पांव-पांव जंगल नापकर वर्किंग प्लान वाले दिनों पर सेटेलाइट इमेजरी हावी है, या कहें, एक्चुअल पर वर्चुअल या जमीनी पर हवाई। अब फारेस्ट कवर के बजाय ग्रीन कवर प्रचलन में है और कहा जाता है कि इस ग्रीन कवर में बगीचे, लॉन तो हैं ही, एस्ट्रो टर्फ भी शामिल हो जाता है। आंकड़े बताते हैं कि पचासेक साल पहले देश में वनाच्छादित क्षेत्र का प्रतिशत 19.5 था, जो अब लगभग 21.71 हो गया है, इस पर क्या कहें! पर्यावरण पर कुछ अलग कहने का प्रयास किया है, श्वेता उपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘धरा के अंक में‘, जिसमें ‘कान्हा‘ नेशनल पार्क है, वे अपने पात्रों से भावुक चिट्ठियां लिखवाती हैं, तो कान्हा नेशनल पार्क में पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बाकायदा चरणबद्ध कार्य योजना भी वनवाती हैं। पढ़ते हुए यह भी याद आया कि कान्हा के मुक्की गेट से अंदर जाते हुए संग्रहालय-इंटरप्रेटेशन सेंटर का नामकरण ‘अनुभूति‘ है। कृति, आधुनिक जीवन, परिस्थितियों और प्रकृति की काव्यात्मक अनुभूति है, चिंतन के स्तर पर पहुंच कर गद्य में नियोजित करते हुए इसकी अभिव्यक्ति में लेखक के भाव, विचारों के साथ घुल-मिल जाते हैं।
कभी एक प्रशासनिक अधिकारी ने किसी ‘विशेषज्ञ‘ माने जाने वाले व्यक्ति से कहा कि मेरे क्षेत्र में एक बड़ा हिस्सा ‘बिगड़े वन‘ का है, हम उसमें वन विकसित करना चाहते हैं। आपके सुझाव के लिए इस क्षेत्र के भ्रमण-अवलोकन की व्यवस्था की जाएगी, मानदेय भी होगा और आप प्रोजेक्ट बना कर देंगे, तो उसकी फीस अलग होगी। ‘विशेषज्ञ‘, वस्तुतः ‘सामान्यज्ञ‘ थे, उन्होंने कहा कि इसके लिए उपाय की बात और काम बहुत छोटा सा है, बात फोन पर ही हो जाएगी, वह यह कि जंगल को अपने हाल पर छोड़ दे, उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न हो, उसकी अपनी मौज में कोई दखल न दे बस, मगर इसमें थोड़ा समय लग सकता है, संभव है तब तक आपका तबादला हो जाए और इस काम का श्रेय आपको न मिले, नाम का पत्थर और शिलान्यास आपका कोई उत्तराधिकारी कराए। प्रशासनिक अधिकारी को समझ में आ गया कि जिसे विशेषज्ञ बताया गया था, उसे तो कुछ भी नहीं आता, वह भी वही बात कह रहा है, जो उस इलाके के अनपढ़-गंवार कह रहे थे, वह तो किसी काम का नहीं है।
वन-पर्यावरण, मानवशास्त्र-जनजातीय समाज, प्रकृति-संस्कृति के मुद्दों पर क्या, क्यों, कैसे, कितना? का वैचारिक द्वंद्व शाश्चत किस्म का है। हम इनका अध्ययन क्यों करते हैं? इनके पास क्यों जाना चाहते हैं? प्राकृतिक, नैसर्गिक स्थितियों, गुड प्रैक्टिसेस को अपनाने के बजाय अपनी समझ के अनुसार उसमें संशोधन-परिवर्धन करने लगते हैं। अपने एकाकीपन और ऊब से भाग कर वहां शरण लेना चाहते हैं, अपना बेहतर या वैकल्पिक निर्वाह तलाशते? कुछ-कुछ आत्मज्ञान-सा होता है, इसके साथ मसीहाई भी जागती है। वैसा ही कोई काम करने की सोचने लगते हैं, जिसका हमें अभ्यास है। यह तब सार्थक होने की संभावना बनती है जब अपने अभ्यस्त तौर-तरीकों और रास्तों के भीतर विद्यमान को तलाश लें, पा लें। अन्यथा इस दौर में सारी आदिम चाहना कभी रूप बदल कर, कभी मौन तो कभी मुखर बलवती होने लगती है और वहीं ला पटकती हैं, जहां से शुरुआत हुई थी। श्वेता उपाध्याय का उपन्यास? ‘धरा के अंक में‘ इसी उहापोह की अभिव्यक्ति है, जो यों तो अंत आते रास्ता बनाते, हल सुझाते दिखती है मगर बीच में वे एक वाक्य ऐसा लिख गई हैं, जो मानों इस सारे उद्यम का हासिल हो, वह है- ‘जिसके पास जो है, वही उसका समाधान है...‘ क्या इसका आशय यह कि सारे परिवर्तन के बीच यथास्थिति या वृहत्तर हालात ज्यों के त्यों बने रहें, मगर उनमें उपेक्षणीय परिवर्तन की संभावना हो?
कहा जाता है कि प्रकृति अपने घाव खुद ही भरती है, मगर ऐसा मान कर सारी सभ्यता घाव करने में लग जाए तो प्रकृति अपने घाव भरने के लिए ऐसा उपाय भी कर सकती है, जिसमें उसके लिए मानव-जाति अप्रासंगिक हो जाए। ध्यान रहे कि जो हमारे लिए प्रलय जैसी भारी तबाही, वह प्रकृति का मामूली उलट-फेर हो, वह बस ताश की गड्डी फेंट रही हो।
राजा पृथु और वेणु की कहानी का संदेश, जैसा मुझे समझ में आता है कि धरती, वन या किसी भी संसाधन का दोहन आवश्यक है, मगर यह संतुलित और कुछ मायनों में देन-लेन वाला होना चाहिए और सारे झगड़े की जड़ यहीं समझ में आती है कि यह संतुलित- क्या, क्यों, कैसे, कितना हो?, तय नहीं। इसके जवाब में सोनल शर्मा की पुस्तक ‘कोशिशों की डायरी‘ के अंतिम पेज की, निष्कर्ष-सी कविता याद आती है-
अच्छा होगा
मैं उस बच्ची के बाल ही सुलझा दूं
गूंथ दूं उसकी चोंटी
उस छोटे लड़के की उधड़ी कमीज में
भर हूं चार टाकें सीवन
पता नहीं सब पूरी तरह कैसे ठीक होगा
और ठीक होकर ऐसा क्या होगा
जो ठीक ही रहेगा
ठीक करने वाले कौन होंगे
वे कहां से आएंगे
और फिर ये कैसे तय होगा
कि किसके लिए कब क्या ठीक है
बैठ जाऊं और सोचती रहूं
भूल गलती खोजती रहूं
इससे तो अच्छा होगा
इंच-इंच चलती रहूं
जो कर सकती हूं
वह करती रहूं.
