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Saturday, October 1, 2016

हीरालाल


डेढ़ सौ साल पहले पैदा हुए व्यक्ति को क्योंकर याद करना जरूरी हो जाता है, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह पितरों में है, फिर भी पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ। 150 वीं जयंती के अवसर पर मुड़वारा-कटनी वाले रायबहादुर डा. हीरालाल की जन्मतिथि 1 अक्टूबर 1867 तक लौटते हुए देखा जा सकता है कि वे किस तरह इतिहास, पुरातत्व, जाति-जनजातियों से जुड़े, इस माध्यम से पूरे समाज की परम्परा, संस्कृति और उसकी भाषा-बोलियों में सराबोर हो कर अस्मिता, आत्म-गौरव की अभिव्यक्ति का नित-नूतन रस-संसार रचा। 67 वर्ष के जीवन सफर में इतिहास-परम्परा के न जाने कितने अनजाने-अनचीन्हे रास्तों को नाप लिया, शिक्षक से डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) बनते तक अपने समकालीन परिवेश और समाज के दैनंदिन कल्याण के समानांतर, भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हुए। अब यह मौका है देखने का, कि उनके इंगित राह पर उनकी स्मृतियों को उंगली पकड़े हम कहां पहुंच पाए हैं।

रामकथा और मानस, भारतीय समाज में धर्म-अध्यात्म का सर्वप्रिय साधन है साथ ही साहित्य और ज्ञान-प्रकाश का स्तंभ बन कर कथावाचकों-टीकाकारों के माध्यम से 'सुराज', स्वाधीन और पराधीन के व्यापक अर्थ भी रचता है। महोबा के पास सूपा गांव की एक कलवार बिरादरी व्यापार के लिए बिलहरी आ बसी। इनमें एक, नारायणदास रामायणी हो कर पाठक कहलाए, मुड़वारा-कटनी आ बसे। इनके वंश क्रम में आगे मनबोधराम, ईश्वरदास और फिर हीरालाल हुए। शिवरीनारायण में तहसीलदार रहे 'श्यामा-स्वप्न' के रचयिता ठाकुर जगमोहन सिंह मुड़वारा मिडिल स्कूल में आए और तब तीसरी कक्षा के विद्यार्थी हीरालाल की प्रतिभा को पहचान कर बालक को संस्कृत पढ़ाने की बात शिक्षक से कही और चले गए। विद्या-व्यसनी बालक हीरालाल ने संस्कृत पढ़ने की जिद ठान ली, शिक्षक ने किसी तरह अपना पिंड छुड़ाया, लेकिन बालक हीरालाल के मन में पड़ा यह बीज आगे चलकर वट-वृक्ष बना।

शासकीय सेवा में विभिन्न दायित्वों के निर्वाह में उनकी विशेष योग्यता के अनुरूप कार्यों में संलग्न किया गया। उन्होंने शिक्षा और अकाल संबंधी काम तो किया ही, भाषा सर्वेक्षण, जाति-जनजाति अध्ययन, जनगणना और गजेटियर के लिए तैयारी करते हुए उन्होंने भाषा-साहित्य, प्राचीन इतिहास और परम्पराओं पर अतुलनीय कार्य किया। एक पुराने ताम्रपत्र के अपरिचित अक्षरों में खुदी लिपि को स्वयं के प्रयास से पहले-पहल समझ कर उसका संपादन किया, जो प्राचीन अभिलेखों की सबसे प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'एपिग्राफिया इंडिका' में प्रकाशित हुआ। फिर तो यह सिलसिला बन गया और वे इस शोध-पत्रिका के विशिष्ट व्यक्ति बन गए, इस क्रम में उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित मध्यप्रान्त और बरार के तब तक ज्ञात सभी प्राचीन अभिलेखों की सूची तैयार कर प्रकाशित कराया।

मैदानी छत्तीसगढ़ में नांगा बइगा-बइगिन के अलावा विभिन्न बइगा ग्राम देवता यथा- सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजउ, ठंडा, लतेल आदि हैं, इन्हीं में एक सुखेन भी हैं, जिनकी पूजा-स्थापना, अब कौशिल्या माता मंदिर के लिए प्रसिद्ध ग्राम चंदखुरी में है, इस जानकारी को सुषेण वैद्य से रोचक ढंग से जोड़कर आपने शोध लेख लिखा। इसी तरह लोकनायक नायिकाओं सुसकी, मुरहा, न्यौता नाइन, गंगा ग्वालिन, राजिम तेलिन, किरवई की धोबनिन, धुरकोट की लोहारिन और बहादुर कलारिन की तरह बिलासा केंवटिन के बारे में जाना तो देवार गीत- 'छितकी कुरिया मुकुत दुआर, भितरी केंवटिन कसे सिंगार। खोपा पारे रिंगी चिंगी, ओकर भीतर सोन के सिंगी।...' का अभिलेखन कर अंगरेजी अनुवाद करते हुए शोध लेख लिखा। 19वीं सदी के पहले दशक में प्राचीन अभिलेखों संबंधी उनके शोध लेखों से छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर का प्राचीन गौरव उजागर हुआ।

हिन्दी गजेटियर की पहल के साथ हिन्दी-सेवा का मानों मौन संकल्प आपने दुहराया। इस काम में औरों को भी जोड़ते हुए बिलासपुर जिला के सन 1910 के गजेटियर का संक्षिप्त हिन्दी स्वरूप 'बिलासपुर वैभव' के लिए प्यारेलाल गुप्त को प्रेरित किया। इसी क्रम में गोकुल प्रसाद, धानूलाल श्रीवास्तव, रघुवीर प्रसाद जैसे नाम भी जुड़े। जबलपुर से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'हितकारिणी' के लिए 1915-16 में ग्रामनामों पर आपके लिखे लेख 1917 में 'मध्यप्रदेशीय भौगोलिक नामार्थ-परिचय' प्रकाशित पुस्तक, स्थान नामों की पहली हिन्दी पुस्तक है, जिसमें छत्तीसगढ़ के स्थान नामों पर रोचक और सुबोध चर्चा है। वह 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी' के अध्यक्ष रहे। ''मध्यप्रान्त में संस्कृत एवं प्राकृत पाण्डुलिपियों की विवरणात्मक ग्रंथ-सूची'' संकलित की जिससे 8,000 से अधिक पाण्डुलिपियां प्रकाश में आईं। साथ ही नागपुर विश्वविद्यालय में 'हिन्दी-साहित्य परिषद' का गठन तथा स्नातकोत्तर तक के पाठ्यक्रम में हिन्दी को मान्यता दिलाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ ने आपके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुआ रचा- 'हीरा मध्यप्रदेश के, भारत के प्रिय लाल, कीर्ति तुम्हारी अमर है, पंडित हीरालाल।' और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘सरस्वती‘ के लिए लिखा- 'अयी अतीत तेरे ढेले भी, दुर्लभ रत्न तुल्य चिरकाल, पर तेरा तत्वज्ञ स्वयं ही, एक रत्न था हीरालाल।'

आपकी स्मृति में 31.12.1987 को डाक टिकट जारी हुआ है।

Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी का तुक


समय-समय पर और खासकर हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के साथ तुक मिला कर बिन्दी-चिन्दी जैसे शीर्षकों वाले लेख छपते हैं, इनमें भाषा-साहित्य की बखिया भी उधेड़ी जाती रहती है। आज रायपुर के अखबारों में एक शीर्षक है 'बाजार के जरिये विश्व भाषा बन रही है हिंदी'। हिन्दी दिवस पर 'अविरल व्यक्तित्व के धनी क्रान्तदृष्टा साहित्यकार-पत्रकार श्री रावलमल जैन 'मणि' की 108वीं कृति के प्रकाशन अवसर पर दो पेज में फैला 'विशेष' भी है। और विनोद कुमार शुक्ल से बातचीत छपी है, जिसका शीर्षक है- 'हिन्दी जनता की भाषा है' - 'और जनता से बड़ा ग्राहक कौन होगा?' इसी तारतम्य में दो बातें याद आ रही है, सैकड़ों हिन्दीे पुस्तकों के लेखक-बेस्ट सेलर सुरेन्द्र मोहन पाठक, जिनके एक उपन्यास की लगभग ढाई करोड़ प्रतियां बिकने की चर्चा दुनिया भर में हुई थी, पिछले माह एक कार्यक्रम में रायपुर आए थे और इसके साथ बेतुकी सी लग सकने वाली बात कि-

विनोद जी के चर्चित उपन्या‍स 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्त‍कें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल‍ चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्यी पर खरीदे जाने की व्यवस्था कर सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है।

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं, पुनर्प्रकाशित हो रहे हैं। सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और कथित लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

Monday, August 22, 2016

त्रयी


रहस्य को भेदने का अपना आकर्षण होता है और रोमांच भी, इसलिए खतरों, चुनौतियों, आशंकाओं के बावजूद व्‍यक्ति अनदेखे, अनजाने, अंधेरे, उबड़-खाबड़ रास्तों को चुन लेता है, कुछ नया, अलग, खास, ‘बस अपना’ पा लेने के लिए, भले यह सफर 'तीर्थ नहीं है केवल यात्रा' साबित हो।

इतिहास में कालक्रम और वंशानुक्रम की सीढ़ी पर घटित जय-पराजय, निर्माण-विनाश और मलिन-उज्ज्वल कहानियों को महसूस कर सकें तो यही अनगढ़ कविता भी है। यह कविता पढ़ लिये जाने पर काल और पात्र के भेद को मिटाती, इतिहास का शुष्क विवरण न रह कर मानव-मन का दस्तावेज बन जाती है। प्राचीन इतिहास की टोही सुस्मिता, शोध-अध्येता के रूप में काल की परतों में दबे इतिहास में झांकते हुए भूत के अंधे-गहरे कुएं में थाह लगाने के पहले से उतरने को उद्यत रहती हैं और वह भी बिना कमंद के।

मानव-मन, जीवन-निर्वाह करते तर्क और खोया-पाया में ऐसा मशगूल होता है कि अपने अगल-बगल बहती जीवन धारा से किनाराकशी कर लेता है। इस धारा को स्पर्श करने या देखने का भी साहस वह नहीं जुटा पाता, इसमें उतर जाने की कौन कहे। ऐसा करना अनावश्यक, कभी बोझिल और कई बार खतरनाक जान पड़ता है, लेकिन व्यक्ति का कवि-मन बार-बार इस ओर आकृष्ट होता है। सुस्मिता की कविताएं, साहित्यिकता के दबाव से मुक्त, किसी कवि नहीं बल्कि एक ऐसे आम व्यक्ति की अन्तर्यात्रा और महसूसियत की लेखी है, जिसने इस धारा को भी समानान्तर अपना रखा है।

एक तरह का संकट यह भी है कि साहित्य की भाषा अधिक से अधिक टकसाली होने लगे और मनोभाव रेडीमेड-ब्रांडेड, जब कविताएं शब्दकोश और तुकांतकोश के घालमेल का परिणाम दिखें, ऐसे दौर में सुस्मिता की कविताओं का साहित्यिक मूल्यांकन सिद्धहस्त समीक्षक करेंगे, हो सकता है ये कविताएं 'अकवि की गैर-साहित्यिक सी रचनाएं' ठहराई जाएं लेकिन इसमें दो मत नहीं कि 'कविता में गढ़ने का उद्यम जितना कम हो और सृजन की सहज निःसृति जितनी स्वाभाविक, कविता उतनी ही ईमानदार होती है', जो इन कविताओं में है, इसलिए पाठक के लिए इनमें अपनेपन के साथ ताजगी तो है ही, गहरी उम्मीदें भी।

'एक टुकड़ा आसमां' शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां इस तरह हैं-
छत से सूखे हुए कपड़े उतार लाते हुए
एक टुकड़ा आसमां भी तोड़ लाये हम ... ... ...
सितारे थककर एक दिन
जुगनू बनकर उड़ गए

'जामदानी' शीषर्क कविता की कुछ पंक्तियां-
घरों में उनके रोटियों के लाले हैं
हाथों में उनके सिर्फ छाले हैं
पहनने वालों को कभी न समझ आएगा
इन फूल पत्तों में छिपे कितने निवाले हैं

आज बुन रहा है वो जामदानी
दो महीने बुनने पर होगी आमदनी... ... ...
आँखों की रौशनी से नींद में उसने
मांगा सिर्फ एक वादा है
और कुछ दिन रोक ले मोतियाबिंद को
बेटे ने अब शहर का रुख साधा है

और 'हिसाब के कच्चे हैं हम (२)' शीर्षक कविता की पंक्ति है-
चाँद जोड़ा आज हमने, सूरज घटाकर
तेरे इंतज़ार में

एक कविता है- 'मन बावरा', जो पढ़ने से अधिक सुनने की है, (नाम पर ऑडियो-विजुअल लिंक है.)

सुरुचिपूर्ण छपाई वाली पुस्तक "TRIANGULAM", ISBN 978-93-5098-112-2 सुस्मिता बसु मजुमदार, राजीव चक्रवर्ती और सुष्मिता गुप्ता की क्रमशः हिन्दी, बांग्ला और अंगरेजी कविताओं का संग्रह है, उक्त टिप्पणी हिन्दी कविताओं के लिए है। इस पुस्तक में मेरे नाम का भी आभार-उल्लेेख है।