Monday, September 22, 2025

प्रतिभू स्मृति कथा

आखिरी पन्नों पर ‘कोरे पन्ने‘ बार-बार आता है, जो किताब के शीर्षक ‘स्मृतिशेष कथा अशेष‘ के उपयुक्त है। पहले दो पर्व पीठिका की तरह, तृतीय पर्व दंगोें, विभाजन, विस्थापन-पलायन, शरणार्थी-तनाव का है और चौथा प्रभावित पूरे समुदाय के खोना-पावना वाला, उसके वापस पटरी पर आने वाला। पुस्तक ‘पूर्वी बंगाल के विस्थापित हिन्दुओं की औपन्यासिक गाथा‘ है, जिसमें हिंदू-मुस्लिम दंगा प्रसंगों के साथ विभाजन की गाथा है, स्वाभाविक ही कई अंश संवेदनशील हैं, मगर पूर्वाग्रह न हों तो बेहद संतुलित। लेखक ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि हिन्दू-मुस्लिम अंतर्संबंधों तथा अंतर्विरोधों को उकेरने का कारण वैमनस्यता फैलाने वाले तत्वों की पड़ताल का है। जाति-धर्म के उन्माद में भाषा का कारक किस तरह प्रभावी हो सकता है, यहां उभारा नहीं गया है, मगर महसूस किया जा सकता है।

कथा-सूत्र के लिए पात्र ‘जतीन बाबू (लेखक स्वयं?) की डायरी‘ वाला उपयुक्त तरीका अपनाया गया है। जो अपने दीर्घ अनुभवों को कलमबद्ध करने को लालायित हैं, किसी और के लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों को विगत से सबक लेने के लिए, डायरी लिखते हैं, जिसमें आत्मावलोकन है और स्वचिंतन भी। एक अंश जहां लगता है कि लेखक अपने भाव सीधे अभिव्यक्त कर रहा है- ‘बंगालियों द्वारा, खासकर पूर्वी बंगाल से विस्थापित बंगालियों द्वारा, ऐसी कोई तिथि या दिन स्वस्फूर्त हो नहीं तय की गई, जो समर्पित हो कष्ट और अमानुषिक यातना की उन यादों को। यह पूरे बंग समाज के लिए गंभीर आत्मचिंतन का विषय है कि क्यों वेदना के करुण देशराग को गाने का कोई मुहूर्त, कोई तिथि नहीं है। उस देशराग को, जिसने न केवल पूरे बंगाल को वरन निखिल विश्व के बंगालियों को और पूरे देश को प्रभावित किया?‘

पुस्तक में बताया गया है कि- बनर्जी, मुखर्जी, चटर्जी और गांगुली के पूर्वज मूलतः उत्तर प्रदेश के कान्यकुब्ज ब्राह्मण उपाध्याय थे। बारहवीं सदी में सेन वंश के तत्कालीन राजा ने काशी से जिन कुछ विद्वानों को वैदिक कर्मकांड हेतु स्थायी रूप से बंगाल बुलाया था, उन्हें जिन ग्रामों में बसाया गया उनसे उनकी पहचान हुई। इस तरह वन्ध्य ग्राम के उपाध्याय हुये वंद्योपाध्याय अर्थात बानुज्जे अर्थात बनर्जी और चट्ट ग्राम के उपाध्याय हुये चट्टोपाध्याय अर्थात चाटुज्जे अर्थात चटर्जी। बनर्जी, मुखर्जी, चटर्जी तथा गांगुली इन चारों को ही कुलीन ब्राह्मण कहा गया (पेज-69)। अनिमेष मुखर्जी अपनी पुस्तक ‘ठाकुरबाड़ी‘ में लिखते हैं कि ‘... यह बंगाली पहले मुखुज्यो, बाणिज्यो और चाटुज्यो से मुखोपाद्धाय, बंदोपाध्याय और चट्टोपाध्याय बने फिर मुखर्जी, बनर्जी और चटर्जी बन गए। वैसे बता दें खुद को मुखोपाध्याय, बंदोपाध्याय और चट्टोपाध्याय कहने का उद्देश्य अपने आपको विद्वान दिखाना होता था‘ (पेज-11)। इस संबंध में कहीं (संभवतः प्रभात रंजन सरकार के लेखन में) पढ़ा था कि ‘बाद में प्रश्नोत्तर के झमेले से बचने के लिए उन्हीं के उत्तरपुरुषों ने लिखना शुरू किया- 'मेरा नाम श्री... वन्द्योपाध्याय है अर्थात् में वंन्द्यघटी गाँव का पंडित हूँ'। उसी प्रकार वर्द्धमान के चाटुति गाँव से चट्टोपाध्याय, बाँकुड़ा जिले के श्मुखोटीश् गाँव से मुखोपाध्याय, वर्द्धमान जिले में गंगोरी/गांगुली गाँव से गंगोपाध्याय, वीरभूम के 'गड़गड़ी' गाँव से गड़गड़ी, 'पर्कटी' (पाकुड़) से पाकड़ाशी, मानभूम (पुरुलिया) के घोषली गाँव से घोषाल, हुगली के दीर्घाड़ी से दोर्घाड्गी, पतितुण्ड गाँव से पतितुण्डी। यह तो प्रारंभिक दिनों की बात। कालक्रम में ये ही पदवियाँ जातिवाचक और जातिद्योतक बन गयीं। अंततः इन पदवियों के कारण विभिन्न प्रकार की भेदबुद्धि पैदा हो गयी। पदवी के सम्बन्ध में वर्त्तमान समाज में क्या करना उचित है इसे विचारशील लोगों के लिए चिन्तन करके देखने की जरूरत है।‘

पुस्तक का एक रोचक उद्धरण- ... वहीं मछली को भोजन का अनिवार्य भाग बनाने वाले ब्राह्मण तथा गैर ब्राह्मण समस्त हिन्दू बंगालियों के लिए बकरे का मांस केवल देवी समक्ष दिये गए बलि के प्रसाद के रूप में ही यदा-कदा अनुमत था। इस मांस को भी बिना प्याज-लहसुन के 'निरामिष' तरीके से पकाने का विधान था। ’निरामिष‘ माने शाकाहारी और ’सामिष’ याने मांसाहारी भोजन। स्वादलोलुप जमींदारों की बिगड़ी पीढ़ियों व उन्हें अनुसरण करने वालों के साथ ही अँग्रेजी तालीम याफ्ता युवकों ने हालाँकि इसका भरपूर उल्लंघन करना आरंभ कर दिया था, पर मुर्गी तब भी कठोरता के साथ हिन्दू रसोई से दूर ही रखी गई थी। मुर्गी व उसके अंडे मुसलमानी आहार थे, अंडों के शौकीन हिन्दुओं के लिए बतख के अंडे अनुमत थे। स्वाभाविक रूप से उन दिनों मुर्गियाँ केवल मुसलमानों के द्वारा पाली व खाई जाती थीं। किसी मुसलमान के घर पाली गई मुर्गी का उड़कर या दाना चुगते हुये भटक कर किसी हिन्दू के घर की ओर चले आना बड़े विवाद का कारण बन जाता था। (पेज-111)

पुस्तक के एक संवाद है, ‘पुटी तो छोटी मछली को कहते हैं‘ (पेज-92)। इस शब्द की चर्चा प्रभात रंजन सरकार की पुस्तक वर्णविचित्रा में इस प्रकार है- ‘शफरी/सफरी - ‘शफरी‘ शब्द का अर्थ है पोंठी मछली। शफरी या पोंठी मछली की बंगाल में 11 प्रजातियां हैं ... वर्तमान में क्षुद्राकृति पोंठी को कोई कोई तीती पोंठी कहा करते हैं ... गंभीरजलसंवारी रोहितादि न विकारी। गण्डूषजलमात्रेण शफरी फरफरायते।। ... बंगला भाषा में ‘शफरी‘ शब्द का अपर अर्थ ‘विदेशागत‘ अर्थात् विदेश से सफर करके जो आया है।‘ (पेज-154)। मेरी जानकारी में यह शब्द संस्कृत के ‘प्रोष्ठी‘ से आया है और प्रोष्ठी के लिए अनुमान होता है कि ओंठ के ऊपरी भाग का आकार। ‘विधुर जातक‘ में ‘पाठीना पावुसा मच्छा बलजा मुंज रोहिता।‘ मछली का नाम ‘पाठीना‘ आया है। एक अन्य संदर्भ- वाल्मीकि रामायण बालकांड में दशरथ के चारों पुत्रों को ‘प्रोष्ठपदोपमा‘, भाद्रपदा के चार तारों के समान कहा गया है। भाद्रपदा नक्षत्र के दो भेद, पूर्व और उत्तर हैं, इसके दो-दो तारे मिल कर कुल चार होते हैं। पचीसवें नक्षत्र पूर्वा भाद्रपदा में मीन राशि आ जाती है और छब्बीसवें नक्षत्र उत्तरा भाद्रपदा पूरी तरह मीन राशि के अंतर्गत आता है।

ऐसा उपन्यास तब निकल कर आता है, जब लेखक को पाठक का ध्यान तो हो, मगर साहित्यिक प्रतिष्ठा पाने का दबाव न हो। प्रतिभू, कहानियां, उपन्यास से इतर लेखन भी करते रहे हैं, मगर अपनी लेखकीय सहजता पर कायम हैं, जो मुझ जैसे पाठक को उनके लेखन के प्रति आकर्षित करता है। प्रतिभू स्वयं को साहित्यकार नहीं मानते, बैंकिग पेशे से जुड़े रहे, पेशेवर लेखक-साहित्यकार होते तो मुझे लगता है कि कथा-क्रम का विकास करते हुए सूत्र के लिए प्रेम-कहानी का ताना-बाना लेते। उन्होंने ऐसा नहीं किया है, जबकि हरिप्रिया-पीयूष के साथ यह प्रेम-प्रसंग में यह संभावना थी। निहायत घरू-पारिवारिक माहौल के दैनंदिन जीवन की आशा-आकांक्षा और कुछ आशंकाओं को आधार बनाया है। लगता है यह स्वाभाविक है और यह इसी तरह आए, अलग से कोई पाठक-प्रलोभन न हो, गैर-पेशेवर होने के कारण आसानी से हो पाया है।

Saturday, September 6, 2025

टैगोर का छल

रवीन्द्रनाथ टैगोर (ठाकुर/ठाकूर या पूर्वज ‘कुशारी‘) का जन्म 6 मई 1861 को, उनकी पत्नी भवतारिणी उर्फ मृणालिनी देवी (विवाह पश्चात नाम) का जन्म 1 मार्च 1874 को, विवाह 9 दिसंबर 1883 को हुआ। उनकी संतानों क्रमशः मधुरिलता-बेला, रथीन्द्रनाथ-रथी, रेणुका-रानी, मीरा-अतासी तथा शमीन्द्रनाथ-शमी (बंगाली परंपरा का भालो-डाक नाम) का जन्म 1886 से 1896 के बीच हुआ, इसके बाद मृणालिनी देवी अस्वस्थ होती रही, 22 दिसंबर 1901 को ब्रह्म विद्यालय (शांति निकेतन स्कूल) की स्थापना के बाद गंभीर रूप से अस्वस्थ हुईं और 23 नवंबर 1902 को उनकी मृत्यु हुई। 1902 से 1907 के बीच पत्नी मृणालिनी के अलावा पुत्री रेणुका, पिता देवेन्द्रनाथ, छोटे पुत्र शमीन्द्रनाथ की तथा इसके बाद 1918 में बड़ी पुत्री मधुरिलता की मृत्यु हुई।

मृणालिनी की मृत्यु के अगले दिनों में पत्नी की याद में टैगोर ने लगभग प्रतिदिन कविताएं लिखीं। इन 27 कविताओं का संग्रह मोहितचन्द्र सेन के सम्पादकत्व में, रवीन्द्र काव्यग्रन्थ के छठे भाग में और ‘स्मरण‘ शीर्षक से स्वतंत्र काव्यग्रन्थ के रूप में मृणालिनी की मृत्यु के बारह वर्ष बाद 1914 में प्रकाशित हुईं। इस क्रम में टैगोर का अन्य संग्रह ‘पलातका‘ 1918 में प्रकाशित हुआ, संग्रह की चौथी कविता ‘फाँकि‘ लगभग 146 पंक्तियों, 11 पैरा और 830 शब्दों की है। इस कविता में पात्र बीनू की अस्वस्थता, उसके साथ ‘मैं‘ की रेलयात्रा और बिलासपुर रेल्वे स्टेशन, झामरु कुली की पत्नी हिन्दुस्तानी लड़की रुक्मिनी का उल्लेख है। कविता में ‘बिलासपुर स्टेशन‘ नाम तीन बार आता है। लगभग 45 साल पहले कविता ‘फाँकि‘, इन पंक्तियों- ‘बिलासपुर स्टेशन से बदलनी है गाड़ी, जल्दी उतरना पड़ा, मुसाफिरखाने में पड़ेगा छः घंटे ठहरना‘ के साथ चर्चा में आई।

26 दिसंबर 1983 को ए.के. बैनर्जी मंडल रेल प्रबंधक, बिलासपुर के पद पर आए। वे साहित्य में रुचि रखने वाले और प्रसिद्ध फिल्मकार हृषिकेश मुखर्जी के दामाद थे। बिलासपुर पदस्थापना के साथ उन्हें टैगोर की कविता ‘फाँकि‘ याद आई और उन्होंने बिलासपुर रेल्वे स्टेशन के मुख्य प्रवेश के बाईं ओर प्लेटफार्म 1 पर, वीआइपी वेटिंग लाउंज के साथ कविता की इन पंक्तियों को रवीन्द्रनाथ टैगोर के चित्र के साथ खास फलक बनवा कर समारोह पूर्वक स्थापित किया। यह आकर्षण का कारण बना और इसकी चर्चा बिलासपुर और खासकर पेंड्रा में होने लगी, जिसमें टैगोर के बिलासपुर होते पेंड्रा जाने, वहां पत्नी का इलाज, पेंड्रा में ही उनकी पत्नी की मृत्यु और उसके बाद अकेले वापस लौटने की बात होने लगी, जिसका आधार यह कविता थी। कविता में आए नाम बीनू को टैगोर की पत्नी मृणालिनी देवी और ‘मैं‘ को साहित्यिक अभिव्यक्ति के पात्र प्रथम पुरुष के बजाय टैगोर स्वयं के साथ निर्मित और घटित स्थिति मान लिया गया।


वेब पर मीडिया के विभिन्न यूट्यूब रिपोर्ट/स्टोरी तथा महीनों पेंड्रा में इलाज और इस दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी मृणालिनी-बीनू का देहांत हो गया ... इसी सैनेटोरियम में रविंद्रनाथ की पत्नी के शरीर को मिट्टी दी गई और समाधि बनाई गई ... जैसी ढेरों खबरें मिल जाती हैं। अब बिलासपुर स्टेशन पर पूरी बांग्ला कविता हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद सहित लगाई गई है, जिस पर अंकित है- ‘यह कविता कविगुरु श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा सन 1918 में बिलासपुर स्टेशन के प्रतीक्षालय में लिखी गई।

और फिर 10.12.2012 को रवीन्द्रनाथ ठाकुर का 5 रुपये का डाक टिकट, बिलासापेक्स, विशेष आवरण सहित जारी हुआ, जिसमें अंकित है- ‘रविन्द्र नाथ टैगोर एवं उनकी धर्म पत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी सन् 1900 में अपनी एक यात्रा के दौरान बिलासपुर स्टेशन के प्रतीक्षालय में छः घंटा रुके। उन्होंने इसका वर्णन अपनी एक कविता में किया है।‘ एक कविता में किया है।‘ जिला अस्पताल सैनेटोरियम परिसर परिसर में रविन्द्र नाथ टैगोर वाटिका, संग्रहालय निर्माण एवं गुरुदेव की मूर्ति का अनावरण, दिनांक 07.05.2023 को होने का शिलान्यास शिलापट्ट लगा है और जुलाई 2023 में परिसर के बरगद के पेड़ को काटने का विरोध हुआ कि टैगोर इस पेड़ के नीचे बैठते थे।

कविता के रचना काल, स्थान और बिलासपुर यात्रा के वर्ष की विसंगतियों के बावजूद यह बात चल पड़ी। मगर इसके पहले 2008 में ही ऐसा माना जाने लगा था, इसी साल रमेश अनुपम संपादित ‘जल भीतर इक बृच्छा उपजै‘ पुस्तक का पहला संस्करण आया, जिसकी तीसरी आवृत्ति, 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक के प्रवासी खंड में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता फॉकि (बांग्ला), उत्पल बॅनर्जी के हिंदी अनुवाद ‘छलाना‘ (न कि छलना या छलावा) सहित प्रकाशित है, साथ ही लंबी पाद-टिप्पणी है, जिसमें बताया गया है कि कविगुरु मृणालिनी देवी को लेकर छत्तीसगढ़ आये। छत्तीसगढ़ का पेंड्रारोड उस समय क्षय रोग चिकित्सा के लिए संपूर्ण एशिया में विख्यात था।‘ ... उस जमाने में (सन 1901) में ... वे पेंड्रारोड में दो महीने तक रुके ... मृणालिनी देवी मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु में कविगुरु को अकेले छोड़कर अनंत में विलीन हो गईं। पेंड्रारोड का विश्वविख्यात टी.बी. सैनेटोरियम तथा यहां की जलवायु भी मृणालिनी देवी को मृत्यु के चंगुल से नहीं बचा सका।

यहां भी पेंड्रा यात्रा-प्रवास का वर्ष 1901, तथा ‘मृणालिनी देवी मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु‘ जैसी विसंगति है। मगर इन सबके बीच यह मान लेना कि बीनू, रवीन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी मृणालिनी देवी का नाम हैं (जो किसी स्रोत से पुष्ट नहीं होता), ‘फाँकि‘ कविता का ‘मैं‘ स्वयं कवि है और यह संस्मरणात्मक, आत्मकथ्यात्मक अभिव्यक्ति है, के औचित्य पर विचार करने के लिए टैगोर से संबंधित अधिकृत और विश्वसनीय स्रोतों को देख लेना आवश्यक है, ऐसे स्रोतों में आए संबंधित कुछ उल्लेख आगे दिए जा रहे हैं-

रवीन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र रथीन्द्रनाथ टैगोर की पुस्तक ‘ऑन द एजेस ऑफ टाइम‘ के विश्व-भारती द्वारा प्रकाशित जून, 1981 के द्वितीय संस्करण, पेज-52 पर मृणालिनी देवी को शांति निकेतन से इलाज के लिए कलकत्ता लाने, डॉक्टरों द्वारा आशा छोड़ देने के साथ मां मृणालिनी देवी की मृत्यु के दौरान सभी पांच संतानों का वहां होने का उल्लेख है।

कृष्ण कृपलानी (टैगोर की तीसरी बेटी मीरादेवी की बेटी नंदिता के पति) की बहु-प्रशंसित ‘रबीन्द्रनाथ टैगोर, ए बॉयोग्राफी‘ 1980 का संस्करण विश्व-भारती कलकत्ता ने प्रकाशित किया है। पेज 201 पर उल्लेख है कि शांति निकेतन में नया निवास मिलने के कुछ माह बाद ही मृणालिनी देवी गंभीर रूप से बीमार हुईं और उन्हें कलकत्ता लाया गया, जहां 23 नवंबर 1902 को उनकी मृत्यु हो गई।

विश्व भारती द्वारा प्रकाशित रवीन्द्रनाथ टैगोर के पत्र-व्यवहार के प्रथम खंड (तीसरा संस्करण बंगाब्द 1400 यानि 1993-94) में मृणालिनी देवी को लिखे पत्र हैं, इस पुस्तक के अंत में मृणालिनी देवी के जीवन की प्रमुख तिथियां-घटना दी गई हैं, जिसके अनुसार उन्हें 12 सितम्बर 1902 इलाज के लिए कलकत्ता लाया गया। 23 नवम्बर 1902 जोरासांको महर्षि भवन में निधन हो गया।

1998 में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा राष्ट्रीय जीवनचरित श्रृंखला में कृष्ण कृपलानी की पुस्तक का अनुवाद रणजीत साहा प्रकाशित ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक जीवनी‘ में पेज 116-117 पर ‘शांतिनिकेतन में, अपना नया घर पाने के कुछ ही दिनों के अंदर रवीन्द्रनाथ की पत्नी मृणालिनी देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं । उन्हें कलकत्ता ले जाया गया और जहां 23 नवंबर 1902 को उनका निधन हो गया। ... ‘किसी पेशेवर नर्स को बहाल न कर उन्होंने लगातार दो महीने तक रात और दिन उनकी सेवा की। उन दिनों बिजली के पंखे नहीं हुआ करते थे और उनके समकालीन साक्ष्यकारों ने इस बात को दर्ज करते हुए बताया है कि हर घड़ी कैसे उनके सिरहाने उपस्थित रवीन्द्रनाथ हाथ में पंखा लिए हुए लगातार धीरे धीरे झलते रहे थे। जिस रात को उनका निधन हुआ, वे पूरी रात अपनी छत की बारादरी के ऊपर नीचे घूमते रहे और उन्होंने सबसे कह रखा था कि उन्हें कोई परेशान न करे।‘

रंजन बंद्योपाध्याय की पुस्तक ‘आमि रवि ठाकुरेर बोउ‘ का शुभ्रा उपाध्याय द्वारा किया हिंदी अनुवाद ‘मैं रवीन्द्रनाथ की पत्नी‘ (मृणालिनी की गोपन आत्मकथा) प्रकाशित हुई है। पुस्तक के परिचय (2013) में स्पष्ट किया गया था- ‘मृणालिनी अपनी गोपन आत्मकथा में क्या लिखतीं? इस उपन्यास में वही सोचने की कोशिश की गई है।‘ मगर इस पुस्तक का ‘उपसंहार‘ उल्लेखनीय है, जिसमें बताया गया है कि मृणालिनी देवी को चिकित्सा के लिए 12 सितंबर 1902 को कलकत्ता ला कर जोड़ासाँको में रवीन्द्रनाथ की लालबाड़ी के दूसरे तल पर एक कमरे में रखा गया। ... मृणालिनी की स्थिति 17 नवंबर को आशंकाजनक हो गई। 23 नवंबर, 1902 को जोड़ासाँको की बाड़ी में मृणालिनी के जीवन का अवसान हुआ। दो महीने ग्यारह दिन उन्हें कलकत्ता में मृत्युशैया की यंत्रणा भोगनी पड़ी।

विकीपीडिया तथा द स्कॉटिश सेंटर आफ टैगोर स्टडीज के वेबपेज के अनुसार- मृणालिनी देवी 1902 मध्य में बीमार पड़ गईं, जबकि परिवार शांतिनिकेतन में एक साथ रहता था। इसके बाद, वे और रवींद्रनाथ 12 सितंबर को शांतिनिकेतन से कलकत्ता चले गए। डॉक्टर उनकी बीमारी का निदान करने में विफल रहे और 23 नवंबर की रात को 29 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बेटे रथिंद्रनाथ ने बाद में अनुमान लगाया कि उनकी मां को एपेंडिसाइटिस था।

रामानंद चटर्जी द्वारा संपादित रवीन्द्रनाथ टैगोर के सत्तरवें जन्मदिन पर 1931 में प्रकाशित ‘द गोल्डन बुक आफ टैगोर‘ में ‘ए टैगोर क्रानिकल: 1861-1931‘ में मृणालिनी देवी से विवाह और उनकी मृत्यु का उल्लेख है, मगर मृत्यु का स्थान नहीं दिया गया है। इसी तरह 1961 में सत्यजित राय ने फिल्म्स डिवीजन के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर पर 51 मिनट का वृत्तचित्र बनाया है, जिसमें उनके विवाह तथा पत्नी की मृत्यु का उल्लेख है, स्थान का नहीं। इन स्रोतों में मृत्यु के स्थान का उल्लेख न होने का कारण यही हो सकता है कि मृणालिनी देवी की मृत्यु उनके मूल स्थान के अलावा कहीं अन्य नहीं हुई थी। यों 'साक्ष्य का अभाव अनुपस्थिति का साक्ष्य नहीं माना जाता' फिर भी उल्लेखनीय है कि माधवराव सप्रे ने पेंड्रा से जनवरी 1900 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ पत्रिका निकालना शुरू किया, यह पत्रिका दिसंबर 1902 तक निकलती रही। टैगोर के पेंड्रा की अवधि भी 1902 के अंतिम कुछ माह माना जाता है, ऐसे में सप्रे जी की पत्रिका में इसका कोई उल्लेख न होना प्रासंगिक तथ्य है।

इस तारतम्य में पेंड्रा रेल लाइन और सैनेटोरियम संबंधी तथ्यों की पड़ताल प्रासंगिक होगी, इनमें-

1910 के बिलासपुर जिला गजेटियर पेज 336 पंडरीबन या पेंड्रा, जमींदारी में सैनेटोरियम का उल्लेख नहीं है, मगर पेज 248 पर मेडिकल शीर्षक के अंतर्गत पेंड्रा अस्पताल में पुरुष एवं महिला के लिए दो-दो बिस्तर वाले अस्पताल की जानकारी है। पेज 69 पर क्षयरोग का उल्लेख है, मगर सैनेटोरियम का नहीं, जबकि मुंगेली और चांपा के कुष्ठ आश्रम का उल्लेख है। पेज 338 पर उल्लेख है कि एक जोगी और उसके दो विशाल सर्पों ने ‘खोडरी टनल‘ काटने पर आपत्ति की और उनके शापवश बड़ी संख्या में मजदूर रोगग्रस्त हो कर मर गए।

1923 के ‘बिलासपुर वैभव‘ पेज 73 पर व्यापार के अंतर्गत उल्लेख है कि ‘सन् 1891 में जबसे कटनी लाइन खुली है ...‘ पेज 105 पर पेंडरा शीर्षक के अंतर्गत उल्लेख है कि गौरेला और पेंडरा के बीच मिस लांगडन का क्षयरोगाश्रम है। पुनः पेज 136 पर ‘पेंडरा जमींदारी का जलवायु शीतल है। इसे बिलासपुर जिले की पंचमढ़ी समझिये। गौरेला और पेंडराके बीच मिस लांगडनका क्षयरोगाश्रम देखने योग्य है।‘

1978 के बिलासपुर जिला गजेटियर में पेज 244 बिलासपुर रायपुर सेक्शन 1881 में, बिलासपुर रायगढ़ सेक्शन 1890 में, बिलासपुर बीरसिंहपुर सेक्शन 1861 में (!) आरंभ होने का उल्लेख है। साथ ही पेज 519 पर क्रिश्चियन मिशन द्वारा संचालित तथा मध्यप्रदेश सरकार और प्रादेशिक रेड क्रास सोसाइटी से सहायता प्राप्त सैनेटोरियम तथा टी.बी. के इलाज के लिए माकूल जलवायु का उल्लेख है।

राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम के वेबपेज की जानकारी के अनुसार देश का पहला ओपन एयर सैनेटोरियम अजमेर के पास तिलुआनिया (तिलौनिया) में 1906 में स्थापित हुआ। ऐसी स्थिति में पेंड्रा में आबोहवा बदलने के लिए मरीजों का आना संभव है मगर उपरोक्त उद्धरणों के आधार पर निष्कर्ष आसानी से निकालता है कि सैनेटोरियम 1910 से 1923 के बीच (वस्तुतः 1916) बना। प्रसंगवश उल्लेखनीय कि आंध्रप्रदेश के मदनपल्ली में 1915 में टीबी सैनिटोरियम स्थापित हुआ था। मदनपल्ली, जे. कृष्णमूर्ति के जन्म स्थान है। टैगोर ने 25/28 फरवरी, 1919 को बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज, मदनपल्ली का दौरा किया। मदनपल्ली कॉलेज के प्रचार्य शिक्षाविद जेम्स हेनरी कजिन्स की पत्नी मार्गरेट कजिन्स ने टैगोर से यहीं ‘जन गण मन ...‘ गीत सुना और उसके भाव के अनुरूप पश्चिमी नोटेशन में लाया, जिस पर टैगोर की सहमति मिली थी।

कटनी रेलखंड पर गाड़ी परिचालन 1891 में आरंभ होने की जानकारी मिलती है, मगर इसके साथ दुविधा रह जाती है कि रेलवे रिकार्ड्स में 1907 में पहले-पहल भनवारटंक टनेल डाउन का निर्माण हुआ तथा इस खंड में रेल लाइन के दोहरीकरण का कार्य 1960-65 के बीच हुआ और भनवारटंक टनेल अप यानि इस लाइन पर नये दूसरे बोगदा का निर्माण 1965-66 में होना, पता चलता है। ऐसी स्थिति में 1907 के पहले बिलासपुर से पेंड्रा का रेल लाइन संपर्क कैसे संभव हुआ होगा?

अंततः ‘फाँकि‘ कविता की पहली पंक्ति ‘बिनुर बयस तेइश तखन‘ यानि नाम बीनू और उसकी उम्र तेइस कहा गया है, यह दोनों ही बातें टैगोर की पत्नी मृणालिनी से मेल नहीं खातीं, क्योंकि भवतारिणी उर्फ मृणालिनी का अन्य नाम बीनू था ऐसा पुष्ट नहीं होता (अन्य संबोधन ‘छोटो बोउ‘, ‘छूटी‘ या ‘छुटि‘ जैसा पत्रों में संबोधन है) और इस समय यानि 1902 में मृणालिनी (जन्म 1874, कहीं 1872/1876 मिलता है) की उम्र 23 वर्ष भी नहीं बैठती। पत्नी के निधन की कविताएं ‘स्मरण‘ में हैं और ‘फाँकि‘ कविता 1918 में प्रकाशित संग्रह ‘पलातका‘ में शामिल है, और इस कविता की रचना तिथि न होने से इसे 1918 या उसके कुछ पहले की रचना मानना उचित होगा। प्रसंगवश, टैगोर अपने पत्रों में बहुधा ‘भाई‘ संबोधन का प्रयोग करते थे, अपनी पत्नी के लिए भी- ‘भाई छुटि‘। संभवतः यह कालिदास का प्रभाव था- जहां रघुवंश में ‘वैदेहिबन्धोः हृदयं विदद्रे- वैदेही-बन्धु राम का हृदय फट गया।‘ प्रयोग है और ऐसा ही अन्यत्र मेघदूत में यक्ष, यक्षिणी के लिए करता है- ‘विधिवशात् दूरबन्धुः- भाग्यवश जिसका बंधु (प्रियजन) दूर है।

संजुक्ता दासगुप्ता, टैगोर साहित्य की गंभीर अध्येता और अंगरेजी अनुवादक हैं। उनकी पुस्तक ‘इन मेमोरियम स्मरण एंड पलातका‘ 2020 में साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुई है, जिसमें मृणालिनी देवी की याद में टैगोर द्वारा लिखी ‘स्मरण‘ की 27 कविताएं का तथा ‘पलातका‘ की 15 कविताओं का अंगरेजी अनुवाद है। पलातका की कुछ अन्य कविताओं सहित फांकी के लिए अनुवादक की टिप्पणी प्रासंगिक और मारक है, जिसमें वे कहती हैं कि ‘पितृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था आजीवन कठोर कारावास की तरह प्रतीत होती है जहाँ घरेलू श्रम और प्रजनन श्रम को आश्रित महिलाओं के वांछित लक्ष्य और मिशन के रूप में महिमामंडित किया जाता है। मुक्ति, चिरादिनेर दागा, फांकी, निष्कृति, कालो मेये, हारिये जाओ जैसी कविताएँ लैंगिक मुद्दों के प्रति मुखर अभिव्यक्ति हैं।‘

कविता में बिलासपुर स्टेशन का नाम है, मगर वहां से गाड़ी बदल कर आगे जाने की बात के साथ पेंड्रा का नाम नहीं आया है। 1902 में पेंड्रा में अस्पताल जरूर था, जैसा कि 1909-10 के गजेटियर से पता लगता है। साथ ही देश का पहला सैनेटोरियम तिलुआनिया (तिलौनिया) में 1906 स्थापित होने का तथ्य असंदिग्ध है। ‘द इंडियन मेडिकल गजट, जुलाई 1945, पेज 369 से निश्चित जानकारी मिल जाती है कि पेंड्रा सैनेटोरियम स्थापना वर्ष 1916 है, यह पेंड्रा के लोगों की स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज साधू बाबू अर्थात् मन्म्थनाथ बैनर्जी के साथ जुड़ा है, वे कलकत्ता, प्रेसिडेंसी कॉलेज से दर्शनशास्त्र में उपाधिधारी थे और पढ़ाई में सुभाषचंद्र बोस से एक कक्षा आगे होना बताया करते थे। टीबी के इलाज के लिए 1917 में सैनेटोरियम लाए गए बताए जाते हैं और फिर स्वस्थ हो कर पूरा जीवन यहां बिताया। साधू बाबू की मृत्यु 8 अगस्त 1982 को हुई। 16 जुलाई 1954 को शिलान्यास हुआ पेशेन्ट्स रिक्रिएशन हॉल अब उनके नाम पर साधू हॉल नाम से जाना जाता है।

पेंड्रा निवासी एक अन्य बुद्धिजीवी डॉ. प्रणब कुमार बैनर्जी लगभग 25 वर्ष की उम्र में 1961 में यहां आए, 2018 में उनकी मृत्यु हुई। वे साधू बाबू से नियमित संपर्क में रहे थे, उन्होंने ही अविवाहित रहे साधू बाबू को मुखाग्नि दी थी। डॉ. प्रणब जी से व्यक्तिगत संपर्क के दौरान मैंने टैगोर के पेंड्रा प्रवास के बारे में जिज्ञासा की थी, उन्होंने स्वयं अपनी तथा साधू बाबू से होने वाली उनकी चर्चाओं में ऐसी किसी बात को अपुष्ट माना था, अब पुनः डॉ. प्रणब के पुत्र प्रतिभू जी ने भी बताया कि ऐसी कोई बात अपने पिता से उन्होंने नहीं सुनी।

कटनी रेलखंड पर 1891 में रेल परिचालन की जानकारी मिलती है साथ ही बिलासपुर बीरसिंहपुर सेक्शन, जिसके बीच बोगदा और पेंड्रारोड स्टेशन है, 1861 (!) में आरंभ होने का उल्लेख मिलता है किंतु बोगदा निर्माण 1907 में होने का तथ्य, विसंगतियों के कारण पहले पेंड्रा-बिलासपुर के रेल से से जुड़ा होना स्पष्ट नहीं होता और संदेह का कारण बनता है।

इस तरह टैगोर का पत्नी के इलाज के लिए 1902 में पेंड्रा आना और यहां उनकी पत्नी की मृत्यु की बात, मात्र एक काव्य रचना के आधार पर स्वीकार किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता और विशेषकर तब, जब सारे प्रामाणिक स्रोतों में इसके विपरीत तथ्य हैं। यों यह रचना विवरण-मूलक है किंतु ‘मैं‘ बीनू के साथ, बिलासपुर स्टेशन पर गाड़ी बदल कर कहां जा रहा है या वापसी में ‘मैं‘ के अकेले होने का कारण, बीनू को कहीं छोड़ आना है या बीनू की मृत्यु? यह कुछ कविता में नहीं आता, इसलिए भी इसे आत्मकथ्यात्मक यात्रा-विवरण मानना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता और जैसा कहा जाता है- ‘साहित्य का ‘मैं‘ सदैव बहुवचन ही होता है।‘ इस कविता के ‘मैं‘ को भी इसी तरह देखना चाहिए। 

मेरा अनुमान है कि किसी व्यक्ति ने बिलासपुर हो कर आगे जाने की ‘फाँकि‘ कविता से मिलती-जुलती अपनी रामकहानी टैगोर को सुनाई होगी, उसकी पीड़ा को अपने अनुभवों के साथ जोड़ कर टैगोर ने इस कविता को रचा होगा, जिसमें ‘मैं‘ के कारण इसे स्वयं उनका संस्मरण मान कर, पत्नी के इलाज के लिए स्वयं उनके बिलासपुर होते पेंड्रा आने और यहां पत्नी के निधन की बात प्रचलित हो गई, जो पूरी तरह काव्यात्मक अभिव्यक्ति मानी जानी चाहिए, क्योंकि तथ्यों से मेल नहीं खाती।

प्रसंगवश-

0 कविता ‘फाँकि‘ में बिलासपुर का नाम आया है। यों छत्तीसगढ़ में ही एकाधिक बिलासपुर हैं, अन्य प्रदेशों के इस स्थान-नाम में हिमांचल का जिला मुख्यालय बिलासपुर प्रमुख है, मगर पुराना जंक्शन वाला रेल्वे स्टेशन होने के कारण छत्तीसगढ़ का यही बिलासपुर होना निश्चित किया जा सकता है। इसके साथ कविता में रुक्मिणी के चले जाने के संदर्भ में तीन अन्य स्थान-नाम ‘दार्जिलिंग, खसरुबाग और आराकान‘ आए हैं। उसका यह प्रवास संभवतः मजदूरी के लिए हुआ। बिलासपुर अंचल से श्रमिक पुराने समय से प्रवास पर ‘कमाने-खाने‘ जाते रहे हैं, उनमें कुछ लौट कर आ जाते हैं और बड़ी संख्या है, जो प्रवास के बाद वहीं टिक जाते हैं। इस क्षेत्र से कालीमाटी अर्थात जमशेदपुर, जहां अब सोनारी में छत्तीसगढ़ियों की बड़ी बस्ती है, ‘कोइलारी-कलकत्ता के अलावा कंवरू-कौरूं यानि असम प्रवास होता रहा है। संभव है उस दौर में अधिकतर प्रवास कविता में आए तीनों स्थान-नामों में होता रहा होगा।

0 कविता ‘फाँकि‘ में रुक्मिनी को ‘हिन्दूस्तानि मेये’ कहा गया है। जैसा बांग्ला-जन द्वारा गैर-बांग्ला भारतीय के लिए सामान्यतः इस्तेमाल किया जाता है, जो सहज प्रवाह में यहां भी आया है। बिलासपुर स्टेशन पर लगे अनुवाद में ‘हिन्दुस्तानी लड़की‘, संजुक्ता दासगुप्ता के अंगरेजी अनुवाद में ‘हिन्दुस्तानी गर्ल‘ है, मगर उत्पल बॅनर्जी ने इसका ‘गैर बंगाली लड़की‘ किया है। इस पर विचार करें- गैर बंगाली यानि जो पूर्व-पश्चिम बंगाल निवासी या बांग्लाभाषी न हो, होगा। यों हिंदुस्तानी का अर्थ बंगाल से इतर हिंदुस्तान निवासी ध्वनित होता है किंतु हिंदुस्तानीभाषी अर्थ नहीं निकलेगा, क्योंकि ‘बंगाल से इतर ‘हिंदुस्तान‘ में हिंदुस्तानी के अलावा अन्य भाषा-भाषी भी निवास करते हैं। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय के निबंध ‘धुरीमन बनाम परिधिमन‘ का एक अंश उद्धृत करना प्रासंगिक होगा- ‘बंकिम ने ‘वन्देमातरम्‘ में केवल सप्तकोटि बंगालियों की बंगमाता को ही गरिमा से अभिषिक्त किया। जब इस गीत का अखिल भारतीय उपयोग होने लगा तो ‘सप्त‘ को बदल कर ‘त्रिंशकोटि-कण्ठ-निनाद-कराले‘ कर दिया गया।‘

0 इस कविता में एक पंक्ति है- ‘बिनुर येन नतुन करे शुभदृष्टि हल नतुन लोके‘- बीनू शादी के बाद ससुराल से पहली बार रेल यात्रा पर निकली है, पति से कभी-कभार मुलाकातें, दबी-घुटी हंसी और बातें ही हो पाती थीं, अब उन्मुक्त माहौल और मानों ‘शुभदृष्टि‘, यानि वह ‘दृश्य‘ जिसमें नववधू विवाह के अवसर पर पान के पत्तों से चेहरा ढकी होती है, फेरों के बाद पहली बार पत्ते हटा कर, अपने होने वाले पति को पहली बार देखती है। ‘शुभदृष्टि- इस कविता में आई बांग्ला संस्कृति का नाजुक संवेदनापूर्ण मर्मस्पर्शी अर्थपूर्ण शब्द-प्रयोग।

0 ‘स्मरण‘ की दो कविताओं का हिंदी अनुवाद-

जीवित रहते उसने मुझे
जो कुछ दिया,
उसका बदला चुकाऊँगा, लेकिन
अभी समय नहीं है।
उसके लिए रात सुबह हो गई है,
हे प्रभु, तूने आज उसे ले लिया है।
मैंने उसे तेरे चरणों में,
कृतज्ञतापूर्वक भेंट किया है।
मैंने उसके साथ जो भी बुरा किया है,
जो भी गलतियाँ की हैं,
उसकी क्षमा मैं आपसे माँगता हूँ,
आपके चरणों में डालता हूँ।
जो कुछ उसे नहीं दिया गया,
जो कुछ मैं उसे देना चाहता हूँ,
उसे आज प्रेम के हार के रूप में
आपकी पूजा की थाली में रखता हूँ।
- - -
एक दिन इसी दुनिया में,
तुम एक नवविवाहिता के रूप में मेरे पास आईं,
अपना काँपता हुआ हाथ मेरे हाथों में रख दिया। 
क्या यह भाग्य का खेल था, क्या यह संयोग था?
यह कोई क्षणिक घटना नहीं है,
यह अनादि काल से चली आ रही योजना है।
दोनों के मिलन से भर जाऊँगा मैं,
युगों-युगों से इसी आशा में हूँ मैं।
मेरी आत्मा का कितना हिस्सा तुमने लिया है,
कितना दिया है इस जीवन धारा को?
कितने दिन, कितनी रातें, कितनी शर्म, कितनी हानि, कितनी जय-पराजय
मैं लिखता रहा हूँ,
मेरे थके हुए साथी क्या करेंगे,
सिवाय मेरे अपने शब्दों के!

0 सस्ता साहित्य मंडल द्वारा इन्द्र नाथ चौधुरी के प्रधान संपादकत्व में 2013 में प्रकाशित रवींद्रनाथ टैगोर रचनावली का खण्ड-42, ‘मेरी आत्मकथा‘ है, जिसमें मुख्यतः टैगोर के जीवन के आरंभिक वर्षों की विदेश यात्रा व प्रवास तथा साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख है। इसमें पेज 209-210 पर ‘स्त्री‘ कह कर अपनी पत्नी से संबंधित रोचक जिक्र आया है- एक तरुण, जो कहता है कि आपकी स्त्री पूर्वजन्म की मेरी माता है, ऐसा मुझे स्वप्न में दिखाई पड़ा है ... इतना ही नहीं कुछ दिनों बाद ‘एक लड़की का (मेरी स्त्री के पूर्व जन्म की लड़की का) एक पत्र मिला ...।‘ इस संदर्भ में उल्लेखनीय कि पता लगता है टैगोर प्लेन्चिट से मृत आत्माओं का आह्वान किया करते थे।

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शब्द-कौतुक

0 बांग्ला पलातका, जैसा मिलता-जुलता मराठी शब्द पळपुटा है, जिसका अर्थ वैसा ही है और छत्तीसगढ़ी का पल्ला भागना, पल्ला तान देना वही अर्थ देता है, इससे लगता है कि शब्द का मूल एक ही होगा।

0 1910 के बिलासपुर गजेटियर में पेंड्रा के साथ ‘पंडरीबन‘ नाम आया है, यह रोचक संकेत का आधार है। सामान्यतः पेंड्रा या पेन्डरा, पिंडारियों से संबंधित शब्द माना जाता है, यह उपयुक्त नहीं जान पड़ता। पंडरीबन शब्द का बन स्पष्टतः वन, वृक्ष-बहुलता का शब्द है और पंडरी को रायपुर के पंडरीतलई, पेंडरवा, पेंड्री, पंर्री, पांडातराई, पंडरीपानी जैसे शब्दों के साथ समझने के प्रयास में इसका अर्थ सफेद (पांडुर) या स्वच्छ-उजला निकलेगा। छत्तीसगढ़ से संबंधित ‘गोरे‘ फादर लोर या वेरियर एल्विन को और अन्य विदेशी पादरियों आदि को पंडरा साहब कहा जाता रहा है। इस आधार पर संभव है कि इस क्षेत्र में सफेदी लिए तना-छाल वाले वृक्ष- धौंरा, केकट या कउहा की अधिकता रही हो, यों कुरलू या कुल्लू, कुसुम, अकोल, मुढ़ी, कलमी, सिरसा, करही, परसा, सेमल, खम्हार, पीपल, पपरेल का तना भी सफेदी लिए होता है, मगर जंगली नही और झुंड में नहीं होता। पंडरा, चूने का संकेत भी देता है, जिसके लिए छत्तीसगढ़ी में सामान्यतः धौंरा (धवल) शब्द है, जिससे धौंराभांठा, धवलपुर, धौरपुर जैसे स्थान-नाम बनते हैं। पंडरभट्ठा स्थान-नाम स्पष्ट ही चूना पत्थर का खदान है। पेंड्रा से चूना निर्यात की जानकारी भी मिलती है, यह दूर की कौड़ी मानी जा सकती है फिर भी ... और इसी तरह गौरेला को गौ-रेला, यानि गायों की पंक्ति-झुंड या रेला बताया जाता है तो इसे गौर (वर्ण), चूने या सफेदी से जोड़ कर भी देखा जा सकता है।

0 इसी क्रम में भनवारटंक, का भनवार बहुत अजनबी शब्द है, और हिंदी में उच्चारित होने वाला टंक अंगरेजी में ‘टी-ओ-एन-के‘ लिखा जाता है। संभावना बनती है कि यह भंवर यानि बड़ी मधुमक्खी से आया हो और अंगरेजी स्पेलिंग के कारण इस तरह बदल गया हो। खोडरी, स्पष्ट ही खड्ड, खोड़रा, अर्थात गड्ढा का अर्थ देता है और खोंगसरा, जैसा एक अन्य स्थान -नाम खोंगापानी है, इसमें सरा-पानी, स्पष्ट है और खोंग का आशय व्यवधान-रुकावट या गहराई के लिए है।

टीप- इस मसौदे को तैयार करने में उपरोक्त उल्लेखित के अतिरिक्त रायपुर, भिलाई के महानुभावों और कोलकाता, विश्वभारती से संबंधित लोगों से संपर्क किया गया। विश्वभारती, शांति निकेतन द्वारा मार्च 2019 में "Rabindranath Tagore and Travel" कान्फ्रेंस का आयोजन किया गया था, संयोजक प्रो. सोमदत्ता मंडल और उनके सहयोगी डॉ. सौरव दासठाकुर थे, टैगोर की संभावित बिलासपुर यात्रा के बारे में इनसे जानकारी लेने का प्रयास किया साथ ही विश्वभारती के ही श्री राहुल सिंह, सुश्री सुर्हिता बसु से भी मेल-दूरभाष पर संपर्क किया। वहां के प्रो. अमित सेन ने सहयोग करते हुए टैगोर की जीवनी और यात्राओं के विशेषज्ञों से जानकारी जुटा कर अवगत कराने का आश्वासन दिया है। इन सबके पीछे मेरा प्रयास है कि टैगोर के बिलासपुर आने का कोई भी संकेत मिल पाता है अथवा नहीं, या ऐसी संभावना का पता करने का प्रयास जिसके कारण उनकी कविता में बिलासपुर का नाम आया है। साथ ही इससे संबंधित आपत्ति, आलोचना, संदेह पैदा करने और स्थानीय तथ्यों की जानकारी-सामग्री जुटाने में रायपुर, बिलासपुर और पेंड्रा से जुड़े बुद्धिजीवियों, मीडिया-परिचितों से सहयोग मिला। 

इस पोस्ट का मुख्य अंश 31 अगस्त को ‘द वायर‘ हिंदी में इस प्रकार पेश हुआ था। साथ ही नीचे इस पोस्ट से संबंधित फेसबुक की 29 अगस्त तथा 1 सितंबर की मेरी तथा 30 अगस्त की रमेश अनुपम जी की बातें- 

रमेश जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय और सौहार्दपूर्ण संबंध है। उनका शिष्ट-शालीन व्यक्तित्व, अकादमिक अध्यवसाय की गहराई और समझ सुस्थापित है। फिर ऐसी बातें, जिसमें मुद्दे के बजाय व्यक्तिगत आक्षेप है, यद्यपि उन्होंने अपनी पोस्ट में किसी का नामोल्लेख नही है, इसलिए संभव है कि वह किसी अन्य के लिए की गई टिप्पणी हो, लोगों ने उसकी ओर ध्यान दिलाया, देख कर लगा कि वह टिप्पणी किसी अन्य के लिए हो तो समान रुप से मेरे प्रति भी की गई संभव है। शायद उन्होंने तात्कालिक उत्तेजना और भावावेश में आ कर लिखा है, यह भी संभव है कि उनका फेसबुक अकाउंट हैक कर उसका दुरुपयोग हम दोनों के बीच मनमुटाव पैदा करने के लिए किया गया हो। दोहराव, मगर प्रासंगिक होने के कारण यहां आवश्यक है अतएव-

अकादमिक शोध-अध्ययन, तथ्यों और उपलब्ध-प्राप्त अधिकतम संभव सूचनाओं का पूरी पारदर्शिता के साथ इस्तेमाल कर निष्कर्ष निकालना होता है, न कि सही-गलत फैसला करना या साबित करना।

किसी गंभीर व्यक्ति की पोस्ट की उपेक्षा, उसे नजरअंदाज करना, उसके अपमान जैसा है यह मानते, उनकी बातों से असहमति के बावजूद पूरा सम्मान देते बतर्ज गांधी ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है‘ के इस्तेमाल की धृष्टता करते हुए कह सकता हूं कि ‘मेरा लेख ही उनकी बातों का जवाब है।‘

पोस्ट पर यह टिप्पणी आई है। मनीष दत्त जी अब हैं नहीं।
सतीश जायसवाल जी अब भी सक्रिय हैं,
टिप्पणी में आई बात- पुष्टि/खारिज कर सकते हैं।


Saturday, August 16, 2025

जन गण मन, दयाल महरानी और राजपुत्र चिरंजीव

गांव-गोष्ठी जमी है, राज-सुराज की बातें हो रही हैं- मैंने ‘गॉड सेव द किंग‘ का तीन वर्शन सुना है, एक हमारी माताजी सुनाती थीं, वे गोला गोकर्णनाथ पढ़ती थीं, वहां प्रार्थना उर्दू में होती थी- ‘खुदाया जॉर्ज पंजुम की हिफाजत कर, हिफाजत कर।‘ इसी उच्चरण में, पंचम नहीं पंजुम। बाद में वे फतेहपुर आ गईं, वहां आर्य समाजी माहौल के स्कूल में हिंदी की प्रार्थना होती- यशस्वी रहें हे प्रभो हे मुरारे, चिरंजीवी राजा और रानी हमारे। छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ठेठ किस्म की प्रार्थना होती थी- ‘ईश राजा को बचाओ, हमारे राजा की जै, इस राजा को बचाओ।‘- लगभग एक सदी पुरानी, सुनी-सुनाई याद रह गई ये बातें, हमारे लिए सहज उपलब्ध, आसान और भरोसेमंद गंवई गूगल रवीन्द्र सिसौदिया जी बताते हैं। याद किया जाने लगा, उस दौर की ऐसी और भी कई रचनाएं हैं। मुझे भारतेन्दु का पद याद आता है- ‘राजपुत्र चिरंजीव’। बात आई-गई से आगे भी बढ़ी, इस तरह- 

भारतेन्दु के ‘राजपुत्र चिरंजीव’ के पहले गुलामी के दौर के साहित्य और साहित्यकारों में एक छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा को याद करते चलें। उन्हें छत्तीसगढ़ का गांधी कहा जाता है। 
हस्तलिखित जेल पत्रिका का चित्र,
दो भिन्न स्रोतों से

1881 में जन्मे पं. सुंदरलाल, 1922 से 1932 के बीच एकाधिक बार कैद किए जाने की जानकारी मिलती है, जेल से ही ‘श्री कृष्ण जन्म स्थान समाचार पत्र‘ हस्तलिखित सचित्र पत्रिका निकाली, जिसके एक अंक का चित्र उपलब्ध होता है, इस पर अंकित है- ‘चैत्र-वैशाख, छठवां अंक प्रथम वर्ष 1923?‘ मगर इसके पहले इन्हीं ने 1902 में रचित और 1916 में प्रकाशित ‘विक्टोरिया-वियोग और ब्रिटिश-राज्य-प्रबन्ध-प्रशंसा‘ पुस्तक में निवेदन किया था कि ‘राज-भक्ति-प्रचार करने के पवित्र उद्देश्य को लेकर मैंने इसकी रचना की थी। यदि उसमें सफलता हुई, तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा। महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा में की गई इस काव्य रचना में विभिन्न विभागों- पुलिस, अदालत, रेल, तार, डाक, पाठशाला, सड़क, अस्पताल, म्युनिसिपैलिटी, पलटन, जहाज, कल कारखाना, नल, बागीचा, सराय और कुँआ, सेटलमेन्ट, नहर, तालाब, अकालप्रबन्ध, पुल, कृषि-बैंक, धर्म्म, दुष्ट-दलन, रामराज्य, कोर्ट्स आफ़् वार्ड्स- के शीर्षक से काव्य रचा गया है। 

जगतसेठ अमीचंद अंग्रेजों का साथ देने के लिए इतिहास-प्रसिद्ध हैं, जिनके वंशज भारतेंदु हरिश्चंद्र हुए। 1876 में भारतदुर्दशा‘ नाटक छपा, अन्धेर नगरी चौपट्ट राजा‘ नाटक प्रसिद्ध है ही। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ग्रन्थावली-4 में संपादक ने लिखा है- ‘राजभक्ति की भावना भारतेन्दु में कूट-कूटकर भरी हुई है। ... महारानी विक्टोरिया के परिवार में किसी को छींक भी आई तो भारतेन्दु ने कविता लिखकर उसके स्वास्थ्य की कामना की है। यह बात अलग है कि छींक स्वाभाविक प्रक्रिया में आई है पर भारतेन्दु के लिए तो वह अवसर ही बनी है।‘ ऐसी कुछ कविताएं हैं- ‘श्री राजकुमार सुस्वागत‘, ‘प्रिंस ऑफ वेल्स के पीड़ित होने पर कविता‘, या वाइसराय लार्ड रिपन के प्रति कविता ‘रिपनाष्टक‘। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ग्रन्थावली के ‘राजभक्ति की कविताएं‘ खंड के अंतर्गत उनकी ऐसी 15 कविताएं संकलित हैं। उनकी कविताओं के लिए यह भी कहा गया है कि उनमें ‘राज-भक्ति‘ की कविताओं की काफी संख्या है। आश्चर्यजनक तथ्य है कि उनकी स्वतंत्र कविताओं में एक भी कविता ऐसी नहीं है जिसे देशभक्ति की कविता कहा जा सके। 

यह सुनते हुए तब के उन संदर्भों की ओर ध्यान जाता है- भारतेंदु ने सन 1874 में ‘बालबोधिनी‘ पत्रिका में प्रकाशित पौराणिक पात्र मदालसा की कथा को ‘मदालसोपाख्यान‘ शीर्षक से पुनः सन 1875 में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया था। पुस्तिका के आरंभ में विवरण था कि इसे पुस्तिका रूप में श्रीयुत प्रिस आव वेल्स बहादुर के शुभागमन के आनन्द के अवसर में बालिकाओं में वितरण के अर्थ अलग छपवाया गया। और यह भी कि ‘जिस लड़की को यह पुस्तक दी जाय उस से अध्यापक लोग 5 बेर कहला लें ‘‘राजपुत्र चिरंजीव‘‘। 

1883 में भारतेन्दु के फ्रेडरिक के. हेनफोर्ट के नाम संबोधित अधूरे पत्र में उनके द्वारा ब्रिटिश राष्ट्रगीत का अनुवाद, इस प्रकार शुरू होता है- प्रभु रच्छहु दयाल महरानी, बहु दिन जिए प्रजा सुखदानी, हे प्रभु रच्छहु श्रीमहरानी, सब दिस में तिन की जय होइ, रहै प्रसन्न सकल भय सोइ, राज करे बहु दिन लों सोई, हे प्रभु रच्छहु श्रीमहरानी। 

दूसरी तरफ 1874 में उन्होंने लिखा- बीस करोड़ (वाली आबादी के) भारतवर्ष को पचास हजार अंगरेज शासन करते हैं ये लोग प्रायः शिक्षित और सभ्य हैं परंतु इन्हीं लोगों के अत्याचार से सब भारतवर्षीयगण दुखी हैं। 

यों तो उनके लेखन में खास बनारसी ठाट और मौज के कहने ही क्या, ‘लेवी प्राण लेवी‘ जैसे शीर्षक से टिप्पणी लिखी और उसकी एक प्रासंगिक बानगी ‘स्तोत्र पंचरत्न‘ का ‘अंगरेज स्तोत्र‘ है, देखिए- ‘अस्य श्री अंगरेजस्तोत्र माला मंत्रस्य श्री भगवान मिथ्या प्रशंसक ऋषिः जगतीतल छन्दः कलियुग देवता सर्व वर्ण शक्तयः शुश्रुषा बीजं वाकस्तम्भ कीलकम् अंगरेज प्रसन्नार्थे पठे विनियोगः।’ 

रवींद्रनाथ टैगोर रचित हमारे राष्ट्रगान पर वाद-विवाद होता रहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पर लिखे ‘जन गण मन अधिनायक जय हे‘ लेख में स्पष्ट किया है कि- कवि ने बड़ी व्यथा के साथ श्री सुधारानी देवी को अपने 23 मार्च 1939 के पत्र में लिखा था कि ‘‘मैंने किसी चतुर्थ या पंचम जार्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों की रथ यात्रा का चिर-सारथी‘ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का सन्देह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है।‘‘

इस लेख में आगे स्पष्ट किया गया है कि- ‘असल में सन् 1911 के कांग्रेस के माडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पति की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो। उन्होंने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का अधिवेशन 'जन गण मन' गान से हुआ और बाद में सम्राट दम्पति के स्वागत का प्रस्ताव पास हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक-बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था। ... विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवीन्द्रनाथ लिखित समझकर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी। इन्हीं रिपोर्टों से आज का यह भ्रम चल पड़ा है।‘ प्रसंगवश, ‘गॉड सेव द क्वीन‘ राष्ट्रगान का अनुवाद बिशप कॉलेज, कलकत्ता के मिर्ज़ा मोहम्मद बाकिर खान ने अरबी और फ़ारसी में किया। अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद कराया गया। पथुरियाघाट वाले टैगोर परिवार के शौरींद्र मोहन ने नागर कीर्तन शैलियों पर आधारित इस राष्ट्रगान के कम से कम बारह विभिन्न रूप तैयार किए थे।

यों वार्तालाप, कथन, वक्तव्य, अभिव्यक्ति, या किसी साहित्यिक रचना के साथ आवश्यक नहीं कि वह, या उसमें इस्तेमाल किया गया शब्द, सदैव विचारधारा प्रमाणित करता हो, विशेषकर संवेदनशील साहित्यिकों के साथ ऐसा तय कर दिया जाना, समाज में अब आम है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ‘माफीनामे‘ पर भी एकांगी टिप्पणियां होती रही हैं। मनोभाव और उसके अनुरूप या परिस्थितिगत अभिव्यक्ति स्वाभाविक है, मगर वह लिखी-छपी जाकर और अब सोशल मीडिया में दर्ज हो कर गफलत के लिए इस्तेमाल किया जाना आसान हो गया है। 

‘जन गण मन ...‘ गान के बारे में जानकारी मिलती है कि इस गीत की रचना 11 दिसंबर 1911 को हुई। 27 दिसंबर को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। यह गीत ‘भारत भाग्य विधाता‘ शीर्षक से जनवरी 1912 में पहली बार ‘तत्वबोधिनी‘ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। 25/28 फरवरी, 1919 को टैगोर ने आंध्र प्रदेश के मदनपल्ली में बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज का दौरा किया। उल्लेखनीय कि मदनपल्ली जे. कृष्णमूर्ति के जन्म स्थान है, जहां 1915 में टीबी सैनिटोरियम स्थापित हुआ था। मदनपल्ली कॉलेज के प्रचार्य शिक्षाविद जेम्स हेनरी कजिन्स की पत्नी मार्गरेट कजिन्स ने टैगोर से यह गीत सुना और उसके भाव के अनुरूप पश्चिमी नोटेशन में लाया, जिस पर टैगोर की सहमति मिली। टैगोर ने यहीं ‘द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया‘ शीर्षक से इसका अनुवाद किया। टैगोर की लिखावट वाली हस्ताक्षरित मूल प्रति कॉलेज में थी, जो अब किसी अमरीकी संग्राहक के पास तथा उसकी प्रतिलिपि मदनपल्ली में संरक्षित है। 1935 में देहरादून के दून स्कूल में स्कूल गीत के रूप में अपनाया गया। 11 सितंबर 1942 को सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में जर्मन-इंडियन सोसायटी की स्थापना बैठक में गाया गया। 1945 की फिल्म ‘हमराही‘ में यह गीत शामिल था। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया।

इससे संबंधित दो उल्लेख- 

पब्लिकेशन्स डिवीजन की पत्रिका ‘आजकल‘, अंक-सितम्बर 1948, सम्पादकीय के ‘राष्ट्रगीत‘ शीर्षक में बताया गया है कि- 
लोकसमा में एक वक्तव्य देते हुए भारत के प्रधान मन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने कहा- ‘‘मन्त्रिमण्डल ने प्रान्तीय सरकारों से परामर्श करके यह निर्णय किया है कि श्जन गण मनश् गीत को तब तक राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाय, जब तक विधान परिषद् इस सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय करे। मध्यप्रान्त के अतिरिक्त अन्य सब प्रान्तों के गवर्नरों ने श्जन गण मनश् गीत पर अपनी स्वीकृति दे दी थी। किन्तु पीछे पश्चिमी बंगाल के प्रधान मन्त्री ने सूचित किया कि वे और उनकी सरकार ‘जन गण मन‘ के बजाय ‘वन्दे मातरम्‘ को पसन्द करते हैं।‘‘ आगे चलकर प्रधान मन्त्री ने कहा- ‘‘कुछ लोगों का ख्याल है कि वन्दे मातरम् गीत की ओर लोगों का आकर्षण अधिक है और उसका एक इतिहास भी है। किन्तु वह विदेशी वाद्य-मण्डलियों द्वारा गेय नहीं है और उसमें गति भी नहीं है। इस लिए यह प्रतीत हुआ कि वन्दे मातरम् भी देश में राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाता रहे; किन्तु राष्ट्रगीत की तान ‘जन गण मन‘ की ही रहे। इस सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय विधान परिषद् जैसा उचित समझेगी, वैसा करेगी। ‘जन गण मन‘ गीत दक्षिण पूर्व एशिया में आज़ाद हिन्द फौज ने ग्रहण कर लिया था। तब से बह और भी लोकप्रिय हो गया है। सन् १९४७ में जब न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्रीय असेम्बली का अधिवेशन हुआ तो हमारे प्रतिनिधियों से कहा गया कि वे अपने राष्ट्रीय गीत को वाद्य मण्डली द्वारा निकलवाने की व्यवस्था करें। प्रतिनिधि मण्डल के पास ‘जन गण मन‘ का रिकार्ड था। वाद्य मण्डली ने उस पर से उसकी तान का अभ्यास किया और उसे एक बड़े जन समारोह को सुनाया। कई देशों के प्रतिनिधियों ने इसे असाधारण और गौरवास्पद बताया। उसका रिकार्ड भर कर भारत को भेजा गया। इसको अब हमारी फौजों में भी बजाया जाता है। विदेशी दूतावासों में वह कई बार बजाया गया है। हमें विभिन्न देशों से इसकी प्रशंसा के सन्देश मिले हैं और विशेषज्ञों ने उसे कितने ही राष्ट्रगीतों में उत्कृष्ट बताया है। अखिल भारतीय रेडियो में इसके बहुत रिकार्ड हैं।‘‘ 

‘वन्दे मातरम्‘ के पीछे देश की स्वतन्त्रता का इतिहास निहित है, इसमें सन्देह नहीं, पर राष्ट्रगीत चुनते समय इसकी तान को सब से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए, इस पर भी दो मत नहीं हो सकते। इस दृष्टि से वस्तुतः ‘जन गण मन‘ गीत का भविष्य बहुत उज्जवल नज़र आता है। 

इसी पत्रिका के जुलाई 1951 अंक के ‘विकास के पद-चिन्ह‘ स्तंभ में ‘राष्ट्रगीत का प्रामाणिक रूप‘ शीर्षक से टीप है- 
राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसाद ने एक वक्तव्य में कहा था कि भारत का राष्ट्रगीत ‘जन गण मन‘ होगा, और सरकार ही उसमें समय-समय पर परिवर्तन कर सकेगी। राष्ट्रगीत के मूल पाठ में अभी तक कोई परिवर्तन नहीं किया गया, और न अभी परिवर्तन की बात सोची ही जा रही है। 

‘जन गण मन‘ के प्रकाशन, गायन और रिकार्डबद्ध करने का अधिकार विश्वभारती और स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उत्तराधिकारियों को है। उन्होंने अब भारत सरकार को सूचित किया है कि सरकार जनता को निर्वाध रूप से गीत के गाने और उसकी ध्वनि के बजाने का अधिकार दे सकती है। अतः प्रकाशकों और ग्रामोफोन के रिकार्ड तैयार करने वालो कम्पनियों को अनुमति दे दी गई है कि वे राष्ट्रगीत के स्वीकृत मूल पाठ को प्रकाशित कर सकते हैं तथा बना और बेच भी सकते हैं। 

‘जन गण मन‘ का गाने और बजाने योग्य रूप तैयार हो गया है। स्वर वाद्य, सैनिक वाद्य और पियानो वाद्य यन्त्र के लिए मूल पाठ, लय और स्वर के स्वीकृत रूप भारत सरकार के पास उपलब्ध हैं। भारत सरकार की इच्छा है कि जनता, प्रकाशक और ग्रामोफोन के रिकार्ड बनाने वाली कम्पनियां राष्ट्रगीत के प्रामाणिक रूप को ही प्रयोग में लायें। उपर्युक्त तीनों रूपों में स्वीकृत राष्ट्रगीत ‘डाइरेक्टर जनरल, ऑल इंडिया रेडियो, नई दिल्ली‘ से प्राप्त हो सकता है। 

प्रसंगवश, ‘वन्दे मातरम्...‘ पर 1998 में प्रकाशित पुस्तक ‘वाणी का क्षीरसागर‘ के निबंध ‘धुरीमन बनाम परिधिमन‘ में कुबेरनाथ राय की टिप्पणी है- ‘बंकिम ने ‘वन्देमातरम्' में केवल सप्तकोटि बंगालियों की बंगमाता को ही गरिमा से अभिषिक्त किया। जब इस गीत का अखिल भारतीय उपयोग होने लगा तो सप्त को बदल कर 'त्रिंशकोटि-कण्ठ-निनाद-कराले' कर दिया गया। परन्तु आज भी बंगला के प्राइमरी स्कूलों की टेक्स्ट ‘किशलय‘ में यह 'सप्तकोटि-कण्ठ-निनाद-कराले' ही है।‘ ... मेरी जानकारी में सप्तकोटि, त्रिंशकोटि अब ‘कोटि कोटि‘ हो गया है।

टीप - ‘द वायर‘ हिंदी ने इसे बेहतर संपादित स्वरूप में यों पेश किया है।