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Monday, July 18, 2016

रामचन्द्र-रामहृदय


दुर्ग, भिलाई की छाती में तो लोहा पनीला होकर बहने लगता है फिर कला-संस्कृति की सतत्‌ प्रवाहित रसधार का उद्‌गम कैसे न हो। रामचन्द्र देशमुख और रामहृदय तिवारी, ऐसी ही दो धाराएं हैं।

रामचन्द्र देशमुख जी का 'छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल', नाम से ही स्पष्ट है कि लोककला के विकास की मंडली थी लेकिन राष्ट्रवाद और आदर्शवाद के साथ उनकी यह पीड़ा कि 'छत्तीसगढ़ विश्व के उपेक्षित अंचलों का प्रतीक है', ने छत्तीसगढ़ के 'लोकमंचों' का स्वरूप निर्धारित किया। प्रस्तुति को उन्होंने 'नसीहत की नसीहत और तमाशे का तमाशा' कहा।

मैंने 'देवार डेरा' की पहली प्रस्तुति, तीसेक साल पहले, बघेरा में देखी थी, इसके पहले सत्तरादि दशक के शुरुआत में पामगढ़ और बलौदा में 'चंदैनी गोंदा' देखने का अवसर मिला था। भैयालाल हेड़उ का गाना 'बधिया के तेल' और दृश्य अब भी याद आता है। 'चंदैनी गोंदा फुल गे' के साथ खुमान साव का संगीत और लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, साधना यादव की उपस्थिति हमारी पूरी पीढ़ी के लिए अविस्मरणीय है। इस क्रम में बाद में 'कारी' की शैलजा ठाकुर का भी नाम स्मरणीय है।

यह मात्र संयोग नहीं कि मैं रामहृदय तिवारी जी के बारे में पिछले कुछ सालों में ही जान पाया। इस पूरी श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी होने के बावजूद भी लोक रचनाकार की तरह उनका नाम अनजाना-सा ही रहा है। इसलिए आज न सिर्फ यह उनका सम्मान है बल्कि पूरे निर्णायक मंडल, कलाप्रेमी बिरादरी और हर छत्तीसगढ़िया के सम्मान का विषय है।

रामहृदय तिवारी जी ने 18 वीं सदी के अंग्रेज यात्री लेकी के उद्धरण - 'यहां के लागों में धार्मिक भावना की प्रबलता है। यहां की संस्कृति बड़ी सहिष्णु है। लोगों में परस्पर बंधुता की भावना है। आपसी सहयोग की भावना यहां के लोगों का मूलमंत्र है।' पर टिप्पणी की है- लेकिन मेरा कहना अब यह है कि अपनी समृद्ध संस्कृति की श्रेष्ठ विरासत का बखान बार-बार करने का फायदा ही क्या, जब आज उसकी कोई भी झलक हमारे आचरण, व्यवहार और दिनचर्या में मुश्किल से दिखाई दे।

दक्षिण भारतीय एक परिचित ने मुझे यह कहकर चौंका दिया कि लगभग साल भर यहां रहते हुए उनका छत्तीसगढ़ी से परिचय मोबाइल के रिकार्डेड संदेश और रेल्वे प्लेटफार्म की उद्‌घोषणा के माध्यम से सुना हुआ जितना ही है।

अस्मिता को जगाए-बनाए रखने के लिए गोहार और हांक लगाने का काम- अवसरवादी स्तुति-बधाई गाने वालों, माइक पा कर छत्तीसगढ़ी की धारा प्रवाहित करने वालों और उसे छौंक की तरह, टेस्ट मेकर की तरह इस्तेमाल करने वालों से संभव नहीं है।

तसल्ली इस बात की है कि छत्तीसगढ़ के लोक और उसकी अस्मिता के असली झण्डाबरदार रामहृदय तिवारी जी की तरह ज्यादातर ओझल-से जरूर है लेकिन अब भी बहुमत में हैं। छत्तीसगढ़ की अस्मिता उन्हीं से सम्मानित होकर कायम है और रहेगी।

रामचन्द्र देशमुख बहुमत सम्मान (भिलाई, 14 जनवरी 2010) के लिए रामहृदय तिवारी जी का नाम तय हुआ, विनोद मिश्र जी का आमंत्रण संदेश मिला, इस अवसर पर उपस्थित होने के लिए जाते हुए जो कुछ मन में चल रहा था, नोट कर लिया और वहां अवसर मिला तो सब से यही बांट भी लिया।

3 comments:

  1. बहुत बढिया, शुभकामनाएँ।

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  2. सुन्दर जानकारी। छत्तीसगढ़ की संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने आपका योगदान भी कम नहीं रहा है।

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  3. रामचन्द्र देशमुख जी जैसे सच्चे मातृभूमि रक्षक ही लोक कला को जीवंत रखते हैं
    बहुत अच्छी जानकारी प्रस्तुति हेतु आभार

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