Sunday, December 29, 2024

देव बलौदा में महाभारत प्रसंग

यहां प्रस्तुत लेख इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की शोध पत्रिका ‘कला-वैभव’ के अंक-17 (2007-08) में पृष्ठ 86-87 पर प्रकाशित हुआ है। श्री रायकवार के इस लेख का टेक्स्ट इस प्रकार है-

दक्षिण कोसल की शिल्पकला में महाभारत के प्रसंग 
- श्री जी. एल. रायकवार*
*दूरभाष नं. 0771/2429109 (निवास) 

दक्षिण कोसल की स्थापायकता में रूपायित महाकाव्यों के कालजयी कथानकों के अंकन की परम्परा अत्यन्त मनोरंजक तथा कौतूहलवर्धक है। ईसवी पूर्व तृतीय-द्वितीय सदी से दक्षिण कोसल का इतिहास पुरावशेषों के माध्यम से प्रकट होने लगता है। इस अंचल की शिल्पकला का विकसित स्वरूप छठवी-सातवीं सदी ईसवी के ताला, मल्हार, राजिम, सिरपुर एवं अन्य स्थापत्य संरचनाओं में प्रस्फुटित है। इस काल में शरभपुरीय एवं सोमवंशी शासकों के द्वारा पुष्पित पल्लवित कला-परम्परा मंदिर स्थापत्य, विहार, प्रतिमाएं, मृण्मयी कला एवं धातु प्रतिमाओं में असीम सौन्दर्य तथा कला के मान्य सिद्धान्तों के अनुसार रूपायित है। रतनपुर के कलचुरि, कवर्धा के फणिनाग एवं बस्तर के छिंदक नाग शासकों के काल में कला-संस्कृति का स्वरूप स्थिर होने लगता है। इस काल में रामायण तथा महाभारत के पात्रों के जीवन से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं को शिल्पियों ने वर्ण्य विषय के रूप में स्वीकार कर मूर्तरूप प्रदान किया है। 

भारतीय कला के आधार तल में दार्शनिक चिन्तन, पौराणिक कथा एवं लोक-जीवन का समुच्चय है। कठोर पाषाण, ईंट, मिट्टी, काष्ठ, धातु एवं अन्य माध्यमों पर अभिव्यक्त कला से हमें तत्कालीन धारणाओं तथा मान्यताओं के साथ-साथ कला-अभिरुचि एवं शिल्पीय मौलिकता के दर्शन होते हैं। भारतीय कला एवं संस्कृति को प्रभावित करने वाले घटकों में धर्म सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारतीय आर्ष ग्रन्थों के अंतर्गत रामायण, महाभारत, पुराण साहित्य तथा धर्मशास्त्रों का कला एवं संस्कृति के पल्लवन में अतिशय योगदान है। 

शिल्पकला में महाभारत के प्रसंगों के निरूपण में दक्षिण कोसल के शिल्पियों ने देवालयों में स्थान निर्धारण तथा अभिधेय को न्यूनतम लक्षणों सहित प्रदर्शन के लिये स्वतंत्र रहा है। एकमात्र राजीव लोचन मंदिर को छोड़कर सोमवंशी काल के समस्त मंदिरों के मंडप भग्न है। राजीव लोचन मंदिर के मंडप में महाभारत के अप्रतिम योद्धा कर्ण तथा अर्जुन का शिल्पांकन मंडप में प्रवेश क्रम के प्रथम भित्तिस्तंभ में आमने- सामने संयोजित हैं। कर्ण तथा अर्जुन की अर्धस्तंभ पर रूपायित मानवाकार प्रतिमाएं प्रथम पंक्ति के क्रमशः बायें तथा दायें ओर दृष्टव्य हैं। उनके आयुधों में लम्बवत् विशाल धनुष, कंधे पर तूणीर तथा कटि में कटार का अंकन है। इनमें से एक प्रतिमा के वक्ष पर, आवृत कवच से कर्ण का अभिज्ञान सुस्पष्ट है। साथ ही साथ अधिष्ठान पर अश्व रूपायित है। कर्ण के पहचान से सम्मुख स्थित प्रतिमा का अभिज्ञान अर्जुन सुनिश्चित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सिरपुर स्थित स्थानीय संग्रहालय में सिरपुर के भग्नावशेषों से संग्रहीत कर्ण और अर्जुन की खंडित प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। इन प्रतिमा खंडों के अधिष्ठान में रथ भी रूपायित है। प्राप्त अवशेषों से सोमवंशी काल के वैष्णव मंदिरों के मंडप पर कर्ण और अर्जुन के रूपांकन की सुदीर्घ परम्परा पुष्ट होती है। 

कलचुरि कालीन कर्ण और अर्जुन की प्रतिमाएँ मारो (दुर्ग जिला), विजयपुर (बिलासपुर जिला) तथा मल्हार (बिलासपुर) से प्राप्त हुई हैं। उपरोक्त प्रतिमायें द्वार-शाखा की भाग हैं। शहडोल जिले के अनूपपुर के सन्निकट ग्राम सामतपुर स्थित लगभग बारहवीं सदी ईसवी के एक मंदिर का प्रवेश द्वार परिपूर्ण है। प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से में दायें ओर सूर्य सहित कर्णं तथा बायें ओर इन्द्र सहित अर्जुन का अंकन है। विषय वस्तु के निरूपण में सामतपुर से प्राप्त अवशेष सुदृढ़ परम्परा और शिल्पीय कौशल का सुन्दर उदाहरण है। कर्ण और अर्जुन युक्त द्वार शाखा सरगुजा जिले के महेशपुर में भी प्राप्त हुई हैं। महेशपुर से ज्ञात विवेच्य प्रतिमायें त्रिपुरी के कलचुरियों के काल, लगभग 11 वीं सदी ईसवी में निर्मित हैं। विवेच्य प्रतिमाओं के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि शिल्पियों ने कर्ण और अर्जुन के प्रतिमा लक्षण में आयुध क्रम के अंतर्गत धनुष-बाण, तूणीर और अधिष्ठान में अश्वों के अंकन को मान्य किया है। 

कर्ण और अर्जुन के युद्ध से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण दृश्य देवबलोदा के शिव मंदिर में प्रदर्शित है। महाभारत के कर्ण पर्व पर आधारित कर्ण-अर्जुन के मध्य युद्ध का यह सर्वोत्तम दृश्य है। इस शिल्पकृति में दायें ओर अर्जुन तथा बायें ओर कर्ण रथारूढ़ बाण प्रहार करते हुये प्रदर्शित हैं। अर्जुन के रथ पर कपिध्वज है। कर्ण के द्वारा संधारित बाण पर अश्वसेन नाग का अंकन है। कर्ण और अर्जुन के द्वैरथ संग्राम में अर्जुन का प्रबल शत्रु अश्वसेन नाग की भूमिका तथा उपस्थिति का विशद वर्णन कर्ण पर्व में प्राप्त होता है। अश्वसेन नाग तथा कर्ण के मध्य संवाद में कर्ण की युद्धनीति, शालीनता तथा पराक्रम का उज्ज्वल पक्ष ज्ञात होता है। 

महाभारत के युद्ध में क्रूरतम विभीषिका के अंतर्गत दुःशासन का वध नारी के अपमान के भयंकर प्रतिशोध का परिणाम माना जाता है। दक्षिण कोसल की शिल्प कला में फिंगेश्वर (रायपुर जिला) के फणिकेश्वर महादेव के मंदिर के जंघा भाग में यह कक्षा रूपावित है। फणिकेश्वर मंदिर लगभग 14 वीं सदी ईसवी में क्षेत्रीय कलचुरि शासकों के काल में निर्मित है। प्रतिमा फलक में बायें ओर युद्धरत एक योद्धा भूमि पर लुंठित है तथा दूसरा योद्धा उस पर हाथों से प्रहार कर रहा है। लुंठित पुरुष के समीप गदा भूमि पर पड़ा हुआ है। ऊपरी मध्य भाग में एक बाहु पृथक से दिखाई पड़ रही है और फलक के अंतिम बायें भाग में एक नारी खड़ी हुई है। इस दृश्य में भीम के द्वारा दुःशासन के भुजा को उखाड़कर फेंकने, उसके हृदय का रक्तपान और उसके रक्त से द्रौपदी के केश प्रक्षालन की समस्त घटनाक्रम की शिल्पकृति में जिस कौशल से प्रदर्शित किया गया है वह दक्षिण कोसल के शिल्पी के निरंतर साधना का प्रतिफल है। भारतीय शिल्प कला में दुःशासन वध का यह एक मात्र ज्ञात शिल्प कृति है। प्रतिमा फलक में सीमित दृश्यांकन से कौरव-पांडवों के मध्य आयोजित द्यूत प्रसंग, दुःशासन के द्वारा द्रौपदी के केश पकड़कर सभा के मध्य पसीटते हुये लाना तथा भीम के द्वारा भीषण प्रतिशोध की घटना कौंध जाती है। महाभारत के कथानक को मौलिक कल्पना से सीमित स्थल में सहज रूप से रूपायित करने में शिल्पी की साधना अपूर्व है। 

दक्षिण कोसल में महाभारत कालीन पुरावत्वीय स्थल तथा अवशेष चिन्हांकित नहीं है तथापि महाभारत से संबंधित कथा तथा पात्रों के चरित्र गायन की मौखिक परम्परा अद्यतन इस अंचल में जीवित है जो 'पंडवानी' के नाम से जानी जाती है। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मंचों में पंडवानी के अनेक प्रदर्शन हुये हैं तथा इस विधा के गायन और अभिनय प्रस्तुति से कला मर्मज्ञ रोमांचित हुये हैं। छत्तीसगढ़ में पंडवानी गायन के सुप्रसिद्ध कला साधक पद्म विभूषण सुश्री तीजनबाई, श्री पूनाराम निषाद, श्रीमती रितु वर्मा, श्रीमती ऊषा बारले आदि प्राण-प्रण से इस परम्परा को सुरक्षित रखने तथा भावी पीढ़ी को उत्तराधिकार में सौंपने के लिये निस्वार्थ भाव से सचेष्ट हैं। 

अंततोगत्वा यह सुनिश्चित रूप से मान्य किया जा सकता है कि दक्षिण कोसल के सोमवंशी काल के स्थापत्य कला में कर्ण और अर्जुन के रूपांकन की परम्परा मान्य रही है। दक्षिण कोसल के कलचुरियों की कला में कर्ण और अर्जुन को द्वारशाखा पर रूपायित कर महत्व प्रदान किया गया साथ ही अन्य प्रसंगों को भी मूर्त करने में शिल्पी सफल रहे हैं। दक्षिण कोसल में महाभारत के शिल्पीय अभिव्यक्ति में मौलिकता, सजगता और कल्पना अद्वितीय है।

Friday, December 27, 2024

कोड़ेगांव सती लेख

यहां प्रस्तुत लेख इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की शोध पत्रिका ‘कला-वैभव’ के अंक-17 (2007-08) में पृष्ठ 107-108 पर प्रकाशित हुआ है। लेख के वाचन तथा भूमिका तैयार करने में सहयोगी अधिकारी श्री जी.एल. रायकवार की मुख्य भूमिका रही है। मूल शिलालेख का अवलोकन मेरे द्वारा नहीं किया गया है, वाचन श्री रायकवार द्वारा लिए तथा उपलब्ध कराए गए छायाचित्र के आधार पर किया जा कर पुष्टि कराई गई है। लेख का टेक्स्ट इस प्रकार है- 

सारंगदेव के समय का कोड़ेगांव से प्राप्त सती लेख 
- श्री राहुल कुमार सिंह* 
* उप संचालक, संस्कृति विभाग, रायपुर (छ.ग.) 

छत्तीसगढ़ अंचल में महाषाणीय शवाधान संस्कृति के स्मृतिपरक अवशेषों के व्यापक क्षेत्र में बस्तर के वनांचल से लेकर दुर्ग धमतरी तक के मैदानी भाग में मानव संस्कृति की इस धारा में बस्तर अंचल के माड़िया गोंड़ जनजाति की शवाधान परम्परा में स्मृतिपरक काष्ठ स्तंभों में प्रकृति, प्रथा और दर्शन एक साथ समाहित रहते हैं। छत्तीसगढ़ के परवर्ती ऐतिहासिक काल के स्मृतिपरक अवशेषों में योद्धा प्रतिमाओं तथा सती प्रस्तर का अंकन विशेष लोकप्रिय रहा है। खड्ग-ढाल, धनुष-बाण और कटार से सज्जित योद्धा प्रतिमाएं अनेक स्थलों से प्राप्त हुई हैं। युद्ध में प्राणोत्सर्ग और आततायी दस्यु तथा नरभक्षी वन्य जन्तुओं से पीड़ितों की रक्षा हेतु आत्मोत्सर्ग करने वाले शूरवीरों की प्रतिमाओं का अंकन तथा सम्मान लोक संस्कृति और परम्परा में प्रचलित रही है। ग्रामीण अंचलों में इस प्रकार की प्रतिमाओं की पूजा लोक देवता मानकर की जाती है, जिसमें पूर्ववत रक्षा की भावना सन्निहित होती है। 

छत्तीसगढ़ में प्राचीन सामाजिक प्रथाओं के अंतर्गत सती प्रस्तर, सती स्तंभ तथा शिलापट्ट बहुतायत से मिलते हैं। सामान्य रूप से इन्हें सती स्तंभ के रूप में अभिज्ञान किया जाता है। प्राचीन काल की कलाकृतियां होने से इन्हें पुरावशेषों के अंतर्गत भी रखा जाता है। सती प्रस्तरों का मुख्य लक्षण है- सूर्य, चन्द्र तथा भुजा सहित दायीं हथेली और दम्पति आकृति का रूपांकन। कुलीन, प्रतिष्ठित और धनाढ्य वर्ग से संबंधित अधिकांश सती प्रस्तरों पर लेख मिलते हैं। कुछ सती प्रस्तरों पर शिवलिंग अथवा विष्णु की आराधना रूपायित की जाती है। अधिकांश सती प्रस्तरों पर अंजलिबद्ध दम्पति युगल (पद्मानस्थ अथवा स्थानक) दिखाई पड़ते हैं। आकृति विहीन सती प्रस्तर भी प्राप्त होते हैं। ग्रामीण अंचलों में श्रद्धा से इनकी पूजा होती है। 

छत्तीसगढ़ अंचल से प्राप्त सती प्रस्तरों में जाति अथवा व्यवसाय मूलक प्रतीक चिह्न कोल्हू, हथौड़ी, कुदारी, अश्व भी पाये गए हैं। अभिलिखित सती प्रस्तरों में पारंपरिक रूप से स्वस्ति वाचन, स्थल, वंशावली (कुल पुरुषों के नाम), शासक का नाम, संवत, मास, तिथि, दिन तथा अंत में कुटुम्बियों के लिये शुभ भावना उत्कीर्ण की गई है। 

छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में लगभग 11-12वीं सदी ईसवी के पश्चात् सती प्रस्तर मिलने लगते हैं। प्राचीन नगर, राजधानी, गिरि- दुर्ग, संगम स्थल, नदियों के तट पर स्थित ग्राम एवं सरोवर और धार्मिक स्थलों के आस-पास सती प्रस्तर विशेष रूप से प्राप्त होते हैं। कुछ स्थलों के नाम के साथ सती नारी के त्याग, भक्ति, शौर्य तथा चरित्र, किंवदंतियों में जीवित हैं। अभिलिखित सती प्रस्तरों में सती नारी के लोकहित से संबंधित जानकारी के उल्लेख नहीं मिले हैं। राजिम तेलिन का नाम इस अंचल के महत्त्वपूर्ण धार्मिक एवं पुरातत्त्वीय स्थल राजिम और राजीव लोचन के साथ जुड़ा हुआ है। राजिम स्थित सती माता मंदिर के गर्भगृह की भित्ति में दो बड़े आकार के सती पट्ट जड़े हुए हैं। इनमें से एक राजिम तेलिन से संबंधित माना जाता है। दोनों सती प्रस्तरों में मानव आकृतियां एवं कोल्हू का अंकन है। 

सती प्रस्तरों की श्रृंखला में ग्राम कोड़ेगांव (बी) जिला धमतरी से प्राप्त अवशेष लेखन शैली की दृष्टि से विशिष्ट है। यह 57x47x20 से.मी. आकार का है। इसके ऊपरी भाग पर क्रमशः सूर्य, हथेली, कलश और चन्द्र का अंकन है। मध्य में प्रकोष्ठ के भीतर प‌द्मानस्थ दम्पति युगल प्रदर्शित हैं। प्रतीक चिन्हों के नीचे, प्रकोष्ठ के उभार पर लम्बवत एक पंक्ति का लेख अंकित है। शेष अंश प्रकोष्ठ के बायें तथा दायें स्तंभ पर ऊपर से नीचे की ओर दृष्टव्य है। यह सती प्रस्तर एवं लेख श्री संवत् 1435 के अनुसार ईसवी 1378 के लगभग निर्मित है। इसमें तत्कालीन शासक, स्थल तथा संवत की जानकारी होने से ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा शोधपरक है। 

मूल पाठ 

प्रथम पंक्ति - स्वस्ती श्री सम्वत 1435। श्री सारंगदेव रा (.) काकैर दुर्गे होला साउ पुत्रधानु साउ सति हीराई सास्त 

बायां पार्श्व             दायां पार्श्व 

रलोक समै             भुरमा साउ पु (-) 
सुधी अ                  त् र ऐरू सेठी कृतिः
धीक -                   सुभं भ 
मासे                      वतुः 
(.....) स 
नीच 
रे 
मु 
ल 

शुद्ध पाठ 

स्वस्ति श्री संवत 1435। श्री सारंगदेव राजः कांकैर दुर्गे होला साउ पुत्र धानु साउ सती हीराय पास (प) रलोक समै (-) अधिक मासे (-) सनीचरे मुल भुरमा साउ पुत्र ऐरू सेठी कृतिः शुभं भवतु। अनुवाद स्वस्ति। श्री संवत 1435 में श्री सारंगदेव राजत्वकाल में कांकैर, दुर्ग (किला) के निवासी होला साहू के पुत्र धानु साहू की सास हीराई के परलोक गमन के समय (-) अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) (-) शनिवार के दिन भुरमा साहू के पुत्र ऐरू सेठी के द्वारा निर्मित की गई। शुभ (कल्याण) हो। 
अभिलेख का महत्त्व - यह अभिलेख शासक का नाम, स्थल नाम, जाति सूचक, संवत, मास, दिन एवं पुरुषोत्तम मास की जानकारी के कारण क्षेत्रीय इतिहास की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस सती प्रस्तर में कलात्मकता भी प्रदर्शित है।

Sunday, December 1, 2024

बैरागी मनमीत

यही कोई आधी सदी पहले। मंचीय कवि-सम्मेलन के दौर में काका हाथरसी और नीरज के बाद नाम आता था, बालकवि बैरागी का, मगर यह भी कोई नाम हुआ, खैर। मालवी बैरागी जी कवि के अलावे मध्यप्रदेश में मंत्री भी रहे, 1969 में। उनकी आत्म-कथा ‘मंगते से मिनिस्टर‘ शायद अब भी अप्रकाशित है और दूसरा खंड, जिसकी योजना थी और शीर्षक तय था, मगर यह शायद लिखी ही नहीं गई- ‘मंत्री से मनुष्य‘। उनकी आत्म-कथा का एक अंश याद आता है- ‘मेरी माँ ने मुझे सबसे पहला खिलौना दिया, वह था- भीख मांगने का कटोरा, जो हमारे परिवार की आजीविका का साधन था।‘ ‘ईदगाह‘ का चिमटा बरबस याद आता है। उनके भाई विष्णु बैरागी रतलाम निवासी हैं, अपना घर बनाने के लिए बेहिचक मित्रों से आर्थिक सहयोग के आग्रह का पत्र लिखा, आशा से अधिक सहयोग मिला, अधिक को लौटा दिया और घर बन गया तो नाम रखा- ‘मित्र-धन‘।

1973, अकलतरा। गणेशोत्सव पर स्कूल में आयोजित कवि-सम्मेलन में शैल चतुर्वेदी आए थे, अकलतरा के अपने सहपाठी प्रताप सिंह जी को याद किया, गले मिले। संदर्भ पता लगा कि आजादी के दौर में बिलासपुर शासकीय विद्यालय छात्रावास के अलावा एक निजी-संचालित छात्रावास भी था, वर्तमान पीजीबीटी कालेज और भूत बंगला यानि मेसानिक हाल के बीच में, जिसका संचालन शैल चतुर्वेदी के मामा करते थे, मथुरा से आए थे, इस बोर्डिंग में भोजन ठीक-ठाक होता और अनुशासन में भी वैसी कड़ाई नहीं होती थी। शैल चतुर्वेदी अपने स्कूली जीवन के कुछ बरस इसी के चलते बिलासपुर में रहे थे। माणिक वर्मा थे, सुनाया- ‘जिस शाम को तुम मिलती हो वो शाम हरी हो जाती है, जिस ठूंठ को छू देती हो, वो ठूंठ हरी हो जाती है‘, आदि। परंपरा थी कि मंच पर एक-दो स्थानीय कवियों से भी कविता पढ़वाई जाए। ऐसे एक कवि ने कविता पढ़ना शुरू किया, लोग बार-बार वही कविता सुनते रहे थे, हूटिंग होने लगी। बालकवि माइक पर आए और कहा कि जो घर-आंगन की तुलसी को नहीं पूज सकता वह वट-पीपल को क्या पूजेगा, बस सन्नाटा खिंच गया।

आज मैंने सूर्य से बस यूँ कहा, 
आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा?
तमतमाकर वो दहाड़ा, मैं अकेला क्या करूँ?
तुम-निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ? 
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो।
संग्राम ये घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो।
उनकी ऐसी रचनाओं के साथ ‘तू चंदा मैं चांदनी...‘ लोकप्रिय हुआ था। तब बांग्लादेश युद्ध की स्मृति तब एकदम ताजा थी, बैरागी जी ने ‘लगे हाथ निपटा ही देते पिंडी और लाहौर को‘ सुनाया। बाद में उनकी ‘पनिहारी‘ की बारी आई। इसके पहले वे कुछ पंक्तियों से माहौल बनाते, जैसे- ‘मैं मरूंगा नहीं, क्योंकि ऐसा कोई काम करूंगा नहीं‘ और ‘मुझे सपने नहीं आते, क्योंकि मैं बुझकर नहीं थककर सोता हूं- ताली वाली ऐसी बातें। फिर पनिहारी, मगर उसके पहले चार पंक्तियां सुनाते, डिस्क्लेमर सहित कि नोट मत कर लेना, कुछ कर-करा लिया तो जिम्मेदार ठहराया जाऊंगा, वह पंक्तियां थीं- 

आज भले ही पत्थर बनकर तू मुझको ठुकराएगी,
मुझे छोड़कर किसी और के नैनों में बस जाएगी, 
तुझसे जितना हो तू कर ले लेकिन ये भी सुन लेना, 
मैं तो पनघट तक आया था तू मरघट तक आएगी।
हमने बैरागी जी की बात मानी, नोट नहीं किया, मगर दूसरी सुबह मिल जुलकर याद कर लिया, याद भी रखा, और संदेश की तरह नहीं, कविता की तरह यहां-वहां अपने काव्य-प्रेम और रसिकता के बतौर प्रमाण कहते-सुनाते रहे। फिर शुरू हुआ, पनिहारी। नवी उमारिया नवी डगरिया नवा पिया की नवी प्यारी (राम) नवी नगरी मैं नवी गगरी ले पनघट जईरी ओ पनिहारी। मालवी शब्दों को बीच-बीच में समझाते चलते, मगर रसिक श्रोता शब्दों के पार जा चुके होते, आह-वाह होता रहता।

बैरागी जी के इस राग-विराग, नींद और सपने पर अर्ली टु बेड ... के साथ कुछ अपनी बात। जल्दी नींद तभी आ सकती है, जब संतोष हो कि आज भर के लिए कुछ कमाई कर ली है और जल्दी नींद तभी खुलती है, जब फिर से नया कुछ करने का उत्साह हो, और कुछ नहीं तो सुबह जल्दी उठकर घंटे भर का योग-ध्यान, व्यायाम, पैदल-कसरत जैसा कुछ कर लिया जाए, लगे कि इतनी तो कमाई कर ही ली। जहां तक सपनों की बात है, सपने तो मन की चुगली हैं। मन से दोस्ती रखें, कुछ उसकी मान लें, कभी अपनी के लिए उसे मना लें। हर बार मनाही-मना ही न हो, न ही हमेशा मनमानी। यानि मन का और मन भर कर सकने की हसरत हो तो उसका हौसला और हिम्मत हो, उसका असर बर्दाश्त करने के लिए तैयार रहें, इतनी हैसियत भी हो। 

कहा गया है, मन ही संसार को रचता है ‘मनो हि जगतां कर्तृ मनो हि पुरुषः परः। मनःकृतं कृतं लोके न शरीरकृतं कृतम्।। आशय संभवतः यह कि इस पार्थिव जगत के प्रति गुण-दोष, चेतन मन ही रचता और आरोपित काता है, द्रष्टा ही स्रष्टा है, दृष्टि ही सृष्टि है, ज्यों ‘मैं सोचता हूं, अतः मैं हूं‘।

चंचल मन दुश्मन नहीं बच्चा है, जिद करता है, शैतान है, मगर उसका साथ मौज है, वह आड़े-टेढ़े वक्त पर आपको बहलाता भी है। मन के गुलाम न हों, न ही लगाम कसे रहें। उससे दोस्ती करें, मन से अच्छा मीत और कोई नहीं। भगवद्गीता बताती है- उद्धरेदात्मनात्मानं... आत्मनो बन्धु..., शुद्ध मन ही जीवत्वाभिमानी बुद्धि का उपकारक मित्र है, आदि। और धम्मपद पहली ही पंक्ति में कहता है- मनोसेट्ठा मनोमया... यानि मन श्रेष्ठ है, स्वच्छ मन के वचन-कर्म का सुख कभी साथ न छोड़ने वाली छाया की तरह अनुगमन करता है।