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Sunday, October 18, 2020

टट्टी-1918

किस्सागोई के लिए हमारी प्रसिद्धि यों ही नहीं है। हुआ कुछ यूं कि विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब ‘सिटी ऑफ जिन्नस्‘ किताब के लिए महाभारत की ऐतिहासिकता के बारे में जानना चाहा और इसके लिए इंद्रप्रस्थ-हस्तिनापुर के उत्खननकर्ता पुराविद प्रो. बी.बी. लाल से मिलने का प्रयास किया। संयोगवश प्रो. लाल पुराना किला, दिल्ली के विश्राम गृह में रुके थे लेकिन उत्खनन प्रतिवेदन पूरा करने में व्यस्त थे, इसलिए समय न दे सके। फिर एक दोपहर फोन आया कि डेलरिम्पल, तुरंत पुराना किला पहुंच सकें तो प्रो. लाल कुछ मिनट का समय दे सकते हैं।

डेलरिम्पल, प्रो. लाल के सामने पहुंच कर समय-सीमा के कारण सीधे सवाल करते हैं- आपके विचार से महाभारत कितना ऐतिहासिक है? इसका सीधा जवाब देने के बजाय प्रो. लाल ने किस्से से बात शुरू की। यों कि, चालीसेक साल पहले 1955 में कलकत्ता से दिल्ली सफर कर रहा था। कुंभ मेला के दिन थे, इलाहाबाद स्टेशन पर अफरा-तफरी मची थी, पुलिस तैनात। पता लगा कि नागा साधु का हाथी बिगड़ गया, भगदड़ मच गई। सैकड़ों लोग कुचल कर मर गए। कई साल बाद इलाहाबाद के पास उत्खनन कराते हुए कैम्प की सांगीतिक संध्या में एक श्रमिक ने गाथा सुनाई, जिसमें 1955 वाली उस घटना का भी समावेश था, मिर्च-मसाला, अतिरंजना सहित। इस गाथा के दो अन्य स्वरूप प्रचलित मिले, किंतु मूल कथ्य में भगदड़ वाली घटना थी। इस तरह कुंभ मेला की कहानी चालीस साल में इतने रूप धर सकती है फिर महाभारत तो मोटे तौर पर घटना के 1300 साल बाद वर्तमान स्वरूप में आया है। यानि कुंभ मेला की घटना-गाथा की तरह महाभारत भी, ऐतिहासिक घटना का मसालेदार किस्सा है।

डेलरिम्पल-लाल संवाद में आया किस्सा, भूमिका है, यहां आगे आने वाले किस्से के लिए। लेकिन उस किस्से के पहले कुछ और बातें। खस की टट्टी, सुन कर लगता कि पानी डालने पर कैसी ठंडी-भीनी सुगंध आती है पर नाम टट्टी? तो याद किया कि टाट, टट्टा या टटरा जैसे शब्द भी प्रचलित हैं, जिनका आशय परदा, ओट है। बांस की खपच्चियों या अरहर के सूखे पौधों से बनी, कामचलाऊ दीवार, आड़ की तरह खड़ा कर दिया जाय या पटसन से बना मोटे कपड़े का बिछावन या डोरी से बुनी बिछाने वाली चटाई, परदे के लिए ऐसे मिलते-जुलते शब्द प्रयोग में आते हैं। तो फिर यह यानि टट्टी क्योंकर पाखाना का पर्याय हो गया। यह भी पता लगता है कि इस शब्द का एक पर्याय पाखाना/मल-त्याग, भाषा-बोली का अंतर लांघते पूरे देश में एक ही है।

अब किस्सा। हमारे एक परिचित ने बताया कि कभी रेल यात्रा में इलाहाबाद से गुजरते हुए उनकी जानकारी में अनूठा इजाफा हुआ था। इतिहास अपने को दुहरा रहा था, लेकिन इस बार कोई अफरा-तफरी नहीं थी। गाड़ी, किनारे वाले प्लेटफार्म पर खड़ी हुई और इस तरह रुकी रह गई थी, मानों यही उसका ठिकाना हो। सब कुछ ठहरा-ठहरा सा था। सहयात्री, हुलिये में ऐसा कुछ कि अपनी अधेड़ उम्र से बहुत आगे निकल चुके जान पड़ते थे, समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, की तरह शुरू हुए, बताने लगे- पुराने जमाने में कुंभ के दौरान देश भर से जुटने वाले विशाल जन समुदाय के अनुरूप व्यवस्थाएं नहीं होती थीं, फिर भी भगवान भरोसे सब निपट ही जाता था। सन 1906 में हैजा का प्रकोप हुआ। बतकही कि हैजा के लिए कहा जाता था ‘है-जा‘, यानि जिसे यह रोग हुआ है, उसे तो बस जाना है, इसके लिए छत्तीसगढ़ी शब्द है, तलाव-उछाल यानि टट्टी-उल्टी।

इसके बाद 1918 में अंगरेज सरकार ने मेले की सारी व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। सरकार ने पुरानी जानकारियों के आधार पर पाया कि मेले में सफाई-व्यवस्था का आलम बहुत बुरा होता है। खासकर मल-त्याग की कोई व्यवस्था न होने के कारण गंदगी और बीमारियां फैलती हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बड़ी संख्या में अस्थायी शौचालयों की व्यवस्था कराई। इसके लिए चार बांस गाड़ कर उसे टट्टी से घेर कर, परदा कर दिया जाता था और उसकी नियमित साफ-सफाई होती रहे, इसका ध्यान रखा जाता था। तो होता यह था कि व्यक्ति मल-त्याग के लिए कहता कि वह टट्टी में जा रहा है, या टट्टी जा रहा है। कुंभ मेले में पूरे देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। बस फिर क्या था, इस तरह कुंभ-1918 के बाद से टट्टी, इस अर्थ में एक साथ पूरे देश की जबान पर आ गया। इसी के साथ एक अन्य शब्द भी जुड़ा, लेकिन उसने अलग अर्थ पा लिया, वह शब्द था- ‘बमपुलिस या बंपुलिस‘ (बैम्बू पोल्स) यानि बांस के बड़े डंडे से बना सार्वजनिक शौचालय। यह सफाई कामगार, जिसके हाथ में बांस के डंडे वाला झाड़ू होता है, के अर्थ में भी प्रयोग होने लगा। बैठै-ठाले विचार के लिए, दूर की कौड़ी सही, लेकिन ‘ब्रह्मपुरीष‘ भी बमपुलिस के पास बैठता है, ब्रह्म-मुहूर्त या प्रातःकाल मल-विसर्जन।

यों तो किस्से को भी मौलिक कहना मुश्किल है फिर गूगल, विकीपीडिया के दौर में कुछ 'मौलिक' जानकारी वाली बात कहने की सोचना उसी के लिए संभव है, जो इन सबसे मुक्त है। इसलिए अब कोई सुना-गुना किस्सा भी मन में उपजे और अपनी जबान में कहना हो तो, कुछ कहने के पहले गूगल टटोल लेना होता है, कि काश! वहां न हो, तब मंगलाचरण किया जाए। जिज्ञासा हुई कि क्या ऐसा कुछ गूगल बता पा रहा है। वहां ऐसा कुछ न मिला, इसलिए किसी से किसी का सुनाया-सुना यह किस्सा। मगर फिर तलाशने लगा कि क्या 1918 के पहले टट्टी इस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता था। इसके लिए पुराने शब्दकोश देखने पर पता लगा कि-

सन 1884 में प्रकाशित जान टी प्लेट्स की डिक्शनरी में टट्टी के अन्य अर्थों के अलावा एक अर्थ, लैट्रिन, सामान्यतः बांस खपच्ची की चटाई से आड़ कर बनाया हो, दिया गया है। सन 1895 में बनारस से ई.जे. लजारस एंड कंपनी द्वारा प्रकाशित 'स्टूडेन्ट्स हिंदी-इंग्लिश डिक्शनरी' में टट्टी का अर्थ स्क्रीन, नेसेसरी, दिया है, वहां पाखाना या इसका समानार्थी कोई शब्द नहीं है। नागरीप्रचारिणी सभा के सन 1929 में प्रकाशित हिंदी शब्दसागर के परिवर्धित, संशोधित, सन 1995 के नवीन संस्करण में टट्टी का अर्थ 1. बांस की फट्टियों, सरकंडों आदि को परस्पर जोड़कर बनाया हुआ ढांचा... के पश्चात् टट्टी शब्द वाले मुहावरे दिए गए हैं। इस सब के बाद बहुत दूर जा कर, देर से अर्थ आते हैं- 2. चिक। चिलमन। 3. पतली दीवार जो परदे के लिये खड़ी की जाती है। के बाद 4. पाखाना तथा 5 व 6 भी तख्ता, फट्टी, छाजन आदि से संबंधित है। नागरीप्रचारिणी सभा के संवत 2008 में प्रकाशित संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर में भी इसी तरह विभिन्न अर्थों के साथ एक अर्थ पाखाना भी आया है।

सन 1950 में प्रकाशित डेढ़ लाख शब्द संख्या वाले ‘नालन्दा विशाल शब्द सागर‘ में टट्टी का पर्याय बांस की फट्टियों का पल्ला, परदा, चिक, छाजन, आड़ जैसे समानार्थी शब्दों के बीच, (मानों ओट लिए हुए) एक अर्थ पाखाना भी है। इसी तरह इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग से सन 1952 में प्रकाशित हिन्दी राष्ट्रभाषा कोश में चिक, चिलमन आदि समानार्थी के साथ बीच में (यहां भी मानों आड़ में) पाखाना आया है। ज्ञानमण्डल लिमिटेड, बनारस के 1952-53 में प्रकाशित ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में टट्टी का अर्थ इस प्रकार दिया गया है- छोटा टट्टर या पल्ला; पतला शीशा; ओट, परदा; पल्लेकी दीवार; अंगूर चढ़ानेके काम आनेवाली बांसकी फट्टियोंकी दीवार; शिकार खेलनेकी आड़; पाखाना; बारातमें निकाली जानेवाली फुलवारीका तख्ता।

कुछ अन्य स्थानों पर, यथा- 2009 में प्रकाशित प्रो. वी.रा. जगन्नाथन के जनेपा ‘छात्रकोश‘ में टट्टी जाना का अर्थ टट्टी की आड़ में मलत्याग करना दिया है, साथ ही नोट है कि- ‘अब टट्टी जाना ग्राम्य/अशिष्ट प्रयोग है, पाख़ाना ज्यादा शिष्ट प्रयोग है। 2010 में प्रकाशित प्रभात ‘बृहत् हिन्दी शब्दकोश‘ में पर्दा या बाड़ अर्थ वाले इस शब्द का प्राकृत मूल टट्टइआ, तट्टी या संस्कृत तटिका दिया गया है और अन्य अर्थों के साथ ‘शौच करने के लिए लगाया गया पर्दा (या की गई आड़) अथवा दीवारों से घिरा शौच-स्थान। शौचालय।‘ बताया गया है। 2011 में प्रकाशित ‘हिंदी पर्यायवाची कोश‘ में अन्य अर्थों के साथ गुह, गूँ, गू, गोबर, छी-छी (बच्चों के लिए), पाखाना, पुरीष, मल; ट्वाॅयलेट, जनसुविधा, पाखाना, बाथरूम, शौचालय, संडास अर्थ दिया गया है।

इससे कुछ और पीछे जाने पर संदर्भ मिला कि वैष्णव कृष्ण भक्ति के 16 वीं सदी के द्वैताद्वैतवादी संत स्वामी हरिदास थे, जिन्हें बैजू बावरा और तानसेन का गुरू माना जाता है। उनके द्वारा टट्टी संप्रदाय स्थापित किया गया था, यह संभवतः संतों-भक्तों द्वारा मोटा-झोंटा टाट वस्त्र धारण करने के कारण लोगों का दिया हुआ नाम था और समय के साथ टट्टी शब्द का ‘पाखाना‘ अर्थ प्रचलन में आ जाने के कारण इस संप्रदाय का नाम ‘सखी संप्रदाय‘ हो गया होगा।

इस तरह अनुमान होता है कि टट्टी शब्द का एक अर्थ प्रयाग कुंभ 1918 के पहले भी यदा-कदा ‘पाखाना‘ होता रहा है किंतु व्यापक प्रचलन में संभवतः किस्सागो मित्र की स्थापना के अनुरूप उसके बाद ही आया। यह भी स्पष्ट हुआ कि टट्टी ने पाखाना अर्थ ओट में जाने, किए जाने के कारण पाया। फिर भी यह नहीं पता लग सका कि इस अर्थ में पहली बार कहां और किस तरह, किसने प्रयोग किया। हां, 1988 में प्रकाशित भोलानाथ तिवारी और रिसाल सिंह द्वारा 11वीं से 16वीं सदी तक के आधार-साहित्य वाले ‘आदिकालीन हिन्दी शब्दकोश‘ में यह शब्द नहीं है।

इस किस्से की तरह यह शब्द और क्रिया ‘दस्त, पेश-आब‘ और 'चने के खेत में...' जैसी शायरी करने वाले 19वीं सदी के लखनवी शायर शेख बाकर अली ‘चिरकिन‘ का सहारा बना था। बहरहाल, इस्तेमाल के साथ शब्द, शायद इसी तरह नये-पुराने अर्थ ग्रहण करते रहते हैंं, प्रचलन में आते-जाते रहते हैं। जैसे यह शब्द टट्टी, जिसके लिए नंबर दो, मल-त्याग, दिशा-मैदान, तालाब, संडास, बाहर, हाजत-फरागत, जो अब लैट्रिन, पाखाना, बाथरूम, टायलेट होते हुए पाॅटी तक आ गई है, कारण साफ है कि अन्य अनेकों शब्दों की तरह, विशेषकर इस तरह की संज्ञा-क्रिया, नेचरकाॅल, नित्य-कर्म के लिए सभ्य जबान नये-नये शब्दों और शब्दों के अलग आशय-अभिप्राय विकसित-ग्रहण करती रहती है।

पुनश्च-
जानदार तो वही किस्सा, जो फले-फूले और जिसकी जड़ भी निकल आए। तो जिस तरह हाथी भगदड़ घटना के कई कथा-रूप बने, इस किस्से में एक और हिस्सा जोड़ा, हमलोगों के गंवई गूगल बबा, रिश्ते में मेरे पितामह, अकलतरावासी रवीन्द्र सिसौदिया यानि रवि बबा ने। वह इस तरह। बात उन्नीस सौ बासठ-पैंसठ की है। एक थे पंडित माधव प्रसाद चतुर्वेदी। किस्सा नहीं हकीकत। रायपुर के पुराने से पुराने कालेज, छत्तीसगढ़ महाविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया। दर्शन शास्त्र और अंगरेजी के जैसे तेज विद्यार्थी, इन परचों में वैसे ही बहुत अच्छे अंक भी आए। प्राचार्य जे. योगानंदम का आशीर्वाद मिला और आगे की पढ़ाई के लिए सागर जाने का परवाना, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के लिए। चतुर्वेदी जी अंगरेजी छोड़ हिंदी शरणागत हुए। चतुर्वेदी जी, सर से भैयाजी फिर अंतिम दिनों में बाबाजी बने, अविवाहित रहे, उनका उत्तरार्द्ध खरौद-शिवरीनारायण में बीता। भैयाजी द्वारा सिसौदिया जी को सुनाया किस्सा, जो सिसौदिया जी से मैंने सुना, वह कुछ ऐसा ही था, जिसे भैयाजी ने आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और रामविलास शर्मा की बातचीत में सुना था।

इस तरह किस्से पर अब कइयों, बड़े-बड़ों की मुहर भी लग गई। रवि बबा ने यह भी बताया कि ब्रह्मपुरीष, दूर की कौड़ी नहीं, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसका प्रयोग किया है, कब, कहा?, इसका जवाब फिर कभी, फिर कहीं।

फिर हाजिर- 
1977-78 में प्रकाशित, ‘नाच्यौ बहुत गोपाल‘ अमृतलाल नागर का प्रसिद्ध उपन्यास है। पुस्तक के आरंभ में नागर बताते हैं कि झाड़ा, पोखरा, बहरी अलंग आदि प्रचलित शब्द हमारी प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति की जगहों का इशारा करते हैं। और सार्वजनिक शौचालय के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्द के रूप में ‘बम्पुलिस‘ का उल्लेख है। आगे हजारी प्रसाद द्विवेदी का संदर्भ है कि बम्पुलिस का शुद्ध रूप ‘ब्रह्म पुरीष‘ है, यज्ञकर्ता ब्राह्मणों के सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए जाने वाले शौचालय। लेकिन नागर संदेह करते हैं कि ब्रह्म, बरम बनता है न कि बम। फिर वे रामविलास शर्मा से पतासाजी करते हैं, तब शर्मा कुंभ मेले में ‘बैम्बू पोल्स‘, शौचालय और टट्टी का खुलासा करते हैं।

अपनराम ब्रह्म को आजमाएं तो, ब्रह्म में ह का अ होते हुए लोप होना सहज है और ब्र, बर बन जाता है, इससे ब्रह्म का बरम बनता है, लेकिन यह ब्रम की तरह भी उच्चारित होता है। इसकी अधिक घिसाई हो तो र भी ह की तरह अ होते लुप्त हो सकता है, खासकर तब, जब प यानि पुरीष या पोल्स वाले शब्द से इसकी संधि होनी हो। ह और र के लोप के बाद बचे ब-म ध्वनि की संधि प से हो तो (प, ब और म एक ही वर्ग के वर्ण हैं।) बम्प या बपं बनने की संभावना बराबर की दिखती है और पुरीष, पुलिस से करीब है ही, पोल्स भी बहुत दूर नहीं। नागर ने यहां मल-त्याग के लिए ‘प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति‘ शब्द प्रयोग किया गया है, यह वैसा ही है, जैसे नित्य-कर्म या हस्बेमामूल या हाजत, जो सीधे समानार्थी नहीं, बल्कि इस अर्थ में रूढ़ हो गए हैं।

पढ़ा-सुना-गुना, न तेरा न मेरा, कच्चा-पक्का पेश कर अब फारिग होता हूं।

Tuesday, September 29, 2020

राजस्थानी

राजस्थानी लोक-गद्य, बिज्जी-विजयदान देथा, साहित्य अकादेमी होते हुए ‘गवाड़‘ तक।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार, संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं और अंग्रेजी के अलावा राजस्थानी में दिया जाता है। अंग्रेजी के लिए कारण साफ है, इसमें कई अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में कहीं अधिक स्तरीय साहित्य प्रतिवर्ष रचा जाता है। किंतु राजस्थानी क्यों? के जवाब में यही सूझा कि कारण कोई भी रहा हो, एक प्रमुख कारक देथा का कथा-संसार ‘बातां री फुलवारी‘ अवश्य रहा होगा, जिसे 1974 में पहला राजस्थानी, साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया था।

पिछले दिनों पुस्तक हाथ में आई ‘गवाड़‘। साहित्य अकादेमी द्वारा सन 2015 के लिए पुरस्कृत राजस्थानी ‘उपन्यास‘। मधु आचार्य ‘आशावादी‘ की कृति का नीरज दइया द्वारा हिंदी में अनुवाद साहित्य अकादेमी से 2018 में प्रकाशित हुआ है। यह 42 शीर्षकों में बंटी 88 पेजी, चौबीस-पचीस हजार शब्दों वाली पुस्तक है।
 
गवाड़, यानि मुहल्ला, पुस्तक में पात्र की तरह है। ऐसा पात्र जिसे बोलचाल में ‘चार लोग‘ क्या कहेंगे या ‘समाज‘ क्या सोचेगा, कहा जाता है। पुस्तक के आरंभिक शीर्षकों में कोई नामजद पात्र नहीं है, ‘घर‘ में बिना नाम लिए शुनःशेप की कथा है। ‘पहचान लें!‘ का आरंभिक वाक्य है- ‘‘गवाड़ में ‘वह‘ रहता है। उसे नाम से कोई नहीं पुकारता था।‘‘ बाद के शीर्षकों के अंतर्गत नाम वाले पात्र रऊफ साहब, भूरा, रामली, भूरिया-भूराराम, जीवणिये, सनिये, हरिया, भोलिये, सुखिया, मगन, लक्की कुमार तक आते हैं।

बीच में शीर्षक ‘डर‘ जैसा व्यतिक्रम है, जहां गवाड़ बस नाम को है फिर ‘लेखक‘ शीर्षक के साथ अंतिम पांच में गवाड़ सिर्फ ‘विकलांगता‘ में ही और नाममात्र को आता है। तब लगता है कि कृति को वांछित ‘उपन्यास‘ आकार में लाने की निर्देश-पूर्ति किसी अनाड़ी द्वारा की गई हो, और उसने बेमन से काम पूरा कर दिया हो। पूरा लेखन अपने विवरण में आस्था-अनास्था के द्वंद्व से मुक्त तटस्थ, किंतु शुभाकांक्षी है। पढ़ते हुए लगता है किसी अखबार के लिए साफ्ट स्टोरी निकालनी हो, जिसमें पत्रकारिता वाले व्यंग-फतवा शैली की छौंक हो, का पालन किया गया है या रिपोर्टर को संपादकीय लिखनी हो और वह अखबार के आमोखास पाठक का ध्यान रखते हुए ज्यों खुलासा करता चले- ‘इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि ...‘। अनुवाद में राजस्थानी छांह रह गई है, इतनी कि इसे आंचलिकता के साथ न्याय कह सकते हैं या चाहें तो अनुवाद (कुछ स्थानों पर प्रूफ) की कमजोरी कह लें।

यह तो हुआ इस कृति का परिचय। इस पर मेरी टिप्पणी यह भी- पहली कि, जिस तरह संख्याओं के साथ यहां पुस्तक के बारे में बात शुरू की गई है, इस तरह किसी कृति का माप-तोल उचित न मानने के बावजूद भी इस ‘उपन्यास‘ के लिए यही उपयुक्त लगा।
दूसरी कि इस टीप को रचना के मूल्यांकन के बजाय साहित्य अकादेमी, दैनिक भास्कर, राजस्थानी साहित्य, मेरे लिए अब तक अनजान एक स्थापित लेखक और अनुवादक पर आक्षेप न माना जाय, क्योंकि इन किसी से मेरा कोई राग-द्वेष कतई नहीं है।
तीसरी कि क्या मेरे मन में विजयदान देथा और विवेकी राय बसे हुए हैं?
चौथी बात, कहने को तो और भी कुछ-कुछ है, लेकिन छोटी सी किताब पर और कितना कहा जाय, ‘बाबू ले बहुरिया गरू‘ होने लगेगा, इसलिए
अंतिम बात कि बतौर पाठक यह समझना मुश्किल है, और गवाड़ी अंदाज में ही पूछा जा सकता है, कि यह उपन्यास क्यों माना गया? और इसे यानि ‘गवाड़‘ को साहित्य अकादेमी पुरस्कार क्यों? राजस्थानी में 2015 में पुरस्कार लायक इससे बेहतर कुछ नहीं रचा गया, और प्रतिवर्ष पुरस्कार दिया जाना आवश्यक है?

हासिल, निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ‪मुझे साहित्य, उपन्यास की अपनी समझ को दुरुस्त करने की जरूरत है। साथ ही भाषा सम्मान, जो पुरस्कार को गैर-मान्यता प्राप्त भाषाओं में साहित्यिक रचनात्मकता के साथ ही शैक्षिक अनुसंधान को स्वीकार और बढ़ावा देने के लिए स्थापित है, और छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए अब तक एकमात्र मंगत रवीन्द्र को सन 2003 में दिया गया था, इस पर जिज्ञासा कि क्या मंगत जी की किसी रचना का प्रकाशन साहित्य अकादमी ने किया है।

Monday, September 21, 2020

गांधीजी की तलाश

सदी बीत गई, सन् 1920, जब गांधीजी आए थे। इस साल 2 अक्टूबर के आगे-पीछे, गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रथम प्रवास के बताए जाने वाले माह, सितंबर-दिसंबर के बीच भटकते मन ने सत्य के प्रयोग करना चाहा, यहां उसका लेखा-जोखा है। विभिन्न स्रोतों से यहां एकत्र की गई जानकारियों का उद्देश्य यह कि गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास की तथ्यात्मक, असंदिग्ध जानकारी स्पष्ट हो सके, ताकि ‘सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय‘ तथा ऐसे अन्य प्रामाणिक स्रोतों में जहां यह सूचना दर्ज नहीं है, प्रविष्टि के लिए ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सके।

‘‘श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ‘‘ का प्रकाशन उनकी 79 वीं जन्म-तिथि पर अगस्त 1955 में हुआ था। सन 1920 में गांधीजी के रायपुर आने का संभवतः पहले-पहल उल्लेख यहीं हुआ है। इस ग्रंथ के जीवनी खंड में श्री रविशंकर शुक्ल के ‘मेरे कुछ संस्मरण‘ शीर्षक लेख में पेज 44 पर उल्लेख आया है कि ‘‘सन् 1920 की कलकत्ता की विशेष कांग्रेस से पूर्व महात्मा गांधी रायपुर आये थे।‘‘ इस पंक्ति के अलावा गांधीजी के रायपुर आगमन-प्रवास का कोई विवरण यहां नहीं दिया गया है। इसके पश्चात् ‘‘सन् 1920 में दिसम्बर मास में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ‘‘, उल्लेख आता है। आगे उनकी 1933 की यात्रा का विवरण पर्याप्त विस्तार से है। ध्यातव्य है कि सन 1920 में कलकत्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का विशेष अधिवेशन, गांधीजी की उपस्थिति में 4 से 9 सितंबर तक हुआ था, जिसमें असहयोग, हंटर कमेटी की रिपोर्ट तथा पंजाब में हुए अत्याचारों के संबंध में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के रुख पर प्रस्ताव पारित किये गये।

‘मध्यप्रदेश संदेश‘ के 30 जनवरी 1988 अंक में सितम्बर, 1920 की 20 एवं 21 तारीख को गांधीजी की छत्तीसगढ़ यात्रा, जिसमें रायपुर, धमतरी और जाने तथा यात्रा का कारण कंडेल नहर आंदोलन, उल्लेख आया है। इसी अंक में अन्य स्थान पर धमतरी से कुरुद और कन्डेल ग्राम जाने का भी लेख है। पुनः इस अंक में श्यामसुन्दर सुल्लेरे के लेख का उद्धरण है- ‘‘21 दिसंबर, 1920 को गांधी जी रायपुर से धमतरी होते हुए कुंडेल गांव भी गए और सत्याग्रहियों से मिलकर उनके साहस की सराहना की।

अक्टूबर 1969 में मध्यप्रदेश गांधी शताब्दी समारोह समिति के लिए सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय द्वारा ‘मध्यप्रदेश और गांधीजी‘ पुस्तक प्रकाशित की गई। प्रस्तावना में बताया गया है कि पुस्तक की सामग्री का संकलन, लेखन, सम्पादन तथा मुद्रण का कार्य श्री श्यामसुन्दर शर्मा ने किया है। पुस्तक के आरंभ में ‘‘दस ऐतिहासिक यात्राएँ‘‘ शीर्षक लेख है, जिसमें बताया गया है कि ‘‘सन् 1920 में रायपुर तथा धमतरी की यात्रा में भी मौलाना शौकतअली गांधीजी के साथ थे।‘‘ तथा ‘‘गांधीजी की रायपुर तथा धमतरी की प्रथम यात्रा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण कही जा सकती है कि धमतरी की जनता ने सत्याग्रह-युग के विधिवत् उद्घाटन के पहले ही असहयोग तथा बहिष्कार के मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त की थी। सन् 1920 में जब गांधीजी धमतरी गए तब तक वहां कण्डेल नहर सत्याग्रह द्वारा जनता विदेशी शासन से लोहा ले चुकी थी और उसे सफलता भी मिल चुकी थी।‘‘ यहां तिथि अथवा माह का उल्लेख नहीं है।

पुस्तक में ‘‘दूसरी यात्रा-1920 रायपुर तथा धमतरी में‘‘ लेख की उल्लेखनीय प्रासंगिक जानकारियां इस प्रकार है कि सितंबर 1920 कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन, इन दो ऐतिहासिक अधिवेशनों के बीच (पं. रविशंकर शुक्ल के संस्मरण में दी गई जानकारी से यह अलग है।) रायपुर नामक स्थान को इस बात का गौरव प्राप्त है कि उसने गांधीजी का स्वागत किया औैर उनके राजनीतिक विचारों का श्रवण तथा मनन किया। ... ... ... जुलाई के महीने में धमतरी के निकट कंडैल नामक गांव में नहर-सत्याग्रह आरंभ हो गया। गांधीजी की रायपुर की यह यात्रा इसी सत्याग्रह की पृष्ठभूमि में हुई थी। कंडैल नहर-सत्याग्रह के प्रमुख संचालक, पं. सुन्दरलाल शर्मा को गांधीजी से परामर्श के लिए कलकत्ता भेजा गया। किन्तु कलकत्ता में उन की गांधी से भेंट न हो सकी और दक्षिण भारत के किसी स्थान पर ही यह भेंट हुई। श्री शर्मा ने उन्हें कण्डैल नहर-सत्याग्रह का परिचय दिया तथा उनसे धमतरी आने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे पं. सुन्दरलाल शर्मा के साथ 20 अथवा 21 दिसम्बर 1920 को कलकत्ता से रायपुर पधारे। उनके साथ अली-बन्धुओं में मौलाना शौकत अली भी थे। ... ... ...

आज जो गांधी चौक है, उस स्थान पर एक विशाल सार्वजनिक सभा में उनका भाषण हुआ। इस समय गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। ... ... ... रायपुर से गांधी जी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये। ... ... ... धमतरी पहुंचने पर गांधीजी का बड़े उत्साह से स्वागत हुआ। कंडैल सत्याग्रह अब तक समाप्त हो चुका था ... ... ... उनके भाषण का प्रबंध जामू हुसैन के बाड़े में किया गया था ... ... ... श्री उमर सिंह नामक एक कच्छी व्यापारी ने उन्हें कंधे पर बिठाया और मंच तक ले गया ... ... ... श्री बाजीराव कृदत्त ने नगर तथा ग्राम-निवासियों की ओर से गांधीजी को 501 रु. की थैली भेंट की। लगभग 15000 लोगों की उपस्थिति में गांधीजी और मौलाना शौकत अली के भाषण हुए। गांधीजी ने अपने भाषण में असहयोग और सत्याग्रह की बात लोगों को समझाई। श्री शौकतअली ने अपने भाषण में सदा की तरह मजाकिया अंदाज में कहा- मैं तो हाथी जैसा हूं और गांधीजी बकरी जैसे हैं ... ... ...

धमतरी से गांधीजी कंडैल ग्राम भी गये। इस अवसर पर वे कुरुद गांव भी गये ... ... ... धमतरी में गांधीजी के ठहरने की व्यवस्था श्री नारायणराव मेघावाले के निवास-स्थान पर की गई थी जहां उन्होंने रात्रि विश्राम किया। प्रातःकाल वे पुनः रायपुर के लिये रवाना हो गये। ... ... ... धमतरी से लौटने के बाद गांधीजी ने रायपुर में महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया ... ... ... अनुमानतः दो हजार रुपयों के मूल्य के सोने चांदी के गहने और रुपये एकत्रित हो गये। ... ... ... इस सभा के पश्चात् बापू नागपुर की ऐतिहासिक-कांग्रेस के लिए रवाना हो गये।

सन 1970 में ‘‘छत्तीसगढ़ में गाँधीजी‘‘ का प्रकाशन, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से गांधी शताब्दी समारोह समिति द्वारा डॉ. ठा. भा. नायक के सम्पादकत्व में हुआ। इस पुस्तक में श्री हरि ठाकुर ने अपने लेख में लिखा है कि ‘‘देश को गांधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का मार्ग सुझाया। ... ... ... कन्डेल नामक ग्राम में नहर सत्याग्रह आरम्भ हुआ। इस सत्याग्रह के सूत्रधार थे पं. सुन्दरलाल शर्मा ... ... ... अन्त में इस सत्याग्रह के नेताओं ने गांधीजी से पत्र-व्यवहार किया। और गांधीजी ने इस सत्याग्रह का मार्गदर्शन करना स्वीकार किया। गांधीजी उस समय बंगाल का दौरा कर रहे थे। उन्हें बुलाने के लिये पं. सुन्दरलाल शर्मा गये। 20 दिसम्बर सन् 1920 को महात्मा गांधी का प्रथम बार रायपुर आगमन हुआ। उसी दिन उन्होंने गांधी चौक में अपार जनसमूह को संबोधित किया। रायपुर से गांधीजी मोटर द्वारा धमतरी और कुरुद गये।... ... ... गांधीजी के आगमन के साथ ही कंडेल सत्याग्रह स्थगित हो गया। ... ... ... इसलिये गांधीजी धमतरी से ही वापस लौट आये। धमतरी और कुरुद से वापस लौटने पर गांधीजी पुनः राययपुर में रुके और उन्होंने महिलाओं की एक विशाल सभा को संम्बोधित किया। महिलाओं से गांधीजी ने ‘तिलक स्वराज्य‘ फण्ड के लिए मांग की और उन्हें तुरन्त दो हजार रु. के मूल्य के गहने प्राप्त हुए।

इस पुस्तक में केयूर भूषण मिश्र ने अपने लेख में मात्र उल्लेख किया है कि ‘‘कन्डेल सत्याग्रह सन् 1917 में प्रारंभ हुआ और 1920 में इस सत्याग्रह ने सफलता प्राप्त की।‘‘ किंतु यहां सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं है। डॉ. शोभाराम देवांगन के लेख में ‘‘इस सत्याग्रह को व्यापक तथा सर्वदेशीय रूप प्रदान करने हेतु यहां से पं. सुन्दरलालजी शर्मा राजिम वाले को 2 दिसम्बर सन् 1920 ईं को महात्मा गांधीजी के पास कलकत्ता इस परिस्थिति का ज्ञान कराने तथा उन्हें धमतरी लाकर आशीर्वाद प्राप्त करने के अतिरिक्त इस सत्याग्रह का संचालन सूत्र उनके हाथ में देने की अपेक्षा कर रवाना किया गया।’’ ... ... ... इस तरह यह नहर सत्याग्रह, महात्मा गांधी के धमतरी आगमन के पूर्व ही पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।‘‘ यहां भी सन् 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास की कोई चर्चा नहीं है।

हरिप्रसाद अवधिया ने लिखा है कि ‘‘अपने आन्दोलन के सर्व प्रथम चरण में ही सन् 1920 में मौलाना शौकत अली को साथ लिये गांधीजी का रायपुर में आगमन हुआ। इस पुस्तक में डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र और घनश्याम सिंह गुप्त के संस्मरणों में सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ के प्रवास की चर्चा नहीं है।

अब्बास भाई का संस्मरण है कि सन् 1921 में महात्माजी और मौलाना शौकत अली का रायपुर में आगमन हुआ। उन्हें धमतरी जाना था परन्तु शासन और पुलिस के आतंक के कारण मोटर मिलना दुष्कर था। पं. शुक्लजी के आह्वान पर मैं महात्माजी, मौलाना शौकत अली और उनकी पार्टी को अपनी मोटर बस में ले जाने के लिए तैयार हुआ। समय पर पुलिस वालों ने मेरे मोटर ड्राइवर को वहीं रोक लिया। ... ... ... मैं महात्माजी और मौलाना सहित पं. शुक्लजी और दूसरे नेतागण को रायपुर ब्राह्मणपारा में जो लाइब्रेरी है, वहां सं बैठाकर धमतरी ले गया। ... ... ... रायपुर मोटर बस सर्विस, रायपुर के नामसे सर्विस चलती थी तथा प्रोप्रायटर वली भाई एण्ड ब्रदर्स। ... ... ... डिप्टी कमिश्नर श्री सी. ए. क्लार्क ने हमारी कंपनी का मोटर चलाने का लाइसेंस भी रद्द कर दिया।

प्रभूलाल काबरा ने लिखा है कि- राजनांदगांव में गांधीजी मौ. मोहम्मद अली, शौकत अली, जमनालाल बजाज, के साथ जब कलकत्ता जा रहे थे ... ... ... जिस समय वे कलकत्ता के खास अधिवेशन में जा रहे थे उसी ट्रेन में लोकमान्य तिलक, दादा साहब खापर्डे, डा. मुंजे भी प्रथम दर्जे के डब्बे में यात्रा कर रहे थे ... ... ... आखिर गांधीजी ने दरवाजा खोला। इसके पश्चात्, जब गांधीजी रायपुर आयेः- में बताया है कि ‘‘ज्योंही गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी, श्री शुक्ल आदि नेतागण ... ... ... इस विवरण के साथ सन् नहीं दिया गया है, लेकिन अनुमान होता है कि यह सन् 1933 का विवरण है। कन्हैया लाल वर्मा का संस्मरण भी बिना सन् के उल्लेख के है। अद्वैतगिरी जी ने लिखा है कि सन् 1920 में गांधीजी रायपुर आये। स्वर्गीय श्री सुन्दरलालजी शर्मा के भांजे कन्हैयालाल जी अध्यापक के निवासगृह में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई। संध्याकाल उन्होंने एक आमसभा को संबोधित किया। भाषण के मुख्य विषय देश की स्वतंत्रता, एकता और सत्याग्रह थे।

महंत लक्ष्मीनारायण दास जी ने लिखा है कि सन् 1921 की घटना है, जब महात्मा गांधी पहली बार रायपुर आये और उन्होंने जैतूसाव मठ को अपनी अविस्मरणीय भेंट दी। ... ... ... महात्मा गांधी के साथ उनके दो अनन्य मित्र और अनुयायी स्वर्गीय शौकत अली और स्वर्गीय मोहम्मद अली भी साथ थे।

डा. शोभाराम देवांगन ने लिखा है कि पं. सुन्दरलालजी शर्मा, राजिम वाले, महात्मा गांधी को धमतरी लाने के लिये 2 दिसम्बर, सन् 1920 को कलकत्ता गये थे किन्तु वहां उनसे भेंट न हो सकी। ... ... ... अंत में उनसे दक्षिण भारत के एक नगर में जहां महात्माजी का कार्यक्रम अधिक दिनों के निश्चित था, वहां भेंट होना संभव हुआ। वे गांधीजीको धमतरी तहसील के कंडेल गांव के नहर सत्याग्रह का पूर्ण परिचय कराकर धमतरी में लाने में सफल हुए। 21 दिसंबर, 1920 ई. को ठीक 11 बजे महात्मा गांधी मौलाना शौकत अली के साथ, रायपुर होते हुए यहां पधारे। ... ... ... महात्मा गांधीजी के भाषण का प्रबन्ध यहां के एक प्रसिद्ध सेठ हुसेन के वृहत बाड़े में निश्चित हुआ था ... ... ... गुरुर निवासी श्री उमर सेठ नामक, एक कच्छी व्यापारी झट महात्माजी को उठाकर और अपने कंधों पर बिठाकर ... ... ... मालगुजार श्रीमन बाजीराव कृदत्त महोदय के हाथ से 501/ रुपये की थैली भेंट कर उनका हार्दिक स्वागत किया गया। लेख में बताया गया है कि लगभग 1 घंटे का भाषण हुआ इसके पश्चात् लगभग साढ़े बारह बजे सभा का कार्य समाप्त हुआ। श्री नत्थूजी जगताप के भवन पर फलाहार और लगभग दो बजे दिन को यहां से रायपुर के लिए प्रस्थान किए। इस तरह तीन चार घंटे के लिये यह नगर महात्माजी के आगमन पर आनंद विभोर में मग्न रहा।

श्रीमती प्रकाशवती मिश्र ने लिखा है कि महात्माजी के दर्शन 1920 के दिसम्बर माह में हुए जब रायपुर में उनका आगमन हुआ। कलकत्ते में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। लाला लाजपतराय अध्यक्ष थे। उसके पश्चात अखिल भारतवर्षीय दौरे पर कांग्रेस का असहयोग आन्दोलन के प्रचारार्थ महात्माजी रायपुर पधारे। महात्माजी उस समय ठक्कर बैरिस्टर के बंगले में ठहरे थे। ... ... ... महात्माजी रायपुर के दौरे के समय कुरुद व धमतरी भी गये थे।

धमतरी नगरपालिका परिषद, शताब्दी वर्ष 1981 की स्मारिका में, त्रिभुवन पांडेय ने सम्पादकीय में गांधीजी का पहली बार धमतरी आगमन नहर सत्याग्रह से प्रभावित होने के कारण और प्रवास की तिथि 21 दिसंबर 1920 बताया है। स्मारिका के इतिहास खण्ड ‘महात्मा गांधी की धमतरी यात्रा‘ शीर्षक सहित है, जिसमें 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास संबंधी जानकारी ‘मध्यप्रदेश और गाांधीजी‘ से ली गई है।

इस स्मारिका में भोपालराव पवार का लेख है, जिसका प्रासंगिक अंश- ‘‘अगस्त 1920 में कलकत्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विशेष अधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने असहयोग का प्रस्ताव खूब कश्मकश के बीच पास कराया और देश को तीन नये नारे दिये:- (1) सरकारी शिक्षालयों में पढ़ना पाप है। (2) सरकारी अदालतों में जाना पाप है। (3) विदेशी वस्त्रों का उपयोग करना पाप है। उन दिनों मैं भी श्री त्र्यंबकरावजी कृदत्त के साथ कलकत्ता में पढ़ता था। स्व. पं. सुन्दरलालजी शर्मा और स्व. नत्थूजीराव जगताप कलकत्ता अधिवेशन में आये थे और उसी मकान में ठहरे थे - जहां हम लोग रहते थे। ... स्व. शर्मा जी और स्व. जगताप साहेब ने महात्मा जी को धमतरी आने का निमंत्रण दिया, जिसे महात्मा जी ने स्वीकार किया। जिस दिन असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ - उसी दिन रात में कलकत्ता के विल्गिंटन स्क्वेयर में गांधीजी की आमसभा हुई। जिसमें उन्होंने अपने तीन नारों को दुहराया। दूसरे दिन हमलोग भी पढ़ाई छोड़कर उसी गाड़ी से घर आये-जिससे महात्मा जी रायपुर आये। रायपुर से महात्माजी को कार द्वारा धमतरी लाया गया और हम लोग ट्रेन से धमतरी आये।’’ अन्य स्रोतों के तथ्य इससे मेल नहीं खाते, इसलिए यह विश्वसनीय नहीं रह जाता।

सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास के संबंध में 1973 में प्रकाशित रायपुर जिला गजेटियर में जानकारी दी गई है कि महात्मा गांधी, कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के ठीक पहले 20 दिसंबर 1920 को अली बंधुओं के साथ तिलक कोष और स्वराज्य कोष के सिलसिले में रायपुर आए। गांधी जी धमतरी तथा कुरुद भी गए। गजेटियर में कंडेल नहर सत्याग्रह की घटना का विवरण गांधीजी के साथ नहीं, बल्कि पृथक से हुआ है। उल्लेखनीय है कि उक्त जानकारी के मूल स्रोत-संदर्भ का हवाला भी यहां नहीं दिया गया है। इस दौर के अन्य स्रोतों से भी इसी से मिलती-जुलती जानकारी सामने आती है, इसलिए उनका उल्लेख यहां नहीं किया जा रहा है।

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 18, जुलाई 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसके पेज 229-230 पर, जुलाई से नवंबर 1920, ‘हमारी दैनन्दिनी‘ शीर्षक के अंतर्गत 10 अगस्त से 26 अगस्त तक का विवरण देते हुए लिखा है कि ‘‘हम लगातार 24 घंटे मद्रासके अतिरिक्त और किसी स्थानपर न रह सके और मद्रास भी इसी कारण रह पाए क्योंकि हम पहले-पहल वहीं गये थे। बादमें तो केन्द्रस्थान होनेके कारण हम आते-जाते दो-चार घंटे वहाँ रुकते। सेलमसे बंगलौर की 125 मीलकी यात्रा हमें मोटरमें तय करनी पड़ी थी। इस रफ्तार से यात्रा करना हमारे लिए कुछ अधिक हो जाता था; लेकिन निमन्त्रण बहुत जगहोंसे मिले थे। इनकार करना उचित नहीं लगता था और फिर यह लोभ भी था कि हम जितनी दूरतक अपना सन्देश पहुँचा सकें उतना ही अच्छा है।‘‘ इस दौरे में बम्बई और अहमदाबाद होते गांधीजी 3 सितंबर 1920 की रात में कलकत्ता पहुंचे थे। इसके पश्चात् 10 सितंबर तक कलकत्ता में, 17 सितंबर तक बंगाल में और 20 सितंबर को साबरमती आश्रम में होने की स्पष्ट जानकारी मिलती है। इस प्रकार कलकत्ता विशेष अधिवेशन के पूर्व गांधीजी के रायपुर आगमन की संभावना नहीं जान पड़ती।

सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 19, नवंबर 1966 में प्रकाशित संस्करण, नेट पर उपलब्ध है, जिसमें नवंबर 1920 से अप्रैल 1921 में पेज 133 पर 16 दिसंबर 1920, गुरुवार को ढाका से कलकत्ता जाते हुए मगनलाल गांधी को लिखे पत्र की जानकारी है। पेज 143 पर 18 दिसंबर को नागपुर की सार्वजनिक सभा में भाषण की जानकारी है। पेज 151 पर 25 दिसंबर को नागपुर की बुनकर परिषद् में भाषण तथा पेज 152 पर नागपुर के अन्त्यज सम्मेलन में भाषण। पेज 161 पर 26 दिसंबर को नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन के उद्घाटन दिवस पर, गांधीजी द्वारा में भाषण, श्री विजयराघवाचार्य को कांग्रेस का अध्यक्ष चुनने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया था।


सी. बी. दलाल की अंगरेजी पुस्तक ‘गांधीः 1915-1948‘ ए डिटेल्ड क्रोनोलाजी, गांधी पीस फाउंडेशन नई दिल्ली ने भारतीय विद्या भवन बम्बई के साथ मिलकर सन 1971 में प्रकाशित किया है। पुस्तक के पेज 35 पर माह दिसंबर, सन 1920 के गांधीजी के दैनंदिन का उल्लेख है, जिसके अनुसार गांधीजी ने 17 दिसंबर 1920 को कलकत्ता छोड़ा और 18 दिसंबर 1920 को नागपुर की आमसभा में रहे। इसके पश्चात दिनांक 19 से 23 तक नागपुर में तथा पुनः 31 दिसंबर तक नागपुर के विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए। एक अन्य अंगरेजी पुस्तक के. पी गोस्वामी की ‘‘महात्मा गांधी ए क्रोनोलाजी‘‘ मार्च 1971 में पब्लिकेशन डिवीजन से प्रकाशित हुई है। इसमें भी गांधीजी के प्रवास की तिथियां दलाल की पुस्तक की तुलना में संक्षिप्त, किंतु पुष्टि करने वाली हैं।


पं. सुंदरलाल शर्मा द्वारा सन 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ आने के संबंध में कोई उल्लेख न किया जाना संयोग-मात्र हो सकता है किंतु विसंगतियों तथा प्रामाणिक प्रकाशनों से मिलान करने पर छत्तीसगढ़ के लिए इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गौरव के प्रसंग पर तथ्यों, दस्तावेजों के साथ असंदिग्ध जानकारियों की आवश्यकता अब भी बनी हुई है। अपने संसाधनों की सीमा में जितनी जानकारी जुटा पाया, जानता हूं कि वह पर्याप्त नहीं है, सुधिजन के परीक्षण हेतु प्रस्तुत है। आशा है कि कुछ और पुष्ट जानकारी प्राप्त हो सकेगी, जिससे इतिहास के पन्नों में स्पष्टीकरण, संशोधन हो सके।