Thursday, September 16, 2021

अबूझमाड़ - गिरधारीलाल

अबूझमाड़-प्रकृति तथा संस्कृति

अबूझमाड़ बस्तर जिले का दुर्गम तथा अविकसित क्षेत्र है। नृतत्वशास्त्रियों के द्वारा अबूझमाड़ के जन-जीवन का विस्तृत अध्ययन किया गया है। यह भी माना जाता है कि प्रागैतिहासिक काल के संस्कृति की झलक अबूझमाड़ के जनजातियों के मध्य अभी भी देखा जा सकता है। बस्तर अचल के अबूझमाड़ की भौगोलिक सीमा में निवास करने वाली माड़िया जनजाति को अबूझमाड़िया कहते हैं। इस क्षेत्र में सातवी सदी ई. का बौद्ध चैत्य भोंगापाल में तथा 7वीं-8वीं सदी ई. के शिवमंदिर के अवशेष छोटे डोंगर में उत्खनन से प्रकाश में आये हैं। 11वीं सदी ईसवी के पश्चात के यहां स्थापत्य अवशेषों का पटाक्षेप हो जाता है।

अबूझमाड़ का परिवेश प्रकृति के अत्याधिक सन्निकट है तथा जीवनयापन के न्यूनतम आवश्यकताओं पर अवलंबित है। वनों पर आधारित जीवन शैली इन्हें, सहज प्राकृतिक जीवन जीने के लिए उत्प्रेरित करती है। गोंड़ी बोली में ‘माड़‘ का अर्थ ‘पहाड़‘ होता है। इसी अर्थ में बस्तर जिले के अंतागढ़-नारायणपुर के तहसील के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले अबूझमाड़िया कहे जाते है तथा मैदान में रहने वालों को दण्डामी माड़िया। अबूझमाड़ियों का मुख्य पर्वाेत्सव ककसार है, जो लगभग-लगभग ग्रीष्म ऋतु में मनाया जाता है। इसी अवसर पर मड़ई भी भरता है। गांव-गांव से स्थानीय लोक देवी-देवताओं का लाट-पताका सहित इस मंडई में सम्मिलित होकर मड़ई में घूमते हैं। इसी अवसर पर ककसार नृत्य आयोजित होता है। दण्डामी माड़ियों का गौर-नृत्य लय तथा ताल के लिए प्रसिद्ध है। इस नृत्य में स्त्री तथा पुरूष दोनों सम्मिलित होते हैं। पुरूष सिर पर गंवर सींग पहनकर तथा गले में ढाले बांधकर ठुमकते-मचलते घूम-घूमकर नाचते हैं तथा स्त्रियां पृथक झुंड में मंथर गति से तालबद्ध नाचती गाती हैं। गोंड़ों के जीवन में भी जन्म, विवाह तथा मृत्यु प्रमुख संस्कार हैं, जिन्हें वे अपने पारंपरिक ढंग से मनाते हैं। विवाह मुख्य रूप से मंगनी करके, अपहरण करके अथवा प्रेम विवाह के रूप में प्रचलित है। गोंड़ों के विवाह में भोज का भी विशेष महत्व है, जिसमें शराब-लांदा तथा बकरा और सूकर मांस का खूब उपयोग किया जाता है। इनमें मृत्युभोज की भी परंपरा पाई जाती है।

माड़िया संस्कृति के श्रेष्ठ उपादान में मृतक स्तंभ विशिष्ट हैं। डार्विन के विकासवाद अथवा हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के अवतारवाद के सदृश्य इनके गोत्र सर्प, कछुआ. बकरा आदि मान्य हैं जो विकासवाद अथवा अवतारवाद के किसी न किसी अंश को व्यक्त करते हैं। माड़िया जनजाति के मृतक स्तंभों में सृष्टि के जीवजगत के सहित प्रकृति के दृश्यमान प्रमुख प्रतीक सूर्य तथा चन्द्रमा, पर्वत, वन, नदी, वन्य पशु, पालतू पशु, कृषि कर्म, विवाह, आखेट आदि का अंकन सामान्य रूप से पाया जाता है। इनके चिंतन की प्रक्रिया में यही सर्वाेत्तम तथ्य है कि प्रकृति एवं पर्यावरण के अन्योन्याश्रित संबंध को प्रमुखता से रूपायित करते हैं। मृतक स्तंभों में कलात्मक पक्ष भी मुखरित होता है। अधिकांश आकृति चारों ओर से सम्मुख दर्शन युक्त होते हैं तथा गतिशील विषय वस्तु को उभारदर क्षैतिजीय क्रम में निर्मित करते हैं। इनके इस कला कर्म में आकृतियां उभारदार (high relief) क्रम में निर्मित होती हैं। स्तंभ का आकार चौपहलू होता है तथा शीर्ष पर घट-कुंभ निर्मित रहता है।

माड़िया जनजाति कृषिजीवी, पशुपालक तथा आखेटजीवी होते हैं। मद्य तथा मांसाहार के ये अभ्यस्त होते हैं। इन्हें वन्य से प्राप्त होने वाले खाद्य वनस्पति के साथ वनौषधियों का भी पर्याप्त ज्ञान होता है। ये अपने रोगों की चिकित्सा पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर करते हैं। अदृश्य शक्ति तथा दूषित आत्मा को ये रोगों का कारण मानते हैं, जिसका शमन वे सिरहा-गुनिया के द्वारा बताये गए बलि तथा पूजा उपासना से करते हैं।

माड़िया जनजाति के जीवन क्रम में प्रकृति का व्यतिक्रम नहीं है, क्योंकि वे प्रकृति को एक आराध्य के रूप में मान्यता प्रदान करते हैं। इसलिए भूमि, जल, वृक्ष की उपासना अपने तौर तरीकों से करते हैं। उनके मान्यता के अनुसार उनके देवी-देवताएं वृक्षों पर वास करते हैं। देवगुड़ी ग्राम का सबसे पवित्र स्थल होता है, जिसमें ग्राम देवी अथवा देवता के रूप में शिलाखंड तथा कभी-कभी स्थानीय देवी-देवताओं की गढ़ित प्रतिमा एवं त्रिशूल रखे रहते हैं।

माड़िया जनजाति की कृषि पद्धति में वनों को काटकर तथा झाड़ झंखाड़ को जलाकर कृषि करने की पूर्व पद्धति अब संकुचित होती जा रही है तथा स्थिर कृषि को अपनाने लगे हैं। इनके कृषि पद्धति में एक ही जाति के ऐसे वानस्पतिक प्रजाति को अलग-अलग जगहों में बोया जाता है, जिससे अनावृष्टि अथवा अतिवृष्टि की स्थिति उत्पन्न होने पर बोई गई कोई न कोई एक फसल कुछ अंशों में प्राप्त हो सके। धान की विभिन्न जातियों, (मरहान धान, गटका, कोसरा, चिकमा, मड़िया) को उगाकर वे मौसम की प्रतिकूलता में भी कम अधिक दिवसों में तैयार होने वाले एक ही प्रजाति के फसल चक्र को अपनाकर कुछ प्रतिशत फसल प्राप्त कर ही लेते है । इस प्रकार से वे आधुनिक संकरित उपज देने वाले फसल की अपेक्षा सामान्य उपज प्राप्त होने वाले परंपरागत बीजों से तैयार होने वाले फसल को ही महत्व देते हैं क्योंकि ये उनकी दृष्टि में परीक्षित हैं। कम भूमि में कृषि करने के कारण वे ऐसे पौधे लगाते हैं, जिनसे उनकी आवश्यकता कम वस्तु से पूर्ति हो सके। इस प्रकार के उदाहरण में मिरची की एक विशेष जाति ‘धान मिरी‘ विशिष्ट है। धान के आकार की इस जाति के एक मिर्च से लगभग 15 से 20 व्यक्तियों के साग में तीखापन निर्मित हो जाता है। इसी क्रम में वे ऐसे सेम की जाति विशेष रूप से लगाते हैं जो आकार में छोटी होती है तथा गूदा भले ही कम हो परन्तु फलियों और बीजों की संख्या अधिक होती है, जो ग्रीष्म ऋतु में उनके लिए दाल की पूर्ति करती है। लौकी की एक ऐसी ही विशिष्ट जाति हाथी सूंड (elephant trunk) को सीधे पेड़ पर चढ़ा देते हैं जो उसके लंबे और भारी बनावट के बोझ को सम्हालता है। इसी प्रकार कुम्हड़े की नार को भी झोपड़ी के छप्पर पर चढ़ा देते हैं।

प्रकृति तथा जैव विविधता को सुरक्षित रखने की यह कला पूर्वजों से उन्हें प्राप्त होती चली आई है। मुर्गी माड़ियों के लिए सिर्फ एक आहार अथवा बलि की वस्तु नहीं है, बल्कि एक घरेलू (पालतू) कीटभक्षी मित्र पक्षी है। जो घूरे, कूड़े, पशुओं के कोठे में गिरे हुए किलनी आदि कीटों को अपने पंजों से खोद-खोदकर चुन लेती है। इस प्रकार से वह आंगन के कीड़ों का विनाश करती है। देशी प्रजाति की इन मुर्गियों में ग्रीष्म का ताप सहने के साथ-साथ वर्षा ऋतु के आर्द्रता को सहने की भी असीम क्षमता होती है। साथ ही साथ सर्प, बिल्ली, सियार के आक्रमण से बचने के लिए फुदक कर उड़ने की कला में भी चपल होते है। प्राकृतिक सुरक्षा के कवच के रूप में इन मुर्गियों को प्रकृति से रंग बिरंगे पंख मिले रहते है, जो इनके शत्रु जन्तुओं को दिग्भ्रमित करते है।

माड़िया जनजाति ही नहीं अपितु वनों के मध्य ग्राम में निवास करने वाले अन्य निवासी जाने-अनजाने जैव विविधता के साथ-साथ प्राकृतिक चक्र को भी विनष्ट होने से बचाने के लिए एक इकाई के सदृश्य उपयोगी है। चाहे अबूझमाड़ के माड़िया हों अथवा मैदानी भाग के दंडामी माडिया, इन सभी के परिधान, श्रृंगार, जीवन यापन की कला में हम इस पारंपरिक जीवन शैली के उपक्रम को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करें, जिससे हमारी जैव विविधता तथा पर्यावरण के बीच बढ़ता असंतुलन कम से कम वन क्षेत्रों के चतुर्दिक क्रमशः बाधित होता रहे।

-जी.एल. (गिरधारीलाल) रायकवार, पुरातत्ववेत्ता
दिनांक 12.9.2002

यह नोट संभवतः अब तक अप्रकाशित है, सार्वजनिक नहीं हुआ है। शायद अंतिम रूप भी नहीं दिया गया है। इस लेखन में मुझे खास लगता है कि ऐसा व्यक्ति जो किसी समुदाय को अपने से अलग तो देखता है, लेकिन अजनबीपन से नहीं, इस तरह मानों हमेशा से साथ रह रहे हों, पैदाइशी जान-पहचान हो, कभी इस तरह देखा-सोचा न हो कि उस समुदाय के बारे में कुछ कहना होगा और ऐसा मौका आ जाए, शायद तभी इस आत्मीय तटस्थता और किसी अन्य समुदाय के प्रति सहज सम्मान, जो स्वयं से न्यूनाधिक नहीं, सम है, का भाव अभिव्यक्त हो सकता है।

बात की बात, मूलतः बस्तर निवासी रायकवार जी अपने लिखे के प्रति फक्कड़ और उदासीन रहने वाले ‘अवधूत‘, बात-बात में ‘बाबा कीनाराम‘ उचारते हैं। उनका यह नोट एक उदाहरण है। अपने लिखे पर नाम न देना, अपने लिखे को दूसरों को दे देना कि वे चाहें तो उसे अपने नाम से छपा लें, दूसरों की फरमाइश पर किसी (जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहों) के लिए भी लिख कर दे देना, वे चुटकियों में करते हैं और ‘नेकी कर दरिया में डाल‘ से एक कदम आगे, शायद इसे कोई नेकी मानते ही नहीं। तस्वीर कुछ मायनों में उन्हीं के मुकाबले फक्कड़ देवज्योति बनर्जी ने ली है, जो दोनों के यानि गिरधारी-देव चरित का कुछ हद तक अनुमान करा सकती है।

उनकी तमीजदार इस लिक्खाड़ी प्रतिभा का एक नमूना मेरे लिए अविस्मरणीय है। किसी बड़े आयोजन की तैयारी में महामहिम राज्यपाल, माननीय मुख्यमंत्री और माननीय विभागीय मंत्री के भाषण के लिए नोट बना कर देना था और वह भी दो-दो, यानि शुभारंभ के लिए अलग और समापन के लिए अलग। तय नहीं था कि कौन, किस अवसर पर आएंगे, लेकिन तैयारी तो चाक-चौबंद करनी थी। रायकवार जी का चमत्कार, एक तरफ इस्तेमाल हुए कागज की गड्डी ले कर तुरंत बैठ गए और घंटे भर में इस प्रयोजन के छह नोट तैयार कर दिया। उन पर अंकित नहीं था कि कौन, किसका, किस अवसर का है। लेकिन कमाल की बात कि उसे पढ़ कर यह समझने, तय करने में कोई परेशानी नहीं हुई कि कौन सा, किसके लिए और किस अवसर के लिए लिखा गया है।

पुनश्च-
अबूझमाड़ विभिन्न कारणों से चर्चा में रहा है, अब भी है। उनमें से उल्लेख एडवर्ड जे. जे की पुस्तक ए ट्राइबल विलेज आफ मिडिल इंडिया (Edward J. Jay, A Tribal Village Of India)का और उसके साथ जुड़ी बस्तर वाले गुलशेर खां ’शानी’ की 1986 में प्रकाशित पुस्तक ‘शालवनों का द्वीप‘ का। जे की पुस्तक एन्थ्रोपोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया से मेमायर नं. 21, 1968 सन 1970 में छपी थी। इस पुस्तक में श्री नोरोन्हा का नाम आर. पी. के बजाय न जाने क्यों एन. पी. नरोन्हा और 'रायपुर जिले के कमिश्नर'? (न कि रायपुर संभाग के Shri N. P. Noronha, I.C.S., the then Commissioner Of Raipur District?) उल्लिखित है। बहरहाल, बाद के वर्षों में किसी विदेशी द्वारा किए महत्वपूर्ण शोध कार्य के रूप में यह विशेष उल्लेखनीय है और शानी की पुस्तक मानों इसकी आवश्यक पूरक। एडवर्ड जे. जे का शोध 1958-60 के दौरान किए गए फील्ड वर्क का परिणाम है। शानी की पुस्तक की भूमिका जे ने जोहार लिख कर पूरा किया है, तब वे कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, हेवर्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रोफेसर थे।

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