Sunday, March 22, 2026

मौज बरास्ते भाषा

# का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिए सांच -तुलसीदास
# संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर -कबीर
# देसिल बयना सब जन मिट्ठा -विद्यापतिे
# निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल -भारतेन्दु

इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी बातें अपनी, देसी भाखा के पक्षधरों की हैं, मगर क्या संस्कृत के विरोध में हैं? कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘भाषा बहता नीर‘ में मानों इस सवाल का जवाब देते, स्पष्ट करते हैं- ‘संस्कृत भाषा कूप जल‘ का संबंध भाषा, साहित्य से है ही नहीं। यह वाक्यांश पुरोहित तंत्र के खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्कृत भाषा।‘ यही बात तुलसी के कथन पर भी लागू है, वही तुलसी मानस के सातो कांडों का आरंभ संस्कृत मंगलाचरण से होता है औैर सातवें-अंतिम उत्तरकांड का समापन ‘भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‘ जैसी बात सहित दो संस्कृत श्लोकों से होता है। मगर वहीं ‘मांग के खाइबो, मसीत में साइबो‘ कहते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी उपरोक्त बात संस्कृत का आड़ ले कर भ्रमित करने वालों के खिलाफ कही गई है न कि संस्कृत के लिए।

निरुक्त और पाणिनी के हवाले से बताया जाता है कि ‘भाषा‘ शब्द, वैदिक भाषा के विपरीत प्रचलित लोकभाषा का द्योतक है। अथर्ववेद के प्रसिद्ध पृथिवी सूक्त का अंश, जहां भाषा की विविधता में भेद-भाव नहीं है- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। यानी ‘विविध भाषाएँ बोलने वाले और विविध धर्मों (संस्कृति, आचार-विचार) को मानने वाले लोगों को, एक घर (परिवार) की तरह, जो पृथ्वी धारण करती है (पोषण करती है), वह स्थिर और सहनशील गाय की तरह, हमें धन की हज़ारों धाराएँ (समृद्धि) प्रदान करे।‘

परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी में परा तो परे ही है, पश्यन्ती, वह जिसे ‘देखा‘ गया, ज्यों वैदिक ऋचाएं (श्रुति), अपरिवर्तनीय- सत्य, अहिंसा, तप, त्याग, दया, संतोष आदि जैसे मानवीय मूल्य, ‘सच बोलो, सच तोलो‘ जैसी, ज्यों गांधी के ‘हिंद स्वराज‘ में निहित भाव। इसके बाद मध्यमा, जहां विचार शब्दों में ढलने लगें (स्मृति), देश-काल-पात्र के साथ बदलने वाली, कब, कहां, कैसे के विचार वाली, ज्यों गांधी की आत्मकथा और फिर वैखरी, मुख से बोली और कान से सुनी जा सकने वाली सार्थक ध्वनि-शब्द (न्याय), ज्यों, गांधी के पत्र-भाषण आदि, जिसके लिए वे कहते कि उनमें विसंगति हो तो बाद में कही गई बात को मानें।

राजशेखर की काव्यमीमांसा का उद्धरण- ‘पुत्रात्पराजयो द्वितीयं पुत्रजन्म‘ सरस्वती अपने पुत्र काव्य पुरुष को गोद में लेकर कहती हैं- यद्यपि मैं संपूर्ण वांग्मय की जननी हूं, फिर भी तुमने संस्कृत में छन्दोमयी वाणी के प्रयोग द्वारा मुझे परास्त कर दिया है ... अपने पुत्र से परास्त होना द्यितीय पुत्र की उपलब्धि के समान आनंदकारक होता है। यहीं आगे आया है- ‘शब्दार्थौ ते शरीरं, संस्कृतं मुखं, प्राकृतं बाहू ...‘ शब्द और अर्थ तेरे शरीर है। संस्कृत-भाषा मुख है। प्राकृत भाषाएँ तेरी भुजाएँ है। अपभ्रंश भाषा जंघा है। पिशाच-भाषा चरण है और मिश्र-भाषाएँ वक्ष स्थल है। ... रस तेरी आत्मा है। छन्द तेरे रोम है। प्रश्नोत्तर, पहेली, समस्या आदि तेरे वाग्विनोद हैं और अनुप्रास, उपमा आदि तुझे अलंकृत करते हैं।

रहीम ने ‘खेटकौतुकम्‘ का पहला श्लोक संस्कृत में रचा है, इसके बाद के पदों के लिए, दूसरे पद में कहते हैं है- ‘फारसीयपदमिश्रतग्रन्थाः खलु पण्डितैः कृताः पूर्वैः। सम्प्राप्य तत्पदपथं करवाणि खेटकौतुकं पद्यैः।।‘ यानी पूर्वाचार्यों ने फारसी शब्दों से मिला हुआ संस्कृत पद्मों में विविध प्रकार के ग्रन्थों का निर्माण किया है। मैं (खानखाना नब्बाब) भी उन्हीं के चरणपथ का अवलम्बन करके उसी तरह फारसी से मिले हुए संस्कृत श्लोकों में ‘खेटकौतुक‘ नामक ग्रन्थ की रचना करता हूँ। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे मणिप्रवाल शैली (मोती और मूंगा) कहा जाता है। रहीम के ऐसे भाषा-कौतुक का एक उदाहरण है- ‘एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में, काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी। तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा, तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- 'सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। ... सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है।' और सुमित्रानन्दन पन्त बताते हैं- 'भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय-स्वरूप है। यह विश्व के हृत्तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है। विश्व की सभ्यता के विकास तथा ह्रास के साथ वाणी का भी युगपद् विकास तथा ह्रास होता है। भिन्न-भिन्न भाषाओं की विशेषताएँ, भिन्न भिन्न जातियों तथा देशों की सभ्यता की विशेषताएँ है। संस्कृत की देव-वीणा में जो आध्यात्मिका-संगीत की परिपूर्णता है यह संसार की अन्य शब्द-तन्त्रियों में नही, और पाश्चात्य साहित्य के विशदयन्त्रालय में जो विज्ञान के कल-पुर्जों की विचित्रता, बारीकी तथा सजधज है, वह हमारे भारती-भवन में नहीं।'

भाषा-बहुलता के संदर्भ में हिंदी के कुछ साहित्यकार, जिनकी बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं पर रही है- भारतेन्दु, गुलेरी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, बच्चन, अज्ञेय, कृष्ण बलदेव वैद, कुबेरनाथ राय जैसे अनेक नाम हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शायद ही ऐसा कोई हो, जो दूसरी किसी एक या एकाधिक भाषा में निष्णात न हो। इस दौर के वागीश शुक्ल, गणित के प्राध्यापक रहे और जिनका संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी पर अधिकार है। इस सिलसिले में रेणु, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय या वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे देशज लोकभाषाओं पर बल देने वाले भी हैं। हमारे एक गुरु हार्वर्डवासी, बनारसी-भोजपुरी प्रेमी भारतेन्दु खानदान के डॉ. प्रमोदचंद्र कहते थे कि अभिव्यक्ति में स्वाभाविक लोच और रस अधिक आ जाता है, अगर पहली जबान देशज हो। यों भी बोली-भाषा का लोक-शास्त्र, बृहत्साम-रथन्तर, विष्णु वाहन गरुड़ के दो डैने हैं।

बस्तर के अभिलेखों की चर्चा। रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी है कि ‘इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं।‘ उनकी यह टिप्पणी विशेष संदर्भ में है, इसके अलावा बस्तर के अभिलेखों में उड़िया है और ‘भाषा‘ भी। दंतेवाड़ा शिलालेख अगल-बगल दो पत्थरों पर है, जिसमें कहा गया है- ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए।‘ यहां संस्कृत ‘देववाणी‘ है औैर पूर्वी किस्म की हिंदी ‘भाषा‘। यही भाषा ‘भाखा‘ है। इन्हीं दिक्पालदेव के पुत्र राजपालदेव का ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि उभय पक्ष समझौते की शर्तें पढ़-समझ सके। इन अभिलेखों का काल अठारहवीं सदी है।

अब थोड़ी मौज - सठियाए सालों पुरानी हमारी पढ़ाई शुरू होती थी ककहरा और गिनती से। गिनती की किताब में पहाड़ा भी आ जाता और फिर यह कहलाता भाषा और गणित। भाषा में इमला होता यानी शुद्ध लेखन, और पाठ-वाचन। गणित में जोड़-घटाव गुणा-भाग के साथ मनगणित और यांत्रिक गणित भी होता, जिसके लिए सूत्र रटाया जाता, ‘सहि अरु का को तोड़कर, भाग-गुणा कर मीत, ता पीछे धन-ऋण करै, यही भिन्न की रीत‘। तीसरी कक्षा में जिले का भूगोल होता, चौथी में प्रदेश का और पांचवीं में देश का। भूगोल, सामाजिकध्यान यानी सामाजिक अध्ययन का एक हिस्सा होता, इतिहास और राजनीति के साथ। मुझे याद नहीं आता कि प्राथमिक कक्षाओं में अर्थशास्त्र होता था या नहीं और होता था तो किस रूप में। आगे चल कर ‘नेकोसेकोसेकापरहे, बैनीआहपीनाला और यमाताराजभानसलगा, जैसे सूत्र सबको याद होते। सोचता रहा हूं, तुलसी भी किसी ऐसे ही दौर से गुजरे होंगे कि कहा- ‘अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार‘। अंक- तथ्य, वस्तुगत और आखर- विषयगत!

हमारे एक परिचित कभी बंबई गए, पकी उम्र में पहली बार। बंबई पहुंचकर उनकी एक ही धुन थी, थाणे का पुलिस स्टेशन देखना है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में ‘इ है बंबई नगरिया ...‘ गीत, कहीं ऐसी कोई बात नहीं, फिर यह कैसी धुन। बात पता लगी कि उन्होंने सुन रखा था कि मराठी में पुलिस थाना को पोलिस ठाणे कहा जाता है, वे देखना चाहते थे कि यह ठाणे के पुलिस थाने में किस तरह लिखा हुआ होगा और मन ही मन ‘ठाणे पुलिस ठाणे‘ सोच कर, मुख-सुख उचार कर आनंद लिया करते रहे। इसी तरह रायपुर से लगे बरौदा गांव, के बैंक आफ बड़ौदा की शाखा को अंग्रेजी में क्या लिखते हैं- Bank of Baroda, Branch- Baroda!

संयोग कि मुझे सिखाने-पढ़ाने वाले ऐसे गुरूजी मिले, जो छकाते भी थे। जिस पर कभी ध्यान नहीं गया था, ऐसी बात किसी ने कही कि जिस शब्द की परिभाषा हो, उसमें वह शब्द या उसका समानार्थी शब्द नहीं आना चाहिए, मैंने अपने गुरूजी से ‘शेयर‘ किया, इस पर उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बात परिभाषा के परिभाषा जैसी मानी जा सकती है और नहीं तो परिभाषा की परिभाषा क्या होगी? फिर यह भी कि समानार्थी शब्द तो शब्दकोश में होते हैं, जिनमें शब्दों के अर्थ दिए होते हैं, फिर उसे अर्थकोश क्यों नहीं कहते!, सो ज्ञानमण्डल, बनारस का ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ खोल लिया। सबसे पहले ध्यान गया, वाह बनारसी ... न शब्द न अर्थ, बस कोश। मगर ऐसा सिर्फ यहां नहीं, वामन शिवराम आप्टे का ‘संस्कृत-हिन्दी कोश‘ है और फादर कामिल बुल्के का नाम 'अँगरेजी हिन्दी कोश‘ मिला, हम ही हैं जो शब्दकोश अर्थककोश के चक्कर में पड़े हैं। बहरहाल, ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में भाषा शब्द पर पहुंचा तो पाया- ‘भावप्रकाशका साधन; किसी विशेष देश या जन-समाजमें प्रचलित शब्दावली और उसे बरतनेका ढंग, बोली; प्रादेशिक भाषा या बोली; हिंदी व्यक्ति विशेषके लिखने-बोलनेका ढंग; परिभाषा; शैली; सरस्वती; अर्जीदावा; एक रागिनी।‘ अब लगता है कि गुरुओं ने रट-घोंट लेने के साथ-साथ जुगाली करते रहने पर जोर दिया, तो जैसी गुरु-दीक्षा, शिरोधार्य।

Sunday, March 15, 2026

उजले ‘श्याम‘

संयोजक श्री शशिकांत चतुर्वेदी, श्री सूर्यकान्त चतुर्वेदी और संपादक श्री रूद्र अवस्थी के
‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन सहित प्रस्तुत-


उजले ‘श्याम‘

स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।

कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते। 

सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते। 

कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे। 

अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी। 
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 

फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं? 

आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है। 

एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो। 

आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं। 

वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ। 
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 लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।' 

मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा। 

2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है। 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी। 

कुटेमहा घटा सो 
(असामयिक बादल के प्रति.) 
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘ 

बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ। 
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै। 
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।। 
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं। 
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।। 

बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी। 
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।। 
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के। 
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।। 
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा। 
बादर झनि आ झनि आ।। 

तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी। 
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।। 
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही। 
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही। 
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ। 
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा। 
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।। 
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा) 
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे। 
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे) 
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।। 
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।) 
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।। 
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।) 
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
 
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना। 
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।। 
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।) 
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन। 
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन) 
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।। 
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।) 
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।। 
बादर झनि आ झनि आ। 

नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)। 
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)। 
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो। 
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।। 
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।) 
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ। 
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।) 
बादर झनि आ झनि आ। 

चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही। 
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।। 
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये। 
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।। 
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)। 
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।

इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।

- राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना, 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Wednesday, March 11, 2026

आहोपुरुषिका

आहोपुरुषिका- वह पात्र, अपने पुरुष होने का भान हो, जिसके होने से।

‘आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए।
जाने अब क्या-क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना।।‘ और फिर
‘तुम निहारती रहीं मुझमें अपने को ... ... और फिर सामने से हट गयीँ शायद तुम्हारा सिँगार पूरा हो गया।।‘
सरसरी तौर पर विधुर-वियोग के विषाद का संगीत जान पड़ने वाली वागीश शुक्ल की किताब ‘आहोपुरुषिका‘, देख रहा हूं। नागरी लिपि में छपी, हिंदी! की किताब। कविताएं, व्याख्या सहित फिर भी दुरूह, संदर्भमय व्याख्या भी कविता की तरह और कभी कविता व्याख्या जैसी।

मेरे लिए किताबें अक्सर दुश्मन की तरह होती हैं, अकर्मण्य बनाने वाली, समय और व्यय साध्य। मगर ऐसे दुश्मन से भिड़ने का उत्साह अब तक बना हुआ है। शुरु करता हूं, उसे खारिज करने के इरादे से। किताब लुभाती नहीं, बल्कि जूझने के लिए उकसाती है और पढ़ ली जा सकी तो धीरे-धीरे असर करने लगती है। अंततः, यह मेरे लिए, मेरी दुश्मन-किताबों के खिलाफ खड़ी किताब है, क्योंकि इसमें लेखन और किताबीकरण का फर्क बताया गया है- ‘वाचिकता का टंकण नहीँ, उसका जडीभवन‘(131)। अब्राहमीय मजहब को किताबी मजहब कहा गया है(132)। हमारे यहाँ श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक् ग्रन्थ नहीँ है, चेतन है - ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)। रामायण और महाभारत में वाल्मीकि और व्यास स्वयं पात्र हैं, क्योंकि भारतीय काव्य-वास्तु में कविता कवि मेँ आयत्त है किन्तु कवि भी कविता मेँ आयत्त है(218)। ... ये गहने-कपड़े, ये आवाज़ेँ, उस वाणी का लिपीकरण हैँ ... असूझ-अबूझ वाक् के सूझ-बूझ में बदलने का यही राज रहस्य है(220-221)। वाणी लिपितनु, अर्थात् लिपि वाणी का शरीर है(222) 

/यहां और आगे भी ( )- ऐसे कोष्ठक के अंदर आई संख्या पुस्तक के पेज का क्रमांक है/ 

किताब में प्रवेश आसान नहीं है, ऐसा क्यों? देखिए- पत्नी इन्दुमती के साथ सत्ता-त्यत्ता, जन्म-मृत्यु?, शरीर का अस्तित्व में आना और शरीर त्याग? मानों किताब पढ़ते चौकन्ना बने रहने का सुझाव है। पुस्तक शुरू ही होती है ‘बक रहा हूँ जुनूँ में क्या कुछ के साथ, मानों पाठक को मन कड़ा रखने को तैयार किया जा रहा है। लेखक के शब्दों में ‘जिसे एक झंझा-लेख कहा जा सकता है। और फिर आगे- ‘कुछ न समझे, खुदा करे, कोई‘ मगर इसके भी पहले है- ‘समागम मेँ (में नहीं) प्रेक्षण‘ का एक शीर्षक है- ‘तेरे बेडरूम में देवता का क्या काम है?‘ तक पहुंचती है, तो लगता है यहां बतर्ज ‘मेरे अंगने में ... के आगे की कोई बात है। 

प्रवेश के लिए किताब-परिचय के दो उद्धरण- अशोक वाजपेयी ने ‘प्रियाहीन पुरुष‘ शीर्षक भूमिका का आरंभ पुस्तक के एक अंश-कविता ‘प्रियाहीन डरपते-बिलखते-फफकते-कलपते-बिलपते-तड़पते...(58-59) से किया है, बताते हैं कि किताब का ‘आरंभिक अंश वागीश जी द्वारा लिखी गई कविताओं उनकी संदर्भ-व्याख्या का है। ... ... दूसरा बड़ा हिस्सा विवाह-सूक्तों के अनुवाद, उनकी पृष्ठभूमि का विवेचन आदि है।‘ उन्होंने इसे अनोखी और अद्वितीय पुस्तक कहा है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती और इसके लिए कम से कम इतना तो हर कोई भी कहेगा। यों किताब में सनातन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है कि अनूठा तो वही हुआ, जो निष्प्रतियोगी है, (जो अवधारणा ही हो सकती है।) ‘कोई दूसरा ‘धर्म‘ नहीं है जिसे दिखा कर आप समझ सकें कि सनातन धर्म इस धर्म से भिन्न है।(140- 141) पहला खंड उनकी 44 कविताएं, व्याख्या सहित हैं। दूसरा खंड विवाह-सूक्त है, जिसके पांच बिंदुओं में 4 ऋग्वेद दशम मण्डल, सूक्त 85 और 5 अथर्व-वेद, काण्ड 14 का प्रथम और द्वितीय अनुवाक है। 

मृदुला गर्ग ने फ्लैप पर लिखा है- ‘आहोपुरुषिका की विषाद की झंझा उसका एक तिहाई हिस्सा है। बाकी दो तिहाई में, विवाह सूक्त का शास्त्र सम्मत और अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विवेचन है।‘ इस परिचय का अंतिम वाक्य है- ‘शायद इसीलिए परम स्थिति वह है जब पति पत्नी में अभेद हो।‘ यह पुस्तक के मर्म का संकेत है।

किताब की बेतरतीब सी लगने वाली बातों में तारतम्य-सूत्र आसानी से नहीं पकड़ सका, मगर किताब उलटते-पलटते सूत्र बना- कन्या‘दान‘(141-44), जिस दान के आशय को कभी ‘दान-व‘ से समझने का प्रयास किया था। ऋग्वेद दशम मंडल के एक ऋषि भिक्षु हैं, धन-अन्न दान को भिक्षा के साथ जोड़ते यह भी कहते हैं- ‘एक उदार मन वाला पुरुष, धन कम होने पर भी अधिक दान दे सकता है, क्योंकि दान का संबंध हृदय की विशालता से है‘, जिसका उपबृंहण भर्तृहरि नीतिशतक में ‘दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य‘ है। इसी तरह अन्यत्र यद्यपि शास्त्रों में दान की विस्तृत चर्चा है, मगर पी.वी काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास‘ में कन्यादान का उल्लेख नहीं है। वहां ‘प्रतिग्रह‘ शब्द के विशिष्ट अर्थ की चर्चा है, साथ ही ‘याग‘ और ‘होम‘ को दान से अलग बताते हुए कहा गया है कि- ‘स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनं...‘, ‘दान में किसी दूसरे को अपनी वस्तु का स्वामी बना दिया जाता है।‘ यहां डोंगरे महाराज की रामकथा का कन्यादान प्रसंग स्मरणीय है- पाणिग्रहण पर राम को ‘प्रतिगृह्णामि‘ कहने को कहा जाता है, राम वैसा ही कहते हैं किंतु लक्ष्मण को ‘प्रतिगृह्णामि‘ बोलने को कहा जाता है तो उन्हें मौज सूझती है, वे सोचते हैं कि मंगलाष्टक हो गया है, कन्या का हाथ मेरे हाथ में आ गया है, क्यों न थोड़ा हठ करूं, और कहते हैं कि प्रतिगृह्णामि तो ब्राह्मण बोलते हैं, जो दान लिया करते हैं, हम क्षत्रिय दान लेते नहीं, दान दिया करते हैं ‘प्रतिगृह्यताम‘ बोला करते हैं। उन्हें समझाया जाता है कि तुम्हारे बड़े भाई ने भी तो प्रतिगृह्णामि कहा है। इस पर लक्ष्मण कहते हैं कि वे तो भोले हैं, उन्हें जैसा कहा गया उन्होंने किया। बात अड़ गई वशिष्ठ के मनाने पर भी लक्ष्मण राजी नहीं हुए। तब विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि चाहे मंगलाष्टक हो गया हो, प्रतिगृह्णामि नहीं बोलोगे तब तक लग्न पक्की नहीं मानी जाएगी, तब कहीं जा कर लक्ष्मण मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता 4/24 ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः में या ज्यों 17/22 की स्वामी अपूर्वानन्द टीका में व्याख्या में कहते हैं- ‘दान के पात्र ब्रह्म हैं और दाता भी ब्रह्मस्वरूप या भगवान का अंश है।‘ गीता 17/20 में दान को ‘अनुपकारिणे‘ यानि बदले में कुछ पाने की अपेक्षारहित, बताया गया है। जैसा कि कविता-33 की व्याख्या में कन्यादान के लिए आया है- ‘देनेवाला और लेनेवाला दोनोँ ही नर नहीँ हैँ ... इस नाते देनेवाले का दाता होने का दर्प और लेनेवाले का प्रतिग्रहदोष, दोनोँ ही नहीँ रहते। तब कविता-38 का अर्थ खुलने में मदद होती है- ... ‘खाली मेँ खाली भर दो तो/खाली ही होता है भरपूर/जैसे/पूर्ण में से पूर्ण निकालो तो पूर्ण ही रहता है बाक़ी।।


प्यासे राहगीर को पानी पिलाने के लिए गर्मियों में प्याऊ बनाए जाते हैं। छोटा सा घेरा, जिसमें पानी के घड़ों के साथ व्यक्ति होता है, छोटी सी खिड़की से पनाली निकली होती है, इससे पानी पीने वाला, पिलाने वाले को और पिलाने वाला, पीने वाले को नहीं देख-पहचान पाता। माना जाता है, तभी पानी पिलाना ‘दान‘ का पुण्य-लाभ होगा, आदि। नाम-रूप का लोप। 

एक और सूत्र मिला, जहां ईशावास्योपनिषद् का नवें मंत्र का उल्लेख है- ‘जो अविद्या की उपासना करते हैँ वे अँधेरे मे पड़ते हैँ, जो विद्या की उपासना करते हैँ, वे और भी गहरे अँधेरे मे पड़ते हैँ‘(87)। परा-अपरा में झूलते हुए कभी ऐसा ही मंत्र-दर्शन मुझे हुआ था, तब (6 जुलाई 2021 को) मैंने लिख कर सार्वजनिक किया था कि ‘मेरा अज्ञान असीम है, आपका सारा ‘ज्ञान‘ इसमें समाहित हो सकता है। खुली आंखों देखी और कानों सुनी जानकारी, आंख मूंदकर गुनी जाकर सार्थक होती है। कान केी पलकें नहीं हैं, परदे हैं, ये परदे छुपाने के नहीं, उघारने के हैं।‘

और किताब में आया ‘बृगल‘ एकाकी से दूसरा और फिर बहुल। (एक अन्य सूत्र यह कि कुछ समय पहले मेरी भी अर्द्धांगिनी का लोप हुआ।)

कविताई मुझसे होती नहीं, मगर मार्च 2022 में मैंने अर्द्धबृगल शीर्षक से चार कविताएं लिखी थीं- 

अर्द्धबृगल*: चार कविताएं
(एकाकी रमता नहीं, प्रजापति भी रमा नहीं, दूसरे की इच्छा की- बृहदारण्यकोपनिषद) 

तुम 

तुम 
भूला सा पाठ 
और खोई पुस्तक, 
वह जिसे बार-बार दुहराने का मन करे। 
तब परीक्षा पास कर, 
जाने कहां रख गई किताब,
स्मृति में फड़फड़ा रहे पन्ने अब।

000

तुम-मैं

तुम मेरे लिए अपवाद की तरह जरूरी। 
अपवाद, नई संभावना। 
आपका, आप से अब तुम हो जाना,
तुम का मैं हो लेना। 
तुम की जगह मैं,
मेरे के बदले तुम्हारे,
अपवाद या सिद्धांत, 
जरूरी या गैरजरूरी।
दो नायिका, एक नायक अथवा
एक नायिका दो नायक के त्रिकोण 
और कोणों पर बारी-बारी खड़े हो 
समग्र समेट लेने की आतुर व्यथा। 

000

तेरा होना 

तेरा होना
तेरे ‘न होने‘ में
न ही तेरे ‘होने‘ में
तेरा होना, तेरे हो जाने में। 
तेरा होना तेरे आने में,
तेरे आने से पहले।
तेरा होना तेरे जाने में,
तेरे जाने के बाद भी।
भूत और भविष्य के रिक्त में
वर्तमान के आभास में।
तेरा होना, हर हाल में होना है।
हो जाने या न जाने
तू माने या न माने
तेरा आना, तेरा जाना 
हमने माना,
तेरा होना।

000

तेरा साथ

साथ चलना है तो- 
मैं तुम्हारी बात मान लूं, 
या तुम्हें समझा कर सहमति बना सकूं, 
यदि नहीं तो-
तुम मेरी बात मान लो,
या मुझे अपनी बात समझाओ।
हम यह भी तय कर सकते हैं कि
जो तुम में है, मुझ में नहीं
और मुझ में है, वो तुम में नहीं। 
फिर चलो, एक दूसरे के पूरक बनते,
साथ चलना यूं ही सही।

*अर्द्धबृगल-द्विदल अन्न का एक दल। 

और इसके साथ एक ‘चतुष्पदी‘

एक साधे सब,
सधता है तब, 
वह एक जब, 
निराकार, शून्य।

000

पहले खंड की अपनी 44 कविताओं में से कविता-9 के साथ कृष्णार्जुन-संवाद को ‘शब्दच्छल‘, आँखेाँ मेँ कजरारेपन और सफ़ेदी के बीच चलने वाला संवाद‘ समझाते हैं(18)। कविता-16 में भोर का तारा, शाम का तारा को शुक्र या वीनस, स्त्री या पुरुष से आगे बढ़ कर बृहस्पति तक पहुंचते हैं और संस्कृत, अंग्रेजी या बोलियों में सहज कह दिये जाने वाले चूतड़ और पाद जैसे भदेस माने जाने वाले शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं(30)। कविता-23 की उपमाएं, क्या कहने, जिनमें से एक- ‘कितना कालापन है तुममेँ/यह तब पता चलता है/जब तुम्हारे गाल का तिल/दृष्टि की आँखो में सुरमा आँजता है(48)। कविता-33 में पान खाने के लिए पत्नी से मिले नोट पर लिखे ‘दस रुपये‘ की भाषाओं (न कि लिपि!) को सामर्थ्य से बाहर (अबूझ?) बताना(71-72)। 

इस तरह सूत्र पकड़ कर मैं पहुंचा कि यह किताब- आत्मा में परमात्मा है तो को-अहं, प्रश्न में अपने को खोजने का प्रयत्न प्रकारांतर से और अंततः परमात्मा की खोज है। इसका संकेत जगह-जगह पर आता है, ज्यों प्राथमिकी में- सनातन धर्म को दो ही तरीक़ोँ से पहचानने की कोशिश की जा सकती है- एक, अ-पौरुषेय वेद से और दो, पौरुषेय लोकव्यवहार से।

भामती प्रसंग (186-187), भामती-पति (वाचस्पति मिश्र) ने जीव की भ्रान्ति को जगत् का कारण बताया। मजेदार कि वाचस्पति मिश्र, ब्रह्मसूत्र के भाष्य की टीका ‘भामती‘ तैयार करते यों एकाग्र-मशगूल रहे कि दाम्पत्य के पचास वर्ष बाद पत्नी भामति से पूछ लिया कि देवी आप कौन हैं? 

पुलोमा प्रसंग(148), महर्षि भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा है। भृगुपत्नी पुलोमा को देख कर पुलोमा (इन्द्र के श्वसुर) नामक दैत्य काम पीड़ित हुआ ...। महाभारत में एक सदृश नाम वाला ‘चित्रांगद‘ प्रसंग है, जिसमें कुरुवंशीय शांतनु (भांडारकर संहिता में स्वीकृत पाठ ‘शंतनु‘) के पुत्र चित्रांगद को गन्धर्व चित्रांगद युद्ध कर, यह कहते हुए कि मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता, उसे मार डालता है। किताब में कहा गया है कि एक ही तत्व, भोक्ता या भोग्य- नाटक के पात्र, एक प्रस्तुति में राजा तो दूसरी में मन्त्री की तरह चोला बदल हो सकता है।(185-186) 

किताब में रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 36 ‘सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।‘, जिसमें खास वैष्णवी परतदारी है, इन चार घाटों को स्पष्ट किया गया है- राम-कथा में याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद का घाट कर्म है। शिव-पार्वती संवाद का घाट ज्ञान है। काकभुशुण्डि गरुड संवाद का घाट भक्ति है। गोस्वामी जी सन्त-समाज को सम्बोधित करते हुए स्वयं कहते हैं तब इस सरोवर में उतरने का घाट प्रपत्ति है(105-106)। अब तक मन में घुली इस बात को शब्दों में पा कर दुहरा आनंद हुआ। 

अपने बेटे की बलि के लिए उद्यत हज़रत इब्राहीम प्रसंग(115) के साथ नचिकेता, शुनःशेप और मोरध्वज की कथा का स्मरण होता है। हजरत ईसा के ‘पड़ोसी‘ का तात्पर्य बताया गया है, ‘पड़ोसी वह है जो तुम्हारा हितैषी हो चाहे वह तुम्हारे मजहब को माने चाहे नहीँ‘(130)। महत्वपूर्ण तथ्यों की चर्चा है कि ‘अंजीर-पत्ता अभियान‘ के तहत वैटिकन संग्रहालय मेँ मौजूद मूर्तियाँ मेँ से बहुत सारी समय-समय पर अनेक अलग-अलग पोपोँ द्वारा खण्डित करवायी गयी हैँ। माइकेलएन्जिलो का ‘द लास्ट सपर‘ भी विरूपित अवस्था में ही प्राप्त है।‘ तथा ज्ञान-संपदा, परंपरा का उच्छेद ‘एकमात्र-ता‘ के हठ से प्रेरित रही हैँ... बाइबिल और र्कुआन का उपलब्ध स्वरूप उनके विविध पाठोँ को नष्ट करके ही प्राप्त किया गया है(136-37)। 

बताया गया है कि ‘सूत्र‘, वह जो अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान, विश्वतोमुख, अस्तोभ हो और अनवद्य (निर्दोष) हो(196-197)। किताब के ऐसे ही कुछ सूत्रों का उल्लेख करना उपयुक्त होगा, जिनमें-
0 पत्नी, ‘विराट‘ है... दाम्पत्य... अव्यक्त से व्यक्त... भाषान्तर के रूप मेँ प्रस्तुत हैँ, भावान्तर नहीँ हैँ(145)। 
0 सनातन ‘सनातन धर्म अवधारणा पर आश्रित है, आचरण पर नहीँ(139) 
0 ‘आधुनिक क्रम प्रेम को जनक और विवाह को उसका जन्य मानता है जबकि सनातन विवाह को जनक और प्रेम को उसका जन्य मानता है‘(146) ... ‘प्रत्येक प्रकार के विवाह में अनुराग ही फल है‘(147), सीधे कहें तो प्रेम के बाद उसकी परिणिति विवाह नहीं बल्कि विवाह से/उसके बाद विकसित प्रेम।
0 निर्विकार ब्रह्म सत्य है, चेतन अतः ज्ञान और अनश्वर होने से अनन्त है(161) 
0 सनातनी आस्था और वैदिक व्याख्या के साथ पांडित्य-लक्षण, यह भी कहते हैं- ‘हम ऐसे किसी सोना-मढ़े या कालिख-पुते अतीत की तलाश में निकल पड़ने के लिए बाध्य नहीं हैं‘(163)।
0 ‘पुरुषार्ध आकाश (खालीपन) स्त्र्यर्ध से विवाह के बाद पूर्ण होता है, इन दो अर्द्धबृगलों का पुनः-सम्पुटीकरण ही विवाह है।(166)
0 ‘मैँ‘ ‘यह‘ ‘वह‘ ‘तुम‘, ... यह अभिनय है, श्रुति अभिनय द्वारा बताती है। ‘श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक्‘ ग्रन्थ नहीँ, चेतन है-ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)
0 ‘सूचनाकारी ग्रन्थ‘ के अर्थ में सूत्र, ‘धागा‘ आदि न हो कर, जो ‘अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान्, विश्वतोमुख, अस्तोभ और अनवद्य हो(196)
0 ब्रह्मसूत्र के विविध व्याख्यान ही केवलाद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद जैसे सम्प्रदायों के मूलाधार हैं।(197) 

वस्तुतः गुणी, ज्ञानी पंडित वही, जो अपनी सीमा को जानता है और असीम का अनुमान कर पाता है। लेखक की पांडित्य विनम्रता, जहां वे कहते हैं- ना-समझी के कारण हुई किसी भी त्रुटि का उत्तरदायित्व मेरा है(175ं) यहां निष्कर्ष (फतवा) की अनिवार्यता नहीं है न ही बेताबी। सीमा-मर्यादा को बराबर महसूस किया जाता रहा है, कुछ उदाहरण- ‘सायण का भाष्य समझना कितना कठिन है‘(245), तात्पर्य स्पष्ट नहीं है, कुछ के अनुसार ... शायद यही अभिप्रेत हो(275), मैं यह नहीं बता सकता कि यह मुद्रण की भूल है या कुछ और(336), बल्बज मूंज है या कुश चमड़े के नीचे या ऊपर, चमड़ा मृगचर्म या गोचर्म (337), प्रतीत होता है और ऐसा लगता है(344) आदि।

दुनिया के सारे तथ्य समय के साथ अपनी पसंद के कथा-रूप में बदल जाते हैं और कथा-बीज। का क्षेपक-उपबृंहण। शाश्वत और सनातन की समयानुकूल व्याख्या की आवश्यता-पूर्ति के लिए कथा। शास्त्र के अनुशासन का बंधन न हो, उसका उपबृंहण हो, ऐसा रचना उससे ही संभव हो सकता है। जितना साहित्य है उतना शोध, ‘फिक्शन और नान फिक्शन‘ एक साथ। असल पंडित ही ऐसा अधिकारी हो सकता है, छूट ले सकता है, जिसे पाठक की परवाह या पसंदगी का दबाव न हो।

‘हिन्दुत्व‘ के संकरे इकहरेपन के लिए बुद्ध, जैन, चार्वाक, शंकराचार्य से लेकर गुरु नानक ... एक मुश्किल सवाल वेदपाठी आर्य-समाजी, दयानंद सरस्वती ने खड़ा किया, उनका वाराणसी शास्त्रार्थ ... गनीमत है कि वेद कोई पढ़ता नहीं, पढ़ता है तो शायद समझता नहीं और समझता है तो अपनी समझ पर खुद संदेह बनाए रखता है, शायद यही सच्चा सनातन हिन्दुत्व है, जिसकी परोक्ष वकालत की मद्धिम गूंज किताब में तानपूरे की तरह बजती रहती है।

सनातन चारों ओर से खुला रहे तभी तक वह सनातन रहेगा। लेकिन सनातन में पहले तो चारदीवारी बनाई गई, बीच में आने जाने के रास्ते खुले थे लेकिन फिर उसमें दरवाजे लगा दिए गए, एक तरफ खुलने वाले। जिसमें अंदर से बाहर तो जाया जा सकता है बाहर से अंदर नहीं।

महीनों बीत गया, इस किताब का साथ बना हुआ है, लगता है, बना रहेगा, समय-समय पर खुलती पंक्तियां, जो और जब थोड़ी भी खुली, दिन बीत जाता है, उसमें ऊभ-चुभ। इक्कीसवीं सदी में अपनी पढ़ी नई किताबों में किसी का नाम लेना हो तो मेरे लिए यह एक तो होगी ही। 

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‘पकड़ती है गला कुछ याद+ए+नाकूस य० क्यों आवाज बैठी है अजाँ मैँ।।‘ इसमें मुझ जैसे पाठक के लिए + और ०, अजनबी जान पड़े। इसी तरह में को मेँ, और लेखक के नाम के साथ ‘शुक्ल‘ मगर अन्यथा ‘शुल्क‘ की तरह छापा जाना। फांट भी खास तरह का इस्तेमाल हुआ है, इससे कई बार प्रूफ की भूल की तरह जान पड़ने वाली छपाई, सामान्य पाठक के लिए तय करना मुश्किल है कि यह गलती से हो गया है या सही है, इरादतन है। किताब में इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है, जिसकी जरूरत ऐसे प्रयोग में अवश्य होनी चाहिए। कुछ शब्दों का शुद्ध-अशुद्ध स्पष्ट किया गया है, जैसे- नक़सान-नुक़सान(329)। प्रूफ-अशुद्धि या मेरी कम-समझी तय नहीं कर पाया, ऐसे कुछ उदाहरण- आभुषण(44)। आँखो(48)। बैसे(83)। बालकाण्ष(105)। ‘रंग‘मंच(188)/‘रङ्ग‘मण्डप(189)। बावुजूद(147)। नाजाइज(152)। मैत्रेयी/मैत्रेयि(155-156)। पदुमावत(90)। वसुल(127)। निशानदिही(138)। ता कि (179)। विना(43, 56, 71, 224, 242)। बेटों ‘बाली‘ तथा प्रवेश के ‘किए‘(325)। बहीॅं(349)। पं जी?(242)। चर्चा की ‘का‘ चुकी(248)। एक शब्द के भिन्न प्रयोग में मात्रा-वर्तनी का उदाहरण- औषध (89, 229), ओषधि(243, 324), औषधीय(244), ओषधियाँ(323, 328), ओषधियोँ(360)। या (53) पर हाशिये से बाहर छपे शब्द!। 

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फिलहाल यह पोस्ट यहीं तक, यह सोचकर कि कथा अनंता न हो जाय। पुस्तक के कुछ अन्य बिंदु भी गहराई से सोचने और विस्तार से कहने की राह सुझाते हैं, जिन्हें नीचे नोट कर रखा है- 

23- यम ने मृत्यु का वरण किया, ताकि वे मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की नगरी का शासन संभाल सकें। / 34- ऋत, अनृत/51- सत्व, रज, तम, इन्दीवर, कुवलय नीलकमल / 65- भेद, विजातीय, सजातीय और स्वगत / 80- गान्धर्व विवाह सबसे उत्तम / 82- खाली में खाली भर दो तो /105- भौगोलिक उपबृंहण। /120- शस्त्र की सहायता के लिए शास्त्र का निर्माण भी आवश्यक माना गया। / 123- पर हुरपेट /130- मानवीय गुणों पर किसका एकाधिकार /130-131 प्रक्षेप/ 135- एक पूज्यता, यहूदी धर्म शासन /137- एकमात्र-ता बनाम एक-बहुपूज्यता अस्तित्ववादी चिंतन /138- जेनेसिस से पुनः बात जोड़ते हैं .../ 147 ऊहा /148-इंटरनेट पर महाभारत /152- धर्षण से धर्षिता को कोई कलंक नहीं लगता /153- विवाहपूर्व के अनुराग नवीन अनुरागलेख / 154- अंजनी कुमार सिनहा /154-55 अनन्यममता /159-160-रूपकाभास / 162 नामरूप त्यत, अमूर्त/ 163- सोना मढ़े कालिख पुते अतीत / 164- अलगाव बाड़े में ब्राह्माण्डिकी वह रममाण नहीं हुआ। /171- चार पत्नियां /190- तौर्यत्रिकी देवविद्या, नट, अभिनेता और नर्तक /192- उपादान और निमित्त /194- आगम निगम भाषा /197- भाषा और बोली का अंतर /202- सेमिनार, पीएचडी-शोधपत्र का साधन/213- षड्कर्म को पूर्त करने वाला विप्र/221- परिष्वंग/ 223- बृहदारण्यक अध्याय 5 का द, इनमें से कोई द नहीं है। 224- विविदिषा जानने की इच्छा /225 क्वान्टम कुछ न कुछ बाहर रहेगा। प्रमेय और सत्य /228- यज्ञ-कर्म-धर्म समानार्थी शब्द, ऋत-अनृत/ 236- इंद्र तभी पधारते हैं / 245- वर बराती/ 263- नग्निका, गौरी, रोहिणी आदि /290 पर 40. सोमः प्रथमो विविदे... /293- 45$46 /307 पर 35$36 जुआरी /324-स्त्री वशीकरण /327- विवाहोत्तर प्रेम / 339- पति, श्वसुर, सास के लिए/ 353- बृहस्पति/ 315 नान्दश्राद्ध

0 छत्तीसगढ़ी - 170- भुॅइफोर, औद्भिज्ज, स्वयंभू, खिन्नमन पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मौज ली है और कुटज के लिए पौरुष-व्यंजक नाम ‘धरतीधकेल‘ बनाया है।41- बहिंगा, सुरहार, कंवरिहा, 83- हुंडरा हुंडार, हुंर्रा
0 भारतेन्दु ‘बालबोधिनी‘ के मुखपृष्ठ पर कविता की पंक्तियां- जो हरि सोई राधिका, जो शिव सोई शक्ति। जो नारी सो पुरुष यामैं कछु न विभिक्ति।। और वीरप्रसविनी बुध वधू होइ हीनता खोय। नारी नर अरधंग की सांचेहिं स्वामिनी होय।
0 अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर, भाषा, शोध, अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर
0 महाउमग्ग जातक, समयानुकूल व्याख्या इसलिए कथा, इतिहास जानने के स्रोत, भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
0 मुझको कहां तू ढूंढे रे बंदे ...
0 भाषा के लिए शब्दकोश से कहीं अधिक जरूरी कठोर व्याकरण नियम, शब्द व्युत्पत्ति आवश्यक 
0 ‘यद्यपि वेदोँ के वाक्योँ का तात्पर्य ... अद्वैत मेँ ही है‘(195)
0 पर-आत्मा नहीं परम-आत्मा की तरह, आत्मा-परमात्मा से निराकार, जो आकार के विरुद्ध नहीं ब्रह्म- अंततः शून्य
0 ‘वीति‘ का अर्थ भक्ष्य भी है, घोड़ा भी। इसी तरह ‘बर्हि‘ कुश भी अग्नि भी। ‘गृणान‘, ‘स्तुति करने वाला‘ किंतु ‘जिसकी स्तुति की जा रही है‘ भी है।(42)
0 वैदिक साहित्य के अनुवाद की एक बहुत बड़ी कठिनाई दुर्निवार है-हमारे पास उस भाषा को समझने के साधन नहीँ बचे हैँ जिसमें वेद निबद्ध हैँ।(202) ... ‘हम वैदिक भाषा से दूर हो चुके हैँ और अब हम वेदोँ का तात्पर्य नहीं समझ सकते। आगे स्पष्ट किया गया है कि संस्कृत के उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित, तीन स्वर होते हैं, स्वरांकन न हो तो अर्थ बदल सकता है, इससे ‘आत्मातत्त्वमसि‘ को ‘आत्मा तत्त्वमसि‘ या ‘आत्मा अतत्त्वमसि‘ दोनों पढ़ सकते हैं। ... वेद का तात्पर्य क्या है इसका निर्णय वर्तमान समय मेँ केवल युक्तियोँ के आधार पर होता है।(204-205) वेद, श्रुति कहे गए हैं ... वेद हमेशा सुने ही जाते हैं(207)
0 भारतीय ज्ञान पद्धति आइकेएस के दौर में ऋग्वेद और अथर्ववेद ही हमारे परस हैं, जिनका जो भी तात्पर्य हो, ‘प्राचीन भारत‘ में तकनीकी का परिचय देना नहीं है।
209- वेद-वेदांग और शास्त्रीय ग्रंथों को इतिहास जानने के स्रोत माना जाता है, वह है भी, मगर वह वहीं तक सीमित रह जाता है, मान लिया जाता है कि उनकी इतनी ही उपयोगिता थी, इतना ही महत्व है...
208- कविता वेदार्थ का उपबृंहण। भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
210- एकमात्र-ता, बेलनी सपाटीकरण का विरोध
0 मेरा अनुरोध यहाँ केवल यह है कि इस अनुवाद को वेद-मन्त्रोँ का ‘अर्थ‘ न समझा जाय, ...‘ इसे अर्चना में चढ़ाया गया जवा पुष्प कहते हैं तो राम की शक्ति पूजा पर उनकी टीका 'छन्द छन्द पर कुङ्कुम' की याद आती है।(226)
0 घर जाओ अपने पति के/ जो अब तुम्हारा है/ स्वामिनी बनो अब तुम उसकी/ उस घर मेँ जो आवे/ तुम्हारे बस मेँ रहे/ हुक्म चलाओ उन सब पर/ जो उस घर से पलते हैँ(272-73)
0 ‘कुमारी‘ का एक अर्थ है ‘वह वधू जिसका पति उससे विवाह के पहले तक कुँवारा रहा है‘(325) वर-बराती (245-246)
0 भूमिका में अक्षर योजना, वेद अपौरुषेय
0साहित्याचार्य्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी की पुस्तक (1940) में ‘भाषाकी शिक्षा’ में चंद्र बिंदु का ही प्रयोग हुआ है।

Tuesday, March 10, 2026

श्रीराम-राज्य-वियोग

‘जाज्वल्या‘ पत्रिका का प्रकाशन जांजगीर-चांपा जिला से विगत वर्षों से किया जा रहा है। इस संबंध में पत्रिका के मुख्य संपादक, कलेक्टर, जिला जांजगीर-चांपा श्री जनमेजय महोबे ने संपादकीय में लिखा है-... जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला जिले की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि बन चुका है।

यह महोत्सव शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, कृषकों एवं आम नागरिकों की सहभागिता से साकार होने वाला एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। तीन दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक कलाकारों के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों, विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं की प्रस्तुतियाँ लोक संस्कृति की विविध छवियों को मंच प्रदान करती हैं। यह मंच नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है।
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इस अवसर (9 से 11 फरवरी) पर प्रकाशित जाज्वल्या स्मारिका जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना का दर्पण है। इसमें जिले के पर्यटन, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर आधारित लेख, कविताएँ एवं रचनाएँ नए दृष्टिकोण के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं ...

‘जाज्वल्या 2026‘ में प्रकाशित मेरे लेख को समय-सीमा के कारण इसे वांछित रूप नहीं दे सका था, मगर पत्रिका के संपादक मंडल ने इसे पत्रिका में प्रमुखता से स्थान दिया, इसके लिए आभार। वह लेख अब कुछ आवश्यक संवर्धन सहित यहां प्रस्तुत- 

श्रीराम-राज्य-वियोग की काव्य-करुणा और जीवन-उमंग 

वैष्णवी भक्ति में वियोग को भी कृपा की तरह देखा गया है, क्योंकि वियोग में जैसी उद्दाम भावना और विकल स्मृति होती है, वह संयोग में नहीं। संभवतः यही भावधारा प्रवाहित हुई होगी शिवरीनारायण सज्जनाष्टक के पं. मालिकराम भोगहा जी के मन में, जिसका परिणाम हुआ ‘श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक‘ की रचना। इस महत्वपूर्ण नाटक की प्रति दुर्लभ होने के कारण इसकी चर्चा कम ही हुई है। यह रचना छत्तीसगढ़ की आरंभिक महत्वपूर्ण नाट्य-कृति है, जिसे पढ़ कर कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह अपने दौर के राम-साहित्य की एक अनुपम और बेजोड़ रचना है। इस पुस्तक के आरंभ में पं. लोचनप्रसाद पांडेय जी ने ग्रन्थकार पण्डित मालिकराम त्रिवेदी भोगहा (द्विजराज) की संक्षिप्त जीवनी लिखी है, जिसका एक अंश इस प्रकार है-

12 जनवरी सन् 1910 के मारवाड़ी (नागपुर) के अंक में, पं. मालिकरामजी की सचित्र, संक्षिप्त, जीवनी प्रकाशित हुई थी और उक्त पत्र के 22 दिसंबर 1909 के अंक के सम्पादकीय स्तम्भ में उनपर एक नोट छपा था। हम उसे नीचे उद्धृत करते हैं- ‘छत्तीसगढ़ के एक गुप्त हिन्दी साहित्यसेवी पं. मालिकराम त्रिवेदी भोगहा की असामयिक मृत्य से हिन्दी माता को बड़ी क्षति पहुंची है। पं. मालिकराम सुप्रसिद्ध ठाकुर जगन्मोहनसिंह के प्रवीण और प्रियतम शिष्य थे। वर्षों तक आप ठाकुर साहब के साथ रहे थे और देशाटन भी किया था। बिलासपुर ज़िले के अन्तर्गत शबरीनारायण क्षेत्र में आप निवास करते थे। शबरीनारायण मन्दिर के पुजारी (भोगहा) और कई गाँवों के अधिकारी थे। आप हिन्दी के उत्कृष्ट लेखक और कवि थे। रामराज्य-वियोग (नाटक); सुलोचना सती (नाटक); स्वप्नसम्पत्ति (नवन्यास); पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य; मालती (काव्य); सुरसुन्दरी (काव्य); आदि कई एक ग्रन्थ आपने रचे हैं। अफसोस आप अपने ग्रन्थों को प्रकाशित न कर सके। हिन्दी के सिवा, आप संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, उड़िया, बँगला, मराठी और अँगरेज़ी भी जानते थे। गान और संगीत विद्या के बड़े प्रेमी और बड़े ईश्वर-भक्त थे। आपकी मृत्यु 30 नवम्बर 09 को हुई। आपकी उम्र 37-38 वर्ष की थी। आपके वियोग से आपके वृद्ध पिता और कुटुम्ब के लोगों के साथ साथ हिन्दी को भी बड़ी हानि पहुंची है। ईश्वर आपके कुटुम्बियों को धैर्य और मृत आत्मा को शान्ति प्रदान करे।‘
पं. मालिकराम भोगहा

इस कृति पर आगे चर्चा के पहले स्मरण करते चलें कि शिवरीनारायण न सिर्फ जिले का, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का पुराना वैष्णव मठ है। जिले के लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद और जांजगीर के विष्णु मंदिर में रामकथा के प्रसंगों का सुंदर शिल्पांकन है। हमारा जिला रामनामी समुदाय की भक्ति से ओतप्रोत है, जहां अकलतरा में रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा रही है। साथ ही बनारी के पं. रामरक्षित, धुरकोट के ठाकुर रणजीत सिंह, जांजगीर के पं. जगदीश्र चंद्र तिवारी तथा कोड़ाभाट के जगदीश्वर सिंह जैसे रामकथा वाचकों की परंपरा रही है।

यहां छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य का संक्षिप्त उल्लेख प्रासंगिक होगा। छत्तीसगढ़ के कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय (1885-1951) की रचना है ‘मैथिली मंगल‘। उन्होंने सरल भाव से व्यक्त किया है कि जबलपुर के राजा गोकुलदास के यहां विवाह का कल्पनातीत वृहद आयोजन देख कर उनके मन में आया कि राम-सीता का विवाह कितना दिव्य रहा होगा और उसे किस तरह से शब्दों में, काव्य में उतारा जा सकता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की ही एक अन्य उल्लेखनीय और मनोरम रचना गिरधारीलाल रायकवार जी रचित हल्बी नाटक ‘सीता बिहा नाट‘ है। इस नाटक के संदर्भ में 1998 में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग से प्रकाशित (तत्कालीन मंत्री हमारे गृह जिले के डॉ. चरणदास महंत) डॉ. हीरालाल शुक्ल संपादित-संयोजित हल्बी, माड़िया और मुरिया रामकथा के तीन भारी-भरकम खंडों का उल्लेख आवश्यक है, जिनमें गिरधारीलाल जी की यह रचना शामिल है। एक अन्य उल्लेख, छत्तीसगढ़ सम्मिलित मध्यप्रदेश के दौरान भोपाल में 1970 में ‘रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति’ का गठन किया गया। इस समिति के संस्थापक हमारे गृहग्राम अकलतरा निवासी पं. रामभरोसे शुक्ल के मानस-मर्मज्ञ पुत्र पं. गोरेलाल शुक्ल जी (आईएएस) थे। समिति के मानस भवन से ‘तुलसी मानस भारती (मासिक)‘ पत्रिका का प्रकाशन पं. शुक्ल के प्रधान संपादकत्व में आरंभ हुआ। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य साधकों का स्मरण आवश्यक है, उन बहुतेरों में से कुछेक-

बिलासपुर निवासी महामहोपाध्याय जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ अल्प-चर्चित राम-रसिक हैं। उन्होंने तुलसी रामायण का अनुशीलन करते हुए महत्वपूर्ण मीमांसक कृतियों का प्रणयन किया, जो नवपंचामृत रामायण (1896), ‘तुम्हीं तो हो‘ का पहला भाग ‘रामाष्टक‘ (1914), श्रीतुलसी तत्वप्रकाश, रामायण प्रश्नोत्तरमाला सहित (1931), श्रीरामायण वर्णावली (1936), श्रीतुलसी भावप्रकाश (1937) हैं। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, मानस में रामकथा (1952), भारतीय संस्कृति को गोस्वामी तुलसीदास का योगदान (चार व्याख्यानों का संग्रह 1953), मानस-माधुरी (1958), खंड काव्य राम-राज्य (1960, पाठ्य संस्करण 1972), तुलसी-दर्शन (1938-39 में डी. लिट्. के लिए हिंदी में प्रस्तुत प्रथम शोध-प्रबंध, सातवां संस्करण 1967 में प्रकाशित) जैसी पुस्तकों के लेखक हैं।

हरि ठाकुर ने ‘छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास‘ शीर्षक लेख द्वारा इस विषय का विस्तार से परिचय दिया था। उनकी 1990 की डायरी में 47 रामकथा-साहित्य की सूची है, जो महाकवि नारायण के रामाभ्युदय महाकाव्य से आरंभ होती है, मगर क्रमांक में आरंभिक 10 इस प्रकार हैं- 1 राम प्रताप-महाकवि गोपाल, 2 तास रामायण-ठाकुर भोला सिंह बघेल, 3 छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम, 4 मैथिली मंगल-शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, 5 कोशल किशोर-डा. बलदेव प्रसाद मिश्र, 6 छत्तीसगढ़ी रामायण-पं. सुन्दरलाल शर्मा, 7 वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप, 8 राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार, 9 राम केंवट संवाद-पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र 10 राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी आदि। इस क्रम में हमारे जिले के मेरे गृह-ग्राम अकलतरा निवासी गुलाबचंद देवांगन का ‘छत्तीसगढ़ी रमायेन‘ उल्लेखनीय प्रकाशन है। यह क्रम लंबा है, इसे यहां विराम देते हुए वापस श्रीरामराज्यवियोग नाटक पर आते हैं।

श्रीरामराज्यवियोग नाटक की प्रकाशित पुस्तक में भूमिका स्वयं भोगहा जी ने लिखी है, इससे स्पष्ट होता है कि इस नाटक के प्रकाशन की योजना तैयार हो गई थी, मगर प्रकाशन-पूर्व उनका निधन हो गया। भूमिका में वे लिखते हैं- कई वर्षों के कठिन परिश्रम से आज इसकी भूमिका लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लोक प्रसिद्ध है,- ‘कोई भी वृहत् कर्म काल पा-कर, अवशेष पावे, तो उस कर्मकर्त्ता का हृदय अमित आनन्द का आगार बन जाता है।‘ उसी तरह मैं भी आज प्रफुल्ल हृदय हो, इस हर्ष से नहीं अघा सकता। इसका प्रारम्भ विचारने में एक कल्प बीत गया। अनेक आधि, व्याधि और उपाधियों से मन को कई बार समाधि देनी पड़ी थी। परन्तु दृढ़ साहस से अनेक असह्य दुःख रूपी पर्वत को लांघते आज अकस्मात् आनन्द-सागर के पुण्य-तट पर आ पहुँचा। ... ... ... इस पुस्तक की पूर्ति सात अंकों में हुई है। गर्भांकों की संख्या बीच बीच में मिलेगी। जिस प्रकार प्रस्तावना में प्रतिज्ञा है उसी रीति पर रचना की गई है। प्रत्येक रस को यथामति उनके स्वरूप ही में वर्णन किया है। यों तो इस में शक्तिभर प्रत्येक रस का विवरण है, परन्तु करुणा रस प्रधान है। इसी से मुझे सुदृढ़ आशा है कि, पाठक गण इसे आदर देंगे। ... ... ... इस कहावत से- परको अवगुण देखिये, अपनो दृष्टि न होय। करै उजरो दीप पै, तरे अँधेरो होय।। मैं अपना दोष नहीं देख सकता। आशा है कि, क्षमाशील पाठक गण कृपापूर्वक सूचित करेंगे, तो दूसरी आवृत्ति में अशुद्धियां शुद्ध कर दी जावेंगी। नाटक के पूर्व कवित्त है, जिसका अंतिम पद है- ‘धर्म चाहो कर्म चाहो वेदहू के मर्म चाहो, तो हे मीत! चाहो नित रामायण देखनो।‘ - रामायण में धर्म, कर्म और वेद का मर्म भी है। जैसाकि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रंथ को ‘वेदोपबृंहणार्थाय‘ बताया है। शांत रस प्रधान, यथार्थपरक महाभारत का मूल स्वर वैराग्य है तो आदर्शपरक रामायण को करुणा-शोक का महाकाव्य निरूपित किया गया है। वाल्मीकि रामायण बालकांड द्वितीय सर्ग में ‘शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोका ...‘ कहा गया है। 

आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत की कारिका-5 में ‘मा निषाद ...‘ पर कहते हैं- ‘नाना प्रकार के शब्द, अर्थ और संघटना के प्रपंच से मनोहर काव्य का सारभूत वही अर्थ है। तभी सहचरी के वियोग से कातर कौंच के क्रंदन से उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकि का शोक श्लोक रूप में परिणत हुआ है- ‘... शोकः श्लोकत्वमागतः‘। आगे चतुर्थ उद्योत की कारिका-5 में कहा है- ‘रामायणे हि करुणो रसः स्वयमादिकविना सूत्रितः ‘शोकः श्लोकत्वमागतः‘ इत्येवंवादिना।‘ इस तरह रामायण में स्वयं कवि ने करुण रस का प्राधान्य सूचित किया है।

श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक में वही करुणा, वैसी ही दारुण व्यथा उभरती है, भोगहा जी ने स्वयं लिखते है- ‘मैं यह नहीं कह सकता कि, इस नाटक की रचना का अन्त, महाराज दशरथ के अन्त तक ही क्यों रखा गया?‘ ऐसा जान पड़ता है कि भोगहा जी की यह कृति उनके स्वयं के जीवन की रामायणमय-करूणा और व्यथा से उपजी है, उनके एक पत्र का हवाला पंडित लोचनप्रसाद जी ने दिया है, यह पत्र अपने अंतिम दिनों में उपचार के लिए प्रयाग के राजवैद्य पंडित जगन्नाथ शर्मा के यहां से उन्हें लिखा था- ‘मेरी दशा शोचनीय है। एक ईश्वर ही अवलम्ब है। कहो, कि यहाँ क्यों आये? मनमें निश्चय करके कि- डूब गये तो डूबगे, पार भये तो पार। पिता एक तरफ रोते रहते, स्त्री एक तरफ रोती रहती. प्रिय परिवार सब अपनी अपनी ओर खींचते। इससे निश्चिन्त यहाँ अटल समाधि लगा कर सो जाने का सानन्द समय मिलेगा।‘ क्या अपने नवजात पुत्र की मृत्यु के पश्चात से अस्वस्थ रहने लगे, मरणासन्न हाल में पहुच गए भोगहा जी का जीर्ण तन और व्यथित मन, अपने पिता के पुत्र-विछोह की आशंका महसूस कर रहा था? 

वियोग की करुणा और विराग की निष्काम तटस्थता में भी काव्य-रस का अविरल-प्रवाह, जीवन के उमंग को अनुप्राणित करता रहता है। 

(श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक की प्रति का अवलोकन भोगहा जी के वंशज श्री वीरेन्द्र तिवारी जी एवं श्री हर्षवर्धन तिवारी जी के अनुग्रह से तथा श्री रवीन्द्र सिसोदिया जी के मार्गदर्शन और श्री रमाकांत सिंह जी के सहयोग से संभव हुआ।)

राहुल कुमार सिंह अकलतरा,
प्रमुख, धरोहर परियोजना,
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Sunday, March 8, 2026

मेघदूत: एक नई कहानी

78 आर.पी.एम. का तवा, जिस पर गीत बजता था- ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेसा ले जाना, अंसुवन की बूंदन बरसाकर, अलका नगरी में तुम जाकर, खबर मेरी पहुंचाना। मुझे याद है कि यह स्टैंडर्ड प्ले रिकार्ड हमने सुन-सुन कर घिस डाला था और तब सुई अटक जाती थी, ‘खबर मेरी पहुंचाना‘ पर। किसी फिल्मी गीत प्रेमी ने बताया कि यह तुम्हें इतना पसंद है, तो इसे भी सुन लो- ‘ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल। विरही जनों के करुण अश्रु जल, रुक जा रे एक पल। दूर दूर मेरा देश, जहाँ बिखराए केश, विरहन का बनाये वेश। प्रिया मेरी विदेश, कैसे काटे कलेश, उसे देना मेरा ये संदेश रे।‘ मगर मन वहीं अटका रहा, जो पहले सुनता रहा था- 'ओ वर्षा के पहले बादल ... खबर मेरी पहुंचाना, खबर मेरी पहुंचाना'।

स्कूली शिक्षा के अलावा जितनी और जैसी भी दीक्षा मिली अधिकतर फिल्मों से ही मिली, या चालू, ऐयारी-जासूसी किताबों से, जानकारियों और जिज्ञासा का खजाना। तब कहां पता था कि यह मेघदूत है, महाकवि कालिदास की अमर कृति पर आधारित गीत। कहा गया है ‘माघे मेघे गतं वयः‘ और ‘काव्येषु माघः कवि कालिदासः‘। कालिदास के काल की चर्चा में कहीं पढ़ा था- संस्कृत परीक्षाएं जब से होती हैं, उनमें आज तक यह प्रश्न नहीं आया कि कालिदास कब हुए? अंगरेजी कोर्स के इम्तहान में इस प्रश्न से शायद ही कभी अपना छुटकारा कर सकें।

किताब हाथ में आई है, जिस पर बादल और घुंघरू वाले पैर हैं। मेघदूत की राह तो आकाशीय है और पथिक, धरातलीय, फिर यह कैसा शीर्षक हुआ ‘मेघदूत की राह के पथिक‘! किताब खोल कर कदम-दर-कदम आगे बढ़ें तो पन्ने-दर-पन्ने जमीनी हकीकत के संग-साथ ‘आज तो पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे‘ जैसी ‘मध्यमा‘ धुन मन में होती है, आप किसी धुनी के साथ हों बिना धूनी रम सकते हैं। किसी जोगी की विरक्ति में आसक्ति, वियोग में ही संयोग-कामना प्रबल होती है और कवि मन ‘द्यावा-पृथिवी‘ में स्थित रचना-संभव होता है।

उमड़ते-घुमड़ते मेघ में आशा-आशंका दोनों है, वहीं जैसा विद्यानिवास मिश्र कहते हैं- ‘पर सुकुमार और परुष ये दोनों पक्ष बादल के पौरुष के प्रतीक हैं। वही धरित्री का कामरूप पुरुष है। उसके लिए धरित्री की पुकार प्रोषित पति के लिए प्रियतमा की पुकार है। आना जी बादल ज़रूर।‘ वही मानस के राम ‘प्रियाहीन डरपत मन मोरा‘ कहते हैं तो वाल्मीकि के राम शरद और वसंत में भी सीता-विरह से व्यथित हैं। वर्षा ऋतु आने पर उन्हें बिजलियां, सोने के कोड़े के समान, मेघों की गर्जना आर्तनाद के समान जान पड़ती है, और कहते हैं कि ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।

लेखक, हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘मेघदूत: एक पुरानी कहानी‘ से गुजरती हैं उनकी राह का पथिक बन मैं भटका पाठक द्विवेदी जी के ‘संदेशरासक‘ का भी रस लेने लगता हूं। ग्यारहवीं सदी का अपभ्रंश काव्य, जिसमें विरहिणी नायिका का संदेश वाहक पथिक मनुष्य है। द्विवेदी जी ने ‘मेघदूत‘ और ‘सन्देशरासक‘ की तुलना करते हुए मार्के की बात कही है- ‘संदेश कैसे दिया जाता है और क्या दिया जाता है, मुख्य बात यही है। वस्तुतः दोनों में कथावस्तु को बहाना बनाकर विरह-वर्णन का चित्रण करना ही कालिदास और अद्दहमाण का उद्देश्य है।

‘आषाढ़ का एक दिन‘ में मोहन राकेश इस सफर में अनंत तक पहुंच जाते हैं- ‘ये तो केवल कोरे पृष्ठ हैं। ... ... ...स्थान-स्थान पर इन पर पानी की बूंदें पड़ी हैं जो निःसंदेह वर्षा की बूंदें नहीं हैं। लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्ठों पर बहुत कुछ लिखा है। और आंखों से ही नहीं, स्थान-स्थान पर ये पृष्ठ स्वेद-कणों से मैले हुए हैं, स्थान-स्थान पर फूलों की सूखी पत्तियों पर अपने रंग इन पर छोड़ दिये हैं। कई स्थानों पर तुम्हारे नखों ने इन्हें छीला है, तुम्हारे दांतों ने इन्हें काटा है। और इसके अतिरिक्त ये ग्रीष्म की धूप के हल्के-गहरे रंग, हेमन्त की पत्रधूलि और इस घर की सीलन ... ये पृष्ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका? इन पर एक महाकाव्य की रचना हो चुकी है... अनन्त सर्गों के एक महाकाव्य की।‘

कवि बादल को तकता है और मानों बादल से परावर्तित एरियल व्यू वाले भूगोल को और इसी तरह इस राह की पथिक बनीं लेखक कैलास पहुंच जाती है। भटकता अतृप्त मेघ अपनी राह गहने वाले को वहां तक पहुंचा देता है, जहां- 
‘इस धरा के रहस्यों पर चलता, आस्था के दीये की लौ की कोमल उष्णता में मोम-सा पिघलता, शिखरों के मध्य चमकता पवित्र नदियों का उद्गम यह कैलास मेरे समक्ष है। ओह! यह कौन-सा पल है-
तारीख-20 अगस्त, 2018, दिन- सोमवार, हिन्दी महीना-सावन, तिथि-शुक्ल पक्ष, दशमी, समय- रात्रि 2ः45, योग- ब्रह्म, करण- भद्रा, नक्षत्र- विशाखा। 
मैं इस वक्त भीतर-बाहर से रिक्त थी। अब मैं ही दृष्टा और मैं ही दृश्य थी। अब मुझे सम्पूर्णता का आभास था।‘ 
(इस पुस्तक के पेज 225 का अंश)

पुनश्च- ब्रह्मपुत्र और सिंधु के साथ देश की तीसरी प्रमुख पुल्लिंग जलधारा ‘सोन नद‘ का स्मरण कि मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा 1983 में प्रकाशित देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘, नदियों पर मेरी पढ़ी किताबों में अग्रगण्य है तथा मेघदूत और रामगिरि की चर्चा के संदर्भ में पुणे की सुजाता देवधर जी का आभारी हूं, जिन्होंने कालिदास संशोधन मंडल, पुणे से 1960 में प्रकाशित वामन कृष्ण परांजपे की पुस्तक ‘Fresh Light on Kalidasa's Meghduta‘ की जानकारी दी, जिसमें उदयपुर, सरगुजा के रामगढ़ को मेघदूत से संबद्ध माना गया है। इसी तरह ऋत्विक घटक, कहानी ‘एक्सटैसी‘ में मध्यप्रदेश के मध्यतम प्रदेश के साथ महुआ और पलाश के पेड़ का उल्लेख करते लिखते हैं- ‘यह वही कालिदास के मेघदूत का देश है। हमारा सुंदर देश। निर्विकार ग्राम वधुओं की याद आ जाती है।‘

Friday, March 6, 2026

छत्तीसगढ़ : पत्र-पत्रकारिता

1982 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ छपी। विजय दत्त श्रीधर, संपादक और संयोजक, म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ ने ‘आभार‘ लिखा साथ ही पुस्तक में उनके लेख ‘मध्य प्रदेश में पत्रकारिता: उद्भव और विकास‘ तथा ‘ग्वालियर अंचल की पत्रकारिता‘ (ग्वालियर, मुंरैमा, भिण्ड, शिवपुरी, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले) शामिल हैं। अन्य लेख हैं- 

मालवा की पत्रकारिता (इन्दौर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, झाबुआ, धार, मन्दसौर, देवास और खरगोन जिले) - शिव अनुराग पटैरिया, राजेश बादल 

भोपाल अंचल की पत्रकारिता (भोपाल, सिहोर और रायसेन जिले) -भाई रतनकुमार 

महाकौशल की पत्रकारिता (जबलपुर, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, बालाघाट, मण्डला, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद, खण्डवा और बैतूल जिले) - गंगाप्रसाद ठाकुर 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले) - स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 

विध्य की पत्रकारिता (रीवा, सीधी, पन्ना, शहडोल, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया जिले) - अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव

‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ लेख में स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के साथ, प्रस्तुति-डा. सुशील त्रिवेदी, नाम भी है। पुस्तक का यह अंश- लेख, यहां प्रस्तुत है। 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता
-स्वराज्य प्रसाद  त्रिवेदी 
प्रस्तुति-डा० सुशील त्रिवेदी

छत्तीसगढ़ (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले।) में पत्रकारिता का इतिहास अपेक्षाकृत अधिक पुराना नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि यह इलाका बीहड़ जंगलों और पहाड़ों से भरा हुआ रहा और दूसरा यह कि यहाँ आवागमन के साधन बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक अत्यन्त न्यून थे। शिक्षा का कोई प्रसार नहीं था। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों का प्रकाशन इस क्षेत्र में विलम्ब से शुरू होना स्वाभाविक ही है। 

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान राजनाँदगाँव जिले (तत्कालीन राजनाँदगाँव रियासत) से 1889-90 में श्री भगवानदीन सिरौठिया ने ‘प्रजा हितैषी‘ नामक पहला पत्र निकाला था। यह पत्र रियासत के तत्कालीन शासक राजा बलरामदास के संरक्षण में प्रकाशित होता था। दुर्भाग्य से इस पत्र के अंक उपलब्ध नहीं हैं। इस पत्र को रियासती संरक्षण मिला हुआ था, इससे यह अनुमान किया गया है कि इसकी शैली और विचार पर रियासत की छाप थी और यह जनभावनाओं का सच्चा प्रतीक नहीं था। 

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का प्रारंभ ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ से माना जाता है। जनवरी 1900 में इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन पेण्डरा (बिलासपुर जिला) से प्रारंभ हुआ था। इसके प्रकाशक रायपुर के प्रसिद्ध जनसेवी स्वर्गीय पण्डित वामनराव लाखे और सम्पादक पं० माधवराव सप्रे तथा पं० रामराव चिंचोलकर थे। चिंचोलकर जी बिलासपुर के रहने वाले थे और वकालत करते थे। (उनका स्वर्गवास 1906 में हो गया था)। ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का मुद्रण पहले रायपुर के कय्यूमी प्रेस से होता था। बाद में वह देशसेवक प्रेस, नागपुर से छपता रहा। 32 पृष्ठ की यह पत्रिका 1/8 डिमाई आकार की थी। इसका वार्षिक शुल्क केवल डेढ़ रु० था। इसके प्रथम और अंतिम 4 पृष्ठ रंगीन कागज के होते थे।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के प्रथम अंक में इसके प्रकाशन के उद्देश्यों को बताते हुए संपादक-द्वय ने लिखा ‘सम्प्रति छत्तीसगढ़ विभाग को छोड़ ऐसा एक भी प्रान्त नहीं है जहाँ दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या त्रैमासिक पत्र प्रकाशित न होता हो। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि सुसम्पादित पत्रों के द्वारा हिन्दी भाषा की उन्नति हुई है, अतएव यहाँ भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी भाषा में उन्नति करने में विशेष प्रकार से ध्यान दे। आजकल भाषा में बहुत सा कूड़ा-कर्कट जमा हो रहा है, वह न होने पावे इसलिए प्रकाशित ग्रन्थों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा समालोचना भी कहे।‘

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा मानता था। यह पत्र हिन्दी को ठोस, सुरुचिपूर्ण, प्रगतिशील साहित्य देना चाहता था। ‘मित्र‘ ने हिन्दी में आलोचना की शुरूआत की थी और क्रमशः उसके स्तर को ऊपर उठाया था। अपने छोटे से काल में उसने तत्कालीन पत्रिकाओं में काफी ऊँचा स्थान अर्जित कर लिया था। देश के प्रायः सभी पत्रों ने उसकी नीति की प्रशंसा की थी और सभी प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ इसमें प्रकाशनार्थ दीं। ‘मित्र‘ के स्तम्भ थे- प्रेरित पत्र, हितबोध, सुभाषित संग्रह, समाचार प्राप्त, नारी धर्म और नारी शिक्षा, लोकोक्ति और कहावत, समालोचना तथा जीवनी। इसमें घारावाहिक लेख भी छपते थे। 

सप्रे जी ने ‘मित्र‘ के माध्यम से लेखकों की एक पीढ़ी तैयार की। इस पत्र में पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं० श्रीधर पाठक, पं० कामता प्रसाद गुरु, पं० गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं० जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल जैसे अनेक शीर्षस्थ लेखकों की प्रारम्भिक रचनाएँ छपीं। अर्थाभाव के बाद भी मित्र का प्रकाशन होता रहा। सत्रे जी का अपने पाठकों पर पूरा विश्वास था। फिर भी यह पत्र स्वावलम्बी न बन सका। जनवरी 1902 के अंक में सम्पादकों ने घोषणा कर दी कि ‘यदि इस वर्ष भी घाटा रहा तो समझ लीजिए आपके प्रिय ‘मित्र‘ के 100 वर्ष पूरे हो चुके और फिर यही इसकी आयु का अंतिम वर्ष भी होगा।‘ अंततः दिसम्बर 1902 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का प्रकाशन बन्द होने के बाद एक दीर्घ अन्तराल आया। इसी बीच छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सक्रियता आयी। कांग्रेस द्वारा संचालित कार्यक्रम तेजी से चल पड़े। समाज सुधार की और जन नेताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। सन् 1914 में रायपुर जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रयास हुआ जिसके जरिये ‘कबीर पंथी‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। परंतु यह पत्रिका ज्यादा चल नहीं सकी।

सन् 1919 में रायपुर से कान्यकुब्ज सभा द्वारा ‘कान्यकुब्ज नायक‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन पं० रघुबर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में किया गया। यह प्रयास भी अल्पजीवी रहा और एक वर्ष चलकर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। पत्र का वार्षिक मूल्य दो रुपये था। इस पत्र की व्यवस्था पं० मातादीन शुक्ल के जिम्मे थी।

सन् 1920 से 1930 तक की अवधि पत्रकारिता के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही। इस दौरान महात्मा गांधी का सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी हो चुका था। विदेशी शासन के प्रति आम जनता का विरोध मुखर हो चला था। कांग्रेस ने आजादी के लिए दो-आयामी कार्यक्रम संचालित किये थे। पहले के द्वारा स्थानीय शासन संस्थाओं और धारा सभाओं के चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया और दूसरे कार्यक्रम के तहत सत्याग्रह संचालित करने और सामाजिक उत्थान के रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने को प्राथमिकता दी गयी। पत्रकारिता की दृष्टि से उल्लेखनीय बात यह भी थी कि छत्तीसगढ़ से बाहर जाकर पं० माधवराव सप्रे ने हिन्दी ग्रन्थमाला की नींव डाली और फिर हिन्दी ‘केसरी‘ का सम्पादन किया। ‘कर्मवीर‘ और ‘श्री शारदा‘ के संस्थापन में भी सप्रे जी का प्रमुख प्रभाव था। 1920 में छत्तीसगढ़ के ईसाई समाज ने मसीही मासिक ‘भानूदय‘ मुंगेली से निकालना शुरू किया। इसके सिर्फ चार अंक छपे थे।

तीसरे दशक में बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने श्री कुलदीप सहाय के सम्पादन में ‘विकास‘ मासिक का प्रकाशन किया था। श्री सहाय ‘विकास‘ के अलावा ‘कर्मवीर‘ तथा ‘महाकोशल‘ के सम्पादन से भी जुड़े थे। 

रायगढ़ जिले के चन्द्रपुर स्थान से 1923 में मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित हिन्दी मासिक ‘छत्तीसगढ़‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

सन् 1930 से 1940 तक की अवधि में जैसे-जैसे राष्ट्रीय गतिविधियाँ तेज हुई, वैसे-वैसे छत्तीसगढ़ में पत्रिकारिता का स्वरूप भी पल्लवित-पुष्पित होता गया। रायपुर के वयोवृद्ध पत्रकार श्री कन्हैयालाल वर्मा ने सन् 1934 में नागपुर से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘हिन्दवासी‘ का सम्पादन किया। 

सन् 1935 में डिस्ट्रिक्ट कौंसिल, रायपुर द्वारा ‘उत्थान‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इसके सम्पादक पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी थे। पत्र इण्डियन प्रेस से प्रकाशित होता था। छपाई अत्यन्त सुन्दर थी। इसमें शिक्षा और साहित्य से संबंधित विषयों पर समानुपात में लेख प्रकाशित होते थे। शिक्षा संस्थाओं और आम लोगों, दोनों के ही बीच यह पत्र बहुत लोकप्रिय था। इसमें छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित होती थी। जब सरकार ने रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल को भंग कर दिया तब ‘उत्थान‘ को 1937 के बाद बन्द कर दिया गया। छत्तीसगढ़ का यह महत्वपूर्ण मासिक-पत्र लगभग साढ़े तीन वर्ष तक प्रकाशित हुआ। पण्डित नेहरू तथा डा० राजेन्द्र प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इस प्रकाशन को सराहा था। 

सन् 1935 में रायपुर से मासिक पत्रिका ‘आलोक‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिन्दी साहित्य मण्डल द्वारा किया जाता था और श्री केशव प्रसाद वर्मा तथा श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी इसका संपादन करते थे। इस पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक सक्रियता को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान किया था। श्री केशव प्रसाद वर्मा के संपादकत्व में पटेरिया बुक डिपो, रायपुर, ने शैक्षणिक पत्रिका ‘शिक्षा‘ के भी कुछ अंक प्रकाशित किये। 

सन् 1936 में धारा सभा के चुनाव के बाद प्रथम बार सन् 1937 में तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बना था। कांग्रेस के उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार के लिए रायपुर से पहली बार साप्ताहिक ‘कांग्रेस पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके संपादक सर्वश्री नन्द कुमार दानी, गौरीशंकर आगम तथा स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी थे। 

सन् 1936 में दुर्ग से ‘हैहयवंश‘, सन् 1937 में सरगुजा से ‘सरगुजा सन्देश‘ और धमतरी से ‘नवयुवक‘ पत्रों का प्रकाशन हुआ। 1940 में राजकुमार कालेज ने अर्द्धवार्षिक पत्र ‘मुकुट‘ का प्रकाशन शुरू किया। 

वर्ष 1941 से शुरू होने वाले दशक में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का विकास ज्यादा तेज गति से हुआ। दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों के प्रकाशनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 

रायपुर जिला 
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ‘अग्रदूत‘ के प्रकाशनारम्भ से जबरदस्त शक्ति मिली थी। विदेशी हुकूमत के विरुद्ध इस साप्ताहिक अखबार (सम्पादक केशव प्रसाद वर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी) ने जबरदस्त अभियान चलाया। छत्तीसगढ़ का यह पहला राष्ट्रवादी समाचार पत्र 20 जून 1942 से रायपुर में छपना शुरू हुआ था। सन् 1943 में प्रांतीय प्रेस सलाहकार समिति के संयोजक ने इसके सम्पादकों को ‘आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन‘ के लिए दो बार चेतावनी दी थी। सितम्बर 1943 में इसके सम्पादकों को तीन माह के लिए जाँच आदेश दिये गये। 1943 की अंतिम तिमाही में श्री केशव प्रसाद वर्मा के गिरफ्तार होने पर इस अखबार का प्रकाशन अस्थायी तौर पर स्थागित कर दिया गया जो 1944 में फिर शुरू हुआ। यह साप्ताहिक अभी भी प्रकाशित हो रहा है। सम्पादक हैं श्री विष्णु सिन्हा। ‘अग्रदूत‘ में प्रकाशित होने वाली राजनीतिक डायरी बहुत लोकप्रिय हुआ करती थी। 

सन् 1943-44 में श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादन में ‘सावधान‘ साप्ताहिक का रायपुर से कुछ समय तक प्रकाशन हुआ था। श्री द्विवेदी हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में ‘नवभारत‘ (नागपुर) से जुड़े हुए हैं। ‘नवभारत‘ का रायपुर संस्करण उन्हीं के संपादकत्व में आरंभ हुआ था। 

पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा नागपुर से साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ का प्रकाशन किया जाता था। इसके सम्पादक श्री सांताचरण दीक्षित और श्री कुलदीप सहाय जैसे वरिष्ठ पत्रकार थे। बाद में, मार्च 1946 में यह पत्र रायपुर आ गया और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के संपादन में प्रकाशित होने लगा। 

साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ शीघ्र ही छत्तीसगढ़ का प्रमुख समाचार-पत्र बन गया। वर्ष 1948 में श्री श्यामाचरण शुक्ल भी ‘महाकोशल‘ के सम्पादन कार्य में सहयोगी बन गये। 

वर्ष 1951 में ‘महाकोशल‘ दैनिक हो गया। छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाला यह पहला दैनिक है। छत्तीसगढ क्षेत्र के प्रायः सभी वरिष्ठ पत्रकार अपने प्रारंभिक समय में इससे जुड़े रहे। सन् 1954 में जब श्री त्रिवेदी शासकीय सेवा में चले गये तब विश्वनाथ वैशम्पायन इसके सम्पादक बने। उनके बाद सर्वश्री विष्णुदत्त मिश्र तरंगी, गुरुदेव कश्यप, कमल दीक्षित इसके सम्पादक रहे। शासकीय सेवा से निवृत्त होने पर श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 1979 में पुनः इसके सम्पादक बने। सम्प्रति श्री कमल ठाकुर इसके सम्पादक हैं। 

सन् 1947 में ‘छत्तीसगढ़ केशरी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 1952 में इसका नाम ‘हिन्द केशरी‘ कर दिया गया। इस नाम से यह तीन वर्ष तक निकलता रहा। सन् 1948 में ‘श्री‘ नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्रिका 1952 में बन्द हो गयी । 

1948 में श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ के सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्याम सुकवि थे और उनके सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका के रूप में कुछ वर्षों तक प्रकाशित होती रही। 
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख राजनीतिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने 4 सितम्बर 1950 से ‘राष्ट्रबन्धु‘ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया। यह अर्द्धसाप्ताहिक था और तत्कालीन शासन की नीतियों का कटु आलोचक था। 1953 में ठाकुर साहब सर्वाेदय आंदोलन में चले गये तो यह पत्र एक स्वतंत्र साप्ताहिक बन गया। अगले वर्ष इसका प्रकाशन बन्द हो गया। 1961 में फिर शुरू हुआ और बन्द हो गया। किन्तु 1967 में श्री हरि ठाकुर के सम्पादन में ‘राष्ट्रबन्धु‘ पुनः प्रकाशित होने लगा। 

सन् 1950 के पहले गास मेमोरियल सेन्टर, रायपुर, से ‘मसीही आवाज‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी के आसपास ‘साथी‘ नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित हुआ था। इसके संपादक श्री राजेन्द्र कुमार चौबे थे। कबीर पंथियों ने रायपुर से ‘वंश प्रताप मणि माला‘ का प्रकाशन मासिक के रूप में शुरू किया। 

सन् 1950 में महासमुन्द से मासिक ‘सेवक‘ का प्रकाशन हुआ किन्तु एक वर्ष चल कर यह बन्द हो गया। इसी वर्ष रायपुर से श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ ने साप्ताहिक ‘नव राष्ट्र‘ निकाला। यह स्वतंत्र विचारधारा का पत्र था। इसकी प्रसार संख्या सीमित थी किन्तु प्रभाव अच्छा था। यह समाचार-पत्र लगभग ग्यारह वर्ष तक निकलता रहा। इस अवधि में कई बार उसका प्रकाशन स्थगित भी हुआ। रायपुर से वर्ष 1951 में ‘रायपुर समाचार‘ निकला। यह साप्ताहिक था, जो सिर्फ एक साल चला। 

रायपुर जिले से पहला अंग्रेजी पत्र 1953 में जगदीशपुर से प्रकाशित हुआ। मेनोनाइट मिशन की सामान्य सभा द्वारा प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्र का नाम था, ‘इण्डिया कालिग‘। वर्ष 1953 में इसका सिर्फ एक अंक प्रकाशित हुआ, फिर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। वर्ष 1956 में इसका पुनः प्रकाशन हुआ। रायपुर से 27 नवम्बर 1959 से ‘प्रिज्म‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक कुछ समय के लिए निकला। दिसम्बर 1960 में रायपुर से श्री क्रांति कुमार द्विवेदी ने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘वाल्कैनो‘ शुरू किया। पर यह पत्र ज्यादा समय तक चल नहीं सका। 

1954 में गास मेमोरियल सेंटर, रायपुर ने हिन्दी और सिधी में ईसाई धर्म की पत्रिका ‘प्रकाश‘ निकालना शुरू किया। इसका प्रकाशन 1958 में बन्द हो गया। सिन्धी पाठकों के लिए 1955 में निर्दलीय साप्ताहिक ‘लोक सेवा‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। किन्तु एक अंक के बाद ही इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष महासमुन्द से ‘लोकसेवा‘ नामक हिन्दी पत्र निकला जो 1956 तक चला। धमतरी के पास शांतिपुर के मेनोनाइट चर्च ने 1956 में हिन्दी साप्ताहिक ‘मेनोनाइट पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका कुछ वर्षों तक चली। 

वर्ष 1956 में श्री खूबचन्द बघेल ने ‘छत्तीसगढ़‘ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया जो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रवक्ता पत्र था। इसका प्रकाशन जनवरी 1958 में बन्द हो गया। भारत सेवक समाज की रायपुर जिला शाखा ने 1956 में ‘भारत सेवक‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली जो 1960 तक चली। महासमुन्द में आर्य समाज ने आदर्श भारती‘ नामक मासिक का प्रकाशन 1957 में शुरू किया। यह पत्रिका रायपुर जिले में ईसाई मिशन के अभियान की कटु आलोचक थी। इसी वर्ष रायपुर से हिन्दी साप्ताहिक ‘रायपुर टाइम्स‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1959 पत्रकारिता के इतिहास की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इस वर्ष चार सामयिकी के अतिरिक्त यहाँ से दो दैनिक पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। 9 अप्रैल 1959 को ‘नवभारत‘ श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादकत्व में और 19 अप्रैल 1959 को ‘नई दुनिया‘ श्री मायाराम सुरजन के संपादन में निकलने लगा। बाद में ‘नई दुनिया‘ ने दैनिक ‘देशबन्धु‘ नाम ग्रहण कर लिया। 

1960 से श्री गोविन्दलाल वोरा ‘नवभारत‘ के सम्पादक हैं। श्री वोरा रायपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। अब यह जिम्मेदारी ‘नवभारत‘ की उप-संपादक श्रीमती आशा शुक्ला सम्हाल रही हैं। ‘नवभारत‘ के नरेन्द्र पारख ने गत वर्ष वीरनारायण सिंह पुरस्कार पाया। 

ग्रामीण पत्रकारिता को नये आयाम देने वाले ‘देशबंधु‘ का सम्पादन श्री ललित सुरजन कर रहे हैं। एक लम्बी अवधि तक श्री रामाश्रय उपाध्याय इसके स्थानीय सम्पादक रहे। ग्रामीण पत्रकारिता का स्टेट्समैन पुरस्कार स्थापना के प्रथम वर्ष ही ‘देशबंधु‘ के श्री राजनारायण मिश्र ने जीता। दूसरे और तीसरे साल भी क्रमशः श्री गिरिजा शंकर और श्री जिया उल हुसैनी ने यह गौरव पाया। ललित जी पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। 

साप्ताहिक ‘ठोकर‘ का प्रकाशन 23 जनवरी 1959 को शुरू होकर 1961 में बन्द हो गया। 

रायपुर का पहला सांध्य दैनिक ‘मध्यप्रदेश‘ 4 अक्टूबर 1959 को निकला, पर शीघ्र ही यह बन्द हो गया। इसी वर्ष दो पाक्षिकों, ‘नया कदम‘ और ‘रिपब्लिक‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1960 में ग्यारह समाचार पत्र निकले। इनमें 26 नवम्बर 1960 से शुरू हुआ सांध्य दैनिक ‘विचार और समाचार‘ उल्लेखनीय था। इसके सम्पादक श्री विश्वनाथ वैशम्पायन थे। बाद में यह साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। सुसम्पादन के लिए यह प्रशंसित हुआ था। इसका प्रकाशन लगभग सात वर्ष तक हुआ। अर्द्ध साप्ताहिक पत्र ‘रायपुर न्यूज‘ का प्रकाशन 30 अप्रैल 1960 से शुरू हुआ था। श्री किशोरीलाल मिश्र इसके सम्पादक थे। ‘एम०पी० टाइम ऐण्ड टाइड‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक भी इसी समय निकला। फरवरी 1960 से ‘राय चक्र‘ नामक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ परन्तु आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन करने के कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया। इसी अवधि में महासमुन्द से ‘छत्तीसगढ़ समाचार‘, ‘श्यामसुन्दर‘ और ‘तहलका‘ साप्ताहिक निकला। रायपुर से ‘बढ़ते चलो‘, ‘हमराही‘, ‘सिने तरंग‘ और ‘ग्राम दर्शन‘ का प्रकाशन हुआ। 

रायपुर से एक अन्य दैनिक ‘युगधर्म‘ का प्रकाशन 26 जनवरी 1961 से शुरू हुआ। प्रथम संपादक श्री पद्माकर भाटे थे। बीच में श्री रामावतार शर्मा भी संपादक रहे। अब इसके सम्पादक श्री बबन प्रसाद मिश्र हैं। इसी वर्ष ‘अनमोल‘, ‘जननाद‘, ‘जागते रहो‘, ‘भारत टाइम्स‘ साप्ताहिक पत्रों और ‘सहयोग दर्शन‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। 26 जनवरी 1962 से साप्ताहिक ‘नभ‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री मधुकर खेर इसके सम्पादक थे। 5 अंकों के बाद ‘नभ‘ बन्द हो गया। 

वर्ष 1964 और 1970 के बीच रायपुर से एक सांध्य दैनिक, दो अर्द्ध साप्ताहिक, पन्द्रह साप्ताहिक, तीन पाक्षिक, दो मासिक, एक द्वैमासिक और एक त्रैमासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। इनमें से ‘समाचार दर्पण‘ नियमित रूप से साप्ताहिक के रूप में दो वर्ष (1964-65) तक प्रकाशित हुआ। श्री कुमार साहू इसके सम्पादक और श्री कनक राम कोठारी प्रकाशक थे। इसी तरह ‘रायपुर सन्देश‘ सांध्य दैनिक भी मई 1966 में निकला जो 25 अक्टूबर 1967 को बन्द हो गया। जुलाई 1966 से निकलने वाला साप्ताहिक ‘स्नातक‘ विद्यार्थियों के बीच बहु-प्रसारित था किन्तु इसका प्रकाशन भी अक्टूबर 1969 में बन्द हो गया। अक्टूबर 1965 से ‘साजना‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। यह साहित्यिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष तक हुआ। 1964 में विवेकानन्द आश्रम ने त्रैमासिक ‘विवेक ज्योति‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विषयों की है। 

रायपुर के अन्य पत्रों में स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध तथा जयनारायण पांडे की स्मृति में अक्टूबर, 1965 से श्री हरि ठाकुर के संपादन में मासिक ‘संज्ञा‘, ‘हस्ताक्षर‘ (विभु खरे), ‘छत्तीसगढ़ी‘ (दयाशंकर शुक्ल), ‘छत्तीसगढ़ केसरी‘ (दीपचन्द डागा), ‘जवाहर ज्वाला‘ (साप्ताहिक), ‘छत्तीसगढ़ सेवक‘ (पाक्षिक), ‘लोकशक्ति‘ (सांध्य दैनिक), ‘प्रजापुकार‘ (साप्ताहिक), ‘गाइड‘ (उर्दू साप्ताहिक), ‘आजाद कलम‘ (साप्ताहिक), ‘सन्मार्ग‘ (साप्ताहिक), ‘कमलनंद‘ (पाक्षिक), ‘विजेता‘ (साप्ताहिक), ‘पहरेदार‘ (साप्ताहिक), ‘विजययंत‘ (साप्ताहिक), ‘तिनका‘ (साप्ताहिक), ‘सम्वाददाता‘ (साप्ताहिक), ‘कुरुद केसरी‘ (पाक्षिक), ‘गोंडवाना‘ (साप्ताहिक), ‘पुष्पहार‘ (साप्ताहिक), ‘अपने ग्रन्थ‘ (मासिक), शामिल हैं। भाटापारा से ‘भाटापारा टाइम्स‘ (साप्ताहिक) 1972 में निकलना शुरू हुआ। 

रायपुर से 5 अगस्त, 1974 को श्री गोविन्दलाल वोरा के सम्पादकत्व में आंग्ल दैनिक ‘मध्यप्रदेश क्रानिकल‘ निकला। दूसरा अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद‘ सितम्बर 1974 में निकला (सं० श्री रामचन्द्र संगीत) जो 1974 में ही बंद हो गया। 

रविशंकर विश्वविद्यालय ने 1968-69 में पत्रकारिता के अध्ययन की विशेष व्यवस्था की और स्नातक उपाधि (बी० जे०) पाठ्यक्रम शुरू किया। 

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकारों में श्री मधुकर खेर का उल्लेखनीय स्थान है। वे प्रेस ट्रस्ट आव् इंडिया, ‘टाइम्स आव् इंडिया‘, ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ आदि के सक्रिय सम्वाददाता हैं। 

आज भी रायपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचार केन्द्र है और यहाँ के दैनिक पत्र अत्यन्त सम्मानित और बहुप्रसारित हैं। तीनों प्रमुख समाचार पत्रों- ‘नवभारत‘, ‘देशबन्धु‘ और ‘युगधर्म‘ ने मुद्रण की आफसेट पद्धति अपनाई हुई है। प्रसार संख्या की दृष्टि से रायपुर ‘नवभारत‘ का मध्यप्रदेश में दूसरा स्थान है। 

दुर्ग-राजनाँदगाँव 
जिला सन् 1947 में खैरागढ़ से ‘प्रजा बन्धु‘ पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ हुआ परन्तु अगले वर्ष ही वह बन्द हो गया। अक्टूबर 1947 में दुर्ग से ‘जिन्दगी‘ साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ। यह स्वतन्त्र रीति नीति का पत्र था। इसके प्रकाशक और सम्पादक श्री केदारनाथ झा ‘चन्द्र‘ थे। 1954 तक यह तीन बार बन्द हुआ और निकला, फिर 1961 में अंतिम रूप से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। अगस्त 1948 में राजनाँदगाँव से पाक्षिक ‘स्वतन्त्र भारत‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। यह भी बहुत कम समय तक चला। राजनाँदगाँव से ही मार्च 1950 में मासिक ‘चित्र संसार‘ निकला। इसका प्रकाशन उसी वर्ष अक्टूबर माह में बन्द हो गया। 

राजनाँदगाँव से 26 जनवरी 1951 से ‘जनतन्त्र‘ साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ हुआ। प्रख्यात साहित्यकार डा० बलदेव प्रसाद मिश्र इसके संरक्षक और सम्पादक थे। इसी केन्द्र से 15 अगस्त 1956 को साप्ताहिक ‘सबेरा‘ का प्रकाशन शुरू हुआ और 1962 तक चला। इसके सम्पादक श्री शरद कोठारी थे। अब वे दैनिक ‘सबेरा संकेत‘ निकाल रहे हैं जो जिले का प्रमुख पत्र है। 

दुर्ग से 1958 में ‘ज्वालामुखी‘ का प्रकाशन हुआ जो 1967 तक चला। इसके प्रकाशक श्री कपिलनाथ ब्रह्मभट्ट थे। 1959 में ‘भारत केसरी‘ साप्ताहिक राजनाँदगाँव से निकला जो 1961 तक चला। श्री ब्रह्मभट्ट बड़े जीवट के पत्रकार थे और अनेक पत्रों से सम्वाददाता के रूप में जुड़े रहे। 

सन् 1958 के बाद दुर्ग-राजनाँदगाँव से बहुत से समाचार पत्र निकले किन्तु उनका अस्तित्वकाल अत्यन्त अल्प रहा। ऐसे पत्रों में ‘प्रेरणा‘, ‘अभियान‘ और ‘चेतावनी‘ प्रमुख थे। 1960 में दुर्ग से ‘साहू सन्देश‘ निकलना शुरू हुआ। भिलाई से 1962 में हिन्दी और अंग्रेजी में ‘भिलाई समाचार‘ निकलने लगा। 1963 में दुर्ग से ‘छत्तीसगढ़ सहयोगी‘ (साप्ताहिक), ‘भिलाई श्रमिक आह्वान‘ (साप्ताहिक) और दुर्ग से ही ‘शांति की देवी‘ (मासिक) निकले। 

सन् 1965-67 के दौरान ‘चिन्तक‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अग्रवाल जगत‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अनन्त‘ मासिक (भिलाई), ‘पञ्च निर्मित‘ साप्ताहिक (बालोद), ‘कामगार मित्र‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘छत्तीसगढ़‘ अर्द्ध साप्ताहिक (दुर्ग), ‘श्रमदेव‘ (दुर्ग), ‘दुर्ग टाइम्स‘ साप्ताहिक (दुर्ग) और ‘सोशलिस्ट वर्कर‘ अंग्रेजी साप्ताहिक (दुर्ग) प्रकाशित हुए। 

दुर्ग जिले के दो पत्रकारों ने राजनीति में भी अच्छा स्थान बनाया। श्री चन्दूलाल चन्द्राकर राष्ट्रीय दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के प्रधान सम्पादक रहे और बाद में केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में राज्य मन्त्री रहे। ‘नवभारत‘, ‘नव-भारत टाइम्स‘ तथा अन्य समाचार पत्रों के सम्वाददाता रहे श्री मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के जागरूक विधायक के रूप में स्थान बनाया है और सम्प्रति उच्च शिक्षा राज्य मन्त्री हैं। 

बस्तर जिला 
आजादी के पहले जगदलपुर एक छोटा सा कस्बा था। पूरे जिले में आदिवासी निवास करते थे। करीब 14,000 वर्गमील की लम्बाई-चौड़ाई बाले इस जिले में कुल 40-45 प्राथमिक शालाएँ थीं। एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल सिर्फ जगदलपुर में था। जगदलपुर में ब्रिटिश राज्य का प्रशासक रहता था। उनके सुख सुभीते के लिए पानी का नल था और कस्बे में बिजली भी थी। सरकारी खबरों के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के पहले से ही ‘बस्तर समाचार‘ नाम का एक साप्ताहिक अखबार सरकारी इन्तजाम में प्रकाशित किया गया था। यह सरकारी अखबार जगदलपुर के सरकारी प्रेस में छपता था। 

1947 के बाद बस्तर में पत्रकारिता का नया युग शुरू हुआ। वहाँ के प्रमुख पत्रकार थे पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी और स्वर्गीय मतीश बनर्जी। एक दक्षिण भारतीय शर्मा जी भी थे। पूर्वी पाकिस्तान (आज के बाँगला देश) के लोग जब बस्तर में आने को हुए तब बोस बन्धुओं का भी यहाँ आगमन हुआ। पुनर्वासियों के सुख-सुभीतों की ओर उनका ध्यान था। श्री मतीश बनर्जी और पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी द्वारा उत्साहित करने पर बोस बन्धुओं ने ‘दण्डकारण्य समाचार‘ 1948 के लगभग प्रकाशित करना शुरू किया, जो आजतक चल रहा है। इसके सम्पादक मतीश बनर्जी थे। अखबार 8 पृष्ठों का था। इसके चार पृष्ठ हिन्दी में और चार अंग्रेजी में छपते थे। ‘दण्डकारण्य समाचार‘ जिले के बाहर भी प्रसारित रहा। अब इसके सम्पादक श्री तुषार कान्ति बोस हैं। 

श्री रविशंकर वाजपेयी के सम्पादकत्व में साप्ताहिक ‘बस्तर टाइम्स‘ निकल रहा है। 

बिलासपुर जिला 
पहले उल्लेख किया जा चुका है कि पेन्ड्रा रोड से प्रकाशित होने वाले ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ ने बिलासपुर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास को एक नया मोड़ दिया था। श्री माधवराव सप्रे के सम्पादन में निकला यह समाचार-पत्र हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन में भी बहुत सहायक सिद्ध हुआ था। 

सन् 1920 के बाद बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने ‘विकास‘ नामक पत्रिका निकाली थी। सन् 1937 में ‘सचेत‘ साप्ताहिक का प्रकाशन हुआ था, पर वह थोड़े समय तक ही चला। 

सितम्बर, 1941 में बिलासपुर से एक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ ‘पराक्रम‘, जिसके सम्पादक श्री रामकृष्ण पाण्डेय थे (उन्हें लोग पराक्रमी पांडे कहने लगे थे)। सितम्बर 1952 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया था जो मार्च 1953 में पुनः प्रारम्भ हुआ। इसी तरह 1955 में कुछ समय बन्द रहने के बाद यह फिर चालू हो गया था, पर ज्यादा चल नहीं सका। 

सन् 1950 में ‘प्रकाश‘ साप्ताहिक निकला जो 1952 में बन्द हो गया। ‘लोकमित्र‘ साप्ताहिक श्री वृन्दावन बिहारी मिश्र के सम्पादन में 1953 से निकलना शुरू हुआ। बाद में श्री बृजराय नारायण मिश्र के सम्पादन में चलता रहा। इन दिनों यह श्री अवध किशोर मिश्र के सम्पादन में निकल रहा है। 

सन् 1953 में एक निर्भीक साप्ताहिक ‘तूफान‘ श्री काले के सम्पादन में निकलना शुरू हुआ किन्तु 1962 में श्री काले के असामयिक निधन से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष यहाँ से ‘नव समाज‘ साप्ताहिक, ‘नई दिशा‘ त्रैमासिक और ‘मुक्ति‘ साप्ताहिक निकले। ‘नई दिशा‘ के सम्पादक श्री श्रीकान्त वर्मा और श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव थे। इसके सलाहकार थे श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, श्री प्रभाकर माचवे और श्री नरेश मेहता। मई 55 में आरम्भ हुई इस पत्रिका का वार्षिक मूल्य 4 रु० और एक प्रति का मूल्य 1 रु० था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी। श्री वर्मा बाद में ‘दिनमान‘ के विशेष सम्वाददाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए और सम्प्रति राज्यसभा के सदस्य हैं। 

सन् 1959 में सक्ति से ‘अवतार‘ पाक्षिक निकलने लगा पर शीघ्र ही बन्द हो गया। इसी वर्ष चाँपा से ‘सक्ति टाइम्स‘ पाक्षिक निकलना शुरू हुआ। सन् 1960 में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘क्षितिज‘ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सन् 1960 में बिलासपुर से ‘मुक्ति दूत‘ दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया, पर वह चल नहीं पाया। इसी समय सहकारी संस्था ने ‘छत्तीसगढ़ सहकारी समाज‘ मासिक निकालना शुरू किया। सन् 1961 में बिलासपुर से ‘नया तूफान‘ साप्ताहिक, ‘छत्तीसगढ़ सह गौरव‘ मासिक, ‘ज्ञान यज्ञ‘ मासिक और ‘बवंडर‘ साप्ताहिक निकले। 

वास्तव में जिले की पत्रकारिका को निश्चित दिशा देने में ‘बिलासपुर टाइम्स‘ का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। श्री डी० पी० चौबे ने इसे एक साप्ताहिक के रूप में निकालना शुरू किया था। वर्ष 1974 में उन्होंने श्री बी० आर० यादव के सहयोग से उसे दैनिक के रूप में स्थापित कर दिया। प्रखरता और स्वच्छता के लिए ‘बिलासपुर टाइम्स‘ उल्लेखनीय है। श्री यादव लम्बे अरसे तक ‘नवभारत‘ के बिलासपुर सम्वाददाता रहे हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश शासन के काबीना मन्त्री हैं। ‘बिलासपुर टाइम्स‘ में श्री गुरुदेव कश्यप तथा श्री कमल ठाकुर सम्पादक रहे। 

बिलासपुर में ‘बूंद और मोती‘ श्री के० भगवान के सम्पादन में, हसदेव टाइम्स‘ श्री कृष्ण कुमार शर्मा के संपादन में तथा ‘सेन्ट्रल टाइम्स‘ 1966 से श्री कृष्णमूर्ति टाह के नेतृत्व में निकल रहे हैं। कोरबा से सन् 1966 साप्ताहिक ‘वक्ता‘ श्री राजेन्द्र गुप्त के सम्पादकत्व में नियमित रूप से निकल रहा है। 

सन् 1977 से बिलासपुर से दैनिक ‘लोक स्वर‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्यामलाल चतुर्वेदी, डा० सच्चिदानन्द पाण्डे और श्री रमेश नैयर ने भी इसका सम्पादन किया है। वर्तमान में श्री बजरंग केडिया संपादक हैं। 

बिलासपुर महत्वपूर्ण समाचार केन्द्र है किन्तु यहाँ रायपुर से निकलने वाले समाचार पत्रों का प्रभाव छाया हुआ है। 

रायगढ़ जिला 
समाचार-पत्र-प्रकाशन की दृष्टि से रायगढ़ जिला काफी पिछड़ा रहा है। सन् 1923 में श्री मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा रायगढ़ से ‘छत्तीसगढ़‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसका आकार 10X7 इंच और वार्षिक मूल्य 2 रु० था। 

एक लम्बे अन्तराल के बाद 1950 में रायगढ़ से ‘अधिकार‘ नामक साप्ताहिक का कुछ समय तक प्रकाशन हुआ। सन् 1951 में ‘बापू‘ नामक हिन्दी मासिक रायगढ़ से निकला जिसके संपादक स्वामी गौरीशंकर थे। बाद में ‘राष्ट्र केसरी‘ नामक हिन्दी साप्ताहिक भी यहीं से निकला। जनवरी 1956 में इन दोनों समाचार पत्रों को मिलाकर ‘नई बात‘ नामक नया हिन्दी साप्ताहिक निकाला गया, परन्तु यह नवम्बर 1958 में बन्द हो गया। 

सन् 1953 में रायगढ़ से ‘भूचाल‘ साप्ताहिक निकाला गया, जो अगले वर्ष ही बन्द हो गया। 

सन् 1957 में ‘महाभारत‘ हिन्दी मासिक प्रकाशित हुआ। सन् 1959 में ‘नई बात‘ साप्ताहिक का पुनः प्रकाशन हुआ और 1965 तक चलता रहा। 

सरगुजा जिला 
छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्र में आवागमन के साधनों से दूर स्थित सरगुजा जिले में पत्रकारिता की गतिविधियाँ अत्यन्त अल्प रही हैं। सन् 1960 के आसपास यहाँ से श्री समर बहादुर सिंह के सम्पादन में ‘राष्ट्रवाणी‘ निकलता रहा है। फिर श्री रवीन्द्र प्रताप सिंह के संपादन में ‘सरगुजा सन्देश‘ निकला। यह पत्र आज भी निकल रहा है और साफ सुथरा है। सन् 1978 में ‘सरगुजा वाणी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर जिले से इस समय 6 दैनिक, 15 साप्ताहिक, 1 पाक्षिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकल रहे हैं। दुर्ग जिले से 6 साप्ताहिक, बस्तर जिले से 6 साप्ताहिक, राजनाँदगाँव जिले से 3 दैनिक, 7 साप्ताहिक और 1 पाक्षिक पत्र का प्रकाशन हो रहा है। बिलासपुर जिले से 2 दैनिक, 11 साप्ताहिक और 1 मासिक पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। सरगुजा जिले से 1 साप्ताहिक और 2 पाक्षिक तथा रायगढ़ जिले से 3 साप्ताहिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकलते हैं। 

पश्चलेख- 
इस क्रम में उल्लेखनीय कि जिला गजेटियरों के अध्याय 18 में जिले के समाचार पत्रों की जानकारी होती थी। संभवतः उक्त पुस्तक के लिए सामग्री उसी के आधार पर विकसित की गई है। अगले क्रम में दो, लगभग एक जैसे प्रकाशनों का उल्लेख प्रासंगिक होगा। इनमें माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल से 2002 (नवंबर?) में प्रकाशित पुस्तिका, डॉ. मंगला अनुजा ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ तथा इसी संस्था की जनसंचार माध्यमों पर केन्द्रित शोध पत्रिका ‘आंचलिक पत्रकार‘ के दिसंबर 2002 अंक में डा. मंगला अनुजा का ही इसी यानी ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ शीर्षक से प्रकाशित लंबा लेख है। इन लेखों का आधार पूर्व उल्लिखित पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ का लेख ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ जान पड़ता है, मगर इसमें चित्रों सहित जानकारियां 2002 तक अद्यतन कर दी गई हैं और पुस्तिका के आरंभ में अनुक्रम है, जिसमें 375 पत्र-पत्रिकाओं का नाम, पृष्ठ संख्या के साथ है, जिससे इसकी उपादेयता बढ़ गई है। 

आंचलिक पत्रकार के उक्त अंक में विजयदत्त श्रीधर ने ‘सम्पादकीय‘ में लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का व्यापक अध्ययन, गहन विश्लेषण और व्याख्या होनी चाहिए। वहां के विश्व विद्यालय यदि ऐसा कोई गहन गंभीर-व्यापक शोध करा सकें, तब वे छत्तीसगढ़ के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहासक्रम की विश्रृंखलित कड़ियां भी जोड़ पाएंगे, इसमें सन्देह नहीं।‘ 

रायपुर, छत्तीसगढ़ में सन 2005 में ‘कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। जानकारी मिली है कि विश्वविद्यालय द्वारा माधवराव सप्रे के ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के सभी 36 अंकों का पुनर्प्रकाशन किया गया है। इस क्रम में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का- बीसवीं सदी का पहला, दूसरा और तीसरा चतुर्थांश, यानी 1900 से 1925, 1926-1950, 1951-1975 तथा इसके पश्चात के लिए प्रत्येक दशक और फिर पृथक राज्य गठन के बाद प्रत्येक पंचवर्षीय कालखंड में अध्ययन, अभिलेखन हेतु प्रयास समीचीन होगा। इस अध्ययन में पत्र-पत्रिका, संपादक, प्रमुख संवाददाता-पत्रकार, उल्लेखनीय घटना, विकास और उपलब्धियां शामिल हों। साथ ही डिजिटल अभिलेखन, जिसमें पत्र-पत्रिकाएं, चित्र, संबंधित दस्तावेज तथा इसके पश्चात संभव हो तो महत्वपूर्ण आडियो-वीडियो फाइल्स भी हों। आशा है कि पत्रकारिता और जनसंचार का यह विश्वविद्यालय ऐसी सारी संभावनाओं की दिशा में अग्रसर होगा।

यह दौर तो अपनी निजी खास रुचि से चुने गए, सतही जानकारी और अनावश्यक दुहराव वाले खर्चीले कॉफी टेबल बुक का है, जो प्रकाशन से जुड़े लोगों/संस्थानों के लिए फायदेमंद होता है मगर अपने वास्तविक लक्ष्य, पाठकों के लिए अक्सर उपयोगी नहीं होता और अधिकतर भ्रामक भी होता है। मानता हूं कि ऐसी जानकारियां, मूल स्रोत के उल्लेख सहित सार्वजनिक, निःशुल्क और सहज नेट पर उपलब्ध होनी चाहिए। अपने स्तर पर पिछले वर्षों से मेरा यही प्रयास है। जिसका एक उदाहरण यह है। इसके लिए मूल स्रोतों की तलाश और जानकारी जुटाना, पढ़ कर फीड करना एवं नेट पर अपलोड कर सार्वजनिक करना, यह सभी काम मेरे स्वयं द्वारा यथासंभव सावधानी और जिम्मेदारी से किया गया है।

यह प्रस्तुति सामान्य जानकारी के लिए तैयार की गई है, किंतु शोध-संदर्भों के लिए मूल स्रोतों को देखना चाहिए।