# कैसा हिन्‍दू... कैसी लक्ष्‍मी! # 36 खसम # रुपहला छत्‍तीसगढ़ # मेला-मड़ई # पुरातत्‍व सर्वेक्षण # मल्‍हार # भानु कवि # कवि की छवि # व्‍यक्तित्‍व रहस्‍य # देवारी मंत्र # टांगीनाथ # योग-सम्‍मोहन एकत्‍व # स्‍वाधीनता # इंदिरा का अहिरन # साहित्‍यगम्‍य इतिहास # ईडियट के बहाने # तकनीक # हमला-हादसा # नाम का दाम # राम की लीला # लोक-मड़ई और जगार # रामराम # हिन्‍दी # भाषा # लिटिल लिटिया # कृष्‍णकथा # आजादी के मायने # अपोस्‍ट # सोन सपूत # डीपाडीह # सूचना समर # रायपुर में रजनीश # नायक # स्‍वामी विवेकानन्‍द # परमाणु # पंडुक-पंडुक # अलेखक का लेखा # गांव दुलारू # मगर # अस्मिता की राजनीति # अजायबघर # पं‍डुक # रामकोठी # कुनकुरी गिरजाघर # बस्‍तर में रामकथा # चाल-चलन # तीन रंगमंच # गौरैया # सबको सन्‍मति... # चित्रकारी # मर्दुमशुमारी # ज़िंदगीनामा # देवार # एग्रिगेटर # बि‍लासा # छत्‍तीसगढ़ पद्म # मोती कुत्‍ता # गिरोद # नया-पुराना साल # अक्षर छत्‍तीसगढ़ # गढ़ धनोरा # खबर-असर # दिनेश नाग # छत्तीसगढ़ की कथा-कहानी # माधवराव सप्रे # नाग पंचमी # रेलगाड़ी # छत्‍तीसगढ़ राज्‍य # छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म # फिल्‍मी पटना # बिटिया # राम के नाम पर # देथा की 'सपनप्रिया' # गणेशोत्सव - 1934 # मर्म का अन्‍वेषण # रंगरेजी देस # हितेन्‍द्र की 'हारिल'# मेल टुडे में ब्‍लॉग # पीपली में छत्‍तीसगढ़ # दीक्षांत में पगड़ी # बाल-भारती # सास गारी देवे # पर्यावरण # राम-रहीम : मुख्तसर चित्रकथा # नितिन नोहरिया बनाम थ्री ईडियट्‌स # सिरजन # अर्थ-ऑवर # दिल्ली-6 # आईपीएल # यूनिक आईडी

Wednesday, January 11, 2012

कवि की छवि

कवि के साथ छवि का तुक यहां संयोग से ही बैठ गया वरना कविता तो अतुकी-बेतुकी सी लगने वाली बातों में भी होती है- खुदबुदाते, मचलते भावों के सामने कब लाचार नहीं पड़ते शब्द, कभी जबान तोतली होने लगती है, तो कभी सघन मौन-चुप्पी। ... घना अंधेरा और तरल रोशनी ... ।
क्यों नदी खामोश है?
दहाड़ क्यों है, पहाड़ के चुप्प्प्प में
जंगल लील जाने को आतुर
चिड़िया टंगी सी, पेड़ अनमने!

कवि मन के भाव-बिंबों को समझने के प्रयास में यह बेतुकी सी बात बन गई। कविताओं के प्रति अपनी रुचि और समझ सीमा के कारण, ऐसा कुछ पढ़ते हुए असमंजस होता है, गद्यार्थी पाठक को घबराहट-सी भी होती है। लेकिन इस संकीर्णता में आसानी से समा जाए ऐसी भी कविता यदा-कदा मिल जाती है।

बात है बिलासपुर, छत्‍तीसगढ़ के युवा रचनाकार मनीष श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'अवलंबन' की। 1974 में जन्मे मनीष नब्बे के दशक से लिख रहे हैं और इस संग्रह में सन 2006 तक की अनुक्रमित (सरल क्रमांक वाली), बिना शीर्षक वाली 1 से 109 तक रचनाएं शामिल हैं, जिनमें अधिकतर का रचना काल 1999 और 2000 दर्शाया है। (रचनाओं को यहां कोष्‍ठक में उनका अनुक्रम देते हुए उद्धृत किया गया है।)

संग्रह से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि रचनाकार फिलहाल अपनी कवि-छवि से मुक्त है, उसे पता नहीं है कि वह जो कुछ लिख रहा है, वह कविता है, यानि वह एक तरह से कुंवारा-कवि है। कवि (की छवि) बन जाने के बाद, ऐसा भान, अपनी यह पहचान उसे बनाए-बचाए रखने का जतन, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी साथ बना रहा तो यह कविता पर भारी पड़ने लगता है। फिलहाल इससे लगभग मुक्त दिखते मनीष, संग्रह के आरंभ में कहते हैं- ''मैंने '97 से '07 तक काफ़ी कुछ कहा। चंद तो यूँ ही बातों में बह गया। जो कुछ मैंने याद रखा, जो कुछ कविता-स्वरूप था, वह संकलित है।''
लक्षण अच्छे कहे जा सकते हैं क्योंकि यह युवा कवि, शब्दों और भाषा को खिलौने की तरह खेलता दिखता है। काश, आकाश और अवकाश पर कविता (2) है तो एक रचना (12) में मोहन, वशीकरण, आकर्षण, द्रावण, उन्मोदन, दीपन, स्तंभन, जृम्भण, उच्चाटन, मारण शब्दों को अपनी तरह से व्यक्त किया है और द्योतक, मोदक, उद्‌घोषक, प्रेरक, धावक जैसे तुक मिले शब्दों के साथ रची गई कविता (26) भी है।

शब्दों से खेल, कहीं भाव से दर्शन तक पहुंच जाता है जैसे (54) एक क्षण, युति का // एक प्रहर, उल्लास का // एक दिवस, आवेगपूर्ण // संध्या एक, आह्लादमयी // एक पक्ष, सान्निध्यरत // एक मास, सहयोग का // एक ऋतु, प्रतीक्षा की // एक वर्ष, प्रयास का // एक दशक, संतुष्टि का // एक जीवन, पूर्णतः परिभाषित!!! और (105) प्रातः उठो, गाओ कुछ पंक्तियाँ, पूरा गीत नहीं // मध्याह्न तक, चलो कुछ कोस, पूरा पथ नहीं // संध्या बैठो, इक नदी किनारे, न, रोओ नहीं // रात सोने दो, आँखों को खेलने दो, एक नए सपन संग, न, खोलो नहीं // हर सुबह नवजीवन का आरंभ, हर रात इक ज़िंदगी ख़त्म, जीवन की अवधि, सिर्फ़ एक दिन!

इस कवि को अपनी बात कहने के लिए कामचलाऊ से लेकर अंगरेजी से भी परहेज नहीं है, लेकिन कमाल तो वहां दिखता है, जब वह शास्‍त्रीय संस्‍कृत के शब्‍द और मनोभूमि में विचरते हुए (15) मंत्रोपलों, ईक्षण, ष्‍ठीवन, लोय, जोय, प्रीत्‍योदधि, व्रण, बैंदव, त्रायमाण, विवक्षा, अमिष जैसे शब्‍दों का सहज इस्‍तेमाल करता है तब कुछ अन्य कविताओं की तरह यहां भी लगता है कि वह सिर्फ संस्कृत भाषा का अभ्यासी नहीं, बल्कि पौराणिक-औपनिषदिक मनोभाव का भी अभ्‍यस्‍त है। जब वह क्‍लासिक उर्दू को पकड़ कर बढ़ता है तो (28) ग़ज़ीर, मुबर्हन, तस्‍ख़ीर, शाबदा, रू-ए-तिला, लज़्ज़ते-गिर्या (77) यूज़क, मिक़्यासुलहरारा, सीमाब, मिक़्यासुलमौसिम, दिनाअत (78) बिफ़ज़िल्ही, चर्बक़ामत, नौख़ास्‍ता, रू-ए-शोरीदा, नैरंगसाज़े-शैदा लफ़्ज आते हैं और (79) में काफिया मिलान के शब्‍द हैं- शुस्‍तोशू, दू-ब-दू, मू-ब-मू, सू-ए-सू, ज़ुस्‍तजू, कू-ब-कू, जू-ब-जू, हू-ब-हू, रू-ब-रू के साथ शेर है- न होते अंग्रेज न 'यू-यू' होती, हिंदी होती तो तुम से तू होती।

आपकी जांच-परख के लिए इस संग्रह के कुछ नमूने-

7 शेरों वाली ग़ज़ल (6) में काफ़िया खींच कर मिलाया गया लगता है, लेकिन बात असरदार बनी है-
माशूक है रोटी यहाँ बच्चे रक़ीब हैं
चूल्हे की वस्लगाह के क़िस्से अजीब हैं
शायर के पेट दौड़ती बहती हुई शराब
कुर्ता-ए-ज़र की ज़ेब में मुद्दे ग़रीब हैं
ये प्यार काग़ज़ी है सो दो लफ़्ज़ हुए हम
मानी हैं जुदा शुक्र है हिज्जे करीब हैं

संग्रह की सबसे छोटी, स्वाभाविक कविता (18) है-
ज़िन्दगी की बिसात पे
जब भी शह देता हूँ...
...तुम मोहरे बदल देती हो!

15 अगस्त 2006 को लिखी कुछ अलग मिजाज की कविता (24) है-
शब्द-विवर में अर्थ-मंडूक // जब मौन व्रत धर लें // अंतरात्मा के झींगुर // परकोलाहलवश सुनाई न दें // चकाचौंध में भावों के मृदु तारागण // जब दिखाई न दें ...
... ... ... ... ... ... ... ... ...
(कहूँ सुप्रीम कोर्ट को इंप्यूडेंट, फिर भले भुगते मुआ ये आदिवासी
मैं और मेरा (लेस्बो) एडवेंचर तो मजे में हैं 'बस मॉस्किटो हैं')
जब कम्युनिज़म पटुओं की ललनाओं को हड़पने की
तानाशाही का जरिया बने, समाधिकार के नाम पर
जब कॅपिटलिज़म का ठेठ अर्थ ही हो जाए
अक्षम से भेदभाव या अपमान या उसे खर समझना
जब सेक्युलर का मतलब दाढ़ी
औ' नेशनलिस्ट सुसंस्कृत हो चले चोटी
सोशलिस्ट (यदि बचा हो) माने झोले में कट्टा
जब टॅररिज़म का मुकाबला करे जिंगोइज़म,
वो भी ख़ाली हाथ!
... ... ... ... ... ... ... ... ...
मौन-कंदरा में विचार शरभ निर्दोष // जब हिमनिद्रालीन हों अनिमेष ही // प्रीत्याभिषेक स्नात मृडमुख से // फूटे ''युद्धं शरणं गच्छामि!'' // कलाश्री के इक्षुचाप में दंत-अंकुश // सुमनशर बद्ध हों जब मायापाश में // तब, ममप्रिय हे अदिति, // तू मुझे अभीष्ट है!

संग्रह की एकदम सहज-स्वाभाविक सी कविता (50) है-

ओह, मैं अश्वमेध कर बैठा!

हृदय-तुरंग से ये कह बैठा
कि जा, जहाँ तक तू दौड़ेगा
वहाँ तक मेरा साम्राज्य होगा

इक नन्हीं बाला ने ऐसा पकड़ा
कि अश्व बेचारा अब तक
उसका बंदी है, वो लालन-पालन
करती है, सो ख़ुश भी है

अश्व छुड़ाने की कोशिश में
राजा से भिक्षु बन बैठा
सुनने में तो ये भी आया
कि उस हय ने संतति की है
दो बछेड़े विश्वास और संयम
और एक नन्हीं घोड़ी प्रतीक्षा
को भी जन्म दिया है!

क्यूँ नृप हारा, बाला जीती?
मैंने अश्व को दमन का अस्त्र बनाया
उसने उसे प्रेम-प्रतीक बना
जीना सिखलाया!

...धरा रह गया यज्ञ
मुझे अश्व की सेवा ही करने दो!

छोटे बहर और 29 शेरों वाली प्रयोगात्मक ग़ज़ल (27) का एक शेर है- खिलौना हूँ मैं दोनों का, करम उसका दुआ उसकी। ऐसी ही 28 शेरों वाली ग़ज़ल (59) शुरू होती है- मुझसे न लिखा जाएगा, ये वर्क़ सफ़ा जाएगा। एक शेर (34) में है- सुबू दो, इक खयाल, काफिए चार, मगर रदीफ बनाई नहीं जाती। एक और ग़ज़ल (38) के कुछ शेर देखते चलें-
भूत है वाचाल चंचल वर्तमान
क्यूँ है रहता लृटलकार मौन
गणपति, मुझ कंठकेतु पर कृपा हो
है तू सक्षम कर मेरा उद्धार मौन
तुझसे गतिमय है मेरी यौवनकथा
न रहेगा इस कथा का सार मौन।
कवि यह भी कहता है- (52) ''हां, मैं विशेषज्ञ नहीं पर, जीवन का हठी विद्यार्थी अवश्य हूँ!'' फिर यह कि- (10) ''सीख लेंगे लब ये जब क़िस्साबयानी, लस्म में, आँखों से तब इरशाद मिलेगी।'' और फिर मानों घोषणा कि- (23) ''ग़ज़लगोई ये चुप नहीं होगी, मुहब्बत तुंदख़ू से है।'' लेकिन बात यहां तक पहुंचती है- (76) ''तम्दीद-ए-ग़ज़ल में है महारत मुझे मगर, यीमन फ़ यौमन ख़ुद को घटाता रहूँ।''

रचनाओं में व्‍यापक भाव और समृद्ध बिंब का जैसा सहज प्रयोग हुआ है, वह कवि की अकूत संभावना का अनुमान कराने के लिए पर्याप्‍त है, लेकिन वह जिस भाषा का प्रयोग करता है, उसके लिए आम पाठक कवि के शब्दों में (37) ही कह सकता है-
... सुनूँ मैं तुम्हारे दिल की बात
और समझ भी पाऊँ! प्रिये यह सरल नहीं है!

राजकमल प्रकाशन की इस पुस्‍तक का आइएसबीएनः 978-81-267-1717-0 है।

38 comments:

Ramakant Singh said...
This comment has been removed by the author.
Archana said...

वाह !! इसे पढ़ना आसान होगा ....
(अब जैसा कि आप समझा चुके हैं )... कवि की छवि को इस तरह प्रस्तुत करने का आभार ...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

चित्र और कविता दोनो में कवि की छवि आकर्षक है।
आप की समिक्षा ने संग्रह के हरेक पहलुओं को बड़ी कुशलता से रेखांकित किया है, ऐसा लगा।

Ramakant Singh said...

मनीष जी से आपने परिचय करवाया, धन्‍यवाद और आभार, अद्भुत लेखन, उन्‍हें पढ़ना चाहूंगा.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बढिया परिचय कराया आपने एक कवि और उसकी छवि से।
आभार

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुन्दर! मनीष जी से परिचय कराने का धन्‍यवाद!

राजेश उत्‍साही said...

आपके परिचय से लगता है( और उदाहरण स्‍वरूप दी गई रचनाओं से भी) कि मनीष जी को बहुत ध्‍यानपूर्वक पढ़ना होगा।

सतीश सक्सेना said...

विलक्षण प्रतिभाशाली मनीष का परिचय आपकी सुनहरी कलम से ....
आनंद आ गया !!
आपको आभार भाई जी !

Mukesh Kumar Sinha said...

main manish jee ko padha hai, sach me behtareen likhte hain...:)

Vikram Singh said...

प्रतिभाशाली मनीष का परिचय करानें के लिये धन्यवाद.


vikram7: हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई ....

P.N. Subramanian said...

विचित्र विविधता दिख रही है श्री मनीष की रचनाओं में. पढने के लिए काफी हिम्मत जुटानी पड़ी. आभार.

Atul Shrivastava said...

बढिया परिचय के लिए आभार....

rashmi ravija said...

मनीष जी की कविताएँ सहज जान पड़ती है...
एक विलक्षण कवि से परिचय करवाने का आभार

रेखा said...

आपके माध्यम से मनीषजी से परिचित हुए हमलोग ...आभार

ali said...

@ राहुल सिंह जी ,
कविता अथवा गज़ल के शिल्प के विषय में वे ही कमेन्ट करेंगे जो इसके माहिर हों ! हम शब्दों और भाषा पर श्री मनीष की प्रयोगधर्मिता की किंचित प्रशंसा और अपनी एक शंका का ज़िक्र ही करना चाहेंगे ! जैसा कि आपने उल्लेख किया है कि वे हाहाकारी / संस्कृतनिष्ठ हिन्दी शब्दों के प्रचुर प्रयोक्ता हैं और उन्होंने पर्शियन ओरियेंटेड उर्दू पर भी जबरदस्त कलम घिसाई की है ! ऐसे में एकबारगी विश्वास करने की इच्छा होती है कि वे अत्यन्त अध्ययनशील युवा हैं पर एक भय भी कि सहज भाषा की लीक से हटकर आतंकित करने वाले दुरूह शब्दों के प्रयोग से क्या वे किसी और मंतव्य को साधना चाहते हैं ?

मेरी इस कशमकश के साक्ष्य बतौर आप काव्य संकलन के कलेवर की सज्जा / आवरण पृष्ठ के रंग संयोजन पे गौर फरमाइये ! गहरी कृष्णवर्ण पृष्ठभूमि में निहित प्राइवेसी / गोपनीयता / अमुक्त अनिश्चित सत्य की तुलना में काव्य संकलन शीर्षक और कवि के नाम का धवलवर्णी प्राकट्य और रक्तवर्णी दो बिंदुओं का छोटा सा संयोजन कहता है कि कवि सायास ही ज्यादातर अव्यक्त (श्यामवर्ण) रहते हुए केवल दो रंगों की शब्द /रेखीय लघुता में नियोजित ढंग से प्रकट / अभिव्यक्त होता है ! अब ज़रा इसकी तुलना दूसरे पृष्ठ से करें जहां रंगों में अधिक वैविध्य नहीं है किन्तु पार्श्व के रंग के अनुपात में कवि स्वयं के रंगों को अधिक चटख / शोख तरीके से पेश करता है !
यदि आप दोनों पृष्ठों में तुलना करते हुए , शब्द और पार्श्व अनुपात तथा कवि स्वयं और उसके पार्श्व के अनुपात को देखें तो मेरे कथन की कदाचित पुष्टि ही होगी !
संकलन आपने पढ़ा है सो आप ही बेहतर कह सकते हैं उसके बारे में पर कवि की नौउम्री को ध्यान में रखकर मैं कवि को बेहद होशियार कहूँगा :)

shikha varshney said...

आपका विवरण और परिचय पढकर लगा जैसे मेरे मन की सी बात कह दी हो.
यूँ मेरे ख्याल में भी कविता लिखने की चीज़ नहीं बस हो जाने की चीज़ है.बाकी तकनीकियों पर टिप्पणी गुणी जन जाने.

शिवम् मिश्रा said...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - " The Politician Who Made No Money - लाल बहादुर शास्त्री " - ब्लॉग बुलेटिन

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

कवि की छवि उसकी रचनाओं के आईने में ही दिखती है और आज आपने अपनी समीक्षा के आईने में दिखाया है!! सुन्दर!!

ali said...

राहुल सिंह जी ,
इस फोटो को अलग भी मान लूं तो , रंग संयोजन की प्रवृत्ति तब भी यथावत रहेगी ! आवरण पृष्ठ अमूमन रचनाकार के सुझाव और अंततः सहमति पर निर्भर करता है :)

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही स्तरीय रचनायें हैं, पढ़नावे और परिचय कराने का अतिशय आभार।

संतोष त्रिवेदी said...

मनीष जी की कविताओं में तरुणाई और बुजुर्गियत का मिक्सचर है,प्रभावित करते हैं. हो सके तो दुरूहता से बचें !

विष्णु बैरागी said...

मनीष श्रीवास्‍तव की और उनकी कविताओं की बात अपनी जगह। किन्‍तु, इस सबके बहाने आपका यह नया रूप/स्‍वरूप सुखद रूप से विस्मित करता है।
उम्‍मीद करें कि इस कलेवर और ऐसे तेवरोंवाली आपकी यह अन्तिम पोस्‍ट नहीं होगी।
ऐसी पोस्‍टें आपको 'बाबा कहि-कहि जाय' से बचाऍंगी।
आनन्‍द आ गया।

Dr. Braj Kishor said...

अच्छा अनुभव रहा कविता से गुजर कर जाने का ...

अरुण चन्द्र रॉय said...

परिचय करने का बढ़िया अंदाज़.... कई अवसरों पर आपको.... अपनी कविता की समझ की सीमा के बारे में कहते सुना है.... तो लगता है कि "एक्स्ट्रा हम्बल" होकर आप कविता और कवि पर व्यंग्य कर रहे हैं.. कविता तो सरल मन का सरलतम प्रवाह है.. इसे समझने के लिए किसी विशेष गुण की आवश्यकता नहीं है.... कविता के लिहाज़ से मनीष जी की एक नई छवि बन रही है... वास्तव में कोई कवि भाषा के तौर पर इतने प्रयोग नहीं करते... अच्छी कवितायेँ पढवाने और नए कवि से परिचय करने का आभार

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भाषा दुरूह तब होती है जब हम भाषा के शब्दों का प्रयोग कम या खत्म कर देते हैं. दर-असल हम लोग आराम-तलब लोग हैं. अब तो r u alr8 भी लिखा जाने लगा है.
बहरहाल जो कलेजे में गड जाए, वही कविता है...मेरे अपने विचार में.

Abhishek Ojha said...

कविता - अपने पल्ले कम पड़ती है. कभी बहुत ज्यादा पढ़ा भी नहीं. एक ईमानदार स्वीकृति है :) धन्यवाद इस परिचय के लिए.

rakesh tiwari said...

कविता के बहाने कवि से तथा कवि के बहाने कविता से भेंट कराने के लिए धन्‍यवाद..

अभिषेक मिश्र said...

एक उभरते कवि और उनकी रचनाओं से परिचित करवाने का आभार.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
आभार!

Patali-The-Village said...

मनीष जी से आपने परिचय करवाया, धन्‍यवाद|

Arvind Mishra said...

मनीष श्रीवास्तव के अवलंबन पर हम भी कुछ देर ठहरे आपके सौजन्य से ..आभार!

Devendra Dutta Mishra said...

आपने अच्छा परिचय कराया, आभार। आशा करता हूँ मनीष जी की पुस्तक शीघ्र हाथ लगेगी।

Sanju said...

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएं...

Rahul Singh said...

कवि की छवि (फोटो) को इस आकार में मेरे द्वारा लगाया गया है, बीच में विभाजक रेखा मैंने यही सोच कर रखी थी कि भ्रम न हो, खैर! और शायद आवरण-सज्‍जा पर रचनाकार का नियंत्रण नहीं रहा है.
आपकी महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी के लिए आभार.

Avinash Chandra said...

परिचय अच्छा लगा, और प्रभावशाली भी

mahendra verma said...

मनीश श्रीवास्तव की काव्यधरा का सिंहावलोकन अच्छा लगा।
समीक्षा पढ़कर मनीश जी को पढ़ने की इच्छा बलवती हुई है।

चंदन कुमार मिश्र said...

कठिन लग रहा है पढ पाना इस बार!

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुंदर.... मनीष जी से परिचय कराने का धन्‍यवाद...राहुल जी