाबू था। बुआ का भतीजा, उनके साले का चिरंजीव। बाबू को मातृसुख न मिला, तो बुआ उसे अपने साथ ले आईं, लेकिन बाबू के होश संभालने के पहले ही बुआ भी चल बसीं। परवरिश में बाबू को अपने घर के लक्षणों और इस घर के संस्कारों के साथ वह हर परिस्थिति मिली, जिससे उसके स्ट्रीट स्मार्ट बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इधर बाबू के फूफा, धीरे-धीरे जगत फूफा बन गए। लेकिन विद्वान बाबू की स्थापना है कि धूम्रपान के शौकीन फूफा, फू-फा करते धुंआ उड़ाते रहते हैं, इससे उनके नाम की व्युत्पत्ति हुई है। उनके फुफकारने की तरह डांटने को और हवाई मनगढंत बातों को भी बाबू, बेवजह की 'फूं फा' कहता।

फूफा, कई मनौतियों के बाद पैदा हुए थे, मामा घर में। यहां उनके घर में तब बाबा भोर में दतुअन-मुखारी कर रहे थे तब तक कौवा-कौवी बात करने लगे- आ गया इस कुल का नामलेवा-पानीदेवा। खोल कुरिया में बैठे बाबा ने सुन और गुन ली बात, उन्हें समझते देर न लगी और घोषणा कर दी कि आज अच्छी खबर आने वाली है, देखते-देखते कुलदीपक फूफा के अवतीर्ण होने का संदेसा आ गया। बाबा घूम-घूम कर मैना, गौरैया की बातें सुन, बुदबुदाते जा रहे थे, वंश के नये सदस्य, जातक का भाग्य और परिवार का भविष्य। बहुत दिनों बाद एक बार फिर, घर के भीतर 'बाजन लागे अनंद बधाई, सखि मन गावैं सोहर हो' होने लगा और ललना की सूचना पास-पड़ोस होते पूरे गांव को मिल गई।

समय पा कर फूफा हुए सर्वगुण संपन्न। चिड़ियों की बोली का ज्ञान फूफा को बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद-स्वरूप विरासत में मिल गया। घर के मुखिया, फूफा के बाबा ही रहे, फूफा के पिता को घर सियानी का मौका मिले तब तक फूफा जवान हो गए थे। खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी बाबा की होती। अपने पिता पर आश्रित रहे फूफा के पिता अपनी मंडली ले कर जमे रहते कछेरी खोली में। परिवार-समाज की समीक्षा करते। खवासों को सेवा-चाकरी और जी-हुजूरी का पूरा अवसर देते रहते। गमी-खुशी की सारी सामाजिकता का निर्वाह उन्हीं के भरोसे होता। शादी-ब्याह, रिश्ते का कोई मामला हो वे दोनों पक्षों के लिए, हां-ना के प्रति निरपेक्ष तर्क और तथ्य प्रस्तुत कर सकते थे। ना काहू से दोस्तीे, ना काहू से बैर। उन्हें यह तत्वज्ञान हो चुका था कि रिश्ते वही बन पाते हैं जो ऊपर तय होते हैं, हम तो निमित्त मात्र हैं। अपने इस गुण के कारण वे इलाके भर के भरोसेमंद अप्रिय पात्र बने रहे। उनकी न्यायप्रियता और सत्यवादिता के चलते उनके पास ऐसे विवाद भी निपटारे के लिए आते, जिनमें निर्णय लंबे समय तक लंबित रखने की मंशा हो।

किंवदंती की तरह प्रचलित है कि फूफा कभी कलकत्ता गए थे, सिनेमा देखने। हुआ यों कि उस साल फसल आई तो आढ़तिया को धान बेचने का काम फूफा ने अपने हाथ में ले लिया, और कुछ रकम अपने खर्च के लिए रोक कर, बिना कुछ पूछे-बताए कलकत्ता चले गए। वहां फिल्म देखी 'जागते रहो'। फूफा की इस हरकत से उत्पन्न परिस्थिति पर बाप-बेटे की बैठक होती रही, लेकिन फूफा ने इससे अपने को अलग, खुद को बेखबर बनाए रखा। विधि का विधान, बाबा की भूमिका मर्त्यलोक में अगले ही साल पूरी हो गई। स्वावलंबी फूफा ने लम्मरदारी अपने हाथों ले ली। फूफा के पिता को बेखबर बने रहना पड़ा। अंततः, घर की बात घर में रह गई। सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्वक हो गया। समाज में पारिवारिक प्रतिष्ठा जस की तस बनी रही। इस साल फसल अच्छी हुई। वे फिर कलकत्ता गए। इस बार दो मुसाहिबों को भी साथ ले गए। उन्हें पता लगा था और यही याद रहा कि फिल्म में मोतीलाल ने 'लैंडलार्ड' धोती पहनी है। फूफा के मन वही भा गई थी। 

इस बार कलकत्ता से एक जोड़ी 'लैंडलार्ड' ले आए। जिस दौर में लोग आमतौर पर बीएनसी मिल की धोती पहनते, कुछ होते जो 'सच्चा नीलम' और 'परमसुख' तक पहुंचते। फूफा की धोती इन सबसे अलग होती, पूरे इलाके में इस मामले में वे अकेले थे। उनकी धोती आठ हाथ की होती, तीन हाथ से कुछ ही कम अरज वाली। समय बीतता रहा। मालगुजारी चली गई, लेकिन फूफा की धोतियां कलकत्ता से ही आती, सिर्फ लैंडलार्ड, जीवन भर। ऐसे कुछ मौके, जब फूफा के चेहरे पर अबूझ मुस्कान आती थी, उनमें से एक यह 'जागते रहो' प्रसंग था। बात निकलने पर फूफा भेद न खोलते, इस जिक्र के एवज में कुछ खुशकिस्मतों को बिड़ी जरूर आफर कर दिया करते थे। 

फूफा, तमीज और कायदे की बारीकी के हिमायती थे। काम हो या बात, नक्काशी न हुई तो वे फूफा क्या। ज्यों जमाई ही क्या, जो रूठे नहीं। ऐसा जान पड़ता कि उनके व्यक्तित्व की गुरु-गंभीर परतें, अपने वास्तविक रुप में जग-जाहिर हों, सोचकर उन्होंने इसके लिए बिड़ी को साधन बना कर इस कला की अपनी निजी शैली विकसित की थी। उनके बिड़ी पीने में कलात्मक अदा होती। कभी नाक से, कभी मुंह से, कभी नाक-मुंह से एक साथ फूंक मारते धुंआ निकालना, कभी मशगूल इतने कि गाढ़ा धुंआ किश्तों में देर तक लहराता बाहर आता रहे, और कभी धुंआ ऐसे गुटक जाना, लगे कि कश कब लिया था, या लिया भी या नहीं। इसके लिए अभ्यास की जरूरत होती है, लेकिन उन्होंने यह आसानी से हासिल कर लिया था। हल्की उम्र और भरा-पूरा घर। लिहाजदारी निभाते हुए यह जरूरत आन पड़ती। कश लेते ही कोई बड़ा सामने आ गया तो धुआं निगल जाना होता था। बाद में उन्हें लगने लगा कि ऐसा करने से हाजत में मदद मिलती है और यह करना उनसे आसानी से सधने लगा। 

ऐसा नहीं कि उन्हें छल्ला निकालना न आता हो, इसमें महारत पाते उन्होंने जान लिया कि यह देखने वाले के लिए मजे का होता है, पर खुद का ध्यान भटकता है और धूम्रपान का आनंद जाता रहता है, इसलिए वे छल्लेबाजी को निषिद्ध मानने लगे। बिड़ी की नोंक आहिस्ते दांत से चबाए और होंठों में सावधान किन्तु सहज पकड़ बनाए, जिससे बिड़ी लार से गीली न हो जाय। बिड़ी होठों के किनारे अक्सर बांयें, लटकी सी रहती, फिर भी सुरक्षित रहती, कभी गिरी नहीं। बिड़ी के आखिरी सिरे को दांत से थोड़ा सा काटते तो पता लगता कि फूफा अब गहरा कश ले कर अधिक धुंआ गुटक कर, गंभीर चिंतन के लिए मन बना रहे हैं। यह सब तो कइयों में देखा जा सकता था, लेकिन फूफा के धूम्रपान को जो बात सब से खास बनाती थी, वह थी- बिड़ी के बंडल यानि कट्टा के, गिनती में पचीस इकाई की एक-एक कर गहन-बारीक जांच, छंटाई और जतन। 

गांव में कुछेक ही थे जो पूरा कट्टा खरीदते, दिन भर में जिन्हें पूरा कट्टा कम पड़े वह भी किफायती अंदाज से एक साथ चार-पांच बिड़ी ही मंगाते। लेकिन फूफा अद्धा पुड़ा मंगाते, अपने ही किरायेदार दुकान से। दस कट्टा वाले अद्धा पुड़ा में से दो या तीन कट्टे पास होते, बाकी नापास दुकान में वापस। अब एक-एक कर कट्टे को सहलाते-सा मथा जाता, जिससे कट्टाबंद बिड़ी बाहर झांकने लगे, उसे ठोंक कर फिर बिठा दिया जाता, यह कई बार दुहराने के बाद एक बिड़ी निकाली जाती, उसके लाल पतले कच्चे धागे की ऐंठन खोल कर, वापस कस कर बांधा जाता, बारी-बारी सभी पचीसों का धागा कस जाने के बाद एक बार फिर हल्की मथाई होती। अब बिड़ी को मुंह की ओर से आहिस्ते ठोंका जाता और तब दबा-दबा कर उसके ठसाठस, कम ठस, पोच्ची और फर्जी का वर्गीकरण होता। फिर कट्टे का शेर मार्का वाला लेबल सामने अपनी ओर रखकर जमाने का काम शुरू होता।

कट्टा जमाना कई तरह से होता। कभी अपनी ओर ठसाठस, परली ओर फर्जी और दाहिने-बायें बची हुई। कभी बाहिरी घेरे में से शुरू कर अंदर केन्द्र की ओर आते हुए ठस से पोच्ची, कभी इसके उलट। फूफा को बिड़ी का कट्टा ठीक करते देख लगता गुलदस्ता बनाया जा रहा हो वह भी ऐसा-वैसा नहीं, इकेबाना कलाकार का आराध्य के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने वाला। ऐसा भी होता कि वे कट्टा निकालते, जांचते-जमाते और कुछ देर बाद बिड़ी को बिना सुलगाए वापस कट्टे में रख देते। औरों के लिए बरबस ध्यान खींचने वाली यह अदा उनके लिए धूम्रपान का ऐसा चरण होता, जिसके बिना बिड़ी का आनंद अधूरा। पीने के लिए निकाली गई हरेक बिड़ी के साथ कट्टे की सजावट फिर दुरुस्त की जाती, मन ही मन गिनती करते हुए खाता मिलान भी हर बार होता। 

फूफा के कट्टे की जमावट एक तरह का अबूझ चक्रव्यूह होता, जिसे शतरंज के शह-मात की तरह खेलते और सार्थक करते, बस एक, फूफा के हिस्सेदार हंडिहरा, गांव-भइया। सामने वाले को बराबरी का दरजा देते हुए भाईचारे के प्रेम के साथ बिड़ी आफर करना हो तो तहजीब है कि पूरा कट्टा सामने किया जाए, जिसमें दो बिड़ी का मुंह बाहर निकला रहे। फूफा सलीके से एक पोच्ची और एक ठस निकालते, ठस भइया के हाथ लग जाती तो पोच्ची अंदर कर फूफा अपने लिए दूसरी ठस निकाल लेते। भइया कई बार इन दोनों विकल्प के अलावा हिस्सेदार-भाई के आत्मीय अधिकार के चलते मुलाहिजा न मानते हुए, कट्टे की अन्य कोई बिड़ी निकाल लेते, और वांछित पाने में सफल हो जाते। फूफा के भावहीन चेहरे से पता चलता कि भाई की इस उच्छृंखलता को 'छमा बड़न को...' के अंदाज में नजरअंदाज कर दिया है। 

सहज भाव से आफर करना हो तो कट्टा उठाकर सीधे सामने कर दिया जाता था, लेकिन सौजन्य बना रहता। ऐसे मौकों पर फूफा ध्यान रखते कि पोच्ची, बाहर की ओर रहे, लेकिन फूफा के करीबी आत्मीय भइया जान लेते और अंदर वाली बिड़ी निकाल लेते, फूफा को इसमें भी रस लेना आता था इसके बाद दोनों के चेहरों पर ऐसी मुस्कान आती जिसे देख कर कोई रेफरी नहीं बता सकता कि जीत किसकी हुई है, ज्यादातर लोगों को तो यह भी पता न चलता कि बाजी जमी और खेल भी हो गया। फूफा ने बिड़ी कट्टा का जनउला बनाया था- ‘एक माई के पेट म, पच्चिस पिला समाय जी। तरी कती सुकुर सइया, ऊपर डहर चकराय जी।‘ जनउला बुझाने के दौरान कट्टे के बीड़ियों की एक-एक कर जांच होती रहती। बड़े-बच्चों किसी को भी यह बूझने को कहते, जवाब न आने पर अपने बिड़ी कट्टे को घुमाते-फिराते क्लू देते, 'का सखी साजन...' वाले भाव और गर्वीली मुस्कान सहित इशारों-इशारों में जवाब समझा देते। 

बिड़ी-आचार में परम्परा की गहरी जड़ें हैं, अलिखित लेकिन शास्त्रीय गंभीरता वाली संहिता। किससे और कब पीने के लिए बिड़ी मांगी जा सकती है, किसे दी जानी चाहिए, किसे आफर करनी है, बिड़ी पीने में किससे कितना ओट रखना है, सुलगाने और पेश करने का ढंग, आपसी संबंधों और उसकी मर्यादा के जानकार ऐसे अवसर के हाव-भाव और मुख-मुद्रा को आवश्यपक संदर्भ के लिए याद रखते और इससे अपने मतलब की बातें-समझ, दुरुस्त कर लेते थे। नजाकत भरा लिहाज ऐसा भी होता जिसमें बिड़ी सामने सुलगा तो लें, मगर कश लेते हुए हथेली से ओट और धुंआ अगल-बगल फूंकना होता। इससे भी आगे, बिड़ी का कश लेने के लिए, दोनों हथेलियों को जोड़कर शंख बजाने वाली मुद्रा में, खोखली मुट्ठी में उसे छुपाए रखना होता था। फूफा की पोच्ची बिड़ी अगले को आफर के लिए होती, पर खुद के लिए इस्तेमाल होती थी जब जल्दी-जल्दी कश लेकर, किसी और काम पर लग जाना होता या तब भी पोच्ची बिड़ी खरचने का मौका होता, जब न चुलुक हो, न करने को कुछ और। वैसे गंभीर चिंतनशील फूफा को देख कर अनुमान करना मुश्किल होता कि वे किस मनःस्थिति में हैं, पोच्ची वाली कि ठस वाली। 

पांचेक सौ छान्ही वाले गांव की इकलौती दुकान, फूफा का ही किरायेदार। कचहरी की तारीख पर फूफा जब शहर जाते, तब जिस दुकान से सौदा-सुलुफ होता, उसी ने अपने साले को भेजा था यहां दुकान खोलने। बिड़ी खरीदी कैशलेस होती, हिसाब घर की बात होती, क्योंकि दुकान का किराया, बिड़ी का पैसा काट कर आता। बिड़ी का हिसाब यहां कोई न रखता, दुकान पर ही रखा जाता। दुकानदार के हिसाब को खरा मान लेना सुविधाजनक होता। चूंकि प्री-पेड जैसी इस व्यवस्था के लिए पैसे नहीं देने होते थे, इसलिए बिड़ी का खर्च कम से कम फूफा को बिल्कुुल पता न लगता। महीना पूरा होते ही नगद किराए के साथ बिड़ी के हिसाब वाला पुरजा भी होता। फूफा इसे पूरी गंभीरता से थोड़ी देर देखते रहते। कोई नहीं समझ सकता था कि यह देखना बस दिखावे के लिए होता है। फूफा जीवन भर 'खाता न बही, फूफा कहय वही सही' वाले रहे, लेकिन बिड़ी के हिसाब पर उन्हें कभी ऐतराज नहीं हुआ। पुरजा, विशेष इंतजाम वाले उस तार फाइल में संभाल कर नत्थी हो जाता, जो दुकानदार से उन्हें कम्प्लिमेंट्री मिला था। 

छोटी बहू तेज-तर्राट, आमने सामने की परदेदारी थी, लिहाज था, लेकिन घर के भीतर मंझोत खंड़ में होने वाली बात फूफा के कान में पड़ती, खांसी और तबियत की चिंता के आड़ में बेवजह के इस खर्च पर। बस तभी श्मशान वैराग्य सा मन में हूक उठती कि बिड़ी छोड़ दूं, लेकिन बड़े-बुजुर्गों से सुनते आए थे, कोई तो इल्लत रहेगी ही, उन्हें इस कथन की व्याख्या अपने आप होती, समझ आती थी। फिर बिड़ी से और भी तो काम सधते थे। फूफा के काम का आदमी उनके पास आया या जिसे उन्होंने बुलवाया और बिड़ी पिलाया, चाहे बचने की कितनी भी कोशिश करे, फूफा जानते कि असर शर्तिया होगा, उनके मन में ‘बइठ पहुना बिड़ी पी ले, पहुना भगन लागे ना‘ करमा गीत गूंजने लगता। इस सबके बावजूद बात अटकी रहती, सोचते कि आखिर बिड़ी पीना शुरू ही क्यों किया। 

यह उनके स्कूल के दिनों की बात है, अल्पवयस्कों की, लेकिन अनुभव-संपन्न संगत से उनके बाल मन की जिज्ञासा में वयस्कों जैसी लालसा का सूत्रपात हो गया था। शाम को स्कूल से लौटते हुए बिड़ी प्रचार वाली गाड़ी के पास जुटी भीड़ में औरों के साथ उनके सहपाठी भी नाच देखने रुक जाते थे। बिड़ी वाली गाड़ी के खुले ट्रेलर पर नचकारिन होती थी, स्त्री वेश में कमसिन लड़का या 'जनानी' हाव-भाव वाला कोई मेहला। ‘पान खाय पंसारी के लइका, बिड़ी पिअय मिजाजी‘ जैसा कोई गीत, फूफा को लगता कि वे पंसारी के लड़के तो हैं नहीं, थोड़े मिजाजी जरूर हैं, इसलिए नचकारिन उन्हें ही लक्ष्य कर गीत गा रही है, तब उन्हें यह भी पता न होता था कि यह लड़की नहीं है, सो बात अधिक मारक हो जाती। अगली पंक्ति 'खेलकूद के मजा उड़ा ले, दू दिन के जिनगानी रे' पर मन मचल-मचल जाता। नाच-गाना खत्म होते बिड़ी का कट्टा उछाला जाता, कट्टा उछल-उछल कर कैच लेने की होड़ रहती। तब लपका हुआ बिड़ी का कट्टा ले कर घर लौटते और बड़ों को सौंप आशीर्वाद पाते। 

माचिस साथ रखने का चलन कम था, लेकिन कुछ शौकीन तब भी लाइटर वाले हुआ करते थे, चकमक पत्थर और रुई वाला, रुपहला। ऊपर का ढक्कन निकालकर छोटी सी गरारी को अंगूठे के दबाव सहित घुमाने पर चिंगारी उठती। ऐसा कई बार करना पड़ता, बीच-बीच में झटकना भी पड़ता, जैसे फाउन्टेन पेन की स्याही न उतर रही हो या थर्मामीटर का पारा उतारना हो। फूफा के पास नये तरीके का लाइटर था, ढक्कन को एक तरफ दबाने से वह अपनी जगह ही गरारी के साथ एक चौथाई घूमकर खुल जाता था। दूसरों को अपना लाइटर हाथ भी न लगाने देते, स्वयं भी इस्तेमाल कभी-कभार ही करते, लेकिन रुई को पेट्रोल, स्पिरिट भिगा तैयार रखते कि पहले चटके में ही लौ भभक उठे। रोजाना की बिड़ी घर-भीतर से सुलगाई जाती। घर में मुढ़र रंधैनी, मुख्य रसोई के अलावा और भी चूल्हे होते जिसमें खिचरा-पानी डबकता। गोरस के लिए कौड़ा होता और भूंजने, सेंकने, तापने के लिए गोरसी। कुछ न कुछ पकता-गरम होता रहता, न पक रहा हो तो भी आग रहती ही।

बिड़ी सिपचाने का काम नाती-पोते उम्र के बच्चों को दिया जाता, यह उनका बिना गुरु के प्रशिक्षण जैसा भी होता। बिड़ी को आग से छुला कर रखा जाता फिर हाथ को हिला कर उसे हवा देते, लगता कि बिड़ी सिपच गई। सिपचना, यानि ऐसी आग जो न सुलगना हो, न जलना। ऐसी आग, जिसमें धुआं लगातार हो, लेकिन लपट आखिर तक न उठे। दौड़ कर भी ले जाते, लेकिन बिड़ी बुझ जाती और डांट खा कर फिर वापस लौटना पड़ता। बुझती बिड़ी को जलाए रखने के लिए बिड़ी को आग की ओर मुंह में डालकर फूंकना होता मगर यह कारगर न होने पर मजबूरन जोर-जोर से कश खींचना होता है, बड़ों को ऐसा करते देखा समझदार बच्चा, वाजिब तौर-तरीका अपनाने लगता, उसे खांसी आती तो सियान, जिसने बिड़ी सिपचाने का दायित्व उसे सौंपा होता, समझ जाता कि बच्चा होशियार है, जल्दी तैयार हो गया, अपना कट्टा अब सहेज कर रखना होगा और बीड़ी सिपच गई है।अधिकतर के धूम्रपान कैरियर की शुरुआत इस संस्कार, परम्परा निर्वाह से होती। फूफा भी ऐसे ही संस्कारी थे। 

हमारी पीढ़ी ने रुपया पैसा का हिसाब समझने लायक होश संभाला तब आना का जमाना जाने लगा था, लेकिन पचीस पैसे को सभी चार आना, या प्यार से चरन्नी कहते थे। बीते जमाने में चीजों के भाव आना में होते। पांच पैसे के लिए जोड़ी एक पैसे की तलाश रहती कि आना पूरा हो जाय और दस पैसा पास हो तो दो आना बनाने के लिए दो पैसा। लेकिन अब पैसा का नया जमाना आ चुका था। एक पैसे में एक बिड़ी मिलती और पचीस पैसे में कट्टा आता था। अर्थशास्त्री फूफा का एक छोटा सा व्याख्यान था, सरकार ने आना-रुपया के बदले नया पैसा शुरु किया है और इसे एक बिड़ी की कीमत और पच्चीस पैसे वाली चरन्नी को कट्टे की कीमत के बराबर तय किया है। हम सोच में पड़ते कि अंगरेजों को भगाकर राज-काज अपने हाथ में ले कर काम करने वाली सरकार, चीन और पाकिस्तान से लड़ाई लड़ती है, वह तो लाल किला, इंडिया गेट वाली है, सुख-समृदिध की बातें करती है, तो भला क्योंकर बिड़ी के चक्कर में पड़ती होगी? लेकिन बाजार की हमारी अधिकतम जानकारी में यह अकेला आइटम था जो एक पैसा फी नग और पचीस पैसे का पचीस वाला एक पैक मिलता हो। अपने संदेहों के निवारण का कोई रास्ता न पा कर, हम फूफा से चाहे-अनचाहे सहमत होने लगते और ऐसा ज्ञान पाकर अपने को धन्य भी मानते। बिड़ी की कीमत बढ़ी तो हम बहुत दिन तक सोच में रहे कि फूफा का अर्थशास्त्र तो गलत हो नहीं सकता, शायद सरकार का इससे कोई लेना-देना न हो और है तो वह खुद अपने हिसाब में ऐसी गड़बड़ क्यों होने देगी, कहीं दुकानदार की बदमाशी तो नहीं।
 
कसैला-कड़ुआ धुआं फूकते फूफा को खांसी आने लगती और हमारी बाल-जिज्ञासा का सवाल होता, क्यों पीते हैं बिड़ी? जवाब होता ‘मिठाथे ग, गुरतुर, सक्कर ले ओ प्पार।‘ बाबू, हमलोगों के भी सहपाठी थे। तीन साल फेल हो कर हमारे साथ आए थे। वह सब कुछ, जो हम शायद चाहते तो थे, लेकिन करना दूर, सोच भी नहीं पाते थे, बाबू ऐसे सब फन में माहिर थे। बिड़ी पीते हुए बेखटके होंठ और जीभ से उलटकर बिड़ी को होंठ दबाए मुंह के अंदर ले लेना और फिर से वापस जलती निकाल कर पीने लगना, जैसा कमाल बाबू दिखाते। बिड़ी पी कर आंख और कान से धुआं निकालने वाले करतब जैसी उनकी बातों में आ कर, उनकी शागिर्दी में रहने का गौरव हासिल होता था। प्रशिक्षुओं का काम बिना बिड़ी के चल जाता, लेकिन बाबू का नहीं, उनका व्यथापूर्ण वक्तव्य होता- बिड़ी पीथंव त फूफा मारथे, नइ पीबे त पेट पिराथे, बड़ मरन आय। 

फूफा का ठुठी बिड़ी को कान के ऊपर टिकाए रखने का ढंग सिगरेट पीने वाले डॉक्टर सुपुत्र को नागवार होता, उसने शालीन रास्ता निकाला और सलाह दी कि बिड़ी को बुझा कर रखना और दुबारा-तिबारा सुलगा कर पीने से कैंसर होता है, फूफा को बात जंच गई। समझदार फूफा काबिल बेटों की ऐसी बात मान लेने में देर न लगाते थे। फूफा की कुछ अज्ञात स्रोत से बनी अपनी मान्यता और उनके प्रति विश्वास अटल रहा, जैसे- खांसी से कफ रूपी विकार शरीर से बाहर निकलता है। हर खांसी दमा नहीं होती। दमा का मरीज दीर्घायु होता है। रात को खांसी आने के कारण बिड़ी पीने वाला सजग रहता है, उसके घर चोरी नहीं होती और बिड़ी पीने वाले को सांप, कुत्ता या मच्छर नहीं काटता। आस-पास के विपरीत उदाहरणों को अपवाद की मान्यता देते हुए स्वयं को मानक उदाहरण स्वरूप प्रस्तु‍त करते थे। फूफा को गहन चिंतन के लिए ठस बिड़ी की जरूरत होती और जल्दी-जल्दी गहरे कश लेते कि बिड़ी बुझ न जाए। पारिवारिक विवाद के बीच उनकी सोच का विषय अक्सर अपनी सियानी की इज्जत न उघड़ने देना ही होता।

योग्य सुपुत्रों ने कोई खास काम उनके लिए छोड़ा न था। बेटियां संस्कारी थीं। ससुराल की कोई शिकवा खुद नहीं उचारती थीं। बेटियों-ननदों वाला घर बहुओं-भौजाइयों वाला हो गया था। बेटियों को मायके से जितनी शिकायतें थीं वह कुछ भौजाईयों से थी, तो कोई भौजी मन-मान रखने के नीयत वाली भी थी। बेटियां, जो अब कार वाली थीं, अपने आत्मसम्मान के लिए सजग रहतीं। रास्ते से गुजरते या गमी-खुशी होने पर कुछ घंटो के लिए आतीं। सबसे मिल जुलकर, नेग-रस्म में शामिल होकर, फोटुओं में भरपूर उपस्थिति दर्ज करा अपरिहार्य कारणों से जल्दी लौटना पड़ता। भौजाईयों के हाव-भाव पर नजर रखे, बहनों के सम्मान रक्षा-सजग भाई भी आतुर, सुझाते कि वापस लौटना है तो देर न करें, अंधेरा हो रहा है, रास्ता भी अच्छा नहीं। दो, ट्रेन वाली थीं। दोनों साथ आती-जातीं। ट्रेन रिजर्वेशन की मजबूरी, उनके मनोनुकूल अल्प प्रवास में मददगार होती। एक, अब विदेश में है। बतर्ज ‘आसमान से आया फरिश्ता...‘ कभी आती, तो वही एक थी जो दो-चार दिन ‘प्यार का सबक...‘ सिखलाने रुक जाती थी, चुनांचे उसके लौटने के बाद उसकी बातों का उद्धरण बहस गरम करने के ही काम आता। 

चिड़ियों की बोली समझना और शकुन विचार की वंशगत थाती पर बचपन में फूफा को आश्चर्य होता कि ऐसा कैसे हो सकता है। 'खुसरा चिरई के बियाह' गीत जरूर उन्हें पसंद आता और 'दास्ताने तोता-मैना' हाथ में लिए, पढ़ना शुरू भी न कर पाए, चटकाए जा चुके थे। चिड़ियां आपस में कुछ बोल-बतिया लेती होंगी, लेकिन उसे कोई मानुस कैसे समझ सकता है? घर में गौरैया, कौवे और मैना दिन भर होतीं। फूफा, अपने बाबा को इनकी चहचहाहट पर एकाग्र होते और आकाशवाणी करते देखते थे, लेकिन बाबा अपनी इस शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन और इस्तेमाल रोजाना नहीं करते थे। देखा-देखी, बाल-फूफा ने भी दिल्लगी की, उनकी बात भी फलित हो गई। सबने मान लिया कि पारिवारिक गुण फूफा में प्रकट होने लगे हैं। जवान होते फूफा ने साधा, वह था नर और मादा चिडि़यों की बोली को न सिर्फ अलग-अलग पहचान लेना, बल्कि उनके वार्तालाप में निहित गूढ़ार्थ का भेद शब्दशः पा लेना। फूफा को गुदगुदी होती।

फूफा के पिता जरूर इस सब को चोचला और फर्जीवाड़ा ठहराते, दबी जुबान से। अपने पिता के लिए कहते कि अगल-बगल की बात तो समझ नहीं आती इनको, सुनकर भक्खल हो जाते हैं, मानों बहरे, वाह रे चिड़ियों की बोली के ज्ञाता। बाबा के कान में बात पड़ती तो वे सोचते कि बेटा, बहू की बोली बोल रहा है, उन्हें अपने सम्मान को दूरदर्शितापूर्वक परिवार की प्रतिष्ठा के साथ जोड़ कर देखना पड़ता। इधर पिता अपने इकलौते पुत्र, फूफा को इस ज्ञान के चंगुल में मान, उनके भविष्य को ले कर चिंतित हो जाते। फूफा को विश्वास होने लगा कि वे पारिवारिक विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी हैं, चिड़ियों की ऐसी बातें भी समझने लगे हैं, जो शायद पहले कोई नहीं समझ पाता था। फूफा का अल्हड़पन था, उन्होंने इस गंभीर विद्या को खेल बना लिया और इसमें खोट आने लगी। एक दौर आया कि चिड़िया कुछ बताती, फूफा कुछ और समझते। 

सावधान हो उन्होंने फरमाइशी व्याख्या करना बंद कर दिया, लेकिन अपनी साधना जारी रखी। रोज सुबह दिन की पहली बिड़ी के साथ गरुड़वाहन विष्णु के बाद काकभुशुण्डि और शुकदेवजी महराज का स्मरण करते। उन्हें समझ में आने लगा था कि घर की चिड़िया और परेवा के गुंडरने से घर-परिवार की बातें पता लगती है, कारीसुई, कोइली और कर्रउंआ से अड़ोस-पड़ोस की। गांव भर की बातें उन्हें चेंपा और फुलचुक्की से पता चल जाती थी। ऐसी चिड़ियों की बोली जान लेना, जो दिखाई न दें, जिनकी सिर्फ आवाज सुनाई देती है, फूफा ने अपने अनुभव से विकसित कर लिया था, उन्हें दूर देश की बातों और आगत का पता इसी से चलता था। चौथेपन में फूफा के मन में जाने क्या समाया, उन्होंने सुआ पाल लिया। फूफा, सुआ से ‘राम-राम‘ कहते, पढ़ाते- बोल रे मिट्ठू तपत्कुरू। तोता रटंत सुआ टें-टें करता। कान खोलने के बावजूद पढ़ना नहीं सीखा, फिर भी उनकी जान सुआ में बसने लगी। शायद फूफा शकुन विचार के लिए सहज उपलब्ध सुआ और उसकी बोली समझने का अभ्यास करना चाहते, लेकिन वह एक सुर टें-टें की रट लगाए रहता या इससे अलग बस फूफा की खांसी की नकल उतारता। 

आजकल फूफा सोचते, क्या सुआ भी उनकी बातें समझ लेता होगा, वह भी बिड़ी पीना चाहता होगा, उसे बिड़ी पीना सिखाया जा सकता है? फूफा को सपना आया है कि खुद एक बड़े पिंजरे में बंद हैं, बोलना चाहते हैं लेकिन बोल नहीं फूट रहे हैं। पिंजरे से बाहर निकलने का प्रयास करते हैं, चकित हैं, वे सलाखों के आर-पार बेरोकटोक आ-जा रहे हैं। हाथ में न बिड़ी है, न कट्टा, पर अभ्यास ऐसा कि पिंजरे में बंद बैठे-बैठे बिड़ी-कट्टे का 'पेशेंस' खेल लेते हैं। अब बिड़ी की तलब उठ रही है, पिंजरे से निकलना चाहते हैं, इस बार ठंडी सलाखें रास्ता रोक लेती हैं। टटोलते हुए पिंजरे का दरवाजा मिल जाता है, मगर खुटका है कि सरक नहीं रहा, फूफा पसीने-पसीने। नींद खुल गई है फूफा के मन में आता है, किसी को पता न चले, सुआ के पिंजरे का दरवाजा खुला छोड़ दें। कहते हैं पालतू पशु-पक्षी, अनिष्ट अपने पर झेल लेते हैं। सुआ रात से ही सुस्त पड़ा हुआ है, कोई आहट नहीं, न खांसी न खंखार।

सुबह होती है, शाम होती है यूं ही... सुबह हुई। अकेलापन भी विकसित होने वाला मनोभाव है, यों तो एकाकी खालीपन सुहाता नहीं, पर मन है कि अब कभी अकेले भी बने रहना चाहता है। फूफा का अस्तित्ववादी आदिम मन भी अक्सर खुद के सामाजिक प्राणी होने को चुनौती देने लगा है। अब कल्पनाओं में रंग नहीं बचा, फीकी हो चुकी उम्मीदें और सपाट होती स्मृतियां। गुलदस्ता-कट्टा, इस कट्टे से सुबह की पहली बिड़ी, ठस। आज कोई आना-जाना न हो, तो दिन भी कट जाएगा इस कट्टे से, लेकिन कल... फिर सिर्फ बिड़ी फूंक कर तो दिन कटेगा नहीं, कट्टा जमाना-सजाना न हो तो बिड़ी बस धुआं-धुआं। दिन चढ़ रहा है, चहल-पहल होने लगी, दुकान खुल गई होगी। बिड़ी पुड़ा मंगाना है, कोई दिखता नहीं, दिखा तो सुनता नहीं, सुना तो किसी और काम में लगा है, भरा-पूरा परिवार, नौकर-चाकर, कमिया-खवास, दरोगा-खभारी लेकिन बिड़ी लाने को आज कोई नहीं, कोई खाली नहीं।

आवाज सुनकर सामने से गुजरता पड़ोसी आ गया, लौट कर खबर लाया कि आज दुकान बंद है। ऐसा तो कभी होता नहीं, तो क्या वह झूठ बोल रहा है। लेकिन वह झूठ क्यों बोलेगा। फिर दुकान सचमुच भी तो बंद हो सकती है। अपने मन को समझा लिया है कि कट्टा कल आ जाएगा, फिर भी आने-जाने वाले से पूछ ले रहे हैं, दुकान खुल गई? अगर दुकान कल भी न खुली तो, उन्हें अचानक ऐसा क्यों लगने लगा कि दुकान कल भी नहीं खुलेगी... मन में जलती-बुझती, कड़वी-मीठी, ठस-पोच्ची बिड़ी। दिन ढल रहा है। सोने का वक्त हो चला। कट्टा खत्म होने को है। दो ही बिड़ी बची है, आज कोई आया-गया नहीं, इसलिए बची हुई दोनों बिड़ी पोच्ची, पर इस दो के भरोसे कल का सबेरा हो जाएगा। मगर रात नींद खुल गई तब तो इन्हीं दो का सहारा होगा। फिर सबेरे क्या होगा, इसी सोच में नींद उड़ी हुई है, रात गहरा गई, आंखें खुली हैं..., एक थे फूफा।

Friday, January 19, 2018

कहानी - अनादि, अनंत ...

एक कहानी पढ़ी मैंने, छोटी सी। बात बस इतनी कि कहानी का नायक सरकारी मुलाजिम, जो वस्तुतः बस केन्द्रीय पात्र है, के शादी की पचीसवीं वर्षगांठ है। कार्यालय में इस पर बात होती है, लेकिन वह चाय-पानी में बिना शामिल घर लौट आता है, घर में भी अनायास माहौल पाता है, यहां शामिल न रह कर भी शामिल है, बस। कहानी में लगभग कोई घटना नहीं है। घटनाहीन भी कोई कहानी होती है? बहरहाल, इतनी सी बात संक्षेप में ही कही गई है। अब ऐसी मजेदार, या कहें त्रासद-हास्य या हास्यास्पद-त्रास, कहानी को पढ़कर, स्वाभाविक ही लगा कि इसे औरों से भी बांट लिया जाए।

मैंने यही कहानी कईयों को सुनाने की कोशिश की। इसे सुनने में वे रुचि लें इसलिए पढ़ना शुरु करने के पहले बताता कि यह जो कहानी आप सुनने वाले हैं, उसमें कैसे बमुश्किल चार लाइन की बात को लेखक कहता गया है, एक दिन और वह भी शाम पांच पच्चीस से रात दसेक बजे तक कुछ घंटों का अहवाल, इसी तरह सपाट सी कहानी को 15 पृष्ठों में और पाठक कैसे उसमें रमा रह जाता है कि बस सफे-सतर।

किस तरह एक बुजुर्ग नौकरीपेशा, शाम को अपने आफिस से घर लौटने को है। छुट्टी का समय होने की बात, आफिस की दीवार घड़ी से उनकी कलाई घड़ी पर आ जाती है, जिसके पुरानेपन की बात पर से यह पता चल जाता है कि यह आज के ही दिन उन्हें मिली थी, और यह कि आज उनकी शादी की पचीसवीं वर्षगांठ है, वे आफिस के साथियों की चाय-पानी की फरमाइश तो पूरी कर देते हैं, लेकिन खुद साथ देने नहीं रुकते, नियम-अनुशासन के पक्के। परम्परा के संवाहक। अपने वरिष्ठ को मन ही मन याद करते, प्रेरणा लेते, उनका अनुकरण कर अपनी जीवन नैया के हिचकोलों को कम करते, भवसागर पार करने वाले।

आफिस से निकल कर बिड़ला मंदिर में थिर कदम, भटकते मन और कान में गीता प्रवचन। घर का रास्ता अभी तय होने के बीच सब्जी मंडी है, लेकिन आठ बजने को हैं, बस अब घर। दरवाजे पर चौंकाने वाली सजावट, झालर और रोशनी। घर में भी माहौल है। पार्टी, रिश्तेदार, बच्चे, बच्चों के दोस्त। केक, कोल्ड ड्रिंक्स से ले कर व्हिस्की तक। समहाउ, इम्प्रापर बट एनीहाउ। उन्हें शामिल होना पड़ा है, अनमने। सब लौट जाते हैं। बच्चों की जिद, पाजामा-कुर्ता पर गिफ्ट में आया गाउन पहनाया जाता है, बस। जिस जिंदगी में ऑफिस और घर ही हो, उसमें मंदिर और सब्जी मंडी से अधिक की गुंजाइश भी कहां।

लेकिन अपनी इस पसंदीदा कहानी को पढ़ कर सुनाने की बात कुछ बन नहीं पाई। तो आजमाने की सोची, और कोई न मिले तो घर-परिवार की साहित्यिक रुचि में अभिवृद्धि का फर्ज पूरा करना क्या बुरा। हाथ में पुस्तक और घरु श्रोता। थोड़ी भूमिका और कहानी शुरु। दो पेज, तीन पेज, चार, पांच..., अटकते-बढ़ते बात यहां तक आ गई कि... हामी के साथ वाहवाहियों की टिप्पणी आती रही, लेकिन साथ ही अब बारी-बारी से किसी को कोई बात, कोई काम याद आने लगा, बुलावा होने लगा। श्रोता, कोरम में अधूरे रह जाने से बुकमार्क लग गया, जो लगा रहा।

इस बीच बराबर अवसर की तलाश रही, लेकिन बात न बननी थी, तो नहीं बनी। तो कोरम की परवाह बगैर मैंने किताब हाथ में लेकर, बुकमार्क खिसकाते, बात का सिरा पकड़ा, जो कहानी उस दिन अधूरी रह गई, अब आगे बढ़ते हैं। सवाल आया, उस दिन वाली कहानी? वह कहानी तो उसी दिन पूरी हो गई थी। श्रोताओं के लिए पूरी हो गई इस अधूरी कहानी को साबित न कर सका कि कहानी पूरी क्या, तब तो आधी भी नहीं हुई थी।

सोने से पहले मन में सवाल अटक गया कि क्या कहानी मुझे पसंद है, औरों को नहीं, लोग सुनना नहीं चाहते या मेरी ओर से कहानी की बात ही बेसमय होती रही। लोगों ने जितना सुना, वह कहानी सुनने में लगे समय की सीमा थी या मेरे लिहाज की। विकल मन से रात गुजरी, ब्रह्म मुहूर्त में बात बनी कि कहानी घटनाहीन हो तो वह न कभी अधूरी होती है, न कभी पूरी या कहें वह हमेशा पूरी होती है और अधूरी भी। उर्फ ये जो है जिंदगी। अब कोई सुनने वाला नहीं और न ही सुना कर पूरा करने की चाह। फिर भी कहानी की कहानी, आधी-अधूरी, जैसे बन पड़े, सुनाना न हो सके तो यहां लिख कर ही सही।

हां! मनोहर श्याम जोशी की इस कहानी का शीर्षक है, ‘सिल्वर वेडिंग‘। और कहानी के नायक हैं सेक्शन ऑफिसर वाई.डी. (यशोधर) पंत। इन यशोधर बाबू को कहानी के आखिर में पाजामा-कुर्ता पर गिफ्ट में आया गाउन पहनाया गया है, सोचता हूं कि मैं उन्हें कभी विनोद कुमार शुक्ल वाले ‘नौकर- सत्तू बाबू की कमीज‘ पहना कर देखूं, कितनी फिट आती है। 

मर्म की बात, कहानी हो घटनारहित, बस हिलोरे लेते, परतदार, न कहीं शुरू न कहीं खत्म। तो कहानी का एप्रीसिएशन भी क्यों न हो इसी जैसा, तरंगों की तरह। केन्द्र के चारों ओर का वृत्त, उससे बड़ा, फिर बड़ा, और बड़ा, वृहत्तर कि केन्द्र से मुक्त हो कर दूसरी तरंगों में घुल-मिल जाए। अनादि, अनंत ...