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Sunday, September 25, 2011

रामराम

वह परिवेश, जो होश संभालने के पहले से देखते रहें, उससे एक अलग ही रिश्ता होता है, जन्मना। जो पहले से है, वह सदैव से विद्यमान, शाश्वत लगता है। अक्सर उसके प्रति वैसा कुतूहल भी नहीं होता, क्योंकि हमारी जानी दुनिया वही होती है, मन मानता है कि वही दुनिया है और उसे वैसी ही होना चाहिए।
किसी रामनामी को पहली बार कब देखा, याद नहीं। कह सकता हूं कि होश संभालने के पहले से देखता रहा हूं। रामनामियों से मेरा ऐसा ही रिश्ता रहा है। जब देखा कि लोगों को आश्चर्य होता है, जिज्ञासा होती है इनके बारे में, तो मुझे अजीब लगा। बाद में जाना कि इनके बारे में जानने कोई अमरीकी आया करता था, शोध किया, वे डॉ. लैम्ब रामदास हुए, उनकी पुस्‍तक है- Rapt in the name: the Ramnamis, Ramnam, and untouchable religion in Central India। कुछ और परिचित पत्रकार-लेखक, अध्येता-विद्वानों को रूचि लेते देखा। दसेक साल पहले सुन्दरी अनीता से रामनामियों पर उनके शोध के दौरान मुलाकात और फिर मेल-फोन से सम्पर्क बना रहा। अनीता को लंदन विश्वविद्यालय से इस अध्ययन Dominant Texts, Subaltern Performances:Two Tellings of the Ramayan in Central India पर डाक्टरेट उपाधि मिली, जिसमें रामकथा, विशेषकर रामचरितमानस के पदों की खास 'रामनामी' व्याख्‍या और इस अंचल की रामलीला में कथा-प्रसंगों की निराली प्रस्तुति को शोध-अध्ययन का विषय बनाकर सामाजिक संरचना को समझने का प्रयास है।
बड़े भजन मेलों और शिवरीनारायण मेले में रामनामियों के साथ समय बिता कर मैंने देखा-जाना कि वे दशरथनंदन राम के नहीं बल्कि निर्गुण निराकार ब्रह्मस्वरूप राम के उपासक हैं और इस भेद को अपने तईं बनाए रखने के लिए राम का नाम एक बार कभी भूले से भी प्रयोग नहीं करते, रामराम ही कहते, लिखते, पढ़ते हैं (छत्‍तीसगढ़ी में इन्‍हें रामनामी नहीं रामरामी या रमरमिहा ही कहा जाता है)। रामराम पूरे शरीर पर, कहने से स्पष्ट नहीं हो पाता कि गुदना शरीर के गुह्‌य हिस्सों सहित आंख की पलकों और जीभ पर भी होता है। समय बदला है। पूरे शरीर पर गोदना, कम होते-होते माथे पर रामराम तक आया फिर हाथ में, लेकिन अब बिना गुदना के रामनामियों की संख्‍या बढ़ती जा रही है।
छत्तीसगढ़ में मेलों की गिनती का आरंभ अंचल की परम्परा के अनुरूप 'राम' अर्थात्‌ रामनामियों के बड़े भजन से किया जा सकता है, जिसमें पूस सुदी ग्यारस को ध्वजारोहण की तैयारियां प्रारंभ कर चबूतरा बनाया जाता है, दूसरे दिन द्वादशी को झंडा चढ़ाने के साथ ही मेला औपचारिक रूप से उद्‌घाटित माना जाता है, तीसरे दिन त्रयोदशी को भण्डारा में रमरमिहा सदस्‍यों एवं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण होता है।
संपूर्ण मेला क्षेत्र में अलग-अलग एवं सामूहिक रामायण पाठ होता रहता है। नख-शिख राम-नाम गुदना वाले, मोरपंख मुकुटधारी, रामनामी चादर ओढ़े रमरमिहा स्त्री-पुरूष मेले के दृश्य और माहौल को राममय बना देते हैं। परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि मेले में सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति, समष्टि हो जाता है। सदी पूरी कर चुका यह मेला महानदी के दाहिने और बायें तट पर, प्रतिवर्ष अलग-अलग गांवों में समानांतर भरता है। कुछ वर्षों में बारी-बारी से दाहिने और बायें तट पर मेले का संयुक्त आयोजन भी हुआ है। मेले के पूर्व बिलासपुर-रायपुर संभाग के रामनामी बहुल क्षेत्र से गुजरने वाली भव्य शोभा यात्रा का आयोजन भी किया गया है।

13 मई 2011 को इस हकीकत की कहानी, फिल्म्स डिवीजन के 51 मिनट के वृत्तचित्र, को सेंसर प्रमाण-पत्र मिला, जिसमें मैं विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल हूं। कमल तिवारी के कथालेख के साथ फिल्म शुरू होती है, कुछ इस तरह-
'समूची दुनिया किसी कथा के छूटे प्रभाव की तरह है' - योगवशिष्ठ कहता है। न जाने कितनी कथाएं हैं, जिनसे बनता है जगत।
एक कहानी यहां भी जी जा रही है। ... यहां श्रद्धा का एक सैलाब है जो तट पर बह निकला है। वैसे बहती श्रद्धा का आरंभ कहां होता है ... आत्मा का, विश्वासों का यह कौन सा भाव है जो अपने शरीर को ही वह पवित्र स्थल बना लेता है, जहां सारी श्रद्धा जैसे मंदिर की सी शक्ल में सिमट आती है। ... इसी आस्था की छुअन अपने शरीर पर लिये चले आए हैं। ये मेला है, आस्थाओं का समागम है, या जिन्दगी को जीने का एक अलग अंदाज़।
ये रामकहानी है, रामनामी समाज की। एक ऐसा समुदाय जो अपने होने में ही एक कथा है। इनके शरीर पर उभरते ये शब्द महज शब्द नहीं, जीवन को जीने के, समझने के सूत्र हैं। इन्हीं सूत्रों से बुनी गई है, रामनामी समाज की गाथा। वो गाथा जो एक सदी से कुछ ज्यादा समय में ले पाई है आकार। रामनामी समुदाय की पहचान है, उनके शरीर पर गुदने के रूप में लिखा रामराम। उनके सिर पर विराजता मोर मुकुट और बदन पर रामराम लिखा बाना।
... ट्रेलर समाप्त... आगे 'रुपहले परदे' पर देखना चाहें तो स्वयं उद्यम करें, या लाइव के लिए आ जाएं छत्तीसगढ़, आपका स्वागत है। आपने समझ लिया हो कि यह पोस्‍ट छत्‍तीसगढ़, फिल्‍म और स्‍वयं के प्रचार-प्रसार के लिए है, तो कहने की इजाजत लूंगा कि 'आप तो बड़े समझदार निकले।'

सभी तस्वीरें फिल्म निर्देशक भोपाल के सुनिल शुक्ल (अपना नाम वे इसी तरह लिखते हैं) ने उतारी हैं। मेरे प्रोफाइल वाली तस्वीर भी उन्हीं की ली हुई है। इस फोटो पर शुभाशंसा मिलती रही है, मैं सब से कहता हूं कि शकल तो वही है, जो हमेशा से है, लेकिन इसमें अलग कुछ है तो वह सुनिल जी की फोटोग्राफी के बदौलत है, सो इस मामले के सारे पिछले-अगले काम्प्लिमेंट, उन्हीं के नाम, रामराम।
28 सितंबर 2011, दैनिक भास्‍कर, रायपुर के सिटी भास्‍कर मुख्‍य पृष्‍ठ क्र. 17  की कतरन 
इसका एक जिक्र राम के दीवाने... शीर्षक से भी है।

60 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अरे वाह! सदा की तरह रोचक जानकारी तो है ही, इस बहाने आपकी विशेषज्ञता को पर्दे पर देखने का अवसर भी मिलेगा। विदेश में यह फ़िल्म किस प्रकार देखी या प्राप्त की जा सकती है?

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

जी. हमेशा की तरह एक नयी और विलक्षण चीज़ की जानकारी दी है आपने. ऐसे और भी न जाने कितने विश्वास होंगे भारत में और बीती सदियों में बहुत से लुप्त हो चुके होंगे.
इस वृत्तचित्र का इंतज़ार रहेगा. क्या आप इसके कुछ अंश यूट्यूब पर या अपने ब्लौग पर एम्बेड कर कसते हैं?

रविकर said...

इस हकीकत की कहानी फिल्म्स डिवीजन के 51 मिनट के वृत्तचित्र में आई है, जिसमें मैं विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल हूं।

आभार ||

संजय @ मो सम कौन ? said...

पैले सबन कू तारीफ़ और वाहवाही करन देयो, हम बाद में आयेंगे ये कहने कि ’राजा नंगा है।’

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं क्यों, आपका ब्लॉग पढ़ नहीं पा रहा हूँ।

सतीश सक्सेना said...

संकलन योग्य लेख के लिए आपका आभार !

प्रतुल वशिष्ठ said...

रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम. रामराम.रामराम.
एक अलग ही सुख होता है आपके कथा-वाचन में... इस बार रामनामियों के बारे में जानकार अच्छा लगा.
रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम.रामराम. रामराम.रामराम.

संजय @ मो सम कौन ? said...

निशांत मिश्र वाली querry हमारी भी समझी जाये। वैसे अपन तरजीह ’लाईव वर्ज़न’ को देंगे, जब भी मौका मिले।
आपकी पोस्ट का बहुत उत्सुकता से इंतज़ार रहता है, आज सुबह कहीं जाना था और जाने से जस्ट पहले एक बार लॉग-इन किया तो आपकी ’रामराम’ देखकर यहाँ आये तो कुछ और ही दिखा। इतना तो समझ ही गया था कि आपके ब्लॉग पर है तो कुछ अहम ही चीज होगी, फ़िर भी आपसे चुहल करने में मजा आता है इसलिये वैसा कमेंट कर गया था(वैसे ये स्पष्टीकरण आपके लिये नहीं है)
पोस्ट दर पोस्ट, आपके ज्ञान और सहजता से शेयर करने की विशेषता से और ज्यादा आपके मुरीद हुये जाते हैं।
रामराम।

Avinash Chandra said...

प्रश्न वही है मेरा भी :)
सहेज रहा हूँ, यहाँ आ वैसे भी यही किया करता हूँ।

चंदन कुमार मिश्र said...

अच्छा तो यह बात है! रामराम की तैयारी हो रही थी। आपके लिए तो मैंने पहले भी कहा है 'पक्का छत्तीसगढ़ी'। फिर से पक्का छत्तीसगढ़ी। देखेंगे कभी। सरकार तक पहुंच रहे हैं आप…

P.N. Subramanian said...

रामनामियों का जिन्दगी जीने का एक अलग अंदाज़ ही तो है. वृत्त चित्र तो मै भी देखना ही चाहूँगा, यदि मिले तो.

Navin C. Chaturvedi said...

पिताजी से सुना था इस बारे में बचपन में। फिर तो जैसे कि विस्मृत ही हो गया। आप ने फिर से याद दिला दिया। आभार।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अद्भुत, अनोखी, अनमोल जानकारी (अब तो ये शब्द भी बौने प्रतीत होने लगे हैं आपकी पोस्टों के सन्दर्भ में)हमेशा की तरह... मेरा सवाल कुछ और है कि इसकी सीडी/डीवीडी यदि उपलब्ध हो तो कृपया प्राप्त करने का पता एवं मूल्य बताने की कृपा करेंगे.. क्योंकि फ़िल्में भी मैं पाइरेटेड नहीं देखता.. फिर यह तो उनसे कहीं ऊपर है!!

देवेन्द्र said...

इनके शरीर पर उभरते ये शब्द महज शब्द नहीं, जीवन को जीने के, समझने के सूत्र हैं।

वाह इसके बेहतर रामनामियों के लिये व्याख्या-सूत्र क्या हो सकता हैं। सुंदर प्रस्तुति के लिये हार्दिक बधाई और इससे परिचित कराने व पढ़ने का विशेष अपसर प्रदान करने का हार्दिक आभार।

जी.के. अवधिया said...

राहुल जी, आप विशेषज्ञ तो हैं ही!

फिर भी फिल्म्स डिवीजन में विशेषज्ञ बनने के लिए बधाई!

मनोज कुमार said...

रोचक जानकारी।

rashmi ravija said...

बहुत ही रोचक और बढ़िया जानकारी.
इतने करीब से कभी रामनामियों को नहीं जाना...आपकी पोस्ट के माध्यम से बहुत सी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी मिली.
ये वृत्तचित्र दूरदर्शन पर या NDTV पर शायद कभी ना कभी जरूर दिखाया जाएगा.(
आप सूचित कीजियेगा.

शिवम् मिश्रा said...

बहुत ही रोचक और बढ़िया जानकारी ... बहुत बहुत आभार आपका साथ साथ बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

केवलकृष्ण said...

राहुलजी, आभार। पढाते रहिएगा। आपकी क्लास में बड़े ध्यान से सुन-समझ रहे हैं हम।

shikha varshney said...

बहुत रोचक जानकारी शायद यह वृतचित्र कभी हमें भी देखने को मिल जाये किसी न्यूजचैनल में.आभार आपका.और बहुत बधाई.

Sunil Shukla said...

आदरणीय राहुलजी,
अति उत्तम.
बहुत ही बढ़िया ब्लॉग पोस्ट किया है आपने. दरअसल ये फिल्म ही आपकी बदौलत ही बन पाई है. पूरे डेढ़ साल लगे फिल्म को बनाने में. मेरे नाम के उल्लेख के लिए धन्यवाद.
सुनिल शुक्ल

संजय @ मो सम कौन ? said...

@ सुनिल शुक्ला जी:
सुनिल साहब,
ब्लॉग प्रोफ़ाईल - सितंबर 2011,
profile views - 5.

यानि कि राहुल सर की यह पोस्ट ही सबब है प्रोफ़ाईल बनने की, तो एक ब्लॉग की शुरुआत भी हो जाये तो कैसा रहे?

डॉ. मनोज मिश्र said...

सदा की तरह नई और रोचक जानकारी.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

रामनामियों से मुलाकात का सुग्योग्य तो मिला, आपकी पोस्ट ने यादों को ताजा कर दिया। आभार

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

बहुत खूब।

एक छोटी सी जिज्ञासा है।

मेरी कॉलोनी नहर के पास बनी है। रास्‍ते में एक मरघट पडता है। अक्‍सर देखता हूं कि शव के दहन के बाद लोग उसको पहनाया गा रामनामी वहीं फेंक कर चले जाते हैं। क्‍या यह उचित है?
------
मनुष्‍य के लिए खतरा।
...खींच लो जुबान उसकी।

Sanjeet Tripathi said...

जानी-सुनी बात को भी आपकी लेखन शैली में पढ़ना और भी अच्छा लगता है। रामनामियों के बारे में कुछ और जानकारी मिली इसे पढ़कर, शुक्रिया भाई साहब। वृतचित्र तो मैं भी देखना चाहूंगा।

mahendra verma said...

शायद 80 के दशक में बिलासपुर संभाग के रामनामियों पर ‘धर्मयुग‘ ने आवरण कथा प्रकाशित की थी। उसमें इनके मेलों, उत्सवों और परम्पराओं से संबंधित 3-4 आलेख और बहुत सारे रंगीन चित्र थे। वह सब आंखों के सामने वृत्तचित्र की भांति घूमने लगा। कभी संयोग हुआ तो आपका वृत्तचित्र भी देखेंगे।

बाण बनारसी said...

ई बिलाग चौंचक हौ. बनारस के डोमरजा पर कुछ बने के चाहीं. ब्रित्त न सही ऐते चित्र लेकिन बने के चाहीं.

ज़ाकिर मियाँ,
उचित अनुचित तो बहुते है जइसे इहाँ आप का कमेंट एकदम विषय से बाहर है. अउर नीचे जो दू लिंक दिये हैं वह तो और भी अनुचित है. कभी बिना लिंक के भी कमेंट कर लिया करो. रैंक बढ़ावे खातिर एतना नीचे न गिरो कि जहाँ जाव वहीं ...

KANTI PRASAD said...

आदरणीय राहुलजी
रोचक जानकारी, बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आशा जोगळेकर said...

राहुल जी आपके ब्लॉग की खासीयत है कि आप हमेशा अलग से विषयों पर लिखते हैं । रामनामी संप्रदाय होता है और उनके बारे में आपके ब्लॉग पर ही जाना । बहुत आभार और राम राम ।

Rahul Singh said...

@ आशा जोगळेकर जी
मुझे हमेशा लगता है कि दैनिक अखबारों और चौबीस घंटे के समाचार चैनलों के बाहर बहुत बड़ी, सच्‍ची सी दुनिया है, बस वहीं मन रमा रहता है. सादर धन्‍यवाद.

संतोष त्रिवेदी said...

रामनामी समुदाय आपके क्षेत्र में मैंने भी देखा है ,वहाँ थोड़े दिन के प्रवास के दौरान जान पाया कि गुदना वाली कला छत्तीसगढ़ में कुछ ज़्यादा है.बाकी ,आप कला के क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा लगा रहे हैं,आभार

bhumika rai said...

आज बहुत कुछ नया पढ़ने-समझने को मिला...आपका ब्लाग डिस्टेंस एजुकेशन सेंटर ते कम नहीं..जहां हमेशा कुछ अनोखा जानने को मिलता है

Saurabh Saxena said...

Nice information, I was not aware about this community. Does presence of this community in Chhattisgarh further strengthen the theory of Rama spending his maximum exile in this region?

सतीश पंचम said...

पहले ओपन नहीं हो रहा थी आपकी यह पोस्ट, काफी जंक दिख रहा था। अब पढ़ा। काफी रोचक जानकारी है। बहुत अलग किस्म की।

Shraddha thawait said...

आप के सारे ब्लोग्स के विषय विशिष्टता लिए होते है और उससे भी खास होती है उनकी प्रस्तुति.

प्रतिभा सक्सेना said...

भारत के वास्तविक रूप से परिचित करानेवाली इस जानकारी से लाभान्वित हुई.
आभार !

Anonymous said...

ramnamayo se mila jarur tha par janta kam tha.jankari ke liye danywad. - vivek raj singh

Rakesh Tiwari said...

BHAIYA PAHLI BAR APANE LAPTOP ME APKA POST PADA RAM JI KE NAM KA....

Dr. Braj Kishor said...

रामनामी पर शिवरीनारायण से लन्दन तक फैला पोस्ट ...
सब के लिए कुछ न कुछ ...
मेरे लिए सब कुछ ...
श्रध्हा और नमस्कार

Anonymous said...

अत्यन्त ही रोचक ..
came to know about the new dimension of your talents ..
शायद .. शब्द अपर्याप्त हैं .. आपकी अभिव्यक्तियों के तारीफ में ..
बधाई ..
- डा जेएसबी नायडू (रायपुर)

Abhishek Ojha said...

बढ़िया. रामनामियों से जुड़ी एक और पोस्ट पहले भी पढ़ा था कहीं. याद नहीं आ रहा. शायद अनिलजी के ब्लॉग पर.

नीरज गोस्वामी said...

हमें तो राम नामियों का पता ही नहीं था...इस रोचक जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद...

नीरज

Puja Upadhyay said...

ऐसी कुछ ब्लोग्पोस्ट्स अंतरजाल को समृद्ध बनाती हैं और हमारे विश्वास की रक्षा करती हैं कि इन्टरनेट का सही इस्तेमाल किया जाए तो बहुत कुछ अच्छा किया जा सकता है.

आपकी पोस्ट पढ़ कर अभिभूत हूँ...ऐसी समग्र जानकारी और इतना रोचक विषय. फिल्म देखने के लिए क्या करना होगा�?

mukti said...

यह पोस्ट पढ़कर सहसा दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली सांस्कृतिक पत्रिका 'सुरभि' की याद आ गयी. हम उस समय बहुत छोटे थे, लेकिन उस धारावाहिक को अवश्य देखते थे. अपने देश और उसकी रंग-बिरंगी संस्कृति को जानने की तीव्र इच्छा ही थी. विशेषतः ग्राम्य संस्कृति मुझे सम्मोहित करती है. छत्तीसगढ और झारखंड की कुछ आदिवासी जातियों के विषय में मेरी मित्र जो कि एक NGO में काम करती है, मुझे बताती रहती है.
आपकी यह पोस्ट मुझे बहुत अच्छी लगी. आपके ब्लॉग पर पहले भी एक-दो बार आ चुकी हूँ, पर इधर कुछ दिनों से तो ब्लॉग पढ़ना ही छूटा हुआ है. आज पूजा ने अपने बज़ पर इसे शेयर किया तो सहसा इस ब्लॉग की याद हो आयी.

ashok said...

mujhe khushi hai ki chhattisgarh ki is durlabh sanskrutik aur adhyatmik parampara ko kisi ne to sanjone ki kohish ki.poori team ko badhai,

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Arvind Mishra said...

अद्भुत मगर प्रश्नों के समूह ने सहसा ही विदीर्ण कर डाला है !
रामनामियों का यह आस्था कुम्भ -कुल दाशरथी राम को नहीं मानता होगा ? यही न ?
यह कबीर के राम के उपासना का तो उत्सव नहीं है ?
क्या यह शूद्र /निचली जातियों तक सीमित है या उनमें विशेष प्रभावी है ?
यह मनुवादी व्यवस्था केप्रतिरोध /प्रतिक्रिया से उद्भूत तो नहीं?
मुझे उत्तर चाहिए ..प्लीज !

Arvind Mishra said...

और हाँ एक सद्प्रयास को मूर्त रूप लेने पर अपने आह्लाद को फिल्म की अवधारणा और निर्माण से जुड़े सभी व्यक्तियों से उन्हें बधायी देकर बांटना चाहता हूँ और अपने विशेषज्ञ महोदय को भी भूरि भूरि बधाई !

रंजना said...

अपूर्व रोचक व नवीन जानकारी रही यह मेरे लिए...

कृपया गाइड करें कि यह अनुपम वृत्तिचित्र कैसे उपलब्ध हो सकती है...

आपकी आभारी रहूंगी...

induravisinghj said...

अद्भुत एवं रोचक पोस्ट...

सूर्यकान्त गुप्ता said...

सर्वप्रथम नवरात्रि पर्व पर माँ आदि शक्ति नव-दुर्गा से सबकी खुशहाली की प्रार्थना करते हुए इस पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई व हार्दिक शुभकामनायें।
यदि परम सत्ता का बोध "राम" नाम लेने से होता हो तो इसमे क्या हर्ज है? यही कारण है कि "श्री रामचरित मानस" प्राय: घर घर मे देखा जा सकता है। "शंभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी। रामचरित मानस कवि तुलसी।" "राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछतायेगा प्राण जायेगा छूट्॥" उपरोक्त पंक्तियाँ दादी नानी से सुना करता था। बहुत ही रोचक जानकारी……सादर आभार।

सञ्जय झा said...

post pdhakar gyanvardh hua....saath hi 'vittchitra' dekhne ki bhu utsukta hue.......


pranam.

मैं और मेरा परिवेश said...

रामनाम से हमारी आत्मा जुड़ी है। कितना गहरा इंपैक्ट डाला है इसने हमारी सोसायटी में। राम से जुड़े स्थल छत्तीसगढ़ में हैं यह जानकर बहुत अच्छा लगता है। योग वशिष्ठ की टिप्पणी मुझे खास तौर पर बहुत अच्छी लगी कि सारी दुनिया किसी कहानी के प्रभाव से ही बनी है।

अभिषेक मिश्र said...

रामनामी समुदाय पर पहली बार जानने को मिला. वृत्तचित्र में आपकी भूमिका पर बधाई. शायद कभी सूचना प्रसारण विभाग के एग्जिबिशन में दिख जाये तो लूँगा. ऑनलाइन उपलब्ध हो तो बतईयेगा. आभार.

amrendra "amar" said...

gyanverdhak lekh ke liye aabhar..........

कविता रावत said...

bahut hi sundar aur rochal prastuti ke liye aabhar!

Harihar Vaishnav said...

Aapkii lekhanii aur prastutiyon ke liye kuchh bhii kahne ko shabdon kii kamii khal rahii hai. Aapko aur aapkii lekhanii ko kotishah naman. Vrittchitra dekhane kii utsukataa banii huii hai. Badhaaii aur aabhaar.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

भारतीय समाज के एक और उपेक्षित वर्ग के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा ... आपको इस सार्थक पोस्ट के लिए धन्यवाद !

abhi said...

अद्दुत पोस्ट!!फिल्म देखने की चाह मेरी भी है!!
जैसा की सभी ने ऊपर कहा की आपकी हर पोस्ट अनोखी होती है, बहुत कुछ सीखने और नया जानने को मिलता है.
खैर, अब ये बात भी कितनी दफा और रिपीट किया जाए :)