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Wednesday, October 31, 2012

राजधानी रतनपुर

इतिहास में राजधानी-नगरों की कहानी बड़ी अजीब होती है, कहीं तो उनका वैभव धुंधला जाता है और कभी-कभी उनकी पहचान खो जाती है। छत्तीसगढ़ या प्राचीन दक्षिण कोसल के दो प्रमुख नगरों- राजधानियों शरभपुर और प्रसन्नपुर की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। शरभपुर का समीकरण सिरपुर, मल्हार, सारंगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ स्थलों से जोड़ा गया, किन्तु प्रसन्नपुर की चर्चा भी नहीं होती। इसी प्रकार इस अंचल में कोसल नगर और 'गामस कोसलीय' नाम के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, किंतु यह स्‍थान 'कोसल' राजधानी था अथवा नहीं; या कहां स्थित था, निश्चित तौर पर यह भी नहीं तय किया जा सका है। अंचल के सर्वाधिक अवशेष सम्पन्न पुरातात्विक स्थल मल्हार का राजनैतिक केन्द्र या राजधानी होना, अभी तक अनिश्चित है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक राजधानी रतनपुर के संबंध में ऐसा कोई सन्देह नहीं है, किन्तु जैसा कि प्रत्येक राजधानी के साथ होता है, राजनैतिक आपाधापी और उलट-फेर में राजधानी-नगरों का वास्तविक सांस्कृतिक वैभव धुंधलाने लगता है। पौराणिक मान्यता है कि रतनपुर चतुर्युगों में राजधानी रहा है और लगभग हजार वर्ष का इतिहास तो ठोस प्रमाण-सम्मत है। एक हजार वर्ष की सुदीर्घ काल अवधि में कुछ घटनाओं के संकेत मिलते हैं, जिनमें चैतुरगढ़-लाफा, कोसगईं आदि स्थान भी राजसत्ता के केन्द्र बने और रतनपुर राज पर जनजातीय आक्रमणों का संकट पड़ा, किन्तु अट्ठारहवीं सदी के मध्य में मराठों के आगमन के पश्चात्‌ घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा, फलस्वरूप एक सहस्राब्दी के सम्पन्न वैभव की झांकी, आज रतनपुर में न हो, लेकिन उसका स्पन्दन वहां अवश्य महसूस किया जा सकता है।

कलचुरियों की आंचलिक प्रथम राजधानी तुम्माण का स्थानान्तरण रतनपुर को इस दृष्टिकोण से देखा जाना भी समीचीन होगा, कि यह काल कबीलाई छापामारी से विकसित होकर खुले मैदान में विस्तृत हो जाने का था और इतिहास गवाह है कि इसी के पश्चात्‌ पूरे दक्षिण कोसल क्षेत्र का पहली बार नियमित व्यवस्थापन रतनपुर राजधानी से हुआ। छत्तीस गढ़ यानि छत्तीस प्रशासनिक केन्द्रों में क्षेत्र को बांट कर राजस्व इतिहास में पहली जमाबंदी रतनपुर केन्द्र से की गई। शासन और शासित के संबंधों का निरूपण, कर वसूलने वाले और करदाता के रूप में किया जाता है, छत्‍तीसगढ़ में इस नियमित व्यवस्था की शुरुआत रतनपुर से हुई, जिसका अनुसरण बाद में अंगरेज प्रशासनिकों ने किया।

रतनपुर के वैभव और इतिहास को उजागर करने का पुनीत कार्य बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री गौरहा, अंगरेज अधिकारीगण, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, राय बहादुर हीरालाल, महामहोपाध्याय वा.वि. मिराशी, डॉ. सुधाकर पाण्डेय, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम, श्री प्यारेलाल गुप्त प्रभृत विद्वानों ने किया है लेकिन जिनका नामोल्लेख यहां नहीं है उनके प्रति और विशेषकर देवार जाति के अनाम कवि गायकों के प्रति भी श्रद्धावनत हूं, जिन्होंने परम्परागत रतनपुर राजधानी, गोपल्ला वीर, घुग्घुस राजा, रत्नदेव और बिलासा केंवटिन जैसे कितने ही पात्रों और घटनाओं को निरपेक्ष रहकर जीवन्त रखा है, जिनका उपयुक्त हवाला इतिहास में नहीं मिलता।

सन्‌ 1999 में प्रकाशित पुस्‍तक में
'सम्‍मति' शीर्षक से मेरी टिप्‍पणी से.

अतः और अंततः धन्य है ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो इतिहास में झांककर समाज के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा बनाता है, निर्जीव इतिहास से जीवन में प्रेरक आशा का उत्साह संचारित कराता है, इसलिए किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं बल्कि इस विशेष भाव का उल्लेख यहां अधिक प्रासंगिक मानता हूं। ब्रजेश श्रीवास्तव की प्रस्तुत कृति 'रतनपुर दर्शन' यहां के प्राचीन वैभव को उद्‌घाटित करने में सफल होगा, ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।  

हार्दिक शुभकामनाओं सहित...

Sunday, October 28, 2012

लहुरी काशी रतनपुर

बाबू रेवाराम से गौरवान्वित लहुरी काशी रतनपुर के काशीराम साहू (लहुरे) के माध्यम से यहां की पूरी सांस्कृतिक परम्परा सम्मानित हुई, जब इसी माह 9 तारीख को छत्तीसगढ़ के लोक नाट्‌य के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार-2011 मिला।
आठ सौ साल तक दक्षिण कोसल यानि प्राचीन छत्तीसगढ़ की राजधानी का गौरव रतनपुर के नाम रहा। इस दौरान राजवंशों की वंशावली के साथ यहां कला-स्थापत्य के नमूनों ने आकार लिया। अब यह कस्बा महामाया सिद्ध शक्तिपीठ के लिए जाना जाता है। कभी इसकी प्रतिष्ठा लहुरी काशी की थी।

तासु मध्य छत्तिसगढ़ पावन। पुण्य भूमि सुर मुनि मन भावन॥
रत्नपुरी तिनमें है नायक। कांसी सम सब विधि सुखदायक॥
जोजन पांच तासु ते छाजै। अमर कंठ रेवा तहं राजै॥

राजधानी वैभव के अंतिम चरण में उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक बाबू रेवाराम का जन्म अनुमानतः संवत 1870, यानि उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ। लगभग 60 वर्षों के जीवन काल में उनके रचित 13 ग्रंथों में एक 'कृष्ण लीला के गीत' है। इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियों पर श्री कृष्ण लीला भजनावली, रत्नपुरी चाल (संग्रहीत) और रासलीला गुटका भी लिखा गया है। गुटके की प्रतियों में उल्लेख मिलता है- 'कृष्ण चरित यह मह है जोई। भाषित रेवाराम की सोई॥' वैसे तो छत्तीसगढ़ में प्रचलित रहंस या रास और नाचा-गम्मत, इस गुटका से अलग अलग दो अन्य विधाएं हैं, लेकिन रतनपुर में कहीं घुल-मिल सी जाती हैं। बोलचाल में रतनपुरिया भजन, भादों गम्मत या सिर्फ गुटका कह दिये जाने का आशय सामान्यतः बाबू रेवाराम की उक्त परम्परा से संबंधित होता है, जो रहंस और नाचा-गम्मत से कहीं अलग है।
बाबू रेवाराम की परम्परा वाले गुटका यानि कृष्ण लीला भजनावली में वंदना, आरती, ब्यारी, गारी, जन्म लीला, पालना लीला, पूतना वध, श्रीधर लीला, गर्ग लीला, कागासुर लीला, विप्र लीला, मृत्तिका लीला, मथन लीला, दधि चोरी लीला, यमलार्जुन लीला, वच्छ चरावन लीला, वच्छ हरण लीला, गेंदलीला नागलीला, जल+पनघट+गगरी लीला, जादू लीला, वस्त्र हरण लीला, वंशी लीला, दधि-दान लीला, ओरहन लीला, मान लीला, महारास, अन्तर्ध्यान, विरह-भजन, कृष्ण मिलन, मंगल आरती जैसे तीस भागों में ढाई सौ पद-श्लोक हैं। रतनपुर में अब भी गणेश चतुर्थी और शरद पूर्णिमा के अवसर पर गम्मत आयोजित होते है, बाबूहाट, करैहापारा में 2007 में भादों गम्मत आयोजन का 127 वां वर्ष था।
रतनपुर में लीला संस्कारित पीढ़ी अभी भी जीवंत है। नवरात्रि पर देवी भजन गुटका के माता सेवा के गीत और होली के दौर में फागुन गुटका का फाग भजन-गीत होता है। यहां परम्परा का असर दिनचर्या में, आचरण-व्यवहार में, पूजा-पाठ, पीताम्बर धारण करना, यों कहें- पूरी जीवनचर्या की अन्तर्धारा में लीला आज भी विद्यमान है। आसपास मदनपुर, खैरा, रानीगांव, भरारी, मेलनाडीह, पोंड़ी, बापापूती, चपोरा, सरवन देवरी और कर्रा जैसे कई गांवों में यह धारा प्रवाहित है। रतनपुरिया भजन से संबंधित कुछ ऐसे लोगों के चित्र, जिनमें निहित लीला-विस्तार को सुन-देख कर समझने का प्रयास करता रहा-

भंगीलाल तिवारी - काशीराम साहू (लहुरे) - दाऊ लक्ष्मीनारायण

दुर्गाशंकर कश्यप - दाऊ बद्री विशाल - बलदेव प्रसाद मिश्र

शिव प्रसाद तंबोली - ईश्वरगिर गोस्वामी - रामकुमार तिवारी

हरिराम साहू - रामकृष्ण पांडेय - काशीराम साहू (जेठे)

रामकिशोर देवांगन - रामप्रसाद साहू - किशन तंबोली
रहंस में पूरा गांव लीला-भूमि और लीला के आयोजन में गांव का गांव कैसे इसका अभिन्‍न हिस्‍सा हो जाता है यह कुछ हद तक कैमरा ही देख सकता है, व्यक्ति के लिए सिर्फ दर्शक बना रहना संभव नहीं हो पाता, दृश्‍य घुल कर कैसे रस बन जाते हैं, तभी पता लगता है, जब लीला पूरी हो जाती है। ''श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभं, जानकी नायकं रामचंद्रं भजे। बोलो श्री राधाकृष्ण की जै। श्री वृन्दावन बिहारी की जै।'' इन अंतिम पंक्तियों के बाद लेकिन, असर बच जाता है- लीला अपरम्पार।

Friday, October 19, 2012

रविशंकर

छत्तीसगढ़ के सजग जोड़ा शहर दुर्ग-भिलाई से पत्रकार कानस्कर जी का फोन आया, रविशंकर जी नहीं रहे। मेरे कानों में कुछ देर स्मृति में दर्ज उनकी खिलखिलाहट बजती रही। उनसे आमने-सामने का संपर्क बहुत पुराना नहीं था, मगर अपेक्षा-रहित उनके भरोसे का संबल मुझे अनायास मिलता रहा। ऐसे निरपेक्ष विश्वासी कम ही होते हैं।
पं. रविशंकर शुक्‍ल
21.01.1927-10.10.2012
उनका निवास भिलाई के सेक्टर-5 में था। पहली बार उनके घर गया। बात होने लगी, 'घर ढूंढने में कोई अड़चन तो नहीं हुई', मैंने कहा- आपने अपने घर के रास्ते का नामकरण जीते-जी करा लिया है 'पं. रविशंकर शुक्ल पथ' (वस्तुतः उनके हमनाम पूर्व मुख्‍यमंत्री)। धीर-गंभीर, प्रशांत, लगभग भावहीन चेहरा और खोई सी आंखें, लेकिन देखकर सहज पता लग जाता कि उनके मन में लगातार कुछ चल रहा है, रचा जा रहा है, मेरा जवाब सुनकर, थोड़ा ठिठके फिर खिलखिला पड़े थे, बालसुलभ-दुर्लभ अविस्मरणीय हंसी। उदार इतने कि आपके रुचि की पुस्तक या ऐसी कोई वस्तु उनके पास हो तो सौंपने को उद्यत होते।

छत्तीसगढ़ का पारम्परिक नाचा-गम्मत पचासादि के दशक में 'लोकमंच' में बदलने लगा। श्वसुर डॉ. खूबचंद बघेल और पृथ्वी थियेटर के नाटकों से प्रेरित दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 1950 में 'छत्तीसगढ़ी देहाती कला विकास मंडल' स्थापना की, आरंभिक दौर में नाटक मंचित करते, लेकिन बड़ी और विशेष उल्लेखनीय प्रस्तुति 26 और 27 फरवरी 1953 को पिनकापार में हुई। यही मंच ऐतिहासिक 'चंदैनी गोंदा' की पृष्ठभूमि बना, जिसकी स्थापना 7 नवंबर 1971 को हुई।

दाऊजी के शब्दों में- ''भटकने की नियति आरंभ हुई। रात-रात भर गाड़ी में, कड़कती हुई धूप में, धूल भरे कच्चे रास्तों पर भटकना, गांवों में कलाकार ढूंढना ...।'' प्रतिभाएं तलाशी-तराशी गईं। लाला फूलचंद, लक्ष्मण दास, ठाकुरराम, भुलवा, मदन, लालू जुड़े। बांसुरी-संतोष टांक, बेन्जो-गिरिजा सिन्हा, तबला-महेश ठाकुर, मोहरी-पंचराम देवदास पर्याय बनते गए। टेलर मास्टर, कवि-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया, राजभारती आर्केस्ट्रा के गायक-अभिनेता भैयालाल हेड़उ, कविता हिरकने-वासनिक, केदार यादव, अनुराग ठाकुर साथ हुए।

दाऊजी और संगीतकार खुमान साव के साथ कवि-गायक रविशंकर शुक्ल की त्रयी, चंदैनी गोंदा की सूत्रधार बनी। शुक्ल जी का रचा शीर्षक गीत- 'देखो फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे। एखर रंग रूप हा जिउ मा, मिसरी साही घुर गे।' छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन के मिठास का प्रतिनिधि गीत बन गया।

रविशंकर जी की ज्यादातर रचनाएं लोकप्रिय हुई, इनमें से कुछ खास, जिन्होंने सभी के कानों में मिसरी घोली- 'झिमिर झिमिर बरसे पानी। देखो रे संगी देखो रे साथी। चुचुवावत हे ओरवांती। मोती झरे खपरा छानी।' फगुनाही गीत है- 'फागुन आ गे, फागुन आ गे, फागुन आगे, संगी फागुन आ गे, देखौ फागुन आ गे। अइसन गीत सुनाइस कोइली, पवन घलो बइहा गे।' और 'धरती मइया सोन चिरइया। देस के भुइयां, मोर धरती मइया।' जैसा गौरव-बोध का गीत। उनके रचे-गाए गीत बनारस की सरगम रिकार्ड कंपनी से बने पर स्‍वाभिमानी ऐसे कि गीत के बोल पसंद न आए, तो गीत गाने के फायदेमंद प्रस्‍ताव की परवाह नहीं करते।

आपने 'तइहा के बात ले गे बइहा गा' / 'फुगड़ी फू रे फुगड़ी फू' / 'सुन सुवना' / 'घानी मुनी घोर दे, पानी दमोर दे' जैसी पारम्परिक पंक्तियों को ले कर भी कई गीत रचे। उनकी लोरी 'सुत जा ओ बेटी मोर, झन रो दुलौरिन मोर। फेर रतिहा पहाही, अउ होही बिहनिया। आही सुरुज के अंजोर। सुत जा ...' में रात के मीठे सपने नहीं, बल्कि सुबह की आस का अनूठा प्रयोग है।
निधन के तीन दिन पूर्व का चित्र
सम्‍मानित हुए और इस अवसर पर गीत भी सुनाया
चित्र सौजन्‍य - आरंभ वाले श्री संजीव तिवारी, भिलाई

उनका पहला संग्रह 'धरती मइय्या' 2005 में चौथेपन में आया। अपनी बात में उन्होंने लिखा- ''चन्दैनी गोंदा, दौना पान, नवा बिहान व अनेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए मैंने गीत लिखे, किन्तु अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार न दे सकने का दुख छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन, दुर्ग द्वारा मानस भवन में अपने साहित्य सम्मान के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मैंने व्यक्त किया था। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के छोटे आर्थिक सहयोग से इस दुख से मुक्ति पा सका और यह संग्रह प्रस्तुत कर सका।'' इसी पुस्तक का अंतिम गीत है-

चल मोर संगी उसल गे बजार।
का बेंचे तॅंय हा अउ का बिसाये।
बड़े मुंधेरहा ले लेड़गा तॅंय आये॥

पिंजरा के धंधाये सोन चिरइ उड़ि गे।
माटी के चोला हा माटी म मिलि गे॥

तॅंय बइठे का देखत हावस आंखी फार-फार।
चल मोर संगवारी उसल गे बजार॥

एक दिन आए, बताया, अस्पताल से आ रहे हैं। कहा- तबियत ठीक है, बस एक कागज बनवाने गया था, आप भी इसकी प्रति अपने पास रखें, बिना कागज देखे मैंने अफसरी सवाल किया, ये बताइए कि करना क्या है, उन्होंने कहा, कुछ नहीं, बस अपने पास रखिए। तब मैंने कागज पर नजर डाली, वह था वसीयतनामा (मृत्‍योपरांत शरीर दान का घोषणा पत्र), मेरे और कुछ कहने से पहले रवानगी को तैयार हो गए।

अंतिम दिनों में अशक्त होने पर भी श्री जी संस्था के लिए सक्रिय रहे। भिलाई आ कर उनसे मिलने की बात हुई तो पते के लिए खास किस्‍म का 'विजिटिंग कार्ड' दिया। छपे हुए पते को 'बदल गया है' कहते हुए काट कर सुधारा।

अब उनका पता फिर बदल गया, लेकिन अपने गीतों में वे अभी भी हम सब के साथ हैं।

Monday, October 8, 2012

शेष स्मृति

2 अक्टूबर, नाटक और खास कर बिलासपुर से जुड़े लोगों के लिए, डॉ. शंकर शेष की जयंती के रूप में भी याद किया जाता है (यही यानि 2 अक्‍टूबर डॉ. शेष की पत्‍नी श्रीमती सुधा की जन्‍मतिथि है) और यह बीत जाए तो अक्टूबर की ही 28 तारीख उनकी पुण्यतिथि है। डॉ. शेष (1933-1981) के साथ बिलासपुर के नाटकीय इतिहास-थियेटर की यादें भी दुहराई जा सकती हैं।
डॉ. शंकर शेष
भागीरथी बाई शेष
बिलासपुर से जुड़ा बिलासा का किस्सा इतिहास बनता है, भोसलों और भागीरथी बाई शेष (1857-1947) के नाम के साथ। पति पुरुषोत्तम राव के न रहने पर निःसंतान मालगुजारिन भागीरथी बाई को उत्तराधिकारी की तलाश थी। बात आसान न थी लेकिन पता लगा कि उन्हीं के परिवार के भण्डारा निवासी विनायक राव पेन्ड्रा डाकघर में कार्यरत हैं। वसीयतनामा तैयार हो गया। कहानी, इतिहास बनी।

1861 में पृथक जिला बने बिलासपुर में रेल्वे के लिए जमीन की जरूरत हुई। उदारमना भागीरथी बाई जमीन दान देने को तैयार हुई, किन्तु अंगरेजों को 'देसी का दान' मंजूर नहीं हुआ और बताया जाता है कि 1885 में तत्कालीन मध्यप्रान्त के चीफ कमिश्नर सर चार्ल्स हाक्स टॉड ने बिलासपुर रेलवे स्टेशन और रेलवे कालोनी के लिए 139 एकड़ जमीन के लिए 500 रुपए मुआवजा दे कर बिक्रीनामा लिखाया।

विनायक राव की पत्नी सीताबाई थीं, उनके तीन पुत्रों में बड़े नागोराव हुए, जो उसी बिक्रीनामा के आधार पर भू-वंचित माने जा कर रेलवे में क्लर्क नियुक्त हुए। नागोराव की पहली पत्नी जानकीबाई और दूसरी पत्नी सावित्री बाई थीं।
सावित्री बाई नागोराव शेष
दूसरी पत्नी के पुत्रों में बड़े बबनराव, फिर बालाजी, तीसरे (डॉ.) शंकर (शेष), उसके बाद विष्णु और सबसे छोटे गोपाल हुए। नागोराव (निधन- 17 दिसम्‍बर 1960), जिनके नाम पर जूना बिलासपुर का पुराना स्कूल है, रेलवे में क्लर्क रहे, लेकिन सोहराब मोदी का थियेटर अपने शहर में देखने-दिखाने की धुन थी, नतीजन 1929 में श्री जानकीविलास थियेटर बना, जिसके लिए हावड़ा की बर्न एंड कं. लि. से सन '29 तिथि अंकित नक्शा बन कर आया था।
पारसी नाटकों, मूक फिल्मों और फिर बिलासपुर फिल्म इतिहास के लंबे दौर का साक्षी, दसेक साल से बंद यह थियेटर मनोहर टाकीज कहलाता है। हुआ यह कि पेन्‍ड्रा के जाधव परिवार के मंझले, मनोहर बाबू वहां सिनेमा का काम करते रहे, छोटे डिगू बाबू ने दुर्ग में तरुण टाकीज का काम संभाला और बड़े भाई, दत्‍तू बाबू बिलासपुर आ कर इसका संचालन करने लगे। इस तरह श्री जानकीविलास थियेटर का नया नाम 'मनोहर' भी पेन्‍ड्रा से आया और पेन्‍ड्रा वाले ही विनायक राव के पुत्र, बिलासपुर में थियेटर के पितृ-पुरुष नागोराव शेष हुए और हुए उनके पुत्र डॉ. शंकर शेष।
मनोहर टाकीज - श्री जानकी विलास थियेटर के साथ डॉ. गोपाल शेष
तब 'सारिका' में डॉ. शेष का कथन छपा था- ''सन 1979 की बात है। मैं भोपाल में था। उन दिनों विनायक चासकर ने मेरा नाटक 'बिन बाती के दीप' उठाया था। मुझे भी नाटक में एक भूमिका दी गई। कैप्टन आनंद की भूमिका। दो दिन रिहर्सल हुई फिर चासकर को लगा कि अगर शेष को कैप्टन आनंद बनाया गया तो और कुछ हो या ना हो, नाटक पिट जाएगा। तो लेखक की नाटक से छुट्‌टी हो गई। इस घटना के बाद मुझे एहसास हुआ और मैंने नियति की तरह इसे स्वीकार किया कि अभिनय करना मेरे बस की बात नहीं।'' यह संक्षिप्त किन्तु रोचक अंश डॉ. शेष की भाषा-शैली सहित उनकी प्रभावी सपाटबयानी का समर्थ उदाहरण है।
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डॉ. शंकर शेष की रचनाओं की व्यवस्थित सूची-जानकारी मिली नहीं, अलग-अलग स्रोतों से एकत्र कर डा. शेष की कृतियों को विधा और रचना वर्ष के क्रम में रखने का प्रयास किया है, जिसमें संशोधन संभावित है, इस प्रकार है-

नाटक
1955- मूर्तिकार, रत्नगर्भा, नयी सभ्यताःनये नमूने, विवाह मंडप (एकांकी)
1958- बेटों वाला बाप, तिल का ताड़, हिन्दी का भूत (एकांकी)
1959- दूर के दीप (अनुवाद)
1968- बिन बाती के दीप, बाढ़ का पानीःचंदन के दीप, बंधन अपने-अपने, खजुराहो का शिल्पी, फन्दी, एक और द्रोणाचार्य, त्रिभुज का चौथा कोण (एकांकी), एक और गांव (अनुवाद)
1973- कालजयी (मराठी व हिन्दी), दर्द का इलाज (बाल नाटक), मिठाई की चोरी (बाल नाटक), चल मेरे कद्‌दू ठुम्मक ठुम (अनुवाद)
1974- घरौंदा, अरे! मायावी सरोवर, रक्तबीज, राक्षस, पोस्टर, चेहरे
1979- त्रिकोण का चौथा कोण, कोमल गांधार, आधी रात के बाद, अजायबघर (एकांकी), पुलिया (एकांकी), पंचतंत्र (अनुवाद), गार्बो (अनुवाद), सुगंध (एकांकी), प्रतीक्षा (एकांकी), अफसरनामा (एकांकी)

पटकथा
1978- घरौंदा,1979- दूरियां, सोलहवां सावन (संवाद)

कहानी
1979 से 1981- ओले, एक प्याला कॉफी का, सोपकेस

उपन्यास
1956- तेंदू के पत्ते 1971- चेतना, खजुराहो की अलका, धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे (अपूर्ण)

अनुसंधान
1961- हिन्दी और मराठी तथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन
1965- छत्तीसगढ़ी का भाषाशास्त्रीय अध्ययन
1967- आदिम जाति शब्द-संग्रह एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन

डॉ. शेष नाटक प्रेमियों में जिस तरह स्‍वीकृत थे, फिर उनके सम्‍मान-पुरस्‍कार का उल्‍लेख बहुत सार्थक नहीं होगा, लेकिन एक जिक्र यहां आवश्‍यक लगता है- नागपुर के प्रसिद्ध धनवटे नाट्य गृह का शुभारंभ 1958 में डॉ. शेष के नाटक 'बेटों वाला बाप' से(?) होने की सूचना मिलती है।
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''इस बार तुमको अरपा नदी दिखाएंगे और अरपा नदी के पचरी घाट,'' बम्बई से चलने के पहले डॉ. शंकर शेष ने तय किया कि अपनी पत्नी को अपने पुराने शहर के सारे ठिकाने, जिनके साथ उनका पूरा बचपन और बचपन की कितनी-कितनी कथाएं जुड़ी हैं, जरूर दिखाकर लाएंगे।

उपरोक्त अंश पैंतीसेक साल पहले 'रविवार' में छपी, सतीश जायसवाल की कहानी ''मछलियों की नींद का समय'' का है। कहानी के नायक डॉ. शंकर शेष हैं और एक पात्र सतीश (कहानी के लेखक स्वयं) भी है। पूरी कहानी डॉ. शेष के बिलासपुर, समन्दर-नदी-तालाब-हौज के पानी, जलसाघर-थियेटर-संग्रहालय-किला-मछलीघर और मछलियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। पंचशील पार्क की अहिंसक मछलियां। मामा-भानजा तालाब (शेष ताल) की बड़ी-बड़ी मछलियां। कहानी में वाक्य है- ''श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष के इस शहर में कुछ भी गैर-सांस्कृतिक नहीं हो सकता।'' और यह भी- ''डॉ. साहब, अरे मायावी सरोवर और अपने मामा-भानजा तालाब के बीच क्या कोई संबंध है?''

सतीश जी की इस कहानी के बहाने कुछ और बातें। बिलासपुर के साथ मछुआरिन बिलासा केंवटिन का नाम जुड़ा है।... ... ... श्रीकान्त वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और डॉ. शंकर शेष, बिलासपुर के चार ''एस'' कहे जाते हैं। ... ... ... आंखों पर पट्‌टी बांधी गांधारी का डॉ. शेष का नाटक 'कोमल गांधार' और सत्यदेव दुबे के 'अन्धा युग' की अदायगी के साथ यहां संयोग बनता है कि डॉ. शंकर तिवारी ने 1958-59 में खोजा कि कांगेर घाटी, बस्तर की कुटुमसर गुफाओं में दो-ढाई इंच लंबी बेरंग मछलियां हैं, उजाले के अभाव में इनकी आंखों पर झिल्लीनुमा पर्दा भी चढ़ गया है। साथ ही उनके द्वारा 15-20 सेंटीमीटर मूंछों वाले अंधे झींगुर 'शंकराई कैपिओला' Shankrai Capiola की खोज प्रकाशित की गई। यह भी कि इस कहानी के बाद सतीश जी यदा-कदा बिलासपुर के पांचवें ''एस'' गिने गए।

कहानी ''मछलियों ...'' का अंतिम वाक्य है- इस बार, बम्बई से साथ आई हुई पत्नी ने पहली बार आपत्ति की, ''यह मछलियों की नींद का समय है और लोग शिकार पर निकले हैं।''
थियेटर के भीतर अब अंधेरा-परदा
प्रमिला काले, जिनका शोध (1986) है
''नव्‍य हिन्‍दी नाटकों के संदर्भ में
डॉ. शंकर शेष के नाटकों का शिल्‍पगत अनुशीलन
सभी ऐतिहासिक पात्र, नामों के प्रति आदर।