Wednesday, July 20, 2022

वाट्सएप विनोदेन

विश्वविद्यालय मानद उपाधि भी देते हैं, दूसरी तरफ वाट्सएप जैसे मंचों से जुड़े लोगों ने इन माध्यमों को ‘मानद-विश्वविद्यालय‘ उपाधि दे दी है। मगर लगा कि संस्मरण, डायरी, पत्र की तरह अब एक विधा, वाट्सएप-संवाद भी है। इस साल अपने वाट्सएप संपर्कियों में से, विनोदेन मेरे संदेशों का एक हिस्सा यहां, जिसमें आवश्यक संदर्भ स्पष्ट करने के लिए कुछ जोड़ा-घटाया है, अन्यथा यथावत-

23 जून 2022
* ‘तद्भव‘ का जनवरी 2022 अंक देख रहा हूं, लगभग सारी सामग्री पठनीय, स्तरीय।

21 मई 2022
* बनारस ज्ञानवापी के संदर्भ में याद करते हुए, बनारस में मेरा देखा सबसे पुराना, सुरक्षित और कंदवा तालाब के साथ स्थित, सुंदर परिवेश वाला मंदिर कर्दमेश्वर महादेव का है।

उड़ीसा और दक्षिण भारत (तमिल-कर्नाट) में पारंपरिक स्थपति और शिल्पकार अब भी हैं। उत्तर भारत में मेरी जानकारी में अकेला परिवार सोमपुरा (प्रभाकर ओ.) ही है, जो शिल्प शास्त्र का जानकार और उसके अनुसार मंदिर रचना करता है।

15 मई 2022
* उम्र के साथ धीरे-धीरे अभ्यास कि अपने जीवन और विचारों को यथासंभव सार्वजनिक कर दिया जाय, का हिमायती हूं। आश्वस्त रहें मूल विचार-बोध श्रुति अपरिवर्तित रहता है। स्मृति, देश-काल-पात्र अनुरूप प्रकट होती है और न्याय, तर्क-प्रमाण।

गांधी का हिंद स्वराज, श्रुति है, उपनिषदों वाली प्रश्नोत्तर शैली, उनकी उम्र लगभग 40 वर्ष। आत्मकथा, स्मृति है ही, उम्र लगभग 50 वर्ष। और बाकी सारा लेखन न्याय, जिसके लिए वे कहते हैं कि 1920 के बाद का उनका जीवन सार्वजनिक है। न्याय, तर्क-प्रमाण आश्रित है, अतः उसमें परिवर्तन संभव है।

सुकरात ने कुछ लिखा नहीं, शिष्य अफलातून यानि प्लेटो ने उनसे सुनी, उनकी बातों को अपने ढंग से लिखा, प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने इन सभी बातों को अपनी दृष्टि के साथ तर्क की कसौटी पर कसा। तो कह सकते हैं सुकरात-श्रुति, उनके शिष्य प्लेटो-स्मृति, और आगे उनके शिष्य अरस्तू-न्याय।

18 अप्रैल 2022
* सारी गड़बड़ी मालिक और नियंता बन जाने के कारण है।

कुआं, निजी स्तर पर खुदवाया जाए फिर भी नैतिक बाध्यता होती थी कि उसका पानी लेने से अन्य किसी को मना नहीं किया जा सकता।

एक सच्चा किस्सा गनियारी गांव का है। उस गांव के प्रमुख रहे दिघ्रस्कर परिवार के एक सदस्य के साथ मैं गनियारी गया। आधे घंटे का रास्ता, घंटे भर रुक कर वापस आना था, मगर चलते हुए उन्होंने पीने का पानी साथ रखा। मुझे लगा कोई बात होगी, शायद उबला पानी पीते हों, मगर पूछ लिया कि इसकी क्या जरूरत है, प्यास लगे तो गांव में भी पानी तो मिलेगा ही, वे टाल गए। वापसी में मैंने फिर पूछा, तब उन्होंने बताया कि उनके परिवार के बुजुर्ग बिलासपुर में रहते थे, लेकिन गांव में पानी की समस्या देखते गांव वालों के लिए कुआं खुदवाना शुरु किया, इसी बीच किसी की कही बात उनके कान में पड़ी कि मालिक अपने लिए कुआं खुदवा रहे हैं। जिस दिन कुआं खुद कर पूरा हुआ, पूजा-पाठ के साथ पानी निकालना शुरू हुआ, उन्होंने वहां इकट्ठा हुए गांववालों के सामने घोषणा की, यह कुआं हमलोगों ने गांव वालों के लिए खुदवाया है, इसलिए मैं इसका पानी नहीं पियूंगा और मेरे वंश का भी कोई इस कुएं का या गनियारी गांव का पानी नहीं पिएगा।

संभव है इसमें इस पूरी बात में कोई अतिशयोक्ति हो, मगर यह बात उस गांव के बुजुर्गों में भी प्रचलित है।

इसी तरह तेल निकालने का साधन ‘तिरही‘, तेल निकालने का, कोल्हू से पहले का तरीका, जिसमें दो भारी लट्ठों के बीच ‘लीवर‘ के दबाव से तेल निकाला जाता है, सच्चे अर्थों में ‘कोल्ड प्रेस, डबल वर्जिन‘, कच्ची घानी से भी एक कदम आगे यह। रख-रखाव की जिम्मेदारी इसे स्थापित करने वाले की होती है, मगर तेल निकालने का मौका उसके लिए तभी होता है, जब अन्य कोई न हो। अन्य स्थान से आए को प्राथमिकता होती है, क्योंकि जिसकी तिरही है, जिसके घर के सामने स्थापित है, वह तो कभी इस्तेमाल कर सकता है।

वैसे ही कुएं में पानी भरने की प्राथमिकता कुआं-मालिक के बजाय बाहिरी को होती थी, जबकि कुएं का रख-रखाव, सफाई करवाने की जिम्मेदारी, उसकी, अकेले की होती थी। पानी भरते हुए किसी बाहिरी की बाल्टी या बर्तन कुएं में गिरा छूट जाए तो समय-समय पर कुएं में कांटा डाल कर, गिरे हुए सब बर्तन निकलवाना और किसका है, पता कर, उस तक खबर कराना और न पहुंच पाए तो उस तक पहुंचवाना भी कुआं-मालिक की जिम्मेदारी होती थी।

* अंतःस्थित मृत्यु के साथ जीवन का सम-लय।

भ्रम है कि शरीर में जीवन है और मृत्यु आ कर उसे हर लेगी। मृत्यु तो काया में सदैव स्थित है और जीवन प्रतिपल उसमें प्रविष्ट हो रहा है, सांस बन कर, आहार के साथ।

* बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ।

सूर्य का पानी सोखना और बरसात पर तुलसी का दोहा। 

* पानी पुराना रास्ता याद करता है और राह रोकने पर नये रास्ते तलाश भी करता है। अपनी राह भी बदलता है।

अनुपम जी की ‘पानी की अपनी स्मृति‘ की बात को मैं इस तरह समझता हूं कि पृथ्वी पर जल एकत्र होने और निकासी की प्राकृतिक व्यवस्था है। सूखे दिनों में या कम बरसात होने पर हम भूल जाते हैं कि कौन सा स्थान पानी जमाव का, या उसके प्रवाह का रास्ता है। हम निर्माण कर जमाव/प्रवाह को प्रभावित करते हैं, वैकल्पिक नालियां खोदकर कामचलाउ इंतजाम करते हैं, किंतु धरातल पर कंटूर, प्रवाह का रास्ता और जमाव का स्थान वही रहता है, यही पानी की स्मृति है, वह अपने स्थान पर लौटना चाहता है।

ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें पानी निकास के लिए पिछले कुछ वर्षों के आधार पर पुल बनाया गया, अधिक बरसात हुई, तो पानी ने अपना कोई बहुत पुराना रास्ता तलाश लिया और पुल के नीचे से बहा ही नहीं। मैंने ऐसा कटघोरा पेंडरा के बीच जटगा के पास नाले के साथ देखा था। इसी तरह सरगुजा, सूरजपुर जिले में सारासोर स्थल है, महान नदी पर विशिष्ट प्राकृतिक संरचना। इसके आसपास ढेरों आधुनिक निर्माण हुए थे, 5-6 साल पहले भारी बाढ़ आई और सभी निर्माण को ध्वस्त कर दिया। ऐसी ही स्थिति मैंने जांजगीर जिले में महानदी और हसदेव के संगम पर देखी थी।

पानी का जमाव व बहाव। प्रभावित-भुक्तभोगी और लाभार्थी।

17 अप्रैल 2022
# नमक-आयोडाइज्ड
# तेल-रिफाइंड
# दूध-पाश्चराइज्ड
# चावल-पहले पालिश्ड अब फोर्टिफाइड
# पानी-प्यूरीफाइड फिल्टर
# हम-फेसबुक्ड

06 अप्रैल 2022
* शिमला के थापा जी का किस्सा पढ़ा। उनकी आंखों से पहाड़ कोई देख रहा हो, दिल कुछ कुछ कइयों का उसी तरह धड़कता है, पिछले दिनों अपने घटे दिन पर एक छोटा नोट लिखा था-

एक फिल्म-संवाद है- जिस रास्ते से गुजरा हूं, कदमों के निशान भी मिटा दिए हैं, मैंने। ताओ कहता है- अच्छा पथ अपने पीछे कोई लकीर नहीं छोड़ता।

उम्र के पड़ाव पर, कोई दिन ऐसा बीते कि दरवाजे पर दस्तक न हो, फोन की घंटी न बजे, और यह आपको बेचैन न करे, तब मान लीजिए आपने सार्थक जीवन जिया है। स्वयं को जगत की स्मृति से लोप होते देखने सा संतोष, स्थिर आनंद और कुछ नहीं।

31 मार्च 2022
* आप जैसे युवा मित्रों की असहमतियों के लिए मैं लगभग लालायित रहता हूं। जानता हूं कि मेरी आयु और बहुत हद तक मधुर व्यवहार के कारण मेरे विचार, अभिव्यक्ति पर ऐसी प्रतिक्रियाएं उनको रोकती हैं, जिनमें प्रतिवाद हो, इसलिए आप जैसे युवा साथियों की टिप्पणी मेरे लिए बहुत कीमती होती है, मुझे खुद को दुरुस्त करने या कम से कम पुनर्विचार करने का अवसर मिलता है।

(28 मार्च 2020- मैं प्रयास करता हूं मेरे कुछ आलोचक, जिनमें एक आशुतोष हैं, दूसरे मेरे पुत्र अनुपम, तीसरे युवा साथी बालमुकुंद, एक और भाई असीम, जो यह बार-बार आगाह करते हैं कि मेरी बातों में जो विज्डम होता है (और सहज रोचकता) वह मेरे लिखने में नहीं आता। मैं अपने बचाव में बस यही कह पाता हूं कि मैं लेखक नहीं, साहित्यकार तो कतई नहीं, वाचिक परम्परा का ‘गोठकार‘ हूं। मन ही मन थोड़ा प्रयास जरूर करता हूं कि उनकी शिकायत दूर कर सकूं, पर अब तक ओके सर्टिफिकेट दुर्लभ है।🙂)

21 फरवरी 2022
* सम्राट अशोक की पोट्रेट अभिलिखित प्रतिमा है। इस पर कभी अंशुमन तिवारी जी ने स्टोरी की थी, एस्केवेशन रिपोर्ट आया, उपिंदर सिंह ने अपनी किताब में शामिल किया (यह किताब आपके पास होनी चाहिए), यह भी निर्धारित हुआ कि इसी तरह की सांची से प्राप्त कलाकृति भी अशोक की ही मूर्ति होनी चाहिए।

03 फरवरी 2022
* इस नारी प्रतिमा का पिछले वर्षों में स्तन को ढका गया है। 12 वीं सदी की है। स्थानीय समिति ने स्तन पर कंचुकीनुमा कपड़ा लगा दिया।

मूर्तियों पर चांदी की आंख लगाना और बंतअमक होने के बाद भी ऊपर से आभूषण पहनाया जाना अब आम है। गनीमत है खजुराहो जैसी मूर्तियों को ढकने की मांग नहीं उठी।

आस्था के चलते देव-प्रतिमाओं का लिंग परिवर्तन, यानि पुरुष प्रतिमा को नारी के रूप में पूजे जाने के भी उदाहरण हैं।

06 जनवरी 2022
* बनारस के लिए मुझे प्रिय भानुशंकर मेहता और मोतीचंद्र जी का लेखन और पुस्तकें, शिवप्रसाद सिंह और काशीनाथ सिंह तो हैं ही। बहती गंगा, शिवप्रसाद मिश्र रूद्र काशिकेय, लाजवाब है। गुलेरी जी के दो लेख और भारतेन्दु जी के तो क्लासिक हैं।

3 comments:

  1. Ashutosh BhardwajJuly 20, 2022 at 10:27 AM

    यह डायरी का नया फॉर्म है, व्हाट्स एप डायरी. अक्सर कहा जाता है कि व्हाट्स एप विधा भाषा के लिए हानिकारक है, लेकिन यहाँ गद्य आभा के साथ उपस्थित है.

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  2. यह तो बहुत सुन्दर तरीका है. मुझे कुँए और तिरही के बारे में पढ़कर अच्छा लगा. हम यह सब भूल गए हैं. अच्छी रीतियाँ भूल केवल बुरी व् बिगड़ी हुई रीतियों को ढो रहे हैं.

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