Sunday, July 9, 2023

कंठी देवल बनाम मुकरबा

अगस्त-सितंबर 1990 में बिलासपुर के समाचार पत्रों में खास खबर होती थी, इन समाचार कतरनों के संदर्भ में स्पष्ट करना आवश्यक है कि तब राज्य शासन के बिलासपुर पुरातत्व कार्यालय में श्री जी. एल. रायकवार और राहुल कुमार सिंह यानि मैं पदस्थ थे। स्वाभाविक ही मीडिया के लिए इस ‘ऐतिहासिक सनसनी‘ के साथ पत्रकार बंधुओं का हमारे कार्यालय में लगातार आना-जाना हुआ। खबरों की भाषा-सामग्री और शिलालेख का पठन-व्याख्या से हमारे कार्यालय की भूमिका को आसानी से समझा जा सकता है। शिलालेख का पाठ नीचे के समाचार के साथ आया है। वस्तुतः (संशोधन संभव) पाठ होगा- ऊ नमः सिवाय। महंत? द/सोवाय श्री भगवानां भी-/सन्यासी संतोसगीरि के करनी करता- देव स्(थ)/लः सुभःमस्तु समप...। इसी तारतम्य में मुकरबा-मकबरा, छतरी और समाधि पर कुछ बातें, तीन समाचार कतरन के बाद यहां लेख की गई हैं।

छत्तीसगढ़ के अनमोल धरोहर की दुर्दशा खुले आसमान के नीचे बिखरी पड़ी है रतनपुर की संस्कृति 
कण्ठीदेवल मंदिर में समाधिस्थ अवस्था में मानव हड्डियाँ मिली ...

बिलासपुर ऐतिहासिक नगरी रतनपुर के कण्ठीदेवल मंदिर के गर्भगृह की खुदाई के दौरान मानव हड्डियां मिलने से इस बाात की संभावना बलवती हो गर्ह है कि वास्तव में यह शिवमंदिर न होकर वहां के शासक या किसी महन्त की समाधि है। यह मंदिर महामाया कुण्ड के सामने अवस्थित था, जो कि वर्तमान में विद्यमान नहीं है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निमाण के नाम से इसे पूरी तरह तोड़ दिया है। पन्द्रहवीं शताब्दी के आसपास निर्मित कण्ठीदेवल मंदिर इसलिए भी महत्व है, चूंकि मराठाकाल की स्थापत्य शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाला, मुगलिया शैली का सम्भवतः प्रथम दुमंजिला मंदिर है। जिस ढंग से, इसका निर्माण कार्य चल रहा है, लगता है कि भारतीय पुरातत्व विभाग, ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में विद्यमान छत्तीसगढ़ के इस अनमोल धरोहर के साक्ष्य मिटा कर रख देगा।

कण्ठीदेवल मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के नीचे, खुदाई करने पर मात्र दो मीटर चालीस सेन्टीमीटर नीचे मानब हड्डियाँ उर्ध्वाधर समाधिस्थ अवस्था में प्राप्त हुई है। वैसे भी महामाया मंदिर को प्राचीन तांत्रिक सिद्ध शक्ति पीठ माना जाता है। शैव सम्प्रदाय के अन्तर्गत कौल कापालिक भी तंत्र मार्ग का अनुसरण करते है। अतः एक सम्भावना यह भी सम्भावित है, कि भैरव उपासकों के द्वारा इस स्थल का उपयोग तंत्रमंत्र साधना के लिए किया जाता हो। मानव हड्डियाँ जिस स्थान में समाधिस्थ अवस्था में मिली है, वहां शव के पास, सिंदूर, बंदन, अक्षत या सिक्के वगैरह नहीं मिले है, इससे स्पष्ट होता है कि वास्तव में वह किसी महान व्यक्ति की समाधि है। कण्ठी देवल का प्रचीन संस्कृत साहित्य के शाब्दिक अर्थ के अनुसार देवकुल होता है। देवकुल के बारे में यह बात पुरातत्व सर्वेक्षण में आती है, कि पूर्व में मृत राजाओं की पाषाण प्रतिमाओं को पूर्वजों को देखने के लिए प्रदर्शित किया जाता था। वास्तव में कण्ठी देवल मंदिर कोई मंदिर नहीं अपितु शासनाधिपति की याद के लिए इस तरह के स्मारक का निर्माण कराया गया था। इस बात का प्रमाण टीकमगढ़ जिले के ओरछा में बेतवा नदी के किनारे (देवकुल) परिपाटी के मंदिर में राजारानी की प्रतिमाएं स्थापित है।

रतनपुर का कण्ठीदेवल मंदिर चार पांच सौ साल पुराना बताया जाता है। मराठा काल के मंदिर के बारे में पुरातत्वविद् यह मानते हैं, कि यह मंदिर प्राचीन भग्न मंदिरों से प्राप्त स्थापत्य खण्डों से निर्मित है। चूंकि पूर्व में मंदिरों की दीवारों में प्रस्तर की प्राचीन प्रतिमाएं जड़ी हुई थीं। इन प्रतिमाओं में शिशु सहित मातृत्व भाव महिला की बच्चे को स्तनपान कराते दिखाया गया है। इस मूर्ति के दोनो तरफ सिंह का किर्तीमुख बना है। दूसरी प्रस्तर की शालभंजिका की प्रतिमा है, जबकि तीसरी प्रतिमा लिगोद्भव शिव की तथा एक अन्य प्रस्तर की आसनस्थ कलचुरी शासक की प्रतिमा उत्किर्णीत है। जिसके कारण यह मान जाता है, कि यह मंदिर बाद में काल में निर्मात कराया गया है। कण्ठीदेवल मंदिर के समीप अनेक चौरानुमा, समाधियां है जो छोटे महन्त शिष्यों राज्य परिवार के शासको तथा सती नारी की भी हो सकती है। सम्भावना है चूंकि रतनपुर के समीप कोई नदी न होने के कारण, इसी स्थान में राजकुल का श्मशान था।

मराठा काल के स्थापत्य कला एवं मुगलिया शैली का प्राचीन कण्ठीदेवल मंदिर वर्गाकार बूतरे पर निर्मित था। इस मंदिर के सम्मुख में प्रारंभ में मण्डप रहा होगा। तथापि अब निर्माण के कारण ४.७६ मीटर लम्बा ४.७६ मीटर चौडा चालीस फिट की ऊंचाई वाला मंदिर को तोड़ दिया गया है। नये निर्माण के कारण नीव की खुदाई कर, सीमेटकार्य पूर्ण कर लिया गया है। दूर से देखने पर इस समय सपाट मैदान दिखाई पड़ला है। मंदिर के पत्थरों को बाजू की जमीन में नम्बर डालकर रख दिया गया है, जिसे देखने पर एकबारगी ऐसा लगता है कि मानो पत्थरों के कब्रस्तान में पहुंच गये हो। एकदम खुले आसमान के नीचे रखे इन पत्थरों पर बारिश ठण्ड और कड़ी धूप की सीधी मार पड़ रही है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने सन् ८७ मे कण्ठीदेवल मंदिर को इसलिए तोड़ दिया चूंकि गिर रहा था। ऐतिहासिक महत्व के इस मंदिर को गिरने से बचाना जरूरी भी था अतएव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के छत्तीसगढ़ जोन के भुवनेश्वर मुख्यालय ने तोड़ने का आदेश दे दिया। बिलासपुर में भारतीय पुरातत्व विभाग का उप मण्डल छोटा सा कार्यालय है, जिसके अन्तर्गत सम्भाग के बीस पच्चीस पुराने और महत्वपूर्ण स्मारक संरक्षित है। इसका एक दुःखद पहलू यह है, कि चूंकि यहां न तो कोई योग्य अधिकारी नियुक्त है और न ही इस कार्यालय के पास पर्याप्त अधिकार ही है। इसलिए छोटे मोटे काम के लिए उड़ीसा के भुवनेश्वर कार्यालय का मुंह ताकना पड़ता है।

आधा तीतर आधा बटेर:- आश्चर्यजनक बात है, कि भुवनेश्वर (उड़ीसा) से संचालित, छतीसगढ़ के पुरातात्विक वैभव के बारे में कितना विरोधाभास है कि कुछ बड़े अधिकारियों को जिन्हें न तो छत्तीसगढ़ से मतलब है न तो यहां के पुराने स्मारको से भावनात्मक ढंग से जुड़े हैं न तो ठीक ढंग से हिन्दी जानते, और यहां के छोटे कर्मचारी जिन्हें उनकी भाषा समझ में नहीं आती, कुल मिलाकर आधा अधूरा, आधा तीतर आधा बटेर समझने वाले कुछ अधिकारी पुरातत्व सम्पदा को तुड़वाकर भुनेश्वर में बैठे हैं। पुरातत्व अधिकारी यदाकदा कुछ आते हैं, देख कर औपचारिकता निभाकर वापस चले जाते हैं।

क्या ऐतिहासिक मंदिर पहले जैसे बनेगा:- पुरातत्वविदों का कथन है, कि कण्ठीदेवल मंदिर का हश्र, मल्हार के उस मंदिर की भांति होगा जो आठवीं शताब्दी का था। उस मंदिर को इसी तरह खो दिया है। आज के हालत यह है कि सन् ८० मे पुननिर्मित इस मंदिर के जो कागजात है, उनका संदिग्ध ढंग से गुम होना शुरू हो गया है। इसके बारे में यह भी कहा जा रहा है, कि वर्तमान में श्री एम. आर. चतुर्वेदी (संरक्षक सहायक) और बी.बी. सुखदेव फोरमेन काफी उत्साही है परन्तु यहां अभी किसी काफी बुजुर्ग और जानकार वरिष्ठ अधिकारी की आवश्यकता है ताकि पुराने स्मारक की रक्षा हो सके। नहीं तो बाद में बड़े अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए यहां से कागजात गुम करना शुरू कर देंगे।

प्रस्तरखण्डों की चोरी- कण्ठीदेवल मंदिर की हिफजात के लिए हालांकि वहां तीन व्यक्ति रहते है, परन्तु इसके बावजूद मंदिर से प्रस्तर खण्डो को निकाल कर खुले मैदान में नम्बर डालकर रखे गये प्रस्तर खण्डों की चोरी जाने की जानकारियां मिल रही है।
राजूतिवारी
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रतनपुर का ऐतिहासिक दस्तावेज कण्ठीदेवल 
अवशेष सहित नरकंकाल की सुरक्षा आवश्यक 

(कार्यालय प्रतिनिधि द्वारा) 

बिलासपुर. ऐतिहासिक नगरी रतनपुर स्थित कण्ठी देवल मंदिर के गर्भगृह की खुदाई के दौरान मिली मानव हड्डियों की सुरक्षा आवश्यक हो गई है। मराठा काल की मुगलिया शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाले इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निर्माण के नाम तुड़वा दिया है। मंदिर के पत्थर खुले आसमान नीचे तथा मंदिर के भीतर और बाहर पत्थरों में उत्कीर्णित कलापूर्ण प्राचीन मूर्तियां एक साधारण झोपड़ी में पड़ी हुई है।

मराठा स्थापत्य काल की मुगलिया शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाले मंदिर को भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निर्माण के नाम से तुड़वा दिया है। मानव हड्डियों के मिलने से पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का मानना है, कि उपरोक्त मानव कंकाल और कण्ठी देवल मंदिर का निर्माण वर्ष एक समय का है। अब पुरातत्व विभाग का सिरदर्द है, कि वह हड्डियों का परीक्षण करा कर मंदिर के निर्माण कर्ता का पता लगाये। वैसे इस मंदिर के बारे में पुरातत्वविदों का मानना है कि रतनपुर कलचुरियों के काल से ही राजधानी रही है। साथ ही वहां की भौगोलिक परिस्थितियां, मंदिर निर्माण तथा ऐतिहासिक संम्भावनाओं के आधार पर यह भी कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी के अलावा भी यह स्थान तीर्थस्थल के रूप में मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण के समकक्ष सम्भवतः विख्यात रहा होगा। ऐसा समझा जा रहा है कि पातालेश्वर, लक्ष्मणेश्वर के समान यह मंदिर नील कण्ठेश्वर के नाम से कलचुरि काल में प्रसिद्ध रहा होगा। चूंकि ख्याति प्राप्त होने के कारण भग्नोपरांत मराठा शासकों ने धरोहर को सुरक्षित रखने के लिये मुगल शैली में इसका निर्माण करा दिया होगा। 

बाद में कलचुरियों एवं मराठा शासकों के पतन के पश्चात् रत्नपुर श्रीहीन हो गया और जनमानस में यह मंदिर केवल, कण्ठी देवल मंदिर भर रह गया। नर कंकाल के मिलने से लोगों में काफी उत्सुकता बढ़ गई है और इस बात की चर्चा सरगर्म हो गई है कि वास्तव में नरकंककाल की आयु क्या होगी? वैसे पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई के दौरान मिलने वाले नर कंकाल पांच हजार तक सुरक्षित प्राप्त भी हुए हैं। भोपाल से लगभग तीस किलोमीटर दूर भीमबैठका शैलाश्रय में डा. वाकणकर एवं सागर विश्वविद्यालय के सहयोग से की गई खुदाई के दौरान मानव नर कंकाल प्राप्त हुआ जो कि सम्भवतः तीन से पांच हजार वर्ष प्राचीन है।

कण्ठीदेवल मंदिर में प्राप्त पत्थर की शिशु सहित मातृका की ग्यारही एवं बारहवीं शताब्दी इस्वी की प्रतिमा है, जिसमें शिल्प खण्ड पर प्रकोष्ठ के मध्य गोद में, शिशु को दुलारते हुए माता का भावपूर्ण अंकन किया गया है। इसी प्रकार मंदिर में आठवीं नवीं सदी इस्वी की शालभंजिका मिली है। पाषाण में उत्कीर्णित यह प्रतिमा नारी सौंदर्य तथा अलंकरण में अद्वितीय है। उसके विविध आभूषण केश विन्यास तथा परिधान में सूक्ष्म अलंकरण तथा मौलिकता स्पंदित है। शालभंजिका के अतिरिक्त वृक्ष में फल खाते तथा उछलते कूदते वानर सहित फूल जुगते हुए पारम्परिक पक्षियों का भी अंकन है।

इसी प्रकार कण्ठी देवल मंदिर के भिती में जड़ी शिल्प खण्ड में शिव की सर्वाेच्च सत्ता का मूर्तिमान किया गया है। लिंगोद्भव की यह कथा, शिवपुराण, वायु पुराण तथा शिल्प संहिताओं मे उपलब्ध है। कथा के अनुसार ब्रह्मा तथा विष्णु के बीच सर्वाेच्चता सिद्ध करने के लिये विवाद होने लगा। 

इसी बीच उनके मध्य एक ज्योतिर्यम स्तम्भ प्रकट हुआ जिसका आदि और अन्त का पता लगाने में दोनों देव असफल हुये। अन्त में दोनों हारकर विनम्र स्तुति करने लगे। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी देवताओं में शिव ही सर्वश्रेष्ठ है। चित्र में ज्योति स्तम्ब विवादरत ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्त में आराधना करते विष्णु दृष्टव्य है। 
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रतनपुर के ऐतिहासिक स्मारक की टूटी कड़ी का महत्वपूर्ण सूत्र मिला
कण्ठीदेवल मंदिर का मानव कंकाल संतोष गिरि सन्यासी का ...

बिलासपुर. रतनपुर स्थित कण्ठीदेवल मंदिर में समाधिस्थ कंकाल श्री संतोष गिरी नामक किसी सन्यासी की है। यह बात, कंठी देवल मंदिर की पुर्नसंरचना के लिए, शिलाखण्डों को उपर से उतारते समय, पश्चिम दिशा में जंघा भाग पर प्राप्त एक शिलालेख से मालूम होती है। इस शिलालेख में, देवनागरी लिपि में कुल पांच पंक्तियां है। शिलालेख का आकार ५२ बाई २७ बाई १३ सेन्टीमीटर है।

शिलालेख में मिले पांच पंक्तियों के देवनागरी में अनुवाद किया गया है, उसका शब्दशः इस प्रकार है। प्रथम पंक्ति - नमोः शिवाय द्वितीय पंक्ति - श्री भगवानाः। तीसरी पंक्ति - सन्यासी संतोष गिरि चौथी पंक्ति - करनी अंतिम पांचवीं पंक्ति - लः सुभःमस्तु सम।

शिलालेख के बारे में ऐसा समझा जाता है, कि इसमें अधिक पंक्तियां रही होंगी जो प्रस्तर के घिसने से मिट गई होंगी या खोदी नहीं जा सकी होंगी। वैसे, शिलालेख का शुभारंभ स्तुतिमान से होता है। इस शिलालेख में, सन्यासी संतोष गिरी का नाम उल्लेखित है। लेख के आधार पर यह अधिकतम दो सौ वर्ष प्राचीन है। शिलालेख मिलने के पश्चात् इस बात की सम्भावना बलवती हो गई है मंदिर से प्राप्त अस्थि कंकाल, संन्यासी संतोष गिरी की है। सूत्रों का इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के बारे में मानना है कि चूंकि अस्थी कंकाल मूलतः सवाधान के रखा गया था तथा मृतक का सिर उत्तर में और पैर दक्षिण की ओर था। चूंकि खुदाई के दौरान अस्थियों के टुकड़ों में जबड़ा, बांह, पैर, घुटने तथा खोपड़ी आदि मिले है।

मृत सन्यासी का आयु पैतालीस वर्ष से साठ वर्ष के बीचः:- प्राप्त अस्थि कंकाल के अवलोकन करने से एक बात यह भी सामने आयी है, कि चूंकि कंकाल के मिले जबड़े में पूरे दांत उपस्थित है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि मृतक सन्यासी की उम्र पैतालीस से लेकर साठ वर्ष के बीच की रही होगी। 

अस्थियां क्षरित होने के बावजूद सुरक्षित:- सन्यासी संतोष गिरी की अस्थियों के बारे में विशेषज्ञों का कथन है कि हालांकि समय की मार से, समाधिस्थ हड्डियां क्षरित हो चुकी है परन्तु इसके बावजूद हड्डियाँ सुरक्षित है। वैसे छानबीन में एक बात यह भी आयी है, कि प्राप्त अस्थि कंकाल कण्ठीदेवल, मंदिर के गर्भगृह के नीचे केन्द्र से दो तीन फिट हट कर है।

मंदिर निर्माण अनुमान:- रतनपुर के ऐतिहासिक कंठीदेवल मंदिर के बारे में पुरातत्वविदों का मानना है कि इस मंदिर में विभिन्न काल की कला शैली एवं धर्म सम्प्रदाय की प्रतिमाएं तथा स्थापत्य खण्ड सहज उपलब्धता की दृष्टि से इकत्रित कर उन्हें मंदिर में जड़ दिया गया जिससे यह पता लगाना उस समय तक कठिन काम है जब तक की किसी शिलालेख में इसका उद्धरण न हो। वैसे कण्ठी देवल मंदिर के पूर्व की ओर निर्मित इस मंदिर के बाजू में ईंट निर्मित स्मारक भी किसी महन्त या राजपरिवार की समाधि होने की आशंका व्याप्त की गयी है।

भारतीय पुरातत्व विभाग की लापरवाही:- पुरातत्व विभाग का मुख्य मण्डल कार्यालय भुवनेश्वर में स्थित है। बिलासपुर में संरक्षण सहायक और पुरातत्व विभाग ने एक फोरमेन की नियुक्ति की है। जानकारी के अनुसार भारतीय पुरातत्व के बिलासपुर शाखा में अब कंठीदेवल मंदिर में पुनर्निमाण के लिए शिलाखण्डों को उतारा गया उस समय सर्किल कार्यालय भुवनेश्वर से सभी लोग उपस्थित थे। सभी कोनो से शिला उतारे गये, किन्तु जब इसका निर्माण प्रारंभ हुआ तब, इसका सारा सिर दर्द बिलासपुर कार्यालय पर थोप दिया गया और बलि का बकरा बनाने के लिए दोनों स्थानीय अधिकारियों पर ऐसी जिम्मेदारी सौप दी गई, जो साधनहीन है। जबकि जानकार अधिकारियों मानना है कि मंदिर का पुननिर्माण दुरुह कार्य है जबकि इसके लिए भारतीय पुरातत्व विभाग का भुवनेश्वर कार्यालय इसे एक अभियान के रूप में यहां स्थापत्य इंजीनियर, पुरातत्व मानचित्रकार, वरिष्ठ तकनिकी दल एवं रसायनिक परीक्षण विभाग का होना आवश्यक है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि बिलासपुर स्थित भारतीय पुरातत्व कार्यालय के अन्तर्गत २०-२५ महत्वपूर्ण पुरातत्व इमारत है परन्तु इन दो कनिष्ठ अधिकारियों के पास काम का इतना अधिक बोझ है कि सालों में बड़ी मुश्किल से दूर के स्मारको को देख पाते हैं।
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इस परिप्रेक्ष में ऐसी संरचना और छत्तीसगढ़ की परंपरा पर कुछ बातें। रतनपुर थाना के पास कुंवरपार तालाब पर गोसाईपारा है, किंतु यहां अब गोसाई-गोस्वामी परिवार नहीं हैं, बल्कि करइहापारा में गोसाईं परिवार हैं, जिनका सौ वर्षों से अधिक का ज्ञात इतिहास है और परंपरानुसार इन परिवारों की जड़े और गहरी हैं। करइहापारा निवासी 55 वर्षीय सोमेश्वर गिरि गोस्वामी जी बताते हैं कि यहां नागा साधुओं का डेरा रहता था और भोग-भंडारा के लिए कड़ाहा (करइहा) चढ़ता था, इसी से इस पारा का नाम पड़ा। संभव है कि कंठी देउल मंदिर से प्राप्त शिलालेख से इसके सूत्र जुड़ते हों।
संवत 1941 यानि सन 1884 की नागपुर से
जिला बिलासपुर, रतनपुर के करैहापारा में भेजी गई डाक,
 जिस पर ‘गुलाबगीर‘ और ‘गोसंई‘ लिखे होने का अनुमान होता है।

लीलागर नदी के दाहिने तट पर बलौदा-महुदा के देवरहा में भी इसी तरह का एक स्मारक मोतिया-कुकुरदेव मंदिर है, लीलागर नदी के बायें तट पर स्थित इस स्मारक के दूसरी ओर ग्राम कुगदा है, जहां पृथ्वीदेव द्वितीय का खंडित शिलालेख, कलचुरि संवत 893 (सन 1141-42) प्राप्त हुआ है, इसके पास ही बछौदगढ़ स्थित है। मोतिया मंदिर में कलचुरिकालीन शिलालेख के टुकड़े भी हैं, जो संभव है कि नदी के दूसरे तट के कुगदा शिलालेख से संबंधित हों। इस स्मारक के साथ नायक-बंजारा की कथा जुड़ी है। यों छत्तीसगढ़ में शवाधान के महापाषाणीय स्मारकों से ले कर बस्तर के उरसकल-उरसगट्टा तक की परंपरा है। दुर्ग जिले के छातागढ़, बिलासपुर जिले के मल्हार और कांकेर जिले के आतुरगांव से ईस्वी की आरंभिक सदी काल के स्मारक शिलालेख भी उल्लेखनीय हैं।

बैरागी और कबीरपंथी जैसे समुदायों में मृतक संस्कार के साथ कब्र बनाने का प्रचलन है। कंठी देवल से प्राप्त शिलालेख के बाद कोई संदेह नहीं रहा कि यह समाधि स्थल-स्मारक है। संतोष नाम के साथ गिरि से यह अनुमान होता है कि वे दशनामी शैव संन्यासी संप्रदाय से संबंधित है। इस आधार पर कंठी देवल नाम को भी समझना आसान हो जाता है, देवल या देउल देवालय है और कंठी, बैरागियों द्वारा गले में धारण किये जाने वाली माला का परिचायक है। कई ऐसे हैं, जिनका निर्माण प्राचीन मंदिरों की प्रतिमाओं, स्थापत्य खंडों का इस्तेमाल कर बनाए गए हैं, जिनमें से एक यह कंठी देउल है।

जानकारी मिलती है कि रायपुर के कंकाली तालाब को 17वीं शताब्दी में महंत कृपाल गिरी ने बनवाया था। इस परंपरा में क्रमशः रामगिरि, सुजानगिरि, अयोध्यागिरि, सुभानगिरि के बाद संतोषगिरि का नाम मिलता है। आगे इस क्रम में शंकरगिरि, सोमारगिरि, शंभुगिरि, रामेश्वरगिरि के बाद वर्तमान महंत हरभूषणगिरि गोस्वामी हैं। इनमें प्रत्येक की महंती का औसत काल 30-35 वर्ष मानें और कंकाली मठ के महंतों की सूची वाले और कंठी देवल वाले संतोषगिरि, एक ही हैं तो उनका काल उन्नीसवीं सदी का पहला चतुर्थांश निर्धारित किया जा सकता है। आसानी से माना जा सकता है कि ‘गिरी‘ और ‘कंकाली‘ मात्र संयोग नहीं। रायपुर के इसी कंकाली मठ में ‘जीवित समाधि‘ स्थल हैं, जिन पर शिवलिंग स्थापित किया गया है।
कंठीदेवल वर्तमान स्वरूप और सूचना फलक

गुम्बद, मुस्लिम स्थापत्य से जुड़ा है। भारत में चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक गुम्बददार इमारतें बनती रहीं, जिनमें मकबरे भी थे। सत्रहवीं सदी में बना आगरा का ताजमहल, दिल्ली का जामा मस्जिद और बीजापुर का गोल गुम्बद, स्थापत्य के खास नमूने हैं। इसके साथ ही गुम्बद, गैर-मुस्लिम भारतीय संरचनाओं में भी अपना लिया गया। गुम्बद वाले मंदिर भी बनने लगे। इनमें विशिष्ट है मुकरबे, यानि मकबरे, जो मुसलमानों के अलावा भारतीय-हिंदू मान्यताओं वाली संरचनाओं के लिए भी अपना लिए गए। मेरी देखी ऐसी संरचनाओं में से एक, प्राचीन सामग्री का इस्तेमाल कर निर्मित अत्यंत भव्य स्मारक, शहडोल के निकट स्थित पंचमठा है।

समाधियों, मृतक स्मारक-संरचनाओं के लिए छतरी और मुकरबा, शब्द अपना लिया गया। संभवतः मात्र संयोग मगर, गुम्बद का आकार, बौद्ध अवशेष को जतन से रखने के लिए बनाई जाने वाली संरचना, स्तूप से मिलता-जुलता है। महाभारत, वनपर्व 190/67 में संभवतः बौद्ध स्तूपों और मृतक-समाधियों के लिए कहा गया है कि युगांतकाल में देवस्थानों, चैत्यों और नागस्थानों में हड्डी जड़ी दीवारों के चिह्न होंगे ...‘। दिल्ली, मध्य भारत, बुंदेलखंड, बघेलखंड में मुकरबे देखे-सुने जाते हैं। ग्वालियर, इंदौर की छतरियां प्रसिद्ध हैं। शिवपुरी में सिंधिया परिवार की और ओरछा में बुंदेलों की छतरियां-समाधि स्थल दर्शनीय है। ऐसी संरचनाओं के साथ मंदिर वाली आस्था और उसकी पवित्रता का भाव भी जुड़ जाता है, जैसा कंठी देउल के साथ रहा है। इसके पूजित होने की जानकारी नहीं मिलती, किंतु गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना रही है। यहां गुलेरी जी के लेख ‘देवकुल‘ का अंश प्रासंगिक होगा, जिसमें बताया गया है कि- ‘मंदिर को राजपूताने में ‘देवल‘ कहते हैं। ... ‘देवकुल पद देवमंदिर का वाचक भी है, तथा मनुष्यों के स्मारक चिह्न का भी।‘ ...‘रजवाड़ों में राजाओं की छतरियां या समाधि-स्मारक बनते हैं। ... कहीं-कहीं उनमें शिवलिंग स्थापन कर दिया जाता है, ... परंतु कई यों ही छोड़ दी जाती हैं।‘  

 एक अन्य ‘मंदिर‘- 
‘अंगरेज का मंदिर‘ कही जाने वाली अलेक्जेंडर कैनिनमंड इलियट की समाधि, ग्राम सेमरापाली, सारंगढ़। इतिहास में प्रथम दर्ज छत्तीसगढ़ आया अंगरेज यात्री, जिसकी मृत्यु कलकत्ता से नागपुर जाते हुए, 23 वर्ष की आयु में 12 सितंबर 1778 को हुई।

6 comments:

  1. महत्वपूर्ण लेख ।

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  2. ज्ञानवर्धक...अगर यह स्थल समाधि है तो वर्तमानमे इसके सूचनापट्ट में भी यह बात शामिल करनी चाहिए💐🙏

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  3. ज्ञानवर्धक...अगर यह स्थल समाधि है तो वर्तमान में निर्मित नए मंदिर के सूचनापट्ट में भी यह बात शामिल करनी चाहिए💐🙏

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  4. ज्ञान वर्धक लेख

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  5. Straight delivery to the people.Thanks Rahul baba (dadaji) 🙏

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  6. Kanti Deval mandir ki itihass ko aur khangalna hoga

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