# गांधीजी की तलाश # असमंजस # छत्तीसगढ़ी दानलीला # पवन ऐसा डोलै # त्रिमूर्ति # अमृत नदी # कोरोना में कलाकार # सार्थक यात्राएं # शिकारी राजा चक्रधर # चौपाल # कौन हूँ मैं # छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठ # काजल लगाना भूलना # पितृ-वध # हाशिये पर # राज्‍य-गीत # छत्तीसगढ़ की राजधानियां # ऐतिहासिक छत्‍तीसगढ़ # आसन्न राज्य # सतीश जायसवाल: अधूरी कहानी # साहित्य वार्षिकी # खुमान साव # केदारनाथ सिंह के प्रति # मितान-मितानिन # एक थे फूफा # कहानी - अनादि, अनंत ... # अभिनव # समाकर्षात् # शहर # इमर # पोंड़ी # हीरालाल # हिन्दी का तुक # त्रयी # अखबर खान # स्थान-नाम # पुलिस मितानी # रामचन्द्र-रामहृदय # बलौदा और डीह # धरोहर और गफलत # अस्सी जिज्ञासा # देश, पात्र और काल # सोनाखान, सोनचिरइया और सुनहला छत्‍तीसगढ़ # बनारसी मन-के # राजा फोकलवा # रेरा चिरइ # हरित-लाल # केदारनाथ # भाषा-भास्‍कर # समलैंगिक बाल-विवाह! # लघु रामकाव्‍य # गुलाबी मैना # मिस काल # एक पत्र # विजयश्री, वाग्‍देवी और वसंतोत्‍सव # बिग-बॉस # काल-प्रवाह # आगत-विगत # अनूठा छत्तीसगढ़ # कलचुरि स्थापत्य: पत्र # छत्तीसगढ़ वास्तु - II # छत्तीसगढ़ वास्तु - I # बुद्धमय छत्तीसगढ़ # ब्‍लागरी का बाइ-प्रोडक्‍ट # तालाब परिशिष्‍ट # तालाब # गेदुर और अचानकमार # मौन रतनपुर # राजधानी रतनपुर # लहुरी काशी रतनपुर # रविशंकर # शेष स्‍मृति # अक्षय विरासत # एकताल # पद्म पुरस्कार # राम-रहीम # दोहरी आजादी # मसीही आजादी # यौन-चर्चा : डर्टी पोस्ट! # शुक-लोचन # ब्‍लागजीन # बस्‍तर पर टीका-टिप्‍पणी # ग्राम-देवता # ठाकुरदेव # विवादित 'प्राचीन छत्‍तीसगढ़' # रॉबिन # खुसरा चिरई # मेरा पर्यावरण # सरगुजा के देवनारायण सिंह # देंवता-धामी # सिनेमा सिनेमा # अकलतरा के सितारे # बेरोजगारी # छत्‍तीसगढ़ी # भूल-गलती # ताला और तुली # दक्षिण कोसल का प्राचीन इतिहास # मिक्‍स वेज # कैसा हिन्‍दू... कैसी लक्ष्‍मी! # 36 खसम # रुपहला छत्‍तीसगढ़ # मेला-मड़ई # पुरातत्‍व सर्वेक्षण # मल्‍हार # भानु कवि # कवि की छवि # व्‍यक्तित्‍व रहस्‍य # देवारी मंत्र # टांगीनाथ # योग-सम्‍मोहन एकत्‍व # स्‍वाधीनता # इंदिरा का अहिरन # साहित्‍यगम्‍य इतिहास # ईडियट के बहाने # तकनीक # हमला-हादसा # नाम का दाम # राम की लीला # लोक-मड़ई और जगार # रामराम # हिन्‍दी # भाषा # लिटिल लिटिया # कृष्‍णकथा # आजादी के मायने # अपोस्‍ट # सोन सपूत # डीपाडीह # सूचना समर # रायपुर में रजनीश # नायक # स्‍वामी विवेकानन्‍द # परमाणु # पंडुक-पंडुक # अलेखक का लेखा # गांव दुलारू # मगर # अस्मिता की राजनीति # अजायबघर # पं‍डुक # रामकोठी # कुनकुरी गिरजाघर # बस्‍तर में रामकथा # चाल-चलन # तीन रंगमंच # गौरैया # सबको सन्‍मति... # चित्रकारी # मर्दुमशुमारी # ज़िंदगीनामा # देवार # एग्रिगेटर # बि‍लासा # छत्‍तीसगढ़ पद्म # मोती कुत्‍ता # गिरोद # नया-पुराना साल # अक्षर छत्‍तीसगढ़ # गढ़ धनोरा # खबर-असर # दिनेश नाग # छत्तीसगढ़ की कथा-कहानी # माधवराव सप्रे # नाग पंचमी # रेलगाड़ी # छत्‍तीसगढ़ राज्‍य # छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म # फिल्‍मी पटना # बिटिया # राम के नाम पर # देथा की 'सपनप्रिया' # गणेशोत्सव - 1934 # मर्म का अन्‍वेषण # रंगरेजी देस # हितेन्‍द्र की 'हारिल'# मेल टुडे में ब्‍लॉग # पीपली में छत्‍तीसगढ़ # दीक्षांत में पगड़ी # बाल-भारती # सास गारी देवे # पर्यावरण # राम-रहीम : मुख्तसर चित्रकथा # नितिन नोहरिया बनाम थ्री ईडियट्‌स # सिरजन # अर्थ-ऑवर # दिल्ली-6 # आईपीएल # यूनिक आईडी

Sunday, May 24, 2020

त्रिमूर्ति


बिलासा केंवटिन वाले बिलासपुर से अनाम शबरी वाले शिवरीनारायण के रास्ते में है, त्रिमूर्ति तिराहा या शायद चौराहा। पहले यह मस्ताना चौक के नाम से जाना जाता था। यह नाम क्यों रहा होगा, खुद सोचें, बता कर आपके मन की गुदगुदी कम नहीं करना चाहता। इतना जान लें कि मान-शान में मुकाबला हजरजगंज और लोकनाथ से। कितनी दूर और कितना समय लगेगा? सवाल पूछने वालों से यही कहा जा सकता है कि फिर तो आप न ही जाएं वहां। हिसाब-किताब से मुक्त जाएं, तभी आप उस त्रिमूर्ति तक पहुंच पाएंगे। फिर भी क्लू दिया जा सकता है, रिस्दा के बाद लीलागर नदी का पुल, कुटीघाट, मंगल मवेशी बजार का भांठा, शरणार्थी कैम्प और अब प्लांटेशन वाला, फिर दाहिनी ओर कोनार का गढ़ दिखने लगेगा और बाईं ओर दूर वाली चिमनी, बनाहिल पावर प्लांट की और पास वाली रेमंड, लाफार्ज, निरमा वालों का न्यूवोको, नाम बदलता रहा इस सीमेंट फैक्ट्री का। बस, अब तब है त्रिमूर्ति।

यह कहानी इसी त्रिमूर्ति के आसपास गढ़ी-बुनी गई है, रचयिता है समय, लोग और यह भू-खंड। वैसे भी दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास अधिकतर प्रयोजनमूलक होता है, जबकि सच्चा सांस्कृतिक इतिहास लोक स्मृतियों में ही जीवन्त रहता है, जो समूह-अस्मिता को गढ़ता है। तू कहता कागज की लेखी ..., लेकिन यह तो ठीक-ठीक आंखन देखी भी नहीं, कानन सुनी और कुछ मन में गुनी हुई है।

नरियरा-बनाहिल-झलमला, आरसमेटा-कोनार-कोसा, सोनसरी-रिस्दा-डोंडकी, मुड़पार-मलार, भैंसो-नंदेली-व्यासनगर और मुलमुला, जिस गांव में यह त्रिमूर्ति है। आसपास वीरान गांव मस्तुरीडीह, गोंदाडीह, रोझनडीह, तावनडीह, बोहारडीह और इन सब के बीच आबाद है यह गांव मुलमुला। इस इलाके पर कभी रीझ गई थीं अमृता प्रीतम और इनमें से कुछ गांवों का उल्लेख उनकी कहानी ‘लटिया की छोकरी‘, ‘गांजे की कली‘ में आता है। माना जाता है कि जिस अंदाज की छत्तीसगढ़ी इस आसपास बोली जाती है, वैसी मिठास और सौंदर्य और कहीं नहीं। यह खास तौर पर उल्लेखनीय इसलिए कि ऐसा इन गांवों के लोगों को कहते कभी नहीं सुना, मगर ऐसा ज्यादातर वे मानते हैं, जो इस क्षेत्र से दूर-दराज हैं, अड़ोसी-पड़ोसी कहते ही हैं, जिनमें एक अकलतरा निवासी मैं स्वयं भी हूं।

कुछ बातें त्रिमूर्ति की। तय किया गया कि इस मार्ग संगम पर आसपास की विभूतियों की मूर्ति लगेगी। सबसे पहले तीन निर्विवाद नाम आ गए, लेकिन पूरा अंचल प्रतिभाओं की खान है, इसलिए तय करने में देर होने लगी, किसी ने सुझाया कि दो-तीन मंजिला बना दिया जाए, जिससे हर जाति, वर्ग, दल के महापुरुष एकोमोडेट किए जा सकें। इस तरह तीन का तेरह होने लगा। बहरहाल, हल निकला समय के साथ। इन कुछ गांवों लिए कहा जाता है- नार-फांस नरियरा बसै, फंकट बसै कोनार, काट-कूट कोसा बसै, देवता बसै मलार। आज के कवि अधिकतर बिना तुक की कविताएं रचते हैं, बेतुकी? वे अपने शब्दों पर संदेह करते दिखते हैं और अपनी कविता पर खुद ही भरोसा नहीं कर पाते। सहज विश्वासी लोकमन पर पद्य में कही गई बात का भरोसा जल्दी बैठता है और यदि उसमें तुकबंदी भी हो, जो आमतौर पर बिठाई ही गई होती है तो फिर कहने क्या। इस तरह की पद्य-पंक्ति मानो पत्थर की लकीर। इन गांवों के लिए कही गई ये बातें, परिहास-उपहास का आधार बनती हैं तो इन्हीं से महिमामंडन भी किया जाता है। लोकमन अपनी सुविधा से शब्द और पंक्ति जोड़-घटा, बदल लेता है और व्याख्या भी प्रसंगानुकूल कर लेता है।

इन गांवों में से नरियरा, रिस्दा, कोनार और मुलमुला के क्रमशः ‘भैरो, भोला, भुसउ, भान, ते कर मरम न जानय आन‘ अर्थात् इन चार महानुभावों के मर्म को अन्य कोई नहीं जान सकता। कुछ लोग आन के बजाय भगवान जोड़ते हैं, यानि भगवान ही इनका मर्म जान सकता है ’मरम जानय भगवान‘ या वह भी इनका मर्म नहीं जान सकता ‘न जानय भगवान‘। कभी इरादा होता है, चार खंडों का ग्रंथ बना डालूं, लेकिन वह इन महापुरुषों की महिमा का अनुमान लगाने को भी पर्याप्त न होगा, सोच कर रुक जाता हूं। फिलहाल इनमें से भान सिंह जी का एक प्रसंग, ‘मामूली-सा‘। उन्होंने अपनी संतानों का जैसा विवाह संबंध संभव किया था, वह पूरे विश्व में ज्ञात एकमात्र उदाहरण है। उन्होंने अपनी छह संतानों का ऐसा रिश्ता तय किया कि पिता-पुत्र उनके समधी बने। छह विवाह की तीन पिता-पुत्र समधी जोड़ियां। भानसिंह की पुत्री गुलापी देवी और पुत्र जीतसिंह, जिनका विवाह क्रमशः सिंउढ के चिंता सिंह के पुत्र बोधन सिंह (पत्नी गुलापी देवी) से तथा चिंता सिंह के पुत्र गोलन सिंह की पुत्री कुमारी देवी (पति जीत सिंह) से हुआ। इसी तरह भानसिंह के पुत्र रूप सिंह और पुत्र धीर सिंह, जिनका विवाह क्रमशः हरप्रसाद सिंह की पुत्री कनकलता (पति रूपसिंह) से और हरप्रसाद सिंह के पुत्र केशव कुमार सिंह की पुत्री रंजना देवी (पति धीर सिंह) से हुआ। पुनः भानसिंह की पुत्री शकुंतला देवी और पुत्री करुणा देवी, जिनका विवाह क्रमशः कौशल सिंह के पुत्र हरिहर सिंह (पत्नी शकुंतला देवी) से तथा कौशल सिंह के पुत्र विशेसर सिंह के पुत्र बृजराज शरण सिंह (पत्नी करुणा देवी) से हुआ। इस तरह भान सिंह के समधी बने सिंउढ़ ग्राम के पिता-पुत्र चिंता सिंह और गोलन सिंह, अकलतरा के पिता-पुत्र हरप्रसाद सिंह और केशव कुमार सिंह तथा नरियरा के कौशल सिंह और विशेसर सिंह।

इस अंचल की प्रसिद्धि लीला-नाटक और संगीत के लिए भी रही है। नरियरा में गउद वाले रासधारी दादू सिंह, रायगढ़ घराने के कत्थक गुरू कार्तिकराम का डेरा रहता था। अब सन 1939 का ऐतिहासिक 52 वां कांग्रेस अधिवेशन का प्रसंग, जिसमें गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा कर सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए थे। इस अधिवेशन के लिए स्थान चयन में छत्तीसगढ़ की भी दावेदारी थी, किंतु अंततः त्रिपुरी (जबलपुर) का चयन किया गया, किन्तु कर्ता-धर्ता महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति और सेनापति, जीओसी यानि जनरल आफिसर कमांडिंग, छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल यानि अकलतरा वाले बैरिस्टर साहब थे।

इस अधिवेशन की शोभायात्रा उपसमिति के प्रभारी बैरिस्टर साहब के छोटे भाई कुंवर भुवन भास्कर सिंह थे। बताया जाता है कि शोभायात्रा में 52 हाथी थे, जिसमें सबसे आगे, पहले हाथी पर भास्कर सिंह के जुड़वा कुंवर भुवन भूषण सिंह उर्फ नक्की बाबू, गांधी जी की तस्वीर ले कर बैठे थे। इस शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने भेजे थे। नंदेली के पचकौड़ प्रसाद (इन हारमोनियम वादक को बाजा मास्टर नाम दिया था बैरिस्टर साहब ने, क्योंकि उनके पिता का नाम भी यही ‘पचकौड़‘ था।) संगीत उपसमिति के प्रमुख थे, जिनके नेतृत्व में वंदेमातरम गीत और अन्य सांगीतिक प्रस्तुतियां हुई थीं। चर्चा होती है कि इस दल में भिखारी ठाकुर भी थे, लेकिन बोलबाला इस अंचल के संगीतकारों तबला वादक भान सिंह, इसराज वादक सुखसागर सिंह, वायलिन-सितार वादक हजारी सिंह का था।

आगे कुछ बातें सीधे मुलमुला की माटी यानि आदरणीय भाई साहब रमाकांत सिंह जी उर्फ बाबू साहब वल्द जीत सिंह वल्द भान सिंह की कलम से, जस के तस। (यह मूल उनके फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।) बस नाममात्र को कतर-ब्योंत कर, उनकी अनुमति से प्रस्तुत-

मोर गुरु गटारन

हर युग में छला जाता है शिष्य यदि गुरु द्रोण हो। द्वापर में छला गया एकलव्य और कलियुग में सुखसागर। गुरु रामलखन दास जी वैष्णव, बनारस घराना। कण्ठे महाराज के परम और प्रिय शिष्य। वैष्णव जी का शायद प्रेम, झुकाव ज्यादा भान सिंह की ओर। सुखसागर ददा विनोदी स्वभाव संग स्मरण-कुशाग्र थे। वैष्णव जी के कलादान, ज्ञान के अंतिम वर्षों में मुलमुला में भान सिंह को एक शाम कुंआ के पाट पर बैठ तबला वादन की एक अतिरिक्त कला का गुप्त ज्ञान दे रहे थे। गुरु-शिष्य डूब गए थे, गोधूलि बेला में लय-सुर-ताल में।

ढाबों की पंक्तियां, जामुन, बिही, केला, सीताफल और बंधवा तालाब के पार पर अटी पड़ी गटारन झाड़ियां। जैसे-तैसे रात बीती, सुबह रियाज में भिड़ गये। भानसिंह गुनगुनाते हुए तबले पर चलाने लगे उंगलियां। अचानक इसराज पर वही लय-सुर-ताल झंकृत हो उठे। इधर भान सिंह की उंगलियां तबले पर नाचे, उधर इसराज के तार डोल उठे बोल पर बोल।

रामलखन दास जी मगन थे अपनी सिखाई विद्या पर, किन्तु अचानक बिजली सी कौंधी, माथा सन्न सन्न कर गया। अरे सुखसागर! ए धुन ल तैं कहाँ पाये रे? तो ला कोन सिखोइस?, तोर गुरु कोन? सुखसागर ददा बोले- मोर गुरु गटारन। ‘मोर गुरु गटारन‘, बन गई पहेली। वैष्णव जी बोले मैं समझा नहीं, जरा खुलकर बताओ तो। ये धुन, ये ताल मुलमुला में आखिर तुम्हें किसने सिखाया। सुखसागर ददा ने कहा, गुरुदेव आप भान भैया को ये ताल सिखला रहे थे। हां तो, तब मैं गटारन झाड़ी के नीचे दिशा-मैदान में बैठा था। क्या बोले, अरे भाई मैं दिशा फड़ाका में बैठा था। वैष्णव जी बोले मैं तो बहुत देर तक समझाता रहा ये ताल। तो क्या हुआ, मैं भी आखिरी तक सुनता रहा। मैं भूल गया कि मैं नित्य कर्म के लिए बैठा हूँ। धुन और ताल में इतना खो गया कि सब भूल गया। मुझे याद रहे तो बस वो ताल और धुन संग बोल। बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। और मुझे गटारन के नीचे आपके गुप्त ज्ञान की। अनायास सुखसागर ददा का विनोदी चंचल मन बोल उठा, मोर गुरु गटारन। ये कोई किस्सा नही जीवन के जीवंत पल साक्ष्य सहित। उनके हाथों लिखी पांडुलिपि, सुखसागर ददा के छोटे सुपुत्र भूलन सिंह के पास सुरक्षित है।

एक और संस्मरण। भैया क्रान्तिकुमार सिंह की जुबानी। बनारस घराने की सुप्रसिद्ध नर्तकी विद्याधरी, इसने जीवन पर्यन्त पूज्य कण्ठे महाराज की आराधना की। कण्ठे महाराज की मीरा थी विद्याधरी। घुंघरू बंधे तो बस कण्ठे महाराज के तबले की थाप पर और खुल गये तो फिर कभी बंधे ही नहीं। मोह, मौन और संकल्प भंग होता है। कण्ठे महाराज के शिष्य रहे श्री रामलखन दास वैष्णव जी। रामलखन दास जी के शिष्य रहे मुलमुला परिवार में भानसिंह ’तबला‘ और सुखसागर सिंह ’इसराज‘।

बनारस घराना ने बरसों कूटा और मांजा दोनों भाइयों को। रामलखन दास जी जब आश्वस्त हो गए, तब इन्होंने अपने शिष्यों से कहा बबुआ अब गंगा स्नान करेंगे। एक सुघर दिन गंगा स्नान कर गुरु कण्ठे जी को प्रणाम किया। एक संजोग इंतजार में बैठा था। विद्याधरी अपने घुंघरू उतार गुरु कण्ठे जी के पास बैठी थी। गुरु शिष्य का मिलन और वार्ता रहा होगा अलौकिक। रामलखन दास जी ने कण्ठे महाराज से मिलवाया, ये रहे मेरे शिष्य भान सिंह और सुखसागर सिंह। वैष्णव जी अपनी साधना, अपने गुरु को दिखाना चाहते थे। हठी बैरागी वैष्णव अपने शिष्यों को अँखिया चुका था, चूकना मत ये अवसर, आज नहीं तो कभी नहीं। रामलखन दास जी के मन रही होगी गांठ। विद्याधरी नाचे उसके शिष्यों की ताल और थाप पर। कारण भी ईश्वरीय महिमा ही कहें, विद्याधरी ने जब से होश सम्हाला था तो थिरकी थी गुरु कण्ठे जी की थाप पर, घुंघरू खुले तो उसकी थाप पर।

रामलखन दास जी का आदेश और उबलता खून दौड़ पड़ा। वैष्णव जी का आदेश हुआ, घुँघरु बंधे तो गुरु दक्षिणा पूरी हुई समझो, अन्यथा मेरी गंगा समाधि, मेरा हठ या भाग्य मानो। शुरू करो आठ गुना से, फिर करो सोलह गुना। सोलह गुना पर थोड़ा दौड़ाओ और बत्तीस गुना पर नचाओ। ताल और थाप का ऐसा संगम हुआ कि विद्याधरी के हाथ पड़े हर थाप पर, जांघ पर। पैरों में न जाने कब घुंघरू बंधे। कौन जाने कब पैरों ने थिरकना शुरू किया और कब किसके ताल-लय पर, कौन थिरका, थमा। उस संस्मरण की गूंज आज भी थिरकती है कानों में। कण्ठे महाराज को गुरु दक्षिणा मिली वैष्णव जी से। और वैष्णव जी भर पाए गुरु दक्षिणा मुलमुला से। रामलखन दास जी बोले कण्ठे महाराज जी से महाराज जी! ये ससुर हमको मलमल का धोती आउ कुर्ता दिए थे। फिन भुछि दक्षिना नहीं दिए थे न, आज मन गदगदा गया, मिल गया सब्बे कुछउ।

9 comments:

  1. बहुत रोचक। भाई रमाकांत ने अपनी बातें फेसबुक में भी डाली हैं।

    ReplyDelete
  2. लोक संस्कृति इतिहास स्वतंत्रता संग्राम क्षेत्रीय भूगोल के साथ कथा में प्रवाह बनाए रखना आपके बूते ही है एक बार में ही पूरा पढ़ गया बधाई हो पोस्ट की.

    बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा और लगा कि बीच में पढ़ना क्यों छूट गया था

    ReplyDelete
  3. वाह !!!

    फाल्गुनी��

    ReplyDelete
  4. वाह!!!

    फाल्गुनी����

    ReplyDelete
  5. जाने-पहचाने गांव के कई अनजाने किस्से.कितना खूबसूरत,कितना सहज लिखते हैं आप.

    ReplyDelete
  6. अमृता प्रीतम वाली बात पर विश्वास नही होता।क्या वो कभी छत्तीसगढ़ आयी थी।

    ReplyDelete