Saturday, September 18, 2021

सिरपुर-1956

यह पोस्ट मुख्यतः जनवरी-फरवरी 1956 में प्रगति पत्रिका में प्रकाशित एम.जी. दीक्षित के लेख को उपलब्ध कराने के लिए है। सरल भाषा में आम पाठक के लिए लिखा गया यह लेख आमतौर पर उपलब्ध नहीं है। प्रसंगवश उनके अन्य लेख का अंश, उस दौर के सिरपुर तक पहुंचने और ग्राम का उल्लेख और सिरपुर से धातु-प्रतिमाओं की प्राप्ति से संबंधित महत्वपूर्ण संदर्भ जैसी कुछ अन्य बातें भी प्रस्तुत है।

सिरपुर में उत्खनन कार्य मोरेश्वर गंगाधर दीक्षित द्वारा 1954-55 में सागर विश्वविद्यालय से इसके बाद मध्यव्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग की ओर से कराया गया। उत्खनन का विस्तृत प्रतिवेदन प्रकाशित नहीं हुआ, किन्तु अगस्त 1955 में प्रकाशित श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ में श्री दीक्षित का लेख ‘सिरपुर में उपलब्ध प्राचीन अवशेष‘ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। लेख का रोचक आरंभिक पैरा इस प्रकार है- ‘‘सिरपुर, प्राचीन श्रीपुर, रायपुर से ३७ मील उत्तर पूर्व में रायपुर जिले की महासमुंद तहसील में महानदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित है। वर्तमान सिरपुर नदी और रायकेड़ा तालाब के मध्यवर्ती स्थान में बसा हुआ है। इसमें लगभग ४५ झोपड़ियां हैं, जिनमें लगभग १५० प्राणी रहते हैं; जो अधिकतर खेती तथा धान की फ़सल पर गुजर-बसर करते हैं। प्रतिवर्ष माघ महीने में पूर्णिमा के दिन गांव में एक बड़ा मेला होता है, जिसमें पास-पड़ोस के ५,००० व्यक्ति एकत्र होकर पवित्र महानदी में स्नान करते हैं।‘‘ इसी लेख में बताया गया है कि सन 1929 के वर्ष में सिरपुर में एक टीले की खुदाई करते समय कांस्य पदार्थों का एक बड़ा दफीना अकस्मात ही उपलब्ध हो गया था। इसका विवरण श्री मुनि कान्तिसागर ने अपने ग्रन्थ ‘खण्डहरों का वैभव‘ में दिया है। साथ ही यह भी उल्लेख है कि इन मूर्तियों की प्राप्ति का स्थान अब पता लगा लिया गया है और अब इस स्थान की व्यवस्थित खुदाई की जाएगी।

सिरपुर उत्खनन के कालक्रम निर्धारण की दृष्टि से इस लेख में जानकारी आई है कि 1954 के ग्रीष्मकाल में लक्ष्मण मंदिर के उत्तर में एक बड़े उंचे टीले की खुदाई में पंचायतन शिव मंदिर मिला और 1955 के प्रारंभिक शीतकालीन महीनों में गांव की दक्षिणी सीमा पर कुछ अधिक व्यापक कार्य आरंभ किया गया (यह लेख अगस्त 1955 में प्रकाशित हुआ है, इससे पता लगता है कि प्रारंभिक कार्य पूर्व में कराया जा चुका था)। लक्ष्मण मंदिर से एक मील दक्षिण में सुरक्षित जंगल के मध्य में अवस्थित मलबे में से उभरी हुई द्वारपालों की दो मूर्तियों के मिलने से यह परिणाम निकाला गया था कि यहां पर भग्नावशेषों में बड़ा मठ (वर्तमान आनंदप्रभकुटी विहार) भूमिगत हुआ है।

प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम बुलेटिन नं. 5, 1955-57 में सिरपुर की कांस्य प्रतिमाओं पर मोरेश्वर जी. दीक्षित का लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख में बताया गया है कि 1939 में (उपर यह तिथि 1929 बताई गई है।) लक्ष्मण मंदिर के पास पत्थर के लिए खुदाई करते हुई कामगारों को तीन बास्केट में साठ से अधिक मूर्तियां मिली थीं, जो व्राप्तकर्ता के पास छह साल रहीं और इसके बाद 1945 में सिरपुर के स्थानीय मालगुजार को सौंप दी गई। इस विस्तृत लेख के साथ 12 कांस्य प्रतिमाओं के चित्र भी प्रकाशित हैं।

प्रसंगवश मुनि कांतिसागर की पुस्तक ‘खण्डहरों का वैभव‘, जिसका उल्लेख श्री दीक्षित ने भी किया है, में लेखक ने बताया है कि वे पैदल यात्रा करते 16 दिसंबर 1945 को सिरपुर पहुंचे। उन्होंने लिखा है कि- ‘‘रायपुर से सम्बलपुर जाने वाले मार्ग पर कउवांझर नामक ग्राम पड़ता है। यहां से तेरहवें मील पर सिरपुर अवस्थित है। घनघोर अटवी को पार कर जाना पड़ता है। महानदी के तीर पर बसा हुआ यह सिरपुर इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से कई मूल्यवान सामग्री प्रस्तुत करता है। सिरपुर की धातु प्रतिमाओं की प्राप्ति संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी मुनि जी के शब्दों में- ‘‘वर्तमान में यह सब धातु-मूर्तियां वहां के भूतपूर्व मालगुजार श्यामसुन्दरदासजी (खंडूदाऊ) के अधिकार में हैं। वे बता रहे थे कि सिरपुर में सरोवर के तीर पर एक मन्दिर है, उसमें खुदाई का काम चल रहा था, जब ज़मीन में सब्बल लगते ही खनखनाहट भरी ध्वनि हुई, तब वहां के पुजारी भीखणदास ने कार्य रुकवाकर नौकरों को बिदा किया और स्वयं खोदने लगा। काफ़ी खुदाई के बाद, कहा जाता है कि एक बोरे में से ये मूर्तियां निकलीं और उसने उपर्युक्त मालगुजार को सौंप दीं। ... ... ... मुझे बताया गया कि मूर्तियां बोरे में से मिलीं। इसमें सत्यांश कम है; क्योंकि कुछ मूर्तियों पर मिट्टी का जमाव व कटाव ऐसा लग गया है कि शताब्दियों तक भू-गर्भ में रहने का आभास मिलता है, जब कि बोरा इतने दिनों तक भूमि में रह ही नहीं सकता। संभव है किसी बड़े बर्तनों में ये मूर्तियां निकली हों, क्योंकि कभी-कभी बर्तन व सिक्के, वर्षाकाल के बाद साधारण खुदाई करने पर निकल पड़ते हैं।

पुनः शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित श्री दीक्षित का लेख जिसके अंत में टीप है- ‘‘सिरपुर के पुरातत्वीय अवशेषों का उत्खनन मध्यप्रदेश शासन के तत्वावधान में सागर विश्वविद्यालय की ओर से लेखक ने सम्पन्न किया है। इस कार्य के श्रीगणेश एवं सम्पन्न करने में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री पं. रविशंकर शुक्ल ने व्यक्तिगत दिलचस्पी दिखलायी है।

बताया जाता है कि मध्यप्रान्त और बरार से मध्यप्रदेश बनने के क्रम में सिरपुर खुदाई का काम बाधित होते दिखा। श्री दीक्षित इस संबंध में लेख प्रकाशित कराते हुए प्रयासरत रहे कि काम बाधित न हो। इसी क्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के रायपुर प्रवास के दौरान श्री दीक्षित ने उनसे समय ले कर सिरपुर भ्रमण का कार्यक्रम तय कराया और विभिन्न स्मारकों के साथ नव-उत्खनित आनंदप्रभकुटी विहार का अवलोकन भी कराया, काम की आवश्यकता, महत्व और प्राथमिकता का स्वयं आकलन कर मुख्यमंत्री जी ने सिरपुर खुदाई का काम अबाधित निरंतर रखने के लिए आवश्यक व्यवस्था करा दी।


उपर का चित्र उसी अवसर का है। स्वाभाविक है कि श्री दीक्षित ने शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ वाले अपने लेख के अंत में पं. शुक्ल की व्यक्तिगत दिलचस्पी का उल्लेख किया है और ‘प्रगति‘ में प्रकाशित अपने लेख का आरंभ पं. शुक्ल के प्रोत्साहन उल्लेख के साथ किया है। पूरा लेख इस प्रकार है-

सिरपुर की खुदाई

बौद्ध संस्कृति की झलक
(डॉ. मो. गं. दीक्षित, विशेषाधिकारी पुरातत्व विभाग, म.प्र.)

राज्य के मुख्य मंत्री तथा सागर विश्वविद्यालय के कुलपति पण्डित रविशंकर शुक्ल के प्रोत्साहन से मध्यप्रदेश में रायपुर से ४७ मील दूर महानदी के तीर पर बसे प्राचीन राजधानी के स्थान सिरपुर ग्राम में विगत दो सालों से खुदाई का काम चल रहा है. इस साल काम शासन द्वारा नव-संगठित पुरातत्व विभाग के तत्वाधान में किया जाएगा.

गये साल की खुदाई में सिरपुर ग्राम से लगी एक बड़ी टेकड़ी में एक विशाल बौद्ध मंदिर करीब करीब अच्छी हालत में जमीन के नीचे दबा हुआ मिला. इस चौरस मंदिर के अग्रभाग में एक मंडप (पोर्च) उसके पीछे कपाटों में स्थापित एक सुंदर कुबेर की मूर्ति, मध्यभाग में चौरस १८ खंभों का एक भव्य सभामंडप और बिलकुल पार्श्वभाग के गर्भ में अति सुंदर सिंहासन पर विराजमान करीब ७ १/२ फुट ऊंचाई की पद्मासन पर आरूढ़ भूमिस्पर्श मुद्रा की एक भव्य बुद्ध प्रतिमा खुदाई में प्राप्त हुई. इस मूर्ति के बांयें भाग में प्रायः प्रस्तर आकार की अवलोकितेश्वर पद्मपाणि बुद्ध देव की एक छ: फुटी प्रतिमा, गर्भगृह के प्रवेश द्वार से मकररूपी वाहन पर खड़ी गंगा की एक बड़ी मूर्ति संपूर्ण अवस्था में मिली. इसके सिवाय मुख्य प्रवेशद्वार के पास ८ १/२ फुट ऊंची दो विशालकाय द्वारपाल और उसी तरह की यक्ष आदि की दूसरी अनेक प्रतिमायें मिलीं. इस मंदिर में सभामंडप के आसपास बौद्ध-भिक्षुओं के निवास के लिए १३ कमरे बने हुए हैं. इन कमरों की खुदाई के समय, तत्कालीन जीवन की झांकी देने वाले बर्तन, दिये, ताले, पूजा की मूर्ति, पूजापात्र आदि करीब ५,००० के ऊपर चीजें भी यहां प्राप्त हुईं. इसके सिवाय वहीं प्राप्त १४ पंक्तियों के एक सुंदर लेख से ज्ञात हुआ है कि यह मंदिर आनंदप्रभ नामक बौद्ध-भिक्षु ने बालार्जुन नामक राजा के समय बनवाया था और उसमें रहनेवाले भिक्षुओं के लिये उसने एक अन्नछत्र भी चलाया था. यह लेख करीब आठवीं सदी याने १२०० वर्ष पहिले का है.

सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में इतना बड़ा और सुसज्जित बौद्ध मंदिर अभी तक कहीं नहीं मिला. इस कारण हम कह सकते हैं कि हमारे प्राचीन वैभव का एक गौरवस्थान हमें फिर से प्राप्त हुआ.

‘जमीन में गड़ी हुई वस्तु प्राचीन दर्शन हमें इस खुदाई में मिले'-- बस इतनी सी सीमित दृष्टि से इस कार्य को देखना गलत होगा. इतिहास की परिभाषा, राजाओं का वंश, उनका राज्यकाल, उनके जमाने में हुई लड़ाइयां, उनकी जय-पराजय ही नहीं है. इतिहास के बारे में हमारी यह अपेक्षा रहती है कि तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक वैचारिक परिस्थितियों का यथातथ्य चित्रण होना चाहिए. कागज-पत्र जल्दी नष्ट हो जानेवाली चीजें हैं अतः उपलब्ध चीजों पर से तत्कालीन मानव जीवन की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का क्रमानुगत इतिहास तय करना खुदाई का प्रमुख उद्देश्य है. खुदाई का मतलब होता है-मानव संस्कृति का वास्तविक अध्ययन. सिरपुर की खुदाई में एक मंदिर की प्राप्ति के सिवाय हमें और भी अनेक प्रकार के फायदे हुए हैं. सिरपुर में उत्खनित बुद्ध प्रतिमा से मानने में अड़चन नहीं होती कि प्राचीनकाल में सिरपुर बौद्ध धर्मावलंबियों का एक केन्द्र था. चीनी यात्री हयूएनसांग सातवीं शताब्दी में जब भारत आया तो उसने कोशल देश की राजधानी को भेंट दी. वहां का राजा हिन्दू था. फिर भी वह बौद्ध धर्मावलवियों का समर्थक था. उह राजधानी में कुछ बौद्धमठ थे यह जानकारी उसने अपने यात्रा वर्णन में दी है. इस वर्णन में राजधानी का नाम नहीं दिया गया है, परन्तु प्रस्तुत खुदाई से ऐसा निस्संकोच कहा जा सकता है कि यह राजधानी सिरपुर (श्रीपुर) ही है. हयूएनसंग ने अपने वर्णन में कहा है कि यहां महानुयायी बौद्ध रहते थे. इसकी पुष्टि खुदाई में प्राप्त मूर्तियों से होती है. सिरपुर की खुदाई में मिली सभी मूर्तियों पर वज्रयान पंथियों प्रभाव दिखाई देता है तथा ये मूर्तियां तंत्रवाद का प्रतिनिधित्व करती है. हयूएनसांग खुद “सर्वास्तिवादिन" अर्थात् बौद्ध धर्म के कर्मठ अनुयायियों में से थे अतः बौद्ध धर्म में आ मिलने वाले वज्र, तंत्र आदि पर उन्हें कैसे विश्वास होता?

यदि धार्मिक बातों को छोड़ भी दिया जाये तो अन्य आधिभौतिक शास्त्रों की महाकोशल के लोग उस काल में कितने उन्नत थे, यह बात सिरपुर की खुदाई से अच्छी मालूम होती है. शिल्पकला में वे उत्तम अभियन्ता थे, इस बात की पुष्टि इमारत का कण कण करता है. पानी के निकास के लिये चारों ओर से पत्थरों से बनाई गई नालियां काफी मजबूत थीं और उनका ढाल भी काफी व्यवस्थित था. १२०० साल के बाद खुदाई कर इनका सफलतापूर्वक उपयोग किया गया. इस संबंध में उत्खनित चीजों की सुरक्षा के लिये अलग से संबंध करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. ईटों की दीवारों को उभारते समय उसकी नींव खूब गहराई तक ले जाई गई दीख पड़ी. उसकी मजबूती के लिये सभी स्थानों में एक दो फुट तक की गहराई में पक्के पत्थरों से दीवार बनाने का परिपाठ उन्होंने रखा था. यह बात नींव की जांच के समय मालूम हुई. जिन पत्थरों की चौखट पर भारी वजन के पत्थर का खम्भा खड़ा करना है वहां छ: फुट ऊंचाई के काम के लिये छ: फुट से भी ज्यादा गहरा भारी भरकम पत्थर की दीवार का नींव में इस्तेमाल किया गया है. इसके सिवाय अलग से दोनों बाजुओं से आड़ी दीवारें बनाकर उसमें मजबूती लाई गई है पत्थर के गुण अवगुण की ओर भी उन्होंने ध्यान दिया है. दरवाजे की पथरीली चौखट से सहज ही खिल्पी निकाली जा सके ऐसा काला कड़ापा जाति का पत्थर पायरी और जमीन के लिये कभी खराब न होनेवाला लालसर रंग के विंध्य प्रस्तर से बना हुआ दिखता है. महीन कलाकारी के लिये उन्होंने पास के नदी के कछार में दिखाई देनेवाले अत्यंत नरम गठिया नामक पत्थर का इस्तेमाल किया है. कलाकारी के बारीक काम के लिये यह पत्थर उस समय बहुत उपयुक्त जंचने पर भी कालांतर में अनेक सालों तक पानी सोखते रहने पर वह बहुत ज्यादा नरम होकर नष्ट हो गया है, ऐसा खुदाई में मिले अवशेष से मालूम होता है. इन पत्थरों के शिल्प अब तक अच्छी स्थिति में है. सिंह के अयाल का प्रत्येक बालु कुछ मूर्तियों के गलों के हार की नक्शियां बिलकुल ज्यों की त्यों है. इससे यह कहा जा सकता है कि कलाकारी के काम में भी ये लोग पिछड़े हुए नहीं थे.

सिरपुर की कला के संबंध में एक बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी मालूम होता है. वह है बौद्ध मंत्र अंकित छोटी छोटी मुद्रायें. ये मुद्रायें मिट्टी के लोंदे पर उलटे अक्षरों से अंकित पत्थर को दबाकर बनाई गई है. इनमें से कुछ मुद्राओं पर तीन अथवा चार पक्तियों में ''धर्म हेतु प्रभवा--" मंत्र अंकित है. परंतु सबसे आश्चर्य की बात है साधारण रुपये के आकार को इस एक मुद्रा पर १७ पंक्तियो में ३४६ अक्षर अंकित किये जा सके. इतना विस्तृत “धारिणी मंत्र" लिखा हुआ है और इसे आज भी पढ़ा जा सकता है. इन मुद्राओं को देखने पर कोई भी आदमी कह उठेगा, “धन्य है वे कलाकार और उनकी कला". यह मुद्रा प्राचीन महाकोशल के उत्कृष्ट कलाकौशल का एक अच्छा नमूना है.

सिरपुर की खुदाई में और एक उल्लेखनीय बात नजर आई. स्वर्णकारों का धातु प्रतिमायें ढालने का कौशल बहुत अप्रतिम है. बरसों पहिले सिरपुर में धातु मूर्तियों का एक संग्रह प्राप्त हुआ था. इसमें की कुछ मूर्तियां आज भी नागपुर और रायपुर के संग्रहालय में विद्यमान हैं. इसे महाकोशल की धातु मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है. खुदाई के पहिले ऐसी कल्पना भी नहीं थी कि इसे सिरपुर में ही बनाया गया होगा. परन्तु इस खुदाई में मठ के एक दालान में जिन हथियारों की सहायता से ये मूर्तियां बनाई गई होंगी, वे सुनारी हथियार भी उपलब्ध हो गये.

धातु का सांचा, तार काटने की कैंची, तार पकड़ने का चिमटा, तिपाई, छोटी छोटी हथौड़ियां, सुनार को लगनेवाले सब औजार, सोना परखने का कसौटी पत्थर जिस पर सोने के रेशे लगे हुए हैं, ज्यों का त्यों प्राप्त हुआ है. इसके सिवाय असमाप्त टूटी-फटी मूर्ति के अंतरंग को बनाते समय डाली गई रेत वैसी ही चिपटी हुई है. इससे मालूम हुआ है कि मूर्ति की ढलाई का काम इसी मंदिर में होता रहा है. इन मूर्तियों में एक विशिष्ट प्रकार की शैली के दर्शन होते हैं. इन विविध वस्तुओं ने हमारे हाथ में महाकोशल की प्राचीन संस्कृति को समझने की अनेक महत्वपूर्ण कड़ियां उपलब्ध कराई है.

कुछ अपनी भी-
सिरपुर खुदाई और एम.जी. दीक्षित जी के बारे में सुनता-पढ़ता रहा था। अपनी शासकीय सेवा के दौरान कोई 30 साल पहले महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर से संलग्न कहंत सर्वेश्वरदास सार्वजनिक ग्रंथालय के भौतिक सत्यापन का काम मुझे सौंपा गया, साथ वेदप्रकाश नगायच जी भी थे। इस दौरान मुझे पता लगा कि इस ग्रंथालय के मुख्यतः तीन हिस्से हैं, सार्वजनिक ग्रंथालय, सी.आर. लाइब्रेरी और ओ.एस.डी. लाइब्रेरी। सार्वजनिक ग्रंथालय के दो भाग थे, जिनमें से एक संदर्भ खंड की पुस्तके सदस्यों को इशू नहीं की जाती थीं, उसे ग्रंथालय, जो वाचनालय भी था, में बैठ कर पढ़ा, संदर्भ लिया जा सकता था। दूसरे खंड की पुस्तकें सदस्यों को इशू हो सकने वाली थीं। सी.आर. लाइब्रेरी, अर्थात क्यूरेटर्स रेफरेन्स, इसी ग्रंथालय में शामिल था, यह संग्रहालय के प्रभारी अधिकारी के लिए होता था। ओ.एस.डी. लाइब्रेरी, अर्थात आफिसर आन स्पेशल ड्यूटी वाली पुस्तके का हिस्सा, वस्तुतः सिरपुर उत्खनन के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, जिन्हें तब विशेषाधिकारी कहा गया है, दीक्षित जी के उपयोग के लिए थी। भौतिक सत्यापन के इौरान सिरपुर खुदाई और एम.जी. दीक्षित जी से स्वयं को करीबी जुड़ा हुआ महसूस करता रहा।

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