Saturday, September 3, 2022

दानीपारा शिलालेख-1969

पिछली पोस्ट, दानीपारा शिलालेख-2006 की पाद टिप्पणी 6 में विष्णुसिंह ठाकुर की पुस्तक ‘राजिम‘ में आए उल्लेख के आधार पर इस शिलालेख के राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के दीपावली विशेषांक में संक्षिप्त प्रकाशन का लेख किया गया है। इस संदर्भ को स्पष्ट करने के लिए राष्ट्रबंधु पत्र के संपादक श्री हरि ठाकुर के पुत्र श्री आशीष सिंह के सत्प्रयासों से उपलब्ध कराई गई सामग्री को उनकी सहमति उपरांत यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

उल्लेखनीय कि राष्ट्रबंधु साप्ताहिक में इस शिलालेख की प्राप्ति पहले समाचार के रूप में प्रकाशित हुई थी और उसके पश्चात लेख के रूप में। राष्ट्रबंधु में प्रकाशित लेख में शिलालेख के चर्चा या प्रकाश में आने की पृष्ठभूमि की भी जानकारी मिलती है। प्रथम दृष्टया लिपि के आधार पर शिलालेख का काल बारहवीं शताब्दी अनुमान किया गया था, किंतु संपादन करते हुए तिथि, पंद्रहवीं शती निर्धारित की गई। यहां प्रस्तुत करते हुए जानकारी अद्यतन करना समीचीन होगा कि लेख में आए नाम श्री कृष्ण कुमार जी दानी, के तीन पुत्र (स्व.) अनिरुद्ध दानी, विजय दानी, अजय दानी (अजय माला प्रकाशन वाले) हुए। अपनी सीमा में मेरे द्वारा शिलालेख की वर्तमान स्थिति जानने और फोटो लेने के प्रयास में पता लगा कि वर्तमान में दानीपारा वाले उक्त मकान में परिवार के सदस्य निवास नहीं कर रहे है। इस भूमिका के साथ, राष्ट्रबंधु में प्रकाशित दोनों अंश-

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दिनांक 17-4-69 में ‘बारहवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त‘ - ‘रायपुर नगर की प्राचीनता पर नया प्रकाश‘ शीर्षक से प्रकाशित समाचार-

रायपुर के दानीपारा में इसी सप्ताह एक ऐसे महत्वपूर्ण शिलालेख को जानकारी मिली है जिसे लिपि के आधार पर बारहवीं शताब्दी का माना जा रहा है। पुरातत्व के प्रकांड विद्वान श्री बालचन्द्र जैन को ज्यों ही इस शिला लेख की सूचना मिली, वे स्थल पर पहुंच गये किन्तु उनके पास उस शिला लेख की छाप लेने की सामग्री नहीं थी। उन्होंने स्थानीय म्युजियम के अधिकारी से इस संबंध में सामग्री मांगी किन्तु उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। इस दन्तनिपोरी के पश्चात श्री जैन ने किसी प्रकार शिलालेख का छाप ले ली है और जहां तक वे उसे पढ़ पाने में सफल हुए हैं उससे ज्ञांत होता है कि यह शिलालेख बारहवीं शताब्दी का है। इस शिलालेख में रायपुर, राजिम तथा आरंग में विभिन्न निर्माण कार्याे का उल्लेख है। इस शिलालेख की एक विशेषता यह भी है कि इसमें गोठाली नामक स्थान का भी उल्लेख है। इस स्थान का उल्लेख रतनपुर के शिलालेख में भी मिलता है। शिला लेख में सेनापति तथा प्रमुख वंशों के पुरुषों के नाम भी आये हैं।

शिलालेख के नीचे का भाग टूट गया है और अप्राप्य है। किन्तु जितना भी हिस्सा उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट है कि रायपुर नगर चौदहवीं शताब्दी से पूर्व बस गया था। इस सम्बन्ध में जब तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर रायपुर में प्राप्त यह प्राचीनतम शिलालेख कहा जा सकता यदि हरिठाकुर को प्राप्त शिलालेख को छोड़ दिया जाये।

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दीपावली विशेषांक, दिनांक 6-11.69 में श्री बालचन्द जैन लिखित लेख-

पन्द्रहवीं शताब्दी
रायपुर में प्राप्त
एक अप्रकाशित शिलालेख 
लेखक- श्री बालचन्द्र जैन

प्रस्तुत शिलालेख श्री कृष्ण कुमार जी दानी के दानीपारा (रायपुर) स्थित घर में रखा हुआ है। पहले यह उनके पुराने मकान की एक मोटी दीवाल में जड़ा हुआ था। पर जब उस मकान का पुनर्निर्माण कराया गया तो शिलालेख को वहां से हटाकर मकान के आंगन में लाकर रख दिया गया और तब से वह वही रखा हुआ है। लेखयुक्त प्रस्तर खंड की चौड़ाई 55 से.मी. और ऊंचाई 45 से.मी. है।

लेख में चौदह पंक्तियां हैं जो 40 से.मी. चौड़े और 29 से.मी. ऊंचे स्थान में उत्कीर्ण है। लेख की ऊपरली दो पंक्तियों के प्रारंभ का आधा भाग क्षत हो जाने के कारण वह भाग पढ़ा नहीं जा सकता। उसी प्रकार सबसे नीचे की पंक्ति के लगभग सभी अक्षरों का निचला भाग क्षतिग्रस्त है। बाकी पूरा लेख अच्छी हालत में है। अक्षर साफ, सुडौल हैं।

लेख की लिपि नागरी है। उसमें तिथि तो नहीं पड़ी है पर अक्षरों की बनावट के आधार पर उसे पंद्रहवीं शती ईसवी का अनुमान किया जा सकता है। शिलालेख की भाषा संस्कृत है प्रारंभ में ‘‘श्री गणेशाय नमः‘‘ और अंत में ‘‘मंगल‘‘ को छोड़कर बाकी पूरी रचना छन्दोबद्ध है। कुल श्लोक दस हैं और उन पर क्रमांक पड़े हुए हैं। तीसरे श्लोक के अंत में भूल से क्रमांक 2 पड़ गया है किंतु आगे के श्लोकों में वह भूल सुधार ली गई है। पहले और तीसरे से लेकर आठवें श्लोकों की रचना अनुष्टुप छंद में की गई है। बाकी तीन श्लोक अर्थात 2, 9 और 10 शार्दूलविक्रीड़ित छंद में हैं। ध्यान देने की बात है कि तीसरा श्लोक में छह चरण है। ऐसे उदाहरण पौराणिक काव्यों में पाए जाते हैं। रायपुर में ही प्राप्त हुए एक दूसरे शिलालेख कलचुरी वंश के राजा ब्रह्मदेव के राज्य काल में विक्रम संवत 1458 में लिखा था। प्रस्तुत लेख में ब के स्थान पर सर्वत्र व अक्षर लिखा गया है। पंक्ति 6 में चंद्रशेखर के ख के स्थान पर रट्ट और उसी प्रकार पंक्ति चार में द्वि के स्थान पर द्धि उत्कीर्ण है। श्लोकों के द्वितीय चरणों के अंत में भी दो दण्डों का प्रयोग किया गया है जबकि एक दंड का ही प्रयोग होना चाहिए था। श्लोकों के अंत में आने वाले म् को भी अनावश्यक रूप से अनुस्वार में परिवर्तित किया गया है।

इस प्रशस्ति में पीलाराय नामक व्यक्ति के चार पुत्रों द्वारा विभिन्न स्थानों पर कराए गए पुण्य कार्यों का विवरण दिया गया है। प्रशस्ति के प्रारंभ में गणेश जी को नमस्कार किया गया है। उसके बाद प्रथम श्लोक में किसी देवी की वंदना है। लेख का अंश खंडित हो जाने के कारण देवी का नाम नहीं मिलता पर संभवतः वह सरस्वती है। दूसरे श्लोक में शिवदास का उल्लेख मिलता है। उनके दो पुत्र थे, एक पीलाराय और दूसरा प्राणनाथ। तीसरे श्लोक में पीलाराय के चार पुत्रों के नाम गिनाए गए हैं और बताया गया है कि वे सभी धर्म तत्पर तथा गो-ब्राह्मणों के सेवक थे। पीलाराय के ज्येष्ठ पुत्र दरियाव के गोठाली नाम का एक रमणीक सरोवर खुदवाया था, चंद्रशेखर (शिव) के मंदिर का निर्माण कराया था और अत्यंत मनोहर बगीचा लगवाया था। ये सभी कार्य रायपुर में कराए गए थे जैसा कि पांचवें श्लोक से जान पड़ता है क्योंकि उस श्लोक में बतलाया गया है कि उस ज्ञानी और परमार्थी दरियाव ने ही रायपुर में राम भक्त मारुति (हनुमान) के मंदिर का भी निर्माण कराया था। छठे श्लोक में कहा गया है कि दरियाव से छोटे तेजीराज ने रायपुर में ही पाटी नाम का एक सुंदर स्वच्छ सुविख्यात और भव्य सरोवर खुदवाया था। तीसरे भाई महाराज (शुद्ध नाम महाराज) ने अपने पुण्य कार्यों को राजिम और आरंग में केंद्रित किया। सातवें और आठवें श्लोक से विदित होता है कि उसने राजीवनयन नामक स्थान में एक जगन्नाथ जी का मंदिर और एक खूब मजबूत शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा उसी प्रकार का आरिंग ग्राम में प्रफुल्ल कमलों से सुशोभित सरोवर और महामाया का मंदिर बनवाया।

प्रशस्ति के नौवें श्लोक में कनिष्ठ भ्राता मधुसूदन के गुणों की प्रशंसा की गई है। उसके द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख संभवतः दसवें श्लोक में कहा हो पर शिलालेख ही अंतिम पंक्ति अपाठ्य होने के कारण वह ज्ञात नहीं हो सका है। इस प्रशस्ति की रचना महेश्वर नामक पंडित ने की थी। उसने सभी प्रकार की विद्याएं प्राप्त कर ली थीं। दसवें श्लोक में रायपुर नगर की प्रशंसा की गई है। प्रशस्ति का पूरा पाठ नीचे दिया जा रहा है। इसे मैंने रायपुर के सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर श्री दिलीप विरदी द्वारा उतारे गए फोटोग्राफ से पढ़ा है।

(प्रशस्ति का पाठ चित्र में देख सकते हैं, पृथक से नहीं दिया जा रहा है।)

4 comments:

  1. सद्प्रयासों के लिए धन्यवाद. हमारी गौरव गाथा के प्रकटीकरण में आपसे बड़ा कोई नहीं. स्वस्थ, मस्त और ऐसे ही व्यस्त भी रहें ताकि मेरे जैसा अलाल कुछ पुरानी फाइलों को अलट पलट सके.

    ReplyDelete
  2. उल्लेखनीय उपलब्धि . रायपुर को नये परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है ۔

    ReplyDelete
  3. डॉ۔ मुकुल रंजन गोयल अंबिकापुर, छत्तीसगढ़

    ReplyDelete
  4. राहुल भैया के प्रयास सराहनीय हैं.

    ReplyDelete