Monday, August 31, 2026

बनारस में सिरपुर ज्ञान-प्रवाह

भारतेन्दु परिवार के मोती चन्द्र जी और शांति जी के पुत्र प्रमोद चन्द्र जी, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला के आचार्य रहे। बनारस से उनके रिश्तों के चलते वहां अमेरिकन एकैडमी आया, जो बाद में चीफ कोर्ट हाउस, रामनगर में अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज (अब गुड़गांव में) हुआ। इसी तरह वे ‘ज्ञान-प्रवाह‘ से जुड़े रहे। उनसे परिचय और उनका स्नेह होने के कारण इन संस्थाओं और बनारस से मेरा रिश्ता मजबूत होता गया। इस भूमिका के साथ स्मरण सन 2010 का। 

फोन पर विस्तृत चर्चा कर उन्होंने सिरपुर पर आयोजन के लिए सुझाव की जिम्मेदारी मुझपर सौंपी। मुझे सुझाना था कि ज्ञान-प्रवाह में ‘सिरपुर‘ पर आयोजन में कौन कौन विद्वान होंगे और उनके टॉपिक क्या होने चाहिए। इस पूरे दौरान मेरा संपर्क ‘ज्ञान-प्रवाह‘ की सुश्री बिमला पोद्दार जी से बना रहा। प्रमोद चन्द्र जी का ई-मेल 14-06-2010 यह था। बात आगे बढ़ी। आयोजन की पूरी कार्यवाही से मैं जुड़ा रहा और ई-मेल की प्रतियां मुझे भी आती रहीं। यह आयोजन 29-30 जनवरी 2011 को हुआ। निजी कारणों से मैं स्वयं शामिल न हो सका। 

ज्ञान-प्रवाह ने अपनी शोध-पत्रिका के अंक 14 में लेख छापे, जिनमें एक श्री जी. एल. रायकवार का ‘सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग‘ था, उस लेख का चित्र और टेक्स्ट आगे दिया जा रहा है-

सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग 
जी.एल. रायकवार 

दक्षिण कोसल के विशिष्ट स्मारक स्थलों में ताला, मल्हार, सिरपुर, राजिम, डीपाडीह, भोरमदेव आदि सुप्रसिद्ध कला केन्द्र हैं। विपुल स्थापत्य अवशेष तथा दुर्लभ कलाकृतियों के माध्यम से इस अंचल की समृद्ध प्राचीन कला परंपरा का बोध होता है। लगभग 6ठी शती. ई. से 12वीं शती ई. तक दक्षिण कोसल के शरभपुरीय, नल, सोमवंशी, नागवंशी तथा कलचुरि शासकों के प्रश्रय में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन कला शैली क्रमशः यहाँ पल्लवित होती रही है। इस अंचल के प्रारंभिक काल की मूर्तिकला के केन्द्रों में गुप्तकालीन कला परंपरा के साथ-साथ क्षेत्रिय प्रवृत्तियाँ भी अन्तर्निहित हैं। यहाँ मूर्तिकला में मान्य शास्त्रीय बिम्बों के अतिरिक्त प्रकृति और लौकिक जगत् की रोचक विविधताओं का समावेश है। इस क्रम में देवरानी जेठानी मंदिर एवं ताला से प्राप्त रुद्रशिव की एकाश्म विशाल प्रतिमा में जीव-जगत् और वनस्पति जगत् का समायोजन अद्वितीय है। इसी मंदिर के सिरदल पर गजलक्ष्मी के अभिषेक दृश्य में नदी देवियों के मानव और सरिता रूप साथ-साथ रूपायित हैं। मूर्तिकला में प्रतिमा शास्त्रीय निर्देशों के साथ मनोरंजक, कौतूहलपूर्ण और विनोदात्मक भावों से परिपुष्ट कलाकृतियाँ विशेष रूप से आकृष्ट करती हैं और मौलिक कल्पना युक्त कथाओं का सृजन करती हैं।

सिरपुर का महातीवरदेव विहार (चित्र २६.१-२) 

कलाशैली की दृष्टि से इस विहार का निर्माण काल 530-650 ईसवी के मध्य निश्चित किया जा सकता है। यहाँ प्रवेश द्वार पर संयोजन द्वार शाखा के सम्मुख तथा पार्श्व भाग विविध कलात्मक दृश्यों से रूपायित हैं। रूप शाखा पर पारंपरिक मिथुन आकृतियों के अतिरिक्त विभिन्न जीव-जन्तुओं का अंकन है। ये कथाएँ प्रथमतः जातक तत्पश्चात् पंचतंत्र में उल्लिखित हैं। विहार के प्रवेश द्वार पर मकरारूढ़ वानर, गजयूथ, मेढ़ों की लड़ाई, मूषक पंक्ति, बक-कर्कट, शुक, उलूक, वृश्चिक, सर्प और मेंढक, मधुमक्खी, भौंरा, नीलगाय, महिष एवं कुक्कुट स्पष्टतः विद्यमान हैं तथा कुछ आकृतियाँ क्षरित होने से अस्पष्ट हैं। अर्धमंडप के एक स्तंभ पर श्वान सहित आखेटक दम्पति भी हैं। महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर रूपायित कुछ महत्त्वपूर्ण कथाशिल्पों का परिचय निम्नांकित हैः 

मकरारूढ़ वानर (चित्र 26.3)- इस कथाशिल्प में मूर्ख मकर अपने मित्र वानर को कपटपूर्वक पीठ पर बैठाकर अगाध जलराशि के मध्य पहुँचता है और अपनी पत्नी की इच्छानुसार उसके हृदय का मांस पिंड खाने के लिए अपनी कपट योजना को सविस्तार व्यक्त करता है। आसन्न संकट से अविचलित चतुर वानर मकर को फुसलाकर तट स्थित पेड़ पर वापस पहुँच जाता है तथा मकर की भर्त्सना करता है। कुछ प्रकारान्तर से यह कथा (चूल कुणाल वर्ग), संसुमार्ग जातक एवं वानरेन्द्र जातक में वर्णित है।1 

बक कर्कट-इस शिल्पकलाकृति में धूर्त बगुले द्वारा सरोवर सूखने का भय प्रचारित कर उस सरोवर में रहने वाली समस्त मछलियों को अन्यत्र ले जाकर कपटपूर्वक खाये जाने तथा केकड़े द्वारा मृत मछलियों की एकत्र अस्थियों को देखकर व बगुले की धूर्तता समझ में आने पर उसके गले में अपने धारदार डंक गड़ाकर उसका प्राणान्त करने की कथा है। यह जातक कथा के कुलावक वर्ग में विद्यमान है।2

यहीं पर संकेत रूप में रूपायित अन्य जातक कथाएँ निम्नलिखित हैं- 

0 उलूक का अंकन समस्त पक्षियों द्वारा राजा चयन करने की कथा का प्रतीक है। इस कथा में कौवे के द्वारा विघ्न उत्पन्न किया जाता है; अंततः उलूक राज्याभिषेक से वंचित हो जाता है। यह कथा कोसिय वर्ग अन्तर्गत उलूक जातक में वर्णित है।3 
0 महिष का अंकन शांत महिष तथा एक उत्पाती वानर की कथा से संबंधित है। उत्पाती वानर महिष की पीठ पर चढ़कर उसे अनेक प्रकार से तंग करता था। शांत महिष वानर के उत्पात को सहन करता रहा। किसी दूसरे महिष को इसी प्रकार तंग करने पर उसके सींग के प्रहार से आहत होकर वानर की मृत्यु हो जाती है। यह कथा अरण्य वर्ग के महिष जातक में मिलती है।4 
0 कुक्कुट का रूपांकन रात्रिकाल में असमय बाँग देने वाले कुक्कुट की कथा का परिचायक है। कुक्कुट के अवांछनीय कर्म के कारण गुरुकुल में अध्ययनरत पीड़ित विद्यार्थियों द्वारा उस कुक्कुट की हत्या कर दी जाती है। यह कथा हंसीवर्ग अन्तर्गत अकालरावी जातक में वर्णित है।5 

सिरपुर में अब तक लगभग 8 बौद्ध विहार तथा अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिर उत्खनन से प्रकाश में आये हैं। किन्तु महातीवरदेव विहार के अतिरिक्त किसी भी अन्य स्मारक पर इस प्रकार का कथात्मक अंकन नहीं है। अपवाद रूप में मल्हार (जिला बिलासपुर) में एक भग्न स्तंभ पर कच्छप और हंसों का अंकन है। यहाँ दो हंसों को एक लकड़ी को मुँह में दबाये उसके मध्य से लटकते कच्छप को आकाश मार्ग से अन्यत्र ले जाते दिखाया गया है। नीचे स्थित बालक वृन्द इस दृश्य को देखकर हर्षित हो रहे हैं। यह कलाकृति 7 वीं 8वीं शती में निर्मित मानी जा सकती है। यह कथा वीरणत्थम्भक वर्ग में कच्छप जातक के अन्तर्गत वर्णित है।6 

महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर प्रदर्शित विवेच्य कलाकृतियों में जातक कथाओं की उपस्थिति सुसंगत है क्योंकि एक तो वे बौद्ध विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित हैं और दूसरे यहाँ बुद्ध के पूर्व जन्म से संबंधित कथाएँ संकेत रूप में प्रदर्शित हैं। 

इसी विहार के सभा मंडप की भित्तियों पर प्रदर्शित एक फलक में प्रणय-अनुराग का रोचक अंकन है। इसमें दो अश्वमुखी यक्षणियों के मध्य एक रूपवान तरुण विवश बैठा है (चित्र 26.4)। दाहिनी ओर स्थित यक्षिणी तरुण की भुजा पकड़कर अपनी ओर खींच रही है तथा बायीं ओर की यक्षिणी उसके गले में लिपटे हुए उत्तरीय को पकड़े है। ऐसा प्रतीत होता है कि युवक साधक को साधना मार्ग से पतित करने के लिये दोनों यक्षणियाँ उद्यत हैं। यह भी कह जा सकता है कि कामुक यक्षणियाँ तरुण के सौंदर्य पर मोहित हो उसे अपने वश में करना चाह रही हैं। इसी के निकट अन्य फलक में चषक पकड़े हुए एक आसनस्थ प्रौढ़ पुरुष (कुबेर?) का अंकन है। उसके बायीं ओर स्थित सेवक सुराही पकड़े चषक भरने के लिए उद्यत है। समीप ही पुरुष के दाहिनी ओर स्थित नारी खिन्न (?) मुद्रा में खड़ी है। पुरुष के शिरोभाग पर अंकित प्रभामंडल देवत्व का द्योतक है। यहीं पर पार्श्व भाग में दो ओर एक-एक वानर भी रूपायित हैं। इन दृश्यों की पहचान अपेक्षित है। 

इसी विहार के अर्धमंडप में स्थित आखेटक युगल का चित्रण अत्यन्त प्रभावोत्पादक और वन्य संस्कृति का परिचायक है। आखेटक के हाथ में धनुष-बाण है जो रस्सी से बंधे श्वान को भी पकड़े हुए हैं। बायीं ओर स्थित उसकी गृहिणी के मस्तक पर टोकरी है तथा बायें हाथ से उसने शिशु को पकड़ा है। विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित एक कथा दृश्य में कुएँ के भीतर स्थित विवर से एक सर्प निकल कर मेंढक को खा रहा है। इसका संबंध पंचतंत्र की कथा से जोड़ा जा सकता है (पंचतंत्र, काकोलूकीय तंत्र, मंडूक मंद विष सर्प कथा)। इस कथा के अनुसार एक वृद्ध सर्प कुएं के भीतर रहने वाले मेंढकों को फण पर बैठाकर घुमाता था और खा जाता था। सभी मेंढकों के स्माप्त हो जाने पर वह मेंढकराज के पुत्र को ही निगल गया। कलात्मकता की दृष्टि से गजयूथ विहार तथा मेढ़ों का युद्ध भी दर्शनीय है। पंक्तिबद्ध मूषकों का द्रुतगति से पलायन पंचतंत्र के हिरण्य ताम्रचूड़ कथा से समीकृत किया जा सकता है। 

वैसे महातीवरदेव विहार वाली कथाओं को कुछ विद्वान पंचतंत्र की कथाओं से जोड़ते हैं जो अधिक युक्तिसंगत नहीं लगता।

अन्य कलाकृतियाँ 

सिरपुर से प्राप्त उत्खनित देव प्रतिमाओं में हारीति, कार्तिकेय, नदी देवियां, गौरी, दिक्पाल, चामुंडा आदि विशिष्ट हैं। हारीति की एक सुन्दर प्रतिमा उत्खनित विहार के मंडप की भित्ति में जड़ी हुई मिली है। इससे सिरपुर के समस्त बौद्ध विहारों में हारीति तथा जंभल की स्थापना भी सुनिश्चित है। कार्तिकेय की एक भग्न प्रतिम में वाहन मयूर तीन शीर्षयुक्त प्रदर्शित हैं।7 

एक शैव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर की शाखाओं पर नदी देवियों का युग्म प्रदर्शित है। मुख्य नदी देवी के साथ उसी के सदृश्य आकार, परिधान तथा अन्य लक्षणों वाला प्रतिरूप किंचित भेद से रूपयित किया गया है। इस अंचल के इसी कला शैली के सिद्धेश्वर मंदिर, पलारी में भी नदी देवियाँ युग्म रूप से प्रदर्शित है। 

गौरी की एक खंडित पाषाण प्रतिमा लक्षणों की दृष्टि से उल्लेखनीय है (चित्र 26.5)। इस प्रतिमा के वितान पर सूर्य, पंचाग्नि और चन्द्र का अंकन है। इसके नीचे एक ओर शिवलिंग तथा दूसरी ओर गणेश हैं। अन्य लक्षणों में यज्ञवेदी, गोह तथा सर्प अवशिष्ट हैं। दिक्पाल प्रतिमाएँ यहाँ विलग तथा भग्नप्रायः स्थिति में मिली हैं। यहाँ के भग्न बालेश्वर शिव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दिक्पाल ऊर्ध्वक्रम में संयोजित रहे हैं। उनमें से ऊपर की ओर भग्न वायु तथा नीचे मेषारूढ़ अग्नि स्पष्ट हैं। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ऊर्ध्व तथा क्षैत्तिजीय क्रम में दिक्पालों का अंकन महत्त्वपूर्ण है।

इसी सन्दर्भ में शाक्त संप्रदाय से संबंधित षड्‌भुज चामुंडा की प्रतिमा का उल्लेख आवश्यक है (चित्र 26.6)। देवी शीर्ष विहीन शव पर आसीन है, जटाभार पर कुंडलित नाग तथा भालपट्ट पर कपाल अक्ति है, मस्तक पर त्रिनेत्र तथा कर्णलुंबी पर बेलनाकार ताटंक झूल रहे हैं। अस्थिस्तना देवी के बायें कंधे पर नरमुंडों का उपवीत है; ऊपर के दाहिने हाथ में मणिविभूषित नाग तथा बायें हाथ में उलूकदंड (ध्वज) है। शव का विच्छिन्न शीर्ष देवी के निचले बायें हाथ में है। शवासीन देवी शव के अंतड़ियों को उसके उदर से खींचकर भक्षण कर रही हैं। प्रतिमा के अधिष्ठान भाग पर शव का मांस नोचते और भक्षण करते हुए श्रृगाल-श्रृगाली तथा गृद्ध साथ-साथ अंकित हैं। चामुंडा की वीभत्स तथा उग्र मुखाकृति तंत्र शास्त्रों में वर्णित लक्षणों से परिपूर्ण है। कला प्रतिमानों की दृष्टि से यह प्रतिमा दक्षिण कोसल की उत्कृष्ट कलाकृतियों में एक है। 

सिरपुर में कृष्णलीला और महाभारत से संबंधित पात्र भी दर्शनीय हैं। सोमवंशी कलाशैली के वैष्णव मंदिरों में कृष्णलीला से संबंधित दृश्यों में पूतना वध, केशीवध, ऊखल बंधन (यमलार्जुन उद्धार) आदि दृश्य प्राप्त होते हैं। लक्ष्मण मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी कृष्ण लीला के अनेक दृश्य रूपायित हैं। संग्रहालय की एक कलाकृति में कृष्ण अश्वरूपधारी केशी दैत्य के साथ युद्ध कर रहे हैं। यह एकाश्म कलाकृति लगभग 4 1/2 फीट ऊँची है तथा विदर्भ के वाकाटक गुप्तयुगीन कलाकृति के समतुल्य है। अन्य प्रदर्शित कलाकृतियों में भग्न धनुर्धर योद्धा का उर्ध्व भाग तथा अवशिष्ट अधिष्ठान पर अश्व सहित रथ रूपायित है। राजीवलोचन मंदिर, राजिम तथा कलचुरि कालीन अन्य स्मारकों से भी ऐसी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं की पहचान लक्षणों के आधार पर महाभारत के पराक्रमी योद्धा कर्ण तथा अर्जुन से की जा सकती है। सोमवंशी काल के राजीवलोचन मंदिर के मंडप के अर्धस्तंभ पर एक ओर कर्ण तथा दूसरी ओर अर्जुन की प्रतिमा स्थापित है। एक भग्न स्थापत्य खंड पर शिव-पार्वती के द्यूत क्रीड़ा का अंकन है। यह खंडित भाग किसी शैव मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व भाग अथवा मंडप में रहा होगा। यहाँ शिव तथा पार्वती परस्पर सम्मुख बैठे चौसर खेल रहे हैं। दोनों के मध्य लम्बवत ऊर्ध्व स्थिति में चौसर रखा है। द्यूत क्रीड़ा में शिव अपनी संपत्ति के साथ अपने वाहन नंदी को भी हार चुके हैं। विजयिनी पार्वती की सखियाँ नंदी को ढकेलती पीटती हुई पार्वती की ओर ले जा रही हैं। पीछे की ओर स्थित शिवगण व्यथित हैं। परवर्ती काल में गुर्जर प्रतिहार (बिनैका, सागर जिला), परमार और कलचुरि कला शैली में भी चौसर क्रीड़ा विविधताओं के साथ रूपायित है।

सिरपुर की अन्य सामग्री 

श्री अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में सिरपुर उत्खनन से बौद्ध धर्म से संबंधित 86 धातु प्रतिमाएँ मिली हैं (वर्ष 2004 में टीला क्र. एसआरपी 10 से सात एवं वर्ष 2008 में उन्यासी)। ये साँचे में ढालकर बनायी गयी हैं तथा इनके आभूषणों में मूल्यवान रत्नों का उपयोग किया गया है। इनमें बुद्ध, तारा, मैत्रेय, वज्रपाणि, जंभल, वसुधारा, मंजुघोष, प्रज्ञापारमिता आदि महत्त्वपूर्ण हैं। बौद्ध प्रतिमाओं के अतिरिक्त धातु के स्तूप भी उत्खनन से ज्ञात हुए हैं। कुछ बौद्ध प्रतिमाओं के पृष्ठ भाग पर बौद्ध मंत्र युक्त गोलाकार मुहरें जड़ी हुई हैं। जंभल की प्रतिमा निधि पात्र सहित तथा हारीति की प्रतिमा शिशु सहित रूपायित है। उत्खनन से आवासीय संरचना, भूगर्त भंडारण कक्ष, मार्ग-वीथिकाएँ, अभिनय-व्याख्यान मंच, तोरण मंडप, देवालयों के गज-अश्व तथा वृषभों को बांधने के लिए प्रस्तर निर्मित छिद्रयुक्त खूंट आदि की भी जानकारी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त पाषाण लेख, ताम्रपत्र, अभिलिखित मुहरें तथा अन्य राजवंशों के सिक्के भी उल्लेखनीय हैं। कुछ कलाकृतियाँ शरभपुरीय शासकों के काल में बनी ज्ञात होती हैं। ऐसी प्रतिमाओं में गंधेश्वर मंदिर में रखी वामन और गरुड़ासीन विष्णु (यह प्रतिमा चोरी हो जाने से अब लुप्त है), लक्ष्मण मंदिर के गर्भगृह में रखी नागराज अथवा शेष और केशीवध की शिल्पाकृतियाँ मुख्य हैं। सिरपुर के बौद्ध विहार (आनंदप्रभ कुटी विहार तथा स्वस्तिक विहार) के गर्भगृह में प्रदर्शित विशालकाय प्रतिमाएँ पृथक-पृथक तराशे गये पाषाण खंडों को जोड़ कर निर्मित हैं। यहाँ की अधिकांश बुद्ध प्रतिमाएँ भू-स्पर्श मुद्रा में हैं। व्याख्यान मुद्रा में बुद्ध की मात्र एक प्रतिमा यहाँ से ज्ञात है। मुचलिन्द बुद्ध की एक प्रतिमा स्थानीय संग्रहालय में रखी है। कुछ विद्वान इसे तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा मानते हैं। बौद्ध धर्म से संबंधित अन्य अवशेषों में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संग्रहीत मंजुश्री, वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर, आयागपट, धातु निर्मित लघु आकार के स्तूप तथा बुद्ध की प्रतिमाएँ, बौद्ध बीजमंत्र तथा आस्वामूलक अन्य सामग्रियाँ उल्लेखनीय हैं।

सिरपुर के अधिकांश बौद्ध विहारों में मुख्य गर्भगृह के साथ दोनों ओर आनुषंगिक पार्श्ववर्ती कक्ष निर्मित हैं। इनमें मुख्य गर्भगृह में बुद्ध तथा पार्श्ववर्ती कक्षों में अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि एवं अन्य प्रतिमाएँ संयोजित रही हैं। उत्खनित विहारों की अन्य विशेषता यह है कि सभी विहार ईटों से निर्मित तथा दुमंजिले हैं। बौद्ध विहारों के संकुल से यह स्पष्ट है कि सिरपुर बौद्ध धर्म का एक प्रसिद्ध केन्द्र था। 

सोमवंशी शासक विशेषतः महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में शैव, वैष्णव और बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय प्राप्त रहा है तथा दूरस्थ अंचलों में भी मंदिर तथा विहारों के निर्माण होते रहे हैं। सोमवंशी शासकों की राजमुद्रा में वृषभ अथवा नंदी का अंकन धर्म तथा समाज में गोवंश की प्रतिष्ठा का परिचायक है। 

भग्नावशेषों के रूप में सिरपुर के अतीत के गौरवपूर्ण अध्याय की परतें उत्खनन से प्रकाश में आ रही हैं। पुराविदों, कला मर्मज्ञों के शोध और अध्ययन के लिए सिरपुर एक आदर्श पुरातत्त्वीय स्थल के साथ पर्यटन स्थल भी है। संक्षेप में दक्षिण कोसल के धर्म, ज्ञान-विज्ञान और कला का यह तीर्थ है। 

नोट: सिरपुर क्षेत्र से प्राप्त पार्वती तथा चामुण्डा की मूर्तियाँ प्रतिमा लक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व की है। 

पार्वती की प्रतिमा में ‘एकपाद तपस्विनी द्विभुज पार्वती‘ तथा केले के वन (रंभावन) में स्थित ‘सिद्ध‘ गौरी की एकरूपता संकेतित हैं। केले के पेड़ पर चढ़ने वाली गोधा, सूर्य-चन्द्र के कीच मुण्डरूप में पञ्चाग्नि, शिवलिंग के नीचे बना चौकोर अग्निकुण्ड, गणेश के नीचे बना कुण्डलित सर्प तया देवी के पैर के पास बना सिंह इस प्रतिमा की अन्य विशेषताएँ हैं। 

चामुण्डा की प्रतिमा में देवी मस्तक विहीन शव के पेट से लंबी आंत खींचकर हाथ से अपने मुँह में ठूँस रहीं हैं। इस रूप में भीषणता की पराकाष्ठा संकेतित है, जिसे शव के पास विद्यमान दो श्रृंगाल तथा गिद्ध अभिवर्धित कर रहे हैं। देवी के बायें घुटने के नीचे बना अतिरिक्त मस्तक तथा शव की दाहिनी भुजा पर बना पंजा भी विचारणीय है। दूसरा वैशिष्ट्य ‘उलूकध्वज‘ है।

प्रतिमाशास्व की दृष्टि से दोनों कलाकृतियाँ अद्वितीय हैं। - संपादक 

संदर्भ 

1. भदन्त आनन्द कौसल्यान, जातक, तृतीय खण्ड, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 1987, पृ. 297 
2. वही, प्रथम खण्ड, पृ. 295 
3. वहीं, तृतीय खण्ड, पृ. 78 
4. वही, पृ. 106 
5. वही, द्वितीय खण्ड, पृ. 43 
6. वही, पृ. 386

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