नन्ददुलारे बाजपेयी की किताब ‘हिन्दी साहित्य की बीसवीं शताब्दी‘ किताब देखते हुए बार-बार ध्यान जाता है कि कृति और रचनाकार को का महत्व रेखांकित करते उसे पूरा सम्मान देते, गंभीर और स्पष्ट असहमतियों वाले समीक्षक हैं। उनकी इस किताब का संशोधित और परिवर्धित संस्करण 1987 देख रहा हूं। 1.1.1993 तिथि अंकित पुस्तक के आरंभिक ‘वक्तव्य‘ में उल्लेख है कि आज से 20-22 वर्ष पहले यह पुस्तक प्रथम बार प्रकाशित हुई थी। इस वक्तव्य में वे लिखते हैं कि इसकी अमित प्रशंसा हुई थी और दूसरी ओर इसका प्रबल विरोध हुआ था ... इसकी-सी स्पष्टभाषिता मेरी परवर्ती पुस्तकों में इस मात्रा में नहीं पाई जाती। ‘विज्ञप्ति‘ में स्वयं पर टिप्पणी करते हैं कि ‘महत्त्वाकांक्षावश मैंने इसका नाम ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी‘ रख दिया है ... अभी तक इस शताब्दी के आधे वर्ष भी व्यतीत नहीं हुए हैं।‘ इसी विज्ञप्ति में वे सूत्ररूप में साहित्य-समीक्षा संबंधी अपनी प्रयास-दिशा के सात बिंदुओं का उल्लेख महत्व-क्रम में करते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख ‘रचना में कवि की अन्तर्वृत्तियों (मानसिक उत्कर्ष-अपकर्ष) का अध्ययन और अंतिम सातवां ‘काव्य के जीवन संबंधी सामंजस्य और संदेश का अध्ययन‘ को रखा है।
पुस्तक का विशेष उल्लेखनीय अध्याय ‘प्रेमचंद‘, चौंकाने वाला है, उनकी समीक्षा-तेवर के कुछ अंश, जिसका आरंभ इस प्रकार होता है- ‘प्रेमचन्दजी की निन्दास्तुति तो एक अच्छी मात्रा में की जा चुकी है, पर उनकी साहित्यकला का अध्ययन करके अभी किसी ने नहीं देखा। यह प्रेमचन्दजी का दुर्भाग्य है कि वे हिन्दी के ऐसे युग में उत्पन्न हुए हैं, जिसने उन्हें उपन्यास सम्राट् की उपाधि दे रखी है, पर शास्त्र की विधि से उनका अभिषेक नहीं किया। यह विडंबना आधुनिक ‘राजबहादुर‘ आदि की आनरेरी डिग्री से कम व्यंगपूर्ण नहीं है, अपितु यह दुखद और ग्लानिजनक भी है। यह एक अच्छा खासा प्रहसन है कि लोग आपको उपाधि देकर चुपचाप खिसक गये हैं और दबककर आपका तमाशा देख रहे हैं। इससे तो आपके विरोधी ही अच्छे, जो आपके साथ विश्वासघात तो नहीं करते। उन्होंने कहा कि आपको स्त्री-चरित्र का चित्रण करने में सफलता नहीं मिली, आप अपने उपन्यासों के अन्त में प्रचारक बन जाते हैं, जिसमें पाठक कृत्रिमता का अनुभव करता है, आप ब्राह्मणों के विपक्षी है, आपको भाषा का बहुत ही साधारण ज्ञान है, आदि आदि।‘ ... ऐसे ही समीक्षकों ने प्रेमचन्दजी को उपन्यास सम्राट् का खिताब देकर उनका उपकार करना चाहा और प्रेमचन्दजी भी फिलहाल उनके कृतज्ञतापाश में बंधे हुए हैं।‘
इस अध्याय में आगे ‘आत्म-कथा - एक विवाद‘ वाले पन्ने हैं। जिसका अंश- ‘प्रेमचन्दजी के उपन्यास उनकी प्रोपेगेण्डा-वृत्ति के कारण काफी बदनाम हैं और हिन्दी के बड़े-से-बड़े समीक्षक ने उसकी शिकायत की है। वही वृत्ति उनके इस लेख में भी प्रसार पा रही है। यद्यपि प्रेमचन्दजी लिखते हैं कि श्हमने तो कभी प्रोपेगेण्डा नहीं किया, हमारा बड़ा-सा बड़ा दुश्मन भी हमारे ऊपर यह आक्षेप नहीं कर सकता; पर प्रेमचन्दजी के सभी समीक्षक जानते हैं कि उनका सबसे बड़ा दोष जो उनकी साहित्य-कला को कलुषित करने में समर्थ हुआ है यही प्रोपेगेण्डा है। यदि प्रेमचन्दजी बिल्कुल ही भोले-भाले न बनें, तो वह अपने विरुद्ध इस प्रकार का आरोप एक नहीं अनेक बार सुन चुके होंगे, पढ़ चुके होंगे और हृदय की थाह लगाकर देख भी चुके होंगे।‘ पाद टिप्पणी में बताया गया है कि आप दोनों के बीच साहित्यिक उत्तर-प्रत्युत्तर हुआ था, जिससे प्रेमचन्दजी के साहित्य संबंधी विचारों पर प्रकाश पड़ता है। उसके आवश्यक अंश दिये जा रहे हैं।
आगे ‘उत्तर-प्रत्युत्तर है, जिसका समापन नन्ददुलारे जी इस तरह करते हैं- ‘अन्त में मुझे यह समझकर मनोरंजनयुक्त विस्मय होता है कि जिस मूल-वस्तु को लेकर यह सम्पूर्ण विवाद हुआ, वह ‘हंस‘ का तथाकथित ‘आत्मकथांक‘ वास्तव में ‘आत्मकथा‘ नहीं ‘संस्मरणांक‘ के रूप में निकला है। यदि इसका विज्ञापन करनेवाले इस विभेद का ध्यान रखकर ‘संस्मरणांक‘ के नाम से विज्ञापन करते तो शायद इतना तूफ़ान उठने की नौबत ही न आती। तथापि ‘आत्मकथा‘ के विषय में प्रेमचन्दजी की बातें सुनने, अपनी बातें कहने और अनेक आदरणीय हिन्दी-लेखकों और कवियों की बातें जानने का मुझे जो सुअवसर प्राप्त हुआ, उसका श्रेय 'हंस' के तथाविज्ञापित ‘आत्मकथांक‘ को ही है। हिन्दी-जनता का इस कहा-सुनी से जो मनोरंजन हुआ और मुझे सूचना मिली है कि उसका पर्याप्त मनोरंजन हुआ हैं वह अलग।
व्यक्तिगत सम्बन्ध का विचार कर ऊपर मैं जो कुछ कह चुका है, आशा है, उसके बाद अब मुझे प्रेमचन्दजी से क्षमा-प्रार्थना की आवश्यकता नहीं रही। मैं तो उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब पिछली बार लखनऊ में दिए हुए अपने वचन के अनुसार प्रेमचन्दजी प्रयाग आकर मुझे दर्शन देंगे और मेरे अथिति बनेंगे।’
प्रसंगवश-
दौर था जब विवाद कोई भी हो, गांधीजी की ‘अदालत‘ में पहुंच जाता था। इनमें से एक, बच्चन की ‘मधुशाला‘ का बताया जाता है कि गांधी ने इसकी आलोचना के बजाय यह कहते हुए समर्थन दिया था कि साहित्य पैम्फलेट नहीं होता, वह तो ऐसी ही होता है। इसी तरह एक प्रसिद्ध विवाद उग्र के ‘चाकलेट-घासलेट‘ वाला था, बनारसीदास चतुर्वेदी ने इससे गांधीजी को अवगत कराते हुए टिप्पणी की अपेक्षा की थी। गांधीजी ने उन्हें 10 अक्टूबर 1928 को पत्र लिखा, कुछ इस तरह-
भाई बनारसीदास,
आपके दो पत्र मेरे पास है।
‘चाकलेट‘ नाम पुस्तक पर जो पत्र था उसको मैने ‘यं. इं.‘ के लिये नोट लीखकर भेज दीया। पुस्तक तो नहि पढा था। टीका केवल आपके पत्र पर निर्भर थी। मैंने सोचा इस तरह टीका करना उचित नहि होगा। पुस्तक पढना चाहीये, मैंने पुस्तक आज खतम की। मेरे मन पर जो असर आप पर हुआ नहि हुआ है। मैं पुस्तकका हेतु शुद्ध मानता हूं। इसका असर अच्छा पड़ता है या बूरा मुझे मालम नहि है। लेखकने अमानुषी व्यवहारपर घृणा ही पैदा की है।

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