Tuesday, November 1, 2022

छत्तीसगढ़ के बाइस बछर

छत्तीसगढ़ के राज्य बनना, प्रशासनिक अउ राजनैतिक घटना आय, मगर संस्कृति के हिसाब से छत्तीसगढ़ के अपन पहिचान बहुत पुराना आय। हमर आज के छत्तीसगढ़ के कई रूप, कई आकार अउ नक्शा रहे हे। घटत-बढ़त बदलत रहे हे। दक्षिण कोसल, चेदि देश के साथ जुड़े रहे हे ते इलाका आज के बस्तर आय, याने दक्षिणी छत्तीसगढ़। ए इलाका दंडकारण्य आय, महाकान्तार कहे गए हे। राम भगवान के बनवास होए या राजा नल के किस्सा, ए इलाका के नाम आत रहे हे।

इतिहास म समुद्रगुप्त दक्षिणापथ अभियान म निकलथे, त सब ले पहिली राज्य कोसल के राजा महेन्द्र ल जीतथे, फेर महाकान्तार के व्याघ्रराज ल। फेर आगू तेलंगाना, आंध्र होत धुर दक्षिण निकल जाथे। महाभारत म भी ऋषभतीर्थ के नाम आथे, जे आज के गुंजी-दमउदहरा आय। उत्तरी सरगुजा अंचल, एक तरफ बघेलखंड से जुड़े रहे हे साथ ही मिर्जापुर इलाका से। जशपुर, रामनुजगंज अउ उदयपुर याने धरमजयगढ़ झारखंड-छोटा नागपुर से जुड़े रहे हे। इतिहास अउ भूगोल के साथ छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ संस्कृति के संदर्भ म भी एकर ध्यान रखना जरूरी होथे।

छत्तीसगढ़ नाम, बीच के मैदानी हिस्सा, धान के कटोरा अउ कलचुरि-मराठा काल के पहिचान आय, जे ल छत्तीसगढ़ ‘गढ़‘ माने छत्तीसगढ़ किला मान लिए जाथे, जबकि बहुत साफ चर्चा मिलथे कि शिवनाथ नदी के उत्तर म अठारह अउ दक्षिण म अठारह, जे ल मोटा-माटी कहे जा सकथे, बिलासपुर राज अउ रायपुर राज। पुराना छत्तीसगढ़ म देशी रियासत के अलावा अइ दू जिला रहे हे।

राज्य से बाहिर के लोग मन बर, छत्तीसगढ़ माने बस्तर या भिलाई रहे हे। धान के कटोरा, मैदानी छत्तीसगढ़ के प्रमुखता हमेशा से रहे हे, मगर ए कारण से सरगुजा के पहिचान, लग रहे हे। छत्तीसगढ़ के बात करत हुए अक्सर सब कुछ मैदानी छत्तीसगढ़ म सिमट जाथे, बस्तर-सरगुजा पिछड़ जाथे, अउ विकास प्राधिकरण बनाए के जरूरत समझ म आथे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनिस त यहां संस्कृति, पुरातत्व, अभिलेखागार, राजभाषा के साथ पर्यटन ल भी जोड़ के संचालनालय बनाए गइस। मध्यप्रदेश म संस्कृति के लगभग सब काम, परिषद, अकादमी अउ पीठ के माध्यम से होत रहिस। ओ कर से भी पहिली के स्थिति सुरता कर लेना चाहिए कि रायपुर म देश के सब ले पुराना संग्रहालय मन म से एक है। सीपी बरार-मध्यप्रदेश म पुरातत्व के काम पहिली, सामान्य प्रशासन, फेर शिक्षा अउ कुछ समय बर लोक निर्माण विभाग म रहे हे। संग्रहालय के मुख्य काम रायपुर से होत रहिस अउ सिरपुर खुदाई के दौरान यहां विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के भी कार्यालय रहिस।


राज्य के बंटवारा म तय होइस कि जे परिषद, अकादमी, पीठ के जिहां मुख्यालय हे, ते ओ राज्य के बांहटा म, उहें रइही। त छत्तीसगढ़ के बांहटा म सिर्फ बख्शी सृजन पीठ आइस। अउ संस्कृति के कुछ अधिकारी कर्मचारी, जे मन बाद म वापस मध्यप्रदेश चले गइन। फेर बात आइस नीति के, त देश भर के कला-संस्कृति के विशेषज्ञ आमंत्रित होइन अउ उन सबके राय के निचोड़ आइस, ते आधार म तय होइस, कहे गइस- ‘राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परंपराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण संवर्धन करना है।‘ ए ल नीति के बजाय संकल्प भी कहे गइस।

संस्कृति बर ए क्षेत्र के लोग मन ही असली अगुवा होथे, सरकार ल ओ मन के अनुसार चलना होथे। छत्तीसगढ़ म धीरे-धीरे संस्कृति के मुख्य काम मंचीय आयोजन हो गे। बेहिसाब कार्यक्रम, कलाकार मन के मानदेय म देरी अउ कटौती। भाषा म जादा ध्यान छत्तीसगढ़ी अउ, ओ कर संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल कराना रहिस। हलबी, गोंड़ी, भतरी, कुडुख, सरगुजिहा, सादरी, पंडो बर कम ध्यान दिए गइस। राजभाषा, बोलचाल की भाषा, सरकारी कामकाज की भाषा, पढ़ाई की भाषा, मानक भाषा बर विद्वान मन सोचत-लिखत-पढ़त हावयं। हकीकत आय कि छत्तीसगढ़ी मंच-माइक अउ भाषण म बाढ़त जात हे, फेर आपसी बोलचाल, खोर-गली, घर-घर म नंदावत जात हे। 

संस्कृति के संरक्षण अउ प्रोत्साहन बर राज्य म पं. सुंदरलाल शर्मा, चक्रधर, दाउ मंदराजी, के साथ कला-संस्कृति के क्षेत्र म सम्मान-पुरस्कार बर विभूति मन के नाम जुड़त जात हे, देवदास बंजारे, किशोर साहू, लक्ष्मण मस्तुरिया, हबीब तनवीर, खुमान साव। जे ल सम्मान मिलथे, ते निर्णायक मंडल म आ जाथे, मगर अइसे भी होथे कि जे निर्णायक मंडल म हे, तेही बाद म पुरस्कार पा जाथे, सम्मान-पुरस्कार संग विवादित होना तो स्वाभाविक आय, मगर ए कर स्थापना म क्षेत्र के बजाय विभूति मन के नाम आधार होथे, तओ एक क्षेत्र के व्यक्ति कई क्षेत्र म पुरस्कार बर पात्र हो जाथे, एके व्यक्ति ल दू बार सम्मान मिल जाथे, तओ लगथे कि हमर राज्य म प्रतिभा के कमी हे का? अउ कहूं नइ रहिन, नइ मिलिन? किशोर साहू के नाम म दू ठन सम्मान हे, जे म के एक दस लाख रुपिया वाला आय, जबकि राज्य सम्मान मन 2-2 लाख रुपिया के आयं, अउ पं लखनलाल शर्मा के नाम से दिए जाने वाला पुरस्कार के पात्रता पुलिस विभाग तक सीमित हे, नागरिक सम्मान नो हय, अउ राशि भी मात्र पचीस हजार रुपिया हे।

छत्तीसगढ़ म पारंपरिक तिहार, खान-पान, पारंपरिक खेलकूद उपर ध्यान दिए जात हे, तीजा-पोरा, हरेली, नवाखाई हमर पहिचान आय। हमर राज्य म माटी तिहार, पंडुम हे त सरना, गंगा दशहरा भी हे। कहूं के दशहरा देवी पूजा आय त कहूं गढ़ जीतना, अउ कहूं रावण के मूर्ति अउ पूजा भी होथे। हमन ल अपन राज्य के ए बारामिंझरा, रिगी-चिंगी विविधता के आनंद लेत रहना हे, अइ हमर असली पहिचान आय, थाती ए, धरोहर आय।

संस्कृति बर परिषद के गठन किए गए हे, जे कर माध्यम से गतिविधि चलत हे। योजना आयोग के अंतर्गत भी कई समिति, उपसमिति, वर्किंग ग्रुप बने हे। बइठक भी होत हे। ध्यान रहना चाहिए कि संस्कृति-पुरातत्व के क्षेत्र म नया सोचे, करे से जादा जरूरी होथे, चले आत हे, ते व्यवस्था हर नियमित हे, ओ म कोई बड़चन तो नइ आत हे, याने ए म रख-रखाव के जरूरत अधिक होथे। कुछ समय पहिली संस्कृति बर अलग संचालनायल के मंजूरी होए हे। ए कर जरूरत बहुत समय से रहिस। का बर कि पुरातत्व के काम पिछड़ जात रहिस, सब अधिकारी-कर्मचार संस्कृति के काम म लगे रहंय। ते कारण पुरातत्व के काम मानदेय, मानद, प्रतिनियुक्ति से चलत रहे हे। अब संस्कृति बर नया रायपुर म जगह भी ठउका लिए गए हे, त जरूरी हे कि जल्दी से जल्दी संस्कृति बर अलग अधिकारी के नियुक्ति हो जाय, नइ त साना-घटा चलत रइही, सरकार जे सोच के ए निर्णय लेहे हे ते कार्यरूप म नइ आही।

कहूं मौका म श्रीकांत वर्मा जी, श्रीमती इंदिरा गांधी से पूछिन- ‘क्या आप मानती हैं कि समाज को लेखक या कि बुद्धिजीवीनेतृत्व प्रदान करता है, राजनेता नहीं? त ओ जवाब दिहिन- ‘जिस नेतृत्व की चर्चा मैं कर रही हूं वह समाज को राजनेता नहीं दे सकता। राजनेता की दिलचस्पी बहुत तात्कालिक और व्यावहारिक प्रकृति के सवालों में होती है, जबकि लेखक-बुद्धिजीवी ज्यादा गहरे प्रश्नों से साक्षात्कार करता है। उसकी चिंता का क्षेत्र मनुष्य और उसका समाज तथा उसकी नियति होती है। सांस्कृतिक समाज अउ राजनीति या सरकार के आपसी संबंध, कोन कहां, का बर, कतका जरूरी आय, साफ ढंग से कहे गए हे, ए ध्यान रखे वाला बात आय। अउ ए आधार म जरूरी होथे कि दुनों पक्ष एक-दूसर के महत्व ल समझय-मानय अउ सम्मान दय।

कला, संगीत, साहित्य, पुरातत्व के क्षेत्र म सुनइया, देखइया के पसंद, लोकप्रियता के महत्व हे, लेकिन ओ कर मुख्य होना ठीक नो हय, का बर संस्कृति तो जीवन के अंग आय, ओ हर प्रदर्शन तक, अउ ओकरे बर सीमित हो जाही, ते ल ठीक नइ माने जा सकय। संस्कृति म प्रगति, विकास अउ निर्माण अलग तरह से होथे, ओ हर दरअसल परिवर्तन होथे, हमर जीवन के परिस्थिति के अनुसार, धीरे-धीरे, कि पता नइ लगय, सहजता से बदल जाथे। समय के साथ बहुत अकन बात अउ चीज के छूटना जरूरी हो जाथे अउ समय के साथ नया के जुड़ना भी ओतके जरूरी हो जाथे। संस्कृति बर लोग अगुवा रहंय अउ जहां तक हो सकय सरकार ए काम बर ओ कर अनुसार ही चलय, त सबके कल्याण होही।

’द सूत्र‘ वाले याज्ञवल्क्य जी की जिद का मैं सम्मान करता हूं, इसके बदले वे मेरी मनाहियों को बरदाश्त करते रहते हैं। पिछले हफ्ते कुछ दिन का समय देते हुए उन्होंने ऐसा कुछ लिखने को कहा। मैंने कहा कि इतना समय हो तो यह संभव न हो सकेगा। यदि फोन रखते ही इसी काम में जुट जाउं तभी संभव हो सकेगा। फिर पुरौनी आया कि छत्तीसगढ़ी में होना चाहिए, शब्द-सीमा भी। वे मेरी मनाही का मान रखते हैं, इसलिए जवाबी, उनकी जिद पूरी करना कठिन हुआ, पर जैसे-तैसे पूरी कर सका, लगभग वही उनकी सहमति से यहां प्रस्तुत।

Friday, October 28, 2022

कथा गढ़ते झारा-शिल्पी

एकताल, रायगढ़ जिले का अनूठा गांव है। छोटी सी आबादी वाले गांव में बहुत से राष्ट्रपति पुरस्कृत शिल्पी और शिल्प गुरु गोविंदराम झारा का गांव। मोमक्षय विधि से पीतल की आकृतियां गढ़ने वाले शिल्पी कथाएं भी गढ़ते हैं। पायली, दिया जागर और लक्ष्मी बनाने वाले कलाकार, करम झाड़ के बाद कथाओं को शिल्प का रूप देने लगे और शिल्प की कथा भी गढ़ने लगे। ‘विद्वान कला समीक्षकों‘ के सवालों के साथ धीरे-धीरे, उन ‘विशेषज्ञों‘ का मन पढ़ना भी इन शिल्पियों ने सीख लिया। शिल्प-कृति कोई भी हो, हर-एक आ कर पूछता है, इसकी कहानी क्या है। सरकारी मुलाजिमों की पूछ-परख का ध्यान रखते कुछ वैसी योजनाओं को भी आकार देने का प्रयास। शिल्पियों ने जान लिया कि सिर्फ कथाओं को शिल्प में गढ़ने से काम नहीं सधेगा, कलाकृति की कथा भी सोचनी, गढ़नी, कहनी पड़ेगी।

गोविंदराम झारा, जैसे हुनरमंद शिल्पी हैं, उतने ही किस्सागो और लोक गायक भी कम नहीं। अब बाकी ने भी कथाकारी सीख ली है और कई तो शिल्पी से अधिक कथाकार हो गए हैं। शंकरलाल, पुन्नीबाई, पटेल कुमार, संतोसिनी, शत्रुघन से बातें करता हूं, वे अब लिखा प्रिंट आउट किस्सा सौंप देते हैं, दसेक साल पुरानी बात। मैं फिर भी उनसे मुंह-अखरा किस्सा सुनने का आग्रह करता हूं। वे किस्सा सुनाते हैं, कागज की लेखी और कही-सुनी ...

शंकरलाल-पुन्नीबाई और पटेल सपरिवार

शंकरलाल चौथी कक्षा तक पढ़े भजन गायन भी करते हैं। गायकी और शिल्पकारी माता-पिता से सीखी। उड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी बोलते हैं। ‘संसार सार गीता‘ का विशेष अध्ययन किया है। अपने शिल्प के बारे में बताते हैं-

सतयुग में विष्णु का अवतार से शेषनाग के उपर में अनंत सज्या समुद्र के उपर में साथ में आदि माता की कहानी प्रस्तुत करता हूं। 

नाभि कमल से ब्रम्हा निर्माण, 
साथ वाहन गरूड़ जी,
मधु और कैटप नामक राक्षस विष्णु जी के मैल से जन्म की कहानी, 
शंखासुर नामक राक्षस का जन्म और उसका उपद्रव।

इसके साथ उन्हीं के शब्दों में-


विष्णु भगवान के दस अवतार

(1) मत्स्य अवतार में जन्म और उनके द्वारा शंखासुर का अंत।
(2) कछप अवतार में पृथ्वी को अपने पीठ पर धारण करना। 
(3) वराह अवतार में अपने खीशे से पृथ्वी को धारण करना।
(4) नरसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप राक्षस का वध।
(5) वामन अवतार में बली राजा से तीन पग भूमि दान का याचना करना।
(6) परशुराम अवतार में 21 बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय करना। 
(7) राम अवतार में रावण का वध।
(8) कृष्ण अवतार में कंश का वध। 
(9) बुद्ध अवतार में मौन रूप धारण। 
(10) कलंकी अवतार का कलीयुग में जन्म।


भगवान विष्णु का ‘‘मतस्य अवतार और शंखासुर का वध’’ की कहानी-

अनंत कोटी कोटी कल्प युग के बाद धरती की युग अनुसार अनंत कोटी जीव जन्तु ज्ञात हुआ और बहुत सारे पशु पक्षी कीट पंतग जीव दानव-मानव तथा राक्षसों का जन्म हुआ और सागर में शंखासुर नामक राक्षस का जन्म हुआ और वह राक्षस अपने बाहुबल से ब्रम्हा आदि सभी दवताओं एवं सुर साधुओं के वेद पुराण शास्त्र सर्व सम्पद का हरण कर लिया। ब्रम्हा ने वेद पुराण के बिना हवन पूजा-पाठ आदि सभी कार्य करना बंद कर दिया। हवन न होने के कारण गंधर्व, नारद ऋषि मुनियो का जीना मुश्किल हो गया। ऋषि मुनी वर्ग में देवताओं ने एक साथ मिलकर बैकुण्ठ में जाने का प्रस्ताव किया। उस समय भगवान विष्णु अनंत शयन में थे। लक्ष्मी माता चरण चाप कर रही थी। शंखासुर का अत्याचार और देवताओं का कष्ट भगवान विष्णु को दिव्य ज्ञान से ज्ञात हो गया था। और इस बात को लेकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी माता पर ध्यान देकर ब्रम्हा आदि ऋषियों के बारे में सोच रहे थे। इसी समय ब्रम्हा अपने साथ सब ऋषि और देवताओं को लेकर बैकुण्ठ पहुंच गये। और भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया लेकिन भगवान विष्णु खुद जाग गये और कहने लगे कि अब तुम्हारा सब दुख दूर हो जाएगा। अब चिंता की कोई बात नही। मैं छल-बल से शंखासुर का वध करके आपका वेद पुराण वापस लाउंगा। यह कहकर ब्रम्हा जी ने सबको आराम से विश्राम करने को कहा।

दक्षिण समुद्र के पास सरस्वती नामक नदी थी। उस नदी के पास विध्य नामक पर्वत था। उस पर्वत में कश्यप नामक ऋषि रहते थे। कार्तिक मास में ऋषि प्रतिदिन नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन ऋषि प्रातः स्थान करके अपने पितृ पिता को अर्ध्य देकर सूर्य देवता के लिये अंजलि कर में जल का अर्पण कर रहे थे। उस समय प्रभु नरसिंह भगवान ने छोटा सा मत्स्य रूप धारण कर ऋषि के हाथ में आ गये उसे देखकर ऋषि ने उसे अपने कंमडल पर रख दिये। उस छोटे से मत्स्य के रूप स्वयं विष्णु भगवान थे। ऋषि को उसका ज्ञान नही था। कमंडल में रहते हुए मछली ने कहा कि मुझे सारस खा जाएंगे, मेरा काया बड़ा होने जा रहा है मुझे बड़ा जघा चाहिए। ऋषि ने सोचा कि मछली सारसों के डर से मेरे शरण में आ गया है, इसे सुरक्षित रखना चाहिए। ऋषि ने अन्य सभी ऋषि-मुनियों को बुलाया और कहा कि इस मत्स्य ने कमंडल में रहते हुए कह रहा है कि यह जगह छोटा पड़ रहा इसलिये मुझे रहने के लिये बड़ा जगह चाहिए। ऋषियों ने विचार कर कहा कि इसे सरोवर में छोड़ देना चाहिए। मत्स्य सरोवर से भी बड़ा होने लगा, कहा मुझे और भी बड़ा जगह चाहिए। सब ऋषियों ने विस्मित होकर सोचने लगे कि यह भगवान विष्णु की लीला है, इसे समुद्र में छोड़ देना चाहिए। फिर सबने मिलकर मत्स्य को समुद्र मे छोड़ दिया। मत्स्य ने अपना स्वरूप धारण करके काया विस्तार करने लगा और स्वर्णमय मत्स्य रूप धारण करके सब देवताओ को बुलाया। छोटा बड़ा मीन का रूप लेकर समुद्र में प्रलय किये। मत्स्य ने उथल पुथल कर हुंकार करके छलांग लगाकर समुद्र का पानी खत्म कर दिये। जल खत्म होने के कारण सब मछलियों इकट्ठा होकर सोचने लगे शंखा मछलियों के साथ बहुत गाभिर में छुपा था। उसे देखकर भगवान विष्णु ने उसके पास पहुंच स्वंय रूप धारण किया शंखासुर को लेकर बद्रिका चल पड़े। गोविंद ने उसका भुजा पकड़ करके शंखासुर को पटक दिया शंखा चुर्ण चुर्ण होकर इधर उधर चारों दिशाओं में बिखर गया, धरती डगमगाने लगा, पर्वत हिलने लगे, भगवान विष्णु ने सांत्वना देकर कहा कि डरने की कोई बात नहीं मैने शंखासुर का वध कर दिया है। सब खुशी से झुमने लगे स्वर्ग से देवताओं ने पुष्प वृष्टि की। ब्रम्हा विष्णु आदि सभी देवताओं ने अपना अपना वेद पुराण, शास्त्र पाकर बहुत खुश हुए और अपना-अपना हवन शुरू किया। तत्पश्चात सभी देवगण अपने-अपने धाम पहुंच गये। संसार में सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

इसलिये लोग कार्तिक माह में एकादशी के दिन विष्णु जी की पूजा सत्यनारायण निराकार के रूप में उपवास करके ब्रत किया जाता है। भगवान विष्णु शंखासुर को कार्तिक माह में मारकर बैकुण्ठ का उद्धार किये।

आद्य अवतार भगवान विष्णु जी की जय।

पटेल झारा के पिता, भाई और भाभी यानि घर के तीन सदस्य राष्ट्रपति पुरस्कृत हैं, उनकी लेखी कहानी, उनकी जबानी- 

धरती सृजना और पृथ्वी जन्म एवं मानव जन्म, मानव उधार - 
दुखयारी मां और दुखयारी चटीयन पक्षी की कहानी


धरती सृजना एवं धरती उधार -

जिस समय धरती विनाशकारी प्रलय से घिरा हुआ था। वह समय राजा सत्यवर्त एक दीन गनडूकी नामक नदी में स्नान कर सूर्य को जल दे रहे थे, तभी हाथ में एक छोटी-सी मछली हाथ में आ गयी और बोलने लगी की हे राजा! मुझे समुद्र एवं नदियों में बडे़-बड़े मछली और मगरमच्छ खा जायेेंगे मेरी रक्षा करो तभी राजा मछली को पकड़ कर महल पर ले गया और एक छोटे से कटोरी में रखा और राजा आगे बढ़ा पलट कर देखा तो मछली बहुत बड़ी हो गयी, और मछली, राजा को बोली कि मुझे इसमें घुटन एवं चलने-फिरनें के लिये दिकतें हो रही है। तभी राजा और उससे भी बड़ा-सा कटोरा मंगावा कर मछली को रखा और फिर मछली देखते ही देखते और अधिक बड़ी हो गयी, इतने में राजा सत्यवर्त को समझने में देर नहीं लगा, राजा बोला हे मछली तु कौन है, कृपा कर आप सही रूप में दर्शन देने का कष्ट करें। तभी मछली के रूप में भगवान विष्णु राजा सत्यवर्त को दर्शन दिया । और कहा हे! राजन् आज से सात दिन बाद धरती विनाश प्रलय में डूब जायेगा। तुम समस्त ऋषि मुनि जीव-जन्तु को नाव पर सवार करना जब धरती प्रलय के समीप होगा तभी मैं मछली के रूप नाव पर सवार ऋषि मुनि जीव-जन्तु का रक्षा करूंगा। यह कहकर अतर्ध्यान हो गये, देखते ही देखते धरती प्रलय से डूबने लंगा और धरती का विनाश हो गया। उस समय ब्रम्हा, विष्णु, महेश चारों वेद पुराण से धरती का निर्माण हुआ साथ हि साथ मानव का भी जन्म हुआ, यह सही एवं सत्य है। इस प्रकार है।

वासुकी धरती माता -

यह इस प्रकार है कि भगवान सर्वत्र हैं अर्जुन भगवान के स्थान के खोज में निकले तभी अर्जुन वासुकी धरती माता के पास पहुंचे और बोला की हे नागवली मुझे अंदर जाने दो तभी नागवली अंदर जाने के लिये मना कर दिया। अर्जुन गुस्से में बोला कि मैं सारे नागवली मेरे एक ही तीर में विनाश कर दूंगा। तभी वासूकी धरती माता बोली हे अर्जुन तुझमें इतना साहस है मैं यह धरती को सुख एवं दुःख भरी समस्त प्राणी सहित धरती को अपनी सिर में उठाई हूं, अगर तूझमें साहस है तो इस धरती को सात दिन तक उठा कर देख तभी अर्जुन अपने धनुष के टंकक से धरती को उठाया और अंत में अर्जुन नागवली के साथ विवाह किया।

दसावतार

मछावतारः- मच्छ रूप में जब शंकासूर ने पृथ्वी सहित चारों वेद पुराण को लेकर समुद्र के अंदर छिपा तभी भगवान मच्छ अवतार लिये शंकासूर का वध किया।

कछवतारः- जिस समय देव और दानव मिलकर समुद्र मंथन किया उसमें लक्ष्मी, अयरावती, अष्टापसरा का जन्म हुआ साथ-साथ हलाल से निकला व विष को पीकर भगवान शंकर नीलकंठ कहलाये एवं सारंग धनुष का जन्म हुआ। जिससे शिव प्राप्त किया, लक्ष्मी को विष्णु ने विवाह किया। 

बराहावतारः- इस अवतार में पृथ्वी उधार एवं हिराणाक्ष का वध किया। 

परशुरामावतारः- इस अवतार में अपने अस्त्र-शस्त्र से अनेकों राजाओं एवं क्षत्रियों को अपनी खड़क से सिर काटा एवं देवों का उध्धार किया। 

नरसिंहावतारः- नरसिंह अवतार में हिरणकस्यपू का उध्धार एवं भक्त प्रहलाद को राजा। 

बावनोवतारः- जब बली नामक का एक राजा था जो धर्मिक राजा के साथ-साथ चक्रवर्ती भी थे एवं सत्यवंत राजा थे, जब बलीराजा ब्रम्हयंज्ञ कर रहे थे तब वहां भगवान ब्राम्हण के रूप में पहुंचा और देखा कि राजा तीन सत्य कर रहे हैं तभी राजा देख ब्राम्हण को बोले आपको क्या चाहिये उन्होने बोले कि मुझे आपसे तीन पांव जमीन चाहिये, जब ब्राम्हण एक पैर आगे बढ़ाया तो एक ही पैर से पूरे धरती को नापा और दूसरा पैर स्वर्ग में रखा एवं तीसरे पैर बली राजा के सिर में रखा।

रामअवतारः-इस अवतार में राम 14 वर्ष बनवाश एवं रावण व और राक्षसों का विनाश किया। इस प्रकार रामअवतार है। 

कृष्णावतारः- इस रूप में गीता भगवत् प्रेम सागर के प्रेम से लीन राधा कृष्ण का मिलन एंव आजीवन करावास कंश वध देवकी उद्धार। 

बुधावतारः- बुध रूप में दुनिया के शांति के लिये एवं ऋषि मुनियांे के रक्षा के लिये भगवान बुधावतार में बैठे। 

कलंकी अवतारः- कलंक में भाई-भाई में दूश्मन एवं एक-दूसरे में नफरत माता-पिता का न ही आदर-सम्मान और न ही विश्वास करते है। यह कलंकी अवतार है। 

मानव शादी-विवाह पति-पत्नि के जीवन कई जन्म का बंधन इस प्रकार है- 

समाज में लड़की पुरया घर की होती है, जब लड़की 18-19 वर्ष का हो जाती हैं तो दूर-दूर के रिस्तेदार जाति-समाज के लोग आते हैं। जाति वर्ग सुलझाते हैं। दोनों लड़का-लड़की का विवाह पक्की कराते हैं। मांगनी (सगाई) करते हैं आदिवासी क्षेत्र में शादी चार लकड़ी के खंबा को चारों दिशा में गाड़ते हैं और बीच में एक मौउहा के पेड़ के डाल को गाड़ते हैं और चारों दिशा में कलश रखते हैं। ऊपर में जामुन के टहनीयं को बिछाते हैं शादी में चूरका को शाम के समय करते हैं। जिसमें देवुल गुड़ी में जाकर पूजा करतें हैं वहां जूठन चावल हल्दी को लाकर लड़का-लड़की के शरीर में लीप करते हैं। शादी में तीन दिन तक लिप किया जाता हैं। लड़का-लड़की एक दिन के लिये उपासना रहते हैं। लगातार तीन दिन शादी के उत्सव में खाना-पिना एवं मास-मदिरा कर समाज के बुजूर्ग महिला एवं पुरूष नाच-गान करती हैं जिसमें पुरूष वादयंत्र ढोलक बजाते हैं और एक ओर महिला समूह में नृत्य करते हैं। लड़का अपनी विवाहित कन्या को अपनी गोद में बैठाकर लड़का को साथ दोनो को नहलाते हैं, कपड़ा के जरीये तब दोनों को नये वस्त्र पहनाकर शादी मंडप में बैठा कर दोनों को जीवन भर के लिये पति-पत्नि बना देते हैं। वहीं पर लड़का और लड़की विवाह के कई जन्मो के लिये बंधन में बंध जाते हैं वहीं से दोनों की नई जीन्दगी शुरूवात हो जाती है। सही एवं सत्य है।

जेजकी महिला

जब महिला गर्भवती होती है तो शिशु को जन्म देती है। 

गर्भवती महिला की दर्द भरी कहानी इस प्रकार है। लड़का हो तो दस महिना दस दिन मां अपनी पेट में रखती हैं वह महिला न तो ठीक से सो पाती है और न ही पेट भर खा नहीं पाती और ठीक से रह नहीं पाती। दसवां महिना दसों दिन तक तखलीफ झेलती है। जब दसवां महिना और दस दिन पूरे होते हैं तब महिला शिशु को पैदा करने के लिये घर में महिला उसकी सहायता के लिये आ जाते हैं। गर्भवती महिला को एक महिला सामने और दूसरी महिला पिछे कमर को दबाती हैं। जब महिला को अधीक तखलीफ होती है तो अपनी मन में हे धरती माता हे भगवान मुझे तकलीफ न दो कह कर सहन करती है। इसके बाद शिशु को खून में लतपत धरती में गिराती है। एक दो मिनिट बाद महिलाएं एक कांसे के बर्तन को लेकर बजाते हैं खून में लतपत लांभी को काटकर शिशु के स्नान करते हैं और पहली मां का दूध अमृत दूध कहलाता है। जब तक अपने परिवार को कोई भी महिला नहीं बताती है कि उसकी बेटा या बेटी हुई है। इसके बाद 10 मिनिट बाद बताते है कि लड़का है या लड़की। 

जेजकी महिला को कपड़ा पहनाते हैं इसके सात दिन तक देख-भाल में 3-4 महिलाये गर्भवती महिला के पेट को जारा नामक पत्ता को आग में सेंक कर पेट की सिकाई करते हैं। जेजकी महिला को केवल सुबह खाना दी जाती है, ताकि किसी प्रकार के बीमार में ना पड़े तब 21 दिन बाद या सात दिन बाद जन्म शिशु का नामकरण एवं नया जीवन नाम रखने के लिये दूध दही दारू घांस चावल एवं नये वस्त्र पहनाकर शिशु के शिर के बाल मुंडन कर उसे जाति समाज के बैठे के बुजूर्गों के सामने शिशु को लाया जाता है और कांसे के बर्तन में रखी पानी बच्चे के हाथ-पैर धोते हैं इसके बाद कांसे के बर्तन में रखी पानी में घांस और चावल को छोड़कर बुजूर्ग बोलते हैं कि नाति-पाति छन्ति यह तीन पार्ट बाद आया शिशु को बोलकर पानी में तैरते हुए घांस के पिछे चावल को छोड़कर घांस को दौड़ने के लिये बोलते है। जब चावल घांस को पकड़ लेता हैं तो उसे अपने पिता के तीन पाठ कहकर कोई अच्छा सा नाम देते हैं। तब खुसी-खुसहाली में बुजूर्ग गीत गोविंद कर नृत्य करते हैं। यह सारी तखलीप को मां सहन करती है। और कहती है कि मार खुद कुड़ा बापर सुनामुड़ अर्थात मां कहती है 10 महिना 10 दिन बच्चे को पेट में रखते है। और बच्चे को जन्म देती है और कहती है, कि तू 40 या 50 साल का भी हो तो मेरे लिए लाल बेटा एवं कलेजे का टुकटा ही होगा। इस प्रकार का कहानी सही एवं सत्य है।

छोटा परिवार सुखी परिवार 

इस प्रकार है कि छोटा परिवार सुखी परिवार अत्यन्त सुखमय परिवार है एक विवाहित पती-पत्नि के दो बच्चे थे। जिसमें एक लड़का और लड़की जो खुशी परिवार सुख शान्ति से रहने खाने पिने आंनद जींदगी व्यतीत करती है । इस प्रकार माता कहते है कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है। पिता - कहते हैं कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है।

बड़ा परिवार दुखी परिवार 

इस प्रकार है कि बड़ा परिवार में दुख के सिवाय कुछ भी नही है बड़ा परिवार न तो चैन से रह सकते है न तो अपने आप को शान्ति से रहना पड़े। एक ऐसे परिवार जिसमें 6 बच्चे और माता-पिता सहित 8 परिवार में परेशानी ही परेशानी है। बड़ा परिवार के सदस्य अर्थाथ बच्चों की सुख सुविधा के लिए अधिक परिश्रम करनी पड़ती है। बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने नही पाते है। अशिक्षित परिवार जो शान्ति से जीवन व्यतीत नही कर पाते हैं। बच्चों की आवश्यकता के लिए माता-पिता मजदूरी से पेट भरने के लिए परिश्रम करते है परन्तु समाज में उनका कोई महत्व नही रहता इनको सहारागी नही मिलता व बीमारी तथा तंगी से परेशान रहते है इनकें बच्चे न तो ठीक से पढ़ लिख सकते है और चिथड़े में पड़े रहते हैं। उनके बच्चे आगे बढ़ने के लिए कुछ भी उन्निती कर नही पाते उनके बच्चे चोरी, चपाटी कर एवं मार पिट, गाली गलौच का सामना ग्लाज करना पड़ता है। उनका पिता इन सब बच्चों के कार्य को परेशानी को देखकर परेशान और तखलीव होकर सिर पकड़ कर बैठे सोच में डूबे रहते है। मन ही मन हम दो और हमारे दो होते वो यह सुखमय जीवन में हमारे नसीब होता बड़ा परिवार में दुखी एंव अशान्तिय परिवार होती है। अर्थाथ बड़ा परिवार दुखी परिवार एवं छोटा परिवार यह सही एवं सत्य है।

मां और एक गोरियान (चोटिया) पक्षी

दोनों की अत्यन्त दुख दर्द भरी कहानी इस प्रकार है कि एक छोटा सा सुखमय परिवार रहते थे उनके छोटे छोटे दों बच्चे थे उसमें एक लड़का और एक लड़की थी। उनके माता-पिता खेती किसानी का कार्य करते थे वह दोनो पति-पत्नि खुशी-खुशियाली एवं शांति से रहते थे एक दिन गरीब किसान की पत्नि घर के अंदर अपनी बच्चों को खाना खिला रही थी उसी समय उनके घर में में दरवाजे के सामने दो गोरियान पक्षी (चाटिया और चटियन) एक एक घास एवं तिनका से उनके रहने एवं बसने के लिए एक घोसला बनाये और अंत में दोनों पक्षी (पति पत्नि) सुख जीवन बिताते थे। गोरियान (चटियन) पक्षी ने गर्ववर्ती हुई और दो पक्षी गोरयान पक्षी ने दो पक्षी बच्चों को जन्म दिया उन दोनों पक्षी पति-पत्नि सुखमय जीवन बिताते थे। उन दोनों पक्षी को गरीब किसान की पत्नि और उसकी पति दोनों, रोज सुबह शाम पक्षी परिवार को देखकर बहुत ही आंनद से रहते थे। एक दिन अचानक किसी शिकारी ने गोरियान पक्षी (चोटियन) को मार दिया। तो चटिया ने अपनी पत्नि के वियोग में इधर-उधर रोते विलकते रो रही थी गरीब किसान की पत्नि अपने बच्चें को खाना खिला रही थी तभी किसान की पत्नि की नजर पक्षीयों पर पड़ा और रोते विलकते पक्षीयों को देख किसान की पत्नि सोचा की चटिया की चुटियन को किसी ने दुष्ट शिकारी ने मार दिया। इसके बाद उसने सोचा बच्चों के लिए दूसरी मां शादी की बच्चों के लिए वह दूसरी मां लाया तथा अपने लिए प्रमिका लाया। किसान की पहली वगवास पत्नि के दो बच्चे थे जो सौतेली मां रोज उन बच्चों के साथ गाली-गलौच मार पिट कर दोनों बच्चो को दुख देती थी। उन दो बच्चो सौतेली मां भर पेट खाना नही देती है। एक दिन दोनों बच्चो को खाने में जहर मिलाकर बड़े लाड़ प्यार से गोद में उठाकर खिलाने की कोशिश की परन्तु दोनों बच्चों ने अपने स्वर्गवास मां की याद में खाना नही खाये और इस प्रकार बिना मां बाप के बच्चे पूरे संसार में जीवन जीने के लिए अत्यन्त कठिनाई एवं दुख दर्द सहन करना पड़ता है।

प्रौढ़ शिक्षा अभियान

आज से 40-50 साल पहले प्रौढ़ शिक्षा अभियान लागू किया गया था। उस समय गांव-गांव में न स्कूल था इसलिए गांव के लोग साक्षर नहीं थे। अशिक्षित लोग पढ़ने वाले 30-40 साल के महिला एवं पुरुष और बुर्जग पढने के लिए पेड़ पौधों के नीचे बैंठकर पढ़ते थे, तथा रात में लालटेन के नीचे पढ़ा करते थे। भारत में अशिक्षित से शिक्षित बनने के साथ साथ भारत के उन्नती थोड़ा बहुत भी विकास हुआ इस प्रकार कहानी है। जो सही एवं सत्य है।

आंगनबाड़ी कार्यालय

घर में बच्चे मां से सबसे पहले मां शब्द कहने के लिए सीखते है। इसके साथ साथ बच्चों को एक बूंद जीदंगी के लिए अर्थात् पल्स पोलियो पिलाया जाता है। एक साल के बच्चे को केवल पांच बार पिलाया जाता है। चार साल बाद आंगनबाड़ी में जाकर अपनी गुरु माता से अ, आ, इ, ई पढ़ते है, और इसके बाद ही आगे उनकी पढ़ाई करने को जाते है। यही आंगनवाड़ी का कार्य है।

कामकाजी शिल्पियों के किस्सों का खजाना अकूत है। अब वापस दुनियादार में जुटने का समय, उनका और मेरा भी। अगली किश्त तक के लिए। कही-सुनी है, इसलिए शोध प्रयोजन के लिए उपयोगी नहीं। शोध हेतु प्राथमिक स्रोतों पर अर्थात सीधे इन शिल्पियों से सुनना चाहिए।

Thursday, October 27, 2022

शिवरीनारायण

महानदी, शिवनाथ और जोंक संगम पर बसा नगर शिवरीनारायण, मेरी दृष्टि में छत्तीसगढ़ की नाभि है। छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र, वैष्णव मठ है। 1891 तक तहसील रहे इस स्थान में महंतपारा और भोगहापारा शामिल थे। माना जाता है कि माघ पूर्णिमा से लगने वाले मेले के पहले दिन जगन्नाथपुरी के ‘नील-माधव‘ यहां विराजते हैं। जानकारी मिलती है कि शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से नील-माधव को पुरी ले जा कर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किए जाने का उल्लेख 14 वीं सदी के उड़िया कवि सरलादास द्वारा किया गया है। 

निकट स्थित प्राचीन नगरी खरौद के साथ इस स्थान का महत्वपूर्ण उल्लेख आर्क्यालाजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोट के वाल्युम 7, 1873-74 में मेजर जनरल ए. कनिंघम के सहायक जे.डी. बेगलर द्वारा बलौदा शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। 
मुख्य मंदिर तथा मंडप में रखी
गरुड़ासीन लक्ष्मीनारायण प्रतिमा

प्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह, 1882-85 के बीच शिवरीनारायण में तहसीलदार पदस्थ रहे। इस दौरान 1885 में महानदी में आई बाढ़ की विभीषिका को उन्होंने अपनी कविता ‘प्रलय‘ में दर्ज किया है। सज्जनाष्टक में यहां के यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, ऋषिराम शर्मा, माखन साव, हीराराम त्रिपाठी, मोहन पुजारी और रमानाथ पर कवित्त की रचना की। साथ ही श्यामास्वप्न, श्यामसरोजनी और श्यामालता की रचना भी शिवरीनारायण में रहते हुए की। 

1910 में ए.ई. नेलसन संपादित बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर शिवरीनारायण का विवरण मिलता है। इसमें बताया गया है कि नदी के पास स्थित छोटे से तालाब ‘रोहिणी कुंड‘ में लोग अस्थि विसर्जन करते हैं, जबकि मुख्य मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा के चरणों के पास जलराशि का छोटा सा कुंड है, जिसे इस नाम से जाना जाता है। साथ ही उल्लेख आता है कि यहां महंत गद्दी की स्थापना दयारामदासजी ने की थी। इस परंपरा में सर्वस्वामी कल्याणदासजी, हरिदासजी, बालकदासजी, महादासजी, मोहनदासजी, सूरतरामदासजी, मथुरादासजी, प्रेमदासजी, तुलसीदासजी, अर्जुनदासजी और गौतमदासजी हुए। गौतमदासजी के गुरु अर्जुनदासजी 44 वर्ष महंत की गद्दी पर रहे, उनकी मृत्यु 75 वर्ष की आयु में हुई। गौतमदासजी निहंग गद्दी के बारहवें महंत हैं, इस समय वे 74 वर्ष के हैं और मठ की व्यवस्था का जिम्मा 29 वर्षीय लालदास को सौंप दिया है। 

केशव नारायण मंदिर के प्रवेश द्वार पर
जतिन दास के साथ मेरी यह फोटो
रघु राय ने ली है।

1923 में प्यारेलाल गुप्त द्वारा बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, हिंदी में ‘बिलासपुर वैभव‘ तैयार किया गया। इसमें उल्लेख आया है कि ‘निहंगोंका एक मठ शिवनारायणमें है। इस मठमें कुल 18 गांव लगे हुए हैं जिनमें 6 गांव माफी हैं। इस समय इस मठके महंत लाल दासजी बड़े सज्जन पुरुष हैं। शिवरीनारायण के रहने वाले योग्य कवि पं. शुकलालप्रसाद पाण्डेय का उल्लेख है। 1885 के बाढ़ में तहसील आफिस बह जाने, जगन्मोहनसिंह तहसीलदार की पुस्तिका ‘प्रलय‘ और ‘शिवनारायण?‘ का उल्लेख है। प्रमुख ठौर शीर्षक अंतर्गत शिवरीनारायण का विवरण है। 

1955 में वी.वी. मिराशी द्वारा किए गए कलचुरि अभिलेखों का अध्ययन ‘कार्पस...‘ प्रकाशित हुआ, जिसमें शिवरीनारायण के तीन अभिलेख सम्मिलित हैं। इनमें रत्नदेव द्वितीय का कलचुरि संवत 878 (1127) का ताम्रपत्र, मूर्तिलेख कलचुरि संवत 898 (1146) तथा जाजल्लदेव द्वितीय का चंद्रचूड़ मंदिर शिलालेख चेदि संवत 919 (1167-68) है, जिस शिलालेख में कलचुरियों की आनुषंगिक शाखा पृथ्वीदेव प्रथम के छोटे भाई सर्वदेव के अलावा अन्य राजपुरुषों आमणदेव, राजदेव, तेजल्लदेव, उल्हणदेव, गोपाल और विकण्णदेव के नाम मिलते हैं। 

शिवरीनारायण के पुरातत्व पर राय बहादुर हीरालाल, पं. लोचनप्रसाद पांडेय, बालचन्द्र जैन, डॉ. सुधाकर पांडेय जैसे विद्वानों ने भी शोध-लेखन किया है। 

2011 में प्रो. अश्विनी केशरवानी के संपादन में ‘श्री शिवरीनारायण माहात्म्य‘ का प्रकाशन हुआ है। इसके पहले उनकी पुस्तक ‘शिवरीनारायण देवालय और परम्पराएं‘, 2007 में प्रकाशित हुई, जिसमें स्थानीय जानकारियों का पर्याप्त रोचक संग्रह है। इस पुस्तक में आभार सहित शिवरीनारायण के एक परवर्ती काल के शिलालेख के मेरे पाठ को पेज-152 पर प्रकाशित किया है। 


छत्तीसगढ़ में अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के अभिलेख, दस्तावेज गिने-चुने हैं। इस दृष्टि से इनका विशेष महत्व है। यह शिलालेख शिवरीनारायण के ‘सिंदुरगिरि‘, वर्तमान जोगीडीपा या जनकपुर के नाम से ज्ञात क्षेत्र के मंदिर में जड़ा हुआ है। शिलालेख का पाठ इस प्रकार है- 

श्री गणेशायनमः। गौरी सुत गज वदन पग वंदि गुरुहि सिर नाय लिषेण सुकीरति सफल कै सारद आज्ञा पाय।।1।। दोहा ।। सिंदुरगिरि परि थल सुभग चित्रोत्पल तीर। सीध तपोवन रहत जहं सेवत सिअ रघुवीर।।2।। कल्प -- कै चरित अति गावत विविध प्रकारा।। शंकर सहसानन सहित लहै न सारद पारा।।3।। द्वापर चौथे पाद मा वह थल अति -काता। तपी तपोनिधि रहत नित तपत नीस दिन रात।।4।। मोरध्वज महिपाल मनि विदित रत्नपुर ग्राम।। सो सिुदंरगिरि में रच्यो बहु तपसिन कै धाम।।5।। काल पाअ पुनि लुप्त भे रह्यो कछुक नहि चीन्हा। तब रघुपति निज दास केै मन इच्छा करि दीन्हा।6।। सुचि संवक श्रीराम के तान भक्ति युत संता। सो पुनि इह थल उदित किये अर्जुनदास महंता।7।। उनविस सत के उूपरे अष्टाविंसति अंका। संवत विक्रम भूप के सर्व सुफल अकलंका।8।। कृष्ण पक्ष आषाढ़ कै तेरस - गुरुवारा। भयो प्रतिष्ठा साम कै अति रमनिक सु प्रसारा।9।। मति गति विद्याहीन है नारायणपुर धामा। दोहा ----- हीरारामा।10।। मीती आसाढ़ कृष्न 13 गुरुवासर संवत 1928. 

राम-जानकी मंदिर का गर्भगृह तथा मंडप में लगा शिलालेख, 
जिसका आशय स्वयं स्पष्ट है। इसमें आया नाम ‘सत्येन्द्र कुमार सिंह‘ 
मेरे (यानि राहुल कुमार सिंह और अग्रज राजेश कुमार सिंह) के पिता हैं। 
अश्विनी जी ने अपनी पुस्तक में इस श्रीराम जानकी मंदिर को
महंत अर्जुनदासजी की प्रेरणा से
संवत 1927 (सन 1870)? में बनवाया जाना लिखा है।