Tuesday, December 28, 2021

भारत के रत्न

कला-साहित्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ पुलिस के राजीव श्रीवास्तव जी, मुख्यतः संगीत और फिल्मों से जुड़े रहे। संस्कृति आयुक्त भी रहे और राज्य पुलिस सेवा के संभवतः एकमात्र ऐसे अधिकारी, जो पुलिस महानिदेशक पद तक पहुंचे। शशि मोहन सिंह जी का लगाव, अभिनय और फिल्मों से है। अपने इस ‘पैशन‘ के लिए लंबी छुट्टी पर रहे, अब भी अपने इस शौक और क्षमता का प्रदर्शन करते रहते हैं। पिछले वर्षों में अभिषेक सिंह जी की पुस्तक ‘बैरिकेड‘ आई, रायपुर किताब मेला-2021 में इसके विमोचन में शामिल होने का संयोग बना। इसी तरह नीरज चंद्राकर जी की पुस्तक ‘भारत के रत्न‘ है, जिसके प्रकाशन के लिए अंतिम स्वरूप में आने से ले कर, विमोचन तक जुड़ा रहा। नीरज जी ने पुस्तक के लिए ‘संदेश‘ लिखने के लिए भी मुझे चुना। 7 मार्च 2020 को विमोचन के अवसर पुस्तक में प्रकाशित अपने ‘संदेश‘ के साथ मैंने अपनी बात इस तरह रखी थी- 

ऐसी संतान, जिसे आप जन्म से देख रहे हों, पलते-बढ़ते वह अपने एक मुकाम तक पहुंच जाए, उसका पीओपी- पासिंग आउट परेड हो, उसके बढ़ने-गढ़ने में सारी मेहनत उसकी हो, लेकिन अपनी छाती गर्व से फूल जाती है, नीरज चन्द्राकर की इस पहली कृति के लोकार्पण पर कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है, मोह ऐसा कि अपना सीना भी चौड़ा हो रहा है। 

पहली पुस्तक छपने-छपाने का हाल नीरज बताएंगे ही, जो ऐसा प्रयास कर रहे हों, उनके लिए यह जरूर उपयोगी होगा, थोड़ी सी बात इस पुस्तक ‘भारत के रत्न‘ पर- 


सफलता का पैमाना अलग-अलग होता है। समाज की नजरों में पद-प्रतिष्ठा, नाम-काम-दाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। समाज का यह नजरिया, समाज के सदस्यों की सोच का ही प्रतिबिंब होता है। इस सोच और नजरिये का स्वाभाविक असर मध्यवर्ग के किशोरों पर भी होता है। 

ऐसा नहीं कि प्रतिस्पर्धा अब अधिक है, कमोबेश वह तो हमेशा से है, लेकिन इस दौर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की नैतिकता और उसके आदर्श धूमिल हैं, गलाकाट का बोलबाला है। युवकों के सपने, उनकी महत्वाकांक्षा में अवसर, प्रतिभा और परिश्रम के साथ संयोग की भूमिका निर्णायक होती है। इस क्रम में अपने लक्ष्यों की प्राप्ति और स्वयं को मुकाम पर बनाए रखने के लिए, साध्य के लिए साधन की शुचिता गौण मान ली जाती है। 

गौतम-गांधी और विवेकानंद की सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी भी भौतिकवादी आंकाक्षाओं के मोहपाश में बंधे हुए हैं। जैसा कि किसीने कहा है मानों पूरी सभ्यता ही भौतिक समृद्धि के नर्क में जाने को उतावली है। हमारा वर्तमान समाज और पूरी पीढ़ी इससे अछूती नहीं है, लेकिन आशा की किरण भी यहीं हैं। 

कैरियर का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां अपवाद न हों, लेकिन समाज की सोच को रेखांकित करने के लिए फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, राजनीति चकाचौंध के ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका आकर्षण सर्वाधिक है, जो आज समाज में सर्वाधिक सम्मानित हैं, इसलिए यह हमारी आशाओं-आकांक्षाओं को उभार कर दिखा पाती है। इसके विपरीत फौजी सैनिक, कहीं अधिक विपरीत परिस्थितयों से जूझता, अपना अनिश्चय भरा भविष्य गढ़ने का प्रयास करता रहता है। अनिश्चय सिर्फ सफलता-असफलता का नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु का। 

समाज के सच का, ओझल सा, किन्तु दूसरा सकारात्मक पहलू भी है। निष्ठा, कर्तव्यपरायणता, देशप्रेम जैसी भावना, जो पुरस्कार-प्रसिद्धि के महत्व को स्वीकारते हुए भी उसे प्राथमिक नहीं मानती। ऐसे युवा भी कम नहीं जो त्याग, समर्पण, सेवा को सर्वस्व मानते हुए अपने क्षणिक सुखों को ही नहीं, जीवन भी न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। समाज और ‘बाजार‘ के लिए सफलता की चकाचौंध का बोलबाला चहुं ओर दिखाई देता है, मगर हमारा समाज सकारात्मक सोच और कर्म से ही टिका हुआ है, जिसका प्रतीक हमारे फौजी सैनिक, कर्मयोद्धा हैं, जिनके साथ भविष्य की पवित्र और उज्ज्वल आशा-संभावना भी है। जीवन के अनुभवों का सच, लेखनी से अभिव्यक्त हो कर कहानी बने तो वह मन बहलाव नहीं, बल्कि ऐसी हकीकत होता है, जिसमें परिस्थितियों के झंझावात से जूझती आशा की लौ, न जाने कितनों के जीवन-पथ को आलोकित कर सकती है। भाई नीरज की लेखनी ताजी होते हुए भी प्रामाणिकता, विश्वसनीयता के साथ आस्था से सराबोर है, जिसमें अपेक्षित भविष्य की संभावना अंकुरा रही है।¬¬ 

नीरज चंद्राकर जी की अगली पुस्तक लगभग तैयार थी, अब उसके लिए शुभकामनाओं सहित प्रतीक्षा है।

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