Thursday, March 26, 2026

सालगिरह-वर्षगांठ

गांधी ने 1 अक्तूबर 1939 को रेल से दिल्ली जाते हुए लिखा था- ‘सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने मेरे इकहत्तरवें जन्म-दिन को खास महत्व दे डाला है। ... पर प्रशंसकों को एक चेतावनी मैं जरूर देना चाहूंगा। कुछ लोग सार्वजनिक स्थानों पर मेरी मूर्ति खड़ी करना चाहते हैं, कुछ तस्वीरें चाहते हैं, और कई हैं जो जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बना देना चाहते हैं। पर श्री च. राजगोपालाचारी मुझे अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने दानिशमन्दी के साथ मेरे जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बनाने की बात को रद कर दिया है।‘

2 अक्टूबर 1939 को महात्मा गांधी जन्म-दिन की भेंट के रूप में सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् द्वारा संकलित-संपादित ‘MAHATMA GANDHI ESSAYS AND REFLECTIONS ON HIS LIFE AND WORK‘ के सस्ता साहित्य मण्डल से प्रकाशित हिंदी संस्करण ‘गांधी-अभिनंदन-ग्रंथ‘ से उक्त उद्धरण लिया गया है।

सालगिरह-वर्षगांठ में साल के साथ गिरह या वर्ष के साथ गांठ का प्रचलित अभिप्राय जो हो, गिरह-गांठ बांधकर साल पूरा होने की गिनती और उसे याद रखने के तरीके से आया है। इस दौर में जन्मदिन और शादी की सालगिरह मनाने का प्रचलन, ‘सभ्य समाज‘ में अनिवार्यता की तरह शामिल है, तब यह जितना खुशी मनाने का, बधाई-धन्यवाद का मौका होता है, उतना ही मन में गांठ बांधने का, कि किसने विश नहीं किया। जन्मदिन छुपाने का मेरा अपना कारण है कि बधाई मिलने पर बारी-बारी से सबको धन्यवाद देना जरूरी लगता है, जो नहीं कर पाता। वैसे ही यह खुद को बचा लेने का प्रयास भी है कि दूसरों को बधाई दिए बिना काम चल जाए। न बधाई के लेन में न देन में। यह स्वीकार करते कि इस बहाने खैरियत और जीवित-प्रमाण की दृष्टि से इसे गैर-जरूरी नहीं माना जा सकता।

बहरहाल, तीन फिल्मी गीत याद आते हैं- बधाई हो बधाई जनमदिन की तुमको ... फिल्म का नाम ही ‘मेरा मुन्ना‘ है, सारा जोर लड्डू पर है, मेहनत से पढ़कर आगे बढ़ोगे, पास होगे तो हमें लड्डू मिलेंगे, बड़े हो के भाभी लाना, शादी होगी तुम्हारी और हमें लड्डू मिलेंगे, बुढ़ापे में बाल पकेंगे और पोते होंगे, तो फिर लड्डू मिलेंगे। यह जनमदिन, ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू‘ हो जाता है, गीत ‘हम भी अगर बच्चे होते ...खाने को मिलते लड्डू‘ में। मगर इन दोनों गीतों में जन्मदिन बच्चे का ही है। संभव है कि यह फिल्म की कहानी के अनुरूप हो, मगर इससे यह भी अनुमान होता है कि जन्मदिन बच्चों का ही मनाया जाता है, और इस मौके पर लड्डू होते हैं, केक नहीं। हैप्पी बर्थ डे टू यू वाला एक अन्य ‘बार-बार दिन ये आए ...‘ रोमांटिक गीत, हसीना सुनीता के लिए है। और अब नया दौर है, जिसमें साथ रहने वाले परिवार के सदस्य, पति-पत्नी भी एक दूसरे को जन्मदिन, सालगिरह की बधाई फेसबुक पर देने लगे हैं।

वह पीढ़ी अभी भी है, जिनमें से अधिकतर का जन्मदिन 1 जुलाई या 1 जनवरी होता है। यह होता इसलिए है कि ऐसा भी दौर था, जिसमें जन्म की तारीख याद रखना आम नहीं था। इसकी जरूरत होती थी स्कूल में भरती के लिए, जिसे एडमिशन नहीं, नाम लिखाना कहा जाता था। दरअसल, अक्सर ऐसा होता था कि स्कूल में प्रवेश तक शिशु का घरू नाम चलता था, कई बार नामकरण भी शाला में प्रवेश दर्ज करने वाले गुरुजी ही करते थे। अधिकतर के साथ यही पहला मौका होता था जब नाम लेखी में आता था। और जन्मतिथि के लिए होता यह कि प्रवेश के लिए आए बच्चे को दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर, बांयां कान छूने को कहा जाता। कान पर ठीक-ठीक हाथ पहुचे तो प्रवेश-वर्ष में छह वर्ष घटाकर, उस वर्ष की 1 जुलाई जन्मतिथि हो जाती और कुछ कम-अधिक यानि साढ़े पांच या साढ़े छह का अनुमान होने पर 1 जनवरी तारीख काम में आती। जन्मदिन न मनाने वाले एक परिचित कहा करते हैं कि जन्मदिन याद रखने की जरूरत ही क्या, मगर क्या करें कोई भी फार्म भरते हुए उसमें जन्मतिथि अंकित करना होता है।

एक गंभीर किंतु रोचक दस्तावेज देखने को मिला, जिसमें जनगणना-2001 के लिए बिलासपुर, जांजगीर-चांपा एवं कोरबा (पुराने बिलासपुर) जिले में सही आयु निर्धारण करने के लिए प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का वर्ष बताया गया है। इसमें 13 प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में पहले क्रम पर 1903 का अकाल है, स्वतंत्रता आंदोलन के वर्ष, इस अंचल के स्वतंत्र भारत के विकास के मील के पत्थर, जिनमें 1954 में हमारे स्कूल ‘अकलतरा शिक्षण ट्रस्ट‘ की स्थापना भी है, 13 वीं प्रविष्टि 1984-इंदिरा गांधी का निधन है। स्पष्ट है कि जनगणना में यह सहायक दस्तावेज, उनके लिए था, जिन्हें अपने जन्म की तिथि या वर्ष ठीक-ठीक नहीं मालूम, मगर इसे वे अंचल की किसी प्रमुख यादगार घटना के साथ जोड़ कर याद करते हैं। साथ ही माना गया है कि इस जनगणना में अधिकतम आयु का व्यक्ति 1903 के आसपास का होगा और 1984 के बाद जन्म लिए की जन्मतिथि, जन्म-प्रमाणपत्र होगा। इसके साथ निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि ‘यदि कोई व्यक्ति सही आयु बताने में असमर्थ है तो इन घटनाओं की याद दिलाते हुए उसकी संही आयु ज्ञात कर सकते हैं मान लो कि परिवार का कोई सदस्य उम्र नहीं बता पाता है तो आप उससे पूछ सकते हैं कि देश की स्वतंत्रता के समय आपकी उम्र क्या थी। यदि सदस्य बताता है कि उस समय उसकी आयु 10 वर्ष थी ओप उसकी आयु 64 वर्ष (10$54= 64) दर्ज करें।

ऐसा नहीं कि वर्षगांठ को इस तरह याद रखना पुराने दौर में था, अब नहीं।

2017 में प्रकाशित अनु सिंह चौधरी की पुस्तक मम्मा की डायरी में आता है- मनीष और मैं 10 नवंबर को पहली बार मिले और ठीक तीन महीने बाद 16 फरवरी को हमारी शादी हो गई। मुझे आमतौर पर तारीखें याद नहीं रहती। मनीष से मिलने की तारीख़ इसलिए याद है क्योंकि हम जिस दिन मिले थे, उसके अगले दिन मॉर्निंग शिफ्ट में पूरे दिन हमने बुलेटिन में यासिर अराफात की मौत की ख़बर चलाई थी। ... उन दिनों न्यूजरूम का असर मुझपर इतना हावी रहता था कि अपनी सारी यादें बड़ी ख़बरों से जुड़ी हुई पाती हूँ। जिस दिन शादी का लहंगा ख़रीदने गई उस दिन सुनामी आया। जिस दिन हमारी शादी हुई उस दिन क्योटो प्रोटोकॉल प्रभाव में आया। जिस दिन अपने नए घर के लिए अपनी शादी के बाद की पहली दीवाली की ख़रीदारी करने निकले, उस दिन दिल्ली में तीन सीरियल धमाके हुए...‘

इस प्रसंग में एक और रोचक संदर्भ मिला- बनारस पर भानुशंकर मेहता के लिखे का अपना रस है, निबंध ‘हुस्ना की टीप‘ में लिखते हैं- ‘बुढ़वा मंगल‘ का कोई भी लेख हुस्ना की टीप की चर्चा के बिना अधूरा रहता है। मगर यह हुस्ना थी कौन? बस इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ते मैं जनाब अब्दुल कुद्दूस नैरंग साहब के दौलतखाने पर पहुँच गया। नैरंग साहब मशहूर नाटककार आगा हश्र काश्मीरी के भानजे हैं। ... नैरंग साहब से पूछा तो यादों की किताब खुल गई, धीमे से गुनगुनाये ‘फिर धुँआ उठने लगा दिल से‘। बोले। ‘साहब, मैं हुस्ना बाई को न जानूँगा?‘ चालीस साल पहले जब मेरी शादी हुई थी- वे रुके और बोले- ‘ठहरिये- मैं जरा दरियाफ्त कर लूँ‘ और तब घर के अन्दर जाकर बेगम साहिबा को आवाज दी और पूछा ‘क्यों भई, कितने साल हो गये होंगे हमारी शादी को?‘ और सीधा उत्तर मिला ‘अब मुझे याद है क्या‘? तुरंत ही नैरंग साहब लौट आये और बोले- ‘हाँ साहब करीब इतने ही साल हुए होंगे- नहीं साहब पचास साल हुए होंगे। तो वाकया यह है कि हमारी शादी हुई तो वे-हुस्ना बाई हमें दुआ देने आई थीं। बहुत ही बासलीका, तहजीबदार औरत थीं। उनकी उस्तादी गायकी, शास्त्रीय गाने का मिसाल नहीं। हर चीज़ पूरे इतमिनान से गाती थीं। और हाँ मैंने देखा है, उन्हें कान पर हाथ रखकर गाते हुए, बड़े उस्तादों की तरह। ... नैरंग साहब फिर से यादों के तूफान में खो गये। बोले- ‘गाना और ड्रामा, क्या-क्या दिन देखे थे बनारस ने। डा. समद साहब डाइरेक्टर थे, सन् 1886 की पैदाइश थी उनकी।‘ 

उक्त अंश में मजेदार कि जिन नैरंग साहब या उनकी बेगम को शादी की तारीख क्या, साल भी ठीक याद नहीं पड़ रहा, डा. समद की पैदाइश का सन बेहिचक याद कर पा रहे हैं।

अटल जी की पंक्तियों के साथ (काशी-)करवट लें- जन्म दिवस पर हम इठलाते, क्यों न मरण-त्यौहार मनाते ... यों कई समाज ऐसे हैं, जिनमें मृतक-संस्कार का उत्सव होता है। मारवाड़ी समाज में हिंदू परंपरा का ‘बैकुंठ‘ प्रचलित है। पूरी उम्र और सुखद जीवन पा कर दुनिया से विदा लेने वाले की बैकुंठी शवयात्रा, उत्सव की तरह, धूमधाम से होती है। इस तरह जन्म की बातें हो रही हो तो जीवन-मृत्यु की युति पर ध्यान जाता ही है। ज्यों, पेंशन और बीमा लाभार्थियों को जीवित प्रमाण पत्र देना होता है। जो जन्मा उसकी तो मृत्यु होगी ही, क्यों न वह अवतार रूप देवता हो, मगर क्या मृत्यु का जन्म भी होता है, क्यों नहीं मृत्यु है तो उसका जन्म भी तो होगा ...

धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म यमराज से हुआ और महाभारत शांतिपर्व के मोक्षधर्म पर्व में मृत्यु के जन्म की कथा इस प्रकार है- ... सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो, मरकर पुनः जन्म धारण करे। नारदजी कहते हैं -राजन् ! महादेवजी की वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्मा ने मन और वाणी का संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मा में ही लीन कर लिया। तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्मा ने उस अग्नि का उपसंहार करके प्रजा के लिये जन्म और मृत्यु की व्यवस्था की। उस क्रोधाग्नि का उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्रा जी की सम्पूर्ण इन्द्रियों से एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई। ... भगवान् ब्रह्मा ने उसे ‘मृत्यु‘ कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा-‘तुम इन प्रजाओं का समय-समय पर विनाश करती रहो। ‘मैंने प्रजा के संहार की भावना से रोष में भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानों सहित सम्पूर्ण प्रजाओं का संहार करो। कामिनि ! तुम मेरे आदेश से सामान्यतः सारी प्रजा का संहार करो । इससे तुम्हें परम कल्याण की प्राप्ति होगी’। ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर कमलों की माला से अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रों से ऑसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्ता में पड़ गयी।‘

महाभारत, शातिपर्व के आपद्धर्म पर्व में कथा है, किसी ब्राह्मण के इकलौते पुत्र की अल्पायु में मृत्यु हो जाती है। परिजन द्वारा उसका शव श्मशान ले जाने पर वहां एक गिद्ध (गीध) और एक सियार प्रकट हो, जीवन-मृत्यु का उपदेश देने लगते हैं। दिन रहते शव-भक्षण लालायित गिद्ध समझाता है- मृत्यु अटल है और यहाँ रुकने से मृत बालक जीवित नहीं होगा, अब रोने-धोने से क्या होगा, परिजन अब शव को छोड़कर घर लौट जाएं। मृत शरीर के पास बैठने से केवल दुःख बढ़ता है। मोह को अज्ञानता बताते हुए लौट जाने और जीवितों के प्रति अपने कर्तव्य निभाने की सलाह देता है। सियार प्रेम और ममता की दुहाई देते अंधेरा होने तक उन्हें रुक जाने की सीख देने लगता है, ताकि रात होने पर वह शव को खा सके। सियार दुहाई देता है कि बड़े निर्दयी हो, जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते। फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम-से-कम संध्या तक रूककर जी भरके देख लो। इस तरह गिद्ध वैराग्य की तो सियार आशा और मोह की, बारी-बारी से शास्त्र और दर्शन (का आधार ले, अपने मतलब की) की बातें समझाते हैं। गिद्ध और गीदड़ के ‘अमृतरूपी वचनों‘ से प्रभावित हो वे मृतक के संबंधी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे। ... ... ...

महाभारत, अनुशासन पर्व के आरंभ में गौतमी ब्राह्मणी के पुत्र की सर्पदंश से हुई मृत्यु की कथा भी उल्लेखनीय है। जिसमें मृत्यु का कारण बने सर्प को व्याध मार डालना चाहता है, जबकि मृतक की माता गौतमी इसके पक्ष में नहीं है। सांप कहता है कि मैं मृत्यु के अधीन हूं, मृत्यु सांप से कहता है मैंने काल की प्रेरणा से तुझे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। तब काल आ कर कहता है, प्राणियों की मृत्यु में मैं, मृत्यु तथा यह सर्प कोई अपराधी नहीं है। बालक की मृत्यु उसके कर्म से हुई है, उसके विनाश में उसका कर्म ही कारण है। संभव है भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी‘ नाटक ऐसी ही किसी कथा से प्रभावित हो।

श्रीमद्भागवत, चौथे स्कंध के आठवें अध्याय के आरंभ में मृत्यु के जन्म का प्रसंग है- ‘मृषाधर्मस्य भार्यासीद्दंभं मायां च शत्रुहन् ...‘ अधर्म भी ब्रह्मा पुत्र था, उसकी पत्नी मृषा (झूठ), पुत्र ‘दंभ‘ और पुत्री ‘माया‘ हुई। दंभ और माया से लोभ और निकृति (शठता), का जन्म हुआ। उनसे क्रोध और हिंसा का, फ़िर उनसे कलह तथा दुरुक्ति (गाली) का जन्म हुआ, उन्होंने मृत्यु और भय को उत्पन्न किया तथा उनसे यातना और निरय (नर्क) का जन्म हुआ। ऐसी ही कथा अग्निपुराण के अध्याय 20, सृष्टि प्रकरण में है- ‘अधर्म की पत्नी हिंसा हुई; उन दोनों से अनृत नामक पुत्र और निकृति कन्या की उत्पत्ति हुई। इन दोनों से भय तथा नरक का जन्म हुआ। क्रमशः माया और वेदना इनकी पत्नियाँ हुई। इनमें से माया ने भय के सम्पर्क से समस्त प्राणियों के प्राण लेने वाले मृत्यु को जन्म दिया और वेदना ने नरक के संयोग से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। इसके पश्चात् मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध की उत्पत्ति हुई।

वैदिक साहित्य में यम, विवस्वान-सूर्य और सरण्यू-संज्ञा के पुत्र, प्रथम मर्त्य, समस्त प्राणियों का ‘नि-य-म-न‘ (यम-नियम, सामाजिक और व्यक्तिगत आचरण) करने वाले देवता हैं। यम के द्वारा स्वयं भी मृत्यु स्वीकार करने का उल्लेख वैदिक साहित्य में है। शाब्दिक दृष्टि से यम, यमज यानी जुड़वा से जुड़ा है। यम-यमी जुड़वा भाई-बहन हैं, इनका संवाद चर्चित है। यमी, अपने जुड़वा यम से संसर्ग प्रस्ताव करती है, इसमें रूपक दिखता है कि यम, मृत्यु है तो उसकी जुड़वा यमी, जीवन होगी। यमी-जीवन, यम-मृत्यु से संसर्ग-वरण प्रस्ताव रख रही है, मगर यम उससे असहमत है। इसी तरह कठोपनिषद के संवादी यम का नचिकेता जीवन-मृत्यु संवाद, बहुश्रुत है।

लगता है कि पुनर्जन्म के विचार में मूलतः, जीवन को मृत्यु से और मृत्यु को जीवन से जोड़ कर देखना है। 

जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह, बधाई-शुभकामना हो न हो, मन में गांठ न बांध लें। दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ ...

4 comments:

  1. महत्वपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में अपने 13 घटनाओं की चर्चा की है जिस से आयु को ट्रेस किया जाता है .मैं बिहार से हूँ.
    मेरे पिताजी की पीढ़ी में भूकंप एक बड़ी घटना थी, 1934 की.
    उसके आगे पीछे तीन-चार वर्ष तक ट्रेस किया जाता था.
    बताया जाता है कि भूकंप के समय वे पांच साल के थे.

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