Sunday, March 22, 2026

मौज बरास्ते भाषा

# का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिए सांच -तुलसीदास
# संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर -कबीर
# देसिल बयना सब जन मिट्ठा -विद्यापतिे
# निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल -भारतेन्दु

इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी बातें अपनी, देसी भाखा के पक्षधरों की हैं, मगर क्या संस्कृत के विरोध में हैं? कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘भाषा बहता नीर‘ में मानों इस सवाल का जवाब देते, स्पष्ट करते हैं- ‘संस्कृत भाषा कूप जल‘ का संबंध भाषा, साहित्य से है ही नहीं। यह वाक्यांश पुरोहित तंत्र के खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्कृत भाषा।‘ यही बात तुलसी के कथन पर भी लागू है, वही तुलसी मानस के सातो कांडों का आरंभ संस्कृत मंगलाचरण से होता है औैर सातवें-अंतिम उत्तरकांड का समापन ‘भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‘ जैसी बात सहित दो संस्कृत श्लोकों से होता है। मगर वहीं ‘मांग के खाइबो, मसीत में साइबो‘ कहते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी उपरोक्त बात संस्कृत का आड़ ले कर भ्रमित करने वालों के खिलाफ कही गई है न कि संस्कृत के लिए।

निरुक्त और पाणिनी के हवाले से बताया जाता है कि ‘भाषा‘ शब्द, वैदिक भाषा के विपरीत प्रचलित लोकभाषा का द्योतक है। अथर्ववेद के प्रसिद्ध पृथिवी सूक्त का अंश, जहां भाषा की विविधता में भेद-भाव नहीं है- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। यानी ‘विविध भाषाएँ बोलने वाले और विविध धर्मों (संस्कृति, आचार-विचार) को मानने वाले लोगों को, एक घर (परिवार) की तरह, जो पृथ्वी धारण करती है (पोषण करती है), वह स्थिर और सहनशील गाय की तरह, हमें धन की हज़ारों धाराएँ (समृद्धि) प्रदान करे।‘

परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी में परा तो परे ही है, पश्यन्ती, वह जिसे ‘देखा‘ गया, ज्यों वैदिक ऋचाएं (श्रुति), अपरिवर्तनीय- सत्य, अहिंसा, तप, त्याग, दया, संतोष आदि जैसे मानवीय मूल्य, ‘सच बोलो, सच तोलो‘ जैसी, ज्यों गांधी के ‘हिंद स्वराज‘ में निहित भाव। इसके बाद मध्यमा, जहां विचार शब्दों में ढलने लगें (स्मृति), देश-काल-पात्र के साथ बदलने वाली, कब, कहां, कैसे के विचार वाली, ज्यों गांधी की आत्मकथा और फिर वैखरी, मुख से बोली और कान से सुनी जा सकने वाली सार्थक ध्वनि-शब्द (न्याय), ज्यों, गांधी के पत्र-भाषण आदि, जिसके लिए वे कहते कि उनमें विसंगति हो तो बाद में कही गई बात को मानें।

राजशेखर की काव्यमीमांसा का उद्धरण- ‘पुत्रात्पराजयो द्वितीयं पुत्रजन्म‘ सरस्वती अपने पुत्र काव्य पुरुष को गोद में लेकर कहती हैं- यद्यपि मैं संपूर्ण वांग्मय की जननी हूं, फिर भी तुमने संस्कृत में छन्दोमयी वाणी के प्रयोग द्वारा मुझे परास्त कर दिया है ... अपने पुत्र से परास्त होना द्यितीय पुत्र की उपलब्धि के समान आनंदकारक होता है। यहीं आगे आया है- ‘शब्दार्थौ ते शरीरं, संस्कृतं मुखं, प्राकृतं बाहू ...‘ शब्द और अर्थ तेरे शरीर है। संस्कृत-भाषा मुख है। प्राकृत भाषाएँ तेरी भुजाएँ है। अपभ्रंश भाषा जंघा है। पिशाच-भाषा चरण है और मिश्र-भाषाएँ वक्ष स्थल है। ... रस तेरी आत्मा है। छन्द तेरे रोम है। प्रश्नोत्तर, पहेली, समस्या आदि तेरे वाग्विनोद हैं और अनुप्रास, उपमा आदि तुझे अलंकृत करते हैं।

रहीम ने ‘खेटकौतुकम्‘ का पहला श्लोक संस्कृत में रचा है, इसके बाद के पदों के लिए, दूसरे पद में कहते हैं है- ‘फारसीयपदमिश्रतग्रन्थाः खलु पण्डितैः कृताः पूर्वैः। सम्प्राप्य तत्पदपथं करवाणि खेटकौतुकं पद्यैः।।‘ यानी पूर्वाचार्यों ने फारसी शब्दों से मिला हुआ संस्कृत पद्मों में विविध प्रकार के ग्रन्थों का निर्माण किया है। मैं (खानखाना नब्बाब) भी उन्हीं के चरणपथ का अवलम्बन करके उसी तरह फारसी से मिले हुए संस्कृत श्लोकों में ‘खेटकौतुक‘ नामक ग्रन्थ की रचना करता हूँ। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे मणिप्रवाल शैली (मोती और मूंगा) कहा जाता है। रहीम के ऐसे भाषा-कौतुक का एक उदाहरण है- ‘एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में, काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी। तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा, तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- 'सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। ... सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है।' और सुमित्रानन्दन पन्त बताते हैं- 'भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय-स्वरूप है। यह विश्व के हृत्तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है। विश्व की सभ्यता के विकास तथा ह्रास के साथ वाणी का भी युगपद् विकास तथा ह्रास होता है। भिन्न-भिन्न भाषाओं की विशेषताएँ, भिन्न भिन्न जातियों तथा देशों की सभ्यता की विशेषताएँ है। संस्कृत की देव-वीणा में जो आध्यात्मिका-संगीत की परिपूर्णता है यह संसार की अन्य शब्द-तन्त्रियों में नही, और पाश्चात्य साहित्य के विशदयन्त्रालय में जो विज्ञान के कल-पुर्जों की विचित्रता, बारीकी तथा सजधज है, वह हमारे भारती-भवन में नहीं।'

भाषा-बहुलता के संदर्भ में हिंदी के कुछ साहित्यकार, जिनकी बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं पर रही है- भारतेन्दु, गुलेरी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, बच्चन, अज्ञेय, कृष्ण बलदेव वैद, कुबेरनाथ राय जैसे अनेक नाम हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शायद ही ऐसा कोई हो, जो दूसरी किसी एक या एकाधिक भाषा में निष्णात न हो। इस दौर के वागीश शुक्ल, गणित के प्राध्यापक रहे और जिनका संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी पर अधिकार है। इस सिलसिले में रेणु, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय या वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे देशज लोकभाषाओं पर बल देने वाले भी हैं। हमारे एक गुरु हार्वर्डवासी, बनारसी-भोजपुरी प्रेमी भारतेन्दु खानदान के डॉ. प्रमोदचंद्र कहते थे कि अभिव्यक्ति में स्वाभाविक लोच और रस अधिक आ जाता है, अगर पहली जबान देशज हो। यों भी बोली-भाषा का लोक-शास्त्र, बृहत्साम-रथन्तर, विष्णु वाहन गरुड़ के दो डैने हैं।

बस्तर के अभिलेखों की चर्चा। रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी है कि ‘इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं।‘ उनकी यह टिप्पणी विशेष संदर्भ में है, इसके अलावा बस्तर के अभिलेखों में उड़िया है और ‘भाषा‘ भी। दंतेवाड़ा शिलालेख अगल-बगल दो पत्थरों पर है, जिसमें कहा गया है- ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए।‘ यहां संस्कृत ‘देववाणी‘ है औैर पूर्वी किस्म की हिंदी ‘भाषा‘। यही भाषा ‘भाखा‘ है। इन्हीं दिक्पालदेव के पुत्र राजपालदेव का ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि उभय पक्ष समझौते की शर्तें पढ़-समझ सके। इन अभिलेखों का काल अठारहवीं सदी है।

अब थोड़ी मौज - सठियाए सालों पुरानी हमारी पढ़ाई शुरू होती थी ककहरा और गिनती से। गिनती की किताब में पहाड़ा भी आ जाता और फिर यह कहलाता भाषा और गणित। भाषा में इमला होता यानी शुद्ध लेखन, और पाठ-वाचन। गणित में जोड़-घटाव गुणा-भाग के साथ मनगणित और यांत्रिक गणित भी होता, जिसके लिए सूत्र रटाया जाता, ‘सहि अरु का को तोड़कर, भाग-गुणा कर मीत, ता पीछे धन-ऋण करै, यही भिन्न की रीत‘। तीसरी कक्षा में जिले का भूगोल होता, चौथी में प्रदेश का और पांचवीं में देश का। भूगोल, सामाजिकध्यान यानी सामाजिक अध्ययन का एक हिस्सा होता, इतिहास और राजनीति के साथ। मुझे याद नहीं आता कि प्राथमिक कक्षाओं में अर्थशास्त्र होता था या नहीं और होता था तो किस रूप में। आगे चल कर ‘नेकोसेकोसेकापरहे, बैनीआहपीनाला और यमाताराजभानसलगा, जैसे सूत्र सबको याद होते। सोचता रहा हूं, तुलसी भी किसी ऐसे ही दौर से गुजरे होंगे कि कहा- ‘अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार‘। अंक- तथ्य, वस्तुगत और आखर- विषयगत!

हमारे एक परिचित कभी बंबई गए, पकी उम्र में पहली बार। बंबई पहुंचकर उनकी एक ही धुन थी, थाणे का पुलिस स्टेशन देखना है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में ‘इ है बंबई नगरिया ...‘ गीत, कहीं ऐसी कोई बात नहीं, फिर यह कैसी धुन। बात पता लगी कि उन्होंने सुन रखा था कि मराठी में पुलिस थाना को पोलिस ठाणे कहा जाता है, वे देखना चाहते थे कि यह ठाणे के पुलिस थाने में किस तरह लिखा हुआ होगा और मन ही मन ‘ठाणे पुलिस ठाणे‘ सोच कर, मुख-सुख उचार कर आनंद लिया करते रहे। इसी तरह रायपुर से लगे बरौदा गांव, के बैंक आफ बड़ौदा की शाखा को अंग्रेजी में क्या लिखते हैं- Bank of Baroda, Branch- Baroda!

संयोग कि मुझे सिखाने-पढ़ाने वाले ऐसे गुरूजी मिले, जो छकाते भी थे। जिस पर कभी ध्यान नहीं गया था, ऐसी बात किसी ने कही कि जिस शब्द की परिभाषा हो, उसमें वह शब्द या उसका समानार्थी शब्द नहीं आना चाहिए, मैंने अपने गुरूजी से ‘शेयर‘ किया, इस पर उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बात परिभाषा के परिभाषा जैसी मानी जा सकती है और नहीं तो परिभाषा की परिभाषा क्या होगी? फिर यह भी कि समानार्थी शब्द तो शब्दकोश में होते हैं, जिनमें शब्दों के अर्थ दिए होते हैं, फिर उसे अर्थकोश क्यों नहीं कहते!, सो ज्ञानमण्डल, बनारस का ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ खोल लिया। सबसे पहले ध्यान गया, वाह बनारसी ... न शब्द न अर्थ, बस कोश। मगर ऐसा सिर्फ यहां नहीं, वामन शिवराम आप्टे का ‘संस्कृत-हिन्दी कोश‘ है और फादर कामिल बुल्के का नाम 'अँगरेजी हिन्दी कोश‘ मिला, हम ही हैं जो शब्दकोश अर्थककोश के चक्कर में पड़े हैं। बहरहाल, ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में भाषा शब्द पर पहुंचा तो पाया- ‘भावप्रकाशका साधन; किसी विशेष देश या जन-समाजमें प्रचलित शब्दावली और उसे बरतनेका ढंग, बोली; प्रादेशिक भाषा या बोली; हिंदी व्यक्ति विशेषके लिखने-बोलनेका ढंग; परिभाषा; शैली; सरस्वती; अर्जीदावा; एक रागिनी।‘ अब लगता है कि गुरुओं ने रट-घोंट लेने के साथ-साथ जुगाली करते रहने पर जोर दिया, तो जैसी गुरु-दीक्षा, शिरोधार्य।

Sunday, March 15, 2026

उजले ‘श्याम‘

संयोजक श्री शशिकांत चतुर्वेदी, श्री सूर्यकान्त चतुर्वेदी और संपादक श्री रूद्र अवस्थी के
‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन सहित प्रस्तुत-


उजले ‘श्याम‘

स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।

कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते। 

सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते। 

कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे। 

अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी। 
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 

फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं? 

आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है। 

एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो। 

आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं। 

वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ। 
 ... 
 लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।' 

मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा। 

2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है। 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी। 

कुटेमहा घटा सो 
(असामयिक बादल के प्रति.) 
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘ 

बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ। 
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै। 
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।। 
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं। 
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।। 

बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी। 
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।। 
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के। 
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।। 
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा। 
बादर झनि आ झनि आ।। 

तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी। 
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।। 
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही। 
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही। 
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ। 
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा। 
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।। 
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा) 
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे। 
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे) 
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।। 
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।) 
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।। 
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।) 
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
 
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना। 
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।। 
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।) 
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन। 
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन) 
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।। 
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।) 
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।। 
बादर झनि आ झनि आ। 

नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)। 
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)। 
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो। 
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।। 
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।) 
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ। 
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।) 
बादर झनि आ झनि आ। 

चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही। 
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।। 
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये। 
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।। 
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)। 
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।

इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।

- राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना, 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Wednesday, March 11, 2026

आहोपुरुषिका

आहोपुरुषिका- वह पात्र, अपने पुरुष होने का भान हो, जिसके होने से।

‘आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए।
जाने अब क्या-क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना।।‘ और फिर
‘तुम निहारती रहीं मुझमें अपने को ... ... और फिर सामने से हट गयीँ शायद तुम्हारा सिँगार पूरा हो गया।।‘
सरसरी तौर पर विधुर-वियोग के विषाद का संगीत जान पड़ने वाली वागीश शुक्ल की किताब ‘आहोपुरुषिका‘, देख रहा हूं। नागरी लिपि में छपी, हिंदी! की किताब। कविताएं, व्याख्या सहित फिर भी दुरूह, संदर्भमय व्याख्या भी कविता की तरह और कभी कविता व्याख्या जैसी।

मेरे लिए किताबें अक्सर दुश्मन की तरह होती हैं, अकर्मण्य बनाने वाली, समय और व्यय साध्य। मगर ऐसे दुश्मन से भिड़ने का उत्साह अब तक बना हुआ है। शुरु करता हूं, उसे खारिज करने के इरादे से। किताब लुभाती नहीं, बल्कि जूझने के लिए उकसाती है और पढ़ ली जा सकी तो धीरे-धीरे असर करने लगती है। अंततः, यह मेरे लिए, मेरी दुश्मन-किताबों के खिलाफ खड़ी किताब है, क्योंकि इसमें लेखन और किताबीकरण का फर्क बताया गया है- ‘वाचिकता का टंकण नहीँ, उसका जडीभवन‘(131)। अब्राहमीय मजहब को किताबी मजहब कहा गया है(132)। हमारे यहाँ श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक् ग्रन्थ नहीँ है, चेतन है - ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)। रामायण और महाभारत में वाल्मीकि और व्यास स्वयं पात्र हैं, क्योंकि भारतीय काव्य-वास्तु में कविता कवि मेँ आयत्त है किन्तु कवि भी कविता मेँ आयत्त है(218)। ... ये गहने-कपड़े, ये आवाज़ेँ, उस वाणी का लिपीकरण हैँ ... असूझ-अबूझ वाक् के सूझ-बूझ में बदलने का यही राज रहस्य है(220-221)। वाणी लिपितनु, अर्थात् लिपि वाणी का शरीर है(222) 

/यहां और आगे भी ( )- ऐसे कोष्ठक के अंदर आई संख्या पुस्तक के पेज का क्रमांक है/ 

किताब में प्रवेश आसान नहीं है, ऐसा क्यों? देखिए- पत्नी इन्दुमती के साथ सत्ता-त्यत्ता, जन्म-मृत्यु?, शरीर का अस्तित्व में आना और शरीर त्याग? मानों किताब पढ़ते चौकन्ना बने रहने का सुझाव है। पुस्तक शुरू ही होती है ‘बक रहा हूँ जुनूँ में क्या कुछ के साथ, मानों पाठक को मन कड़ा रखने को तैयार किया जा रहा है। लेखक के शब्दों में ‘जिसे एक झंझा-लेख कहा जा सकता है। और फिर आगे- ‘कुछ न समझे, खुदा करे, कोई‘ मगर इसके भी पहले है- ‘समागम मेँ (में नहीं) प्रेक्षण‘ का एक शीर्षक है- ‘तेरे बेडरूम में देवता का क्या काम है?‘ तक पहुंचती है, तो लगता है यहां बतर्ज ‘मेरे अंगने में ... के आगे की कोई बात है। 

प्रवेश के लिए किताब-परिचय के दो उद्धरण- अशोक वाजपेयी ने ‘प्रियाहीन पुरुष‘ शीर्षक भूमिका का आरंभ पुस्तक के एक अंश-कविता ‘प्रियाहीन डरपते-बिलखते-फफकते-कलपते-बिलपते-तड़पते...(58-59) से किया है, बताते हैं कि किताब का ‘आरंभिक अंश वागीश जी द्वारा लिखी गई कविताओं उनकी संदर्भ-व्याख्या का है। ... ... दूसरा बड़ा हिस्सा विवाह-सूक्तों के अनुवाद, उनकी पृष्ठभूमि का विवेचन आदि है।‘ उन्होंने इसे अनोखी और अद्वितीय पुस्तक कहा है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती और इसके लिए कम से कम इतना तो हर कोई भी कहेगा। यों किताब में सनातन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है कि अनूठा तो वही हुआ, जो निष्प्रतियोगी है, (जो अवधारणा ही हो सकती है।) ‘कोई दूसरा ‘धर्म‘ नहीं है जिसे दिखा कर आप समझ सकें कि सनातन धर्म इस धर्म से भिन्न है।(140- 141) पहला खंड उनकी 44 कविताएं, व्याख्या सहित हैं। दूसरा खंड विवाह-सूक्त है, जिसके पांच बिंदुओं में 4 ऋग्वेद दशम मण्डल, सूक्त 85 और 5 अथर्व-वेद, काण्ड 14 का प्रथम और द्वितीय अनुवाक है। 

मृदुला गर्ग ने फ्लैप पर लिखा है- ‘आहोपुरुषिका की विषाद की झंझा उसका एक तिहाई हिस्सा है। बाकी दो तिहाई में, विवाह सूक्त का शास्त्र सम्मत और अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विवेचन है।‘ इस परिचय का अंतिम वाक्य है- ‘शायद इसीलिए परम स्थिति वह है जब पति पत्नी में अभेद हो।‘ यह पुस्तक के मर्म का संकेत है।

किताब की बेतरतीब सी लगने वाली बातों में तारतम्य-सूत्र आसानी से नहीं पकड़ सका, मगर किताब उलटते-पलटते सूत्र बना- कन्या‘दान‘(141-44), जिस दान के आशय को कभी ‘दान-व‘ से समझने का प्रयास किया था। ऋग्वेद दशम मंडल के एक ऋषि भिक्षु हैं, धन-अन्न दान को भिक्षा के साथ जोड़ते यह भी कहते हैं- ‘एक उदार मन वाला पुरुष, धन कम होने पर भी अधिक दान दे सकता है, क्योंकि दान का संबंध हृदय की विशालता से है‘, जिसका उपबृंहण भर्तृहरि नीतिशतक में ‘दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य‘ है। इसी तरह अन्यत्र यद्यपि शास्त्रों में दान की विस्तृत चर्चा है, मगर पी.वी काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास‘ में कन्यादान का उल्लेख नहीं है। वहां ‘प्रतिग्रह‘ शब्द के विशिष्ट अर्थ की चर्चा है, साथ ही ‘याग‘ और ‘होम‘ को दान से अलग बताते हुए कहा गया है कि- ‘स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनं...‘, ‘दान में किसी दूसरे को अपनी वस्तु का स्वामी बना दिया जाता है।‘ यहां डोंगरे महाराज की रामकथा का कन्यादान प्रसंग स्मरणीय है- पाणिग्रहण पर राम को ‘प्रतिगृह्णामि‘ कहने को कहा जाता है, राम वैसा ही कहते हैं किंतु लक्ष्मण को ‘प्रतिगृह्णामि‘ बोलने को कहा जाता है तो उन्हें मौज सूझती है, वे सोचते हैं कि मंगलाष्टक हो गया है, कन्या का हाथ मेरे हाथ में आ गया है, क्यों न थोड़ा हठ करूं, और कहते हैं कि प्रतिगृह्णामि तो ब्राह्मण बोलते हैं, जो दान लिया करते हैं, हम क्षत्रिय दान लेते नहीं, दान दिया करते हैं ‘प्रतिगृह्यताम‘ बोला करते हैं। उन्हें समझाया जाता है कि तुम्हारे बड़े भाई ने भी तो प्रतिगृह्णामि कहा है। इस पर लक्ष्मण कहते हैं कि वे तो भोले हैं, उन्हें जैसा कहा गया उन्होंने किया। बात अड़ गई वशिष्ठ के मनाने पर भी लक्ष्मण राजी नहीं हुए। तब विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि चाहे मंगलाष्टक हो गया हो, प्रतिगृह्णामि नहीं बोलोगे तब तक लग्न पक्की नहीं मानी जाएगी, तब कहीं जा कर लक्ष्मण मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता 4/24 ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः में या ज्यों 17/22 की स्वामी अपूर्वानन्द टीका में व्याख्या में कहते हैं- ‘दान के पात्र ब्रह्म हैं और दाता भी ब्रह्मस्वरूप या भगवान का अंश है।‘ गीता 17/20 में दान को ‘अनुपकारिणे‘ यानि बदले में कुछ पाने की अपेक्षारहित, बताया गया है। जैसा कि कविता-33 की व्याख्या में कन्यादान के लिए आया है- ‘देनेवाला और लेनेवाला दोनोँ ही नर नहीँ हैँ ... इस नाते देनेवाले का दाता होने का दर्प और लेनेवाले का प्रतिग्रहदोष, दोनोँ ही नहीँ रहते। तब कविता-38 का अर्थ खुलने में मदद होती है- ... ‘खाली मेँ खाली भर दो तो/खाली ही होता है भरपूर/जैसे/पूर्ण में से पूर्ण निकालो तो पूर्ण ही रहता है बाक़ी।।


प्यासे राहगीर को पानी पिलाने के लिए गर्मियों में प्याऊ बनाए जाते हैं। छोटा सा घेरा, जिसमें पानी के घड़ों के साथ व्यक्ति होता है, छोटी सी खिड़की से पनाली निकली होती है, इससे पानी पीने वाला, पिलाने वाले को और पिलाने वाला, पीने वाले को नहीं देख-पहचान पाता। माना जाता है, तभी पानी पिलाना ‘दान‘ का पुण्य-लाभ होगा, आदि। नाम-रूप का लोप। 

एक और सूत्र मिला, जहां ईशावास्योपनिषद् का नवें मंत्र का उल्लेख है- ‘जो अविद्या की उपासना करते हैँ वे अँधेरे मे पड़ते हैँ, जो विद्या की उपासना करते हैँ, वे और भी गहरे अँधेरे मे पड़ते हैँ‘(87)। परा-अपरा में झूलते हुए कभी ऐसा ही मंत्र-दर्शन मुझे हुआ था, तब (6 जुलाई 2021 को) मैंने लिख कर सार्वजनिक किया था कि ‘मेरा अज्ञान असीम है, आपका सारा ‘ज्ञान‘ इसमें समाहित हो सकता है। खुली आंखों देखी और कानों सुनी जानकारी, आंख मूंदकर गुनी जाकर सार्थक होती है। कान केी पलकें नहीं हैं, परदे हैं, ये परदे छुपाने के नहीं, उघारने के हैं।‘

और किताब में आया ‘बृगल‘ एकाकी से दूसरा और फिर बहुल। (एक अन्य सूत्र यह कि कुछ समय पहले मेरी भी अर्द्धांगिनी का लोप हुआ।)

कविताई मुझसे होती नहीं, मगर मार्च 2022 में मैंने अर्द्धबृगल शीर्षक से चार कविताएं लिखी थीं- 

अर्द्धबृगल*: चार कविताएं
(एकाकी रमता नहीं, प्रजापति भी रमा नहीं, दूसरे की इच्छा की- बृहदारण्यकोपनिषद) 

तुम 

तुम 
भूला सा पाठ 
और खोई पुस्तक, 
वह जिसे बार-बार दुहराने का मन करे। 
तब परीक्षा पास कर, 
जाने कहां रख गई किताब,
स्मृति में फड़फड़ा रहे पन्ने अब।

000

तुम-मैं

तुम मेरे लिए अपवाद की तरह जरूरी। 
अपवाद, नई संभावना। 
आपका, आप से अब तुम हो जाना,
तुम का मैं हो लेना। 
तुम की जगह मैं,
मेरे के बदले तुम्हारे,
अपवाद या सिद्धांत, 
जरूरी या गैरजरूरी।
दो नायिका, एक नायक अथवा
एक नायिका दो नायक के त्रिकोण 
और कोणों पर बारी-बारी खड़े हो 
समग्र समेट लेने की आतुर व्यथा। 

000

तेरा होना 

तेरा होना
तेरे ‘न होने‘ में
न ही तेरे ‘होने‘ में
तेरा होना, तेरे हो जाने में। 
तेरा होना तेरे आने में,
तेरे आने से पहले।
तेरा होना तेरे जाने में,
तेरे जाने के बाद भी।
भूत और भविष्य के रिक्त में
वर्तमान के आभास में।
तेरा होना, हर हाल में होना है।
हो जाने या न जाने
तू माने या न माने
तेरा आना, तेरा जाना 
हमने माना,
तेरा होना।

000

तेरा साथ

साथ चलना है तो- 
मैं तुम्हारी बात मान लूं, 
या तुम्हें समझा कर सहमति बना सकूं, 
यदि नहीं तो-
तुम मेरी बात मान लो,
या मुझे अपनी बात समझाओ।
हम यह भी तय कर सकते हैं कि
जो तुम में है, मुझ में नहीं
और मुझ में है, वो तुम में नहीं। 
फिर चलो, एक दूसरे के पूरक बनते,
साथ चलना यूं ही सही।

*अर्द्धबृगल-द्विदल अन्न का एक दल। 

और इसके साथ एक ‘चतुष्पदी‘

एक साधे सब,
सधता है तब, 
वह एक जब, 
निराकार, शून्य।

000

पहले खंड की अपनी 44 कविताओं में से कविता-9 के साथ कृष्णार्जुन-संवाद को ‘शब्दच्छल‘, आँखेाँ मेँ कजरारेपन और सफ़ेदी के बीच चलने वाला संवाद‘ समझाते हैं(18)। कविता-16 में भोर का तारा, शाम का तारा को शुक्र या वीनस, स्त्री या पुरुष से आगे बढ़ कर बृहस्पति तक पहुंचते हैं और संस्कृत, अंग्रेजी या बोलियों में सहज कह दिये जाने वाले चूतड़ और पाद जैसे भदेस माने जाने वाले शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं(30)। कविता-23 की उपमाएं, क्या कहने, जिनमें से एक- ‘कितना कालापन है तुममेँ/यह तब पता चलता है/जब तुम्हारे गाल का तिल/दृष्टि की आँखो में सुरमा आँजता है(48)। कविता-33 में पान खाने के लिए पत्नी से मिले नोट पर लिखे ‘दस रुपये‘ की भाषाओं (न कि लिपि!) को सामर्थ्य से बाहर (अबूझ?) बताना(71-72)। 

इस तरह सूत्र पकड़ कर मैं पहुंचा कि यह किताब- आत्मा में परमात्मा है तो को-अहं, प्रश्न में अपने को खोजने का प्रयत्न प्रकारांतर से और अंततः परमात्मा की खोज है। इसका संकेत जगह-जगह पर आता है, ज्यों प्राथमिकी में- सनातन धर्म को दो ही तरीक़ोँ से पहचानने की कोशिश की जा सकती है- एक, अ-पौरुषेय वेद से और दो, पौरुषेय लोकव्यवहार से।

भामती प्रसंग (186-187), भामती-पति (वाचस्पति मिश्र) ने जीव की भ्रान्ति को जगत् का कारण बताया। मजेदार कि वाचस्पति मिश्र, ब्रह्मसूत्र के भाष्य की टीका ‘भामती‘ तैयार करते यों एकाग्र-मशगूल रहे कि दाम्पत्य के पचास वर्ष बाद पत्नी भामति से पूछ लिया कि देवी आप कौन हैं? 

पुलोमा प्रसंग(148), महर्षि भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा है। भृगुपत्नी पुलोमा को देख कर पुलोमा (इन्द्र के श्वसुर) नामक दैत्य काम पीड़ित हुआ ...। महाभारत में एक सदृश नाम वाला ‘चित्रांगद‘ प्रसंग है, जिसमें कुरुवंशीय शांतनु (भांडारकर संहिता में स्वीकृत पाठ ‘शंतनु‘) के पुत्र चित्रांगद को गन्धर्व चित्रांगद युद्ध कर, यह कहते हुए कि मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता, उसे मार डालता है। किताब में कहा गया है कि एक ही तत्व, भोक्ता या भोग्य- नाटक के पात्र, एक प्रस्तुति में राजा तो दूसरी में मन्त्री की तरह चोला बदल हो सकता है।(185-186) 

किताब में रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 36 ‘सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।‘, जिसमें खास वैष्णवी परतदारी है, इन चार घाटों को स्पष्ट किया गया है- राम-कथा में याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद का घाट कर्म है। शिव-पार्वती संवाद का घाट ज्ञान है। काकभुशुण्डि गरुड संवाद का घाट भक्ति है। गोस्वामी जी सन्त-समाज को सम्बोधित करते हुए स्वयं कहते हैं तब इस सरोवर में उतरने का घाट प्रपत्ति है(105-106)। अब तक मन में घुली इस बात को शब्दों में पा कर दुहरा आनंद हुआ। 

अपने बेटे की बलि के लिए उद्यत हज़रत इब्राहीम प्रसंग(115) के साथ नचिकेता, शुनःशेप और मोरध्वज की कथा का स्मरण होता है। हजरत ईसा के ‘पड़ोसी‘ का तात्पर्य बताया गया है, ‘पड़ोसी वह है जो तुम्हारा हितैषी हो चाहे वह तुम्हारे मजहब को माने चाहे नहीँ‘(130)। महत्वपूर्ण तथ्यों की चर्चा है कि ‘अंजीर-पत्ता अभियान‘ के तहत वैटिकन संग्रहालय मेँ मौजूद मूर्तियाँ मेँ से बहुत सारी समय-समय पर अनेक अलग-अलग पोपोँ द्वारा खण्डित करवायी गयी हैँ। माइकेलएन्जिलो का ‘द लास्ट सपर‘ भी विरूपित अवस्था में ही प्राप्त है।‘ तथा ज्ञान-संपदा, परंपरा का उच्छेद ‘एकमात्र-ता‘ के हठ से प्रेरित रही हैँ... बाइबिल और र्कुआन का उपलब्ध स्वरूप उनके विविध पाठोँ को नष्ट करके ही प्राप्त किया गया है(136-37)। 

बताया गया है कि ‘सूत्र‘, वह जो अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान, विश्वतोमुख, अस्तोभ हो और अनवद्य (निर्दोष) हो(196-197)। किताब के ऐसे ही कुछ सूत्रों का उल्लेख करना उपयुक्त होगा, जिनमें-
0 पत्नी, ‘विराट‘ है... दाम्पत्य... अव्यक्त से व्यक्त... भाषान्तर के रूप मेँ प्रस्तुत हैँ, भावान्तर नहीँ हैँ(145)। 
0 सनातन ‘सनातन धर्म अवधारणा पर आश्रित है, आचरण पर नहीँ(139) 
0 ‘आधुनिक क्रम प्रेम को जनक और विवाह को उसका जन्य मानता है जबकि सनातन विवाह को जनक और प्रेम को उसका जन्य मानता है‘(146) ... ‘प्रत्येक प्रकार के विवाह में अनुराग ही फल है‘(147), सीधे कहें तो प्रेम के बाद उसकी परिणिति विवाह नहीं बल्कि विवाह से/उसके बाद विकसित प्रेम।
0 निर्विकार ब्रह्म सत्य है, चेतन अतः ज्ञान और अनश्वर होने से अनन्त है(161) 
0 सनातनी आस्था और वैदिक व्याख्या के साथ पांडित्य-लक्षण, यह भी कहते हैं- ‘हम ऐसे किसी सोना-मढ़े या कालिख-पुते अतीत की तलाश में निकल पड़ने के लिए बाध्य नहीं हैं‘(163)।
0 ‘पुरुषार्ध आकाश (खालीपन) स्त्र्यर्ध से विवाह के बाद पूर्ण होता है, इन दो अर्द्धबृगलों का पुनः-सम्पुटीकरण ही विवाह है।(166)
0 ‘मैँ‘ ‘यह‘ ‘वह‘ ‘तुम‘, ... यह अभिनय है, श्रुति अभिनय द्वारा बताती है। ‘श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक्‘ ग्रन्थ नहीँ, चेतन है-ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)
0 ‘सूचनाकारी ग्रन्थ‘ के अर्थ में सूत्र, ‘धागा‘ आदि न हो कर, जो ‘अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान्, विश्वतोमुख, अस्तोभ और अनवद्य हो(196)
0 ब्रह्मसूत्र के विविध व्याख्यान ही केवलाद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद जैसे सम्प्रदायों के मूलाधार हैं।(197) 

वस्तुतः गुणी, ज्ञानी पंडित वही, जो अपनी सीमा को जानता है और असीम का अनुमान कर पाता है। लेखक की पांडित्य विनम्रता, जहां वे कहते हैं- ना-समझी के कारण हुई किसी भी त्रुटि का उत्तरदायित्व मेरा है(175ं) यहां निष्कर्ष (फतवा) की अनिवार्यता नहीं है न ही बेताबी। सीमा-मर्यादा को बराबर महसूस किया जाता रहा है, कुछ उदाहरण- ‘सायण का भाष्य समझना कितना कठिन है‘(245), तात्पर्य स्पष्ट नहीं है, कुछ के अनुसार ... शायद यही अभिप्रेत हो(275), मैं यह नहीं बता सकता कि यह मुद्रण की भूल है या कुछ और(336), बल्बज मूंज है या कुश चमड़े के नीचे या ऊपर, चमड़ा मृगचर्म या गोचर्म (337), प्रतीत होता है और ऐसा लगता है(344) आदि।

दुनिया के सारे तथ्य समय के साथ अपनी पसंद के कथा-रूप में बदल जाते हैं और कथा-बीज। का क्षेपक-उपबृंहण। शाश्वत और सनातन की समयानुकूल व्याख्या की आवश्यता-पूर्ति के लिए कथा। शास्त्र के अनुशासन का बंधन न हो, उसका उपबृंहण हो, ऐसा रचना उससे ही संभव हो सकता है। जितना साहित्य है उतना शोध, ‘फिक्शन और नान फिक्शन‘ एक साथ। असल पंडित ही ऐसा अधिकारी हो सकता है, छूट ले सकता है, जिसे पाठक की परवाह या पसंदगी का दबाव न हो।

‘हिन्दुत्व‘ के संकरे इकहरेपन के लिए बुद्ध, जैन, चार्वाक, शंकराचार्य से लेकर गुरु नानक ... एक मुश्किल सवाल वेदपाठी आर्य-समाजी, दयानंद सरस्वती ने खड़ा किया, उनका वाराणसी शास्त्रार्थ ... गनीमत है कि वेद कोई पढ़ता नहीं, पढ़ता है तो शायद समझता नहीं और समझता है तो अपनी समझ पर खुद संदेह बनाए रखता है, शायद यही सच्चा सनातन हिन्दुत्व है, जिसकी परोक्ष वकालत की मद्धिम गूंज किताब में तानपूरे की तरह बजती रहती है।

सनातन चारों ओर से खुला रहे तभी तक वह सनातन रहेगा। लेकिन सनातन में पहले तो चारदीवारी बनाई गई, बीच में आने जाने के रास्ते खुले थे लेकिन फिर उसमें दरवाजे लगा दिए गए, एक तरफ खुलने वाले। जिसमें अंदर से बाहर तो जाया जा सकता है बाहर से अंदर नहीं।

महीनों बीत गया, इस किताब का साथ बना हुआ है, लगता है, बना रहेगा, समय-समय पर खुलती पंक्तियां, जो और जब थोड़ी भी खुली, दिन बीत जाता है, उसमें ऊभ-चुभ। इक्कीसवीं सदी में अपनी पढ़ी नई किताबों में किसी का नाम लेना हो तो मेरे लिए यह एक तो होगी ही। 

000 000 000

‘पकड़ती है गला कुछ याद+ए+नाकूस य० क्यों आवाज बैठी है अजाँ मैँ।।‘ इसमें मुझ जैसे पाठक के लिए + और ०, अजनबी जान पड़े। इसी तरह में को मेँ, और लेखक के नाम के साथ ‘शुक्ल‘ मगर अन्यथा ‘शुल्क‘ की तरह छापा जाना। फांट भी खास तरह का इस्तेमाल हुआ है, इससे कई बार प्रूफ की भूल की तरह जान पड़ने वाली छपाई, सामान्य पाठक के लिए तय करना मुश्किल है कि यह गलती से हो गया है या सही है, इरादतन है। किताब में इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है, जिसकी जरूरत ऐसे प्रयोग में अवश्य होनी चाहिए। कुछ शब्दों का शुद्ध-अशुद्ध स्पष्ट किया गया है, जैसे- नक़सान-नुक़सान(329)। प्रूफ-अशुद्धि या मेरी कम-समझी तय नहीं कर पाया, ऐसे कुछ उदाहरण- आभुषण(44)। आँखो(48)। बैसे(83)। बालकाण्ष(105)। ‘रंग‘मंच(188)/‘रङ्ग‘मण्डप(189)। बावुजूद(147)। नाजाइज(152)। मैत्रेयी/मैत्रेयि(155-156)। पदुमावत(90)। वसुल(127)। निशानदिही(138)। ता कि (179)। विना(43, 56, 71, 224, 242)। बेटों ‘बाली‘ तथा प्रवेश के ‘किए‘(325)। बहीॅं(349)। पं जी?(242)। चर्चा की ‘का‘ चुकी(248)। एक शब्द के भिन्न प्रयोग में मात्रा-वर्तनी का उदाहरण- औषध (89, 229), ओषधि(243, 324), औषधीय(244), ओषधियाँ(323, 328), ओषधियोँ(360)। या (53) पर हाशिये से बाहर छपे शब्द!। 

000 000 000

फिलहाल यह पोस्ट यहीं तक, यह सोचकर कि कथा अनंता न हो जाय। पुस्तक के कुछ अन्य बिंदु भी गहराई से सोचने और विस्तार से कहने की राह सुझाते हैं, जिन्हें नीचे नोट कर रखा है- 

23- यम ने मृत्यु का वरण किया, ताकि वे मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की नगरी का शासन संभाल सकें। / 34- ऋत, अनृत/51- सत्व, रज, तम, इन्दीवर, कुवलय नीलकमल / 65- भेद, विजातीय, सजातीय और स्वगत / 80- गान्धर्व विवाह सबसे उत्तम / 82- खाली में खाली भर दो तो /105- भौगोलिक उपबृंहण। /120- शस्त्र की सहायता के लिए शास्त्र का निर्माण भी आवश्यक माना गया। / 123- पर हुरपेट /130- मानवीय गुणों पर किसका एकाधिकार /130-131 प्रक्षेप/ 135- एक पूज्यता, यहूदी धर्म शासन /137- एकमात्र-ता बनाम एक-बहुपूज्यता अस्तित्ववादी चिंतन /138- जेनेसिस से पुनः बात जोड़ते हैं .../ 147 ऊहा /148-इंटरनेट पर महाभारत /152- धर्षण से धर्षिता को कोई कलंक नहीं लगता /153- विवाहपूर्व के अनुराग नवीन अनुरागलेख / 154- अंजनी कुमार सिनहा /154-55 अनन्यममता /159-160-रूपकाभास / 162 नामरूप त्यत, अमूर्त/ 163- सोना मढ़े कालिख पुते अतीत / 164- अलगाव बाड़े में ब्राह्माण्डिकी वह रममाण नहीं हुआ। /171- चार पत्नियां /190- तौर्यत्रिकी देवविद्या, नट, अभिनेता और नर्तक /192- उपादान और निमित्त /194- आगम निगम भाषा /197- भाषा और बोली का अंतर /202- सेमिनार, पीएचडी-शोधपत्र का साधन/213- षड्कर्म को पूर्त करने वाला विप्र/221- परिष्वंग/ 223- बृहदारण्यक अध्याय 5 का द, इनमें से कोई द नहीं है। 224- विविदिषा जानने की इच्छा /225 क्वान्टम कुछ न कुछ बाहर रहेगा। प्रमेय और सत्य /228- यज्ञ-कर्म-धर्म समानार्थी शब्द, ऋत-अनृत/ 236- इंद्र तभी पधारते हैं / 245- वर बराती/ 263- नग्निका, गौरी, रोहिणी आदि /290 पर 40. सोमः प्रथमो विविदे... /293- 45$46 /307 पर 35$36 जुआरी /324-स्त्री वशीकरण /327- विवाहोत्तर प्रेम / 339- पति, श्वसुर, सास के लिए/ 353- बृहस्पति/ 315 नान्दश्राद्ध

0 छत्तीसगढ़ी - 170- भुॅइफोर, औद्भिज्ज, स्वयंभू, खिन्नमन पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मौज ली है और कुटज के लिए पौरुष-व्यंजक नाम ‘धरतीधकेल‘ बनाया है।41- बहिंगा, सुरहार, कंवरिहा, 83- हुंडरा हुंडार, हुंर्रा
0 भारतेन्दु ‘बालबोधिनी‘ के मुखपृष्ठ पर कविता की पंक्तियां- जो हरि सोई राधिका, जो शिव सोई शक्ति। जो नारी सो पुरुष यामैं कछु न विभिक्ति।। और वीरप्रसविनी बुध वधू होइ हीनता खोय। नारी नर अरधंग की सांचेहिं स्वामिनी होय।
0 अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर, भाषा, शोध, अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर
0 महाउमग्ग जातक, समयानुकूल व्याख्या इसलिए कथा, इतिहास जानने के स्रोत, भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
0 मुझको कहां तू ढूंढे रे बंदे ...
0 भाषा के लिए शब्दकोश से कहीं अधिक जरूरी कठोर व्याकरण नियम, शब्द व्युत्पत्ति आवश्यक 
0 ‘यद्यपि वेदोँ के वाक्योँ का तात्पर्य ... अद्वैत मेँ ही है‘(195)
0 पर-आत्मा नहीं परम-आत्मा की तरह, आत्मा-परमात्मा से निराकार, जो आकार के विरुद्ध नहीं ब्रह्म- अंततः शून्य
0 ‘वीति‘ का अर्थ भक्ष्य भी है, घोड़ा भी। इसी तरह ‘बर्हि‘ कुश भी अग्नि भी। ‘गृणान‘, ‘स्तुति करने वाला‘ किंतु ‘जिसकी स्तुति की जा रही है‘ भी है।(42)
0 वैदिक साहित्य के अनुवाद की एक बहुत बड़ी कठिनाई दुर्निवार है-हमारे पास उस भाषा को समझने के साधन नहीँ बचे हैँ जिसमें वेद निबद्ध हैँ।(202) ... ‘हम वैदिक भाषा से दूर हो चुके हैँ और अब हम वेदोँ का तात्पर्य नहीं समझ सकते। आगे स्पष्ट किया गया है कि संस्कृत के उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित, तीन स्वर होते हैं, स्वरांकन न हो तो अर्थ बदल सकता है, इससे ‘आत्मातत्त्वमसि‘ को ‘आत्मा तत्त्वमसि‘ या ‘आत्मा अतत्त्वमसि‘ दोनों पढ़ सकते हैं। ... वेद का तात्पर्य क्या है इसका निर्णय वर्तमान समय मेँ केवल युक्तियोँ के आधार पर होता है।(204-205) वेद, श्रुति कहे गए हैं ... वेद हमेशा सुने ही जाते हैं(207)
0 भारतीय ज्ञान पद्धति आइकेएस के दौर में ऋग्वेद और अथर्ववेद ही हमारे परस हैं, जिनका जो भी तात्पर्य हो, ‘प्राचीन भारत‘ में तकनीकी का परिचय देना नहीं है।
209- वेद-वेदांग और शास्त्रीय ग्रंथों को इतिहास जानने के स्रोत माना जाता है, वह है भी, मगर वह वहीं तक सीमित रह जाता है, मान लिया जाता है कि उनकी इतनी ही उपयोगिता थी, इतना ही महत्व है...
208- कविता वेदार्थ का उपबृंहण। भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
210- एकमात्र-ता, बेलनी सपाटीकरण का विरोध
0 मेरा अनुरोध यहाँ केवल यह है कि इस अनुवाद को वेद-मन्त्रोँ का ‘अर्थ‘ न समझा जाय, ...‘ इसे अर्चना में चढ़ाया गया जवा पुष्प कहते हैं तो राम की शक्ति पूजा पर उनकी टीका 'छन्द छन्द पर कुङ्कुम' की याद आती है।(226)
0 घर जाओ अपने पति के/ जो अब तुम्हारा है/ स्वामिनी बनो अब तुम उसकी/ उस घर मेँ जो आवे/ तुम्हारे बस मेँ रहे/ हुक्म चलाओ उन सब पर/ जो उस घर से पलते हैँ(272-73)
0 ‘कुमारी‘ का एक अर्थ है ‘वह वधू जिसका पति उससे विवाह के पहले तक कुँवारा रहा है‘(325) वर-बराती (245-246)
0 भूमिका में अक्षर योजना, वेद अपौरुषेय
0साहित्याचार्य्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी की पुस्तक (1940) में ‘भाषाकी शिक्षा’ में चंद्र बिंदु का ही प्रयोग हुआ है।