Sunday, November 7, 2021

बस्तर - विवेकदत्त

संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व द्वारा 28-29 जनवरी 2014 को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी। गोष्ठी में आधार वक्तव्य प्रोफेसर विवेकदत्त झा, पूर्व विभागाध्यक्ष प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर का था। वह पुस्तिका के रूप में वितरित किया गया था, जो यहां प्रस्तुत है-

बस्तर का इतिहास एवं पुरातत्व

राज परिवारों की जय-पराजय तथा उपलब्धियों का लेखा-जोखा मात्र इतिहास नहीं है। इतिहास समाज का आइना है। संदर्भित काल के समाज की राजनीति, दर्शन, शिक्षा, साहित्य, कला-स्थापना, आर्थिक दशा, धर्म, परमपराओं, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने को उजागर करने वाला इतिहास ही समग्र इतिहास है। इसलिए इतिहास को पंचमवेद कहा गया है।

किसी क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास को स्वरूप देने में भूगोल तथा पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) की अहम भूमिका होती है। उर्वर समतल भूमि, प्रचुर जल संसाधन और अनुकूल पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में विकास की गति तीव्र होती है। इसके उलट पहाड़ों, वादियों ऊँची-नीची और आवागमन के लिए प्रतिकूल असमतल भूआकृति वाले अंचल भौतिक विकास में पिछड़े होते हैं, किन्तु सांस्कृतिक विकास में संदर्भ में अधिक समृद्ध होते हैं। बस्तर जैसे अपेक्षाकृत कम विकसित एवम् आधुनिक सभ्यता से लगभग अप्रभावित तमाम क्षेत्रों का समाज अपनी जड़ों से रहन-सहन, लोकगीतों, लोककथाओं, धार्मिक उत्सवों, सामाजिक संगठन तथा कठिनाइयों के निराकरण में प्रयुक्त देशज उपायों-तकनीकों में अतीत सूत्र होते हैं। इन्हीं सूत्रों के सहारे वर्तमान से अतीत तक पहुँचना होता है। मुरिया, माड़िया, समाज में कन्या के वयस्क विवाह, विवाह में उसकी सहमति के अधिकार, कन्या मूल्य, अबुझमाड़ में भूमि पर ग्राम का सामूहिक स्वामित्व, नवान्न बनाने के उपयोग के पूर्व पूजा, वृक्ष और पशुपूजा, घोटुल, अर्थव्यवस्था, शव विसर्जन, उपासना, अतिथि सत्कार, सद्यः प्रसूता नारी को प्रदत्त सुविधाएँ दी गई।

छत्तीसगढ़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित क्षेत्रफल में केरल राज्य से बड़ा आदिवासी बहुल यह अंचल विभिन्न संस्कृतियों का संगम स्थल है। विगत कुछ वर्षों में आवागमन के साधनों में बढ़ोतरी आवश्य हुई है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है तथा शासन की अनेक परियोजनाएँ जारी हैं। इस सबके बावजूद विकास की गति धीमी है। विशाल वन, पर्वत श्रृंखलाएँ, गहरी नदियां, नौकायन के लिए अनुपयुक्त अनेक छोटी-छोटी जलधाराएँ और नक्सलवादी गतिविधियाँ प्रगति में बाधक हैं। लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैले दुर्गम अबूझमाड़ में आवागमन के साधनों का लगभग अभाव है।

बस्तर अंचल रामायण काल में दण्डकारण्य, दक्षिण कोसल, महाभारत काल में कांतार, बुद्ध के समय कलिंग तथा गुप्तकाल में दक्षिणकोसल/ महाकांतार के अंतर्गत था। 9वीं-10वीं शताब्दी ईसवी में लगभग इस अंचल की संज्ञा चक्रकूट/ चककोट्य हो गयी। भ्रमरकोट्य बस्तर का एक क्षेत्र था। कालांतर में जब काकतीय राजवंश ने वर्तमान बस्तर ग्राम को राजधानी का गौरव प्रदान किया, तब उनके द्वारा शासित क्षेत्र की संज्ञा बस्तर हो गयी।

बस्तर के इतिहास तथा पुरातत्व को उजागर करने वाले विद्वानों में कर्नल ग्लसफर्ड, केप्टेन मेकवियर, केप्टेन इलियट, पण्डा बैजनाथ, केदारनाथ ठाकुर, एच. कृष्णा शास्त्री, वी. वी. मीराशी, रायबहादुर हीरालाल, एस.एन. राजगुरू, डब्लू.बी. ग्रिग्सन, वी.डी. कृष्णास्वामी, पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी, बी.सी. जैन, जेड. एम. कपूर, कृष्ण कुमार झा, हीरालाल शुक्ल और विवेक दत्त झा प्रमुख हैं। डेक्कन कॉलेज, पूना के कृष्णास्वामी ने सर्वप्रथम 1952 में प्रिहिस्टारिक बस्तर शीर्षक से शोधलेख प्रस्तुत कर इस अंचल के प्रागैतिहासिक अवशेषों पर प्रचुर प्रकाश डाला था। उसके पूर्व बस्तर रियासत के वनाधिकारी पं. केदारनाथ ठाकुर का ग्रन्थ बस्तर भूषण 1908 में प्रकाशित हो चुका था। उक्त ग्रन्थ बस्तर रियासत के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास तथा कलावशेषों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। 1906-07 में बस्तर रियासत के तत्कालीन प्रशासक पण्डा बैजनाथ ने केशकाल के समीप स्थित गढ़धनोरा के प्राचीन टीलों में उत्खनन द्वारा शिवलिंग और ईंटों से निर्मित मंदिर अवशेष उजागर किए। कालांतर में मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व निदेशालय के पुरातत्वविद डॉ. जी.के. चन्द्रौल के द्वारा सर्व श्री नरेश पाठक, वेद प्रकाश नगायच, जी.एल. रायकवार एवं राहुल कुमार सिंह के सहयोग से गढ़धनोरा में उत्खनन के द्वारा नगर, मंदिर समूह और भग्नावशेष प्रकाश में लाने का कार्य किया। पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी ने रामायणकालीन घटनाओं से बस्तर क्षेत्र का सम्बन्ध स्थापित करने का सफल प्रयास किया।

प्राक-इतिहास - 1965 से 1985 के मध्य प्रोफेसर विवेक दत्त झा द्वारा किए गये अनुसंधान के फलस्वरूप पाषाणयुगीन संस्कृतियों, महाश्म संस्कृतियों की विस्तृत जानकारी के साथ-साथ स्थापत्य और मूर्तिकला पर नवीन सूचनाएँ उपलब्ध हुई। संस्कृति, कला और राजनीति के केन्द्रों का भी उद्घाटन हुआ।

निम्नपुरापाषाण कालीन उपकरण - इन्द्रावती, नारंगी, कांगेर, शबरी, खोलाब, भंवरडिग, तालचेरू, मिनगाचल तथा छोटी-छोटी नदियों, नालों के तट पर और समतल मैदानों में प्राप्त हुए हैं। मनुष्य को न तो मजबूत और काट-छॉंट के लिए उपयुक्त पत्थरों की जानकारी थी न उपकरण निर्माण के तकनीकों की। इसलिए, इस काल के उपकरण उन मोटे कणों वाले बलुआ पत्थर, फ्लिट और क्वार्टजाइट पर बने हैं जो सर्वत्र आसानी से उपलबध हो जाते थे। ये उपकरण बड़े और असुघड़ हैं। उपकरण निर्माण में शारीरिक शक्ति की भूमिका प्रमुख थी, बुद्धि का योगदान नगण्य। अविकसित मस्तिष्क के साथ मानवजीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था। शारीरिक और आर्थिक जरूरतों के चलते पुरूष और नारी साथ तो रहते थे, किंतु उनमें भावनात्मक लगाव नहीं था। संकट में समय एक-दूसरे का साथ छूट जाता था क्योंकि परिवार प्रथा का जन्म नहीं हुआ था। निपट अकेले, लगभग नग्न मनुष्य का आश्रय स्थल प्राकृतिक गुफाएँ थी। कृषि से अनभिज्ञ मानव का जीवन कन्द, मूल, फल और आखेट पर निर्भर था। दीर्घकाल तक चलने वाले निम्न पुरा पाषाण काल में बस्तर में प्राप्त पाषाण उपकरणों में विकास की दो अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। प्रथम अवस्था में अनिश्चित आकार के बड़े उपकरणे में केवल कार्यांग (वर्किंग एज) के समीप काट-छॉट कर काम चलाउ भोथरी धार निर्मित की जाती थी। शेष भाग पर मूल पत्थर बना रहता है। दूसरी अवस्था में अपेक्षाकृत छोटे, लगभग नियमित आकार और तीक्ष्ण कार्यांग वाले उपकरण क्रमशः विकास के परिचायक हैं। मूठछुरा (हेण्डएक्स), खुर्चनी (स्केपर), गंडासा, कतरना (चॉपर, चॉपिंग टूल) और विदारक (क्लीवर) प्रमुख उपकरण हैं।

मध्यपुरापषाण काल (मिडिल पेलियोलिथिक एज) में लगभग 50,000 (पचास हजार) वर्ष पूर्व विकसित मस्तिष्क और दीर्घकालीन अनुभव के परिणामस्वरूप मनुष्य ने छोटे, बेहतर और कारगर बहुउपयोगी उपकरणों का निर्माण फ्लिंट, चर्ट, जास्पर और अगेट जैसे मजबूत तथा काट-छाँट के लिए उपयुक्त पत्थरों पर किया। संभवतः परिवार प्रथा का जन्म हो चुका था इसलिए परिवार में श्रम विभाजन प्रारंभ हुआ और पहले की तुलना में उदरपूर्ति के साधन जुटाना आसान हो गया। जलवायु परिवर्तन के कारण इस युग में उपकरण निर्माण की तकनीक में विकास हुआ। बुद्धि और शक्ति के उपयोग द्वारा पत्थर की भारी तथा बाणफलक जैसे सपुच्छ उपकरण बनाये जाने लगे। तीर-धनुष का उपयोग किया जाने लगा। बाणफलक, खुर्चनी, अग्रास्त्र, ब्लेड उस काल के प्रमुख उपकरण हैं। बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में इस काल के सभी उपकरण प्राप्त हुए हैं।

भारत में लगभग 35,000 वर्ष पहले एक और जलवायु परिवर्तन के साथ उच्च पुरा पाषाण काल (अपर पेलियोलिथिक एज) का प्रारंभ हुआ। होमोसेपियन्स (प्रज्ञ मानव) नामक मानव प्रजाति का पदार्पण हुआ। वह विकसित मस्तिष्क वाला था। जलवायु परिवर्तन के कारण धरती की सतह पर एकत्र बर्फ की चादर पिघली और वनस्पतियों का विस्तार हुआ। विकसित तकनीक द्वारा बहुत छोटे, तीक्ष्ण और सुडौल उपकरण निर्मित किए जाने लगे। उपकरणों को लकड़ी और हड्डी की मूठ लगाकर उपयोग में लाया गया। उक्त उपकरणों द्वारा वनोपज को काटकर संग्रहीत किया जाने लगा। अतिरिक्त मांस का संग्रह भी होने लगा। श्रम विभाजन के फलस्वरूप वनोपज संग्रह, आखेट, उपकरण निर्माण का दायित्व परिवार के अलग-अलग सदस्यों का होता था। ब्लेड और तक्षणी (ही व्यूरिन) प्रमुख उपकरण थे। भाला, धनुष-बाण के उपयोग द्वारा जलजीवों का आखेट भी प्रारंभ हुआ। इसी युग में हड्डी, लकड़ी और मुलायम पत्थरों पर मानव, पशु और पक्षी आकृति निर्मित की जाने लगी। हड्डी, सींग, सीपी और पत्थर के आभूषणों का निर्माण भी प्रारंभ हुआ। बस्तर में उक्त आभूषण और शैल चित्र (इस काल के) नहीं मिले हैं। देश के कुछ क्षेत्रों में इस काल के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। चर्ट, फ्लिंट ओपल, जस्पर, अगेट, चालसीडोनी, क्वार्ट्स और गनफ्लिंट जैसे बेहतर पत्थरों पर लम्बे और पतले ब्लेड निर्मित किए गये।

मध्यपाषाण काल (मेसोलिथिक एज) में बाणफलक, छेदक, तक्षणी, आरी ब्लेड जैसे सूक्ष्म पाषाण उपकरण ब्लेड तथा निपीड़ प्रविधि द्वारा निर्मित किए गये। अधिकतर प्राकृतिक गुफाओं, शैलगृहों में समय गुजारने वाले मानव ने अपने चतुर्दिक प्रकृति, दैनिक कार्यकलापों, पशु-पक्षी और आखेट में चित्रों का आरेखन गुफा की दीवार और छत पर किया गया। गेरू, हेमेटाइट पत्थर, पीली तथा खड़िया मिट्टी और पत्तियों के रस द्वारा बनाये गये ये चित्र तत्कालीन मानव जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हैं। मृतक के शव को गुफा के फर्श पर दफनाने की प्रथा के प्रचलन के प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। इस समय तक सामाजिक संगठन का सूत्रपात हो गया, जिसके द्योतक विशाल उपकरण निर्माण स्थलों (फैक्टरी साइट) और चित्रित शैलगृहों की बड़ी संख्या है। वस्तु विनिमय प्रथा प्रचलित थी। संभवतः, फैक्टरी समूह और चित्रित गुफाओं में समीप आवश्यक वस्तुओं का लेन-देन किया जाता था। खुले मौसम में मैदान में अस्थाई शिविर बनाये जाते थे।

नवपाषाण युग (नियोलिथिक एज) - पाषाण युग का अंतिम चरण था। पर वास्तव में इस युग में हुई सांस्कृतिक क्रांति के फलस्वरूप विकास क्रम ने गति प्राप्त की। बढ़ी हुई जनसंख्या की उदरपूर्ति आखेट और वनोपज पर संभव नहीं थी। विकल्प के रूप में पशुपालन और कृषि को अपनाया गया इसके लिए मानव शक्ति की आवश्यकता अनिवार्य थी। फलतः बड़े और सुसंगठित कबीले का जन्म हुआ और खेती के लिए स्थाई रूप से मनुष्य एक ठिकाने पर रहने लगा। इसी वजह से झोपड़ी का जन्म हुआ। अनाज और जल संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन बनाये गये तथा खेती और झोपड़ी के लिए जंगल की सफाई हेतु बड़े प्रस्तर कुठार छेनी, बसूला बनाये गये जो धारदार तथा नियमित आकार के होते थे। अनजान मनुष्य ने जंगल जलाकर, नुकीली लकड़ी से मिट्टी गोड़कर पहाड़ी ढलानों में खेती करना प्रारम्भ किया। बस्तर जिला के अबूझमाड़ में इसी प्रकार की चलखेती आज भी प्रचलित है। तब की भॉति अब भी बेबर या झूम खेती की जमीन पर गॉव और कबीले का स्वामित्व होता है। संग्रहीत अनाज, पशुधन और स्त्रियों पर अधिकार के लिए कबीले एक दूसरे पर आकमण करने लगे। आक्रमणों से रक्षा के लिए ऊँचे पठारों पर बस्ती बसकर पत्थर की बाड़ उसके चारों ओर बनाई जाती थी। बस्तर जिला के वेदरे (कुटरू में समीप), गढ़चंदेला (लोहाण्डीगुड़ा के समीप), गढ़धनोरा और तीरथगढ़ में पठार पर ऐसे आवास स्थल पाये गये हैं। बस्तर अंचल में छोटे डोंगर, गढ़चंदेला और दोरनापाल में पत्थर की चिकनी-धारदार कुल्हाड़ियां प्राप्त हुई है।

महाश्म शवागार संस्कृति (मेगालिथिक कल्चर) - इस संस्कृति के उद्भव केन्द्र एवं उद्भव काल पर मत वैभिन्य है। यह माना जाता है कि मध्यभारत में इसका उद्भव काल 1000 ईसापूर्व के लगभग है। इस लौहकालीन संस्कृति में मानव शव को कब्र में रखकर उसके चहुँ ओर विशाल प्रस्तर खण्डों को लम्बवत खड़ाकर कब्र को चपटे-मोटे पत्थर से ढंक दिया जाता था। समीप ही एक विशाल प्रस्तर खड़ा करने की प्रथा थी। शव के साथ अन्न, जल, अस्त्र-शस्त्र और पकी मिट्टी के पात्र, आभूषण इत्यादि रखे जाते थे। वस्तुतः यह पुनर्जन्म पर आस्था का संकेत है। दूसरे लोक की यात्रा में और वहां पहुंचने पर मृतक को भोजन, जल और जीविकोपार्जन के लिए अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता होगी। इस विश्वास के वशीभूत यह किया जाता था।

उल्लेखनीय है कि बस्तर जिले में मुरिया और माड़िया समाज में यह परम्परा आज भी जीवित है। नेला कांकेर, करकेली, इरपा, हांदामुडा, संकनपल्ली, राये, गोंगपाल सहित अन्य अनेक स्थलों में बड़े प्रस्तर खण्डों से आवृत्त कब्र और/अथवा लम्बवत खड़े किए गये पत्थर के, स्मृति स्तंभ प्राप्त हुए हैं। कहीं-कहीं काष्ठ स्तंभ, जिसपर मानव और पशु-पक्षियों, सरीसृपों की आकृतियाँ उकेरी गयी हैं, भी हैं। ऐसे स्तंभों को ‘माड़िया खुंटा‘ कहा जाता है। बस्तर में प्राप्त कब्रों में मिट्टी के बर्तन, नृत्य की वेशभूषा कुल्हाड़ी, तीर धनुष और बैल की पूँछ तथा सींग रखी जाती है।

मानव शव को भूमि में दफनाकर उसके ऊपर कब्र निर्मित करने की प्रथा ऋग्वैदिक संस्कृति में प्रचलित थी। ऋग्वेद (ऋग्वेद 10,15,14,10,18,13) में मानव शव को भूमि में गाड़कर उसके ऊपर काष्ठ स्तंभ स्थापित करने का उल्लेख है। मृतक शरीर की उपलब्धि के लिए भूमिगृह (शवाधान) में धनुष सहित सभी वस्तुएँ रखे जाने का निर्देश भी है (ऋग्वेद, 7,89,1) यजुर्वेद, तैत्तिरीय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण में भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलते हैं।

शैलचित्र, शैलोत्कीर्ण चित्र (रॉक पेन्टिंग, रॉक एनग्रेविंग) - उच्च पुरापाषाण काल में प्रज्ञ मानव ने अवकाश के क्षणों में काष्ठ, अस्थि और प्रस्तर की छोटी प्रतिमाओं, आभूषणों के निर्माण के साथ-साथ नैसर्गिक रंगों से गुफाओं के अंदर और बाहर रेखाचित्र बनाना प्रारंभ किया। इन रेखा चित्रों में सूर्य, चंद्र, तारा, पशु-पक्षी, आखेट, समूह नृत्य, जलधारा, अस्त्र-शस्त्र और तत्कालीन जीवन के विविध पक्षों का प्रदर्शन हुआ है। यह परम्परा परवर्ती कालों में चलती रही। देश के आंतरिक अंचलों में आज भी मिट्टी की बनी झोपड़ियों की वाह्य दीवारों पर पशु-पक्षियों, सूर्य, चन्द्र, तारा और वृक्षों के रंगीन चित्र पाये जाते हैं।

बस्तर में उच्च पुरापाषाण युगीन और मध्य पाषाण युगीन शैल चित्र अब तक नहीं मिले हैं। ताम्रपाषाण काल में और उसके परवर्ती चित्र बस्तर के शैलगृहों में चित्रकूट जलप्रपात के समीप मटनार, बड़े डोंगर के समीप आलोर की लिंगसहाय डोंगरी, उसूर के समीप नडपल्ली और नम्बीधारा, एड़का तथा चारामा, कांकेर क्षेत्र में पाये गये हैं। विभिन्न स्थलों में प्राप्त कत्थई रंग से चित्रित हैं। अबूझमाड़ में भीतरी क्षेत्र में स्थित एरिमट्टी और कोहकापाल क्षेत्र में अनेक चित्रित शैलगृह हैं। नम्बीधारा में चित्रित गुफा के प्रवेश के पार्श्व में उत्कीर्ण मानव मस्तक बस्तर में प्राप्त एकमात्र रॉक एनग्रेविंग है।

शैलचित्र तथा महाश्म शवागारों के अतिरिक्त बस्तर में आद्य ऐतिहासिक काल (प्रोटोहिस्टारिक पीरियड) के अवशेष उपलब्ध नहीं हैं। दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के समीप नदी में जाने वाली कच्ची पगडण्डी में खुदे हुए एक गर्त में मुझे धूप में सुखाई ऐसी ईंटे प्राप्त हुई थी जिसका माप प्राक-हड़प्पा संस्कृति की ईंटों के समान है। इस प्रमाण की पुष्टि हेतु सघन अन्वेषण की आवश्यकता है। स्मरणीय है कि बस्तर में आद्य ऐतिहासिक संस्कृति के मिट्टी के भाण्ड प्राप्त नहीं हुए हैं। इसलिए, इस संदर्भ में कोई निर्णय लेना तर्कसंगत नहीं है।

परोक्ष प्रमाण ऋगवैदिक काल तथा महाकाव्य काल की संस्कृति से बस्तर का सम्पर्क प्रदर्शित करते हैं। वैदिक साहित्य में वर्णित शव विसर्जन, पुनर्जन्म पर विश्वास, पितृपूजा, कन्या का वयस्क विवाह, मुण्डन, नामकरण संस्कार इत्यादि बस्तर के मूल निवासियों में प्रचलित हैं। मातृदेवी (वस्तुतः उर्वरा की देवी पृथ्वी) की उपासना ऋग्वैदिक काल, हड़प्पा संस्कृति से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में प्रचलित रही है। मातृदेवी, लज्जिका, नग्निका इत्यादि संज्ञाओं से विभूषित देवी प्रतिमाएं हड़प्पा संस्कृति, परवर्ती संस्कृतियों में निर्मित की जाती थी। बस्तर के मुरिया, माड़िया धरती की माता के रूप में उपासना करते हैं, उनके समाज की प्रत्येक झोपड़ी में पूर्वजों के लिए एक अन्नपात्र रहता है। काष्ठनिर्मित स्मृति स्तंभ (माड़िया खूटा) पर अन्य आकृतियों के साथ मातृदेवी की आकृति उकेरे जाने के कुछ उदाहरण मिले हैं। गढ़बोधरा में ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में निर्मित मातृदेवी की एक प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है। उक्त प्रतिमा में नारी का मस्तक और दोनों हाथ प्रयोजन वश नहीं उकेरे गये हैं। उन्नतवक्ष आकृति कूल्हों के बल दोनों पैर फैलाकर बैठी है, जिसके दोनों घुटने और दोनों पंजे बाहर की ओर मुड़े हैं, योनि समादर पूर्वक प्रदर्शित है। अलंकृत कटिमेखला, अनेक पादवलयों और कड़ों से सुशोभित देवी के स्कंध पार्श्वों में गोलाकार कमलाकृति उकेरी गयी है।

रामायण काल में छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल कहा गया है। दक्षिण कोसल में बस्तर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र कांतार के नाम से जाने जाते थे। कांतार की समुद्रगुप्त के शासन काल में, महाकांतार संज्ञा हो गयी, जिसमें शासक व्याघ्रराज को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। यह व्याघ्रराज संभवतः नल शासक वराहराज का पूर्वज था। बस्तर का भगवान राम से सम्पर्क था। प्रोफेसर के.डी. वाजपेयी और पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी के इस मत से लेखक की पूर्ण सहमति है कि भगवान राम बनवास काल में बस्तर गये थे। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में जिस चित्रकूट का उल्लेख हुआ है वह बस्तर का चित्रकूट जलप्रपात है। स्मरणीय है कि, वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में भी चित्रकूट की चर्चा है। इस प्रकार, अरण्यकाण्ड और अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट भिन्न-भिन्न थे। अयोध्याकाण्ड का चित्रकूट कामतानाथ गिरी (जिला बांदा) में है। रावण को निर्मूल करने के पश्चात पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते हुए श्रीराम ने भगवती सीता को दण्डकारण्य में स्थित चित्रकूट का दर्शन कराया, उसका वर्णन कालिदास कृत रघुवंश में हुआ है। पंडित सुंदरलाल त्रिपाठी ने इस मत की स्थापना की जिसका समर्थन प्रोफेसर वाजपेयी और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान रेवाप्रसाद द्विवेदी ने किया है। रघुवंश में चित्रकूट के जलप्रपात तथा वहाँ की प्रकृति की जो चर्चा है वह पूर्णतः बस्तर के चित्रकूट से मिलती है। बस्तर में प्रचलित परम्पराएँ और स्थलनाम यथा शबरी नदी, शबर (सौरा), बीजापुर और नारायणपुर जिलों में स्थित कोसलनार ग्राम, कुशनार ग्राम (कुश के समर्पित), श्री राम का अंचल से सम्पर्क प्रदर्शित करते है। रघुवंश और वाल्मीकि रामायण के विवरणों से स्पष्ट है कि कुश का दक्षिण कोसल पर अधिकार था। ऐतरेय ब्राह्मण, मत्स्य पुराण तथा वायुपुराण में शबर जाति को दक्षिणापथ का निवासी कहा गया है।

महाभारत कालीन प्रख्यात नरेश निषधपति नल का संबंध बस्तर क्षेत्र से रहा है। महाभारत के नलोपाख्यान, शतपथ ब्राह्मण और कथासरित सागर में वर्णित नल का निषध देश बस्तर का निकटवर्ती क्षेत्र में रहा है। यद्यपि, विद्वान क्रमशः बरार, दक्षिण मालवा, उच्च और निम्न विन्ध्य क्षेत्र, बरार के उत्तर-पश्चिम में सतपुड़ा के निकट विन्ध्य और पयोष्णी के निकटवर्ती क्षेत्र में निषधदेश की स्थिति मानते है, तथापि नलोपाख्यान (महाभारत) में यह विवरण मिलता है कि राज्यच्युत राजा नल 10 दिनों की पदयात्रा कर कोसल (दक्षिण कोसल) के राजा ऋतुपर्ण की राजधानी सुपला पहुंचा। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में भी कोसल नरेश ऋतुपर्ण की राजधानी सुफला बतलायी गयी है। स्मरणीय है कि कोसल (अयोध्या) में शासकों की सूची में ऋतुपर्ण का नाम नहीं मिलता है, न ही सुफला का उल्लेख उत्तरकोसल की राजधानी के रूप में कहीं हुआ है। अतः ऋतुपर्ण को दक्षिण कोसल का शासक मानना होगा, उसकी राजधानी तक 10 दिनों की पदयात्रा द्वारा पहुंचने वाला राजा नल दक्षिण कोसल के अंतर्गत किसी क्षेत्र का शासक रहा है। बस्तर, कोरापुट और दुर्ग जिलों में प्रारंभिक नल शासकों की मुद्राएँ, पुरालेख और कलावशेष पाये गये हैं। कोरापुट जिले में स्थित पोड़ागढ़ की पहचान प्रारंभिक नल शासकों की राजधानी पुष्करी से की गयी है। प्रारंभिक नल नरेश अपने आप को पौराणिक नल का वंशज मानते थे। इसलिए, पौराणिक नल का राज्य निषध, कोरापुट, बस्तर, रायपुर, दुर्ग जिलों में कहीं स्थित था। परवर्ती नल शासक विलासतुंग का अभिलेख भी राजिम (जिला रायपुर) में है।

इतिहास - बस्तर का प्रारंभिक इतिहास उजागर करने वाले साक्ष्य अनुपलब्ध हैं। नंद-मौर्य काल में नंदों और मौर्यों ने बिहार से लेकर गोदावरी नदी घाटी और उड़ीसा सहित भारत के बड़े क्षेत्र, अपने अधिकार में कर लिया। संभवतः कलिंग विजय के उपक्रम में अशोक ने बस्तर पर अधिकार किया था। आलोर ग्राम के समीप चित्रित गुफा में मौर्यकालीन शंखलिपि में एक अभिलेख है। कलिंग नरेश खारवेल ने भी बस्तर को पद्दलित किया होगा। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला के अंतर्गत मल्हार में सातवाहन शासक वेदश्री की मृण्मुद्रा, गुंजी और किरारी के अभिलेख, छत्तीसगढ़ में सातवाहनों का अधिकार प्रदर्शित करते हैं। किन्तु, बस्तर पर उनके अधिकार का प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है। बस्तर ग्राम में प्राप्त विष्णु की एक प्रतिमा सातवाहन कला से प्रभावित है। दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) और महाकांतार (बस्तर क्षेत्र) पर जब सम्राट समुद्रगुप्त ने आक्रमण किया तब बस्तर पर व्याघ्रराज का अधिकार था। व्याघ्रराज संभवतः नल शासक वराहराज का पूर्वज था। ग्रहण मोक्ष नीति के अंतर्गत समुद्रगुप्त ने दक्षिणापथ में पराजित राजाओं को स्वाधीन कर दिया। फलस्वरूप, नल नृपति बस्तर और समीपवर्ती क्षेत्रों पर शासन करते रहे। गुप्तवंश के नल राजाओं से संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहे। इसीलिए, परवर्ती नल शासक भवदत्तवर्मन ने गुप्तों के केन्द्र प्रयाग तक जाकर वहाँ दान दिया।

उत्तर बस्तर में पाला, गुबरहिन तथा गढ़धनोरा के कला और स्थापत्य अवशेष, छोटे डोंगर का पाँचवी शताब्दी का अभिलिखित सती स्तंभ नल शासन काल के हैं। प्रतीत होता है कि गढ़धनोरा उत्तर बस्तर में नलों का प्रशासनिक केन्द्र था। गढ़घनोरा के समीप एडेंगा में नल राजाओं की स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। भवदत्तवर्मन और अर्थपति शैव धर्मावलम्बी थे, तो स्कंदवर्मन वैष्णव। स्कंदवर्मन ने पुष्करी में विष्णु मंदिर निर्मित किया था, भवदत्त और अर्थपति की स्वर्णमुद्राओं में शिव का स्तवगान किया गया है। एडेंगा के अतिरिक्त कुलिया (जिला दुर्ग) में भवदत्तवर्मन, अर्थपति, स्तंभ और नंदनराज नामक नल राजाओं की स्वर्ण मुद्राएँ पायी गयी हैं। राजिम (रायपुर) में परवर्ती नल नरेश विलासत्तुंग का अभिलेख है। नलों का दूसरा प्रशासनिक केन्द्र पुष्करी में था। पुष्करी की पहचान कोरापुट जिले के पोड़ागढ़ से की गई है, वहां स्कंदवर्मन का अभिलेख और विष्णुमंदिर के अवशेष हैं। भवदत्तवर्मन नलवंश का सर्वाधिक शक्तिशाली नरेश था। उसने वाकाटक नरेश को पराजित कर उनकी राजधानी नंदिवर्धन पर कब्जा कर लिया था। पृथ्वीषेण द्वितीय के बालाघाट ताम्रपत्र तथा अजंता अभिलेख से जानकारी मिलती है कि कलिंग, कुन्तल, अवंति, मालवा, कोसल तथा आन्ध्र पर वाकाटकों का अधिकार था। कोसल (दक्षिण) आंध्र, और कलिंग से सम्पृक्त बस्तर पर भी वाकाटकों का अधिकार था। प्रोफेसर मिराशी के अनुसार भवदत्त ने वाकाटक नरेन्द्रषेण को पराजित किया था और वाकाटक राजधानी विवर्धन से अपना अभिलेख प्रचलित किया। भवदत्त का साम्राज्य कोरापुट, बस्तर, रायपुर और दुर्ग जिलों तक विस्तृत था। उसके द्वारा प्रयाग यात्रा और दान दिये जाने का अभिलेखीय प्रमाण भी है।

वाकाटक नरेन्द्रषेण के पुत्र पृथ्वीसेन द्वितीय ने समकालीन नरेश अर्थपति को, जो भवदत्त का पुत्र और उत्तराधिकारी था, पराजित कर नल साम्राज्य के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया अर्थपति का अधिकार बस्तर कोरापुट तक सीमित रह गया। कुछ साल बाद वासिम शाखा के वाकाटक अधिपति हरिषेण ने 480 ईसवी के पूर्व नल शासक अर्थपति को पुनः पराजित कर उनकी राजधानी पुष्करी को नष्ट कर दिया। उनके आक्रमण के दौरान संभवतः अर्थपति मारा गया। अर्थपति के अनुज स्कंदवर्मन ने वाकाटक हरिषेण से नल प्रदेश छीनकर पूर्वजों के राज केन्द्र पुष्करी का जीर्णाेद्वार किया। नंदनराज और स्तंभ नामक नल शासकों ने स्वर्णमुद्राएँ प्रचलित की थी, किन्तु उनके शासन काल और घटनाओं की जानकारी प्रदान कारने वाले प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। उनकी स्वर्ण मुद्राओं के आकार-प्रकार, भार और उन पर अंकित आकृति तथा प्रतीक का अन्य नल शासकों की स्वर्ण मुद्राओं से पूर्ण साम्य है, इस आधार पर उन्हें नलवंशी शासक माना गया है।

बस्तर क्षेत्र को एक राजनीतिक सूत्र में पिरोकर स्थायी शासन प्रदान करने का श्रेय नलवंश को है। उन्होंने ही सर्वप्रथम इस अंचल में स्वर्णमुद्राएँ प्रचलित की। देव प्रतिमाओं तथा देवमंदिरों के निर्माण का सूत्रपात किया। उल्लेखनीय है कि उड़ीसा के कोरापुट जिले का अधिकांश क्षेत्र ईसवी सन 1811 तक एवं रायपुर जिले का सिहावा क्षेत्र ईसवी सन 1830 तक बस्तर रियासत के अंतर्गत था। नलों के उपरांत पाण्डुवंशियों ने कुछ काल के लिए इस क्षेत्र पर अधिकार किया, बाद में जो चालुक्य कीर्तिवर्मन के हाथों पराजित हुए। पाँचवी शताब्दी ईसवी से बिलासपुर, दुर्ग, रायपुर, कालाहांडी, सम्बलपुर और रायगढ़ क्षेत्र पर शासनरत शरभपुरिया शासकों का आधिपत्य भी बस्तर पर रहा प्रतीत होता है। छोटे डोंगर (बस्तर) में प्राप्त छठी शताब्दी ईसवी के एक नष्टप्रायः शिलालेख में ‘शरभ‘ शब्द पठनीय है।

सातवीं-आठवीं शताब्दी के लगभग बस्तर और उसके आसपास चक्रकूट/ चककोट्य/ शक्करकोट्टम/चित्रकूट कहलाया। राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग के सामंत राजा बेमुलवाड़ के युद्धमल प्रथम ने चित्रकूट के अभेद्य प्राकृतिक दुर्ग को जीत लिया। चित्रकूट का यह प्राकृतिक दुर्ग बस्तर के चित्रकूट जलप्रपात के समीप इन्द्रावती और नारंगी नदियों के संगम पर स्थित गढ़बोधरा दुर्ग है। तीन ओर से नदियों तथा चौथी ओर से मिट्टी की सुरक्षा दीवार से घिरा हुआ यह दुर्ग वास्तव में अभेद्य रहा है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि कामतानाथ गिरि (जिला बांदा) के चित्रकूट को युद्धमल प्रथम ने हस्तगत किया था। किन्तु, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वहाँ कोई दुर्ग नहीं है, न ही युद्धमल का मध्यभारत क्षेत्र पर भी अधिकार रहा है। पम्पकृत विक्रमार्जुन विजय में उल्लेख है कि राष्ट्रकूट कृष्ण द्वितीय के सामंत बड्डेग प्रथम सोलदगुण्ड ने चक्रकूट पर विजय प्राप्त की। इस अंचल पर अधिकार हेतु राष्ट्रकूटों और चालुक्यों में दीर्घकालीन संघर्ष हुआ। इस संघर्ष के दौरान कभी चालुक्यों और कभी राष्ट्रकूटों का इस पर अधिकार रहा। चालुक्य विजयादिव्य तृतीय ने अपने विजय अभियान में चक्रकूट को अग्निसात कर दिया था यह मल्लपदेव के पीठापुरम अभिलेख में वर्णित है।

10वीं शताब्दी के अंतिम चरण में बस्तर के बड़े क्षेत्र पर नागवंश का अधिकार हो गया। नागवंश के शासन काल में परमार, चालुक्य और कलचुरि नरेश बस्तर पर आक्रमण करते रहे। उदयपुर प्रशस्ति, जयनाद अभिलेख और नवसाहसांकचरित परमारों का बस्तर क्षेत्र पर अधिकार प्रदर्शित करते हैं। नवसाहसांकचरित के अनुसार दक्षिण कोसल के विजेता परमार नरेश सिंधुराज ने भोगवती के नाग शासक शंखपाल की कन्या शशिप्रभा से विवाह किया था। शंखपाल चक्रकूट में राज्य करने वाले भोगवती पुरवरेश्वर नाग शासकों का पूर्वज था और कलचुरि जगदेव ने संयुक्त अभियान के दौरान काकरय (कांकेर) नरेश को पराजित किया।

चक्रकूट पर अधिकार के लिए पश्चिमी चालुक्यों और चोलों के एकाधिक आक्रमण 11वीं शताब्दी में हुए। चक्रकूट पर ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राजेन्द्र चोल प्रथम ने अधिकार कर लिया उस समय संभवतः नृपतिभूषण, जिसका 1023 ईसवी का अभिलेख एर्राकोट में प्राप्त हुआ है, चक्रकूट का अधिपति था। चोल राजेन्द्र प्रथम ने चक्रकूट में अपने प्रतिनिधि के रूप में संभवतः नाग धारावर्ष को नियुक्त किया। कुछ समय पश्चात् 1047 ईसवी के लगभग चालुक्य सोमेश्वर प्रथम ने चक्रकूट पर आक्रमण किया। उक्त आक्रमण में चालुक्य राजा ने सेनापति नागवर्मा ने चक्रकूट में कालकूट धारावर्ष को पराजित किया यह नांदेड़ अभिलेख में लिखा है। यह धारावर्ष चक्रकूट में चोल राजेन्द्र प्रथम का प्रतिनिधि था। 1055 ईसवी के लगभग चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ ने चक्रकूट पर विजय प्राप्त की जिसका उल्लेख विक्रमांकदेवचरित तथा जयनाद अभिलेख में हुआ है। 1068 में लगभग वीर राजेन्द्र चोल ने चक्रकूट में चालुक्य नरेश को पराजित किया जिसका विवरण तिरूम्मकुदल अभिलेख में है। पराजित चालुक्य शासक सोमेश्वर प्रथम था। चोल कुलोत्तुंग प्रथम ने भी बस्तर पर अधिकार किया था। तमिल युद्ध काव्य कलिंगत्तुत्परणि के साथ-साथ अभिलेखों द्वारा भी सिद्ध हुआ है।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर नृपतिभूषण को बस्तर का प्रथम नागवंशी शासक माना गया है जिसका 1023 ई. का अभिलेख प्राप्त हुआ है। किंतु परोक्ष साक्ष्य इंगित करते हैं कि नागवंश का आधिपत्य नृपतिभूषण के पूर्व भी बस्तर पर था। नवसाहसांकचरित में सिंधुराज के द्वारा भोगवती के नाग शासक शंखपाल की कन्या से विवाह किये जाने का विवरण है। बस्तर के ज्ञात नागवंशी शासकों की उपाधि उनके अभिलेखों में ‘भोगवतीपुरवरेश्वर‘ मिलती है। अतः दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भोगवती अधिपति शंखपाल को नृपतिभूषण का पूर्वज बस्तर का नागवंशी शासक स्वीकार करना चाहिए। इसके भी पूर्व संभवतः वल्लभराज नामक नागवंशी शासक बस्तर पर शासन कर रहा था। चित्रकूट के निकटवर्ती उपेत नामक ग्राम में 9वीं शताब्दी ताम्रपत्र मिला है जिस पर ताम्रलेख ‘चक्रकूट शासति वल्लभराजुलु नागावंतश‘ है। निःसंदेह वल्लभराज 9वीं शताब्दी में बस्तर का नाग नृपति था। प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक को छोटे डोंगर में एक प्रस्तर अभिलेख मिला है। 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उक्त अभिलेख में वंखकादिव्य नामक शासक का नामोल्लेख हुआ, परंतु उसके वंश का उल्लेख करने वाला अंश नष्ट हो गया है। अतः वह नागवंश का ही था यह अंतिम रूप से नहीं कहा जा सकता। जो भी हो, बस्तर में नागवंश का इतिहास 11वीं शताब्दी से नहीं बल्कि वल्लभराज के साथ 9वीं शताब्दी से प्रारंभ स्वीकार किया जाना चाहिए।

बस्तर में नाग शासकों की वंशावली, उनके अनुकम को लेकर मत वैभिन्य है। कृष्णाशास्त्री तथा बालचन्द्र जैन के मतानुसार 1060 ई. के बारसुर अभिलेख में उल्लिखित धारावर्ष जगदेक भूषण उत्तराधिकारी था नृपतिभूषण का। धारावर्ष जगदेकभूषण एक ही व्यक्ति था। एस.एन. राजगुरू के अनुसार धारावर्ष और जगदेकभूषण भिन्न शासक थे। वस्तुतः नृपतिभूषण और धारावर्ष को अलग शासक स्वीकार करना चाहिए। चन्द्रादित्य के उक्त बारसुर अभिलेख में धारावर्ष के लिए ‘महाराज‘ संज्ञा प्रयुक्त हुई है, इसलिए यह भ्रम पैदा हुआ है। किन्तु उसी अभिलेख में जगदेकभूषण के माण्डलिक चन्द्रादित्य के लिए की ‘महाराज‘ भी उपाधि प्रयुक्त होना विचारणीय है। दरअसल, धारावर्ष और चन्द्रादित्य दोनों ही जगदेकभूषण के अधीन माण्डलिक राजा थे। धारावर्ष की राजमहिषी गुण्डमहादेवी के नारायणपाल अभिलेख तथा कुरुसपाल अभिलेख में धारावर्ष की उपाधि राजभूषण है। नांदेड़ अभिलेख में चालुक्य सेनापति नागवर्मा के द्वारा चक्रकूट में कालकूट धारावर्ष को पराजित किये जाने का उल्लेख है, जगदेवभूषण का नामोल्लेख नहीं हुआ है। प्रतीत होता है कि 1028 ईसवी के लगभग राजेन्द्र चोल प्रथम ने बस्तर के नागशासक नृपतिभूषण को पराजित कर धारावर्ष को अपने अधीन चक्रकूट (बस्तर) का शासक नियुक्त किया। चोलों के प्रतिद्वंदी चालुक्य सोमेश्वर प्रथम और उसके पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ ने 1044 ई. से लेकर 1055 ई. के मध्य चक्रकूट पर आक्रमण कर वहाँ के शासक चोल राजा के प्रतिनिधि धारावर्ष को पराजित कर जगदेकभूषण को चक्रकूट का राजा नियुक्त किया। धारावर्ष और जगदेवभूषण दो अलग-अलग नागवंश की शाखा के थे। प्रतीत होता है कि दोनों परस्पर संबंधी थे। इसीलिए जगदेकभूषण ने धारावर्ष को अपना माण्डलिक राजा नियुक्त कर दिया। अभिलेखिक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि 1060 ईसवी तक धारावर्ष निश्चित रूप से जगदेकभूषण का माण्डलिक रहा है।/div>

जगदेकभूषण के शासन काल का अंत कब हुआ यह ज्ञात नहीं है। जगदेकभूषण के पश्चात् मधुरांतकदेव, जो संभवतः उसका वंशज था, भ्रमरकोट्य मण्डल का शासक हुआ 1065 ईसवी के पूर्व। 1069 ईसवी के पूर्व धारावर्ष के पुत्र सोमेश्वर, मधुरांतक देव का वध कर चक्रकूट का शासक बन बैठा। दीर्घकालीन शासन, लगभग 1069 से लगभग 1111 ईसवी तक, शासन करने वाला नाग शासक सोमेश्वर इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली नृपति था। उसके शासन काल में आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में बहुत विकास हुआ। उसकी स्वर्ण मुद्राओं और उसके काल में निर्मित देवालयों, प्रतिमाओं तथा जलाशयों द्वारा समृद्धि की सूचना मिलती है। कुरुसपाल अभिलेख में सूचना सन्निहित है कि सोमेश्वर ने रतनपुर, लंज्जि (लॉजी, जिला बालाघाट), लेम्णा (लवण, जिला रायपुर) वज्र (बैरागढ़, जिला चन्द्रपुर), वेंगी और भद्रपट्टम (भाण्डर) सहित दक्षिण कोसल के 06 लाख 96 हजार ग्रामों पर अधिकार कर लिया। बिलासपुर, रायपुर और बालाघाट सहित लगभग सम्पूर्ण दक्षिण कोसल पर छिंदक नाग शासक में सोमेश्वर रतनपुर के कलचुरि शासक जाजल्लदेव को पराजित कर दक्षिण कोसल का बड़ा भू-भाग हस्तगत का लिया गया। 1114 ईसवी में पूर्व जाजल्लदेव प्रथम ने सोमेश्वर पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया। यह विवरण जाजल्लदेव प्रथम के 1114 ईसवी के रतनपुर अभिलेख में है। सोनसरी (जिला बिलासपुर) में नाग सोमेश्वर की तथा नारायणपाल (बस्तर) में जाजल्लदेव की स्वर्णमुद्राओं की प्राप्ति से परस्पर राजाओं के संघर्ष की पुष्टि होती है। सोमेश्वर देव नाग के शासनकाल का गंगमहादेवी का 1108 ईसवी का बारसूर अभिलेख सिद्ध करता है कि सोमेश्वर 1108 ईसवी तक निश्चित रूप से चक्रकूट का अधिपति था। उसकी मृत्यु 1108 से 1111 ईसवी में मध्य कभी हुई। गुंड महादेवी का 1111 ईसवी का नारायणपाल अभिलेख कन्हरदेव के शासनकाल में उत्कीर्ण किया गया है। सोमेश्वर का उत्तराधिकारी कन्हर संप्रभु शासक न होकर संभवतः रतनपुर के कलचुरि वंश के करद सामंत की भॉति राज्य करता रहा। उसके शासन काल के एकमात्र नारायणपाल अभिलेख में कन्हर की उपाधि श्री मद्वीर कन्हरदेव है। कन्हरदेव के पश्चात नागवंश का क्रमिक इतिहास प्रमाणों के अभाव में पुनर्निमित करना कठिन है। कन्हरदेव के उत्तराधिकारी कलचुरियों के अधीन शासक थे। सोमेश्वर की पराजय के साथ ही चक्रकूट का नागवंश कलचुरियों के अधीन हो गया था। नरसिंहदेव (1218-1224) के उत्तराधिकारी जयसिंहदेव के अभिलेख मध्य बस्तर में पाये गये हैं जिससे प्रतीत होता है कि नरसिंहदेव के पश्चात् नागवंश का अधिकार मध्य बस्तर तक सीमित रह गया। बारसुर के खण्डित शिलालेख में उल्लिखित कन्हरदेव तथा टेमरा सती स्तंभ लेख के हरिश्चन्द्रदेव को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से नागवंशी शासक नहीं माना जा सकता। उक्त अभिलेखों में शासकों की विरूदावली और वंश का उल्लेख नहीं हुआ है।

कतिपय विद्वानों का मत है कि चककूट के नागवंश में एक से अधिक सोमेश्वरदेव और एक से अधिक कन्हर नामक शासक हुए हैं। 1224 के पश्चात् कांकेर को छोड़कर शेष बस्तर में स्थानीय शासकों का अधिकार रहा यह प्रतीत होता है। कांकेर के शासक अपने आप को सोमवंशी जानते थे। 1192 से 1320 ईसवी तक कांकेर (प्राचीन काकरय) के शासकों की उपाधि ‘सोमवंशान्वय प्रभूत महामाण्डलिक‘ रही है। वे संभवतः कलचुरिवंश के महामाण्डलिक थे। इन सोमवंशी शासकों की प्रारंभिक राजधानी ‘सिहावा‘ रही है। वाघराज अथवा कर्णराज के समय उनका राजकेन्द्र कांकेर हो गया। कर्णराज, पम्पराज और भानुदेव के अभिलेख और ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। सोमवंशी शासकों के राज्यकाल में निर्मित मंदिर और प्रतिमाएं सिहावा, देवहद और कांकेर क्षेत्र में हैं। कर्णराज इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसके सिहावा अभिलेख के अनुसार कर्ण ने पड़ोसी शासकों को पराजित कर उनसे कर वसूल किया। भानुदेव इस वंश का अंतिम ज्ञात शासक है।

ईसवी 1424 से लेकर भारतीय गणतंत्र की स्थापना तक बस्तर पर राज्य करने वाले राजवंश की स्थापना अन्नमदेव द्वारा की गई। अन्नमदेव किस वंश का था इसे लेकर मत वैभिन्य है। दिक्पालदेव के शासनकाल के 1703 ई. के दंतेवाड़ा शिलालेख, अन्नमदेव के वंशजों के अन्य अभिलेखों के आधार पर वेंकटरमनैय्या ने अन्नमदेव को वारंगल का काकतीय शासक प्रतापरुददेव का अनुज माना है। इस मत को स्वीकार करने में बड़ी बाधा यह है कि ईसवी 1323 में प्रतापरुद्र का देहावसान हुआ और उसके 99 वर्ष उपरांत ई. 1424 में अन्नमदेव ने बस्तर में शासन प्रारंभ किया। दो भाईयों के मध्य इतनी अवधि का अंतराल संभव नहीं है। प्रतीत होता है कि ‘प्रतापचरितम्‘ नामक ग्रन्थ के भ्रामक विवरण को सत्य मानकर दंतेवाड़ा अभिलेख के लेखक भगवान मिश्र ने और उनका अनुक्षरण कर वेंकटरमनैय्या ने अन्नमदेव को काकतीय स्वीकार किया। प्रतापचरितम् में वर्णन है कि प्रतापरुद्र की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र वीरभद्र वारंगल की गद्दी पर बैठा और प्रतापरुद्र का अनुज अन्नमदेव विन्ध्यपर्वत की ओर चला गया परन्तु वास्तव में वारंगल नरेश प्रतापरुद्र के पुत्र वीरभद्र तथा अनुज अन्नमदेव का प्रातपरुद्र यशोभूषण नामक ग्रन्थ और 1357 तक के वारंगल के काकतीय अभिलेखों में उल्लेख नहीं है। ‘प्रतापरुद्र यशोभूषण‘ नामक ग्रन्थ माननीय प्रतापरुद्र के जीवनकाल में लिखा गया है। प्रतापरुद्र निःसंतान था। बस्तर के लोकगीतों में बस्तर नरेश को ‘चालकी राजा‘ (चालुक्य राज) कहा गया है। तब क्या बस्तर के अंतिम राजवंश को चालुक्य स्वीकार किया जाना चाहिए किन्तु, इस गत की पुष्टि हेतु साक्ष्य अनुपलब्ध हैं। पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी में मतानुसार नेल्लोर और कर्नूल के समीप स्थित राज्य एडुव में 15वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में शासनरत तेलुगु चोड़ अन्नमदेव अथवा अन्नमराज बस्तर के अंतिम राजवंश का संस्थापक था। उसके पुत्र का नाम वीरभद्र था।

मुदाएं - नल और नागवंशी शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ तथा कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम भी स्वर्ण मुद्राएँ बस्तर में पायी गई है। 

नल शासकों की मुद्राएं - 1939 में कोण्डागांव तहसील में स्थित केसकाल के समीप स्थित एडेंगा ग्राम में वराहराज, भवदत्तवर्मन तथा अर्थपति की स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। उक्त मुद्राओं का प्रकाशन प्रोफेसर मीराशी ने ‘न्यूमिस्मेटिक सोसायटी ऑफ इंडिया जर्नल‘ में किया है, (जे.ए.एस.आई., क्रमांक 1, पृष्ठ 28 इत्यादि)। लखनऊ संग्रहालय में संग्रहीत नल नृपतियों की चार स्वर्ण मुद्राएं रायबहादुर प्रयागदयाल ने प्रकाशित की है। (जे.ए.एस.आई., क्रमांक 33, खण्ड 2 पृष्ठ 115 इत्यादि)। दुर्ग जिले के कुलिया ग्राम में प्राप्त मुद्रानिधि में नल शासक भवदत्त तथा अर्थपति की मुद्राओं के साथ नंदनराज और स्तम्भ की स्वर्णमुद्राएं प्राप्त हुई हैं। नंदनराज और स्तंभ को भी नलवंशी शासक स्वीकार किया गया है, (जे.ए.एस.आई., अंक 45 इत्यादि) तथा प्राच्य प्रतिमा, जिल्द 5, अंक 1, पृ. 69-74)। सोमेश्वरदेव नाग की स्वर्णमुद्राएं बिलासपुर जिले के सोनसरी ग्राम में मिली हैं।

नाग शासकों की मुद्राएं - सन् 1957 में बस्तर के निकटवर्ती और सन् 1811 तक बस्तर रियासत में सम्मिलित कोरापुट जिला के ग्राम कोडिंगा के समीप नाग नृपतियों की स्वर्ण मुद्राएं पायी गई है। 

आदिवराह द्रम्म - आदिवराह द्रम्म मुद्राएं नामक चार रजत मुद्राएं बस्तर ग्राम में उपलब्ध हुई थी (न्यूमिस्मेटिक नोट्स एण्ड मोनोग्राफ्स, वाराणसी, पृ. 14)। 

कलचुरि जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्णमुद्राएं - नारायणपाल (बस्तर) में कलचुरि नरेश जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्ण मुद्राएं मिली है। 

अभिलेख तथा ताम्रपत्र - बारसुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, पोटीनार एर्राकोट, टेमरा (सती स्तंभ लेख), कुरुसपाल, राजपुर (ताम्रपत्र), गढ़िया, कर्णराज का सिहावा अभिलेख, पम्पराज के कांकेर और पाढ़िपट्टन से प्रचलित ताम्रपत्र, भानुदेव का कांकेर अभिलेख के द्वारा बस्तर में इतिहास पर प्रचुर प्रकाश पड़ा है। छोटे डोंगर का 4-5वीं शती का स्तंभी लेख अपठनीय है।

छोटे डोंगर में 9वीं 10वीं शताब्दी का वंखकादित्य का अभिलेख, इसी काल की एक अन्य अभिलेख, केसरपाल का छठी-सातवीं शताब्दी का अभिलेख और वल्लभराज का उपेत ताम्रपत्र द्वारा मध्यकालीन बस्तर का इतिहास समृद्ध हुआ है।

मूर्तिकला - प्रतिमा वह लक्षण है जो लक्ष्य को प्रदर्शित करता है। मनोगत भाव का स्थूल प्रतीक ही प्रतिमा है। देव विशेष और व्यक्ति विशेष की आकृति की सूचक प्रतिमा है। कला के चारुत्व, रस, अर्थ, छंद और रुप हैं। भावजनित रस की अभिव्यक्ति जब रुप (आकृति) द्वारा होती है तब वह प्रत्यक्ष और प्रभावी होती है। प्रतिमा द्वारा धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है। हड़प्पा संस्कृति से प्रतिमा निर्माण के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद (2/23) में इन्द्र की रंगीन प्रतिमा का विवरण है। ऋग्वेद में अन्यत्र (ऋग्वेद 4, 17, 4) कहा गया है कि इस इन्द्र को बनाने वाला कोई चतुर कारीगर होगा। अथर्ववेद तथा यजुर्वेद में भी प्रतिमा का उल्लेख है। उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, स्मृतियों एवं महाकाव्यों में प्रतिमा और प्रतिमा निर्माण के उल्लेख हैं। कौशाम्बी, मथुरा, राजघाट और तक्षशिला में मौर्यकाल की पूर्ववर्ती मातृदेवी की प्रतिमाएं मिली है। मौर्यकाल से प्रतिमा निर्माण की अविच्छिन्न परम्परा रही है।

बस्तर अंचल में ईसा की तीसरी शताब्दी से प्रतिमाएं निर्मित होने लगी थी। बस्तर ग्राम में तीसरी शताब्दी ईसवी की विष्णु प्रतिमा है, छोटे डोंगर में चौथी शती ईसवी का सती स्तंभ जिस पर मानव दम्पति की आकृति उकेरी गयी है। पांचवी-छठी शताब्दी की प्रतिमाएं पाला, गुबरहिन-गढ़धनोरा, देवधनोरा और भोंगापाल में है।

9वीं-10वीं शताब्दी से बस्तर में वैष्णव, शैव, ब्रह्मा, सौर, गाणपत्य, शाक्त, सम्प्रदायों, बौद्ध और जैन धर्मों की प्रतिमाएं, पौराणिक पशुओं, पशु-पक्षियों, नाग और मानव और मिथुन प्रतिमाएं गढ़ी जाने लगीं। इस क्षेत्र की प्रतिमाओं में उड़ीसा, दक्षिण भारत और दक्षिण कोसल की कलचुरिकालीन कलाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रतिमाओं पर तंत्र का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। समन्वित देव प्रतिमाओं का सृजन भी बस्तर में हुआ है। भैरमगढ़ में प्राप्त हरि-हर-हिरण्यगर्भ-पितामह की एक अत्यंत विरली प्रतिमा है। इसी प्रकार बड़े डोंगर में काले पत्थर पर निर्मित लक्ष्मी-नृसिंह की दुर्लभ प्रतिमा है। जिसमें नृसिंह के बायीं जंघा में बैठी लक्ष्मी का मुख भी नृसिंह जैसा (सिंहमुखी) प्रदर्शित किया गया है। ब्रह्मा भी एक ऐसी प्रतिमा दंतेश्वरी मंदिर बारसुर के सभामण्डप में सुरक्षित है जिसमें एकमुखी, चतुर्भुजी, ऊर्ध्वकेशी ब्रह्मा ललितासन मुद्रा में हंस पर आसीन हैं। उनेक हाथों में क्रमशः अक्षमाला, श्रुक, वेद और हंस प्रदर्शित हैं। परिसर में ऊपर की ओर 06 हंसों भी एक पंक्ति है। ब्रह्मा के हाथ में हंस प्रदर्शित करने के शास्त्रीय निर्देश नहीं है। उस मायने यह एक बिरली प्रतिमा है जो अन्यत्र नहीं पायी गयी है। दंतेवाड़ा में द्विभुजी शिव की पद्मासन मुद्रा में आसीन प्रतिमा के वामहस्त में प्याला और दक्षिण हस्त में चाबुक है। यह शास्त्रीय निर्देशों से हटकर है।

दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा में उमा-महेश्वर की दो विशिष्ट प्रतिमाएं हैं। पहली प्रतिमा में द्विभुजी देवता की जंधा पर विराजमान द्विमुखी देवी दायें हाथ में नंदी की पूंछ पकड़ी हुई हैं। दूसरी उमा-महेश्वर प्रतिमा में देवी शिव की दायीं जंघा पर आसीन हैं तथा दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए हैं। भैरमगढ़ में पद्मासन मुद्रा में प्रदर्शित, खड्ग, डमरु, त्रिशूल और कपाल धारिणी देवी के मस्तक पर शिवलिंग, प्रदर्शित है। प्रधानिक रहस्य के निर्देशानुसार मस्तक पर शिवलिंग, योनिधारी महालक्ष्मी के हाथों में क्रमशः बिजौरा नीबू, गदा, ढाल और कपाल होना चाहिए। मस्तक पर शिवलिंग और हाथ में कपाल प्राधानिक रहस्य के निर्देशानुसार प्रदर्शित हैं।

देवरली मंदिर बारसुर में शिव की एक अद्भुत तथा प्रतिमा विज्ञान से, हटकर सर्वथा नवीन रुप में प्रदर्शित है। पद्मासन मुद्रा में आसीन चतुर्भुजी नग्न देवता की भुजाओं में क्रमशः कटार, परशु, चक्र और कपाल प्रदर्शित हैं। देवता ऊर्ध्वरतेस नहीं हैं। गुदमा ग्राम के मंदिर में स्थापित चतुर्भुजी देवी की पहचान नहीं हो सकी है। तंत्र से प्रभावित प्रतिमा लोमड़ी जाति के पशु पर आसीन है। देवी के हाथों में क्रमशः खड्ग, डमरु, त्रिशूल और ढाल हैं। डमरु और सर्प लिपटे हैं। देवी का मुकुट दैत्य के खुले हुए मुख में आधा छुप गया है जिसके दोनों पार्श्व में एक-एक दैत्य मुख है, देवी के चरणों के समीप भी दोनों और एक-एक दैत्य मुख अंकित है। यह प्रतिमा शास्त्रीय निर्देशों से नहीं मिलती। गढ़बोदरा की मातृदेवी/लज्जिका अथा नग्निका की प्रतिमा का विवरण पूर्व पृष्ठों में दिया जा चुका है। तीरथगढ़ में प्राप्त चतुर्मुखी भैरव प्रतिमा गति, लालित्य और आभूषणों के प्रदर्शन में मूर्तिकार का कौशल परिलक्षित है। राजापारा, कांकेर, दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा तथा बालाजी मंदिर जगदलपुर में स्तम्भशीर्ष पर गरुड़ की आकृति प्रदर्शित है। बड़े डोंगर और दंतेवाड़ा में राजा और राजदम्पति की स्वतंत्र प्रतिमाएं हैं। बारसुर, छोटे डोंगर और भैरमगढ़ सहित अन्य स्थलों में शिलापट्ट पर उकेरी गई, ढाल-तलवार धारी पुरुष आकृति है जिसमें लंबे बाल, चोटी की भांति पीछे लटके प्रदर्शित हैं। 11-12वीं शताब्दी की इन प्रतिमाओं को स्थानीय निवासी मेलिया के नाम से पुकारते हैं। उनकी मान्यता है कि प्राचीन बस्तर में प्रचलित नरबलि प्रथा में बलि हेतु पुरुष प्रदान करने का कार्य मेलिया करते थे।

बस्तर ग्राम, गढ़बोदरा, बीजापुर, भैरमगढ़, बारसुर, दंतेवाड़ा में मिट्टी की सुरक्षा प्राचीन आवास स्थलों पर आक्रमण से बचाव के लिए बनाई गई थी। बेदरे और गढ़चंदेला में नवप्रस्तर युग में पत्थर भी सुरक्षा दीवार निर्मित की गयी थी।बस्तर ग्राम में 600X400 मीटर की सुरक्षा प्राचीर में चार प्रवेश द्वार हनुमान द्वार, भोंड द्वार, गायता द्वार और तेलगा द्वार थे। सुरक्षा दीवार के बाहर निर्मित खाई अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती थी। छोटे डोंगर, बड़े डोंगर, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, बारसुर, गढ़बोदरा, गढ़धनोरा, बीजापुर, कांकेर मध्यकालीन बस्तर में महत्वपूर्ण राजकेन्द्र/ प्रशासनिक केन्द्र थे। सती प्रथा और पर्दा प्रथा बस्तर के आदिवासी समाज में कभी प्रचलित नहीं थी। राजपरिवारों, राज्याधिकारियों, सम्पन्न नागरिकों और सैनिकों में सती प्रथा का प्रचलन था। बस्तर के आदिवासी समाज में प्रचलित अतिथि सत्कार सराहनीय है। मुरिया और माड़िया समाज के छोटे से छोटे गांव में, गांव से कुछ हटकर अतिथिगृह के तौर पर एक झोपड़ी होती है, जिसे कोसघोटुल व थानागुड़ी अथवा पाईकगुड़ी कहा जाता है। ग्राम में आने वाले प्रत्येक अतिथि को अतिथिगृह में ठहराया जाता है। अठपहरिया नामक ग्राम का एक कर्मचारी अतिथिगृह को झाड़ता पोंछता है, खाना पकाता है और रात्रि में अतिथि के पास ही रहता है। 24 घंटे तक ग्राम की ओर से अतिथि को निशुल्क, लकड़ी, राशन, दूध, नमक, मिर्च, हल्दी, घी प्रदान किया जाता है। आग्रह करने पर भी ग्रामीण अतिथि से दाम नहीं लेते हैं। अठपहरिया को ग्रामवासी सेवा शुल्क के रूप में फसल आने पर अनाज देते हैं।

इस वक्तव्य के अंत में संदर्भ सूची है, जिसमें 54 प्रविष्टियां हैं। इनमें झा जी की स्वयं की पुस्तक ‘बस्तर का मूर्तिशिल्प‘ मुख्य है। अन्य का उल्लेख वक्तव्य में आया है, इसलिए यहां पृथक से नहीं है।

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