Friday, October 19, 2012

रविशंकर

छत्तीसगढ़ के सजग जोड़ा शहर दुर्ग-भिलाई से पत्रकार कानस्कर जी का फोन आया, रविशंकर जी नहीं रहे। मेरे कानों में कुछ देर स्मृति में दर्ज उनकी खिलखिलाहट बजती रही। उनसे आमने-सामने का संपर्क बहुत पुराना नहीं था, मगर अपेक्षा-रहित उनके भरोसे का संबल मुझे अनायास मिलता रहा। ऐसे निरपेक्ष विश्वासी कम ही होते हैं।
पं. रविशंकर शुक्‍ल
21.01.1927-10.10.2012
उनका निवास भिलाई के सेक्टर-5 में था। पहली बार उनके घर गया। बात होने लगी, 'घर ढूंढने में कोई अड़चन तो नहीं हुई', मैंने कहा- आपने अपने घर के रास्ते का नामकरण जीते-जी करा लिया है 'पं. रविशंकर शुक्ल पथ' (वस्तुतः उनके हमनाम पूर्व मुख्‍यमंत्री)। धीर-गंभीर, प्रशांत, लगभग भावहीन चेहरा और खोई सी आंखें, लेकिन देखकर सहज पता लग जाता कि उनके मन में लगातार कुछ चल रहा है, रचा जा रहा है, मेरा जवाब सुनकर, थोड़ा ठिठके फिर खिलखिला पड़े थे, बालसुलभ-दुर्लभ अविस्मरणीय हंसी। उदार इतने कि आपके रुचि की पुस्तक या ऐसी कोई वस्तु उनके पास हो तो सौंपने को उद्यत होते।

छत्तीसगढ़ का पारम्परिक नाचा-गम्मत पचासादि के दशक में 'लोकमंच' में बदलने लगा। श्वसुर डॉ. खूबचंद बघेल और पृथ्वी थियेटर के नाटकों से प्रेरित दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 1950 में 'छत्तीसगढ़ी देहाती कला विकास मंडल' स्थापना की, आरंभिक दौर में नाटक मंचित करते, लेकिन बड़ी और विशेष उल्लेखनीय प्रस्तुति 26 और 27 फरवरी 1953 को पिनकापार में हुई। यही मंच ऐतिहासिक 'चंदैनी गोंदा' की पृष्ठभूमि बना, जिसकी स्थापना 7 नवंबर 1971 को हुई।

दाऊजी के शब्दों में- ''भटकने की नियति आरंभ हुई। रात-रात भर गाड़ी में, कड़कती हुई धूप में, धूल भरे कच्चे रास्तों पर भटकना, गांवों में कलाकार ढूंढना ...।'' प्रतिभाएं तलाशी-तराशी गईं। लाला फूलचंद, लक्ष्मण दास, ठाकुरराम, भुलवा, मदन, लालू जुड़े। बांसुरी-संतोष टांक, बेन्जो-गिरिजा सिन्हा, तबला-महेश ठाकुर, मोहरी-पंचराम देवदास पर्याय बनते गए। टेलर मास्टर, कवि-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया, राजभारती आर्केस्ट्रा के गायक-अभिनेता भैयालाल हेड़उ, कविता हिरकने-वासनिक, केदार यादव, अनुराग ठाकुर साथ हुए।

दाऊजी और संगीतकार खुमान साव के साथ कवि-गायक रविशंकर शुक्ल की त्रयी, चंदैनी गोंदा की सूत्रधार बनी। शुक्ल जी का रचा शीर्षक गीत- 'देखो फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे। एखर रंग रूप हा जिउ मा, मिसरी साही घुर गे।' छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन के मिठास का प्रतिनिधि गीत बन गया।

रविशंकर जी की ज्यादातर रचनाएं लोकप्रिय हुई, इनमें से कुछ खास, जिन्होंने सभी के कानों में मिसरी घोली- 'झिमिर झिमिर बरसे पानी। देखो रे संगी देखो रे साथी। चुचुवावत हे ओरवांती। मोती झरे खपरा छानी।' फगुनाही गीत है- 'फागुन आ गे, फागुन आ गे, फागुन आगे, संगी फागुन आ गे, देखौ फागुन आ गे। अइसन गीत सुनाइस कोइली, पवन घलो बइहा गे।' और 'धरती मइया सोन चिरइया। देस के भुइयां, मोर धरती मइया।' जैसा गौरव-बोध का गीत। उनके रचे-गाए गीत बनारस की सरगम रिकार्ड कंपनी से बने पर स्‍वाभिमानी ऐसे कि गीत के बोल पसंद न आए, तो गीत गाने के फायदेमंद प्रस्‍ताव की परवाह नहीं करते।

आपने 'तइहा के बात ले गे बइहा गा' / 'फुगड़ी फू रे फुगड़ी फू' / 'सुन सुवना' / 'घानी मुनी घोर दे, पानी दमोर दे' जैसी पारम्परिक पंक्तियों को ले कर भी कई गीत रचे। उनकी लोरी 'सुत जा ओ बेटी मोर, झन रो दुलौरिन मोर। फेर रतिहा पहाही, अउ होही बिहनिया। आही सुरुज के अंजोर। सुत जा ...' में रात के मीठे सपने नहीं, बल्कि सुबह की आस का अनूठा प्रयोग है।
निधन के तीन दिन पूर्व का चित्र
सम्‍मानित हुए और इस अवसर पर गीत भी सुनाया
चित्र सौजन्‍य - आरंभ वाले श्री संजीव तिवारी, भिलाई

उनका पहला संग्रह 'धरती मइय्या' 2005 में चौथेपन में आया। अपनी बात में उन्होंने लिखा- ''चन्दैनी गोंदा, दौना पान, नवा बिहान व अनेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए मैंने गीत लिखे, किन्तु अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार न दे सकने का दुख छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन, दुर्ग द्वारा मानस भवन में अपने साहित्य सम्मान के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मैंने व्यक्त किया था। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के छोटे आर्थिक सहयोग से इस दुख से मुक्ति पा सका और यह संग्रह प्रस्तुत कर सका।'' इसी पुस्तक का अंतिम गीत है-

चल मोर संगी उसल गे बजार।
का बेंचे तॅंय हा अउ का बिसाये।
बड़े मुंधेरहा ले लेड़गा तॅंय आये॥

पिंजरा के धंधाये सोन चिरइ उड़ि गे।
माटी के चोला हा माटी म मिलि गे॥

तॅंय बइठे का देखत हावस आंखी फार-फार।
चल मोर संगवारी उसल गे बजार॥

एक दिन आए, बताया, अस्पताल से आ रहे हैं। कहा- तबियत ठीक है, बस एक कागज बनवाने गया था, आप भी इसकी प्रति अपने पास रखें, बिना कागज देखे मैंने अफसरी सवाल किया, ये बताइए कि करना क्या है, उन्होंने कहा, कुछ नहीं, बस अपने पास रखिए। तब मैंने कागज पर नजर डाली, वह था वसीयतनामा (मृत्‍योपरांत शरीर दान का घोषणा पत्र), मेरे और कुछ कहने से पहले रवानगी को तैयार हो गए।

अंतिम दिनों में अशक्त होने पर भी श्री जी संस्था के लिए सक्रिय रहे। भिलाई आ कर उनसे मिलने की बात हुई तो पते के लिए खास किस्‍म का 'विजिटिंग कार्ड' दिया। छपे हुए पते को 'बदल गया है' कहते हुए काट कर सुधारा।

अब उनका पता फिर बदल गया, लेकिन अपने गीतों में वे अभी भी हम सब के साथ हैं।

Monday, October 8, 2012

शेष स्मृति

2 अक्टूबर, नाटक और खास कर बिलासपुर से जुड़े लोगों के लिए, डॉ. शंकर शेष की जयंती के रूप में भी याद किया जाता है (यही यानि 2 अक्‍टूबर डॉ. शेष की पत्‍नी श्रीमती सुधा की जन्‍मतिथि है) और यह बीत जाए तो अक्टूबर की ही 28 तारीख उनकी पुण्यतिथि है। डॉ. शेष (1933-1981) के साथ बिलासपुर के नाटकीय इतिहास-थियेटर की यादें भी दुहराई जा सकती हैं।
डॉ. शंकर शेष
भागीरथी बाई शेष
बिलासपुर से जुड़ा बिलासा का किस्सा इतिहास बनता है, भोसलों और भागीरथी बाई शेष (1857-1947) के नाम के साथ। पति पुरुषोत्तम राव के न रहने पर निःसंतान मालगुजारिन भागीरथी बाई को उत्तराधिकारी की तलाश थी। बात आसान न थी लेकिन पता लगा कि उन्हीं के परिवार के भण्डारा निवासी विनायक राव पेन्ड्रा डाकघर में कार्यरत हैं। वसीयतनामा तैयार हो गया। कहानी, इतिहास बनी।

1861 में पृथक जिला बने बिलासपुर में रेल्वे के लिए जमीन की जरूरत हुई। उदारमना भागीरथी बाई जमीन दान देने को तैयार हुई, किन्तु अंगरेजों को 'देसी का दान' मंजूर नहीं हुआ और बताया जाता है कि 1885 में तत्कालीन मध्यप्रान्त के चीफ कमिश्नर सर चार्ल्स हाक्स टॉड ने बिलासपुर रेलवे स्टेशन और रेलवे कालोनी के लिए 139 एकड़ जमीन के लिए 500 रुपए मुआवजा दे कर बिक्रीनामा लिखाया।

विनायक राव की पत्नी सीताबाई थीं, उनके तीन पुत्रों में बड़े नागोराव हुए, जो उसी बिक्रीनामा के आधार पर भू-वंचित माने जा कर रेलवे में क्लर्क नियुक्त हुए। नागोराव की पहली पत्नी जानकीबाई और दूसरी पत्नी सावित्री बाई थीं।
सावित्री बाई नागोराव शेष
दूसरी पत्नी के पुत्रों में बड़े बबनराव, फिर बालाजी, तीसरे (डॉ.) शंकर (शेष), उसके बाद विष्णु और सबसे छोटे गोपाल हुए। नागोराव (निधन- 17 दिसम्‍बर 1960), जिनके नाम पर जूना बिलासपुर का पुराना स्कूल है, रेलवे में क्लर्क रहे, लेकिन सोहराब मोदी का थियेटर अपने शहर में देखने-दिखाने की धुन थी, नतीजन 1929 में श्री जानकीविलास थियेटर बना, जिसके लिए हावड़ा की बर्न एंड कं. लि. से सन '29 तिथि अंकित नक्शा बन कर आया था।
पारसी नाटकों, मूक फिल्मों और फिर बिलासपुर फिल्म इतिहास के लंबे दौर का साक्षी, दसेक साल से बंद यह थियेटर मनोहर टाकीज कहलाता है। हुआ यह कि पेन्‍ड्रा के जाधव परिवार के मंझले, मनोहर बाबू वहां सिनेमा का काम करते रहे, छोटे डिगू बाबू ने दुर्ग में तरुण टाकीज का काम संभाला और बड़े भाई, दत्‍तू बाबू बिलासपुर आ कर इसका संचालन करने लगे। इस तरह श्री जानकीविलास थियेटर का नया नाम 'मनोहर' भी पेन्‍ड्रा से आया और पेन्‍ड्रा वाले ही विनायक राव के पुत्र, बिलासपुर में थियेटर के पितृ-पुरुष नागोराव शेष हुए और हुए उनके पुत्र डॉ. शंकर शेष।
मनोहर टाकीज - श्री जानकी विलास थियेटर के साथ डॉ. गोपाल शेष
तब 'सारिका' में डॉ. शेष का कथन छपा था- ''सन 1979 की बात है। मैं भोपाल में था। उन दिनों विनायक चासकर ने मेरा नाटक 'बिन बाती के दीप' उठाया था। मुझे भी नाटक में एक भूमिका दी गई। कैप्टन आनंद की भूमिका। दो दिन रिहर्सल हुई फिर चासकर को लगा कि अगर शेष को कैप्टन आनंद बनाया गया तो और कुछ हो या ना हो, नाटक पिट जाएगा। तो लेखक की नाटक से छुट्‌टी हो गई। इस घटना के बाद मुझे एहसास हुआ और मैंने नियति की तरह इसे स्वीकार किया कि अभिनय करना मेरे बस की बात नहीं।'' यह संक्षिप्त किन्तु रोचक अंश डॉ. शेष की भाषा-शैली सहित उनकी प्रभावी सपाटबयानी का समर्थ उदाहरण है।
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डॉ. शंकर शेष की रचनाओं की व्यवस्थित सूची-जानकारी मिली नहीं, अलग-अलग स्रोतों से एकत्र कर डा. शेष की कृतियों को विधा और रचना वर्ष के क्रम में रखने का प्रयास किया है, जिसमें संशोधन संभावित है, इस प्रकार है-

नाटक
1955- मूर्तिकार, रत्नगर्भा, नयी सभ्यताःनये नमूने, विवाह मंडप (एकांकी)
1958- बेटों वाला बाप, तिल का ताड़, हिन्दी का भूत (एकांकी)
1959- दूर के दीप (अनुवाद)
1968- बिन बाती के दीप, बाढ़ का पानीःचंदन के दीप, बंधन अपने-अपने, खजुराहो का शिल्पी, फन्दी, एक और द्रोणाचार्य, त्रिभुज का चौथा कोण (एकांकी), एक और गांव (अनुवाद)
1973- कालजयी (मराठी व हिन्दी), दर्द का इलाज (बाल नाटक), मिठाई की चोरी (बाल नाटक), चल मेरे कद्‌दू ठुम्मक ठुम (अनुवाद)
1974- घरौंदा, अरे! मायावी सरोवर, रक्तबीज, राक्षस, पोस्टर, चेहरे
1979- त्रिकोण का चौथा कोण, कोमल गांधार, आधी रात के बाद, अजायबघर (एकांकी), पुलिया (एकांकी), पंचतंत्र (अनुवाद), गार्बो (अनुवाद), सुगंध (एकांकी), प्रतीक्षा (एकांकी), अफसरनामा (एकांकी)

पटकथा
1978- घरौंदा,1979- दूरियां, सोलहवां सावन (संवाद)

कहानी
1979 से 1981- ओले, एक प्याला कॉफी का, सोपकेस

उपन्यास
1956- तेंदू के पत्ते 1971- चेतना, खजुराहो की अलका, धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे (अपूर्ण)

अनुसंधान
1961- हिन्दी और मराठी तथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन
1965- छत्तीसगढ़ी का भाषाशास्त्रीय अध्ययन
1967- आदिम जाति शब्द-संग्रह एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन

जानकारी मिलती है कि उपन्यास ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ 1956 में लिखा जा रहा था, मगर अपूर्ण रहा। इसका पुस्तकाकार प्रथम संस्करण जगतराम एण्ड सन्ज, दिल्ली से 1990 में प्रकाशित हुआ। सिर्फ 91 पृष्ठों में देवव्रत-भीष्म के जन्म की पृष्ठभूमि से धृतराष्ट्र के गांधारी से विवाह की पृष्ठभूमि तक, महाभारत की कहानी के अंश की सारी नाटकीयता को जिस तरह मनोभावों के चित्रण और संवाद के साथ लिखा गया है, वह अपने अधूरेपन में भी पूरे जैसा महत्वपूर्ण है। यह भी देखा जा सकता है कि यह कहानी जहां छूटती है वह ‘कोमल गांधार‘ में जुड़ जाती है, मानों उन्होंने उपन्यास-नाटक का जोड़ा रचा हो। 

डॉ. शेष नाटक प्रेमियों में जिस तरह स्‍वीकृत थे, फिर उनके सम्‍मान-पुरस्‍कार का उल्‍लेख बहुत सार्थक नहीं होगा, लेकिन एक जिक्र यहां आवश्‍यक लगता है- नागपुर के प्रसिद्ध धनवटे नाट्य गृह का शुभारंभ 1958 में डॉ. शेष के नाटक 'बेटों वाला बाप' से(?) होने की सूचना मिलती है।
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''इस बार तुमको अरपा नदी दिखाएंगे और अरपा नदी के पचरी घाट,'' बम्बई से चलने के पहले डॉ. शंकर शेष ने तय किया कि अपनी पत्नी को अपने पुराने शहर के सारे ठिकाने, जिनके साथ उनका पूरा बचपन और बचपन की कितनी-कितनी कथाएं जुड़ी हैं, जरूर दिखाकर लाएंगे।

उपरोक्त अंश पैंतीसेक साल पहले 'रविवार' में छपी, सतीश जायसवाल की कहानी ''मछलियों की नींद का समय'' का है। कहानी के नायक डॉ. शंकर शेष हैं और एक पात्र सतीश (कहानी के लेखक स्वयं) भी है। पूरी कहानी डॉ. शेष के बिलासपुर, समन्दर-नदी-तालाब-हौज के पानी, जलसाघर-थियेटर-संग्रहालय-किला-मछलीघर और मछलियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। पंचशील पार्क की अहिंसक मछलियां। मामा-भानजा तालाब (शेष ताल) की बड़ी-बड़ी मछलियां। कहानी में वाक्य है- ''श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष के इस शहर में कुछ भी गैर-सांस्कृतिक नहीं हो सकता।'' और यह भी- ''डॉ. साहब, अरे मायावी सरोवर और अपने मामा-भानजा तालाब के बीच क्या कोई संबंध है?''

सतीश जी की इस कहानी के बहाने कुछ और बातें। बिलासपुर के साथ मछुआरिन बिलासा केंवटिन का नाम जुड़ा है।... ... ... श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष, बिलासपुर के चार 'एस' कहे जाते हैं। (यों इसमें पं. श्यामलाल चतुर्वेदी विशिष्ट हैं।) ... ... ... आंखों पर पट्‌टी बांधी गांधारी का डॉ. शेष का नाटक 'कोमल गांधार' और सत्यदेव दुबे के 'अन्धा युग' की अदायगी के साथ यहां संयोग बनता है कि डॉ. शंकर तिवारी ने 1958-59 में खोजा कि कांगेर घाटी, बस्तर की कुटुमसर गुफाओं में दो-ढाई इंच लंबी बेरंग मछलियां हैं, उजाले के अभाव में इनकी आंखों पर झिल्लीनुमा पर्दा भी चढ़ गया है। साथ ही उनके द्वारा 15-20 सेंटीमीटर मूंछों वाले अंधे झींगुर 'शंकराई कैपिओला' Shankrai Capiola की खोज प्रकाशित की गई। यह भी कि इस कहानी के बाद सतीश जी यदा-कदा बिलासपुर के पांचवें 'एस' गिने गए।

कहानी ''मछलियों ...'' का अंतिम वाक्य है- इस बार, बम्बई से साथ आई हुई पत्नी ने पहली बार आपत्ति की, ''यह मछलियों की नींद का समय है और लोग शिकार पर निकले हैं।''
थियेटर के भीतर अब अंधेरा-परदा
प्रमिला काले, जिनका शोध (1986) है
''नव्‍य हिन्‍दी नाटकों के संदर्भ में
डॉ. शंकर शेष के नाटकों का शिल्‍पगत अनुशीलन
सभी ऐतिहासिक पात्र, नामों के प्रति आदर।

Sunday, September 30, 2012

अक्षय विरासत

साहित्य और पत्रकारिता विरासत में प्राप्त लेखक डॉ. सुशील त्रिवेदी द्वारा पिता पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी की स्मृति को सादर समर्पित 'अक्षय विरासत' शीर्षक के साथ साहित्य और संस्कृति भी है। नामानुरूप संग्रह इसी प्रकार नियोजित है। प्रकाशकीय से यह स्पष्ट नहीं होता, जैसाकि लेखकीय प्राक्कथन में कहा गया है- ''इस ग्रंथ में उन लेखों का संग्रह प्रस्तुत है, जो साहित्य और कला के अंतर्संबंध को उजागर करते हैं।'' लेकिन यहां भी संग्रह के लेखों का पूर्व प्रकाशित, प्रकाशन संदर्भ और तिथि उल्लेख की दृष्टि से सूचना अधूरी है।

संग्रह के पहले हिस्से के 11 लेख साहित्य के हैं और बाद के 9 संस्कृति की विरासत पर हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से गहरे प्रभावित पहला लेख, साहित्य और संस्कृति के समन्वय पर है, उद्धरण है- ''रचनाकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दिक्‌ और काल में होने वाले घटनाओं और द्वन्द्वात्मकता को जानें और इसे जानने के दौरान वे इतिहास, संस्कृति, कला, रचना और भाषा के आधार बिन्दुओं को जानने की कोशिश करें।'' लगता है कि यह किसी कार्यशाला में दिया गया सूचनात्मक निर्देश है या इन पंक्तियों का लेखक स्वयं के रचनाकार को चेता रहा है। बहरहाल यह अंश लेख के और इस संग्रह के भी आशय को रेखांकित करता है।

इसके बाद पुस्तक के 54 पेज यानि लगभग एक तिहाई में तीन लेख, डा. त्रिवेदी की शोध-उपाधि और विशेषज्ञता-क्षेत्र यानि जगन्नाथ प्रसाद भानु के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हैं। इनमें भानु जी के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ छन्दः प्रभाकर का विस्तार से परिचय है। साहित्यशास्त्र पर हिन्दी में कम सामग्री मिलती है, बातें भी कम ही होती हैं, लेकिन इस पक्ष पर 'काव्य प्रभाकर' भानु जी की महत्वपूर्ण और विशिष्ट रचना है, संग्रह में पूरी गंभीरता और गरिमा के साथ यह प्रस्तुति स्तुत्य है। ऐसा लगता है कि भानु जी पर ये लेख अलग-अलग समय पर लिखे और प्रकाशित हुए, क्योंकि इनमें कहीं-कहीं दुहराव है। वैसे इन्हीं विषयों पर दो अन्य स्वतंत्र पुस्तकें, भानु जी की जीवनी और ''छन्दः प्रभाकर'' का नया संस्करण भी लेखक ने तैयार किया है।

हिन्दी के प्रथम साहित्यशास्त्री भानु जी पर लेखों के बाद हिन्दी साहित्य के कुछ अन्य 'पहले-पहल' हैं। ठाकुर जगमोहन सिंह हिन्दी रचना में फैंटेसी विधि के आविष्कर्ता के रूप में दर्ज हैं। भानु जी की तरह ठाकुर साहब की भी रचना भूमि भी छत्तीसगढ़ रही है। इस लेख में पृष्ठ 77 और 79 पर अशोक बाजपेयी के 'फैंटेसी' कथन का उद्धरण दुहराव लगता है। हिन्दी समालोचना के प्रवर्तक और हिन्दी के पहले कहानीकार माधवराव सप्रे की कहानी के लिए पृष्ठ 82 पर ''एक टोकरी मिट्टी'' नाम बताया गया है, यही कहानी देवीप्रसाद वर्मा संपादित पुस्तक में ''टोकरी भर मिट्टी'' शीर्षक से प्रकाशित है, जबकि पं. माधवराव सप्रे साहित्य शोध केन्द्र-समिति के प्रकाशनों में उल्लेख मिलता है कि 'छत्तीसगढ़ मित्र' के अप्रैल 1901 के अंक में छपी कहानी का शीर्षक ''एक टोकरी भर मिट्टी'' है। दो और 'पहले पहल' हिन्दी के पहले मौलिक नाटक 'आनंद रघुनंदन' के कुंवर विश्वनाथ सिंह पर तथा हिन्दी के पहले मौलिक उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री पर लेख भी महत्वपूर्ण हैं।

संस्मरण के रूप में 'मास्टर जी' पदुमलाल पुन्नालाल बख्‍शी पर लेख में छायावाद के उद्‌भावक माने जाने वाले पं. मुकुटधर पांडेय और छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के अग्रदूत कहे गए पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के उल्लेख से रेखांकित होता है कि इस संग्रह की योजना में ठोस उदाहरणों सहित, हिन्दी साहित्य के आरंभिक काल में छत्तीसगढ़ का अद्वितीय अवदान, अघोषित लेकिन विद्यमान है। संग्रह के एक अन्य लेख में भारत में नवजागरण के साथ हिन्दी की स्थिति का विवेचन महावीर प्रसाद द्विवेदी को केन्द्र में रख कर किया गया है, यह संक्षिप्त सा लेख देश और हिन्दी के साथ साहित्य पर युग-दृष्टि का जैसा नमूना है, वह सहज उपलब्ध नहीं होता।

संग्रह के दूसरे हिस्से के 9 लेखों में संस्कृति के सभी पक्षों को गहरी समझ लेकिन सहज अभिव्यक्ति सहित स्पर्श किया गया है। इस क्रम में ऋग्‍वेद, गांधी, नेहरू, गोविंदचन्द्र पांडे, रमेशचंद्र शाह, अमर्त्य सेन, भगवत शरण उपाध्याय, महर्षि अरविन्द, हर्मन गूज आदि के कथनों से अपनी स्थापनाओं को स्पष्ट और पुष्ट करते हुए डा. त्रिवेदी लिखते हैं- ''संस्कृति का स्वभाव आदान-प्रदान है। जो जाति केवल देना ही जानती है, लेना नहीं, तो उसकी संस्कृति समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत जो संस्कृति दूसरों से ग्रहण करती है, वह सदा फलती-फूलती रहती है। (पृष्ठ-118)''

संस्कृति संबंधी अन्य लेखों में लोक और शास्त्रीय संगीत पर विचार करते हुए स्पष्ट किया गया है कि- ''शास्त्रीय संगीत अपना जीवन रस सदैव लोक संगीत से ही लेता आया है। लोक में प्रचलित संगीत जब संस्कार और परिष्कार की प्रक्रिया के द्वारा प्रतिष्ठित होता है, जब उसका अनुसंधान सुसंस्कृत व्यक्ति करते हैं, जब उसका अपना व्याकरण बन जाता है, तब वह शास्त्रीय संगीत का पद प्राप्त करता है।'' इसके साथ एक स्थान पर लेखकीय व्यथा है कि- ''यह दुःख की बात है कि लोक का उपयोग कुछ कम सम्मानजनक ही होता है।'' लेखक, हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत के मिश्रण की जरूरत पर प्रश्न उठाता है लेकिन दोनों ही शैलियों को उनके मौलिक रूप के अनुसार विकसित होने में अपने किसी सुझाव या स्थापना के बजाय प्रबुद्ध और मननशील संगीतकार और संगीतज्ञों की भूमिका को आवश्यक मानता है। 'साहित्य और कलानुशासनों की अंतर्निर्भरता' लेख में चित्रकला, संगीत, नृत्य, उपसंहार उपशीर्षकों और भूमिका के साथ कला के स्वरूप पर समग्र दृष्टि से विचार किया गया है। लेख 'भारतीय शास्त्रीय नृत्यः प्राचीन से समकालीन तक' पढ़कर लगता है कि कलाप्रेमी सजग पाठक अपनी समझ और अनुभूतियों को वैचारिक क्रम देते हुए उसकी व्यवस्थित प्रस्तुति कर दे तो वह अन्य के लिए भी किस तरह पठनीय सामग्री और आम पाठक के लिए विषय की प्राथमिक समझ बनाने में भी मददगार हो जाता है।

आकाशवाणी भोपाल के लिए श्रीमती रूक्मिणी अरूंडेल तथा हबीब तनवीर जी के साक्षात्कार के अवसर को दो लेखों में संस्मरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए इन व्यक्तित्वों की कला साधना और विशिष्ट पहलुओं को उजागर किया गया है। संग्रह के अंतिम लेख में लोक कला को मानों परिभाषित करते हुए कहा गया है- ''लोक परंपरा में मानव की सौंदर्यमूलक, सृजनशीलता अलग-अलग रूपों में और अलग-अलग माध्यमों में होने वाली अभिव्यक्ति लोक कला है।'' इस पीठिका पर लोक कलाओं की मंचीय प्रस्तुति तथा श्री झाड़ूराम देवांगन से हुई विस्तृत चर्चा में लेखक पंडवानी के अनगढ़ व्याकरण के साथ कापालिक और वेदमती शाखाओं का अंतर बताते हुए असमंजस में जान पड़ता है, लेकिन पूरे प्रसंग को विचार मंथन की तरह प्रस्तुत करते हुए निष्कर्ष पर पहुंचता है- ''यह एक सच्चाई है कि न केवल पंडवानी वरन अन्य कला रूपों का भी स्वरूप अपना मूल ऐन्द्रिय आकर्षण खो रहा है। शायद यह हमारे आर्थिक विकास और सामाजिक बदलाव की एक कीमत है।''

पत्रकारिता-मीडिया का शास्त्र रच रहे सूचना-समृद्ध सर्जक डा. त्रिवेदी की सजग-स्मृति, संदर्भ-सूत्रों का समग्र या समन्वित नहीं बल्कि आधुनिक प्रवृत्ति का 'समावेशी' (उन्हीं के शब्दों में) प्रयोग करने के लिए सदैव तत्पर रहती है और इसके चलते वे समयबद्ध-नियमित बहुविध लेखन कर पाते हैं। वे राय बनाने में समय लगाते हैं, लेकिन प्रकट करने में नहीं और अपनी राय भी फैसले की तरह सुनाते हैं, इस मामले में उनकी बेबाकी और तेवर उन्हें प्रखर समीक्षक की प्रतिष्ठा दिलाती है। कई बार उनकी तटस्थ टिप्पणियां तल्ख हो जाती है और कभी विनम्रता, व्यंग्यात्मक भी। उन्हें विरासत में मिली पत्रकार दृष्टि विषय को सहज और आम रुचि के पाठकों के लिए भी उपयोगी बनाने में सहायक हो जाती है वहीं विश्लेषण और मूल्यांकन करते हुए वे गणितीय पद्धति का इस्तेमाल करते दिखते हैं। कहीं यह भी लगता है कि किसी घटना या दौर के उल्लेख बिना लिखी गई 'संपादकीय' पढ़ रहे हों।

प्रसंगवश, कला समीक्षक डा. त्रिवेदी मूलतः जनसंपर्क विभाग के, फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं और सुदीर्घ प्रेस-प्रशासनिक अनुभव सहित अब भी महती कार्य-दायित्व के साथ व्यस्त हैं। मध्यप्रदेश में संभागीय उत्सवों के आरंभ 1973 से भारत भवन की स्थापना 1982 तक का दौर रहा, जब वे भोपाल के कलाधानी बनने के साक्षी ही नहीं, अभिलेखक भी रहे और यह क्रम इसके पूर्वापर निरंतर रहा है। कलारूपों पर उनका इतना और ऐसा लेखन चकित करने वाला है। उल्लेखनीय यह भी है कि वे ऐसे दुर्लभ प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो कला समीक्षक कहलाना न सिर्फ पसंद करते हैं, बल्कि इस पहचान से सम्मानित भी महसूस करते हैं, उनका यह स्वभाव कला, परम्परा और विरासत के सम्मान का अपना ढंग माना जा सकता है।

संपादन-मुद्रण में प्रभावी कवर वाली इस पुस्तक में पृष्ठ 32 के आरंभ में भगीरथ प्रसाद, नाम के साथ पहले 'डॉ.' फिर इसी पेज के अगले पैरा में 'डाक्टर' है, पुस्तक में 'हिन्दी' कहीं 'हिंदी' भी छपा है, प्रूफ की कुछ अन्य भूलें खटकने वाली हैं। लेख-6 की छपाई में पंक्तियों के बीच का अंतर सामान्य से कम है तो लेख-8 का फान्ट कुछ बड़ा है।

पुस्‍तक विमोचन, 29 सितम्‍बर 2012, रायपुर
कृति, प्रकाशन और विमोचन के बीच पढ़नी हो, जैसा इस पुस्तक के लिए हो रहा है, तो उसके साथ नाजुक बर्ताव करना होता है, फिर यदि पढ़ते हुए उस पर लिखने की बात ध्यान में रहे तो सहज पाठकीय रसास्वादन भी मुश्किल होता है, पढ़ने का सहज आनंद जाता रहता है सो, मेरे लिए यह पुस्तक कुछ समय बाद दुबारा और शायद बार-बार पढ़नी जरूरी होगी, संदेह नहीं कि ऐसा उनके साथ भी होगा, जिनके हाथ यह कृति विमोचन के बाद पहुंचेगी।

इस 'अक्षय विरासत' के लगभग आधे लेख 2011 में प्रकाशित
लेखक की पुस्‍तक 'छत्‍तीसगढ़ और उसकी अनन्‍यता'
में भी शामिल हैं.
यह पोस्‍ट रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'इतवारी अखबार' के 21 अक्‍टूबर 2012 के अंक में प्रकाशित।