Wednesday, March 4, 2026

कुबेरनाथ राय

कुबेरनाथ राय रचनावली के 13 खंडों का प्रकाशन, दिसंबर 2024 में वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया। इसके सम्पादक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय और मुहम्मद हारून रशीद ख़ान हैं। उपाध्याय जी के काम और उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा से परिचित हूं। हारून जी से दूरभाष पर परिचय है, उन्होंने कुबेरनाथ जी से संबंधित कुछ जानकारियां मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराई थीं। कुबेरनाथ जी से उनकी पारिवारिक निकटता की जानकारी भी उनसे मिलती रही है।

इस बीच जानकारी मिली कि 12 खंडों में एक अन्य ‘कुबेरनाथ राय रचनावली‘ का प्रकाशन पिछले दिनों प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से हुआ है। वेबसाइट की जानकारी के अनुसार प्रथम संस्करण 2023 में तथा संशोधित-परिवर्धित संस्करण 2026 का (लक्ष्मण जी के फेसबुक पर की सूचना के अनुसार लोकार्पण 20 फरवरी! को, साथ की तस्वीरों पर 22 फरवरी 2026 अंकित) है। इसके संपादक द्वय अवधेश प्रधान तथा लक्ष्मण केडिया हैं। लक्ष्मण जी से प्रत्यक्ष परिचय रहा है इसलिए इस रचनावली की तैयारियों की जानकारी मुझे रही है। उन्होंने भी कुछ पठन-सामग्री, जो यों अनुपलब्ध-अप्रकाशित थी, मेरी रुचि जान कर, मुझे भेजी थी। हारून जी और लक्ष्मण जी का उदार-अनुग्रह रहा है।

इन दोनों रचनावलियों के खंडों को मैंने अभी तक नहीं देखा है, इसलिए विस्तृत टिप्पणी नहीं कर सकता, मगर इन दोनों की खंड योजना की जानकारी मिली है, जिसमें वाणी के पहले 10 खंडों में उनकी 20 प्रकाशित पुस्तकें तथा खंड 12 में 21 वीं प्रकाशित पुस्तक आगम(न?) की नाव शामिल है। प्रतिश्रुति के पहले 7 खंड उनकी सभी प्रकाशित 21 पुस्तकें हैं। इन दोनों में लगभग संग्रहों के प्रकाशन कालक्रम को मुख्य आधार बनाया गया जान पड़ता है, जो मेरी दृष्टि से कतई उपयुक्त नहीं है। इस संबंध में मेरी टिप्पणी आगे है।

पिछले लगभग पंद्रह वर्षों में जिन प्रकाशकों/प्रकाशन संस्थाओं के जिम्मेदारों से मेरी मुलाकात होती थी, उनसे कुबेरनाथ राय समग्र छापने की चर्चा अवश्य करता था। इस क्रम में मेरे द्वारा योजना भी बनाई गई थी, जिसे मेरे द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को अवगत कराते, प्रेषित भी किया गया था। साथ ही कंथा-मणि की जानकारी कम मिल पाती थी, इसलिए ललित कुमार जी से आग्रह कर मेरे द्वारा स्वयं फीड कर ‘कविता कोश‘ के लिए प्रेषित किया गया, जो वहां उपलब्ध है।

इस दौरान अवधेश प्रधान जी से फोन पर बात कर खंड योजना पर अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराया, साथ ही अन्य बिंदुओं का संक्षिप्त उल्लेख कर, अपनी मंशा बताई कि यह मैं सार्वजनिक करना चाहता हूं, उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वागतेय कहा। इस तारतम्य में मेरे द्वारा बनाई गई योजना और टिप्पणी इस प्रकार रही है-

कुबेरनाथ राय की पुस्तकों की मेरी जानकारी के अनुसार सूची निम्नानुसार है, इसमें साहित्य अकादेमी द्वारा, भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला में उन पर प्रकाशित पुस्तक में दी गई सूची की मदद ली गई है। इस सूची के अनुसार उनकी कुल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 21 है। अपने संग्रह की इन 21 पुस्तकों की पृष्ठ संख्या का जोड़ कुल 3916 है। इस प्रकार समग्र प्रकाशन की योजना आठ या उससे अधिक खंडों की ही उपयुक्त होगी, क्योंकि इसमें पत्र, संपादकीय, परिचय, लेख सूची/अनुक्रमणिका तथा अन्य सामग्री शामिल होने पर पृष्ठ 4500 से कम न होंगे। नीचे सूची में पुस्तक का नाम-प्रकाशन वर्ष साहित्य अकादेमी के अनुसार है, आगे इन पुस्तकों के मेरे संग्रह में उपलब्ध संस्करण तथा उसके बाद पृष्ठ संख्या है।

क्र. पुस्तक-प्रकाशन वर्ष            मेरे संग्रह के संस्करण             पृष्ठ संख्या
 
01 प्रिया नीलकंठी-1969?             (1968, 1974) तृतीय-1978            172 
02 रस आखेटक-1971?               प्रथम-1970                                   292 
03 गंधमादन-1972                       (1972) द्वितीय-1974                     323 
04 निषाद बाँसुरी -1973?              प्रथम-1974                                  235 
05 विषाद योग-1974                    (0000) द्वितीय-1976                     250 
06 पर्ण मुकुट-1978                      प्रथम-1978                                  224 
07 महाकवि की तर्जनी-1979        प्रथम-1979                                   223 
08 पत्र मणिपुतुल के नाम-1980     (1980) द्वितीय-2004                     101 
09 मन पवन की नौका-1982         प्रथम-1982                                  170 
10 किरातनदी में चंद्रमधु-1983     प्रथम-1983                                   156 
11 दृष्टि अभिसार-1984                 प्रथम-1984                                  175 
12 त्रेता का वृहत्साम-1986            प्रथम-1986                                  206 
13 कामधेनु-1990                        प्रथम-1990                                   151 
14 मराल-1993                            प्रथम-1993                                   168 
15 उत्तरकुरु-1993                      प्रथम-1994?                                  132 
16 चिन्मय भारत-1996                (1996) द्वितीय-2006                       201 
17 वाणी का क्षीरसागर-1998        प्रथम-1998                                    116 
18 कंथामणि-1998                      प्रथम-1998                                    110 
19 अंधकार में अग्निशिखा-2001    प्रथम-1998                                   160 
20 रामायण महातीर्थम्-2002        तीसरा-2007                                  351
21 आगम की नाव-2005              प्रथम-2008                                    126
अन्य - 
#निवेदिता रजत जयंती अंक-1997 स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर
#साहित्य अकादेमी का प्रकाशन - कुबेरनाथ राय (2007) पुनर्मुद्रण 2014

खंड बनाते हुए प्रकाशन वर्ष को आधार बनाना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह स्वयं स्पष्ट है कि महाकवि की तर्जनी-1979, त्रेता का वृहत्साम-1986 और रामायण महातीर्थम्-2002 को एक ही खंड में रखना होगा। राय साहब ने स्वयं निषाद बांसुरी -1973?, किरातनदी में चंद्रमधु-1983 और मन पवन की नौका-1982 को त्रिवर्ग (ट्रिओलोजी) बताया है। मेरे विचार से उत्तर कुरु भी इसमें शामिल होगा, इस प्रकार 4 पुस्तकें। इसी प्रकार उन्होंने स्वयं प्रिया नीलकंठी-1969?, गंधमादन-1972 और पर्ण मुकुट-1978 को एक ही रस परंपरा के अंतर्गत रखा है। इसमें रस आखेटक भी जुड़ जाएगा, (4 पुस्तकें) क्योंकि कामधेनु प्रथम संस्करण की भूमिका में कहा गया है कि प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक और गंधमादन एक प्रकार की तो विषाद योग और कामधेनु (2 पुस्तकें) दूसरे प्रकार की। पत्र मणिपुतुल के नाम-1980 और कंथामणि-1998 उनकी अन्य सभी रचनाओं से अलग हैं।

संपादकीय दायित्व होगा कि निबंधों के प्रथम प्रकाशन का संदर्भ, पत्र-पत्रिका में हो तो नाम, वर्ष और अंक सहित दिया जाए। समग्र/ रचनावली में किस पुस्तक/संग्रह के अब तक कितने संस्करण आ चुके हैं, संस्करण में कुछ जोड़-घटाव हुआ हो, तो उसकी जानकारी सहित, ध्यान रखना होगा कि संस्करण और प्रकाशन वर्ष में विसंगतियां हो सकती है, जैसा कामधेनु के नेशनल पब्लिशिंग वाले संस्करण में है। इसमें यह भी उल्लेख है कि इस, द्वितीय संस्करण में पर्याप्त संशोधन और संवर्धन हुआ है और कुछ नये निबंध भी जोड़े गए हैं। इसी तरह ‘विषाद योग‘ संग्रह के ‘अन्त में, अपनी बात‘ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस संग्रह के निबंध सात-आठ वर्षों में लिखे गए हैं, इनमें से अधिकांश का रचनाकाल 1970-71 है। तथा द्वितीय संस्करण में चार पुराने संस्करण के निबंध अनुपस्थित हैं। प्रथम संस्करण में रामायण-प्रसंग पर पांच ललित निबंध थे। उनमें दो को इसमें रखकर शेष तीन को निकाल दिया गया है। इन चार निबंधों के बदले में हम इसमें चार टिप्पणियां या लेख, चाहे जो कहें, जोड़ रहे हैं। वैसे ही काल के उल्लेख की आवश्यक पर उन्होंने स्वयं बल दिया है, ‘पर्ण-मुकुट‘ के एक निबंध ‘आभीरिका‘ के लिए ठोस उदाहरण दिया है कि यह निबंध सामयिक कालखंड 1977 की राजनीति, तो कुछ को ‘भारतीय लोकदल‘ का पोषक लग सकता है, जबकि यह निबंध 1974 में लिखा गया था और 1975 में ‘मधुमती‘ में छप चुका था।

उनके द्वारा अप्रचलित शब्दों के प्रयोग पर टीप या ऐसे सौ-एक शब्द, जो यों अप्रचलित है, लेकिन उनके लेखन में अक्सर आए हैं, की अर्थ-व्याख्या सहित सूची होनी चाहिए। ‘गन्धमादन‘ संग्रह के निबंध ‘जल दो, स्फटिक जल दो!‘ का आरंभिक अंश उल्लेखनीय है, जहां वे श्वेत-श्याम को सृष्टि के मौलिक वर्ण कहते हुए इसके विपर्यय चौबीस सोपानबद्ध भूमियां, इन चौबीस रंगों के अपरा इंद्रधनुष का आदि अननुभूत निरंजन और अवसान दृष्टिभक्षी, तमोगुणी महातमस बताते हैं। इसके अलावा अज्ञात, अल्पज्ञात शब्दों के बारे में उन्होंने स्वयं रामायण महातीर्थम के ‘अपने लेखन के बारे में‘ में बात की है। जैसे स्यंदन या वर्म (हथियारबंद, जिरह-बख्तर?), कुहक, ना-धर्मी और हां-धर्मी तथा अस्ति-भवति का भी प्रयोग उनके लेखन में अक्सर है, जो यों अन्यत्र सामान्यतः नहीं होता। भाषा के लिए उन्होंने ‘निषाद बांसुरी‘ में यह भी कहा है- 'परन्तु समग्र जीवनव्यापी भाषा बनने के लिए इसे ब्रज-अवधी-भोजपुरी-मगही-मैथिली-छत्तीसगढ़ी के "जानदार-पानीदार" शब्दों को लेना ही होगा, इसमें कोई विवाद ही नहीं, क्योंकि यह तो 'घर' की निधि है। मेरी धारणा है कि जरूरत पड़ने पर एक ओर पंजाबी-गुजराती और दूसरी ओर बांग्ला-असमीया-उड़िया की शब्दश्री से भी सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। अवश्य ही जरूरत पड़ने पर ही । अन्यथा हिन्दी के रूप में एक नयी 'बदअमली' की सृष्टि होगी जो कदापि वांछनीय नहीं।"

इटैलिक पर, इन्वर्टेड पर, हलन्त पर, बिंदी और चंद्र बिन्दी का निर्णय लेना होगा, ङ ञ वाले शब्द संस्कृत उद्धरण में तो ठीक हैं, किंतु हिंदी (को हिन्दी लिखेंगे?) में अनुस्वार रखने पर विचार करना होगा। उसी तरह १-२ आदि के स्थान पर 1-2 का प्रयोग, जो भी निर्धारित हो उसका उल्लेख संपादकीय लेख-टीप में देना होगा और एकरूपता रहे इसका ध्यान रखना होगा। इसी तरह ‘आया‘ तो ठीक है किंतु- ‘आए‘ (न कि आये), आई (न कि आयी), तात्पर्य कि ऐसे शब्दों में जहां स्वर का प्रयोग हो सकता है, व्यंजन-मात्रा का प्रयोग न हो।

इस प्रकार के और ढेरों विचार मन में आ रहे हैं, यदि उपयोगी लगें तो अधिक समय दे कर ध्यान से करूंगा। यह काम मेरे लिए आनंद और आत्मसंतोष का होगा, बशर्ते कि यह आपके काम में मददगार और उपयोगी हो।

कुबेरनाथ जी को पढ़ना, पढ़ते रहना, मेरे लिए ‘माघे मेघे गतं वयः‘ जैसा ही है, मगर मुझे उनके पूरे लेखन में से एक अंश चुनना हो तो वह होगा, कामधेनु संग्रह के ‘दिवस का महाकाव्य‘ निबंध का आरंभ। इस लालित्य के आगे और कुछ भी फीका। ... और उनके लिए मुझे कुछ कहना हो तो यह उन्हीं से शब्द लेकर संभव होगा, सो ... जैसा वे ‘गंधमादन‘ के निबंध ‘शब्द-श्री‘ में कहते हैं- 'पर मैं तो साठोत्तरी का कामुक यक्ष-मेघ हूं और भाषा के 'दिङ्नागानाम्' के स्थूल हस्त-चपेटों से बच-बचाकर शब्दरूपा श्री का 'चाक्षुष-यज्ञ' भोग कर रहा हूँ। मेरे जीवन का क्षण-प्रतिक्षण इसीके यश का मन्त्रगान बनना चाहता है, मेरे 'अ' से 'ह' तक सारे वर्णोच्चार, मेरे सारे उच्चारण, मेरा सारा 'अहं', इसी की भाषामयी आरती है। यही सारी विद्याओं की अभिव्यक्ति का आधार है।' या जैसा वे ‘महाकवि की तर्जनी‘ में लिखते हैं- ‘मुझे लगा कि मैं बीसवीं शती का एक मामूली मृदंग-वादक अपनी नीरस गद्य-मृदंग लेकर कालनदी के कई हजार वर्ष पुराने घाट पर पहुंच गया हूं और इस वाङ्मनस-अगोचर संबंध को सुन रहा हूं। वह मरा हुआ पक्षी उत्तर-काव्य का वाहन बनकर लौट आया और इस प्रकार बोला ‘बंधु, मैं लौट आया हूं शब्द बनकर, भाव बनकर। मैं अपने कल-कूजन द्वारा तुम्हारे अंदर असंख्य वर्षा-शरद और असंख्य वसंतों की रचना करता रहूंगा।‘

पुनश्च-

प्रतिश्रुति प्रकाशन के लक्ष्मण केड़िया जी ने 14 मार्च की फेसबुक पोस्ट में उनके द्वारा प्रकाशित ‘कुबेरनाथ रचनावली‘ का संक्षिप्त परिचय दिया है। साथ ही पोस्ट की टिप्पणी में मेरे लिए उल्लेख किया है- 
'रचनावली-कार्य से आप युक्त रहे हैं। आपके सहयोग ने मुझे समृद्ध किया है। आभार पृष्ठ में आपका उल्लेख भी किया है। 
रचनावली के संपादन में समय अधिक लगा, क्योंकि रचनाएं मुझे शेष तक मिलती रही हैं। 
खुशनसीब हूं कि स्पर्धात्मक वातावरण मुझे आधी-अधूरी रचनावली के लिए विवश न कर सका। 
आप कुबेरनाथ जी के उत्कट प्रेमी हैं। आपकी टिप्पणी मेरे लिए पुरस्कार है। 
पुनः आभार व्यक्त करता हूं। धन्यवाद।

लक्ष्मण जी के प्रति आभार। 'कुबेरनाथ राय जैसे जरूरी हिंदी-सेवक की रचनावली, जो बहुत आवश्यक थी, देर से छपी और छपी तो दो-दो। अब सुनने में आया है कि इस मुकदमेबाजी भी हो रही है। कुबेरनाथ जी होते तो इस पर शायद वही कहते, जो उन्होंने ‘उत्तरकुरु‘ की भूमिका में कहा है। पहले तो वे लिखते हैं- ‘... इसके बाद इस क्षेत्र की महाविद्या की शयन आरती!‘ और फिर भूमिका के अंत में- ‘अन्त में मैं प्रकाशक को धन्यवाद देना चाहूंगा। मेरी किताबें प्रकाशकों के पास दो-तीन वर्ष सड़कर के प्रकाशन का सौभाग्य पाती हैं। परन्तु बाल-बच्चेदार प्रकाशकों को इसका क्या दोष दूं? वे प्राथमिकता देते हैं उन प्रकाशनों को जिनकी आशुबिक्री संभव हो सके। इस हालत में साहित्य-प्रेम के नाम पर मेरे लिए वे जो कुछ कर रहे हैं, उसी से मैं संतुष्ट हूं।‘

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