Saturday, January 15, 2022

लिटिल एंजल - नम्रता

बिलासपुर, जुलाई 1999। नार्मल स्कूल रोड पर ‘लिटिल एंजल स्कूल‘ आरंभ हुआ। पीयूष गुप्ता जी और अनिल अग्रवाल जी ने पूरी तैयारी के साथ इस शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की। स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित एफ. कोशी मैडम ने प्रिंसिपल पद दायित्व के साथ पूरे संस्थान के अकादमिक स्वरूप की जिम्मेदारी ली। दूसरी तरफ बिना किसी अनुभव वाली नम्रता सिंह, अपनी अवैतनिक सेवाएं देने जुड़ीं, कारण कि उनमें स्वाभाविक बचपन का ध्यान रखते, अनुशासन के साथ बच्चों के प्रति संतुलित भावनात्मक लगाव था। स्कूल में मात्र चार कक्षाएं थीं- प्री-नर्सरी, नर्सरी, केजी-1 और केजी-2 और प्रवेश की आयु दो वर्ष। अपने सीमित आकार के साथ स्कूल चल निकला। 15 अगस्त धूमधाम से मनाया गया और छोटे बच्चों की प्रस्तुति अखबारों की सुर्खियां बनी। इसके बाद किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से कोशी मैडम ने संस्थान छोड़ दिया और वरिष्ठता के नाते जिम्मेदारी नम्रता जी यानि सिंह मैडम पर आ गई।

बाद के वर्षों में संचालकों ने स्कूल संचालन से स्वयं को अलग करते संस्थान की पूरी जिम्मेदारी सिंह मैडम को सौंप दी। इसके बाद स्कूल का संचालन दो अन्य भवनों से हुआ, लेकिन स्कूल की प्रतिष्ठा बनी रही। यह स्कूल आगे की पढ़ाई के लिए शहर के बड़े स्कूलों में बच्चों के प्रवेश-परीक्षा में सफलता की गारंटी माना जाता था। अभिभावकों को अलग से तैयारी नहीं करानी पड़ती, बल्कि कुछ बड़े संस्थानों में तो लिटिल एंजल के बच्चों को साक्षात्कार टेस्ट की औपचारिकता कर प्रवेश मिल जाता था।

इस स्कूल की प्रतिष्ठा, बच्चों के रंगारंग वार्षिकोत्सव के कारण थी साथ ही बच्चों के बॉटल-फीड, टिफिन, खाने और टॉयलेट की आदतों में भी सकारात्मक बदलाव आता, कारण होता स्कूल की सामाजिकता और प्रिंसिपल मैडम और पूरे स्टाफ का इस ओर ध्यान देना। अभिभावक, बच्चों की किसी व्यवहारगत समस्या के लिए सिंह मैडम से समय ले कर अलग से मिलने आते। यह भी पता लगा कि कुछ बच्चे अपने माता-पिता की बात पसंद न आने पर कहते कि सिंह मैडम को बता देंगे।
एक वार्षिकोत्सव के अवसर पर
सिंह मैडम का स्वागत भाषण

पांच शैक्षणिक सत्रों के बाद सिंह मैडम के बिलासपुर से रायपुर आ जाने के कारण स्कूल बंद हो गया। इस दौरान सिंह मैडम के पास लगभग प्रतिदिन बच्चों के व्यवहार के किसी अनूठे पक्ष का अनुभवों होता, उन्हें डायरी में लिखने का सुझाव दिया जाता, लेकिन वे ऐसा नियमित न कर पाईं, मगर बाल-शिक्षण से जुड़े अपने अनुभवों को उन्होंने एक लेख का रूप दिया, जो उस दौरान बिलासपुर, नवभारत समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। लेख इस प्रकार था-

वर्षा की फुहारों के साथ नया शैक्षणिक सत्र आरंभ होने वाला है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से लेकर उच्च शिक्षा के लिए अच्छे शिक्षा संस्थानों में दाखिला पाने के लिए भागदौड़ हो रही है। दूसरी तरफ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए भले ही नई कक्षाओं में प्रवेश हो चुका है, किन्तु किताब-कापी में जिल्द, टिफिन बाक्स और वाटर बाटल सहित यूनिफार्म के कपड़े, जूते-मोजे और टाई की खोज फिर से शुरू हो गई है। कुछ बच्चे उत्साहित हैं तो कुछ को छुट्टियां खत्म होने का अफसोस भी हो रहा है। इसी माहौल में ऐसे भी अभिभावक हैं, जो अपने बच्चे का पहला या दूसरा जन्मदिन मना चुके हैं और इस सवाल का बार-बार सामना कर रहे हैं कि बच्चा स्कूल जाने लगा? ऐसे अभिभावकों के मन में सवाल होता है कि क्या बच्चे की उम्र इतनी हो गई कि उसे स्कूल भेजना शुरू किया जाए? इस सवाल के साथ ढेरों संदेह, आशंकाएं उनके मन में पनपने लगती हैं। यह स्थिति कई बार अभिभावकों और उनके बुजुर्गों के बीच तो कई बार पति-पत्नी के आपसी मतभेद का रूप ले लेती है।

यह अवश्य विचारणीय है कि स्कूल में प्रवेश के लिए बच्चे की क्या उम्र होनी चाहिए? बड़े-बुजुर्ग अपने दिनों को याद करते हैं कि स्कूल में तब तक दाखिला नहीं दिया जाता था, जब तक बच्चा सिर पर से हाथ घुमाकर कान न पकड़ ले यानि लगभग छह साल को उपयुक्त आयु माना जाता था। छह साल तक बच्चे के लिए उसकी प्री-स्कूलिंग पाठशाला, उसका अपना घर ही होता था, जहां वह भाई-बहनों और हमउम्र पड़ोसी बच्चों के साथ खेलते-कूदते बड़ा होता था और सामाजिकता का पहला पाठ पढ़ता था। वे दिन संयुक्त परिवार के थे, जब आमतौर पर अधिकतर बच्चों को खेलने के लिए खुली जगह मिल जाती थी। मौसम और स्थितियों को लेकर बच्चों के लिए इतने कठोर बंधन नहीं हुआ करते थे, हिदायतें जरूर दी जाती थीं। आज की बदली हुई परिस्थिति में स्वाभाविक ही सामाजिक स्थितियों के साथ-साथ अभिभावकों की रोजमर्रा की जिंदगी और पारिवारिक स्थितियों में अंतर आया है तो बच्चों का बचपन भी प्रभावित हुआ है। इस स्थिति में बच्चों के स्कूल में प्रवेश की आयु के साथ धीरे-धीरे प्री-स्कूलिंग (स्कूल-पूर्व शिक्षा) की आवश्यकता के साथ, प्रवेश की उम्र घटती जा रही है।

इस सवाल पर निर्णय लेने के लिए अभिभावकों को कुछ बिंदुओं पर अवश्य विचार करना चाहिए। प्रत्येक बच्चे का जन्म, नई आशा का जन्म होता है। वर्तमान जीवन परिस्थितियों में बच्चों को प्रकृति से साहचर्य, संयुक्त परिवार में मिलने वाला लाड़ प्यार, पालकों की व्यस्तता के कारण बच्चों को मिलने वाला उनका समय और दूसरे बच्चों से मेल-मुलाकात प्रभावित हुई है। इन स्थितियों के कारण आमतौर से अभिभावकों की शिकायत होती है- बच्चे का चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, टेलीविजन, वीडियो गेम या कम्प्यूटर से चिपके रहना, दूसरे बच्चे के अपने घर आने पर अथवा स्वयं दूसरों के घर जाने पर असामान्य व्यवहार करना जैसे-अभिभावकों से मारपीट, हिंसक और उत्तेजनात्मक खिलौनों, रिवाल्वर-बंदूक के प्रति उनका बढ़ता आकर्षण आदि। ऐसी स्थितियों के प्रति अभिभावकों को चिन्ता होती है, लेकिन अधिकतर वे इसके कारण के रूप में बदली हुई परिस्थिति को साफ-साफ नहीं समझ पाते। यह स्थिति बच्चों के निश्छल और सहज बचपन सहित विकास की दृष्टि से निसंदेह चिन्ताजनक है।

अतएव वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है कि यदि आप बच्चे का दूसरा जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे हैं या मना चुके हैं तो बच्चे के लिए किसी ऐसे स्कूल का पता जल्द कर लीजिए जहां उन्हें खेल-खेल में भाषा, भोजन और सामाजिकता के पाठ सहित उनके स्वाभाविक विकास के साथ उनके शिक्षा की बुनियाद तैयार की जाती है। उनके सहज-स्वाभाविक बचपन के साथ उनमें आवश्यक संस्कार विकसित करने का प्रयास किया जाता है। यह ध्यान रखिए कि आपके बच्चे का लालन-पालन आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता, किन्तु प्रतिष्ठित स्कूलों में, जिनमें बच्चों की संख्या सीमित रखी जाती है, लगातार बच्चों के सम्पर्क में रहने से वे आपके बच्चे की समस्या को समझकर उसका निदान अच्छी तरह से कर सकते हैं। ऐसे स्कूलों में स्वयं जा कर संस्था प्रमुख, शिक्षक-शिक्षिकाओं, पूरे स्कूल स्टाफ व उनकी पृष्ठभूमि की अच्छी तरह जानकारी लेकर ही अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिला कर, उसे स्कूल भेजने की तैयारी करें।

श्रीमती नम्रता सिंह, राहुल कुमार सिंह की, यानि मेरी पत्नी हैं और यह लेख लिखने के लिए मैंने उन्हें प्रोत्साहित कर मदद की थी।

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