Saturday, September 11, 2021

पुनाराम

पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित रिंगनी, छत्तीसगढ़ के पंडवानी गायक पुनाराम निषाद जी की चार कविताएं-

गीत नं. 1- हवाई जहाज का वर्णन

घोर - कइसे घुम्मथे घुम्मथे घुम्मथे गा अधरे अधर कइसे घुम्मथे।
हमर पुष्प बिमान हमर पुष्प बिमान अधरे अधर कइसे घुम्मथे।।

पद - सिढ़िया ल आपन चढ़े बर लमाथे। पांवे ला धरती में पक्का जमाथे।।
एक मिनट मे दस मिल जाथे। सौ मिल दस मिनटों मे पहुंचाथे।।
आपन पंखा ला जब सरकाथे। गीध नमूना आपन हा बनाथे ।।
उड़ान - भर के हवा तब करथे उडान. अधरे अधर कइसे घुम्मथे।
हमर पुष्प बिमान अधरे अधर ---।।1।।

पद - पट्टी ला बांध लेहू तुमन भइया। अब हावय हमर जिहाज उड़इया।।
नास्ता पानी हमन तुम्हला देवाबो। जइसन खाहू तइसन तुम्हला खवाबो।।
लेज के तुम्हला खुद पहुंचाबो। बिना केहे तुंहर भार उठाबो।।
उड़ान - तुमन तो आवव हमर महिमान. अधरे अधर कइसे घुम्मथे।
हमर पुष्प बिमान अधरे अधर कइसे घुम्मथे।।2।।

पद - धन हे चलइ़या ये ड्रायबर बिचारा। यात्री के एहर हावय सहारा।।
कभू उपर कभू तरी नचाथे। पानी अउ बादर ले सब ला बचाथे।।
जब कभू बादर मे टकराथे। तब हम ला माइक मे समझाथे।।
उड़ान - झन करहू भइया तुमन धुम्रपान अधरे अधर कइसे घुम्मथे।
हमर पुष्प बिमान अधरे अधर --।।3।।

गीत नं. 2- हवाई जहाज का वर्णन
घोर - हवाई जहाज के जरा सुनो ग कहानी।
ताजा खभर बात आवय नो हे गा पुरानी, भइया नो हे ग पुरानी। 
हवाई जहाज के जरा सुनो ग कहानी।।

पद- हवाई जहाज भाई जब चढ़े ला जाहू। तुरत नई टिकट हा मिले पहिली ले कटवाहू।।
पासपोर्ट महिना भरके आगू ले बनवाहू। समय के जब ख्याल करहू तभे तुमन पाहू।।
उड़ान - एही आवय हवई जहाज के जरा सुनो गा कहानी।।1।।

पद -जिहाज के चढ़इया सबो सिढ़िया सो ले जाथे। नम्बर के मुताबिक उहां सीट ला बताथे।।
कमर पट्टी बेल्ट ओमन पहिली ले बंधाथे। उडही अब जिहाज हमर माइक मे समझाथे।।
उड़ान - धुंवा झन उड़ाहू तुमन मानो हमर बानी भइया मानो हमर बानी।
हवाई जहाज के जरा सुनो गा कहानी।।2।।

पद - उड़े के शुरु ला करथे डेना ला सरकाथे। पंखा जेकर चक्र असन घुमत गजब जाथे।।
उड़ जाथे अकाश उपर बराबर मे जाथे। मुंह ला मीठ करथे ओ मन चाकलेट खवा के।।
उड़ान - नास्ता काफी चाय ला दे के करथे मेहमानी भइया करथे मेहमानी।
हवाई जहाज के जरा सुनो गा कहानी।।3।।

पद - बने हे संडास रूम लोग जिहां जाथे। सिनेमा के फिलिम सबो लोग ला देखाथे।।
रेडियो ला खुर्सी के सब लोग मन बजाथे। घर के सुरता आवय नही मन घलो भुलाथे।।
उड़ान - कहूं सो ले आवय नहीं उहां हवा पानी, भइया उहां हवा पानी।
हवाई जहाज के जरा सुनो गा कहानी ।।4।।

गीत नं. 3 - हवाई जहाज का वर्णन

घोर - कैसा जहाज बनाया बनाने वाला कैसा जहाज बनाया जी।।टेक।।

पद - चील असन ओ तो अधर उड़त हे आपन पंख लमाया जी।
मनखे मन भितरी मे तो बइठे, कइसन मजा ला उड़ाया।।
बनाने वाला कैसा जहाज बनाया जी --।।1।।

पद- हावय जमीन ले गा केतकोन उपर कहूं ला भय नहि खाया जी।
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, जावथे दिशा नई भुलाया।।
बनाने वाला कैसा जहाज बनाया जी --।।2।।

पद - भितरी के सब झन मनखे ला माइक में समाझाया जी।
काफी चाय पिये बर गा देथे, भोजन सबो ला खवाया।।
बनाने वाला कैसा जहाज बनाया जी --।।3।।

पद - नई पतियाहू ते चढ़ के गा देखव, देबी हा उहां तो समाया जी।।
ये हर झूठ लबारी तो नो हे आंखी मे देख के आया।
बनाने वाला कैसा जहाज बनाया जी --।।4।।

गीत नं. 4 - किसान का परिचय ।।

घोर - छतीसगढ़िया आवन गा, छत्तीसगढ़िया आवन गा।
नागर के जोतइया हमन नगरिहा आवन गा -- टेक --

पद - चटनी बासी खा के भइया करथन हमन किसानी।
चिखला पानी बइला के संग हावय हमर मितानी।।
धोती कुरता पंछा पगड़ी हावय हमर निशानी।
करम करे बर नई डररावन ये गीता के बानी।।
उड़ान - हमन खरतरिहा हावन गा, हमन खरतरिहा हावन गा।
नागर के जोतइया हमन नगरिहा आवन गा -।।1।।

पद - सुत उठके हम बड़े फजर ले अपन खेत मे जाथन।
खून पसीना एके करके दिन भर रोज कमाथन।।
खार मे बेरा जब हो जाथे बइठ के बासी खाथन।
संझा बेरा दीन बुड़े ले अपन कुटी मे आथन।।
उड़ान - हमन खरतरिहा हावन गा, हमन खरतरिहा हावन गा।
नागर के जोतइया हमन नगरिहा आवन गा -।।2।।

पद - कतकोन हम ला हांस के कहिथे ए मन हावय अडहा।
पढ़े लिखे एक्को झन नइये नागर जोतइया गड़हा।।
देश के सेवा हमन बजाथन अन्न उपजाथन बढ़िया।
चाहे कतकोन पढ़े लिखे हन आवन छत्तीसगढ़िया।।
उड़ान - सबो ले बढ़िया हावन गा, सबो ले बढ़िया हावन गा।
नागर के जोतइया हमन नगरिहा आवन गा -।।3।।

पद - कान खोल के सुन लेव संगी छत्तीसगढ़ के बोली।
रोग ला कतकोन दूर भगाथे आय कुलंजन।।
अड़हा जान के तुम झन करहू थोरको हमर ठिठौली।
छतीसगढ़िया ला झन हांसव नहि ते पड़ही गोली।।
उड़ान - डोमी करिया आवन गा, डोमी करिया आवन गा।
नागर के जोतइया हमन नगरिहा आवन गा -।।4।।

प्रसंगवश, ‘नुक्कड़ जनम संवाद‘ के अप्रैल 2004-मार्च 2005, हबीब तनवीर विशेषांक में पूनाराम जी से किया गया सवाल है कि ‘आपने हबीब साब के साथ काम किया, नया थियेटर में काम किया उसकी वजह से आपकी पंडवानी में क्या फर्क आया?‘ उन्होंने जवाब में कहा- अब पंडवानी में क्या है पहले तो गाते थे जैसे घर में गाते हैं, तो फिर साहब के साथ रहे ना उन्होंने उसको ठीक कर दिया। साहब का कहना है कि यह देखो कि निशाना कहां है, आखिर बाण तो निशाने पर चलाना है। और देखना किधर है-देखना नीचे की तरफ है, इस तरह से आप प्रस्तुत करें तो देखने वाला समझ जाए कि छाया में देखके बाण चलाना है।

जैसे भीमसेन की गदा है, उस सबमें फर्क पड़ा... अब अंदाजे का तो ये है ना कि पहले तंबूरा को गदा बनाके ऐसे ही उठा लेते थे। फिर उन्होंने कहा कि गदा तो ऐसे कंधे पर रखा जाता है। जैसे तरकश है, तरकश कैसे मारा जाता है... अच्छा तलवार कहां है, तलवार यहां बंधी है, यहां ठीक नहीं है, तलवार यहां पकड़ो, पकड़के ऐसे खींचो। और जैसे द्रोपदी चीरहरण, द्रोपदी चीरहरण में क्या है, साड़ी खींचना है, ऐसे नहीं, पूरी ताकत के साथ खींचो, साहब का कहना था कि घुटने टेक करके पूरी ताकत का जोर लगाओ। इधर-उधर मत देखो, अपने लक्ष्य की तरफ... साहब ने जब ये किया तो फर्क पड़ा।

नौकरी की उपलब्धियों को याद करता हूं, तो उसमें सबसे उल्लेखनीय होगा, बड़े कलाकार, जो बेहतर इंसान थे, उनकी आत्मीयता और सान्निध्य। ये कलाकार कार्यालय आ कर मिलते थे, जोहार-पैलगी के बाद अपना काम निपटाते और निवृत्त हो कर बिना किसी काम के मेरे साथ समय बिताना पसंद करते थे। मुझे अपना रोजमर्रा ‘सरकारी काम‘ कुछ देर के लिए छोड़ कर कलाकारों के साथ बिना काम के समय बिताते हुए लगता कि यह मेरी ड्यूटी का अधिक जरूरी हिस्सा है।

इस दौरान मैंने पाया कि तीजनबाई जी पंडवानी के अलावा, अन्य पारंपरिक गीतों की दर्जेदार जानकार और किस्सागो हैं। गोविंदराम झारा, ढोकरा के कलाकार तो हैं ही, गीत और किस्से सुनाते हैं, तो लगता है कि वे जो भी करेंगे इतना ही सधा और ललित करेंगे। बेलगुर मंडावी, पंडीराम और युवा जैनू सलाम के साथ तो घंटों चुटकियों में बिताया जा सकता है। सरगुजा के पंडितराम और आत्मादास, जब जहां शुरू हों, बस रसधार।

इसी क्रम में पुनाराम जी, जब भी रायपुर आते, मुझे अपने रिंगनी आश्रम के लिए न्यौत कर जाते। गांव के बाहर उनके ठिकाने पर गया, उनके रहते-रहते और उनके न रहने के बाद भी। एक बार उनसे बातें होने लगीं, मैंने उनकी हवाई-यात्रा के अनुभव सुनना चाहा, फिर बातों में पता लगा कि वे कविताएं भी रचते हैं, छंदविधान सहित। उनका मूड चित्र में झलक रहा है, देखकर आग्रह करने पर उन्होंने सादा कागज लिया और मेरे लिए ‘एक्सक्लूसिव, सर्वाधिकार’ वाली चार कविताएं वहीं रच दीं। लगा कि यह उनके मन में पकी-पकाई तैयार थीं। यह अनमोल धरोहर मेरे पास सुरक्षित हैं, यहां उस पुण्यात्मा के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप। कविताओं के शब्द, क्रम, भाव और छंद पर टिप्पणी लिखने का भी इरादा था, लेकिन यह अटका न रह जाए, इसलिए फिलहाल इतना ही।

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