Friday, October 29, 2021

सतरंगी रतनपुर

तुमान खोल की प्राकृतिक सुरक्षा सीमा पहाड़ियों से परिवेष्टित राजसत्ता का विस्तार जब रतनपुर में आता है तो उसका मैदानी खुलेपन की दिशा में आकर्षण दिखाई पड़ता है। सत्ता संघर्ष के जंगल कानून और गुरिल्ला छापामारी का युग समाप्त होकर मैदानी साहचर्य और विकसित सभ्यता की शुरूआत का, भू-व्यवस्थापन और कर-लगान की नई प्रणाली का, राजसत्ता में जनता की महत्वपूर्ण भागीदारी का सूत्रपात रतनपुर में होता है।

महिष्मति के कलचुरियों की पौराणिक पृष्ठभूमि से विकसित इतिहास ने त्रिपुरी में अगर दिशा पाई तो दक्षिण कोसल आकर उसे ठोस विस्तार मिला। दसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में तुमानखोल के सुरक्षित घेरे में त्रिपुरी कलचुरियों की एक शाखा ने अपनी स्वतंत्र सता घोषित की जो इतिहास में कलचुरियों की रतनपुर शाखा के रूप में जानी गई । इस नई शाखा की स्थापना और इनका लगभग साढ़े सात सौ वर्षों का अद्वितीय राज्यकाल कलचुरी, आदि हैहयवंशियों को इतिहास पुराण का सर्वाधिक दीर्घकाल तक शासन करने वाले वंश के रूप में स्थापित करता है।

रतनपुर में महाप्रतापी कलचुरी शासकों रत्नदेव, पृथ्वीदेव और जाजल्लदेव, प्रतापमल्ल, बाहरसाय और कल्याणसाय जैसे इतिहास प्रमाणित शासकों का स्वर्णयुग देखा वहीं मोरध्वज और चतुर्युगों मेें राजधानी का गौरव प्राप्त कर पुराण कथाओं से महिमा-मंडित भी हुआ है।

रतनपुर के कलचुरिकालीन पुरावशेषों का झलक और कला का अद्भुत सम्मोहक संसार अब बिखर सा गया है लेकिन उनकी झांकी रायपुर व बिलासपुर संग्रहालय, रतनपुर के प्राचीन किले, महामाया मंदिर, कंठी देऊल, जूनाशहर का सतखंडा महल, बावली, बीस दुअरिया, आठ बीसा, बादल महल, कर्णाजुनी तालाब, बैराग बन, भैैरव बाबा, रामटेकरी और लखनी देवी मंदिर में देखी जा सकती है।

महामाया मंदिर को प्रतिष्ठा सिद्ध आदि शक्ति के रूप में मान्य हुई है। प्रवेश-द्वार के सामने स्तंभों पर शिलालेख है। संलग्न तालाब और प्रतिमाओं, स्थापत्य अवशेषों के सांध्य आरती का वातावरण मानो कि काल विस्तार को लांघकर दर्शनार्थी को उसी स्थिति में ला देता है। जैसा रत्नदेव ने विलक्षण अनुभव यहां प्राप्त किया था। रायपुर संग्रहालय की दो महत्वपूर्ण प्रविष्टियां रतनपुर से प्राप्त हैं, जिनमें से एक शिव-पार्वती परिणय का कल्याण सुन्दर विग्रह है, इस प्रतिमा में सोमवंशी और कलचुरि कला के संधि-स्पर्श का सौन्दर्य अत्यन्त सजीव और मनोरम है।

ऐसी ही कलात्मक मूल्य की एक अन्य प्रतिमा शालभंजिका नायिका कठी देऊल मंदिर में है जिसके आभूषण अलंकरण और समानुपातिक शारीरिक सौन्दर्य में प्राकृतिक वृक्ष और जीव-जंतुओं को संघटित किया गया है। नायिका के संग दिखाया गया विदूषक प्रदर्शित है। रायपुर संग्रहालय में रखी काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा इस क्षेत्र में प्राप्त ग्रेनाइट की सर्वाधिक बड़े आकार की प्रतिमा है। चंवरधारिणी परिचारिकाओं सहित सम्पूर्ण देवमण्डल का परिकर है तथा उपासकों में प्रतिमा निर्माण हेतु दान के इतिहास को उद्धाटित करने वाले रतनपुर से प्राप्त शिलालेख भी सुरक्षित है।

कठीदेउल मंदिर वस्तुतः विभिन्न कार्यों की सामग्रियों से संयोजित पुनः संरचना है और संभवतः मंदिर में उत्कीर्ण संतोषगिरि नामक गोसाई का समाधिस्थल है। पुरातत्व अधिकारी एवं अध्येता राहुल कुमार सिंह का इस पक्ष में प्रबल तर्क है कि इस मंदिर के नामकरण का आधार भी यही रहा होगा साथ ही इस मंदिर की गोसाई परम्परा के लिए ग्राम छतौना लगाया गया था, जो इस मान्यता की पुष्टि करता है। कंठी देऊल मंदिर की संरक्षण प्रक्रिया में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे पत्थर दर पत्थर अलग कर पुनः खड़ा किया है।

कंठी देऊल मंदिर में ही काले ग्रेनाइट पत्थर की लिंग पीठिका के साथ-साथ ब्रह्मा और विष्णु के बीच ज्योतिर्लिंग के समक्ष हुई प्रतियोगिता का शिल्पांकन भी अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण है। इस स्मारक में कलचुरिकालीन राजपुरूष व कलचुरि मंदिरों के गजपीठ आदि स्थापत्य खंड भी जुड़े हुए है। यह दोमंजिली इमारत युगल शैली के प्रभाव का भी आभास कराती कलचुरिकालीन प्रतिमाओं का रतनपुर से संग्रह बिलासपुर संग्रहालय में किया गया है। बिलासपुर में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों के धार्मिक सद्भाव पर प्रकाश डालती है। जैन धर्म के विभिन्न तीर्थकरों की पद्मासन व कार्योत्सर्ग मुद्रा की प्रतिमाओं में कला प्रतिमान के दर्शन तो होते ही हैं, यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन रतनपुर राज्य क्षेत्र में जैन धर्मावलंबियों को विशेष महत्व तथा उनकी धार्मिक भावनाओं को सम्मान दिया गया था। नगर प्रवेश में भैरव बाबा स्मारक है।

रतनपुर के इतिहास का एक अन्य महत्वपूर्ण भाग कल्याण साय के साथ जुड़ा हुआ है। जिसकी राजस्व डायरी में अंग्रेजी प्रशासनिक अधिकारियों ने इस पूरे क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र ने छत्तीसगढ़ की संज्ञा धारण कर अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता की पहचान बनाई।

अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मराठा शासकों के साथ जुड़ा इतिहास काल है जब बैराग वन की प्रतिष्ठा कर्णार्जुनी की महत्ता फिर से पहचानी गई और रामटेकरी, मूसे खां की दरगाह, बिठोबा मंदिर, लखनी देवी, आठबीसा, बादलमहल और जूना शहर का सतखंडा महल, बीस दुअरिया और बावली की रचना हुई ।

रतनपुर के रचनाकारों, स्थपतियों, राजपुरूषों और अनाम श्रमजीवी शिल्पियों का स्मरण कला समर्पित उस युग का स्मरण है जहां धर्म, अध्यात्म और उच्चतर सांस्कृतिक मूल्यों से यह सारा अंचल सराबोर था किन्तु इसी क्रम में उन नामों का उल्लेख भी आवश्यक है जिन्होंने इतिहास के इस गौरवशाली अध्याय को पुनः सभी के सम्मुख लाने में योगदान दिया है। बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री, चीजम और नेल्सन जैसे अंग्रेज अधिकारी, वी.वी मिराशी, हीरालाल, बालचंद जैन, लोचन प्रसाद पांडेय और प्यारेलाल गुप्त, डॉ. माखन झा इन सभी विद्वानों के गंभीर शोध अध्ययन को यदि किसी ने लोकरंगों से रंगकर सहज ग्राह्य बनाया है तो वे है जनश्रुतियों और परम्पराओं के कारण कवि देवार जिनके गीतों ने इतिहास के परम्परागत अध्ययन को सदैव दिशा और गति दी है।

भाई अशोक अग्रवाल उन दिनों पत्रकारिता में सक्रिय थे। रायगढ़ उनका डेरा होता था। 'अकलतरा के असल नवरत्न, अकलतरा में स्थापित रहते हैं', :)इसलिए अब स्थायी डेरा-बासा अकलतरा। पिछले दिनों (चित्र)याद ताजा करते हुए, कि उस दौरान वे अकलतरा आते तो मौज में उनसे हुई बातों को लेख का स्वरूप मिल जाता। ऐसी ही एक चर्चा को उन्होंने इस तरह कलमबद्ध किया था।

Thursday, October 28, 2021

विरासत-वार्ता, पाठक-मंच और कलम

राजनीति जैसे इतिहास भी, और कविता तो अवश्य ही शब्दार्थ पर आश्रित प्रविधियां हैं। कविता को हम इससे विलग करके कला कहते हैं, लेकिन इसकी समानता इसी बिन्दु पर समाप्त हो जाती है। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के तत्वावधान में ‘विरासत वार्ता‘ की इस माह की वैचारिक गोष्ठी में डा. शिरीष ढोबले ने ‘कविता, राजनीति और इतिहास‘ पर स्थानीय राघवेन्द्र राव वाचनालय में अपना वक्तव्य रखा।

पेशे से हृदय शल्य चिकित्सक डा. ढोबले, हिन्दी कविता तथा गद्य में एक स्थापित नाम हैं। उन्होंने कविता, राजनीति और इतिहास के आपसी संबंधों को स्पष्ट करने के लिए विशिष्ट दृष्टिकोण और उदाहरणों को आधार बनाया। डा. ढोबले ने मानव शरीर विज्ञान कबीर, गीता, तिलक और विदेशी विचारक-साहित्यकारों के उद्धरणों के प्रकाश में अपनी बात रखी और कहा कि राजनीति और राजकारण के पास अर्थों का एक निराला संग्रह है, इतिहास के पास एक ऐसा संग्रह जो यथाशक्ति तथा यथाबुद्धि, राजकारण और कविता से बुद्धि उधार लेता रहता है। शब्दों की खड़िया से कौन किस समय क्या लिखता है, यह बहुधा उपलब्ध अर्थसंसार पर निर्भर करता है। यह कोष किस मनस् से, किस मानसिकता से और किस अभीष्ट से विभिन्न प्रविधियां या कलाएं चुनती है, विशेषतः किस अभीष्ट से राजनीति, इतिहास और कविता इन्हें चुनती है, इसकी पड़ताल में देखें कि किस तरह देखना था, न देखना एक मुद्दा बनता है।

गोष्ठी के चर्चा सत्र में उपस्थित नगर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों ने वक्तव्य पर अपनी जिज्ञासाएं और शंकाएं रखी। डा. कमलेश मिश्र ने पूछा कि, क्या वे कविता, राजनीति और इतिहास को भैषजिक दृष्टिकोण से देखते हैं? डा. ढोबले ने स्पष्ट किया कि किसी भी अनुशासन के उदाहरण से इन तीनों के अंतसंबंधों की पड़ताल संभव है। सामाजिक विज्ञान का व्यक्ति इसके उदाहरण पारिवारिक स्थितियों में भी घटाकर देख सकता है। रामकुमार तिवारी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जैसे-जैसे ऐतिहासिक चेतना आती है, अपने बने रहने के लिए हम रिड्यूस होते जाते हैं, इस पर डा. ढोबले ने कहा कि इतिहास की प्रविधियां, राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन लिखा गया हर टेक्स्ट, गास्पेल नहीं होता। उसे गास्पेल की तरह न लें। राजनीति के बारे में आगे डा. ढोबले ने कहा- इसकी परिणिति दो जगह होती है, या तो चकाचौंध भरे वातावरण में या कन्संट्रेशन कैम्पों में, राजनीति में हमारे निर्णय लेने का अधिकार दूसरों के पास होता है और एक ऐसा समूह, जिसमें व्यक्ति की पहचान खो जाती हो, उन्हें मान्य नहीं। किंतु डा. हेमचंद्र पाण्डेय से चर्चा में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इसके मायने तंत्र अथवा व्यवस्था की खिलाफत नहीं, बल्कि वे उसकी कमी की ओर संकेत कर रहे हैं। श्री विकास शर्मा ने पूछा कि क्या आप ऐसे इतिहास की बात कर रहे हैं, जो ईर्ष्या पैदा न करें? उत्तर में डा. ढोबले ने कहा कि इतिहास से सीख लेनी चाहिए। वैज्ञानिक तथ्यों को जांचा जा सकता है लेकिन इतिहास को नहीं।

गोष्ठी में पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, नंदकिशोर तिवारी, बल्लू दुबे, कपूर वासनिक, शाकिर अली, डा. चन्द्रशेखर तथा सुश्री अलका व शुभदा रहालकर, अंजू पासी, डा. बी.के. प्रसाद, मधुकर गोरख, डा. घनश्याम वाई.पी. डडसेना, एन.के. वर्मा, राकेश सिंह, बद्रीसिंह कटहरिया, राजेश तिवारी, सुरेश चन्द्राकर, नथमल शर्मा, एजाज कैसर, विवेक जोगलेकर, राकेश खण्डेलवाल आदि सम्मिलित हुए कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शुभदा जोगलेकर ने किया। गोष्ठी के आरंभ में वक्ता का परिचय तथा कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन पुरातत्व अधिकारी राहुल सिंह ने किया।
यह समाचार नवभारत, बिलासपुर में 3 अक्टूबर 2002 को प्रकाशित हुआ था। ऐसी गोष्ठियां हर महीने राज्य के प्रमुख नगरों में आयोजित किए जाने की योजना थी, हुई भी, लेकिन संभवतः बिलासपुर में और वह भी नियमित न रह सकी। गोष्ठी के लिए वक्ता से अपेक्षा होती थी कि वह परचा तैयार करे, जिसकी प्रतियां गोष्ठी में उपस्थित होने वालों को दो-तीन पहले वितरित कर दी जाती थी। खासियत कि थोड़े प्रयास और व्यक्तिगत रुचि के कारण विभिन्न वर्गों के बुद्धिजीवी श्रोता, प्रतिभागी बन कर उपस्थित होते। व्यय भी नाममात्र होता। इसी प्रकार ‘पाठक मंच‘ की गोष्ठियां आयोजित होती थी, इसकी एक गोष्ठी के लिए मुझे विजयदान देथा की ‘सपनप्रिया‘ के आधार वक्तव्य का जिम्मा दिया गया था। एक अन्य गोष्ठी का समाचार, दैनिक भास्कर, बिलासपुर 29 जुलाई 2003 में इस प्रकार प्रकाशित हुआ था-

‘कोई लेखन तभी कालजयी होता है, जब उसमें लेखक की निज पीड़ा सार्वजनिक संघर्ष के सुर में तब्दील होकर समकालीन समय की सत्ता की क्रूरता व दमनात्मकता के विरुद्ध न सिर्फ आवाज मुखर करती है, बल्कि भविष्य की लड़ाइयों के लिए सूत्र भी छोड़ती है।‘ बेबी हालदार लिखित बहुचर्चित पुस्तक ‘आलोआंधारी‘ पर चर्चा के दौरान पाठक मंव की गोष्ठी में यही बात सामने आई।

वकील कनक तिवारी के कार्यालय में आयोजित नवगठित पाठक मंच की पहली गोष्ठी में ‘आलोआंधारी‘ पर चर्चा करते हुए वकील कनक तिवारी ने इस पुस्तक को एक स्त्री की जिजीविषा का, उसकी दृढता व संघर्ष यात्रा की गाथा बतलाते हुए कहा कि इसे पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है मानों हमारी अपनी बच्ची अपनी गाथा हमारे सामने कह रही हो। उन्होंने कहा कि इस गाथा की प्रमुख पात्र सातवीं कक्षा तक पढ़ी घर में कामकाज करने वाली नौकरानी है। वह अपने सपाट बयानी लहजे में अपने कष्टों, अपनी पीड़ा की कहानी सुनाती है। रिश्तों के प्रति उसकी बैलेंसिंग गजब की है। पुस्तक में बंगला संस्कृति और परंपरा की झलक है। पुस्तक का आधार वक्तव्य पढ़ते हुए शोभित बाजपेई ने कहा कि पुस्तक की प्रमुख पात्र बेबी के वर्गीय चरित्र को बखूबी नहीं उभारा गया है। बेबी की अपने ऊपर होने वाले अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना के स्वर मुखर नहीं हो पाते।

चर्चा में भाग लेते हुए राहुल सिंह ने बेबी हालदार की सपाटबयानी को ही उनका धारदार हथियार बतलाते हुए कहा कि यद्यपि यह दिखता है कि बेबी में प्रतिरोध के स्वर नहीं हैं, लेकिन यदि उसकी पीड़ा पढ़कर हमें ऐसे स्वर की अपेक्षा होती है तो यह भी एक तरीका होता है अपनी निज की पीड़ा को सार्वजनिक संघर्ष में बदलने का।

रुपरंजन घोष ने बेबी के वर्गीय चरित्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि यद्यपि बेबी बाद में निम्न वर्ग में दिखती है परंतु उसका प्रारंभिक लालन-पालन मध्यम वर्ग में हुआ, इसलिए उसकी चेतना में मध्यवर्गीय सस्कार हावी रहेंगे। कपूर वासनिक ने कहा कि आशापूर्णा देवी और दया पवार दोनों एक्टिविस्ट हैं और विशिष्ट उद्देश्य से लेखन कार्य करते हैं। अतः दोने से बेबी हालदार की तुलना करना अप्रासंगिक है। क्योंकि बेबी के पास ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है।

नमिता घोष ने कहा कि यह उस स्त्री की व्यथा-कथा है, जो एक स्त्री होने के मर्म और स्त्री होने की पीड़ा दोनों से वाकिफ है। विवेक जोगलेकर ने कहा कि किसी भी रचना का मूल्यांकन करते समय अपनी सोच व रचनाकार की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें व उसके बाद रचना या रचनाकार का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। रफीक खान ने कहा कि बेबी अपनी रचना के पीछे सवाल छोड़ जाती है, जो पाठक के मन में पीड़ा उत्पन्न करते हैं। यही लेखन की सफलता है।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पुष्पा तिवारी ने कहा- कि आलोआंधारी एक स्त्री को निज बयानी है और इससे भी अधिक व भयावह अनुभव वाली स्त्रियां देश में हैं पर उनके पास लेखन के लिए प्रोत्साहन है न छप जाने लायक सुविधाएं।

गोष्ठी में प्रख्यात चिंतक राजेश्वर सक्सेना, कवि रामकुमार तिवारी, प्रो. बृजकिशोर प्रसाद सिंह, डा. चंद्रशेखर रहालकर, प्रताप ठाकुर, कालीचरण यादव आदि उपस्थित थे। पाठक मच की अगली बैठक नौ अगस्त को दोपहर तीन बजे वकील कनक तिवारी के कार्यालय में आयोजित की गई है।

रायपुर और फिर बिलासपुर में प्रभा खेतान फाउंडेशन के ‘कलम‘ का आयोजन होने लगा। इसके सूत्रधार गौरव गिरिजा शुक्ला ‘कलम‘ में प्रत्यक्ष उपस्थिति और आयोजन में परोक्ष सहयोग का अवसर मुझे देते हैं, उन्हें अब तक यह ठीक-ठीक अनुमान नहीं कि ऐसे आयोजन मेरे लिए सहज और प्रिय क्यों है।

Wednesday, October 27, 2021

जागेश्वर प्रसाद

छत्तीसगढ़ी सेवक-जागेश्वर प्रसाद

जागेश्वर प्रसाद जी बर कुछ लिखना मो ल बड़ा मुस्किल लगथे। दू कारण से, एक तो निजी कारण कि जेकर संग बहुत आत्मीयता हो जाथे, मन के बहुत सारा भाव रथे, ओ हर शब्द म नई आ पात रहय, त थथक-पथक लागथे अउ दूसर बात कि जागेश्वर जी के बारे म मो ल अंदाजा हे कि उनकर काम कतका अकन हे, लेकिन उनकर बारे म मोर जानकारी कतका कम हे। फिर भी अतका कहि सकत हंव कि उनकर कस ‘छत्तीसगढ़ी के सेवक‘ दुर्लभ हे। ओ अपन पूरा जीवन छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी बर समर्पित कर दिहिन। कागज पत्तर, लिखा-पढ़ी, संपादन के साथ-साथ पूरा छत्तीसगढ़ भर म घूम-घूम के लोग मन ल जागृत करना, लोगन के सहयोग लेना अउ उन ल सहयोग करना।

कहूं मौका म उनकर भाषण सुनें, उग्र अउ प्रखर जागेश्वर जी सार्वजनिक मंच म जतका मर्यादित, संयत लेकिन ठोस बात रखथें, त लगथे कि कइसे एक आदमी के पूरा जीवन, ओकर अनुभव के निचोड़ आत हे। उनकर मजबूत काम आधार आय, जेला शायद बहुत झन नइ गम पात होहीं, वो तेन टाइम म साधन-सुविधा के चिंता करे बिना, छत्तीसगढ़ी के सेवा सरलग करत रहिन, जब ए काम करे बर कोनो जादा माहौल नइ रहिस। आज के पीढ़ी उनकर काम से परिचित होही त समझ पाही कि छत्तीसगढ़ी महतारी के अइसनहा भी सेवक होए हे। छत्तीसगढ़ महतारी के कोख ले अइसनहे पूत, सपूत जनमत रहंय। जागेश्वर जी कस छत्तीसगढ़ी सेवक से प्रेरणा ले के हम अपन महतारी के सेवा करत हुए अपन राज ल खुसहाल अउ सुराज बना सकत हन।

जागेश्वर प्रसाद के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है, गत वर्ष उनके 75 वें जन्मदिन के अवसर पर रामेश्वर वैष्णव जी के सम्पादकत्व में ‘जागरण दूत-जागेश्वर‘ शीर्षक से जागेश्वर प्रसाद अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित हुआ, जिसके सहयोगी संपादक डॉ. बिहारीलाल साहू जी, रामेश्वर शर्मा जी और जी.पी. चन्द्राकर जी थे। इस संग्रह में उनके प्रति व्यक्त मेरी उक्त भावना को भी स्थान दिया गया था।