Sunday, May 24, 2020

त्रिमूर्ति से त्रिपुरी-1939

बिलासा केंवटिन वाले बिलासपुर से अनाम शबरी वाले शिवरीनारायण के रास्ते में है, त्रिमूर्ति तिराहा या शायद चौराहा। पहले यह मस्ताना चौक के नाम से जाना जाता था। यह नाम क्यों रहा होगा, खुद सोचें, बता कर आपके मन की गुदगुदी कम नहीं करना चाहता। इतना जान लें कि मान-शान में मुकाबला हजरतगंज और लोकनाथ से। कितनी दूर और कितना समय लगेगा? सवाल पूछने वालों से यही कहा जा सकता है कि फिर तो आप न ही जाएं वहां। हिसाब-किताब से मुक्त जाएं, तभी आप उस त्रिमूर्ति तक पहुंच पाएंगे। फिर भी क्लू दिया जा सकता है, रिस्दा के बाद लीलागर नदी का पुल, कुटीघाट, मंगल मवेशी बजार का भांठा, शरणार्थी कैम्प और अब प्लांटेशन वाला, फिर दाहिनी ओर कोनार का गढ़ दिखने लगेगा और बाईं ओर दूर वाली चिमनी, बनाहिल पावर प्लांट की और पास वाली रेमंड, लाफार्ज, निरमा वालों का न्यूवोको, नाम बदलता रहा इस सीमेंट फैक्ट्री का। बस, अब तब है त्रिमूर्ति।

यह कहानी इसी त्रिमूर्ति के आसपास गढ़ी-बुनी गई है, रचयिता है समय, लोग और यह भू-खंड। वैसे भी दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास अधिकतर प्रयोजनमूलक होता है, जबकि सच्चा सांस्कृतिक इतिहास लोक स्मृतियों में ही जीवन्त रहता है, जो समूह-अस्मिता को गढ़ता है। तू कहता कागज की लेखी ..., लेकिन यह तो ठीक-ठीक आंखन देखी भी नहीं, कानन सुनी और कुछ मन में गुनी हुई है।

नरियरा-बनाहिल-झलमला, आरसमेटा-कोनार-कोसा, सोनसरी-रिस्दा-डोंडकी, मुड़पार-मलार, भैंसो-नंदेली-व्यासनगर और मुलमुला, जिस गांव में यह त्रिमूर्ति है। आसपास वीरान गांव मस्तुरीडीह, गोंदाडीह, रोझनडीह, तावनडीह, बोहारडीह और इन सब के बीच आबाद है यह गांव मुलमुला। इस इलाके पर कभी रीझ गई थीं अमृता प्रीतम और इनमें से कुछ गांवों का उल्लेख उनकी कहानी ‘लटिया की छोकरी‘, ‘गांजे की कली‘ में आता है। माना जाता है कि जिस अंदाज की छत्तीसगढ़ी इस आसपास बोली जाती है, वैसी मिठास और सौंदर्य और कहीं नहीं। यह खास तौर पर उल्लेखनीय इसलिए कि ऐसा इन गांवों के लोगों को कहते कभी नहीं सुना, मगर ऐसा ज्यादातर वे मानते हैं, जो इस क्षेत्र से दूर-दराज हैं, अड़ोसी-पड़ोसी कहते ही हैं, जिनमें एक अकलतरा निवासी मैं स्वयं भी हूं।

कुछ बातें त्रिमूर्ति की। तय किया गया कि इस मार्ग संगम पर आसपास की विभूतियों की मूर्ति लगेगी। सबसे पहले तीन निर्विवाद नाम आ गए, लेकिन पूरा अंचल प्रतिभाओं की खान है, इसलिए तय करने में देर होने लगी, किसी ने सुझाया कि दो-तीन मंजिला बना दिया जाए, जिससे हर जाति, वर्ग, दल के महापुरुष एकोमोडेट किए जा सकें। इस तरह तीन का तेरह होने लगा। बहरहाल, हल निकला समय के साथ। इन कुछ गांवों लिए कहा जाता है- नार-फांस नरियरा बसै, फंकट बसै कोनार, काट-कूट कोसा बसै, देवता बसै मलार। आज के कवि अधिकतर बिना तुक की कविताएं रचते हैं, बेतुकी? वे अपने शब्दों पर संदेह करते दिखते हैं और अपनी कविता पर खुद ही भरोसा नहीं कर पाते। सहज विश्वासी लोकमन पर पद्य में कही गई बात का भरोसा जल्दी बैठता है और यदि उसमें तुकबंदी भी हो, जो आमतौर पर बिठाई ही गई होती है तो फिर कहने क्या। इस तरह की पद्य-पंक्ति मानो पत्थर की लकीर। इन गांवों के लिए कही गई ये बातें, परिहास-उपहास का आधार बनती हैं तो इन्हीं से महिमामंडन भी किया जाता है। लोकमन अपनी सुविधा से शब्द और पंक्ति जोड़-घटा, बदल लेता है और व्याख्या भी प्रसंगानुकूल कर लेता है।

इन गांवों में से नरियरा, रिस्दा, कोनार और मुलमुला के क्रमशः ‘भैरो, भोला, भुसउ, भान, ते कर मरम न जानय आन‘ अर्थात् इन चार महानुभावों के मर्म को अन्य कोई नहीं जान सकता। कुछ लोग आन के बजाय भगवान जोड़ते हैं, यानि भगवान ही इनका मर्म जान सकता है ’मरम जानय भगवान‘ या वह भी इनका मर्म नहीं जान सकता ‘न जानय भगवान‘। कभी इरादा होता है, चार खंडों का ग्रंथ बना डालूं, लेकिन वह इन महापुरुषों की महिमा का अनुमान लगाने को भी पर्याप्त न होगा, सोच कर रुक जाता हूं। फिलहाल इनमें से भानसिंह जी का एक प्रसंग, ‘मामूली-सा‘। उन्होंने अपनी संतानों का जैसा विवाह संबंध संभव किया था, वह पूरे विश्व में ज्ञात एकमात्र उदाहरण है। उन्होंने अपनी छह संतानों का ऐसा रिश्ता तय किया कि पिता-पुत्र उनके समधी बने। छह विवाह की तीन पिता-पुत्र समधी जोड़ियां। भानसिंह की पुत्री गुलापी देवी और पुत्र जीतसिंह, जिनका विवाह क्रमशः सिंउढ के चिंता सिंह के पुत्र बोधन सिंह (पत्नी गुलापी देवी) से तथा चिंता सिंह के पुत्र गोलन सिंह की पुत्री कुमारी देवी (पति जीत सिंह) से हुआ। इसी तरह भानसिंह के पुत्र रूप सिंह और पुत्र धीर सिंह, जिनका विवाह क्रमशः हरप्रसाद सिंह की पुत्री कनकलता (पति रूपसिंह) से और हरप्रसाद सिंह के पुत्र केशव कुमार सिंह की पुत्री रंजना देवी (पति धीर सिंह) से हुआ। पुनः भानसिंह की पुत्री शकुंतला देवी और पुत्री करुणा देवी, जिनका विवाह क्रमशः कौशल सिंह के पुत्र हरिहर सिंह (पत्नी शकुंतला देवी) से तथा कौशल सिंह के पुत्र विशेसर सिंह के पुत्र बृजराज शरण सिंह (पत्नी करुणा देवी) से हुआ। इस तरह भान सिंह के समधी बने सिंउढ़ ग्राम के पिता-पुत्र चिंता सिंह और गोलन सिंह, अकलतरा के पिता-पुत्र हरप्रसाद सिंह और केशव कुमार सिंह तथा नरियरा के कौशल सिंह और विशेसर सिंह।

इस अंचल की प्रसिद्धि लीला-नाटक और संगीत के लिए भी रही है। नरियरा में गउद वाले रासधारी दादू सिंह, रायगढ़ घराने के कत्थक गुरू कार्तिकराम का डेरा रहता था। अब सन 1939 का ऐतिहासिक 52 वां कांग्रेस अधिवेशन का प्रसंग, जिसमें गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा कर सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए थे। इस अधिवेशन के लिए स्थान चयन में छत्तीसगढ़ की भी दावेदारी थी, किंतु अंततः त्रिपुरी (जबलपुर) का चयन किया गया, किन्तु कर्ता-धर्ता महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति और सेनापति, जीओसी यानि जनरल आफिसर कमांडिंग, छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल यानि अकलतरा वाले बैरिस्टर साहब थे।

इस अधिवेशन में याद किया गया कि इसके पहले 1926 के गोहाटी अधिवेशन में हाथियों की शोभायात्रा निकाली गई थी, लेकिन यह हाथी बहुल असम में हुआ था। बैरिस्टर साहब ने इस बावनवें अधिवेशन को भव्य और यादगार बनाने के लिए 52 हाथियों की शोभायात्रा का कठिन संकल्प ले लिया, जिसकी पूर्ति के लिए शोभायात्रा उपसमिति के प्रभारी बैरिस्टर साहब के छोटे भाई कुंवर भुवन भास्कर सिंह ने जी-तोड़ प्रयास कर, इसे संभव बनाया। शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने स्वयं के खर्च पर भेजे थे। इसके अतिरिक्त रीवां महाराज और उनके माध्यम से विभिन्न रजवाड़ों और जमींदारियों से हाथी आए थे। इसमें बघेलखंड कांग्रेस कमेटी का योगदान भी उल्लेखनीय था। प्रसंगवश, सुश्री डॉ. कुन्तल गोयल ने मध्यप्रदेश सन्देश में ‘इतिहास के पृष्ठों को समेटे सरगुजा की वनश्री‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख में बताया है- ‘स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिए रांची भिजवाए थे।‘ संभवतः यह जानकारी 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन से संबंधित है, इससे लगता है कि कांग्रेस अधिवेशनों में हाथियों की शोभायात्रा का चलन हो गया था। 

इस शोभायात्रा में सबसे आगे, पहले हाथी पर गांधी जी और अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस की तस्वीर ले कर कुंवर भुवन भास्कर सिंह के जुड़वा कुंवर भुवन भूषण सिंह उर्फ नक्की बाबू बैठे थे। नंदेली के पचकौड़ प्रसाद (इन हारमोनियम वादक को बाजा मास्टर नाम दिया था बैरिस्टर साहब ने, क्योंकि उनके पिता का नाम भी यही ‘पचकौड़‘ था।) संगीत उपसमिति के प्रमुख थे, जिनके नेतृत्व में वंदेमातरम गीत और पं. लोचन प्रसाद पांडेय द्वारा रचित स्वागत गान जैसी सांगीतिक प्रस्तुतियां हुई थीं। चर्चा होती है कि इस दल में भिखारी ठाकुर भी थे, लेकिन बोलबाला इस अंचल के संगीतकारों तबला वादक भान सिंह, इसराज वादक सुखसागर सिंह, वायलिन-सितार वादक हजारी सिंह का था।
हाथियों वाली शोभायात्रा

पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने स्वागत गान की रचना तथा त्रिपुरी कांग्रेस के संस्मरण को अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह दर्ज किया है-

एक दिन प्रातः मैं ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर (बार एट-ला) से मिलने उनके बिलासपुर स्थित निवास पर गया। उन दिनों वे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उन्होंने सस्नेह मेरा स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ी में कहा- ‘महराज मैं आज चिट्ठी भेजवैया रहें।‘ त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के लिए एक स्वागतगान की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा- ‘इस कार्य को आपके अतिरिक्त और कौन अच्छी तरह कर सकता है।‘ थोड़ी देर मौन रह कर मैंने उत्तर दिया- ‘बैरिस्टर साहब, मैं तो अब हिन्दी पद्य रचना बन्द कर दिये हेंव‘ इस पर उन्होंने कहा कि - मैं अपने प्रांत की ओर से आपसे इस कार्य का भार ग्रहण करने का अनुरोध करता हूं। मैंने प्रत्युत्तर में कहा कि चूँकि यह आदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का है अतः मैं इसका पालन करूंगा; लेकिन मुझे भय है कि कहीं मेरी कविता उच्च कोटि की न बन सके।‘ इस पर वे हँस पड़े और मैंने उनसे विदा ली।

घर लौट कर मैंने बैरिस्टर साहब की इच्छानुसार हिन्दी में कुछ पंक्तियां लिखीं पर वे मुझे उच्चकोटि की प्रतीत नहीं हुई। उचित समय पर मैंने इन पंक्तियों को बैरिस्टर साहब के पास उनका अभिमत जानने के लिए भेज दिया।... ... ...त्रिपुरी में मेरी भेंट श्री छेदीलाल जी, शुक्ल जी, महंत जी, मिश्र जी सेठ गोविंद दास तथा अन्य कांग्रेस जनों से हुई। ये सभी महानुभाव अधिवेशन के प्रबंध एवं स्वागत कार्यों में जुटे हुए थे। महंत जी ने मुझे बताया कि स्वागत समिति ने कांग्रेस के खुले अधिवेशन में गाए जाने के लिए मेरा स्वागत गान स्वीकृत कर लिया है। यह खबर सुन मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर का भी मैं आभारी था क्योंकि उन्होंने ही तो स्वागत गान लिखने के लिए मुझे आदेशित किया था।... ... ...महात्मा जी उस समय तक नहीं पधारे थे। अध्यक्ष गंभीर रूप से अस्वस्थ्य होने के कारण कलकत्ते में रोग-शैय्या पर पड़े थे। अध्यक्ष के स्वागत तथा जुलूस के लिए 56 से अधिक हाथी पहुंच चुके थे।... ... ...जब हम रौशनियों से जगमगाती दुकानों और पुस्तक विक्रेताओं के स्टालों का निरीक्षण कर रहे थे तभी यह शोर उठा कि एक हाथी अनियंत्रित हो गया है तथा दुकानों को तोड़ रहा है। हम लोग असमंजस में पड़ गये। लेकिन तुरंत ही खबर आई कि हाथी नियंत्रण में आ गया है तथा किसी प्रकार घबड़ाने की जरुरत नहीं है । इस सूचना से हमें राहत मिली।... ... ...ऐसा ज्ञात हुआ था कि त्रिपुरी कांग्रेस के प्रथम दिन के सभी कार्यक्रमों को न केवल अभिलिखित किया गया था बल्कि उनका चलचित्र भी उतारा गया था।

त्रिपुरी कांग्रेस के खुले अधिवेशन (1939) में गाया गया स्वागत गान

त्रिपुरी आज मुदित महान
महाकोशल चेदि मेकल हुए गौरववान
राष्ट्रपति भारत हृदय मणि विश्वबंधु प्रधान
सत्य समता अहिंसा के दिव्य दूत महान
यहां पधारे साथ लेकर भारत-भू भगवान
बुद्ध-ईसा-कृष्ण के तप-योग-बल बलवान
पुण्य आश्रम शर्मदा शुभ नर्मदा वरदान
युद्ध ज्वाला से लहे संसार अपना त्राण
पधारो भारत के यश चंद
तव सुभाष की सुधा लाभ कर कटे जाति दुख द्वन्द
वसुधा-हो वसु-पूर्ण प्रेम मय, मानवता स्वच्छंद
दुर्गावती-वीरता-केतन त्रिपुरी-शौर्य-अमन्द
रेवा जल से चरण पखारे ले सेवा आनंद

गान

त्रिपुरी करत स्वागत गान
जयति भारत विश्व हित रत जयति हिन्दुस्तान
अंग, बंग, कलिंग स्वागत शौर्य शक्ति निधान
सिन्धु-गुर्जर द्रविड़ उत्कल कला-कौशलवान
हस्तिना, काशी, अयोध्या, द्वारका गुण खान
समुद्र स्वागत पंचनद-भू कामरूप महान
हृदय सिंहासन बिछे हैं कर रहे आह्वान
नर्मदा तट महाकोशल बने गौरव-वान
वीर नन्द-आर्य ललना शक्ति केतन प्रधान
भूमि यह दुर्गावती की धन्य आज महान
कलचुरी हैहय महीपों का सुराज विधान
लखे नव ऋषि राज का नव-युग ‘स्वराज‘ विहान

पं. लोचनप्रसाद जी ने इंडियन हिस्टारिकल रिकार्ड कमीशन के कलकत्ता अधिवेशन 1938 के संस्मरण में ‘त्रिपुरी‘ से संबंधित एक अनूठा अविश्वसनीय प्रसंग का उल्लेख किया है कि हिस्ट्री कांग्रेस अधिवेशन के प्रतिनिधियों के लिए आयोजित स्टीमर विहार में ‘जगत विख्यात जादूगर पी.सी. सरकार हमारे मनोरंजनार्थ स्टीमर पर उपस्थित थे। उन्हांेने जादू के अद्भुत और आश्चर्यजनक खेलों का प्रदर्शन किया। हममें से कोई भी व्यक्ति ब्लैक बोर्ड पर अपनी इच्छा से कुछ भी लिखता था और श्री सरकार जो कि न केवल ब्लैकबोर्ड की ओर पीठ किये हुए थे बल्कि अपनी आंखों पर पट्टी भी बांधे हुए थे, उसे पढ़ते और उसका अर्थ बताते थे। यह हमारे लिए विस्मयकारी था। मैंने ब्लैकबोर्ड पर 300 ईसापूर्व की ब्राह्मी लिपि में ‘त्रिपुरी‘ लिखा। श्री सरकार से तुरंत उत्तर आया- “पिछले वर्ष के कांग्रेस अधिवेशन का स्थल, जिसके जुलूस में 56 हाथी थे“ वहां उपस्थित सभी विद्वान श्री सरकार की योग शक्ति पर चकित हो गये। (यहां तिथि के उल्लेख में चूक दिखती है, क्योंकि त्रिपुरी कांग्रेस का वर्ष 1939, इस अधिवेशन के साल 1938 के बाद का है!)
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आगे कुछ बातें सीधे मुलमुला की माटी यानि आदरणीय भाई साहब रमाकांत सिंह जी उर्फ बाबू साहब वल्द जीत सिंह वल्द भान सिंह की कलम से, जस के तस। (यह मूल उनके फेसबुक पेज पर देख सकते हैं।) बस नाममात्र को कतर-ब्योंत कर, उनकी अनुमति से प्रस्तुत-

मोर गुरु गटारन

हर युग में छला जाता है शिष्य यदि गुरु द्रोण हो। द्वापर में छला गया एकलव्य और कलियुग में सुखसागर। गुरु रामलखन दास जी वैष्णव, बनारस घराना। कण्ठे महाराज के परम और प्रिय शिष्य। वैष्णव जी का शायद प्रेम, झुकाव ज्यादा भान सिंह की ओर। सुखसागर ददा विनोदी स्वभाव संग स्मरण-कुशाग्र थे। वैष्णव जी के कलादान, ज्ञान के अंतिम वर्षों में मुलमुला में भान सिंह को एक शाम कुंआ के पाट पर बैठ तबला वादन की एक अतिरिक्त कला का गुप्त ज्ञान दे रहे थे। गुरु-शिष्य डूब गए थे, गोधूलि बेला में लय-सुर-ताल में।

ढाबों की पंक्तियां, जामुन, बिही, केला, सीताफल और बंधवा तालाब के पार पर अटी पड़ी गटारन झाड़ियां। जैसे-तैसे रात बीती, सुबह रियाज में भिड़ गये। भानसिंह गुनगुनाते हुए तबले पर चलाने लगे उंगलियां। अचानक इसराज पर वही लय-सुर-ताल झंकृत हो उठे। इधर भान सिंह की उंगलियां तबले पर नाचे, उधर इसराज के तार डोल उठे बोल पर बोल।

रामलखन दास जी मगन थे अपनी सिखाई विद्या पर, किन्तु अचानक बिजली सी कौंधी, माथा सन्न सन्न कर गया। अरे सुखसागर! ए धुन ल तैं कहाँ पाये रे? तो ला कोन सिखोइस?, तोर गुरु कोन? सुखसागर ददा बोले- मोर गुरु गटारन। ‘मोर गुरु गटारन‘, बन गई पहेली। वैष्णव जी बोले मैं समझा नहीं, जरा खुलकर बताओ तो। ये धुन, ये ताल मुलमुला में आखिर तुम्हें किसने सिखाया। सुखसागर ददा ने कहा, गुरुदेव आप भान भैया को ये ताल सिखला रहे थे। हां तो, तब मैं गटारन झाड़ी के नीचे दिशा-मैदान में बैठा था। क्या बोले, अरे भाई मैं दिशा फड़ाका में बैठा था। वैष्णव जी बोले मैं तो बहुत देर तक समझाता रहा ये ताल। तो क्या हुआ, मैं भी आखिरी तक सुनता रहा। मैं भूल गया कि मैं नित्य कर्म के लिए बैठा हूँ। धुन और ताल में इतना खो गया कि सब भूल गया। मुझे याद रहे तो बस वो ताल और धुन संग बोल। बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। और मुझे गटारन के नीचे आपके गुप्त ज्ञान की। अनायास सुखसागर ददा का विनोदी चंचल मन बोल उठा, मोर गुरु गटारन। ये कोई किस्सा नही जीवन के जीवंत पल साक्ष्य सहित। उनके हाथों लिखी पांडुलिपि, सुखसागर ददा के छोटे सुपुत्र भूलन सिंह के पास सुरक्षित है।

एक और संस्मरण। भैया क्रान्तिकुमार सिंह की जुबानी। बनारस घराने की सुप्रसिद्ध नर्तकी विद्याधरी, इसने जीवन पर्यन्त पूज्य कण्ठे महाराज की आराधना की। कण्ठे महाराज की मीरा थी विद्याधरी। घुंघरू बंधे तो बस कण्ठे महाराज के तबले की थाप पर और खुल गये तो फिर कभी बंधे ही नहीं। मोह, मौन और संकल्प भंग होता है। कण्ठे महाराज के शिष्य रहे श्री रामलखन दास वैष्णव जी। रामलखन दास जी के शिष्य रहे मुलमुला परिवार में भानसिंह ’तबला‘ और सुखसागर सिंह ’इसराज‘।

बनारस घराना ने बरसों कूटा और मांजा दोनों भाइयों को। रामलखन दास जी जब आश्वस्त हो गए, तब इन्होंने अपने शिष्यों से कहा बबुआ अब गंगा स्नान करेंगे। एक सुघर दिन गंगा स्नान कर गुरु कण्ठे जी को प्रणाम किया। एक संजोग इंतजार में बैठा था। विद्याधरी अपने घुंघरू उतार गुरु कण्ठे जी के पास बैठी थी। गुरु शिष्य का मिलन और वार्ता रहा होगा अलौकिक। रामलखन दास जी ने कण्ठे महाराज से मिलवाया, ये रहे मेरे शिष्य भान सिंह और सुखसागर सिंह। वैष्णव जी अपनी साधना, अपने गुरु को दिखाना चाहते थे। हठी बैरागी वैष्णव अपने शिष्यों को अँखिया चुका था, चूकना मत ये अवसर, आज नहीं तो कभी नहीं। रामलखन दास जी के मन रही होगी गांठ। विद्याधरी नाचे उसके शिष्यों की ताल और थाप पर। कारण भी ईश्वरीय महिमा ही कहें, विद्याधरी ने जब से होश सम्हाला था तो थिरकी थी गुरु कण्ठे जी की थाप पर, घुंघरू खुले तो उसकी थाप पर।

रामलखन दास जी का आदेश और उबलता खून दौड़ पड़ा। वैष्णव जी का आदेश हुआ, घुँघरु बंधे तो गुरु दक्षिणा पूरी हुई समझो, अन्यथा मेरी गंगा समाधि, मेरा हठ या भाग्य मानो। शुरू करो आठ गुना से, फिर करो सोलह गुना। सोलह गुना पर थोड़ा दौड़ाओ और बत्तीस गुना पर नचाओ। ताल और थाप का ऐसा संगम हुआ कि विद्याधरी के हाथ पड़े हर थाप पर, जांघ पर। पैरों में न जाने कब घुंघरू बंधे। कौन जाने कब पैरों ने थिरकना शुरू किया और कब किसके ताल-लय पर, कौन थिरका, थमा। उस संस्मरण की गूंज आज भी थिरकती है कानों में। कण्ठे महाराज को गुरु दक्षिणा मिली वैष्णव जी से। और वैष्णव जी भर पाए गुरु दक्षिणा मुलमुला से। रामलखन दास जी बोले कण्ठे महाराज जी से महाराज जी! ये ससुर हमको मलमल का धोती आउ कुर्ता दिए थे। फिन भुछि दक्षिना नहीं दिए थे न, आज मन गदगदा गया, मिल गया सब्बे कुछउ।


14 comments:

  1. बहुत रोचक। भाई रमाकांत ने अपनी बातें फेसबुक में भी डाली हैं।

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  2. लोक संस्कृति इतिहास स्वतंत्रता संग्राम क्षेत्रीय भूगोल के साथ कथा में प्रवाह बनाए रखना आपके बूते ही है एक बार में ही पूरा पढ़ गया बधाई हो पोस्ट की.

    बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा और लगा कि बीच में पढ़ना क्यों छूट गया था

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  3. वाह !!!

    फाल्गुनी��

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  4. वाह!!!

    फाल्गुनी����

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  5. जाने-पहचाने गांव के कई अनजाने किस्से.कितना खूबसूरत,कितना सहज लिखते हैं आप.

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  6. अमृता प्रीतम वाली बात पर विश्वास नही होता।क्या वो कभी छत्तीसगढ़ आयी थी।

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  7. वाह ! बहुत सुंदर ,छोटे बाबू साहब की जुगलबंदी तो महफिल लूट ले गई 👌

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  8. वाह..। बहुत शानदार,ऐतिहासिक और गौरवशाली संस्मरण।हमारे क्षेत्र के विभूतियों और आला दर्जे की प्रतिभाओं का बहुत रोचक वर्णन किया है भैया आपने...��������

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  9. बहुत ही बढ़िया लेख। लग रहा था पढ़ता ही रहुं।

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  10. वाह,गौरवशाली संस्मरण 🙏🙏🙏

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  11. Alok Kumar ChandelMarch 2, 2022 at 10:14 PM

    अद्भुत ,अकथनीय सिर्फ पठनीय। मेरे शब्द बोने पड़ रहे हैं इसलिए कबीर वाणी में अपनी बात कहना चाहता हूं - "गूंगे केरी शर्करा खाई और मुस्काई"

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