Tuesday, November 29, 2011

इंदिरा का अहिरन

छत्‍तीसगढ़ के कोरबा जिले में बहने वाली छोटी सी नदी 'अहिरन' का नाम जटाशंकरी भी है, लेकिन फिलहाल यह पर्याय की तरह याद आ रही है इंदिरा गोस्‍वामी के लिए, जो मामोनी रायसम गोस्‍वामी के नाम से भी जानी जाती थीं। लगभग 35 साल पहले रचित उनके इस असमिया उपन्‍यास का हिन्‍दी अनुवाद 'अहिरन' 2007 में प्रकाशित हुआ।
कोई छः माह पुरानी बात है (वे लगभग इतने समय से अस्‍वस्‍थ्‍य थीं), जब इंदिरा जी के छत्‍तीसगढ़ के साथ इस रिश्‍ते को जानने के बाद मैंने प्रयास शुरू किया। अपनी सीमा में अधिकतम संभव हुआ कि उनके पिछले छत्‍तीसगढ़ प्रवास के बारे में कुछ जानकारियां मिल पाईं।
रायपुर में 14-16 अक्‍टूबर 2005 में आयोजित अखिल भारतीय कवयित्री सम्‍मेलन के छठें अधिवेशन में आई थीं। चित्र में उनके साथ मुख्‍यमंत्रीजी की पत्‍नी श्रीमती वीणा सिंह और कवयित्री-अभिनेत्री सुश्री नीलू मेघ हैं।

अहिरन पढ़ रहा हूं, अपने घर-पड़ोस की बातें हैं- चांपा, कोरबा, चारपारा, कठघोरा, हसदेव, शिवनाथ, पाली, कुदुरमाल, बिलासपुर, छत्‍तीसगढ़..., फिलहाल अधूरी है...

पढ़ा कि उनके जन्‍म पर भविष्‍यवाणी की गई थी- ''इस लड़की के सितारे इतने खराब हैं, इसे दो टुकड़े करके ब्रह्मपुत्र में फेंक दो'' और इसके बाद जीवन भर जिन चुनौतियों से मुकाबिल वे साहित्‍य, असम, राष्‍ट्र और खुद को रचती रहीं कि उनसे मिलने का मन बना कर पिछले दिनों दिल्‍ली तक गया, मुलाकात न हो सकी, फिर भी पोस्‍ट पूरी करता ही, अपनी गति से..., लेकिन सुबह-सुबह उनके निधन का समाचार मिला, सो फिलहाल इतना ही, इस अधूरी पोस्‍ट और पूरे मन के साथ उन्‍हें छत्‍तीसगढि़या श्रद्धांजलि।

संबंधित पोस्‍ट - सतीश का संसार पर अहिरन और अहिरन के साथ...

Tuesday, November 22, 2011

साहित्यगम्य इतिहास

यह पोस्‍ट, 7 से 9 मार्च 2000 को बिलासपुर में आयोजित संगोष्‍ठी के लिए साहित्‍य वाले डॉ. सरोज मिश्र जी और इतिहास वाले डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद जी के सुझाव पर मेरे द्वारा तैयार किया गया परचा, शुष्‍क आलेख है, जिनकी रुचि साहित्‍य एवं इतिहास विज्ञान में न हो, उनके लिए इसे पढ़ना उबाऊ और समय का अपव्‍यय हो सकता है।

''जन केन्द्रित और समग्र मानव इतिहास के लिए विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का सहयोग और सहकार आवश्यक है। अनुशासनों से जुड़े गर्व के कारण इन विषयों के बीच का संवाद अब तक, पीटर बर्क के शब्दों में बहरों की बातचीत रहा है। इन अनुशासनों ने एक दूसरे को पूर्वाग्रह, शंका और भय की दृष्टि से देखा है। हमने उनकी सीमाओं पर विचार किया है, उपलब्धियों और संभावनाओं पर नहीं।'' प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे के इस कथन में ''इतिहास और साहित्य-इतिहास लेखन का अंतरावलंबन'' की पड़ताल में यहां इतिहास की दिशा से प्रवेश का प्रयास है।

''राजतरंगिणी'' भारतीय साहित्य का वह बिन्दु है, जहां इतिहास और साहित्य के लेखन और अंतरावलंबन की पड़ताल सुगम है। बारहवीं सदी ईस्वी में काश्मीर के शासक जयसिंह के समकालीन कल्हण की यह रचना, प्रथम इतिहास ग्रंथ मान्य है। कल्हण की यह कृति साहित्य की रचना करते हुए, इतिहास का लेखन है, इसलिए अंतरावलंबन का यह बिन्दु विचार प्रस्थान के लिए उपयुक्त है। राजतरंगिणी इतिहास की शब्दगम्य श्रेणी है। इसके अतिरिक्त वस्तुगम्य और बोधगम्य इतिहास श्रेणियां कही जा सकती हैं। वस्तुगम्य इतिहास की सीमा में पुरातात्विक वस्तुओं के रूप में उत्खननों से प्राप्त प्रमाण से लेकर जीवाश्म और पूरा भौतिक संसार है, जो प्राकृतिक इतिहास के रूप में जाना जाता है और बोधगम्य इतिहास- मूल्य, मान्यता, आचार, व्यवहार, शैली और परम्परा यानि समष्टि लोक है।

पुनः प्रस्थान बिन्दु राजतरंगिणी पर दृष्टि केन्द्रित कर विचार करें। कालक्रम में इसके पूर्व, वैदिक युग है, जिस काल का शब्दगम्य इतिहास बन पाता है, वस्तुगम्यता नगण्य है। दूसरी स्थिति अशोक के अभिलेख हैं, जहां इतिहास गढ़ते हुए, साहित्य की रचना होती चलती है। इसके पश्चात्‌ गुप्त युग है, जो अधिकतर पुराणों का रचनाकाल माना गया है। पुराणों के साथ रोचक यह है कि हिन्दू (भारतीय) धर्म-शास्त्रीय ग्रंथों के अंतिम क्रम में होने के बावजूद उन्हें पुराना और साथ ही इतिहास-पुराण सामासिक रूप में कहा गया है, इसीलिए इतिहास-साहित्य के अंतरावलंबन का यह बिन्दु महत्वपूर्ण हो जाता है। यह भी रोचक है कि एक विरोधाभासी भविष्यत्‌ पुराण का उल्लेख आता है। अन्य पुराणों की शैली से अनुमान होता है कि पुराणों में प्राचीन गाथाओं के साथ समकालीन घटनाओं का भी विवरण संग्रह है, लेकिन प्राचीन गाथाओं को अद्यतन और समकालीन घटनाओं को भविष्यवाणी के रूप में रखा गया है। इस प्रकार पुराण, न सिर्फ इतिहास-पुराण सामासिक पद के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, बल्कि भारतीय पद्धति में इतिहास-साहित्य लेखन के संघटन को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

गुप्तकालीन स्थितियों में चौथी सदी ईस्वी में रचित हरिषेण की प्रयाग-प्रशस्ति और पांचवीं सदी ईस्वी में रचित वत्सभटि्‌ट की मन्दसौर प्रशस्ति शिलालेख, जैसी रचनाएं तत्कालीन इतिहास की स्रोत-सामग्री तो हैं ही, इनका साहित्यिक मूल्य तत्कालीन साहित्यिक कृतियों से कम नहीं हैं। इसी युग के ताम्रपत्र, जिन पर दान के विवरण के साथ दान की प्रतिष्ठा 'आचन्द्रार्क तारकाः' यानि जब तक सूरज, चांद और तारे रहें, काल अवधि तक के लिए बताई जाती है, किन्तु इतिहास के कालक्रम का ढांचा तैयार करने में समस्या तब होती है जब ऐसे अनेक ताम्रपत्रों पर तिथि किसी प्रचलित संवत्‌ के स्थान पर शासक के राज्य वर्ष की संख्‍या में अंकित की गयी है।

शब्दगम्य इतिहास में विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत और अन्य लिपियुक्त अवशेषों, साहित्यिक सामग्रियों का विवरण पाठ्‌य पुस्तकों में पर्याप्त है, किन्तु राजतरंगिणी के पश्चात्‌ काल के शब्दगम्य इतिहास में विवेच्य प्रयोजन हेतु अंतिम आधुनिक चरण आरंभ होता है- 15 जनवरी सन 1784 से, जब सर विलियम जोन्स ने कलकता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। इसके साथ इतिहास के वैज्ञानिक और व्यवस्थित लेखन के प्रयास का सूत्रपात हुआ। सन 1788 से 'एशियाटिक रिसर्चेज' शोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ और कुछ वर्षों बाद ही सेन्ड्राकोट्टस को चन्द्रगुप्त मौर्य से समीकृत किया गया, जोन्स का यह प्रसिद्ध शोध लेख भारतीय इतिहास को कालगत क्रम में व्यवस्थित करने का आधार बना। इसके बाद के उस दौर का भी स्मरण यहां आवश्यक है, जब राहुल सांकृत्यायन की 'वोल्गा से गंगा', रामधारी सिंह दिनकर की 'संस्कृति के चार अध्याय' और भगवतशरण उपाध्याय की 'पुरातत्व का रोमांस' जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुई।

इतिहास लेखन की दृष्टि से कुछ विचार-कथनों का स्मरण कर लें, इससे भारतीय इतिहास-दृष्टि की न्यायसंगत समीक्षा आसान हो सकेगी। कौटिल्य ने इतिहास को पुराण, इतिवृत्त, आख्‍यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र से समन्वित माना है। नेहरू, इतिहास के साथ महाकाव्य, परम्परा और कहानी-किस्से को जोड़ते हुए मानों कौटिल्य के कथन की टीका करते हैं- दंतकथाएं, महाकाव्यों तक महदूद नहीं हैं, वे वैदिक काल तक पहुंचती हैं और अनेक रूपों और पोशाकों में संस्कृत साहित्य में आती हैं। कवि और नाटककार इनसे पूरा फायदा उठाते हैं और अपनी कथाएं और सुंदर कल्पनाएं इनके आधार पर बनाते हैं। नेहरू यह भी स्पष्ट करते हैं कि ''तारीखवार इतिहास लिखने की या घटनाओं का कोरा हाल इकट्‌ठा कर लेने की खास अहमियत नहीं रही है। जिस बात की उन्हें ज्यादा फिक्र रही है, वह यह है कि इन्सानी घटनाओं का इन्सानी आचरण पर क्या प्रभाव और असर रहा है।''

अमरीका के प्रसिद्ध विधिवेत्ता ऑलिवर वेन्डल होम्स मानो जिरह करते हैं- ''इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिए क्योंकि इतिहास कारणों और पूर्ववृत्त के ऐसे सूत्रों का चयन है, जिनमें हमारी रुचि है और रुचियां पचास वर्षों में बदल जाती हैं।'' अंगरेज इतिहासकार ईएच कार अपनी प्रसिद्ध कृति ''इतिहास क्या है?'' में दिखाते हैं- ''ऐतिहासिक तथ्य मात्र वे हैं, जो इतिहासकारों द्वारा जांच के लिए छांटी गयी हैं'' वे स्पष्ट करते हैं कि लाखों लोगों के बावजूद सीजर का रूबिकन पुल पार करना महत्वपूर्ण हुआ (और मुहावरा बन गया) वे आगे कहते हैं- ''सभी ऐतिहासिक तथ्य इतिहासकारों के समसामयिक मानकों से प्रभावित हुई अभिव्यक्ति के परिणामस्वरूप हम तक आते हैं।''

भारत में इतिहास, हमारी काल चिंतन पद्धति के अनुरूप रहा है। भारतीय, बल्कि समूचा प्राच्य चिंतन, काल तथा उसके सापेक्ष वस्तुओं, घटनाओं को परिवर्तनशील वृत्तायत दृष्टि से देखता है न कि पाश्चात्य, रैखिक विकास की दृष्टि से। साथ ही हमारा सुदीर्घ, अबाध और जीवन्त क्रम, सनातन माना जाकर इतिहास के बजाय स्वाभाविक ही परम्परा में बदल सकता है। परम्परा, जिसकी सार्थकता उसके पुनर्नवा होने में है, उसमें नदी सा सातत्य है। वह प्राणवान 'भवन्ति' का स्पंदित प्रवाह है, न कि खण्डित 'अस्ति' का संवेदनारहित समूह। वस्तुतः इतिहास और परम्परा किसी तथ्य अथवा घटना के दो लगभग विपरीत, किन्तु पूरक बनकर, दोनों सार्थक दृष्टिकोण हैं। परम्परा से जुड़ा व्यक्ति उसके प्रति विषयगत हो जाता है तो, बाहरी व्यक्ति इसके प्रति रूक्ष होकर इसके कपोल-कल्पना साबित करने में जुट जाता है। इसी स्थिति में भारतीयों पर 'इतिहास-बोध' न होने का आरोप लगता है, जिसकी सफाई में कुछ कहने के बजाय भारतीय मानस में 'नियति बोध' का दर्शन पा लेना अधिक आवश्यक है, किन्तु यहीं अभिलेखन के भारतीय दृष्टिकोण का एक उल्लेख पर्याप्त होगा, वृहस्पति का कथन है-
षाण्मासिके तु सम्प्राप्ते भ्रान्तिः संजायते यतः।
धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढान्‍यतः पुरा॥
''किसी घटना के छः मास बीत जाने पर भ्रम उत्पन्न हो जाता है, इसलिए ब्रह्‌मा ने अक्षरों को बनाकर पत्रों में निबद्ध कर दिया है।''

इतिहास लेखन की यह एक विकट समस्या है कि समकालीन इतिहास, घटना के प्रभाव के प्रति तटस्थ नहीं हो पाता। इतिहास का आग्रह अधिकतर तभी तीव्र होता है, जब गौरवशाली अतीत के छीनने का आभास होने लगे। वैभव, जब मुट्‌ठी की रेत की तरह, जितना बांधकर रखने का प्रयास हो उतनी तेजी से बिखरता जाय अथवा ऐसा आग्रह भाव तब भी बन जाता है जब आसन्न भविष्य के गौरवमंडित होने की प्रबल संभावना हो, जैसे राज्याभिषेक के लिए नियत पात्र की प्रशस्ति रचना या प्रस्तावित छत्तीसगढ़ राज्य का पृथक अस्तित्व होने के पूर्व, उसे राज्य इकाई मानकर किया जाने वाला लेखन, लेकिन प्रयोजनीय होने से ऐसे दोनों अवसरों पर तैयार किया जाने वाला इतिहास लगभग सदैव सापेक्ष हो जाता है। इस तरह घटनाओं को साथ-साथ देखते चलें, आगे से देखें या पीछे से, इतिहास के लिए दृष्टि समकोण हो, अधिककोण या न्यूनकोण, वह मृगतृष्णा बनने लगता है।

इतिहास के तथ्य, तर्क-प्रमाण आश्रित होते हैं, परम्परा की तरह स्वयंसिद्ध नहीं। इसलिए इतिहास-नायकों को चारण-भाट की आवश्यकता होती है, जो उनकी सत्ता और कृतित्व के प्रमाणीकरण हेतु काव्य रच सकें, पत्थर-तांबे पर उकेर सकें लेकिन परम्परा के लोक नायकों के विशाल व्यक्तित्व की उदात्तता, जनकवि को प्रेरित और बाध्य करती है, गाथाएं गाने के लिए। इतिहास के तथ्य, तर्क-प्रमाणों से परिवर्तित हो सकते हैं, इसलिए संदेह से परे नहीं होते किन्तु लोक मन का सच, काल व समाज स्वीकृत होकर सदैव असंदिग्ध होता है। इसलिए जिस समाज के जड़ों की गहराई और व्यापकता परम्परा-पोषित जनजीवन में व्याप्त है, वह आंधी तूफान सहता, पतझड़ के बाद बसंत में फिर उमगने लगता है।

इतिहास लेखन में समस्या तब अधिक गंभीर होती है, जब किसी स्रोत-सामग्री का नाम लेना उसके जान लेने की एकमात्र बुनियादी शर्त बन जाती है। इतिहासकार अपना दायित्व वस्तु-घटनाओं के वर्गीकरण और उसकी सांख्यिकीय जमावट तक अपने को सीमित कर लेता है, वह इतिहास को परिवर्तन के बजाय, इकहरे क्रमिक विकास की दृष्टि से देखता है। भारतीय स्थापत्य के इतिहास का उदाहरण इसे अच्छी तरह स्पष्ट करता है। हम पाते हैं कि यहां आरम्भ में हड़प्पा सभ्यता में निर्माण हेतु ईंट प्रयुक्त हुए, वैदिक युग का स्थापत्य घास-फूस, लकड़ी और पत्थर की कुम्भियों का था, मौर्य युग में ढूह (स्तूप) और स्तम्भ तथा काष्ठ वास्तु की तरह रेलिंग बनने लगी, फिर अचानक संरचनात्मक के स्थान पर शिलोत्खात (लेण और गुहा) वास्तु का दौर आता है, संयोगवश लगभग यही काल भारतीय इतिहास का अंधकार युग कहा जाता है, फिर गुप्त युग में क्रमशः सीधे-सपाट संरचनात्मक वास्तु का पुनः आरंभ होता है, इसके बाद देश के कुछ हिस्सों, विशेषकर छत्तीसगढ़ में फिर ईंटों का प्रचलन हो गया और इसी प्रकार परिवर्तन अब तक होते रहे हैं। अब यदि इसे विकास क्रम में जमाने का प्रयास करें तो कुछ तथ्यों को छोड़कर आगे बढ़ना होगा या फिर कुछ मनगढ़ंत सम्मिलित करना विवशता होगी।

इस प्रकार पाश्चात्य पद्धति ने हमारी इतिहास दृष्टि को जागृत करने में सहायता की, जिसके माध्यम से हम मंदिरों का, मूर्तियों का, सिक्कों का, लिपियों का, बोली-भाषाओं का और साहित्य के इतिहास का ढांचा तैयार कर सके, किन्तु शायद इसी ने समग्रता के इतिहास से जो परम्परा से सम्बद्ध होकर मानव का, उसकी संस्कृति का, इतिहास हो सकता था, दूर कर दिया। यह विवेचन अंगरेजों को उत्तरदायी ठहराने के लिए नहीं, अपने स्वाभाविक वर्तमान का आकलन करने के लिए है।

निष्कर्ष यह कि हमारे व्यक्तित्व के ढांचे में, चेतना के स्तर पर समष्टि सूत्रों से हम सृष्टि में प्रकृति के सहोदर हैं, लोक-जन हमारे अग्रज हैं, वे ही हमारे मूल से वर्तमान को जोड़ने का परिचय-माध्यम हो सकते हैं, सूत्र बन सकते हैं। आज हम जहां हैं, वहां होने की तार्किकता, अपने आदि से कार्य-कारण संबंध तलाश कर, उसमें छूटे स्थानों को पूरी आस्था सहित लोक और जन से पूरित कर, यानि चेतना के स्तर पर अपने इतिहास से अपने वर्तमान का सातत्य पाकर हम वास्तविक अर्थों में मनुज कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं। यह विश्लेषण आश्रित शब्दगम्य इतिहास मात्र से संभव नहीं, इसके लिए वस्तुगम्य इतिहास की व्याख्‍या और बोधगम्य इतिहास सम्पदा को साहित्य का सम्मान देते हुए, तैयार किया गया इतिहास ही सार्थक होगा।

Saturday, November 12, 2011

ईडियट के बहाने

भेद-भाव की अपनी समस्‍याएं हैं तो समानता के भी अलग संकट हैं, ऐसी किसी वजह से ''एक सिर बराबर एक मत (वोट)'', बीसवीं सदी का सबसे खतरनाक अविष्कार कहा गया होगा। 'थ्री ईडियट्‌स' फिल्म की प्रशंसा से अलग कुछ कहना शायद इसीलिए जल्दी संभव नहीं हुआ। उग्र प्रजातंत्र के माहौल में अपनी राय प्रकट करने के पहले कोई पक्ष बहुमत बन चुका हो तो सावधानी जरूरी है। लेकिन यहां राय, अल्पमत में रहकर विशेषाधिकार पा लेने या धारा के विरुद्ध खड़े होने जैसी क्रांतिकारिता के कारण नहीं है और यह वाद-विवाद प्रतियोगिता भी तो नहीं, जिसमें अपनी बात 'मैं इस सदन की राय के विपक्ष में कहने खड़ा हुआ हूं' इस जुमले की तरह रस्‍मी हो।

आप कभी-कभार और मुख्‍यतः अत्यधिक अनुशंसा के कारण फिल्में देखने जाते हों तो वापस आकर फिल्म की आलोचना का साहस जुटाना कठिन हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने पर आप अनुशंसकों के आलोचक बनते हैं फिर निर्माता-निर्देशक ने तो आपको आमंत्रित किया नहीं था, आपने खुद चलकर, समय लगाकर, खर्च कर फिल्म देखी इसलिए फिल्म देखने का अपना निर्णय ईडियॉटिक मानने के बजाय, दुमकटी लोमड़ी बनकर हां में हां मिलाना अधिक सुविधाजनक और समझदारी भरा जान पड़ता है।

यह फिल्म पसंद न आने में मैंने अपने संस्कार और रूढ़ मन को टटोलना शुरू किया। सत्तरादि दशक के आरंभ में हम माध्यमिक शाला की पढ़ाई आठवीं कक्षा पास कर लेते तो उच्चतर शाला की नवीं कक्षा में प्रवेश के लिए जाते, बिना ताम-झाम और तैयारी के। पढ़े-लिखे, जागरूक अभिभावकों को भी खबर नहीं होती थी। सब गुरुजी तय कर देते। साठ फीसदी तक अंक वाले छात्रों का नाम नवीं 'अ' में पचास तक 'ब' में और उसके नीचे 'स' में। अ का मतलब होता, गणित विषय, इन्जीनियर, ब का मतलब बायोलाजी (उच्चारण होता बैलाजी) यानि डाक्टर बनेगा और बचे-खुचों के लिए स, माना जाता कि आगे पढ़ना तो है ही सो स यानि कला की पढ़ाई और क्या बनेगा के सवाल पर जवाब होता- अफसर न हुआ तो काला कोट पहनेगा, तो कभी भूगोल की प्रायोगिक कक्षा की याद दिला कर कहा जाता जमीन की पैमाइश तो कर ही लेगा। इस अ, ब, स में परिवर्तन कभी-कभार ही होता।

नवीं 'ब' में भरती हुई लेकिन डॉक्टर बनने के लक्षण और योग्यता मेरे परीक्षा परिणामों में नहीं दिखी। अपनी क्षमताओं का 'तत्‍वज्ञान' मुझे तो काफी हद तक हो ही चला था, इससे एक तरफ परीक्षा प्रणाली पर मेरा विश्‍वास बना रह गया और दूसरी ओर स्नातक बनने के लिए बीएस-सी से बीए करने लगा। विषय चुनने की बात आई, तो इस बात पर दृढ़ रहा कि मेरी पढ़ाई का विषय भाषा-साहित्य या गणित नहीं होगा, क्‍योंकि ये दोनों विषय मुझे आरंभ से और अब भी उतने ही पसंद हैं। मुझे लगता, बल्कि दृढ़ मान्यता रही कि पढ़ाई के लिए विषय के रूप में इनका चयन कर लेने पर इनमें मेरी रुचि बनी नहीं रह पाएगी, इन विषयों की स्‍वाभाविक समझ और उनके प्रति मौलिक सोच बची न रह पाएगी, इन्‍हें प्रशिक्षित रूढ़ ढंग से देखना शुरू कर दूंगा और ये दोनों विषय तो यों भी पढ़ लूंगा फिर और कुछ क्यों न आजमाया जाए।

बाद में मेरी पढ़ाई और स्नातकोत्तर डिग्री प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व की हुई, बावजूद इसके कि विगत में रुचि होने पर भी इतिहास मेरे सख्‍त नापसंद का विषय था। विषय चयन करने की बात पर मैंने इतिहास के लिए अपनी अरुचि प्रकट की तो मुझसे इसका कारण पूछा गया। मैंने बताया कि तिथि-सन रटना न मुझे पसंद है न मुझसे हो सकता। तब बताया गया कि पुरातत्व ऐसा इतिहास है, जिसमें सन का रट्‌टा नहीं है। सदी से और कभी सदियों और सहस्राब्दी से भी काम चल जाता है फिर तो कुछ पता किए बिना यह चयन करने में कोई असमंजस नहीं रहा।

स्‍नातकोत्‍तर परीक्षा के प्रश्‍न-पत्रों के अंतराल में परीक्षा की पढ़ाई के साथ 'चांद का मुंह टेढ़ा है', 'कुरु कुरु स्‍वाहा' और 'प्‍लेग' पढ़ा। इस परीक्षाफल में मुझे प्रथम स्‍थान और फलस्‍वरूप स्‍वर्ण पदक प्राप्‍त हुआ। इस बार परीक्षा प्रणाली के प्रति विश्‍वास(?) बना कि मैं इस खेल के नियम कुछ-कुछ समझने लगा हूं, बस इतना ही और इसके बावजूद अव्‍वल आने की न चाहत बनी न आदत। वैसे भी अव्‍वल होते रहने के भाव के साथ कभी छल-छद्म का सहारा और सूक्ष्‍म हिंसा तो लगभग सदैव जुड़ी होती है।
अंततः संयोग यह भी बना कि निजी तौर पर अपरिग्रहवादी मैंने संग्रहालय विज्ञान में पत्रोपाधि ली। इस चाहे-अनचाहे अनिश्चित सिलसिले का सिला, शासकीय सेवा के अपने काम में पुरातत्व-इतिहास के साथ भ्रमण, दूरस्थ अंचलों में लंबी अवधि तक कैम्प, लोककला और संस्कृति से जुड़ाव का रुचि-अनुकूल अवसर मिलता रहा है।

थ्री ईडियट्‌स का नायक बीएड नहीं है, बाल मनोविज्ञानी भी नहीं, उद्यमी भी नहीं लेकिन स्कूल चला रहा है, व्यवसायी नहीं पर अविष्कार कर उसे पेटेंट करा रहा है। आइआइटीयन चेतन भगत युवा लेखक और विचारक हैं। दो-तीन आइआइटीयन को मैं जानता हूं, जिनमें से एक ने डिग्री पूरी कर सन्यास ले लिया, कोई रेडियो जॉकी बन गया या उनमें से कुछ और इसी तरह का भलता कुछ काम करने लगे और यों अपरिचित और काम के नए क्षेत्र में सफल भी हैं। देकार्त विधिस्नातक थे, सैनिक बने, गणित करने लगे और दार्शनिक के रूप में जाने गए। लियोनार्डो दा विंची, बैरिस्‍टर गांधी और आइसीएस बोस ... न जाने कितने उदाहरण हैं। पढ़ाई के विषय और रुचि में तादात्म्य, रोजगार-जीवन यापन की शुरुआत, बीच में बदलाव और कई बार उसके समानान्तर कार्य को रुचि के अनुकूल बना लेना या पसंद का काम, मुआफिक संभावना खोज लेना भी आवश्यक कौशल है।

'तारे जमीं पर' की याद करते चलें, जो मुझे कुछ बेहतर फिल्‍म लगी, बावजूद इसके कि डिस्लैक्सिया और बच्चों में छिपी नैसर्गिक प्रतिभा और उसके उजागर होने को गड्‌ड-मड्‌ड कर दिया गया है, मध्यान्तर तक नायक नहीं आता, लेकिन आता है तो फिर नायक, नायक ही है और ईशान भी अंततः फर्स्ट आता है, तभी जाकर फिल्म और शायद फिल्मकार की मुराद पूरी होती है।

थ्री ईडियट्‌स की कामेडी चर्चा में रही और पसंद की गई लेकिन यहां भी व्यापक मान्यता और स्वीकृति पा लेने के बाद इसे सहज आसानी से भोंडा की हद तक सुरुचिरहित कहना कठिन हो रहा है। फिल्म के हास्य की आलोचना की कठोरता कम करने के लिए यह कहा जा सकता है कि शालीनता और मर्यादा में हास्य की गुंजाइश कम होती है। अब तो 'दबंग' और 'डेल्ही बेली' भी हैं, जिसके भोंडेपन को जीवन और सामाजिक व्यवहार की स्वाभाविकता के तर्क में रंगा जा सकता है। इस फिल्म की कामेडी ऐसी है कि अपनी दिनचर्या में सभ्य नागरिक को इन बातों या स्थितियों का सामना करना पड़े तो वह असहज हो जाता है, लेकिन यहां...। सभ्य और नागरिक शब्द क्रमशः सभा और नगर से बने हैं और इसी तरह भदेस, गवांरु, देहाती शब्द देसी-गवंई से बने हैं लेकिन फूहड़ और अश्लील के लिए रूढ़ हो गए हैं। इसे संदर्भ के साथ आप जोड़ लें। मैं तो यही कहूंगा कि लोकप्रिय हो जाने के कारण, लोगों (बच्चे-बच्चे) की जबान पर चढ़ जाने के कारण भोंडे और फूहड़ को सुरुचिपूर्ण की स्वीकृति नहीं मिल जाती।

निष्कर्ष इतना कि कुछ अच्छे सीक्वेंस, संवाद, दृश्य-गीत के बावजूद मैं इसे बतौर अच्‍छी फिल्म स्‍वीकार नहीं कर पाया। बहरहाल, इस ईडियट के बहाने आमिर खान ने अपनी बाक्‍स आफिस समझ जरूर साबित की है।