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Monday, June 20, 2016

अकलतराहुल-062016


देश, पात्र और काल।

देश- अकलतरा, छत्तीसगढ़, अक्षांश- 22.0244638 उत्तर, देशांतर- 82.42381219999993 पूर्व, जो पात्र- राहुल कुमार सिंह (जैसा कहने का चलन है, इस नाचीज बन्दे) का गृहग्राम है और काल- सन 2016 का जून माह, इन दिनों।

'अकलतराहुल', अकलतरा और राहुल की संधि-सा, लेकिन यहां 'अकल-त-राहुल', आशय 'राहुल की समझ' है और गढ़ा इसलिए गया कि विशिष्ट शब्द होने के कारण गूगल खोज में आसानी से मिल जाए।

देश-पात्र-काल, जातक की जन्म-कुंडली, कभी कहानी, कभी इतिहास, लेकिन इरादा कि यह सब गड्ड-मड्ड करते अकलतरावासी राहुल का पढ़ा-देखा-सुना, समझा-बूझा महीने-महीने यहां आता रहे। वैसे कुल-जमा मन में तो बस सुमिरन है, लेकिन...

माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माहिं।
मनवा तो चहुं दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहीं।।

o वर्णमाला का ''आरंभ - अ'' से और लगभग ''समापन - स'' से।
मेरी मां के नाम का आद्याक्षर 'अ' और पिता का 'स'।
मेरे आत्मीेय अशोक, अनूप, अनुज, आशुतोष, अनुभव, अपूर्व, अनंत, अनुपम, अभिषेक, अनिल, अमित, अजीत, आनंद, अंबुज, अखिलेश, असीम, आगत, अमितेश, आलोक, अरविंद आदि और सम्माननीय अधिकतर महिलाओं के आद्याक्षर 'स या श'।
आकस्मिक या संयोग मात्र।
इनमें जो शामिल नहीं वे आत्मीय अधिकतर में नहीं या इस संयोग के अपवाद हैं।

o खुद चाहे भटकते रहें और अपनी राह न सूझती हो, न खोज पाएं, लेकिन कई बार लगता है कि ऐसी बातों से किसी को राह मिल सकती है। इस 'चिंतन-संधान' से जग वंचित न रह जाए (स्माइली)। 'सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।'

किसी की बराबरी का प्रयास न किया कभी, न अपने बराबर माना किसी को। यह किसी को विनम्रता लगती है, किसी को अभिमान। लेकिन चाहता हूं ऐसा सहज निभता चले।

पचपन पार करने के बाद 35-40 वाला तो गबरू जवान लगता है, तो कभी लगता है कि सठिया तो नहीं रहे हें, लेकिन देना-पावना का हिसाब लगाने की उम्र तो हो ही गई है और अब अपने बारे में कई धारणाएं पक्की होने लगती हैं, अब वह मान लेने में हर्ज नहीं, संकोच नहीं होता, जिससे पहले मन ही मन लुका-छिपी होती रहती थी। और सोच की पारदर्शिता जब स्व से सार्वजनिक होने लगे तो थोड़ा सेंसर जरूरी हो जाता है, लेकिन उसमें अपनी दृष्टि, महसूसियत और अभिव्यक्ति के स्तर पर ताजगी हो, हां! वह सप्रयास क्रांति वाली न हो।

याददाश्तत बहुत अच्छी हो तो संस्मरण लिखना कितना मुश्किल होगा। रचना-रस और शायद सार्थकता भी तभी, जब यह 'क्या‍ भूला, क्या याद किया' के असमंजस सहित हो।

o नारायण दत्त, (पूरा नाम- होलेनर्सीपुर योगनरसिम्हम् नारायण दत्त), पठन-पाठन में मुझे प्रभावित करने वाले, विचार-व्यवहार और तालमेल वालों में पहला नाम है, नवनीत हिन्दी डाइजेस्‍ट के संपादक और उनके कुछ लेखों के माध्यम से परिचित हूं। फिर लेखक-साहित्यकारों में हिन्दीर को खास ढंग से समृद्ध करने वाले कुबेरनाथ राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मनोहर श्याम जोशी, विद्यानिवास मिश्र, शिवप्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय, रेणु, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा ... ... ... बौद्ध पढ़ना हो तो भदंत आनंद कौसल्यायन और जैन के लिए नाथूराम प्रेमी...

o इस महीने नारायणपुर-नवागढ़ मार्ग पर गांव संबलपुर (जिला बेमेतरा, छत्तीेसगढ़) से गुजरते हुए श्रीमती कदमबाई बंजारे से मुलाकात हुई, उन्होंने बताया कि पिछले बारह वर्षों से रहंस का ग्यारह दिवसीय आयोजन, चैत्र नवरात्रि में यहां कराती हैं। समाज की सहमति-असहमति के बीच पूरे गांव से सहयोग ले कर। मूर्तिकार खम्हइया, ग्वालपुर आदि से आते हैं और व्यास महराज तोताकांपा के श्री मिलू, दर्रा के श्री बैदनाथ, और भी कई हैं। रहंस के बाद गणेश मूर्ति ठंडा कर दी जाती है, बाकी अपने-आप घुरती है, अभी बची हैं इसलिए यहां, चौक के पास कुंदरा छा लिया है, घर के काम निपटा कर यहां आ जाती हैं।

o विशेषज्ञ, किसी वस्तु/विषय को देखते ही निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, यों कहें कि गणित की कोई पहेली हो औैर गणितज्ञ को उसे- जबकि, तो, इसलिए, माना कि... जैसे चरणवार बढ़ते-सुलझाते और उसे अभिव्यक्त करने के बजाय सीधे हल पर पहुंच जाए, विशेषज्ञ के लिए आसान होता है, लेकिन यह औरों के लिए पहेली में चमत्कार जैसा हो जाता है।

अनाड़ी, कदम-दर-कदम ठिठकते-भटकते, असमंजस सहित आगे बढ़ता है, सभी सीखे तौर-तरीकों को आजमाते और उसके बरत सकने की खुद की काबिलियत को जांचते, एक से दूसरे उपाय पर जाते, कांट-छांट, यानि पूरी चीर-फाड़, विश्लेषण सामने प्रकट रखते।

अनाड़ी-नौसिखुआ के हाथों पड़कर कोई वस्तु/विषय बेहतर खुल सकता है। अनाड़ी के हल में अन्य का प्रवेश-निकास आसानी से हो सकता है, विशेषज्ञ का हल कवचयुक्त, व्याख्या-आश्रित होता है।

4 comments:

  1. आपके लौट आने से ख़ुशी हुई......स्वागत ! अभिनंदन !!
    सिंहावलोकन का ‘नया रूप’ अच्छा लगा ।
    आपका लिखा छत्तीसगढ़ को नज़दीक से देखने का अवसर प्रदान करता है ।
    ‘नवनीत’ तब तक नवनीत रहा जब तक नारायण दत्त संपादक रहे ।
    शुभकामनाएँ ।

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  2. अनाड़ी-नौसिखुआ के हाथों पड़कर कोई वस्तु/विषय बेहतर खुल सकता है। अनाड़ी के हल में अन्य का प्रवेश-निकास आसानी से हो सकता है, विशेषज्ञ का हल कवचयुक्त, व्याख्या-आश्रित होता है।

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  3. @अनाड़ी, कदम-दर-कदम ठिठकते-भटकते, असमंजस सहित आगे बढ़ता है, सभी सीखे तौर-तरीकों को आजमाते और उसके बरत सकने की खुद की काबिलियत को जांचते, एक से दूसरे उपाय पर जाते, कांट-छांट, यानि पूरी चीर-फाड़, विश्लेषण सामने प्रकट रखते।

    अनाड़ी-नौसिखुआ के हाथों पड़कर कोई वस्तु/विषय बेहतर खुल सकता है। अनाड़ी के हल में अन्य का प्रवेश-निकास आसानी से हो सकता है, विशेषज्ञ का हल कवचयुक्त, व्याख्या-आश्रित होता है।

    हम अाजकल इसी राह से गुज़र कर पगडंडी तलाश करते हुए , दौड़ना सीख रहे हैं .... अापका यह अंदाज़ बढ़िया लगा , अाभार पढ़ाने के लिए

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    1. हम तो बमुश्किल, डगमग चल पा रहे हैं सतीश जी. आपकी दौड़ सरपट है और मैराथानीय लंबी भी. :)

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