Saturday, August 14, 2021

ककहरा

संस्कृत-हिंदी भाषा के लिए प्रयुक्त देवनागरी वर्णमाला पर ध्यान जाने पर लगता रहा कि ‘अक्षर कोश‘ जैसा भी कुछ होता है?, तलाश करते ठीक-ठीक वैसा कुछ मिला नहीं, जैसा सोचता/चाहता था और इसका कारण समझ में आया कि मैं क्या सोचता/चाहता हूं, शायद ठीक-ठीक मुझे मालूम ही नहीं। संभव है कि कहीं ऐसा कुछ हो और मुझे जानकारी न हो। इस तरह शुरू हुआ, अक्षर और ध्वनि का संबंध और उसके आशय समझने का मनमाना प्रयास।

यह भी ध्यान में आता रहा कि कोई अक्षर, दूसरे किस अक्षर में बदलता है, स-च-छ या ड़-ळ-ल-र या व-ब, य-ज आदि एक तरफा होता है या दोतरफा। छत्तीसगढ़ी में पाषाण-पत्थर के लिए पखना और पथरा, दोनों शब्द प्रचलन में हैं। यह रोचक उदाहरण है। पखना में ष का ख और ण का न बना है। और पाषाण, पत्थर-पाथर होते हुए पथरा तक आता है। लक्ष्मण का लखन, लषन तो अलट-पलट होता ही रहता है। शत्रुघ्न का सतरोहन, विभीषण का भभीछन, सरस्वती का सुरसती, द्रौपदी का दुरपती, यशोदा का दसोदा, त्रियुगी का तिरजुगी, अंबिका का अमरीका, योद्धा का जोइधा और दुर्याेधन का जिरजोधन हो जाना, पक्षी Black-winged Kite (या कभी Falcon, Shikra को) संस्कृत का सञ्चाण, सञ्चान, सचान, सिचान, सइचान, छत्तीसगढ़ी में छछान या छछांद है और इसी तरह वटसावित्री से बरसाइत, रथयात्रा यानि रथद्वितीया से रजुतिया और जीवितपुत्रिका का जिउतिया आसानी से हो जाता है। इस तरह बोलियों में प्रयुक्त उच्चारण और बदल गए शब्द इसमें मददगार होते हैं।

भाषा-ध्वनि, उच्चारण-भेद में मुख-सुख के अलावा अन्य कारकों को उदाहरण के माध्यम से समझने के लिए छत्तीसगढ़ी में प्रचलित दो शब्दों पर ध्यान जाता है- ‘छुछु‘ और ‘दुदी‘ या ‘दूदी‘। स्कूल की पढ़ाई पहली कक्षा से आरंभ होती थी, मगर शाला में नियमित प्रवेश के पहले बच्चों को प्री-स्कूल के लिए भेजा जाता था, उनकी कक्षा ‘छुछु पहली‘ होती थी। छुछु में स्पष्ट है, शिशु के दोनों श का छ हो गया है और पहली इ की मात्रा उ में बदल गई है। शिशु का छिछु से आगे छुछु होने का कारण संभव है कि छि-छु (छि-छि, शु-शु), मल-मूत्र के करीबी पर्याय शब्द हैं। इसी तरह दूसरा शब्द दुदी है, यह दो-दो के लिए प्रयुक्त होता है। स्वाभाविक और अभ्यास से विकसित छत्तीसगढ़ी के फर्क के लिए दुदु/दुदी, ‘की-वर्ड‘ जैसा भी है। दो, छत्तीसगढ़ी में दू है और स्तन के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द दूध से बाल-तोतलेपन के अनुरूप दुधु से दुदु हो जाता है। दो-दो कहना हो तो यों दू-दू कहा जाएगा, लेकिन इसका आशय स्तन हो जाता है, इसलिए स्वाभाविक छत्तीसगढ़ी अभ्यासी इसे ‘दुदी‘ कहता है। यहां शिशु-छुछु के पहले शब्द में इ की मात्रा उ हुई है तो दुदु में दूध की पहली मात्रा दीर्घ से ह्रस्व फिर दूसरा शब्द ध सरल हो कर द हुआ है और उस पर उ की मात्रा, शायद मुख-सुख के कारण नहीं, बल्कि लोक-लाज के कारण उ का ई होता है।

भाषा शास्त्र, ध्वनि विज्ञान के शास्त्रीय अध्ययन के बिना सहज रूप से इसे कैसे और कितना समझा जा सकता है। धातु रूप, संस्कृत, प्राकृत, पाली, अपभ्रंश (इंडो-आर्यन, इंडो-यूरोपियन, विदेशी भाषाओं सहित, उदाहरणार्थ- फादर, फ्योदोर, पितर, पिता या मदर, मातर, मातृ, माता, मादर, आदि।) इसमें किस तरह सहायक होंगी। जैसमाइन का जैस्मिन होते हुए यास्मीन हो जाना और यशोमति का यश, ज्यों दस-मत कइना, कैना/ओड़निन या जस्मा ओड़न तक विस्तार। भारतेन्दु का ‘इशुखृष्ट और ईशकृष्ण‘ शीर्षक लेख है, जिसमें लिखा है- ‘गोब्रिल (जिबरईल) गरुड़ का अपभ्रंश है। हमारा चन्‍द्रगुप्‍त, यूनानी सेण्‍ड्रॉकोट्टस बनता है तो मूल यूनानी अलेक्जेंडर, अलिकसुंदर, अलीकचन्‍द्र, अलेक्सांद्र, अलक्षेन्द्र, इस्कंदर होते हुए फारसी उच्चारण सिकंदर बनता है। ... दिव धातु से देववाची शब्द संसार में प्रसिद्ध है। भारत के इन्द्र देव वे देवेन्द्र और यूनान में दिवस या जियस।‘ इस पर याद आता है- देउस पितर, ज्यूपिटर, हमारे वृहस्पति, देव गुरु। जब मैंने जाना कि उपाध्याय ही घिसकर झा रह जाता है तो पहले-पहल विश्वास नहीं हुआ, फिर दिखाया गया कि उपाध्याय से उपझाय से ओझा से झा, तो लगा कि यह कितना सहज, स्वाभाविक है। इसी तरह मार्जन से समझने में मदद मिली कि मार्जन से मज्जन, मंजन होते मांजना बन जाता है।

संस्कृत चमत्कारों में वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन क्रम से और सार्थक, का यह प्रयोग मिला- कःखगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोैटौठीडढणः। तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोरिल्वाशिषां सह।। और फिर ‘वन्दे वाणीविनायकौ‘ में जाना कि विनायक अर्थात् विनयन, विशिष्ट नयन, ले जाने, पहुंचाने वाले हैं। तो इन विनायक के स्मरण के साथ सोचते हुए कि क्या वाणिज्य को बनिया-बनिए, बनता देख इसमें वाणी को भी अंटाया जा सकता है। यह सब उमड़ता-घुमड़ता रहा, बहुत सारा उल-जलूल जमा होता गया, तो उसे व्यवस्थित कर, अपने सवाल, अपनी जिज्ञासा, नासमझी को स्वयं समझने का परिणाम है ये टूटे-फूटे शब्द-

क- करना, कर-हाथ, क्रिया, काम, कल, काल-समय, कड़कड़ाहट, कर्कश-ध्वनि
ख- खाली, खोल, खोली, खोखला, खक्खी, शून्य, आकाश
ग- गमन, गति, गत
घ- घात, नुकसान, घटना, घर, घना
च- चर्वण, चबाना, चक्की, निश्चय, खचित, जाबेच्च, और
छ- छेद, छिद्र, छत, छाया, छाप, छतरी
ज- जन्म, पैदा, उत्पन्न
झ- झकझोर, हिलना, झाड़ना, झूलना, लटकना, झूला, झंडी, झालर, झंझावात
ट- टूटना, टुकड़ा, टीका
ठ- स्थिर, जड़, ठहरना, ठांव (ठग?)
ड- डोलना, डगमग, डर, उत्तेजना, डीह, डिपरा, डुगू, ऊंंचा, उभरा हुआ, असमान स्तर
ढ- ढकना, ढक्कन, ढलना, ढलान, ढाल
त- तोलना, तरल, तट, ताप, तराजू, तिरना, तैरना, पानी
थ- थमना, थामना, स्थिर, पृथ्वी, थक्का
द- देना, दान
ध- धन, धर्म, धारण, धरती
न- नकार, निषेध
प- पालन, पति, ... पंख, पत्र ...?
फ- फूलना, फल, फूल, फैलना
ब- बाग, बगरना, फूलना, फैलना
भ- भाग, भवन, भंडार, भाड़, भंग, भग, भरका, भोंडू, भोंगरा (छेद/गड्ढा) भजन, भंजन, भरा
म- मत्सर, मछली, मन - चंचल
य- यान, यज्ञ, यति... ?
र- रज्जु, राह, राग- सिलसिला, टेढ़ा-मेढ़ा, लहरदार
ल- लपट, लहर, लपलपाना, तरल, चल- अस्थिर, दृष्टि, लोचन, आलोचना, LOOK-लोक, अवलोकन, लंबा, लट्ठ
व- वर, वधू, वरण, खास, विद्या, वीक्षण ... ?
श- शांत
ष- छह
स- साथ, सहित, संबद्घ- जुड़ा हुआ
ह- हवा, हलचल, हिलना
क्ष- क्षत, नष्ट होना, विघटित, अभौतिक, अदृश्य, भेदक, सरल रेखा
त्र- तीन, त्राण, पात्र
ज्ञ- जानना

टीप-समझ अनुसार इसमें जोड़-घटाव करता रहूंगा। फिलहाल बस श्रीगणेश ...

2 comments:

  1. छत्तीसगढ़ी शब्दों की व्युत्पत्ति को अत्यंत सारगर्भित ढंग से समझाने वाला बहुत ही शोधपरक आलेख । इस लेख से छत्तीसगढ़ी के अनगढ़ से लगने वाले शब्दों की सुघड़ता समझ आ रही है।

    अभिनन्दन !

    रामनाथ साहू

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  2. माँ हमारे बचपन मे छुछु पहली शब्द का प्रयोग करती थी अभी उस शब्द को संदर्भ से जोड़ पा रहा हूँ।

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