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Wednesday, January 31, 2024

जंजगिरहा छत्तीसगढ़ी

बहुतेरे मानते हैं कि महानदी-हसदेव-लीलागर के बीच, यानि लगभग वर्तमान जांजगीर जिला, में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी अनूठी-मीठी है। उन बहुतेरों में एक मैं, सब साथ छोड़ दें तब भी। खरौद-रहौद-रसौंटा, नंदेली-कोसा-कोनार, नरियरा-बनाहिल-सोनसरी, गांव के नाम सिर्फ इसलिए कि जिन गांवों के निवासियों की बोली याद आई, कान में गूंजी और इन सबके साथ कोटमी-अकलतरा-मुलमुला। 


श्री रमाकांत सिंह
इसी मुलमुला के हैं हमारे आदरणीय बड़े भाई साहब रमाकांत सिंह जी, हम सब के बाबू साहब। इन गांवों में बोली-बानी की जैसी अभिव्यक्ति है, उसका असल सुख तो सुनने में ही है, मगर कामचलाउ समझने के लिए उसकी एक बानगी बाबू साहब की यह पोस्ट, दुहराते हुए कि बोली का गुरतुरपन (गुड़तुल्यपन) मिठास तो बोलने-सुनने में ही है, लिखते हुए क्षय स्वाभाविक है और अनुवाद में कुछ और अधिक क्षय, यों भी अनुवाद का अभ्यास रहा नहीं, छत्तीसगढ़ी और हिंदी दोनों मेरे लिए सहज अवश्य है, इसी के चलते पहले ‘जसमा ओड़न‘ नाटक का छत्तीसगढ़ी अनुवाद फिर रेरा चिरई गीत और अकबर खान के किस्से का हिंदी, फिर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लिए बच्चों की सात पुस्तिकाओं का नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए छत्तीसगढ़ी अनुवाद का काम किया। जरूरी मानकर पहले रमाकांत सिंह जी की फेसबुकपर आई छत्तीसगढ़ी पोस्ट की प्रति और उसके बाद मेरे द्वारा किया गया उसका हिंदी अनुवाद- 

नानी की अम्मा बड़े प्यार से बुलाती थी ‘रामाकन ...‘ 
ममा दाई के दाई पीली दाई कहय बाबू ..... 
लिम के पाके फर गुरतुर होके मीठा जाथे 
फेर दाई ददा के पाके नई मिठाय बेटा 
आजकाल कहाँ दाई ददा लईका संग रथें? 
सकेले बर परथे नता ल, ऑंखि कस पुतरी राखे बर परथे 
नई त बरी कस भूरिया आऊ फुसिया जाथे परे परे 
नता घला ल पागे पर परथे या फेर अथान कस मरिसा म सुग्घर जचों के धर आउ टिपटिप ले भर सरसों तेल ... 
बड़ मया पिरित लगाके पागे बर परथे खाजा कस। 
जइसे पगाये रथें पपची चिकि गुर के चाशनी म। 
फेर खा के ...दे ...दे जोरन म बड़ मिठाथे। 
बस नता घलो ल चुरोये बर परथे मन लगाके कम आंच म 
डेहरी आउ ओरी के छांव आय नता मन 
फेर दाई आउ ददा, भाई बहिनी सब्बो लागमानी सरग के फर आय एकेच घ मिलथे नई मिलय दूसर घानी। 
बड़ मरन हो जाथे 
बड़ फदीयत आय बंटा जाथे बेटा घलो ह बहुरिया आय म 
सब्बो नता बबा, दाई, कका, फूफा, के कहे म भाँवर परेहे 
उढ़री होतिस त बात आन तान होतिस .... 
20 ...22 बछर अपन घर बाढ़े, मऊरे आउ पऊढे बहुरिया 
अपन आँखि म बड़कन सपना धर के आथे 
फोकला घर मिलिस त फदकगे 
भरे पूरे घर मिलिस त केंवटिन गौटिन 
होगे बड़ सासत हो जाथे राम हो 
दाई ददा भरे पूरे घर म साझी के हो जाथे 
माताराम कहै बेटा ‘साझी के सूजी सांगा म जाय‘ 
चार बेटा होगे बंटागे दाई ददा 
चैत ले जेठ रामलाल के पारी आय 
अषाढ़ ले भादों बड़े मंझला ह देखहि 
अगहन ले मांघ किशोर बुतरू के बाँहटा 
पूस ले फागुन साध राम देहि खाय बर 
आउ खर मास परगे त दाई ददा ढेंकी कुरिया म खाहिं 
चाउर दार पारी पारी पहुंच गईस त ठीक नहीं त ... 
चूल्हा म गईस सब नता मया पिरित 
चार सियान कहिस त सुने म आईस एकादशी के दिन 
अपन मन मजा करिन हमन जनम गयेन 
एमा काय बड़े बुता होंगे राम जी 
बाह रे जमाना सियान गियानी लईका घलो ल नवा बहुरिया एकेच रात म समझा डारथे रामायन। 
जिनगी के बेरा ओहर जाथे जिनगी समझत म 
ई सब म चुन्दी संग उमर खंटावत पाक जाथे नता 
लिम के फर पाक के मीठ होगे आउ दाई ददा होगे करू 
अगोरत देखे हावव आंसूं धरे महतारी ल 
आउ डेहरी म हंफरत पेट ऐंठत सियान ल अपने घर म 
फेर कोन कइथे दाई ददा म करगा (अपवाद) नई होवय 
एक ठन हमरे तुंहर घर के गोठ 
दाई गोंदा बाई बेटा बहोरन के सुरता आगे 
बहोरन......गोंदा दाई तेँ हर जनम भर मोर घर रहिजा 
जऊंन बनहि मिल बांट के खा लेबो 
गोंदा बाई.... सुन न बहोरन तेँ हर मोला सोन के सीथा खवाबे तभी तोर करा नई रहौ...ग 
बहोरन .... कस दाई मैं तो भूतियार मनसे आंव, मान ले काल तेँ हर सोन के लेंडी हाग देहे त मैं गरीब आदमी ओला
धरिहौ कोन कोठी म? 
तभो ले सोच ले काकर संग रहिबे? 
एहि लटर पटर म कब संझा ले बिहनियां होंगे पता नई चलिस हमरो चुन्दी पाकगे 
बोयें होबो तेला काटबो काय संसो करना 
राखिहैं राम लेजिहैं कोन, आउ लेजिहैं राम त राखिहैं कोन 
बस अपनो की याद और मेरे अपनों को समर्पित 
जनम दिस मोर महतारी फेर भरूहा धराइस मोर गुरु 

अनुवाद 

नानी की अम्मा बड़े प्यार से बुलाती थी ‘रामाकन,, 
नानी की मां पीली दाई कहतीं बाबू 
नीम का पका फल मीठा हो कर स्वादिष्ट हो जाता है 
मगर उम्र पके मां बाप नहीं सुहाते 
आजकल बच्चों के साथ कहां रहते हैं मां-बाप 
रिश्तेदारी को सहेज-समेट रखना होता है, आंख की पुतली की तरह (संभाले) रखना होता है 
अन्यथा बड़ी की तरह फफूंद लगी, बासी हो जाती है पड़े-पड़े 
रिश्तों को भी पागना होता है या फिर अचार की तरह घड़े में प्यार और जतन से भरा-पूरा हो सरसों तेल से 
बहुत ममता-प्रीति के साथ पागना होता है खाजा की तरह 
जैसे पगाया हो पपची (एक मिष्ठान्न) या चिकी गुड़ के साथ 
खा कर और फिर दे दो जोरन (विदाई-भेंट) में बहुत स्वादिष्ट 
बस रिश्तों (नात-गोत) को भी इसी तरह पकाना होता है, मन लगा कर धीमी आंच में 
डेहरी और ओरी (घर-प्रवेश का मुख) की छांव है रिश्ते 
मगर मां और पिता, भाई बहन सब रिश्ते-नाते स्वर्ग के फल हैं, एक बार ही मिलते हैं, नहीं मिलते दूसरी बार।
असमंजस (धर्मसंकट) हो जाता है 
बड़ी फजीहत है कि बेटा भी बंट जाता है बहू आने पर 
सभी रिश्ते बाबा, मां, चाचा, फूफा की सहमति से फेरे पड़े हैं 
भगा कर लाई गई होती तो और बात होती 
20-22 साल अपने घर पली-बढ़ी-सज्ञान बहू 
अपनी आंखें में बहुत से सपने संजो कर आती है 
खाली-निर्धन घर मिला तो बात बिगड़ी 
भरा-पूरा घर मिला तो दरिद्र भी मालकिन हो गई 
बहुत सांसत हो जाती है राम हो 
मां-बाप भरे पूरे घर में साझे (सब) की हो जाती है 
माताजी कहती थीं बेटा ‘साझे की सुई सांगा (भारी बोझ उठाने में प्रयुक्त दंड) में जाती है 
चार बेटे हुए, बंट गए मां-बाप 
चैत से जेठ तक रामलाल की बारी 
आषाढ़ से भादों बड़े-भंझला देखेगा 
अगहन से माघ किशोर बुतरू के हिस्से 
पूस से फागुन साधराम देगा खाने को (खिलाना-पिलाना करेगा) 
और खर मास पड़ा तो मां-बाप का खान-पान, घर के साझे हिस्से में 
(तब) चावल-दाल बारी-बारी पहुंच जाए तो ठीक, वरन 
चूल्हे में गए सब रिश्ते, ममता-प्रीति 
चार बुजुर्गों का तो कहा सुनने मिला, एकादशी के दिन 
आप मजा किए, हम पैदा हो गए 
यह कौन सी बड़ी बात राम जी 
वाह रे जमाना, समझदार लड़के को भी नई बहू एक ही रात में समझा डालती है रामायण। 
जिंदगी का समय ढल जाता है जिंदगी को समझते 
इसी सब में बाल के साथ उम्र पक जाती है खंटते 
नीम का फल पक कर मीठा हो गया और मां-बाप हो गए कड़ुए 
आंसू भरे इंतजार करते देखा है मां को 
और सीढ़ी पर हाफते पेट ऐंठते बुजुर्ग को अपने घर में 
फिर कौन कहता है मां-बाप में करगा (अपवाद) नहीं होता 
एक हमारे-आपके घर की बात 
मां गोंदाबाई बेटा बहोरन याद आए 
बहोरन- गोंदादाई तुम आजन्म मेरे घर रह जाओ 
जो भी होगा, मिल-बांट कर खा लेंगे 
गोंदाबाई- सुनो बहोरन, तुम मुझे सोने का सीथा (भात का गिरा हुआ दाना) खिलाओगे तब भी तुम्हारे पास नहीं रहूंगी 
बहोरन- क्यों मां, मैं तो मजदूर आदमी हूं, मान लो कल तुम सोने की लेड़ी हग दी तो मैं गरीब आदमी उसे किस कोठी में रखूंगा? 
तब भी सोच लो किसके साथ रहोगी? 
इसी लटर-पटर में कब शाम से सबेरा हो गया पता नहीं चला, हमारे बाल भी पक गए 
बोया होगा वही काटेंगे, क्यों चिंता करना 
रखेंगे राम ले जाएगा कौन और ले जाएंगे राम तो रखेगा कौन 
बस अपनों की याद और मेरे अपनों को समर्पित 
जन्म दिया मां ने मगर भरुहा (नरकुल-लेखनी) धराया मेरे गुरु ने।

Tuesday, November 1, 2022

छत्तीसगढ़ के बाइस बछर

छत्तीसगढ़ के राज्य बनना, प्रशासनिक अउ राजनैतिक घटना आय, मगर संस्कृति के हिसाब से छत्तीसगढ़ के अपन पहिचान बहुत पुराना आय। हमर आज के छत्तीसगढ़ के कई रूप, कई आकार अउ नक्शा रहे हे। घटत-बढ़त बदलत रहे हे। दक्षिण कोसल, चेदि देश के साथ जुड़े रहे हे ते इलाका आज के बस्तर आय, याने दक्षिणी छत्तीसगढ़। ए इलाका दंडकारण्य आय, महाकान्तार कहे गए हे। राम भगवान के बनवास होए या राजा नल के किस्सा, ए इलाका के नाम आत रहे हे।

इतिहास म समुद्रगुप्त दक्षिणापथ अभियान म निकलथे, त सब ले पहिली राज्य कोसल के राजा महेन्द्र ल जीतथे, फेर महाकान्तार के व्याघ्रराज ल। फेर आगू तेलंगाना, आंध्र होत धुर दक्षिण निकल जाथे। महाभारत म भी ऋषभतीर्थ के नाम आथे, जे आज के गुंजी-दमउदहरा आय। उत्तरी सरगुजा अंचल, एक तरफ बघेलखंड से जुड़े रहे हे साथ ही मिर्जापुर इलाका से। जशपुर, रामनुजगंज अउ उदयपुर याने धरमजयगढ़ झारखंड-छोटा नागपुर से जुड़े रहे हे। इतिहास अउ भूगोल के साथ छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ संस्कृति के संदर्भ म भी एकर ध्यान रखना जरूरी होथे।

छत्तीसगढ़ नाम, बीच के मैदानी हिस्सा, धान के कटोरा अउ कलचुरि-मराठा काल के पहिचान आय, जे ल छत्तीसगढ़ ‘गढ़‘ माने छत्तीसगढ़ किला मान लिए जाथे, जबकि बहुत साफ चर्चा मिलथे कि शिवनाथ नदी के उत्तर म अठारह अउ दक्षिण म अठारह, जे ल मोटा-माटी कहे जा सकथे, बिलासपुर राज अउ रायपुर राज। पुराना छत्तीसगढ़ म देशी रियासत के अलावा अइ दू जिला रहे हे।

राज्य से बाहिर के लोग मन बर, छत्तीसगढ़ माने बस्तर या भिलाई रहे हे। धान के कटोरा, मैदानी छत्तीसगढ़ के प्रमुखता हमेशा से रहे हे, मगर ए कारण से सरगुजा के पहिचान, लग रहे हे। छत्तीसगढ़ के बात करत हुए अक्सर सब कुछ मैदानी छत्तीसगढ़ म सिमट जाथे, बस्तर-सरगुजा पिछड़ जाथे, अउ विकास प्राधिकरण बनाए के जरूरत समझ म आथे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनिस त यहां संस्कृति, पुरातत्व, अभिलेखागार, राजभाषा के साथ पर्यटन ल भी जोड़ के संचालनालय बनाए गइस। मध्यप्रदेश म संस्कृति के लगभग सब काम, परिषद, अकादमी अउ पीठ के माध्यम से होत रहिस। ओ कर से भी पहिली के स्थिति सुरता कर लेना चाहिए कि रायपुर म देश के सब ले पुराना संग्रहालय मन म से एक है। सीपी बरार-मध्यप्रदेश म पुरातत्व के काम पहिली, सामान्य प्रशासन, फेर शिक्षा अउ कुछ समय बर लोक निर्माण विभाग म रहे हे। संग्रहालय के मुख्य काम रायपुर से होत रहिस अउ सिरपुर खुदाई के दौरान यहां विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के भी कार्यालय रहिस।


राज्य के बंटवारा म तय होइस कि जे परिषद, अकादमी, पीठ के जिहां मुख्यालय हे, ते ओ राज्य के बांहटा म, उहें रइही। त छत्तीसगढ़ के बांहटा म सिर्फ बख्शी सृजन पीठ आइस। अउ संस्कृति के कुछ अधिकारी कर्मचारी, जे मन बाद म वापस मध्यप्रदेश चले गइन। फेर बात आइस नीति के, त देश भर के कला-संस्कृति के विशेषज्ञ आमंत्रित होइन अउ उन सबके राय के निचोड़ आइस, ते आधार म तय होइस, कहे गइस- ‘राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परंपराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण संवर्धन करना है।‘ ए ल नीति के बजाय संकल्प भी कहे गइस।

संस्कृति बर ए क्षेत्र के लोग मन ही असली अगुवा होथे, सरकार ल ओ मन के अनुसार चलना होथे। छत्तीसगढ़ म धीरे-धीरे संस्कृति के मुख्य काम मंचीय आयोजन हो गे। बेहिसाब कार्यक्रम, कलाकार मन के मानदेय म देरी अउ कटौती। भाषा म जादा ध्यान छत्तीसगढ़ी अउ, ओ कर संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल कराना रहिस। हलबी, गोंड़ी, भतरी, कुडुख, सरगुजिहा, सादरी, पंडो बर कम ध्यान दिए गइस। राजभाषा, बोलचाल की भाषा, सरकारी कामकाज की भाषा, पढ़ाई की भाषा, मानक भाषा बर विद्वान मन सोचत-लिखत-पढ़त हावयं। हकीकत आय कि छत्तीसगढ़ी मंच-माइक अउ भाषण म बाढ़त जात हे, फेर आपसी बोलचाल, खोर-गली, घर-घर म नंदावत जात हे। 

संस्कृति के संरक्षण अउ प्रोत्साहन बर राज्य म पं. सुंदरलाल शर्मा, चक्रधर, दाउ मंदराजी, के साथ कला-संस्कृति के क्षेत्र म सम्मान-पुरस्कार बर विभूति मन के नाम जुड़त जात हे, देवदास बंजारे, किशोर साहू, लक्ष्मण मस्तुरिया, हबीब तनवीर, खुमान साव। जे ल सम्मान मिलथे, ते निर्णायक मंडल म आ जाथे, मगर अइसे भी होथे कि जे निर्णायक मंडल म हे, तेही बाद म पुरस्कार पा जाथे, सम्मान-पुरस्कार संग विवादित होना तो स्वाभाविक आय, मगर ए कर स्थापना म क्षेत्र के बजाय विभूति मन के नाम आधार होथे, तओ एक क्षेत्र के व्यक्ति कई क्षेत्र म पुरस्कार बर पात्र हो जाथे, एके व्यक्ति ल दू बार सम्मान मिल जाथे, तओ लगथे कि हमर राज्य म प्रतिभा के कमी हे का? अउ कहूं नइ रहिन, नइ मिलिन? किशोर साहू के नाम म दू ठन सम्मान हे, जे म के एक दस लाख रुपिया वाला आय, जबकि राज्य सम्मान मन 2-2 लाख रुपिया के आयं, अउ पं लखनलाल शर्मा के नाम से दिए जाने वाला पुरस्कार के पात्रता पुलिस विभाग तक सीमित हे, नागरिक सम्मान नो हय, अउ राशि भी मात्र पचीस हजार रुपिया हे।

छत्तीसगढ़ म पारंपरिक तिहार, खान-पान, पारंपरिक खेलकूद उपर ध्यान दिए जात हे, तीजा-पोरा, हरेली, नवाखाई हमर पहिचान आय। हमर राज्य म माटी तिहार, पंडुम हे त सरना, गंगा दशहरा भी हे। कहूं के दशहरा देवी पूजा आय त कहूं गढ़ जीतना, अउ कहूं रावण के मूर्ति अउ पूजा भी होथे। हमन ल अपन राज्य के ए बारामिंझरा, रिगी-चिंगी विविधता के आनंद लेत रहना हे, अइ हमर असली पहिचान आय, थाती ए, धरोहर आय।

संस्कृति बर परिषद के गठन किए गए हे, जे कर माध्यम से गतिविधि चलत हे। योजना आयोग के अंतर्गत भी कई समिति, उपसमिति, वर्किंग ग्रुप बने हे। बइठक भी होत हे। ध्यान रहना चाहिए कि संस्कृति-पुरातत्व के क्षेत्र म नया सोचे, करे से जादा जरूरी होथे, चले आत हे, ते व्यवस्था हर नियमित हे, ओ म कोई बड़चन तो नइ आत हे, याने ए म रख-रखाव के जरूरत अधिक होथे। कुछ समय पहिली संस्कृति बर अलग संचालनायल के मंजूरी होए हे। ए कर जरूरत बहुत समय से रहिस। का बर कि पुरातत्व के काम पिछड़ जात रहिस, सब अधिकारी-कर्मचार संस्कृति के काम म लगे रहंय। ते कारण पुरातत्व के काम मानदेय, मानद, प्रतिनियुक्ति से चलत रहे हे। अब संस्कृति बर नया रायपुर म जगह भी ठउका लिए गए हे, त जरूरी हे कि जल्दी से जल्दी संस्कृति बर अलग अधिकारी के नियुक्ति हो जाय, नइ त साना-घटा चलत रइही, सरकार जे सोच के ए निर्णय लेहे हे ते कार्यरूप म नइ आही।

कहूं मौका म श्रीकांत वर्मा जी, श्रीमती इंदिरा गांधी से पूछिन- ‘क्या आप मानती हैं कि समाज को लेखक या कि बुद्धिजीवीनेतृत्व प्रदान करता है, राजनेता नहीं? त ओ जवाब दिहिन- ‘जिस नेतृत्व की चर्चा मैं कर रही हूं वह समाज को राजनेता नहीं दे सकता। राजनेता की दिलचस्पी बहुत तात्कालिक और व्यावहारिक प्रकृति के सवालों में होती है, जबकि लेखक-बुद्धिजीवी ज्यादा गहरे प्रश्नों से साक्षात्कार करता है। उसकी चिंता का क्षेत्र मनुष्य और उसका समाज तथा उसकी नियति होती है। सांस्कृतिक समाज अउ राजनीति या सरकार के आपसी संबंध, कोन कहां, का बर, कतका जरूरी आय, साफ ढंग से कहे गए हे, ए ध्यान रखे वाला बात आय। अउ ए आधार म जरूरी होथे कि दुनों पक्ष एक-दूसर के महत्व ल समझय-मानय अउ सम्मान दय।

कला, संगीत, साहित्य, पुरातत्व के क्षेत्र म सुनइया, देखइया के पसंद, लोकप्रियता के महत्व हे, लेकिन ओ कर मुख्य होना ठीक नो हय, का बर संस्कृति तो जीवन के अंग आय, ओ हर प्रदर्शन तक, अउ ओकरे बर सीमित हो जाही, ते ल ठीक नइ माने जा सकय। संस्कृति म प्रगति, विकास अउ निर्माण अलग तरह से होथे, ओ हर दरअसल परिवर्तन होथे, हमर जीवन के परिस्थिति के अनुसार, धीरे-धीरे, कि पता नइ लगय, सहजता से बदल जाथे। समय के साथ बहुत अकन बात अउ चीज के छूटना जरूरी हो जाथे अउ समय के साथ नया के जुड़ना भी ओतके जरूरी हो जाथे। संस्कृति बर लोग अगुवा रहंय अउ जहां तक हो सकय सरकार ए काम बर ओ कर अनुसार ही चलय, त सबके कल्याण होही।

द सूत्र‘ वाले याज्ञवल्क्य जी की जिद का मैं सम्मान करता हूं, इसके बदले वे मेरी मनाहियों को बरदाश्त करते रहते हैं। पिछले हफ्ते कुछ दिन का समय देते हुए उन्होंने ऐसा कुछ लिखने को कहा। मैंने कहा कि इतना समय हो तो यह संभव न हो सकेगा। यदि फोन रखते ही इसी काम में जुट जाउं तभी संभव हो सकेगा। फिर पुरौनी आया कि छत्तीसगढ़ी में होना चाहिए, शब्द-सीमा भी। वे मेरी मनाही का मान रखते हैं, इसलिए जवाबी, उनकी जिद पूरी करना कठिन हुआ, पर जैसे-तैसे पूरी कर सका, लगभग वही उनकी सहमति से यहां प्रस्तुत।

Wednesday, February 2, 2022

छत्तीसगढ़ी - अनेकता में एकता के सूत्र

डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा
‘रचना‘ द्विमासिक पत्रिका का अंक-27, नवंबर-दिसंबर 2000 में प्रकाशित हुआ। छत्तीसगढ़ राज्य गठन काल के इस अंक के अतिथि संपादक डॉ. राजेन्द्र मिश्र थे। अंक में प्रख्यात भाषाविज्ञानी डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा का ‘छत्तीसगढ़ी बोली‘ शीर्षक लेख है। इस लेख के चयनित अंश यहां प्रस्तुत हैं- 

छत्तीसगढ़ी पर ग्रियर्सन के सर्वेक्षण (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, 1904, 1968) का ऐतिहासिक महत्व तो है, पर उन के सहायकों की सीमाओं के कारण उस की प्रामाणिकता पर प्रायः उँगलियाँ उठती रही हैं। यों भी उस कार्य को इस दिशा में पर्याप्त विस्तृत शोधपरक आयाम जुड़ जाने के कारण बासी कहना कोई अपराध नहीं होगा। विस्तृत कार्य-सूची अगले पैरों में दी जाएगी; पहले छत्तीसगढ़ी के अंतर्गत बोली-रूपों के वर्ग-बंधन की दृष्टि से केवल दो कार्यों की तुलना द्रष्टव्य है। भालचंद्र राव तैलंग ने सन् 1966 ई. के अपने ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी, हलबी, भतरी बोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन‘ में ग्रियर्सन का ही अनुसरण किया है, जो इस प्रकार है - (1) छत्तीसगढ़ी (अथवा खलटाही अथवा लरिया), (2) सरगुजिया, (3) सदरी-कोरबा, (4) बैगानी, (5) बिंझवारी, (6) कलंगा, (7) भूलिया, परंतु नरेंद्रदेव वर्मा ने इस में संशोधन कर के सन् 1979 ई. में अपने ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास‘ में विश्लेषण को आगे बढ़ाया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी के अंतर्गत दो भाषिक-भेद रायपुरी और बिलासपुरी (पार्थक्य की भौगोलिक विभाजक रेखा शिवनाथ नदी को स्वीकार करने के साथ) स्थापित करते हुए खलटाही और लरिया की अलग-अलग निजता सिद्ध की है तथा हलबी (या बस्तरी) को सूची में बढ़ा दिया है। उन्होंने सन् 1961 ई. के जनगणना-प्रतिवेदन में छत्तीसगढ़ी के अंतर्गत दी गई सोलह मातृभाषाओं का वर्ग-बंधन अपने द्वारा प्रदत्त बोली-रूपों के साथ निम्नानुसार किया है - खलटाही, लरिया, सरगुजिया, बैगानी, बिंझवारी और भूलिया पृथक-पृथक; बिलासपुरी का अंतर्भाव छत्तीसगढ़ी में; काँकेरी का समाहार हलबी (या बस्तरी) में; एवं देवार बोली, सतनामी, गोरो, गौरिया, नागवंशी, पंडो, पनकी और धमदी जातिनामाधारित और स्थाननामाधारित मातृभाषाओं का समावेश अपने-अपने क्षेत्र में प्रचलित प्रमुख बोली-रूपों में। 

छत्तीसगढ़ी पर प्रकाशित भाषिक कार्यों में से आगे की पंक्तियों में केवल समूची पुस्तकों या उन के खंडों में प्रस्तुत कार्यों का कालानुक्रमशः उल्लेख किया जा रहा है - 

‘छत्तीसगढ़ी बोली का व्याकरण‘, हीरालाल काव्योपाध्याय (अनु.) ‘ए ग्रामर ऑफ छत्तीसगढ़ी डायलॅक्ट‘, जीए ग्रियर्सन (1890) (मूल ग्रंथ अनुपलब्ध)। 
‘ए ग्रामर ऑफ छत्तीसगढ़ी डायलॅक्ट ऑफ हिंदी‘, लोचन प्रसाद पांडेय (1921)। 
‘लिस्ट ऑफ मोस्ट कॉमन छत्तीसगढ़ी वर्ड्स एण्ड डिक्शनरी‘, ई डब्ल्यू मेनजेल (1939)। 
‘छत्तीसगढ़ी, हलबी, भतरी बोलियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन‘, भालचंद्र राव तैलंग (1966)। 
‘छत्तीसगढ़ी बोली, व्याकरण और कोश‘, कांति कुमार (1969)। 
‘छत्तीसगढ़ी का भाषाशास्त्रीय अध्ययन‘, शंकर शेष (1973)। 
‘छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास‘, नरेंद्रदेव वर्मा (1979)। 
‘छत्तीसगढ़ी-लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन‘, मन्नूलाल यदु (1979)। 
‘छत्तीसगढ़ी शब्दकोश‘, (सं.) रमेश चंद्र महरोत्रा एवं अन्य (1982)। 
‘छत्तीसगढ़ी और खड़ी बोली के व्याकरणों का तुलनात्मक अध्ययन‘, साधना जैन (1986)। 
‘छत्तीसगढ़ी-मुहावरा-कोश‘, (सं.) रमेश चंद्र मेहरोत्रा एवं अन्य (1991)। 
‘छत्तीसगढ़ी की व्याकरणिक कोटियाँ‘, (सं.) चित्त रंजन कर (1993)। 
‘संकल्प: छत्तीसगढ़ी भाषा विशेषांक‘ (अतिथि सं.) विनय कुमार पाठक (1994)। 
‘छत्तीसगढ़ी में उपसर्ग‘, नरेंद्र कुमार सौदर्शन (1996)। 
‘हिंदी की पूर्वी बोलियाँ‘ (‘छत्तीसगढ़ी‘, रमेश चंद्र मेहरोत्रा) हरियाणा साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ (प्रकाश्य)। 

छत्तीसगढ़ी के वर्णनात्मक-संरचनात्मक, संवहनात्मक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक, व्यतिरेकी, शब्दवैज्ञानिक, नामवैज्ञानिक, बोलीभौगोलिक, समाज-भाषावैज्ञानिक, अर्थवैज्ञानिक और लोकभाषिक आदि विविध पक्षों पर हुए पी-एच.डी. तथा डी.लिट्. स्तरीय शोधकार्यों की अल्पाधिक प्रकाशित-अप्रकाशित सामग्री का संकेतात्मक विवरण इस प्रकार है-
 
‘रायपुर जिले की जनभाषा रायपुरी‘, शीतला प्रसाद वाजपेयी (1968) 
‘छत्तीसगढ़ी-स्वनों और रूपों का उद्विकास‘, नरेंद्रदेव वर्मा (1973)। 
‘छत्तीसगढ़ी-लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन‘, मन्नूलाल यदु (1973); 
‘छत्तीसगढ़ के कृषक-जीवन की शब्दावली‘, पालेश्वर प्रसाद शर्मा (1973)। 
‘मध्यप्रदेश में आर्यभाषा-परिवार की बोलियाँ‘, प्रेम नारायण दुबे (1974)। 
‘द लिंग्विस्टिक स्टडी और नेम्स इन दी डिस्ट्रक्टस ऑफ रायपुर एंड दुर्ग‘, एन.एस. साहू (1975)। 
‘छत्तीसगढ़ी-प्रहेलिकाएँ एवं तदाघृत संस्कृति‘, बिहारी लाल साहू (1975)। 
मुरिया और उस पर छत्तीसगढ़ी का प्रभाव‘, तारा शुक्ला (1976)। 
‘छत्तीसगढ़ी-मुहावरों और कहावतों का सांस्कृतिक अनुशीलन‘, चंद्रवली मिश्र (1976)। 
‘छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त परिनिष्ठित हिंदी और इतर भाषाओं के शब्दों में अर्थ-परिवर्तन‘, विनय कुमार पाठक (1978)। 
‘छत्तीसगढ़ी और उड़िया में साम्य और वैषम्य तथा छत्तीसगढ़ी में उड़िया-तत्व‘, ध्रुव कुमार वर्मा (1978)। ‘छत्तीसगढ़ी के अभिलेखों का नामवैज्ञानिक अनुशीलन‘, चित्त रंजन कर (1982)। 
‘छत्तीसगढ़ी में व्यवहृत रिश्ते-नातों से संबंधित शब्दावली का भाषावैज्ञानिक अध्ययन‘, सतीश जैन (1983)। 
‘छत्तीसगढ़ी के क्षेत्रीय एवं वर्गगत प्रभेदों के वाचकों की भाषावैज्ञानिक प्रतिष्ठापना‘, व्यास नारायण दुबे (1983)। 
‘छत्तीसगढ़ी-व्यक्तिनामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन‘ (डी.लिट.), विनय कुमार पाठक (1985)। 
‘मानक हिंदी और छत्तीसगढ़ी के समान शब्दों का अर्थवैज्ञानिक अध्ययन‘, शैल शर्मा (1988)। 
‘छत्तीसगढ़ी-क्रियाओं की व्याकरणिकता‘, रामानुज शर्मा (1994)। 
‘मानक हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी के भेदक तत्वों का अर्थपरक अध्ययन‘, नरेंद्र कुमार सौदर्शन (1995)। 
‘मानक छत्तीसगढ़ी का अर्थपरक अध्ययन‘, पूनम वर्मा (1995)। 
‘अकाउस्टिक डिस्टिंक्टिव फीचर्स ऑफ छत्तीसगढ़ी सॅगमैंटल्स‘ (डी.लिट्.), ए.एस. झाडगाँवकर (1996)। 

छत्तीसगढ़ी की भौगोलिक व्यापकता और प्रयोक्तागत बहुलता के साथ इस के अंतर्गत बहुत-से नाम-रूप सम्मिलित होते गए हैं, जो अलग-अलग उपक्षेत्रों (प्रयोग के स्थानों) के नाम अथवा उन्हें प्रयुक्त करने वाली जातियों के नाम पर आधारित हैं। जनगणना प्रतिवेदनों में छत्तीसगढ़ी के साथ परिगणित मातृभाषाओं की संख्या का और क्षेत्र में प्रचलित अन्य विविध अभिधानों की संख्या का छत्तीसगढ़ी बोली की भाषा विज्ञान-सम्मत उपबोलियों की संख्या के साथ सीधा-टेढ़ा कोई ताल-मेल नहीं बैठता। प्राप्त हुए कुल ‘नामरूप‘ अधिकांश के संक्षिप्त परिचय के साथ इस प्रकार हैं (इन्हें ‘उपबोलियों‘ में निबद्ध बाद में प्रस्तुत किया जाएगा) - 

1. (केंद्रीय-क्षेत्रीय) छत्तीसगढ़ी - इस का प्रयोग पूर्वी सीमांत को छोड़ कर रायपुर और महासमुंद ज़िलों, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा ज़िलों के दक्षिणी भाग, दुर्ग और धमतरी ज़िलों, राजनांदगाँव और कवर्धा ज़िलों के पूर्वी भाग, रायगढ़ जिले के पश्चिमी भाग, तथा काँकेर जिले में होता है। ग्रियर्सन ने छत्तीसगढ़ी, खलटाही और खरिया को एक ही माना था। 
2. खलटाही या खलताही या खलवाटी - इस का प्रयोग बिलासपुर, कवर्धा और राजनांदगाँव जिलों के पश्चिमी भागों, मंडला के पूर्वी सीमांत तथा बालाघाट के पूर्वी भाग में होता है। बालाघाट जिले और मैकल पर्वत के लोग छत्तीसगढ़ी को खलौटी या खुलौटी और यहाँ की बोली को खलवाटी बोलते रहे हैं। यह नाम जनगणना-प्रतिवेदन में नहीं है। संभवतः मातृभाषियों ने अपने को सीधे छत्तीसगढ़ी-भाषी बताया होगा। 
3. लरिया या लड़िया - इस रूप का प्रयोग रायपुर और महासमुंद जिलों के उड़िया प्रदेश में प्रविष्ट हुए और होते हुए भागों और संबलपुर के आस-पास होता है। उड़िया-क्षेत्र के लोग छत्तीसगढ़ी को लरिया-प्रदेश और यहाँ की बोली को लरिया नाम से संबोधित करते हैं। 
4. कलंगा - उड़िया से प्रभावित यह रूप रायपुर जिले के पूर्वी सीमांत पर और उड़िसा की सीमा पर पटना में कुछ कबीलों द्वारा व्यवहत किया जाता रहा है। ग्रियर्सन ने इसे छत्तीसगढ़ी की उपबोली कहा था, पर सेंसस में इस का नाम नहीं आया है। कुछ लोग इसे उड़िया के अंतर्गत रखते हैं। 
5. कलंजिया - इस की स्थिति कलंगा के समान है। 
6. कवर्धाई - कुछ लोगों के लिए कवर्धा जिले में बोली जानेवाली छत्तीसगढ़ी कवर्धाई है। 
7. काँकेरी - इस का प्रयोग काँकेर जिले में होता है। छत्तीसगढ़ी का यह रूप हलबी से तथा उड़िया की बोली भतरी से संपर्कित है। 
8. खैरागढ़ी - खैरागढ़ की छत्तीसगढ़ी को कुछ लोग खैरागढ़ी कहते हैं। 
9. गोरो - छत्तीसगढ़ी का यह रूप असम पहुँचे हुए छत्तीसगढ़ी लोगों के द्वारा प्रयुक्त होता है। सेंसस-अधिकारियों ने इसे बोलने वालों की स्लिपों की छान-बीन में यह पाया कि इस के प्रयोक्ता बैगा थे। इस दृष्टि से यह छत्तीसगढ़ी के बैगानी कहे जानेवाले रूप के निकट हुआ। इस पर असमिया का थोड़ा-मोड़ा प्रभाव पड़ जाना स्वाभाविक है। 
10. गौरिया - यह रूप पश्चिम बंगाल में मिला। सेंसस के समय इस के प्रयोक्ताओं में से कुछ ने कोष्ठकों में स्वयं को छत्तीसगढ़ी-भाषी लिखा था। 
11.जशपुरी - यह नाम छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्व में स्थित जशपुर जिले की छत्तीसगढ़ी के लिए प्रयुक्त मिलता है। 
12. डंगचगहा या डंगचगही या नटी - यह छत्तीसगढ़ी बोलने वाले मध्यक्षेत्र के यायावर नटों की मातृभाषा का नाम है। 
13. देवार बोली या देवरिया - इस का प्रयोग प्रमुखतः रायपुर, महासमुंद और धमतरी जिलों में देवार जाति द्वारा होता है।
14. धमदी या धमधी - धमदा नामक स्थान दुर्ग जिले में है। धमदी नाम के प्रयोक्ता महाराष्ट्र में बसे हुए वे छत्तीसगढ़ी-भाषी हैं, जिन्हें स्थानीय सूचनाओं के आधार पर सेंसस वालों ने छत्तीसगढ़ीभाषी सिद्ध किया है। 
15. नांदगाही - ‘कहने वाले लोग‘ राजनांदगाँव ज़िले की छत्तीसगढ़ी को नाँदगाही कहने में खुशी महसूस करते हैं। 
16. नागवंशी - इस के बहुत ही कम मातृभाषी हैं, जो सरगुजा ज़िले और रायगढ़ जिले में रहते हुए स्थानीय पूछताछ के उत्तर में स्वयं को छत्तीसगढ़ी-भाषी स्वीकार करते हैं। 
17. पंडो - यह रूप भी मुख्यतः सरगुजा और रायगढ़ में प्रयुक्त होता है। इस के कुछ प्रयोक्ता उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ कर सतना में बस गए हैं।
18. पनकी - इस का प्रयोग-स्थल बस्तर है। 
19. पारधी - इस नाम के साथ छत्तीसगढ़ी के प्रयोक्ता छत्तीसगढ़ के केंद्रीय क्षेत्र में मिलते हैं। 
20. बहेलिया - दुर्ग, राजनांदगाँव, रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और कोरबा में इधर-उधर छितरी हुई बहेलिया जाति द्वारा व्यवहृत छत्तीसगढ़ी का नाम बहेलिया चलता है। 
21. बिंझवारी या बिंझवाली - इस नाम-रूप का प्रयोग मुख्यतः रायपुर, महासमुंद और रायगढ़ ज़िलों के पूर्वी भागों में तथा उड़ीसा के पटना में बिंझवार, भूमियाँ और भुजिया जातियों द्वारा व्यवहृत छत्तीसगढ़ी के लिए होता है। 
22. बिलासपुरी - इस के भाषी मध्यप्रदेश के बाहर असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में भी रहते हैं (देखिए ऊपर क्रमांक 9. गोरो और क्रमांक 10. गौरिया), जो कभी बिलासपुर जिले से वहाँ गए थे।) 
23. बैगानी - छत्तीसगढ़ी की प्राचीन बैगा जनजाति के लोगों के द्वारा प्रयुक्त इस रूप पर गोंडी-शब्दावली तथा बुंदेली के व्याकरण का प्रभाव है। इस के प्रयोक्ता रायपुर और बिलासपुर जिलों से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए कवर्धा जिले और बालाघाट तक फैले हैं। 
24. भूलिया उड़िया से प्रभावित इस रूप का प्रयोग रायगढ़ जिले के दक्षिण (सारंगढ़) से उड़ीसा के पटना और आगे सोनपुर तक के जुलाहों द्वारा होता है। इसे कुछ लोग उड़िया के साथ रखते हैं (देखिए ऊपर क्रमांक 4. कलंगा)। सरईपाली इन भाषाओं के लिए प्रमुख प्रवेशद्वार है। 
25. मरारी - यह पश्चिम में बालाघाट की ओर मरार जाति के साथ जुड़ी है। इसे सेंसस में दक्षिणी बघेलखंडी माना गया है। 
26. रतनपुरी - यह बिलासपुर जिले की ऐतिहासिक नगरी रतनपुर के नाम पर संबोधित है। 
27. रायपुरी - रायपुर जिले में व्यवहत छत्तीसगढ़ी के लिए यह नाम कुछ लोगों के द्वारा बिलासपुरी के सादृश्य रख लिया (ऊपर संकेतित पी-एच.डी. शोधग्रंथ ‘रायपुर जिले की जनभाषा रायपुरी‘ द्रष्टव्य)। इस शब्द का प्रयोग सेंसस में नहीं हुआ है। 
28. शिकारी - इस की स्थिति बहेलिया के समान है (देखिए ऊपर क्रमांक 21.) 
29. सतनामी - यह रूप बिलासपुर, जांजगीर-चाँपा, कोरबा, रायपुर, महासमुंद, धमतरी और दुर्ग जिलों में छितरी हुई, स्वयं को उच्च सामाजिक वर्ग का माननेवाली, सतनामी जाति के द्वारा प्रयुक्त होता है। 
30. सदरी-कोरबा - ग्रियर्सन द्वारा छत्तीसगढ़ी के अंतर्गत मान्य यह रूप जशपुर जिले की कोरबा जाति के द्वारा व्यवहत होता है और यह सरगुजिया के पर्याप्त समान है। इस के भाषी कोरबा जिले में और रायगढ़ जिले के उत्तरी भाग में भी हैं। सेंसस में यह नाम नहीं मिलता, पर अन्य अर्थों में (अन्य भाषा-रूपों के संदर्भ में) सदरी भी मिलता है और अलग कोरबा भी। उस में सदरी का नाम सदान भी देते हुए, उसे बिहारी की एक मातृभाषा स्वीकार किया गया है सदान लोग बिहार और मध्यप्रदेश के छोटा नागपुर पठार के निवासी हैं। सदरी या सद्री या साद्री या सदान या सदानी या टिक्कूबाज़ी को कुछ लोग भोजपुरी के अंतर्गत रखते हैं तथा इस के दक्षिणी रूप को नागपुरी या नगपुरिया कहते हैं। पुस्तकों में यह लिखा मिलता है कि सदरी या नगपुरिया भोजपुरी और छत्तीरसगढ़ी का मिश्रित रूप है (अवधी के छुटपुट प्रभाव के साथ)। सेंसस में अलबत्ता कोरवा है (कोरबा नहीं), जो एकदम भिन्न खेरवारी के साथ है। 
31. सरगुजिया या सुरगुजिया या सुरगुजिहा - छत्तीसगढ़ी के इस रूप पर भोजपुरी के अलावा बघेली का और आग्नेय-परिवार की उराँव का भी कुछ प्रभाव है। ऊपर क्रमांक 30. में संकेत किया गया है कि सदरी-कोरबा इस से पर्याप्त समानता रखती है। इस का प्रयोग सरगुजा कोरिया, जशपुर ज़िलों में और रायगढ़ जिले के उत्तरी भाग में होता है। 
32. हलबी - कुछ लोग इस नाम का प्रयोग बस्तर के संभ्रांत कुल की छत्तीसगढ़ी के लिए करते हैं। कुछ लोग इसे काँकेरी के पर्याय के रूप में प्रयुक्त करते हैं। बस्तर जिले में प्रयुक्त होने वाला यह भाषा-रूप नीचे लिखे गए इस के उपरूपों सहित सेंसस और कुछ लोगों द्वारा मराठी के अंतर्गत रखा गया है। इस के लगभग सब भाषी केंद्रीय छत्तीसगढ़ी या मानक हिंदी या गोंडी की किसी बोली पर अतिरिक्त अधिकार रखते हैं। आगे हलबी से संबद्ध उपरूपों के नामों की सूची और यथा-आवश्यक टिप्पणियाँ दी गई हैं। 
33. अदकुरी या अडकुरी। 
34. चंदारी या चंडारी। 
35. जोगी - संख्या समाप्त प्राय है। 
36. धाकड़ - (सेंसस में नहीं है) 
37. नाहरी। 
38. महरी या मेहरी या मुहारी। 
39. मिरगानी। 
40. बस्तरी या बस्तरिया - कुछ लोग इसे हलबी का एक उपरूप न मान कर पूरी हलबी के लिए प्रयुक्त करते हैं। 
41. कमारी - इसे रसेल और हीरालाल ने छत्तीसगढ़ी में माना है। 

उपर्युक्त बोली-रूपों में से स्थान के आधार पर नामकरण के उदाहरण काँकेरी, जशपुरी, नांदगाही, बिलासपुरी, रायपुरी, बस्तरी और स्वयं छत्तीसगढ़ी आदि हैं तथा जाति के आधार पर नामकरण के उदाहरण कमारी, नटी, बहेलिया, बिंझवारी, बैगानी, मरारी, सतनामी और हलबी आदि हैं। 

यदि छत्तीसगढ़ी से जुड़े सभी स्थान-नामों और जाति-नामों को रद्द करके विविध मतों को मथने के बाद छत्तीसगढ़ी बोली के भाषिक प्रमुख रूप गिनाए जाएँ, तो उस के केवल ये पाँच रूप ठहरते हैं - केंद्रीय, पश्चिमी, उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी। छोटे-मोटे भीतरी भेदों के बावजूद ये पाँच आधार-उपबोलियाँ पर्याप्त हैं। भले ही इन्हें स्थान-विशेष या जाति-विशेष के साथ आत्मीय भाव से जोड़ना सुखद और व्यवहारोपयोगी कार्यान्वयन है। लेख में संकेतित कुल 41 नाम-रूपों की उपबोलियों से संलग्नता इस प्रकार है- 

1. केंद्रीय छत्तीसगढ़ी (मानक हिन्दी से इतर बाह्य प्रभावों की सघनता से मुक्त) - कवर्धाई, काँकेरी, खैरागढ़ी, गोरो, गौरिया, केंद्र-क्षेत्रीय छत्तीसगढ़ी (ऊपर क्रमांक 1. में उल्लिखित रूप), डंगचगहा, देवार बोली, धमदी, नांदगाही, पारधी, बहेलिया, बिलासपुरी, बैगानी, रतनपुरी, रायपुरी, शिकारी, सतनामी। (कुल 18; इन में अगुआ - केंद्र-क्षेत्रीय छत्तीसगढ़ी।) 
2. पश्चिमी छत्तीसगढ़ी (बुंदेली और मराठी के तत्वों से संवलित) - कमारी, खलटाही, पनकी, मरारी। (कुल 4; इन में अगुआ - खलटाही।) 
3. उत्तरी छत्तीसगढ़ी (बघेली, भोजपुरी और उराँव के तत्वों से संवलित) - पंडो, सदरी, कोरबा, जशपुरी, सरगुजिया, नागवंशी। (कुल 5; इन में अगुआ - सरगुजिया।) 
4. पूर्वी छत्तीसगढ़ी (उड़िया के तत्वों से संवलित) - कलंगा, कलंजिया, बिंझवारी, भूलिया, लरिया। (कुल 6; इन में अगुआ - लरिया) 
5. दक्षिणी छत्तीसगढ़ी (पश्चिम से मराठी, पूर्व से उड़िया और दक्षिण से गोंडी के तत्वों से संवलित) - अदकुरी, चंदारी, जोगी, धाकड़, नाहरी, बस्तरी, महरी, मिरगानी, हलबी। (कुल 9; इन में अगुआ - हलबी।)

Sunday, January 30, 2022

छत्तीसगढ़ी भाषा-बोली

छत्तीसगढ़ी भाषा-बोली संबंधी भाषावैज्ञानिक अध्ययन होता रहा है, अब शब्दकोश और मानकीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 21 जनवरी 2022 को आदेश जारी कर ‘मानक छत्तीसगढ़ी व्याकरण अउ छत्तीसगढ़ी शब्दकोश‘ निर्माण समिति के गठन हेतु सदस्य नामांकित किए गए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भाषाविज्ञानी डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा के कुछ महत्वपूर्ण संदर्भों का स्मरण कर लेना आवश्यक है। इनमें से एक ‘छत्तीसगढ़ी बोली‘ शीर्षक लेख है। यह लेख द्विमासिक पत्रिका ‘रचना‘ के अंक-27, नवंबर-दिसंबर 2000 में प्रकाशित हुआ था। इसके साथ ‘देशबंधु‘ से साभार पुस्तिका ‘छत्तीसगढ़ी-लेखन का मानकीकरण‘ का प्रकाशन 2002 में हुआ था, सहयोग में डॉ. चित्त रंजन कर, डॉ. केसरी लाल वर्मा तथा डॉ. सुधीर शर्मा का नाम है। अन्य भाषाविद्, साहित्यकारों के साथ यह तीनों ही नाम उक्त समिति के सदस्य नामांकित हैं।

यह उल्लेख समीचीन होगा कि इस बीच डॉ. चित्त रंजन कर ने भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण श्रृंखला में सन 2015 में प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ की भाषाएं‘ खंड का संपादन किया है। डॉ. केसरी लाल वर्मा भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक जैसे अन्य कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे तथा वर्तमान में पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति हैं। डॉ. सुधीर शर्मा ने भाषाविज्ञान के साथ आयोजन और प्रकाशन के क्षेत्र में भी ख्याति अर्जित की है। समिति में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सचिव भी सदस्य हैं। साथ ही हल्बी, गोंड़ी और जशपुर के भाषाविदों का भी नाम होना उल्लेखनीय है, जिससे अनुमान होता है कि इस क्रम में छत्तीसगढ़ की अन्य भाषा-बोली के समावेश पर भी विचार किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ी भाषा-बोली और मानकीकरण पर कुछ विचारणीय बातें-

मेहरोत्रा जी के ‘रचना‘ पत्रिका वाले लेख का आरंभ था- ‘छत्तीसगढ़ी‘ को अधिकतर छत्तीसगढ़ी-भाषी ‘भाषा‘ कहना-कहलवाना पसंद करते हैं, पर इस लेख के शीर्षक में इसे ‘बोली‘ लिखा गया है - जान-बूझकर, जिसके अनेक तकनीकी कारण हैं। इसी लेख में आगे है- ‘भाषा बनने के लिए छत्तीसगढ़ी को अपना स्वतंत्र अस्तित्व और भारी-भरकम व्यक्तित्व बनाना पड़ेगा, जैसे हिंदी से अलग हो कर पंजाबी ने बनाया।‘ तथा ‘जिस प्रकार पहले की असमिया बोली बंगला भाषा से अलग हो कर पृथक भाषा बन चुकी है। इस के लिए हमें और हमारी आगामी पीढ़ियों को छत्तीसगढ़ी और मानक हिंदी के आज के रिश्ते को देखते हुए कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा, इसका जवाब कोई नहीं दे सकता। ... अपनी मातृभाषा, अपने परिवार, अपनी जाति, अपने क्षेत्र से लगाव होना बिल्कुल गलत नहीं है। लेकिन ‘लगाव‘ का अर्थ ‘लगाव‘ से अधिक नहीं होना चाहिए। ... छत्तीसगढ़ी आदि को हिंदी से पृथक भाषा मानने का अर्थ है मानक हिंदी के आच्छादक रूप से छत्तीसगढ़ी आदि के अंतरंग संबंधों को नकारना।‘

राज्य गठन के साथ छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी की भावना तीव्र थी इसके चलते मेहरोत्रा जी के इस तकनीकी आधार के विरुद्ध भावनात्मक प्रतिक्रियाएं आईं। संभवतः इसी का परिणाम था कि पुस्तिका ‘छत्तीसगढ़ी-लेखन का मानकीकरण‘-2002 के आरंभ में उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी में भले ही संस्कृत के बहुत-से भाषापारिवारिक तथ्य और लक्षण विद्यमान हैं, पर जिस प्रकार वह ‘संस्कृत नहीं है‘, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी भी अब अपने रास्ते पर इतना आगे बढ़ चुकी है कि यह आज ‘हिंदी नहीं है।‘ तथा आगे लिखते हैं- ‘किसी ऐसे विषय पर अपनी विद्वत्ता नहीं दिखानी चाहिए, जिस में हमारी विशेषज्ञता न हो। ... देवनागरी लिपि को बहुत बड़े विशेषज्ञों ने बनाया/विकसित किया था/है। इस में भाषा-विकास के साथ वर्तनी-संबंधी आवश्यक सुधार भी विशेषज्ञ लोग और उनकी समितियां ही यथासमय किया करती हैं। लेकिन बाहरी नीम-हकीमों की संसार में कमी नहीं है, जिन्हें समझ लेना चाहिए कि सही हकीम बनने के लिए विषय-विशेष के गंभीर अध्ययन और अच्छे अनुभव की आवश्यकता होती है।‘ 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद द्वारा, ‘‘एक विचार यात्रा ... छत्तीसगढ़ ‘जनभाषा से राजभाषा तक‘‘ का प्रकाशन सन 2003 में हुआ। इस पुस्तिका में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा ने ‘छत्तीसगढ़ी विभाषा से भाषा की यात्रा‘ शीर्षक लेख में कहते हैं- ‘भाषा विज्ञान के मूर्धन्य विद्वान डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा के तर्क से मैं सहमत हूं कि छत्तीसगढ़ की पुस्तकें, शब्दकोष, तकनीकी शब्दावली, विज्ञान तथा वाणिज्य के ग्रंथों का अभाव है। छतीसगढ़ी का मानक शब्दकोश अभी तक नहीं बन पाया है, जो उपलब्ध है, वह संपूर्ण नहीं है। मानक या परिनिष्ठित छतीसगढ़ी में सृजन के लिए नयी पीढ़ी को तत्पर होना पड़ेगा अन्यथा चिल्लाने या नारे लगाने से भाषा या राजभाषा की क्षमता नहीं बढेगी।‘ इसके बाद आगे लिखते हैं कि ‘वास्तव में अभी छत्तीसगढ़ी लोकभाषा या जनभाषा है, उसे भाषा के रूप में समृद्ध होने के लिए हिंदी से अलग अपना अस्तित्व कम से कम पचास प्रतिशत बनाना होगा। भाषा विज्ञान के अनुसार अभी छत्तीसगढ़ी पूर्वी हिन्दी परिवार के अंतर्गत ही आती है। वह एक ओर अर्धमागधी की दुहिता, तो दूसरी ओर अवधी, वघेली की सहोदरा है। उसे संस्कृत की लाड़ली दौहित्री कहना अधिक उपयुक्त है- उसे समृद्ध और हिन्दी से अलग अस्तित्व प्रदान करने के लिए हमने क्या और कितना श्रम किया?‘ 

पुनः सन 2001 में रमेश चंद्र मेहरोत्रा की पुस्तिका ‘छत्तीसगढ़ी को शासकीय मान्यता?‘ प्रकाशित हुई। इसमें उनके विचार इस प्रकार हैं- ‘छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में विकसित करने की व्यग्रता का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है, ... बोली की सीमाओं को लाँघ कर भाषा के रूप में दावा कर चुकी छत्तीसगढ़ी को राजकीय कामकाज की भाषा की मान्यता दी जाने की दिशा में प्रयत्न शुरू हो चुके हैं। मेहरोत्रा जी की इसी पुस्तिका में ‘छत्तीसगढ़ी के लिए ‘दिल‘ और ‘दिमाग‘ शीर्षक के साथ उल्लेख है कि ‘यदि हलके-फुलके ढंग से बात करें, तो भाषा और बोली में अंतर करना बच्चों का खेल है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता, जो स्वयं को इस विषय का विशेषज्ञ मान कर इस बारे में अपना निर्णय झपट कर न दे देता हो।‘ इसके आगे उल्लेख है कि ‘भाषा/बोली और राजभाषा‘ शीर्षक के अंतर्गत विभिन्न कोशों का उद्धरण, जिनमें भाषा और बोली को समानार्थी बताया गया है, देते हुए स्पष्ट करते हैं- ‘अब निकालिए सिर खुजला-खुजला कर इन आद्योपांत पराच्छादित अर्थों में से पहले ‘भाषा‘ और ‘बोली‘ का अंतर और उस के बाद जमाइए ‘छत्तीसगढ़ी भाषा‘ और ‘छत्तीसगढ़ी बोली‘ का अपना ‘वाद‘! तात्पर्य कि भाषा और बोली में ठीक-ठीक अंतर नहीं किया जा सकता। इसी पुस्तिका में निष्कर्षतः कहते हैं- ‘इस समय ‘छत्तीसगढ़ी भाषा‘ का मतलब है ‘छत्तीसगढ़ी के केंद्रीय पश्चिमी-उत्तरी-पूर्वी-दक्षिणी सारे रूपों का पारिवारिक संकुल‘ और ‘मानक छत्तीसगढ़ी‘ का मतलब है ‘केंद्रीय छत्तीसगढ़ी का वह मानकीकृत (आदर्शाेन्मुख) रूप, जो छत्तीसगढ़ी भाषा के सर्वक्षेत्रीय बोली-रूपों को संपर्क-बद्ध किए हुए है।‘ 

भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण के अध्यक्ष गणेश एन. देवी कहते हैं कि ‘पूर्व औपनिवेशिक काल में भाषा से संबंधित ज्ञान-मीमांसाओं में ‘मानक भाषा‘ तथा ‘बोली‘ के संबंध में किसी भी प्रकार की उच्च-नीचता (पदानुक्रम) नहीं थी। ... उस भाषा को निम्न कोटि कर माना जाने लगा जो मुद्रित स्वरूप में उपलब्ध नहीं थी। वहीं डॉ. चित्त रंजन कर के अनुसार यहां वर्तमान में तिरानवे भाषाएं/बोलियां बोली जाती हैं। 

‘द मारिया गोंड्स ऑफ बस्तर‘ डबलू.वी. ग्रिग्सन 1938, ने गोंडी और उसके व्याकरण अध्येता अंग्रेज अधिकारियों के अलावा, हल्बी को लिंगुआ फ्रैंका- संपर्क भाषा के साथ बस्तर की भाषाई विविधता के लिए बताया है कि सर्किल इंस्पेक्टर चेतन सिंह बस्तर की सभी ‘36‘ भाषाएं जानते थे। 

डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ में लिखा है- ‘सरगुजा जिले के कोरवा और बस्तर जिले के हलबा के साथ कवर्धा के किसी बैगा और सारंगगढ़ के किसी कोलता को बैठा दीजिए फिर इन चारों की बोली-बानी, रहन-सहन, रीति-नीति पर विचार करते हुए छत्तीसगढ़ीयता का स्वरूप अपने मन में अंकित करने का प्रयत्न कीजिये। देखिये आपको कैसा मजा आयेगा!‘ 

ए.ए. मैक्डॉनल की पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिट्रेचर‘ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में भाषा के मानकीकरण के संबंध में ग्रंथ के अनुवादक डॉ. रामसागर त्रिपाठी के विचार महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि ‘परिवर्तनशीलता भाषाओं की एक सामान्य प्रकृति है। पिता और पुत्र की भाषा सर्वांश में एक रूप नहीं होती, उच्चारण में कुछ न कुछ अन्तर पड़ जाता है। यह अन्तर पीढ़ियों के व्यवधान से १००-२०० वर्ष में इतना अधिक बढ़ जाता है भाषा का स्वरूप ही बदल जाता है और तब पूर्ववर्ती और परवर्ती दोनों भाषाओं को एक मानना असंगत प्रतीत होने लगता है। जो कालकृत व्यवधान के विषय में कही जाती हैं वही बात स्थानकृत दूरी के विषय में भी कही जा सकती है। एक ही भाषा थोड़ी-थोड़ी दूर में बदलती जाती है और पर्याप्त दूरी तक बढ़ कर अपना नाम रूप खो देती है। ... ... ... यह सारा कार्य भाषा संस्कार के द्वारा सम्पन्न हुआ था, अतः इस भाषा का नाम संस्कृत भाषा पड़ गया। यह समझना भारी भूल होगी कि संस्कृत कभी भी जन साधारण की भाषा थी। जन साधारण की भाषा वही भाषा हो सकती है जिसमें बोलने वालों को अपने ढंग से परिवर्तन कर लेने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो। ... ... ... इस भाषा (संस्कृत) का प्रवर्तन स्थायी साहित्य लिखने के मन्तव्य से ही हुआ था। ... ... ... साहित्य सर्जना की दृष्टि से विचार मरने पर यही एक भाषा अमर भाषा कही जाने की अधिकारिणी है। ... ... ... हजारों वर्ष पहले लिखी वाल्मीकि रामायण को हम आज उसी सरलता से समझ सकते हैं जैसे तत्कालीन विद्वान उसे पढ़ते और समझते रहे होंगे। 

सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया‘ का हिन्दी अनुवाद उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान (हिन्दी समिति प्रभाग) द्वारा प्रकाशित है। इस सर्वेक्षण में 179 भाषाएं और 544 बोलियां, इस प्रकार कुल संख्या 723 है। इसमें भाषा और बोली के लिए कहा गया है कि ‘साधारण रूप से हम यह कह सकते हैं कि एक भाषा की विभिन्न बोलियों में समानता होती है और उस भाषा को बोलनेवाले उसे समझ जाते हैं किन्तु अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा को ग्रहण करने के लिए विशेष परिश्रम और अध्ययन की आवश्यकता होती है।‘ 

इस भाषा सर्वेक्षण में छत्तीसगढ़ी की चर्चा ‘छत्तीसगढ़ी, लरिआ या खल्टाही‘ शीर्षक अंतर्गत है, जिसके नाम के परिचय में कहा गया है- ‘यह बोली ऊपर दिये हुए तीन नामों में से आमतौर से पहले, छत्तीसगढ़ी अर्थात् छत्तीसगढ़ की भाषा, के नाम से जानी जाती है। बिलासपुर जिला इस क्षेत्र का एक हिस्सा है और यह पड़ोसी बालाघाट जिले में ‘खलोटी‘ के नाम से प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ी, इस परवर्ती जिले के एक हिस्से में भी बोली जाती है और वहाँ यह (छत्तीसगढ़ी) ‘खलोटी‘ क्षेत्र की भाषा, अर्थात् ‘खल्टाही‘ के नाम से जानी जाती है। छत्तीसगढ़-मैदान के पूरब की ओर पूर्वी सम्बलपुर का उड़िया प्रान्त तथा उड़िया की सामन्तीय रियासतें पड़ती हैं। उन क्षेत्रों में रहने वालों के बीच, उनके पश्चिम में स्थित छत्तीसगढ़ प्रदेश ‘लरिया प्रदेश‘ के नाम से प्रसिद्ध है; और इसीलिए उनके यहाँ छत्तीसगढ़ी को ‘लरिआ‘ कहा जाता है।

रमेश चंद्र मेहरोत्रा जी का यह उद्धरण भी प्रासंगिक है- अब देखिए छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ से संबंधित अन्य बोलियों पर चुने हुए पीएचडी और डीलिट् स्तरीय शोधकार्य (इनमें से कई पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुके हैं)। छत्तीसगढ़ी रचनाओं और रूपों का उद्विकास (नरेंद्रदेव वर्मा 1973), छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन (मन्नूलाल यदु 1973), छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली (पालेश्वर प्रसाद शर्मा 1973), मध्यप्रदेश में आर्यभाषा परिवार की बोलियां (प्रेमनारायण दुबे 1974), मुरिया और उस पर छत्तीसगढ़ी का प्रभाव (श्रीमती तारा शुक्ला 1976), छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त परिनिष्ठित हिंदी और इतर भाषाओं के शब्दों में अर्थ परिवर्तन (विनय कुमार पाठक 1978), छत्तीसगढ़ी और उड़िया में साम्य और वैषम्य तथा छत्तीसगढ़ी में उड़िया तत्व (ध्रुव कुमार वर्मा 1978), छत्तीसगढ़ी में व्यवहृत रिश्ते-नातों से संबंधित शब्दावली का भाषावैज्ञानिक अध्ययन (सतीश जैन 1983), छत्तीसगढ़ी के क्षेत्रीय एवं वर्गगत प्रभेदों के वाचकों की भाषा वैज्ञानिक प्रतिस्थापना (व्यास नारायण दुबे 1983), छत्तीसगढ़ के स्थान-नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन ( विनय कुमार पाठक, 1985, डिलिट्), मानक हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी के भेदक तत्वों का अध्ययन (नरेंद्र कुमार सौदर्शन 1995), अकाउस्टिक डिस्टिंक्टिव फिचर्स ऑफ छत्तीसगढ़ी सग्मैंटल्स (ए.एस. साड़गांवकर, 1996, डिलिट्)।

ये भी- छत्तीसगढ़ के दोरली लोक साहित्य का भाषापरक अध्ययन (राम जनम पांडे 1971), छत्तीसगढ़ की तेलंगी पर ए डस्क्रिप्टिव अनालिसिस ऑफ द तेलंगी डायलक्ट ऑफ बस्तर (जे. श्रीहरि राव, 1975), छत्तीसगढ़ की दंडामी माड़िया पर ए ग्रामर ऑफ दंडामी माड़िया (केशीनाथ पांडेय 1980), बस्तर के आदिवासियों के नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन (शिरीन लाखे 1987), राजनांदगांव के विभिन्न धर्मावलंबियों की धर्म-संबंधी शब्दावली का अर्थवैज्ञानिक अध्ययन (श्रीमती उषा मिश्रा, 1992)।

संभवतः उपर्युक्त कार्यों में किसी सीमा तक परिचित (मुझ से व्यक्तिगत रूप से अपरिचित) आयुक्त जे.आर.सोनी ने संकल्प-रथ (भोपाल) के जुलाई 1999 अंक (छत्तीसगढ़ के साहित्यिक अवदान पर केंद्रित विशेषांक) में लिखा है- डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा निर्विवाद रूप से छत्तीसगढ़ अंचल को भाषा विज्ञान से परिचित कराने वाले तथा छत्तीसगढ़ी पर महत्वपूर्ण शोध कार्य करने व करवाने वाले एकमेव प्रणम्य आचार्य हैं।

अब मुझे आगे आने वाले वाक्यों की पृष्ठभूमि के रूप में स्वयं भी यह विनित भाव से लिख देना चाहिए कि ऊपर दी गई सूची का सारा कार्य मैंने ही किया और करवाया है। लेकिन फिर भी यदि कोई दूरदर्शी मुझे छत्तीसगढ़ी का हितैषी नहीं मानता है, तो वह कृताचेता अधिकाधिक स्थूलकाय होने के लिए स्वतंत्र है। उस की चाह है कि छत्तीसगढ़ी को छत्तीसगढ़ की राजभाषा अभी बना दिया जाए, क्योंकि उसने छत्तीसगढ़ी की बहुत सेवा की है- वह अपने घर में बीवी-बच्चों से हमेशा छत्तीसगढ़ी में बात किया करता है, बस।

आइए समापन करें। हिंदी की मानक आकृति छत्तीसगढ़ी की विरोधी कतई नहीं है, यह तो अपने ही घर की बड़ी है, यह वृहत्तर समाज में सारे रिश्ते बनाए रखने के लिए यूनिफाइंग फोर्स है, यह कई प्रकार का बोझ अपने कंधों पर लेकर चलने वाली सहयोग सिद्ध गतिशीला है। जिस दिन छत्तीसगढ़ी के कंधे सब प्रकार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए मजबूत हो जाएंगे, उस दिन यह स्वयं राजभाषा का पद पारंपरिक रूप से संभाल लेगी। वर्तमान पीढ़ियों के लिए पृथक राज्य बहुत बड़ी उपलब्धि और खुशी है, हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी कुछ करने और पाने के लिए छोड़ दें।

(छत्तीसगढ़ बोली है, भाषा है या विभाषा है, यह बहस राज्य निर्माण के पहले और दौरान भी जारी थी। 22 अगस्त 2000 को भाषाविद् रमेशचंद्र मेहरोत्रा जी का एक आलेख देशबन्धु में प्रकाशित हुआ था। शीर्षक था- छत्तीसगढ़ी के पक्ष और विपक्ष में।)

कुछ अपनी बात- 
आमजन में यह बहुत प्रचलित, भ्रामक धारणा है कि भाषा के लिए व्याकरण और लिपि आवश्यक है और छत्तीसगढ़ी के साथ यह कमी है। वस्तुतः यह बात ऐसे लोगों के बीच प्रचलित और मानी जाती है, जिन्हें छत्तीसगढ़ी के व्याकरण होने की जानकारी नहीं है साथ ही यह भी कि कोई भी अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति का शब्द-व्यापार व्याकरण के बिना संभव नहीं है। व्याकरण से ही किसी जबान के माध्यम से विचार विनिमय संभव है, जो वक्ता और श्रोता के लिए समान अर्थ देता हो। लिपि, भाषा के लिए आवश्यक नहीं, न ही अनिवार्यता है, ऐसा मानते हुए कुछ प्रयास छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ में प्रचलित अन्य भाषाओं की लिपि बनाने के हुए हैं। किंतु लिपि बनाने के संबंध में विशेषज्ञों की राय उपरोल्लिखित है। यह भी स्मरणीय है कि निजी प्रयासों के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा भी शब्दकोश तैयार कर, प्रकाशित कराया गया है।

भाषा और बोली के बीच के अंतर को भी विभिन्न प्रकार से विशेषज्ञों ने समझा-समझाया स्पष्ट किया है। किंतु सामान्यतः बोली को हेय, और भाषा को उच्च मान लिया जाता हैै, जैसा छत्तीसगढ़ी के साथ भी हुआ है। ऊपर इसके पर्याप्त उदाहरण आए हैं, जबकि भाषा बनने के क्रम में बोली का लोच चला जाता है। खड़ी बोली के खड़ेपन यानि कम लोच-मधुर होने के कारण ही उसका भाषा बन जाना आसान हुआ। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानक हो जाने के साथ व्याकरण नियम जितने कठोर होंगे, शब्दार्थ जितने दृढ़ और स्थिर होंगे, अभिव्यक्ति की आयु उतनी बढ़ जाएगी। इसलिए श्रेयस्कर यही होगा कि छत्तीसगढ़ी का मानक स्वरूप ऊपर आए विशेषज्ञों की मार्गदर्शी राय के अनुरूप हो, जो लिखने और व्यापक, तकनीकी इस्तेमाल के लिए हो किंतु बोलचाल की छत्तीसगढ़ी में उसका बोलीपन सुरक्षित रहे।

छत्तीसगढ़ी मानकीकरण पर सोचते हुए एक उदाहरण ‘कर‘ पर ध्यान जाता है। ‘ओ कर‘ का अर्थ हुआ उस का। ‘ओ करऽ‘ यानि वहां पर। ‘ओ कर करऽ‘ यानि उस के पास और ‘ओ कर के‘ यानि वह कर के। यह भी विचारणीय है कि छत्तीसगढ़ी के भाषा-बोली और मानकीकरण की बात जितनी जोर पकड़ती जा रही है, घरों में आपसी बोलचाल से उतनी तेजी से बाहर हो रही है जबकि लिखने तथा माइक पर इसका आग्रह तीव्र हो जाता है, तो भविष्य का अनुमान चिंतित करता है। फिर भी आशा की जा सकती है कि वर्तमान में गठित समिति पूर्व निर्धारित मार्गदर्शी को कार्यरूप में परिणित करेगी साथ ही यह छत्तीसगढ़ी के भाषा व्यवहार को समृद्ध करने में सहायक होगा।

Sunday, October 17, 2021

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया

छत्तीसगढ़ की भूमि का स्वभाव शांत, सौम्य और संतुष्ट है। यह विशिष्टता अगर किसी पूरे भौगोलिक खण्ड में सामान्य-सहज ढंग से उपलब्ध हो तो यह निश्चय ही अत्यंत सम्पन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ही विकसित होना संभव है।

कहावत है कि ‘पूत के पांव पालने में दिखाई पड़ते हैं’ और इतिहास की झलकियां इस अंचल की विशिष्टताओं की साक्षी हैं। इस सांस्कृतिक विरासत के रूप-आकार में हमारा समष्टि उद्यम तो कारक बना ही, प्राकृतिक स्थितियों का महत्व भी कम नहीं है। छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों और वन-कान्तार में जैव विविधता, खनिज-सम्पदा, नदी-नाले, वह सभी कुछ है, जो सभ्यता-शिशु को अपनी गोद में दुलार-संवार कर पाल-पोसकर सक्षम बना सकता है। इस भूभाग के उपजाऊ मैदान से छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ ‘धान का कटोरा’ कहकर किया जाना, अंचल को कमतर आंकना होगा। प्रकृति ने इस अंचल को विशिष्टता प्रदान की है और उसका सम्मान कर अंचल ने जो प्रतिमान रचे-गढ़े हैं, वही पृष्ठभूमि इस सम्पन्न धरती पुत्रों की संतुष्टि और शालीनता में अभिव्यक्त होती है। सभ्यता विकास के विभिन्न चरणों के लिए इस धरती की उपयुक्तता सहज देखी जा सकती है, जहां इतिहास में ऋषभतीर्थ-गुंजी विकसित हुआ उसी से जुड़ा आधुनिक औद्योगिक तीर्थ कोरबा भी बुलंदियों पर है। चित्रकला, मूर्तिकला, भाषा-लिपि के विभिन्न अप्रतिम, सर्वोच्च, सर्वप्रथम और विशिष्ट चमत्कार यहां घटित हुए हैं जिनमें कुछ अल्पज्ञात हैं, कुछ अचर्चित तो कुछ विस्मृत। इन्हीं का विवरण किसी (भूभाग) के निवासियों के साथ उनकी संस्कृति में प्रस्फुटित हो जीवन की सतरंगी छटा बिखेरता है और अपनी पहचान स्थापित करता है।

गौरव गाथा के क्रम में वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता भी उतनी ही आवश्यक होती है और यह समय प्राकृतिक आपदाओं का, संसाधनों के निर्मम दोहन को उत्पादन घोषित करने वालों और क्षेत्रीय हितों को स्वहितों से घालमेल कर आगे बढ़ने वालों का है। ऐसी परिस्थिति में इस भूमि पर गर्व करने वालों की शालीनता और संतुष्टि में सक्षम और सजग रहने का समावेश अपरिहार्य हो गया है। पंचतंत्र की नीति शिक्षा है- ‘‘अपनी शक्ति को प्रकट न करने से शक्तिशाली मनुष्य भी अपमान सहन करता है, काठ के भीतर सोई आग को लोग आसानी से लांघ जाते हैं किन्तु धधकती ज्वाला को नहीं।’’ और दिनकर की पंक्ति है-
छीनता हो स्वत्व तेरा और तू, त्याग, तप से काम ले, यह पाप है,
है उचित विच्छिन्न का देना उसे, बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।

गढ़ों का तिलस्म
छत्तीसगढ़ के नामकरण का आधार तो निस्संदेह रतनपुर राज्य मुख्यालय के अंतर्गत विभक्त प्रशासनिक इकाईयां हैं। देवार गीतों में भी मंडला राज के बावनगढ़, सम्बलपुर राज के अट्ठारहगढ़ और रतनपुर राज के छत्तीसगढ़ गिनाये जाते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ भौतिक स्वरूप वाली परिखा (खाई) और प्राकार (दीवार) युक्त संरचनाओं का अस्तित्व भी इस अंचल में हैं।

मृत्तिका या धूलि दुर्ग नाम से अभिज्ञात इन गढ़ों में व्यवस्थित वैज्ञानिक उत्खनन अब तक नहीं हुआ है, इसलिए इनका तिलस्म कायम है लेकिन यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि ऐसे गढ़ लगभग 2700 साल तक पुराने और इतिहासपूर्व युग को ऐतिहासिक काल से संबद्ध करने वाली कड़ी साबित हो सकते हैं। विभिन्न आकार प्रकार की इन विशिष्ट संरचनाओं को महाजनपद काल का माना जाता है। मिट्टी के इन गढ़ों की संख्या व वितरण इनके सामरिक प्रयोजन को संदिग्ध बनाता है। जांजगीर जिले में ही ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीस से अधिक है। दो गढ़ों की आपसी दूरी कहीं-कहीं तो सिर्फ तीन किलोमीटर है, जैसे मल्हार और कोनारगढ़। ऐसे उदाहरण पामगढ़-शिवरीनारायण के बीच और जांजगीर-केरा के बीच बहुतायत में है। मिट्टी के इन गढ़ों की विशालता और उसके निर्माण में लगे मानव श्रम का अनुमान चकित कर देने वाला है। मल्हार जैसे कुछ गढ़ों से मिलने वाले प्राचीन अवशेष की विपुलता और विविधता भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। अंचल के ऐसे सभी गढ़ों की प्राचीनता अगर अनुरूप हो तो इनके व्यवस्थित अध्ययन से इतिहास का रोमांचक पृष्ठ खुल सकता है और अपने अनूठेपन के साथ-साथ इतिहास को सार्थक तथ्य उपलब्ध करा सकता है।

छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना
छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना अभिलेख पत्थर पर उत्कीर्ण व सुरक्षित है। यह शिलाखंड दंतेवाड़ा में स्थापित है। लेख में शासक दिकपाल देव का उल्लेख है और तिथि सम्वत् 1760 यानि सन् 1702 है। लेख वस्तुतः साथ लगे संस्कृत शिलालेख का अनुवाद है, लेख का अन्य संबंधित विषय स्वयं स्पष्ट है -

दंतावला देवी जयति।। देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरही हैं ते पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिखे है। ..... ते दिकपालदेव विआह कीन्हे वरदी के चंदेल राव रतनराजा के कन्या अजवकुमरि महारानी विषैं अठारहें वर्ष रक्षपाल देव नाम जुवराज पुत्र भए। तव हल्ला ते नवरंगपुरगढ़ टोरि फांरि सकल वंद करि जगन्नाथ वस्तर पठै कै फेरि नवरंगपुर दे कै ओडिया राजा थापेरवजि। पुनि सकल पुरवासि लोग समेत दंतावला के कुटुम जात्रा करे सम्वत् सत्रह सै साठि 1760 चैत्र सुदि 14 आरंभ वैशाष वदि 3 ते संपूर्न भै जात्रा कतेकौ हजार भैसा वोकरा मारे ते कर रकत प्रवाह वह पांच दिन संषिनी नदी लाल कुसुम वर्न भए। ई अर्थ मैथिल भगवान मिश्र राजगुरू पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपाल देव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।

सामाजिक समरसता
जाति चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन करने की परम्परा का प्रमाण बिलासा केंवटिन के देवार गीत में मिलता है किन्तु सामाजिक समरसता और जाति सद्भाव-सम्मान की अनूठी परम्परा इस अंचल मेें रही है। बिलासा केंवटिन, राजिम तेलिन, बहादुर कलारिन, किरवई की धोबनिन, गंगा ग्वालिन और मुरहा राउत, परऊ बैगा, बैगा-बैगिन जैसे लोक चरित्रों की प्रतिष्ठा तथा उनके प्रति सम्मान प्रकट कर गौरव बोध होना अंचल की सामाजिक समरसता का द्योतक है। लोक गाथा गायक देवार जाति के इतिहास के अनाम नायकों के शौर्य, महानता और उदारता की गाथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाकर हाशिये के इतिहास की चारण-गाथा को सुरक्षित रखा है।

गांव के दो समान नाम वाले जाति, वर्ग, धर्म भेद से परे ‘सहिनांव’ मितान बन जाते हैं और ननिहाल आये बच्चों के लिए पूरा गांव मामा-मामी और नाना-नानी बन जाने की सौहार्द्रपूर्ण परम्परा की सम्पन्नता भी इस अंचल में है। खल्लारी में देवपाल नामक मोची ने छः सौ साल पहले मंदिर निर्माण कराया और उसे इस काम में राजा के साथ ब्राह्मण और कायस्थ जातियों का समर्थन और सहयोग मिला था।

धूमिल भित्तिचित्रों से मुखरित सदियों पुरानी चित्रकला
रामगढ़, सरगुजा की ख्याति नाट्यशाला और सुतनुका के लिये है किन्तु यहां एक और अनजाना सा दुर्लभ प्रमाण ऐतिहासिक चित्रकला का भी है, जो अजंता और बाघ की विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्रों से भी अधिक पुरानी है। चित्रों की रेखाएं ओर रंग धूमिल हो जाने से उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिली, जिसकी वे हकदार है, किन्तु उनका अस्तित्व आज भी विद्यमान है। छत्तीसगढ़ में कैप्टन टी. ब्लाश ने सन् 1904 में इन चित्रों का अवलोकन कर, इन्हें ‘‘दो हजार साल से भी अधिक पुरानी और संभवतः’’ भारत को प्राचीनतम भित्तिचित्र के प्रमाण माना। प्राचीनता के प्रमाण स्वरूप इनमें चैत्य गवाक्ष आकृतियां, दो पहियों वाली तीन या चार घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी और प्राचीन रूपाकार मानव चित्रित हैं। ये चित्र सफेद पृष्ठभूमि पर सिंदूरी जैसे रंग से बनाए गए हैं और मानव, हाथी और वृक्ष के लिए समान रंग प्रयोग में लाया गया है, जबकि रेखांकन काले रंग से किया गया हैं। आंख के स्थान सफेद छोड़े गए हैं जबकि बाल काले रंग से बने हैं और कहीं कहीं बाल को बांई ओर जूड़ा बंधा दिखाया गया है। वस्त्राभरण सफेद रंग के लाल रेखांकन से प्रदर्शित है। विभिन्न दृश्यों से अर्द्धवृत्त में लाल रेखाओं से विभक्त किया गया है। सबसे निचले भाग में पीले और लाल रंग से चित्रित अस्पष्ट दृश्य हैं। रामगढ़ की इस पहाड़ी में पाली में उत्कीर्ण है- सुतनुका व रूपदक्ष की गाथा। विश्व में भारतीय कला को प्रतिष्ठा दिलाने वाले कला मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने इन चित्रों की कलात्मकता और प्राचीनता को स्वीकृति देते हुए इन्हें प्रतिष्ठित किया है।

जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों की भूमि
लगभग दो हजार साल पहले बूढ़ीखार (मल्हार) में दान स्वरूप निर्मित कराई गई विष्णु की प्रतिमा को भारतीय मूर्तिकला में विष्णु की प्राचीनतम प्रतिमा का गौरव प्राप्त है। चतुर्भुजी विष्णु की मानवाकार प्रतिमा दण्ड, चक्र सहित है। बौद्ध तथा जैन प्रतिमा भी मल्हार तथा सिरपुर से बड़ी संख्या में मिली हैं।

शैव प्रतिमा का आंचलिक अनूठापन भी निर्विवाद है, चाहे ताला के ‘रूद्र शिव’ की पहचान और नामकरण का मामला विवादग्रस्त हो। पशु-पक्षियों से शारीरिक अंगों का रूपांकन और पूरे शरीर पर मानव मुख अंकित हैं। आठ फुट ऊंची यह प्रतिमा पांच टन से भी अधिक भारी है। इस प्रतिमा की विशिष्टता का साम्य मांढल (महाराष्ट्र) की शिव-प्रतिमाओं, चीन के गुहा शिल्प, नेपाल के तांत्रिक चित्रों और सेल्टिक पेंटिंग्स में तलाशने का प्रयास किया गया, किन्तु इस प्रतिमा के शिल्पशास्त्रीय और धार्मिक परम्परा का रहस्य इसके अनूठेपन को बढ़ाता है। शैव प्रतिमा निर्माण का स्थल सरदा (दुर्ग) भी कम विस्मयकारी नहीं है जहां उमा-महेश और अर्द्धनारीश्वर जैसी प्रतिमाओं में पाशर््िवक-विपर्यय हुआ है। यानि शास्त्रीय विधान में शिव के बाएं और इसी तरह बांया अर्द्धांग नारी का होता है किन्तु यहां इसे उलट कर व्यतिक्रम करते हुए मानों कोई समांतर शास्त्र की रचना हुई थी।

सुदीर्घ राजनैतिक स्थिरता का दुर्लभ इतिहास
रतनपुर, आज भी इस अंचल में राज और राजा के लिए सदैव न सिर्फ याद किया गया है, बल्कि राजशक्ति का पर्याय बन गया है क्यों न हो, कलचुरि, हैहय या चेदि वंश के नाम से ज्ञात संबद्ध कालखण्ड किसी एक राजवंश का संभवतः सर्वाधिक दीर्घ अवधि का राज्यकाल रहा है। पुराण-महाकाव्यों का महानायक सहस्रबाहु कार्त्तवीर्यार्जुन हुआ। इतिहास में हैहयवंशी महिष्मती में रहे, इसके बाद उनकी राजधानी त्रिपुरी (जबलपुर-भेड़ाघाट के निकट वर्तमान तेवर ग्राम) बनी। त्रिपुरी के कलचुरियों का प्रभाव कोसल अर्थात वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी रहा और संभवतः इस वंश के राजपुत्र दक्षिण कोसल के सामंत नियुक्त होते रहे। लगभग दसवीं सदी में इस वंश की एक शाखा ने दक्षिण कोसल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर, अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इनकी राजधानी तुम्माण (कटघोरा के निकट वर्तमान तुमान ग्राम) बनी। तुमान के राजधानी बनने में निश्चय ही इस स्थान की भौगोलिक स्थिति प्रमुख कारण थी। तुमान-खोल के पूरे क्षेत्र में प्रवेश और निकास का एक-एक मार्ग है बाकी पूरा भू-भाग दुुर्गम पहाड़ी से घिरा हुआ है। 

तुमान में आज भी प्राचीन मंदिर और सतखण्डा क्षेत्र में पुरावशेष उपलब्ध होते हैं। राजधानी समय के साथ परिवर्तित होकर रतनपुर आ गई, लेकिन कलचुरियों की यह शाखा रतनपुर के कलचुरियों के नाम से प्रसिद्ध होकर लगभग साढ़े सात सौ साल अखण्ड राज्य करती रही। बीच-बीच में त्रिपुरी कलचुरियों, चक्रकोट के नागवंशियों, बाणवंशियों, क्षेत्रीय मूल के स्थानीय राजाओं और अंततः मुगलों से संघर्ष और मनमुटाव हुआ, किन्तु यह राजवंश पीढ़ी पर पीढ़ी दान, स्थापत्य-निर्माण आदि की कीर्ति-पताका फहराते रतनपुर राजधानी से सन् 1740 तक राज्य करता रहा। इतनी सुदीर्घ अवधि तक अविच्छिन्न राज्य का इतिहास में यह अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है। 

नागपुर के भोंसला-मराठों के आगमन के पश्चात् भी उन्नीसवीं सदी तक इस वंश की शाखा सहित इसका प्रभाव बना रहा। रतनपुर के कलचुरियों की इस गौरव गाथा के प्रमाण रतनपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में पचासों अभिलेखों, हजारों-हजार सिक्कों और मूर्तियों, बहुसंख्यक मंदिर हैं जिसका कोई भी अंश प्रत्यक्ष पाकर उस गरिमामय सुदीर्घ कालखण्ड की झलक अभिभूत कर देने के लिए पर्याप्त साबित होती है।

छत्तीसगढ़ का ‘पाणिनी’-हीरालाल
आज हम जिस छत्तीसगढ़ी के लिए भाषा या बोली तथा उसके नियमित-वैज्ञानिक व्याकरण के विवाद में उलझ जाते हैं तब शायद यह तथ्य नजरअंदाज होता है या हम भूल जाते हैं कि पूरी एक सदी से भी अधिक पहले एक व्यक्ति ऐसा भी हुआ, जिसने तर्क-वितर्क या विवाद पैदा करने अथवा कोई नारा गढ़ने के बजाय अपनी प्रतिभा को पूरी लगन और समर्पण से छत्तीसगढ़ का व्याकरण तैयार करते हुए, मानों न सिर्फ छत्तीसगढ़ी का, बल्कि पूरे इस अंचल की जबान का गौरवशाली इतिहास रचा। यह मनीषी था- धमतरी के एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल का हेड मास्टर- हीरालाल काव्योपाध्याय।

छत्तीसगढ़ी व्याकरण का यह इतिहास एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य से जुड़ा हुआ है। लगभग सौ साल पहले जार्ज ए. ग्रियर्सन द्वारा कराया गया भारत का भाषा सर्वेक्षण पूरी दुनिया में किसी भी क्षेत्र में हुए सर्वेक्षणों में भाषा सर्वेक्षण का विशालतम पैमाना था। इस पूरे सर्वेक्षण के दौरान एकमात्र छत्तीसगढ़ी का वैज्ञानिक व्यवस्थित व्याकरण प्राप्त हुआ था और इसका गौरव-मंडन स्वयं ग्रियर्सन ने किया। यह व्याकरण प्राप्त होने पर ग्रियर्सन इतने रोमांचित और उत्साहित हुए कि उन्होंने हीरालाल काव्योपाध्याय के ससम्मान नामोल्लेख सहित इसे सन् 1890 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, शोध-पत्रिका के खंड-49, भाग-1 में अनूदित और सम्पादित कर प्रकाशित कराया। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी व्याकरण की यह परम्परा आगे सतत् विकसित होती रही। सन् 1921 में पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ने रायबहादुर हीरालाल के निर्देशन में इस व्याकरण को विस्तृत रूप से पुस्तकाकार प्रकाशित कराया। इसी परम्परा में बिलासपुर के डॉ. शंकर शेष और रायपुर के डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का कार्य भी स्मरणीय हैं।

धरती में गढ़ा इतिहास का अनमोल खजाना
धरती में गड़ा धन और खजाने की खोज की चर्चा भी रोमांचकारी होती है। किन्तु पुराने सिक्कों में दर्ज इतिहास का रोमांच भी कम नहीं होता, तभी तो प्रसन्नमात्र के ताम्बे के सिक्के के सामने इसी शासक के सोने के सिक्कों की कीमत दो कौड़ी जैसी हो जाती हैै।

मल्हार, बालपुर जैसे स्थानों में प्राचीन सिक्कों का ऐसा भूमिगत भंडार भरा है कि मल्हार में ‘संफरिया नांगर’ (जोड़ी में हल) चलाने का रिवाज नहीं है, हल चलाते हुए कभी भी, कुछ भी मिल सकने की उम्मीद जो बनी रहती है, और किंवदन्ती यह भी है कि कोटगढ़ के राजा के आह्वान पर मल्हार में सोने की बरसात हुई थी। बालपुर के लिये कहा जाता है कि वहां भू-गर्भ में पूरी दुनिया को ढाई दिन खिला सकने जितनी सम्पदा गड़ी हुई है। कोटमी-धुरकोट का साधु प्रसिद्ध है जो चिमटे से बिच्छू कमण्डल में डालकर चांदी के सिक्के बना देता था और रमल विचार कर यहां-वहां खुदाई की खबरें मिलती रहती हैं।

छत्तीसगढ़ व सीमावर्ती क्षेत्र से मिलने वाले ठप्पांकित या उभारकर सिक्के, एक तरह से अंचल की पहचान हैं क्योंकि एसे सिक्के सिर्फ इस अंचल से उपलब्ध हुए हैं, जो पूरी दुनिया के मुद्राशास्त्रीय इतिहास में अनूठे हैं। ये उभारदार सिक्के लगभग छठी सदी ई. के हैं। इन सिक्कों की प्राप्ति रायपुर जिला में खैरताल, पितईवंद, रीवां, महासमुुंद, सिरपुर से, बस्तर के एड़ेंगा से, दुर्ग के कुलिया से, रायगढ़ के साल्हेपाली से बिलासपुर के मल्हार, ताला, नन्दौर और तलवा से हुई है। संलग्न राज्य सीमाओं पर उड़ीसा के बहरमपुर, नहना, मारागुड़ा, मदनपुर-रामपुर, महाराष्ट्र के भण्डारा, बिहार के शाहाबाद व अन्य फुटकर स्थानों से मिलने के साथ-साथ उत्तरप्रदेश व पश्चिम बंगाल के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन सिक्कों में 215-महेन्द्रादित्य, 127-प्रसन्नमात्र, 4-क्रमादित्य, 29-वराहराज, 3-भवदत्त, 1-नंदनराज, 1-स्तंभ तथा 4 सिक्के संभवतः कुषाण तथा गुप्त शासकों से संबंधित हैं। इनमें संख्या की दृष्टि से बिलासपुर जिले के बाराद्वार के निकट तलवा से प्राप्त 81 स्वर्ण सिक्के से भी अधिक की प्राप्ति, ऐसे सिक्कों की विशालतम निधि है और मल्हार के ताम्बे का तथा ताला के चांदी का सिक्का अपने प्रकार के अकेले उदाहरण हैं।

अंचल से प्राप्त होने वाले सिक्कों के कुछ अन्य प्रमुख स्थान रायपुर में तारापुर, आरंग, खैरताल, दलाल सिवनी, रायगढ़ में बार और पाराडीह, दुर्ग में सिरसा, खैरागढ़ और रायगढ़ रियासतों में तथा बिलासपुर के अकलतरा, केरा, बछौद, चकरबेड़ा, केन्दा, पेण्डरवा, झझपुरी, भगोद, धनपुर आदि हैं। इनमें बिलासपुर जिले के सोनसरी से प्राप्त 600 सोने के सिक्के विशेष उल्लेखनीय हैं। छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट मुद्रा निर्माण तकनीक के ठप्पांकित सिक्के अन्यत्र दुर्लभ, मौलिक और असमान्तर कृतियां हैं। 

अक्षरों की कहानी, लिपि का रहस्य
छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में अक्षरों की अपनी कहानी है। उत्कीर्ण लिपियों का अपना रहस्य है, जो पूरी दुनिया को आकर्षित कर अंचल को गौरवशाली प्रतिष्ठा देता है। रामगढ़, गुंजी, किरारी और सीमावर्ती विक्रमखोल इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

प्राचीनतम रंगशाला, रामगढ़, जिला-सरगुजा के नाट्यमण्डप होने से दो राय हो सकती है, किन्तु सुतनुका देवदासी और देवदीन मूर्तिकार का अभिलिखित प्रणय-प्रसंग दो हजार से भी अधिक साल की प्राचीनता सहित आरंभिक उत्कीर्ण राग लेख है, संक्षिप्त किन्तु सम्प्रेषण-समर्थ -

सतुनुका। देवदाशिय। सुतनुका नाम देवदाशी।
तं कामयिथ बालुणसुएये देवदीन नाम लूपदखे।

लगभग दो हजार साल पहले इस अंचल में लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का भी प्रयोग हुआ, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभलेख का अब अंश ही सुरक्षित बच सका है, किन्तु हीराबंध तालाब से निकले इस लकड़ी के खंभे का महत्व समझकर स्थानीय ग्रामवासी पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी नकल उतार ली थी और उसे जांचकर तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने प्रामाणिक मानकर उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया, जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों का उल्लेख है।

सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गंुजी लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का नामोल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा, अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। अन्य अमात्य और दण्डनायक ने भी एक हजार गौओं का दान दिया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्न परम्परा को द्योतक हैै।

आंचलिक सीमा से संलग्न विक्रमखोल का चट्टान लेख हड़प्पाकालीन संकेतों और ब्राह्मी लिपि के बीच की कड़ी माने जाने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण और अनूठा प्रमाण है। 

मल्हार की कालधारा में पुरावशेषों की विविधता
सभ्यताओं के बनते-बिगड़ते इतिहास और वैभवशाली विशाल अट्टालिकाओें-प्रासादों का खंडहर में तब्दील होना मानों स्वाभाविक नियति-चक्र है, किन्तु हड़प्पायुगीन सभ्यता के नगर हों या मजमूली नक्शों में अंकित वीरान गांव, यह जिज्ञासा अवश्य जगाते हैं, कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय के साथ मिट्टी को परतों में दबकर कोई स्थान इतिहास का पन्ना बनकर रह गया। विस्मयकारी यह भी है कि कोई सात-आठ किलोमीटर की परिधि कालक्रम और अवशेषों की विविधता से इतनी सम्पन्न हो, जैसा मल्हार। विशाल और विख्यात कोई भी पुरातात्विक स्थल विविधता की दृष्टि से मल्हार के सीमित किन्तु सघन क्षेत्र के सामने बौना लगने लगता है।

मल्हार और निकटवर्ती ग्रामों जैतपुर, बूढ़ीखार, नेवारी, बेटरी, जुनवानी आदि से अब तक प्रकाश में आये पुरावशेषों को देखकर लगता है कि धरती का यह छोटा सा हिस्सा सदैव प्रबल आकर्षण का केन्द्र रहा और सभ्यता-संस्कृति के सभी कर्ताओं को अपने अंक में पाला-पोसा है। मल्हार में प्राचीनता के प्रमाणस्वरूप सागर विश्वविद्यालय द्वारा कराये गये उत्खनन से लगभग अट्ठाइस सौ साल पुरानी बसाहट के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। महामाया खोदा गया तो पातालेश्वर मंदिर निकट आया और भीमा-कीचक टीला खुदा तो देउर मंदिर निकल आया। किसानों को तो विशेषकर भसर्री क्षेत्र में कुआं खोदते हुए पुराना रेडीमेड पक्का कुआं मिल जाता है, तो कहीं नींव खोदते हुए पत्थर की बनी बनाई प्राचीन नींव। हल चलाते हुए धातु, पत्थर, मिट्टी, इंट का कोई पुरावशेष मिल जाता है तो बरसात में पानी के कटाव से सिक्के निकल आते हैं। यानि पूरा सिलसिला है पत्थर, तांबे, मिट्टी पर उकेरे-उभरे हजारों शब्दों का भण्डार- शिलालेख, ताम्रपत्र, मूर्तिलेख, राजमुद्रा और मुद्रांक, इसके आगे पत्थर और मिट्टी पर गढ़ी गई मूर्तियां हैं। मंदिर और स्थापत्य के अनेकानेक नमूने हैं। 

पत्थर और मिट्टी की गुरिया, मनके, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, सोने, चांदी, तांबा, सीसा और पोटीन के सिक्कों का तो अकूत भंडार है यहां। यह भी कम आश्यर्चजनक नहीं कि काल की दृष्टि से इन सामग्रियों का क्रम अनवरत है। मल्हार के जिक्र में वहां से शंख के जीवाश्म की प्राप्ति इस स्थल की पहेली को अधिक अबूझ बना देती है तो भूगर्भ में विद्यमान संभावनाएं इस समृद्धि का अनुमान लगाने में भी मानव-मस्तिष्क को अचंभित कर जड़ कर देती हैं।

ईंटों पर रचा तकनीक का काव्य
भारतीय स्थापत्य कला के इतिहास में राजिम, ताला और जांजगीर के पाषाण-निर्मित मंदिरों का अपना-अपना विशिष्ट स्थान है। राजिम में राजीव लोचन मंदिर का शिखर शैलीगत आरंभिक स्थिति का प्रमाण है तो ताला के जिठानी और देवरानी मंदिर की निर्माण योजना अत्यंत विशिष्ट संरचना है। आरंभिक काल के इस उदाहरणों के पश्चात लगभग 12 वीं सदी का जांजगीर का भीमा मंदिर या विष्णु मंदिर स्थापत्य विकास का चरमोत्कर्ष है जहां जंघा के साथ-साथ जगती पर भी आदमकद प्रतिमाएं जड़ी हैं। लेकिन इस अंचल ने तारकानुकृति मंदिरों की योजना को ईंट माध्यम का प्रयोग कर साकार किया है तथा स्थापत्य इतिहास में जो प्रतिमान रचे हैं उनका कोई साम्य नहीं मिलता।

खरौद का शबरी और इन्दल देउल, सिरपुर का लक्ष्मण और राम मंदिर, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, धोबनी का चितावरी मंदिर, पुजारीपाली के केंवटिन और गोपाल मंदिर, यह पूरी श्रृंखला ईंटों पर बारीक नक्काशी और साफ जुड़ाई अनूठी है। अष्टकोणीय भू-योजना का अड़भार मंदिर और ताराकार ईंटों के उल्लिखित मंदिरों सहित भोरमदेव का भग्न मंदिर और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर की कोणिक रचना-पद्धति को कोसली नामकरण सहित शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

इन मंदिरों की निर्माण प्रक्रिया के लिए अनुमान है कि बिना पकी उकेरी गई ईंटों को पतली छनी गीली मिट्टी को जुड़ाई के लिए इस्तेमाल कर पूरी संरचना तैयार कर ली जाती थी और इसके बाद पूरी रचना भट्ठी लगाकर उसे पकाया जाता था। यह अनूठी स्थापत्य योजना व अभिकल्प और प्रयोग हमारी वैचारिक तकनीकी सम्पन्नता का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए सक्षम उदाहरण है।

देश में राजस्व व्यवस्थापन की छत्तीसगढ़ी गुरूआत
देश के इतिहास में राजस्व भू-व्यवस्थापन के साथ सदैव अकबर और उनके नवरत्नों में से एक राजा- टोडरमल को याद किया जाता है, किन्तु हम स्वयं भी अक्सर अपने क्षेत्रीय गौरव कलचुरि शासक कल्याण साय की जमाबंदी को भूल जाते हैं। कल्याण साय (सन् 1550) के जमाबंदी की पृष्ठभूमि निश्चय ही अकबर से पहले की है।

इस जमाबंदी में दर्ज ऐतिहासिक राजस्व व अन्य राजकीय सूचनाओं का महत्व अंग्र्रेज अधिकारियों ने पहचाना। सन् 1861-68 के दौरान (पहला) सेटिलमेंट करते हुए मि. चीजम ने इसी जमाबंदी को अपने कार्य का आधार बनाया और फिर सन् 1909-10 में बिलासपुर जिला गजेटियर तैयार करने के सिलसिले में मि. नेल्सन द्वारा इसकी खोज की गई, यह मूल अभिलेख न मिल पाने के फलस्वरूप ढेरों जानकारियां जो मि. चीजम ने उद्धृत की थीं, ज्यों की त्यों इस्तेमाल कर गजेटियर पूरा किया जा सका। कल्याण साय की जमाबंदी तत्कालीन, अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियों का दस्तावेज है, जिसके अनुसार रतनपुर राज के गढ़ों यानि सिर्फ खालसा क्षेत्र से साढ़े छह लाख रूपये का राजस्व वसूल होता था, तब के रूपये का मूल्य अनुमान कर तत्कालीन सम्पन्नता समझी जा सकती है। कल्याण साय की सेना में बंदूकधारियों (मैचलाक) सहित 14,200 सैनिक थे और 116 हाथियों की फौज अलग थी। 

कल्याण साय की जमाबंदी से तत्कालीन इतिहास की जो तस्वीर उभरती है, उससे इस क्षेत्र के नामकरण के पीछे छत्तीस प्रशासनिक इकाईयां गढ़ ही आधार बनीं, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता। इस दृष्टि से यह अभिलेख और भी प्रासंगिक हो जाता है। तत्कालीन गढ़ चौरासी गांवों का परम्परागत समूह होता था और इसके प्रभारी दीवान कहलाते थे। आगे विभाजन बियालिस, चौबीसा, बरहों में होता था और इन समूहों में ग्रामों की संख्या सदैव नियमित होना आवश्यक नहीं था लेकिन अंतिम इकाई गांव ही होती थी। जमाबंदी में अड़तालिस गढ़ नामों को अलग-अलग संख्या में समूह-वर्गीकरण कर इस संख्या को छत्तीस बनाया गया है, जिसमें वर्तमान जमींदारियां भी शामिल है। इन्हीं गढ़ों की व्यवस्था तीन परगनों में बदल गई। इन परगनों बिलासपुर (रतनपुर), मुंगेली (नवागढ़) व शिवरीनारायण (खरौद) के अंतर्गत ग्रामों की संख्या क्रमशः 241, 482 व 145 थी। कलचुरियों के सुदीर्घ और निर्विघ्न राज्य का प्रमुख आधार संभवतः उनका यहां व्यवस्थित और सुसंगठित राजस्व-व्यवस्थापन था, जो छत्तीसगढ़ के नामकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण और इतिहास में प्राचीनता की दृष्टि से अनूठा हैै।

आंकस ग्राम देवताओं की भूमि
आधी रात के बाद गांव की गली में टपा-टप घोड़े की टाप सुनाई पड़ती है। सात हाथ का झक्क सफेद घोड़ा और सवार भी सफेद धोती-कुरता पहने, सफेद ही पागा बांधे चला जा रहा है। इसे किसी ने आज तक सामने से नहीं देखा और देखा तो बचा नहीं। बड़े बुजुर्ग बताते हैं देव है, गांव का मालिक देवता, ठाकुर देव, बड़ा देव। गांव की निगरानी में निकलता है। सीवाने के देवता अंधियारी पाठ को ताकीद करने। 

ठाकुरदेव सहित अन्य सभी देवता आज भी उतने की जागृत हैं, जितनी हमारी मौलिक सांस्कृतिक चेतना। छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं का मण्डल व्यापक और सुरक्षित है। ग्राम देवताओं की पूजा-उपासना पद्धति व संबंधित भाषा विशिष्टता में यहां की वर्तमान समेकित संस्कृति के मूल घटकों-उपादानों की पहचान हो सकती है। ठाकुरदेव और बड़ादेव जैसा ही महत्वपूर्ण देवता बूढ़ादेव है। बूढ़ादेव के साथ बढ़ावन की मान्यता होती है, जो पत्थर की गोल गोटियां हैं। वार्षिक उत्सव बार के अवसर पर बढ़ावन की पूजा होती है। पर्यावरण-सजग कोल समुदाय के वन्य ग्रामों में ग्राम से संलग्न वन खंड, अधिकतर शाल वृक्ष समूह में ‘सरना’ स्थापित-मान्य होता है। इसे अत्यंत पवित्र और जागृत क्षेत्र माना जाता है। ग्राम व क्षेत्र की मनोरंजन-गोष्ठियां और सामान्य बैठक से लेकर पंचायत-फैसले, देव-साक्ष्य में सरना में होते हैं, साथ ही सरना राहगीरों को रात्रि विश्राम के लिए शरण भी देता है।

उजाड़ वीराना, टीलों में डीह, डिहवार या डिहारिन दाई की मान्यता होती है। मातृ शक्तियों के रूप माताचौंरा या महामाया सामान्य रूप से लगभग प्रत्येक गांव में विद्यमान हैं। मातृकाओं में सतबहिनिया और अक्कइसो बहिनी भी पूजी जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में सतबहिनियां का नाम जयलाला, बिलासिनी, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासूली और चण्डी मिलता है, जबकि छत्तीसगढ़ अंचल में सतबहिनिया को चेचक या सात माता, बूढ़ी मां, मटारा, लोहाझार, कथरिया, सिंदुरिया, कोदइया और आलस के नाम से भी पूजा जाता है। अन्य प्रचलित देवियां- कमलई, समलई, महलई, खमदेई, कोसगई, केन्दई, विशेसरी, सत्ती, चण्डी, मावली, कालिका, कंकालिन, परेतिन दाई, रात माई, आदि हैं, जो ग्राम के मध्य, थाना-गुड़ी या सीवाने पर हो सकती हैं।

ग्राम देवताओं के पुजारी बैगा, गुनिया, देवार, सिरहा आदि नाम से जाने जाते हैं, इनमें ठाकुर देव और बाहुकों जराही-बराही के साथ परउ बैगा की मान्यता होती है कुछ क्षेत्रों में बैगा के सहायक होमदेवा भी होते हैं, जो केवल होम दे सकते हैं। देव-आह्वान का अधिकार मात्र बैगा का होता है। परऊ बैगा जैसी ही प्रतिष्ठा दइगन गुरू, राउतराय, बिरतियाबावा, लाल साहब, संवरादेव, सौंराइनदाई की है जबकि गोंड जनजाति में परगनिहा और कुमर्रा देव प्रचलित हैं। अन्य बैगा देवता, सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजऊ, लतेल, ठंडा आदि हैं। इसी प्रकार की प्रतिष्ठा मुनिबाबा, पांडेदेव, धुरूआदेव की भी होती है।

बाबा देवताओं में सिद्ध या सीतबावा, बरम, भैरो, मुड़िया, अघोरी, कलुआबावा आदि हैं। पाट या पाठ देव अधिकतर वृक्ष देवता हैं, जिनमें कुर्रु, बासिन, डूंगर, कोटरा, सिंहासन, भंवर, अंधियारी, अंजोरी, बघर्रा, डोंगा, बइहार, नगनच्चा आदि पाठ हैं। कुकुरदेव को बंजारों का देवता और बंजारी देवी को वन देवी माना गया है। ग्राम के प्रभारी प्रतीक दाऊ साहब और रियासत जमीदारियों की दन्तेश्वरी, सरंगढ़िन, कुदरगढ़िन, चांगदेवी आदि हैं। मार्ग सूचना या यात्रा संकल्प के देव ओंगनापाठ, चिथरीदाई, चिरकुटी, ढेलादेव आदि हैं। अन्य कुछ देवताओं में हरदेलाल, घोड़ाधार, सांढ-सांढ़िन, साहड़ादेव, नागदेव, चिरकुटी, खूंटदेव, मेंड़ोदेव, खरकखाम्ह, अखराडांड, गौरइया, धूमनाथ, चितावारी, ठेंगहादेव से डॉक्टरदेव तक विस्तृत सूची है। छत्तीसगढ़ के लोक संसार का इन देवताओं के प्रति आत्मीय साहचर्य तब प्रकट होता है, जब देवताओं से कथित भयभीत होकर उन्हें सम्मान देने वाला जनमानस वर्षा के लिए देवता को गोबर या मिट्टी लीप-पोत कर या धूप में बाहर निकालकर सजा भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय और मौलिक संस्कृति की सच्ची पहचान के लिए ग्राम देवताओं के विस्तृत और गहन सर्वेक्षण शोध आवश्यक है, क्यांेकि इसी बिन्दु को पहचान कर हम सृष्टि में अपनी सहोदरा प्रकृति और अंग्रेजों से स्वयं तक की सांस्कृतिक अनेकता में एकता के सूत्र पा सकते हैं।

पर्यावरणीय चेतना के बीज
कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ होगा, जिस दिन पहला पेड़ कटा और पर्यावरण का संकट तब पैदा हुआ, जब आरे का इस्तेमाल शुरू हुआ। तात्पर्य यह कि पर्यावरण का असंतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से नहीं बल्कि दोहन के कारण होता है। इस दृष्टि से मिथकीय दन्तकथाओं का हमारा सार्थक और सम्पन्न संसार है। कृष्ण-मोरध्वज का प्रसंग और आरे की कथा भूमि में आरे का प्रयोग निषिद्ध मानकर, इस अंचल ने अपनी पर्यावरणीय चेतना और दूरदर्शिता का परिचय दिया।

कथा संक्षेप में यह है कि राजा मोरध्वज द्वारा कृष्ण को दिये गए वचन के पालन में, उसने अपना आधा शरीर आरे से चिराकर दान देना चाहा, इसके लिए आरे को एक ओर रानी कुमुद देवी ने और दूसरी ओर पुत्र ताम्रध्वज ने संभालकर आरा चलाना शुरू किया। कृष्ण ने देखा कि राजा मोरध्वज की बांयी आंख से आंसू बह रहा है। इस पर कृष्ण ने दान ग्रहण करने से मनाही की, किन्तु राजा ने इसका कारण बताया कि बांये अंग को इस बात का दुख हो रहा है कि केवल दायां अंक ही समर्पित हो पा रहा है, बांये अंग का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। मोरध्वज को हैहय-कलचुरि राजाओं का पूर्वज माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि रतनपुर कलचुरि शासकों की नाक के ऊपर से कपाल के पिछलेे भाग तक आरे से चिरा जैसा चिन्ह हुआ करता था। 

स्थान नाम आरंग की व्युत्पति को भी आरे और इस कथा से संबद्ध किया जाता है और परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ के निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। मि. चीजम ने उल्लेख किया है कि इस अंचल में आरे का प्रचलन मराठा शासक बिंबाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। अंचल में आरे के प्रयोग को निकट अतीत में भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था और आरा चलाने वाले ‘अरकंसहा’ को महत्व देने के बाद भी उनके पेशे को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया है।

परम्परा का इतिहास और इतिहास की परम्परा
कहा जाता है कि कहानी से बड़ा सच और इतिहास से बड़ा झूठ कुछ नहीं होता। कहावत है, तो सच्चाई भी होगी और सच न हो तो कोई ईमानदार दृष्टिकोण तो जरूर होगा। इस सिलसिले में जब विदेशी आलोचना करते हैं कि हमें इतिहास-बोध नहीं हैं, हम इतिहास के बदले पुराण और किस्से-कहानी सुनाने लगते हैं, तो इस विसंगति की ओर ध्यान जरूर जाता है कि यह आलोचना उन्हीं की ओर से आ सकती है, जिनका न कोई इतिहास है न कोई पुराण। अपनी अविच्छिन्न परम्परा से हम सनातन हैं और इतना सुदीर्घ इतिहास अगर निरन्तर विकाशील है तो वह परम्परा में ही बदल सकता है, वस्तुतः इतिहास और परम्परा किसी तथ्य अथवा घटना के दो लगभग विपरीत किन्तु दोनों सार्थक दृष्टिकोण हैं, परम्परा से जुड़ा व्यक्ति विषयगत हो जाता है तो बाहरी इसे प्रति अपनी नामसझी से इसे कपोल-कल्पना साबित करने में जुट जाता है।

दरअसल पारम्परिक मान्यताएं ही सांस्कृतिक सूत्र के झीने ताने-बाने हैं जो समष्टि सोच की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। छत्तीसगढ़ में घुग्घुस राजा, दामा धुरुआ, लोहार रानी, कुम्हार राजा, भोंसला राज केवल कल्पना नहीं सार्थक शब्द हैं। छमासी रात का मंदिर, सतजुगी मंदिर, रतनपुर राज का मंदिर, काल निर्धारण की हमारी निजी शैली है। नये मिट्टी के ठीकरों से पण्डवन चुकिया की अलग पहचान के लिये सदैव पुराविद होना आवश्यक नहीं होता। बरात का पत्थर में तब्दील हो जाना और बरतिया भांठा के अपने अर्थ हैं। देवरहा, जोगीडीपा, पुतरा-पुतरी, खइया और गंगार में गहरे संकेत हैं। माची पखना, झांपी पखना और छंकना पथरा में भिन्नता है। जिठानी-देवरानी, ममा-भांचा, भीमा-कीचक सिर्फ रिश्ते और नाम नहीं इसके आगे के भेद का पता देते हैं। 

सोने की बरसात, डीह, डोंगा, कुकुरदेव और नायक बंजारा, मंदिर का कलश चढ़ने के पहले सूर्योदय या भाई-बहन का साथ-साथ मंदिर न जाना, गुड़ी, ठाकुरदेव, महामाया या माताचौंरा, छः आगर छः कोरी तलाब, अड़बंधा तलाब और सतखंडा तलाब या महल, अड़भार (अष्टद्वार) और बारादुआर (द्वादशद्वार) ऐसे न जाने कितने शब्द है, जिससे हम अपनी संस्कृति से अपनी आत्मीय समझ के साथ संबद्ध हैं। यह कहा जा सकता है कि जिसे ये शब्द आत्मीय लगें वही दरअसल छत्तीसगढ़िया है और जिसे भदेस या बेगाने लगे वह अपनी पहचान स्वयं तय करे।

छत्तीसगढ़ इसी प्रकार के शब्द और परम्परा-मान्यताओं से सम्पन्न है, जिसके माध्यम से लोक समझ का संसार स्पंदित रहता है। एक दृष्टिकोण यदि किसी ऐतिहासिक स्थल या सामग्री को खंडित, भग्न या खंडहर मान लेता है तो इस अंचल की जन-चेतना में जीवन शैली बनकर अंगीकार हो गया है। शुष्क इतिहास को जीवन परम्परा बनाकर युगों-युगों की सांस्कृतिक उपलब्धियों की संघटित धारणा से सम्पन्न और शास्त्रीय प्रतिमानों में मौलिक संवेदना से प्रवहमान गति संचार हमारी विशिष्टता है।

खरौद के मंदिर में अद्वितीय गंगा-यमुना
भारतीय संस्कृति में मंदिर, मात्र धार्मिक श्रद्धा के केन्द्र नहीं बल्कि सुदीर्घ और सम्पन्न अवधारणा का मूर्तन हैं, इसलिए प्रतिमा रहित, अधूरे छूटे या भग्न खण्डहर भी आकर्षण के केन्द्र और दर्शनीय होते हैं, बल्कि शायद पूजित मंदिरों की गहमा-गहमी के माहौल में जो चीजें छूटती हैं, वे खण्डहरों के गहरे सन्नाटे में उपलब्ध हो जाती हैं।

मंदिर स्थापत्य के स्पष्ट उदाहरण लगभग चौथी सदी से मिलने लगते हैं। आंरभिक मंदिरों में एक कक्ष ईश्वर के लिए होता है, जो प्रवेश द्वार से स्तंभ आश्रित खुले मंडप से संलग्न होता है। इन मंदिरों का ऊपरी भाग यानि छत सपाट है। शिखर का विकास उत्तरोत्तर हुआ है। मंदिर स्थापत्य में विकास के साथ उसकी रचना और अवधारणाएं दोनों, परिवर्धित होकर संश्लिष्ट होती गई और सबसे महत्वपूर्ण भाग बना गर्भगृह का प्रवेश द्वार, जिसमें से गुजर कर व्यक्ति, भक्त समूह से पृथक होकर, गर्भगृह में एकाकी प्रवेश करता है और मानों पुनर्जन्म प्राप्त कर लौटता है, इस बिन्दु पर भक्त और भगवान के बीच का अन्तर नाममात्र रह जाता है।

यह प्रसंग छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में खरौद के तीन मंदिरों- इंदल देउल, लक्ष्मणेश्वर और सौंराई मंदिर से जुड़ा हुआ है। मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गज-लक्ष्मी, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, गणेश, सप्तमातृका नवग्रह, द्वादश-आदित्य आदि का अंकन धरन की क्षैतिज शिला यानि सरदल पर हुआ करता है तथा दोनों उर्द्ध बाजुओं अर्थात् द्वारशाखा पर नदी देवी गंगा-यमुना सहित द्वारपाल, ऊपर विभिन्न शाखाओं, यथा- रूपशाखा, मिथुनशाखा, पत्रशाखा आदि, विभाजन होता है। फर्श पर उदुम्बर-शिला में कल्पवृक्ष या लक्ष्मी अंकित होती हैं। इन अंकनों का अभिप्राय यह है कि भक्त कल्पवृक्ष से ऊपर उठकर, प्रतिहारियों द्वारा अशुभ शक्तियों के निवारण से गर्भगृह प्रवेश की इच्छा करता है वैसे ही गंगा-यमुना (अर्थात पवित्र संगम-जल) उसका अभिषेक करती हैं और ग्रह, नक्षत्र, देव-राशि उसके पक्ष में हो जाते हैं। 

मंदिरों के प्रवेश द्वार पर नदी-देवियों का अंकन गुप्त काल से आरंभ हो गया था किन्तु इस शास्त्रीय परम्पराओं में जो आंचलिक प्रयोग खरौद में हुआ है, वह पूरी भारतीय कला में दुर्लभ है। सौंराई मंदिर की द्वारशाखा के निचले लगभग तिहाई भाग मंे गंगा-यमुना हैं तो लक्ष्मणेश्वर में परम्परागत अगल-बगल के बजाय, आधे ऊपरी द्वार शाखा में नदी देवियां और निचले आधे भाग में द्वारपाल हैं और सर्वाधिक विलक्षण और दुर्लभतम उदाहरण इंदल देउल में है, जहां पूरी द्वारशाखा की लम्बाई-चौड़ाई गंगा और यमुना की मानवाकार प्रतिमाओं से पूरित है, यह भारतीय स्थापत्य का अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है।

ताला के मंदिर
मंदिर वास्तु की संरचना भारतीय मनीषा का ठोस और जीवन्त प्रतीक हैं। भारतीय मंदिर वास्तु का नियमित इतिहास गुप्तों के स्वर्ण युग के आरंभ होता है, उदयगिरी (विदिशा) और सांची के मंदिर के बाद क्रमिक विकास का उत्स उत्तर भारत के खजुराहो, उड़ीसा के भुवनेश्वर और दक्षिण भारत के मदुरै जैसे कला केन्द्रों में परिलक्षित होता है। हालांकि छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आरंभिक मंदिरों का स्वरूप प्राप्त नहीं हुआ है, किन्तु प्रसिद्ध पुरातात्विक केन्द्र ताला के प्रकाश में आने के बाद स्थापत्य के क्रमिक विकास की अनहोनी और शास्त्रीय सीमा के अन्तर्गत ऐसा व्यतिक्रम उद्घाटित हुआ कि यह पूरे विश्व के प्राच्य-विद्या विशारदों को अंचभे में डाल दिया।

शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के निकट मनियारी बसंती संगम पर छठी सदी ई. के दो स्मारक टीले जिठानी-देवरानी, सिद्ध-बाबा और देउर नाम से जाना गया, यह अमेरीकांपा ग्राम सीमा में तालाखार में स्थित है। इस स्थल का पहला ज्ञात उल्लेख 1873-74 में मि. बेगलर ने किया। छठें दशक में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इन खण्डहरों को निजी-नोट््स में दर्ज किया। सातवें दशक में डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इनकी जानकारी सार्वजनिक की। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 1980 में अमरीकी शोधार्थी डोनाल्ड स्टेडनर ने ताला के देवरानी मंदिर का छायाचित्रों और रेखाचित्र सहित प्रकाशित कराया और इसके पश्चात प्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग की उपलब्धियां हुई।

ताला के जेठानी मंदिर का स्थापत्य नासिक, भाजा, कार्ले के चैत्य वास्तु की झलक युक्त है। विलक्षण दक्षिणामुख इस मंदिर में पूर्व व पश्चिम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। मंदिर में विशाल आकार के पाषाण स्थापत्य खंडों पर विविध आकृति भाव व अलंकरणयुक्त गुणों का अंकन अनूठा है। देवरानी मंदिर पूर्वाभिमुख गर्भगृह अंतराल और मुखमंडप वाली संरचना है। प्रवेश द्वार की बारीक और सूक्ष्य नक्काशी जाली का काम अत्याकर्षक है तथा द्वारशाखा पार्श्वों में कीर्तिमुखों के रौद्र भाव के लिये कोमल पुष्प-पत्रों का अभिकल्प प्रयुक्त हुआ है। रूद्र शिव की प्रतिमा आकार के साथ, विभिन्न मानवमुखों युक्त तथा जीव-जंतुओं को मुख व अंगों में प्रदर्शित किया गया है।

ताला से प्राप्त छठी सदी ई. के शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का सिक्का निश्चित तौर पर ज्ञात इस शासक का एकमात्र रजत सिक्का है। ताला प्रतिमाशास्त्र में भी गहन शोध अध्ययन की आवश्यकता है, तभी भारतीय वास्तु व कला इतिहास के इस विशिष्ट अध्याय से देश व अंचल के इतिहास का गौरव प्रतिपादन हो सकेगा।

सूर्य पुत्र रेवन्त के मंदिर की मिसाल, बेमिसाल 
प्रकृति-पूजा की परम्परा, हमारे देश में आदिकाल से रही है और उसमें सूर्य की प्रखरता ने पूरे विश्व की धार्मिक भावना को चकाचौंध कर उभारा है। वेदों में सूर्य का स्थान इंद्र और वरूण के साथ तीन प्रमुख देवताओं में है।

मंदिर स्थापत्य में सूर्य के अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर अल्प संख्या में किन्तु विभिन्न क्षेत्रों में विद्यमान हैं। उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर, राजस्थान के बरमान और ओसियां के मंदिर, गुजरात में प्रभासपाटन के निकट तथा मोढेरा का मंदिर, कश्मीर का मार्तण्ड मंदिर और दक्षिण भारत के त्रिकूट मंदिर सूर्य के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिहार में देव का मंदिर भी विख्यात है तथा वहां सूर्य-षष्ठी पर सूर्य की पूजा लोक जनजीवन में रचा बसा है। मध्यप्रदेश में मंदिरों की नगरी खजुराहो में चित्रगुप्त मंदिर, वस्तुतः सूर्य मंदिर ही है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी सरगुजा जिले के डीपाडीह और रायपुर जिले के नारायणपुर में सूर्य-आदित्य के मंदिर विद्यमान हैं तथा बिलासपुर जिले के मल्हार से प्राप्त एक आकर की विविध सूर्य प्रतिमाएं, वहां द्वादश आदित्य मंदिर की प्रबल संभावना प्रकट करती है।

इस परिप्रेक्ष्य में अकलतरा के शिलालेख में एक अत्यंत दुर्लभ उल्लेख प्राप्त होता है, जो पूरे भारतीय स्थापत्य में बेमिसाल है वह है रेवन्त का मंदिर। रेवन्त के एकमात्र मंदिर के निर्माण का विवरण इस शिलालेख में मिलता है, जिसमें रेवन्त को सप्ताश्र्व (सूर्य) का पुत्र कहा गया है। मंदिर निर्माता के रूप में कलचुरि शासकों के सामंत हरिगण के पुत्र वल्लभराज का नाम मिलता है। वल्लभराज निश्चय ही कलचुरि राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति था, क्योंकि कलचुरि शासकों के अन्य अभिलेखों में उसका नाम आया है साथ ही उसके द्वारा वल्लभसागर तालाब तथा अन्य सार्वजनिक, धार्मिक कार्य कराये जाने की जानकारी मिलती है। रेवन्त को शिल्प में अधिकतर शिकार यात्रा पर दिखाया जाता है। रेवन्त, बड़वारपी संज्ञा, जो विश्वकर्मा की पुत्री और सूर्य की सर्वप्रधान पत्नी थी, के गर्भ से उत्पन्न गुहों का अधिपति माना जाता है। पुराणों के अनुसार राजा लोग तोरण प्रान्त में प्रतिमा या घर में सूर्य पूजा की विधि के अनुसार रेवन्त की पूजा करते हैं। शिलालेख में उल्लिखित इस रेवन्त मंदिर का मूल स्थान संभवतः कोटगढ़ अथवा महमंदपुर में रहा होगा। मंदिर के प्रवेश द्वार, शिखर व अन्य स्थापत्य खंडों के साथ कोटगढ़ के द्वार पर देव-कोष्ठ में स्थापित सूर्य की प्रतिमा एकमात्र ज्ञात रेवन्त मंदिर का मुख्य अवशेष है।

छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग
सोमवंश का शासक, महाशिवगुप्त बालार्जुन का लगभग तेरह सौ साल पुराना इतिहास छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग माना जाता रहा और इस मान्यता पर मुहर लगी, जब सिरपुर से इस शासक के 27 ताम्रपत्रों (9 सेट) की निधि एक साथ मिली। किसी एक ही शासक के इतने प्राचीन ताम्रलेख इस तादाद में अब तक कहीं नहीं प्राप्त हुए हैं (विश्वसनीय जानकारी के अनुसार इस निधि में ताम्रपत्रों की संख्या इससे भी अधिक थी), यह प्राप्ति केवल संख्या की दृष्टि से ही उल्लेखनीय नहीं हैं, बल्कि यह तत्कालीन छत्तीसगढ़ के स्चर्ण युग की गौरव-गाथा का अमूल्य अभिलेख है। महाशिवगुप्त बालार्जुन, सोमवंश में उत्पन्न हुआ और वंशानुगत वैष्णव धर्म से भिन्न शैव धर्म के सोम सम्प्रदाय का अनुयायी बनकर, अपने पूर्वजों के विपरीत स्वयं को परम भागवत के बदले परम माहेश्वर कहलाने लगा, किन्तु उसके राजस्व काल में माता वासटा द्वारा बनवाया गया विष्णु मंदिर, जो अब सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के नाम से जाना जाता है और बौद्ध आचार्यों को उसके द्वारा दिये गए दान से, उसकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है।

वासटा के सिरपुर शिलालेख की प्रशस्ति, अतिशयोक्तिपूर्ण होगी, किन्तु इस महान शासक के सद्गुणों, क्षमता और शक्ति का साफ अनुमान जरूर होता है। इस शिलालेख के अनुसार ‘धर्मावतार दिखाई पड़ने वाले महाशिवगुप्तराज ने पृथ्वी को जीत लिया। यह भीष्म पितामह से भी महान होगा, पराक्रम से आचार्य द्रोण को जीतेगा, तब रण में सामना करने के लिए कौन इसके लिये समान बल वाला कर्ण बनेगा। इस प्रकार बालार्जुन को अस्त्र विद्या में सभी को जीतने वाला और कुशल मानकर शत्रुओं ने अपने जीवन की इच्छा छोड़ दी, सम्पत्ति की इच्छा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। कृष्ण भी इस बालार्जुन के समान नहीं थे और न ही भावी कल्कि ही इसके समान हो सकेंगे।’

महाशिवगुप्त बालार्जुन की सिरपुर ताम्रपत्र निधि के अलावा बरदुला, बोंडा, लोधिया से एक-एक तथा मल्हार से तीन ताम्रलेख, सेनकपाट और मल्हार शिलालेख के साथ-साथ सिरपुर से विभिन्न शिलालेख प्राप्त होते हैं। मल्हार (वस्तुतः जुनवानी) से प्राप्त अब तक ज्ञात उसके अंतिम 57 वें राज्यवर्ष के ताम्रलेख में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनाओं सहित, अत्यंत रोचक विवरण आता है, जिसमें भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया है तथा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर होगा। संभवतः तब भी यह किस्सा प्रचलन में रहा होगा, जिसमें राजधानी सीमा में राजा द्वारा ब्राह्मण को एक खाट के बराबर भूमिदान की चर्चा होती है, किन्तु बाद में दान प्राप्तकर्ता ने खाट की रस्सी खोलकर पूरे राजमहल को घेर लिया था।

सिरपुर ताम्रपत्र निधि से मिलने वाली ऐतिहासिक जानकारी के साथ ही तत्कालीन राजधानी श्रीपुर में राज परिवार के सदस्यों द्वारा दिये गये दान का जिक्र है और यहां शैव सम्प्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है और विभिन्न शैव-आचार्यों की गुरू-शिष्य परम्परा के नाम यथा अघोरशिव, दीर्घाचार्य, व्यापशिवाचार्य मिलते हैं जबकि जुनवानी ताम्रलेख में सोम सिद्धांत के आचार्यों भीमसोम, तेजसोम, रूद्रसोम और सोमशर्मा जैसे नाम मिलते हैं। निःसंदेह महाशिवगुप्त बालार्जुन इन्हीं शैव-सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर परम माहेश्वर की उपाधि का धारक बना था।

टीप
प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और परंपराओं को एकजुट कर अंचल को समझने के प्रयास में छत्तीसगढ़ के विभिन्न पक्षों पर मेरा यह नोट किश्तों में, कभी समग्र रूप से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में छपा, जिसमें से उल्लेखनीय दैनिक भास्कर, बिलासपुर में 9 से 29 मई 1998 के बीच 20 किश्तों में छपा, इसे कुल 36 किश्त छपना था, लेकिन अटक गया। पुनः मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी के समवेत उपक्रम की द्विमासिक पत्रिका ‘रचना‘ के छत्तीसगढ़ राज्य गठन के विशेष अंक, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित हुआ। 

पत्रिका 'बहुमत' अंक 24, मार्च 2014 में यह विशेष रूप से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है कि- ‘वे सांस्कृतिक भूमण्डलीकरण के इस दौर में भी अपने आसपास के जनजीवन को ही रचना और विचार के केन्द्र में रखते हैं। ऐसे समय में जब आधुनिकतावाद और उत्तरआधुनिकतावाद जैसे जुमले साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में आते जा रहे हैं जिनसे साहित्य का आम पाठक अपने आपको सम्पृक्त नहीं कर पा रहा, राहुल सिंह उस दुनिया और समाज को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाते हैं जो आम तौर पर किसी भी साहित्यिक बातचीत में हाशिए पर ही खड़ा दीखता है।‘

Saturday, December 12, 2020

चौपाल

हमर राज्य के छत्तीस ठन गढ़ मन बर कहे जाथे, सिवनाथ नदी के उत्तर म अठारह अउ सिवनाथ नदी के दक्षिण म अठारह। मगर ए छत्तीस गढ़ मन हमर राज्य के बीच के मैदानी भाग म ही आवंय, ए कर अलावा राज्य के उत्तर म सरगुजा राज, जे म कोरिया अउ जशपुर राज भी शामिल हे अउ दक्षिण म बस्तर राज, जे म सुकमा-कोन्टा, बीजापुर-भोपालपट्टनम, नारायणपुर-अबुझमाड़, कांकेर इलाका भी हावय। ए कर अलावा पूर्व अउ पश्चिम म रायगढ़ अउ नांदगांव है। सड़के-सड़क जाए म पाली-कटघोरा से आगू जात म ताराघाट पहुंचे के बाद, भाखा-बोली म साफ फरक पता लगे लगथे। अउ एती बस्तर जात घानी चारामा-कांकेर ले केसकाल के बाद आने राज आ गएन कस अपन मन के जनाथे।

छत्तीसगढ़ राज्य के इतिहास ल देखत म ए बात साफ दिखथे कि हमर आज के छत्तीसगढ़, पहिली समय म भौगोलिक रूप से अलग-अलग रहिस, लेकिन आपस म सांस्कृतिक संबंध रहिस हे। जइसे आज भी राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र म पड़ोसी राज्य मन संग हमर सांस्कृतिक आदान-प्रदान अउ एकता बने हुए हे। कई बार हम खुद अपन दायरा ल सीमित करे बर धरथन, अउ ए कर से अपने राज्य के कला-संस्कृति ह हम ल अनचिन्हार कसन लगे लगथे। जबकि हम सभी एक सनातन परंपरा के अंग अन, जे कर क्षेत्रवार अपन-अपन ढंग से विकास अउ परिवर्तन होए हे। अपन ले थोरको आने भाखा-बोली, खान-पान, रहन-सहन, पहिरावा-ओढ़ावा देख के ओ म हम ल रुचि होथे, ओ कर आकर्षण होथे, लेकिन कई बार हम अपन सोच ल सीमित कर के आने परंपरा के सम्मान करे म हिचक जाथन। जबकि जे ल अपन परंपरा म आस्था हे, प्रेम हे, गर्व हे, ओ कर बर मजबूत हे ते हर आने कला-संस्कृति के भी सम्मान करथे, ओ म रस लेथे।

एक हफ्ता आड़ कर के हर पाख म बिरस्पत के हरिभूमि पेपर के ‘चौपाल‘, जइसे ए कर नांव हे, तइसनहे ए कर पहिचान। ए मंच म छत्तीसगढ़ के चारों मुड़ा रंग-रंग के जानकारी मिल जाथे। कला, संस्कृति, साहित्य, इतिहास-पुरातत्व, ए सब विषय, जे कर से हमर पहिचान बनथे, जे कर बर हम ल गर्व होथे, ते सब पारी-पारी यहां बरगट होत रथे। तिहार आही, त तिहार, अउ जइसनहा मौसम-लगन हे, तइसे सचित्र अउ रोचक जानकारी। चौपाल के अंक मन कतको झन होहीं, जे मन ओ ल अगोरत रथें, जतन के राखथें, अउ समय-समय म फेर-फेर लहुटा के देखत-पढ़त रथें। चैपाल के अंक मन ह छत्तीसगढ़ी संस्कृति के कोश बनत जात हे, जे ल किसी भी संदर्भ बर देखे जा सकत हे। ए कर सब ले जादा खासियत यही आए कि ए माध्यम से हमर वर्तमान पूरा राज्य के संस्कृति के हर पक्ष ल शामिल किए जाथे। राज्य के संस्कृति-प्रेमी अउ जानकार मन ए कर से प्रेम बनाए रखे हें अउ अपन सहयोग देथें, अउ ए मंच से लेखक-पाठक संबंध मजबूत होथे।

ए बीच म करोना के संकट आए हे। ए हर एक प्रकार के दुकाल आए। हमन इतिहास म बड़े-बड़े महामारी अउ अकाल-दुकाल के सामना करे हन। एहू ह एक प्रकार के फिरे दिन आय, ‘रहिमन चुप हो बैठिए, देख दिनन के फेर‘। ए समय ह धीरज धर के निभाए के आय। एक तरफ ए संकट हे, त दूसर तरफ सरकार, स्वयंसेवी संस्था अउ कतको अइसनहा लोग हें, जे मन अड़चन म परे मन के मदद करत हें। बेमारी से बचाव, इलाज के व्यवस्था किए जात हे। ए ध्यान रखना हे कि ए समय के मार ह सब उपर हे, पूरा दुनिया के हर आदमी किसी न किसी तरह से प्रभावित होए हे। ए समय म पहिली हम ल अपन सुरक्षा, फेर अपन घर-परिवार, पास-परोस के ध्यान रखना जरूरी हे। ए हर अइसनहा बेमारी अउ समय आय कि आने उपर परिही त हमू ल घालिही। ते पा के ए मौका म हम ल अपन साथ-साथ पूरा समाज बर सोचना हे। अउ जे कर से जे बन परय, एक दूसर के मदद करना हे। अइ हमर संस्कृति आय। प्रकृति हर सभ्यता के सामने चुनौती खड़ा करथे अउ परीक्षा लेथे, लेकिन हम अपन धीरज, बुद्धि-विवेक से हर कठिन परिस्थिति के सामना करथन अउ हर संकट के बाद अपन ल अधिक नया अउ ताजा रूप म, जीवन के नया उत्साह सहित आगे बढ़थन। 

मो ल पूरा भरोसा हे कि आगे आने वाला समय ह हमर हेल-मेल, भाईचारा अउ खुशहाली के होही। हम अपन कला-संस्कृति संग अपन अस्मिता के गौरव महसूस करत हुए एक सुंदर समाज के रचना म अपन योगदान देबो।