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Tuesday, July 31, 2012

ब्‍लागजीन

ये कैसे अपने कि अब तक रू-ब-रू भी न हुए, लेकिन अब तो बहुतेरे अपने जाने-पहचाने नाम, लिखे-उचारे शब्‍दों और चित्र के परोक्ष-यथार्थ से ही 'मूर्तमान' होते हैं। ''ब्‍लागर्स पार्क'' के अंक, ऐसे ही एक परिचित, इस पत्रिका से जुड़े, अश्‍फ़ाक अहमद जी के माध्‍यम से देखने को मिले। भोपाल-नोएडा से प्रकाशित पत्रिका का पहला अंक अगस्‍त 2009 में आया था, जिसमें मुख्‍य संपादक की टीप है कि इस पत्रिका को मैगज़ीन के बजाय ब्‍लागज़ीन कहना संगत होगा।
ब्‍लागर्स पार्क के प्रवेशांक का संपादकीय - ताजे अंक का मुखपृष्‍ठ
इस नये शब्‍द 'ब्‍लाग-जीन' का 'ब्‍लाग' भी तो नया शब्‍द ही है। सन 1997 के अंत तक वेब-लॉग web-log बन गया we-blog फिर we छूटा तो बच रहा blog-'ब्‍लॉग' या 'ब्‍लाग'। 'मैगज़ीन' शब्‍द मूलतः संग्रह या भंडार अर्थ देता है सो किताबों को ज्ञान का भंडार मान कर मैगज़ीन कहा जाने लगा, लेकिन वर्तमान मैगज़ीन, उन्‍नीसवीं सदी से सीमित हो कर मात्र पत्रिकाओं के लिए रूढ़ है। इस तरह ब्‍लाग-blog और मैगज़ीन-magzine के मेल से बना, ब्‍लागज़ीन-blogazine। अब ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के मुखपृष्‍ठ पर सबसे ऊपर World's First Blogazine अंकित होता है। सोचना है, ब्‍लागजीन शब्‍द पहले अस्तित्‍व में आया होगा या यह पत्रिका, मुर्गी-अंडा में पहले कौन, जैसा सवाल है।

कुछ और छान-बीन करते ब्‍लाग-जीन के पहले अंश blog शब्‍दार्थ के लिए यहां 56 प्रविष्टियां मिलीं, इसमें से पहली पर गौर फरमाएं- ''Short for weblog. A meandering, blatantly uninteresting online diary that gives the author the illusion that people are interested in their stupid, pathetic life. Consists of such riveting entries as "homework sucks" and "I slept until noon today." और यहीं blog से मिल कर बनने वाले कोई 431 शब्‍द मिले यानि इस पर चर्चा की जाए तो पूरा लेख क्‍या, शास्‍त्र तैयार हो सकता है। इनमें एक Bloggerhood भी है, लगा कि ब्‍लाग संबंधी अन्‍य शब्‍दों सहित 'ब्‍लागबंधु' या 'ब्‍लागबंधुत्‍व' जैसा मिठास भरा शब्‍द हिन्‍दी ब्‍लागिंग में कितना कम प्रचलित है।

ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के ताजे जुलाई 2012 के अंक-28 में कुछ लेखकों के परिचय के साथ 'ब्‍लागर' उल्‍लेख भी है और एक लेखक कुणाल मेहता के परिचय में उनके शहर का नाम और 'ब्‍लागर' मात्र है। नाम के साथ अपनी ब्‍लागर पहचान अपनाए हिन्‍दी ब्‍लागिंग में गिनती के, एक हैं 'ब्‍लॉ.' उपाधिधारी ललित शर्मा और दूसरी बिना लाग लपेट के ब्‍लॉग वाली, ''ब्‍लागर रचना''। ब्‍लागर्स पार्क में www.scratchmysoul.com पर किए गए पोस्‍ट में से चयनित सामग्री विषयवार, सुरुचिपूर्ण, स्‍तरीय और सुंदर चित्रों सहित शामिल की जाती है। अश्‍फ़ाक जी से चर्चा में मैंने छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित दैनिक ''भास्‍कर भूमि'' समाचार पत्र और साप्‍ताहिक पत्रिका ''इतवारी अखबार'' का उल्‍लेख किया, जिनमें नियमित रूप से ब्‍लाग की रचनाएं छापी जाती हैं। छत्‍तीसगढ़ की तीन उत्‍कृष्‍ट वेब पत्रिकाएं ''उदंती डाट काम'', ''रविवार'', ''सृजनगाथा डाट काम'' सहित छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लाग एग्रिगेटर ''छत्‍तीसगढ़ ब्‍लागर्स चौपाल'', ''ब्‍लॉगोदय'' और गंभीर हिन्‍दी ब्‍लागरों पर भी बातें हुईं, इन चर्चाओं का सुखद निष्‍कर्ष रहा, उन्‍होंने बताया है कि ब्‍लागर्स पार्क, छत्‍तीसगढ़ की ब्‍लाग गतिविधियों पर खास सामग्री जुटाने, प्रकाशित करने की तैयारी में है।

प्रसंगवश-

अंगरेजी में भी संस्‍कृत की तरह शब्‍दों के लिए, वस्‍तु-व्‍यक्तियों के नामकरण, शब्‍द बनाने-गढ़ने-बरतने का शास्‍त्रीय और कोशीय चरित्र है लेकिन इस दृष्टि से हिन्‍दी कृपण भाषा साबित होती है। मुझे लगता है हम हिन्‍दीभाषी शब्‍द गढ़ने में देर करते हैं, बन गए शब्‍द को जल्‍दी अपनाते नहीं, कई बार अपने-पराये का ज्‍यादा ही मीन-मेख करने लगते हैं या शब्‍द वापरने के बजाय अविष्‍कारक होने के महत्‍वाकांक्षी बन जाते हैं, और शायद इसीलिए शब्‍द को अपना भी लिया तो मानक का सवाल उलझ जाता है।

दैनंदिन लेखा या नियमित अद्यतन किया जाने वाला लेखा 'ब्‍लाग', इस शब्‍दशः अर्थ में मेरी जानकारी में एकमात्र ब्‍लाग ''BACHCHAN BOL'' की जुलाई 30, 2012 की पोस्‍ट ''DAY 1564'' शीर्षक हमेशा की तरह तिथि संख्‍यावार है।

Wednesday, July 18, 2012

बस्तर पर टीका-टिप्पणी

एकबारगी लगा कि यह मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्त कर लेने की आपाधापी तो नहीं, जब वित्‍तीय वर्ष 2012 की समाप्ति के डेढ़ महीने में बस्तर पर चार किताबें आ गईं। 15 फरवरी को विमोचित राजीव रंजन प्रसाद की 'आमचो बस्तर' इस क्रम में पहली थी। फिर 26 फरवरी को संजीव बख्‍शी की 'भूलनकांदा', इसके बाद 2 मार्च को ब्रह्मवीर सिंह की 'दंड का अरण्य' और अंत में 31 मार्च को अनिल पुसदकर की 'क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!' विमोचित हुई। चारों पुस्तकों पर एक साथ बात करते हुए इस संयोग पर बरबस ध्यान जाता है कि ठेठ बस्तर पर हल्बी शीर्षक वाली आमचो बस्तर का विमोचन दिल्ली में हुआ तो अन्य तीन का रायपुर में और इन चार में, मुख्‍यमंत्री, छत्तीसगढ़ के संयुक्त सचिव संजीव बख्‍शी की कृति का विमोचन विष्णु खरे ने किया तो बाकी तीन का मुख्‍यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने।

क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!' - अनिल पुसदकर
मंजे पत्रकार, स्वयं लेखक के शब्दों में उनकी ''किताब में ढेरों सवाल हैं, व्यवस्था पर, सरकार पर, मीडिया पर और मानवाधिकार पर भी सवाल उठाये गये हैं। किताब में बस्तर का नक्सलवाद और उससे जूझते पुलिस वालों की स्थिति का हाल सामने रखा गया है।'' इस किताब विमोचन में हर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों की बड़ी संख्‍या में उपस्थिति पूरे मन से है, दिखाई पड़ रही थी और ज्यादातर लोग पूरे समय शाम 4 से 7 बजे तक बने रहे। अविवाहित अनिल जी की कृति का विमोचन था, कल्पना हुई कि वे बिटिया ब्याहते तब ऐसा माहौल होता।

कार्यक्रम आरंभ होने में विलंब के दौरान पुस्तक अंश के वाचन की रिकार्डिंग बज रही थी। यह अविस्मरणीय प्रभावी था और लगा कि एकदम बोलचाल की शैली में लिखी इस पुस्तक को सुने बिना, सिर्फ पढ़ने से काम नहीं चलेगा। यानि पुस्तक के साथ इसकी आडियो सीडी भी होती तो बेहतर होता। आयोजन के मंच पर लिखे- क्यों जाऊँ बस्तर? मरने! को देखकर साथी बने अष्‍टावक्र अरुणेश ने कहा कि क्या शीर्षक में चिह्नों को बदल देना उचित नहीं होता, यानि क्यों जाऊँ बस्तर! मरने?, मुझे उनका सुझाव सहमति योग्य लगा।

दंड का अरण्य - ब्रह्मवीर सिंह
युवा पत्रकार-लेखक के मन में सवाल है- आदिवासियों की हित रक्षा की बात सभी करते हैं तो आखिर उनके विरोध में कौन है? लगभग इसी मूलभूत सवाल के लिए की गई हालातों की जमीनी तलाश में उपजा जवाब है यह रचना। अखबारी दफ्तरों की उठापटक के हवाले हो गए इस छोटी सी किताब के शुरुआती 10-12 पेज अनावश्यक विस्तार से लगते हैं। ऐसा लगता है कि यह पुस्तक बस्तर पर होने वाले लेखन में साहित्यिक अभिव्यक्तियों के प्रति गंभीर रूप से असहमत है शायद इसीलिए साहित्यिक होने से सजग-सप्रयास बचते हुए, परिस्थिति और समस्या को यहां तटस्थ विवरण, वस्तुगत रिपोर्ताज की तरह प्रस्तुत किया गया है और वह असरदार तो है ही।

भूलनकांदा - संजीव बख्‍शी
खैरागढ़-राजनांदगांव के, पदुमलाल पुन्नालाल बख्‍शी परम्परा वाले संजीव जी से मैंने 14-15 साल पहले रमेश अनुपम, आनंद हर्षुल, जयप्रकाश के साथ कांकेर में पहली बार कविताएं सुनीं और तब से उनकी कवि-छवि ही मेरे मन में जमी हुई है। बस्तर में पदस्थ रहे इस राजस्व-प्रशासनिक अधिकारी की कविताओं में अपना जिया परिवेश और संदर्भ- खसरा नंबर दो सौ उनासी बटा तीन (क), मुख्‍यधारा, मौहा जाड़ा, हफ्ते की रोशनी, बस्तर का हाट और कांकेर के पहाड़, जैसे कविता-शीर्षकों के साथ आते रहे हैं।

भूलनकांदा उपन्‍यास का विमोचन, मंच पर उपस्थित लेकिन अनबोले से विनोद कुमार शुक्ल और अपनी जवाबदारी निभाते डॉ. राजेन्द्र मिश्र के वक्तव्य सहित हुआ। मुख्‍य अतिथि विष्णु खरे का व्याख्‍यान, इस लिंक पर शब्दशः सुना भी जा सकता है, 'वागर्थ' के मई 2012 अंक में प्रकाशित हुआ है, जिसके कुछ अंश हैं-
यह गांव का उपन्यास है, पर ऐसे यथार्थ मानवीय गांव का, जो मैं नहीं समझता कि हिन्दी में इसके पहले कहीं आया हो। ... संजीव बख्‍शी ने जो भाषा बुनी है वह ऐसी नहीं है जो फणीश्वरनाथ रेणु की है। रेणु बड़े उपन्यासकार हैं, इसमें शक नहीं, लेकिन उनके यहां बहुत शोर है, तुमुल कोलाहल है, बहुत ज्यादा साउंड इफेक्ट है। ... कुल मिलाकर यह उपन्यास विनोद जी से थोड़ा हट कर, लेकिन कुछ आगे जाता नजर आता है। ... विजयदान देथा के होते हुए भी, आज तक ऐसा उपन्यास नहीं आया है। ... ऐसी सार्वजनीनता इससे पहले और कहीं नहीं आई थी, शायद प्रेमचंद के यहां भी नहीं।

प्रसंगवश, पिछले सालों में केदारनाथ सिंह ने इस रचनाकार के कविता संग्रह को कविवर विनोद कुमार शुक्ल की काव्य-परंपरा की अगली कड़ी कहा था। लेकिन यह भी जोड़ा है कि इस कवि ने विनोद जी की शैली को इस तरह साधा है कि जैसे यह कवि का अपना ही 'स्वभाव' हो। इन उद्धरणों के बीच मेरी दृष्टि में यह उपन्यास व्यवस्था से विसंगत हो जाने की जनजातीय समस्या, जिसमें धैर्य की ऊपरी झीनी परत के नीचे गहरी जड़ों वाला द्रोह सुगबुगाता रहता है, का विश्वसनीय चित्रण है।

आमचो बस्तर - राजीव रंजन प्रसाद
लंबे समय बाद इतनी भारी-भरकम, 400 से अधिक पृष्ठों की इस पुस्तक को पेज-दर-पेज पढ़ा। पुस्‍तक में (पृष्ठ 314 पर) कहा गया है कि ''मुम्बई-दिल्ली-वर्धा से बस्तर लिखने वालों ने कभी इस भूभाग को समग्रता से प्रस्तुत ही नहीं किया।'' निसंदेह, यहां बस्तर के देश-काल को जिस समग्रता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, उसके लिए यह आकार उपयुक्त ही नहीं, आवश्यक भी है। बस्‍तर इतिहास के प्रत्‍येक महत्‍वपूर्ण कालखंड, आदि काल से अब (पृष्ठ 331 पर 6 अप्रैल 2010) तक, को विस्तृत फलक पर प्रस्तुत इस कृति में काल-पात्रों के अलग-अलग स्तर का समानान्तर निर्वाह होता है।

मिथकीय चरित्र गुण्डा धूर और भूमकाल विद्रोह, दंतेश्‍वरी में नरबलि आदि प्रसंगों की चर्चा पर्याप्‍त विस्तार से है। पात्रों, शैलेष और मरकाम की बातचीत के माध्‍यम से बस्‍तर की समस्‍याओं, परिस्थितियों से लेकर संस्‍कृति, कहावत-मुहावरे तक का अंश भी यथेष्‍ट है। इन सब के बीच लेखक किसी दृष्टिकोण-मान्‍यता का पक्षधर नहीं दिखाई पड़ता, इससे पात्रों के विचार और कथन, उनकी अपनी विश्वसनीय और स्वाभाविक अभिव्यक्ति जान पड़ते हैं। प्रस्‍तुति में प्रवाह का ध्‍यान रखा गया है न कि कालक्रम का, लेकिन प्रवीरचंद्र भंजदेव और उनके निधन का विवरण अंत में लाना एकदम सटीक है, क्‍योंकि यही वह बिन्‍दु है, जिसके पूर्वापर संदर्भों बिना बस्‍तर के रहस्‍य का अनुमान कर पाना भी कठिन होता है।

संक्षेप में पुस्‍तक पढ़ते हुए भरोसा होता है कि लेखक न सिर्फ गंभीर और सावधान है, बल्कि उसने इस कृति में निष्ठा सहित अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। प्रूफ शुद्धि भी उल्‍लेखनीय और प्रशंसा-योग्‍य (वैसे पुस्‍तक में बार-बार 'प्रसंशा' मुद्रित) है। एक स्‍थान पर ''जहाज डूबने से पहले चूहे ही भागने लगते हैं'' (पृष्ठ 172) कहावत का प्रयोग भैरमदेव से कराया जाना जमा नहीं। आलोचना के कुछ और छिटपुट उल्‍लेख किए जा सकते हैं, लेकिन इस पुस्‍तक की सब से बड़ी कमजोरी, परिशिष्ट का अभाव, माना जा सकता है। इतिहास और तथ्‍यों को औपन्‍यासिक शैली में प्रस्‍तुत करते हुए यह उपयुक्‍त होता कि परिशिष्‍ट के कुछ और पेज जोड़ कर बस्‍तर इतिहास का कालक्रम, ऐतिहासिक पात्रों के नाम की सूची और संक्षिप्‍त परिचय भी दिया जाता, इससे पुस्‍तक की उपयोगिता और विश्‍वसनीयता बढ़ जाती। बस्‍तर पर कुछ लिखते-पढ़ते इस पुस्‍तक में आई टिप्‍पणी याद आ जाती है कि- ''इन दिनों बस्तर शब्द में बाजार अंतर्निहित है। (पृष्ठ 326) और ''अब बस्तर शब्द का लेखन की दुनिया में बाजार है।'' (पृष्ठ 337) अखिलेश भरोस द्वारा लिये चित्र का आवरण के लिए चयन, सार्थक और सूझ भरा है।

इन चारों साहित्‍य-पत्रकारिता की रचनाओं को एक साथ मिलाकर देखते हुए धारणा बनती है कि- अशांति और विद्रोह का इतिहास पढ़ते हुए महसूस होता है कि आम तौर शांत, संस्कृति संपन्न, उत्सवधर्मी लेकिन अपने में मशगूल (बस्तर का) वनवासी, अस्तित्व संकट से मुकाबिल होता है तो जंगल कानून पर अधिक भरोसा करता रहा है।

बस्तर और उसकी परिस्थितियों को समाज-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ समझने के लिए (कम से कम) जो प्रकाशन देखना मुझे जरूरी लगता है, वे हैं- डब्ल्यूवी ग्रिग्सन, वेरियर एल्विन, केदारनाथ ठाकुर, प्रवीरचंद्र भंजदेव, लाला जगदलपुरी, डॉं. हीरालाल शुक्ल, डॉ. कृष्‍ण कुमार झा, हरिहर वैष्णव, डॉं. कामता प्रसाद वर्मा की पुस्तकें/लेखन और मार्च 1966 के जगदलपुर गोलीकांड पर जस्टिस केएल पांडेय की रिपोर्ट।

बस्तर को उसकी विशिष्टता के साथ पहचानते हुए, शोध-अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य हैं- छत्तीसगढ़ के पहले मानवविज्ञानी डॉ. इन्द्रजीत सिंह का लखनऊ विश्वविद्यालय से किया गया गोंड जनजाति पर शोध, जो सन 1944 में The Gondwana and the Gonds शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। पुस्तक, बस्तर के जनजातीय जीवन की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ उनके आर्थिक परिप्रेक्ष्य का तटस्थ लेकिन आत्मीय विवरणात्मक दस्तावेज है, जिसका निष्कर्ष कुछ इस तरह है- जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास का कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए, जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति के साथ समझ सकें। इसी प्रकार दूसरा कार्य है, सागर विश्वविद्यालय से किया गया डॉ. पीसी अग्रवाल का शोध Human Geography of Bastar District, जो सन 1968 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ और तीसरा, मध्यप्रदेश राज्य योजना मंडल द्वारा Bastar Development Plan वर्किंग ग्रुप के चेयरमैन आरसी सिंह देव के निर्देशन में सन 1984 में योजना आयोग के लिए तैयार, बस्तर विकास योजना, जिसे देख कर महसूस होता है कि इस प्रतिवेदन के अनुरूप तब इसका उपयुक्त क्रियान्वयन हो पाता तो आज शायद बस्तर कुछ और होता।


यहां आए सभी नामों के प्रति यथायोग्‍य सम्‍मान।

Monday, July 9, 2012

ग्राम-देवता

आस्था के आदिम बिन्दुओं पर सभ्यता का आवरण और संस्कृति का श्रृंगार

मैदानी छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं की मान्यता, वैविध्यपूर्ण संस्कृति के मुख्‍यतः द्रविड़ और निषाद प्रजाति-कुलों की थाती मानी जा सकती है। ग्राम देवता के वर्गीकरण, उपासना-पूजा की पद्धति व संबंधित भाषा-विशिष्टता में हमारी वर्तमान समेकित संस्कृति के मूल घटकों-उपादानों की पहचान हो सकती है। चूंकि ग्राम देवता परंपरागत ढंग से मूलतः जनजातीय समाज और उनके धार्मिक अनुष्ठानों से सम्बद्ध हैं, इसलिये यह सांस्कृतिक बिन्दु अपेक्षाकृत कम मिलावटी है।

आगम स्मृतिसार का कथन है- ''ब्राह्मणानां शिवो देवाः क्षत्रियाणां तु माधवः। वैश्याणां तु भवेद ब्रह्मा, शूद्राणां ग्राम देवताः॥'' यह ग्राम देवताओं के अनार्य परंपरा से जुड़े होने का संकेत मात्र है, किन्तु हमारी संस्कृति की समन्वयात्मक प्रकृति के फलस्वरूप आर्य-अनार्य, लोक-शास्त्र घुल-मिल कर समरस हो गये और ग्राम देवता, संस्कृति संवाहक बनकर, जाति-प्रजाति भेद लांघकर, समष्टि चेतना के अविभाज्य अंग बन गए।

ग्राम देवताओं की मान्यता का स्वरूप स्वाभाविक ही सुसंगठित नहीं होता, क्योंकि आदिम-धर्मों में भी आध्यात्मिकता का बीज अवश्य रहा होगा किन्तु उसमें सुविचारित दार्शनिक पृष्ठभूमि या मोक्ष जैसे उच्चतर विचार शास्त्रजन्य संभावनाएं हैं। धर्म का मूल रूप आस्था और विश्वास का है, परिवर्तन के क्रम में धर्म के मूल घटक तो विद्यमान रहे, किन्तु अपेक्षाकृत जटिल होकर गौण होते गए लेकिन इन आदिम श्रद्धा केन्द्रों- ग्राम देवताओं का स्वरूप परंपरागत मान्यता पर आधारित, सहज और सरल बना रहा। हेनरी वाइटहेड (1921) के अनुसार- ''ग्राम देवताओं का कार्य महामारी और अनिष्ट से गांव की रक्षा करना है, ये ग्राम्य-जीवन के मौलिक तथ्यों के प्रतीक हैं और विश्व के निर्माण-संहार जैसी महत्तर शक्तियों से नहीं जुड़े होते।''

आशुतोष भट्‌टाचार्य (1955) कहते हैं- ''ग्राम देवताओं में व्यक्तिगत उपासना के बजाय सामुदायिक जनजीवन और उपासना में तत्व निहित हैं।'' डॉ. ओपर्ट, डाल्टन और हैविट ने भी इन्हीं विशिष्टताओं का उल्लेख विस्तार से किया है कि ''ग्राम देवताओं की पूजा से गांव माता-महमारी, पशुरोग, अकाल, अग्नि-दुर्घटना, बाढ़, असमय मृत्यु, सर्पदंश, वन्य-पशु आक्रमण की आशंका से मुक्त होकर सम्पन्नता और खुशहाली का जीवन व्यतीत करता है।'' ग्राम देवता खोई हुई वस्तु की प्राप्ति और पशु चोरी का पता करने जैसे दैनंदिन जीवन के तात्कालिक तथा स्पष्ट और सहज लक्ष्य के लिये व्यक्तिगत स्तर पर पूजे जाते हैं।
ग्राम देवता पहाड़, नदी-नाला, तालाब, जंगल, वृक्ष के अतिरिक्त सीमा पर, मार्ग में अथवा ग्राम के मध्य में स्थापित होते हैं। कोल समुदाय के वन्य ग्रामों में वन देवताओं की स्थापना ग्राम से संलग्न वन-खण्ड या अधिकतर शाल वृक्ष समूह में 'सरना' के रूप में की जाती है। सरना अत्यंत पवित्र व जागृत क्षेत्र माना जाता है। ग्राम व क्षेत्र की सामान्य बैठकें, मनोरंजन और पंचायत-निर्णय, देव साक्ष्य की उपस्थिति में, सरना में होता है साथ ही सरना राहगीरों को रात्रि विश्राम के लिए 'शरण' भी देता है।

इस अंचल के प्रत्येक मैदानी गांव का महत्वपूर्ण स्थल ठकुरदिया होता है, जहां गांव के मालिक-देवता, ठाकुरदेव अपने बाहुकों जराही-बराही और कहीं-कहीं परऊ बैगा व अन्य देवों के साथ विराजते हैं। ठाकुरदेव के ही मान्यता-साम्य बड़ादेव या बूढ़ा देव भी है। बूढ़ादेव के साथ बढ़ावन की मान्यता होती है, जो पत्थर की गोल गाटियां है, त्यौहार 'बार' के अवसर पर देव के साथ-साथ 'बढ़ावन' की पूजा होती है, और इसी प्रकार की मान्यता, ठाकुरदेव की स्थापना, शोधन और पुनर्स्थापना के लिए बैगा (ओझा-गुनिया) द्वारा पूर्ण कराई जाती है।

पुरानी बस्ती पर, विशेषकर नदी-नालों के किनारे बसे गांवों में अथवा गांव से संलग्न उजाड़-वीरान टीला, सरना या ठकुरदिया जैसा महत्वपूर्ण, 'डीह' क्षेत्र होता है, जहां देवकुल विद्यमान मानकर उन्हें पूजा जाता है। डीह, डिहवार या डिहारिन देव के रूप में मान्य पवित्रता के कारण, इस क्षेत्र के आसपास शुद्धता, पेड़ काटने की मनाही तथा यहां से गुरजते हुए पागा (पगड़ी) और पनही (जूता) उतार लेने की सावधानी बरती जाती है।
इस अंचल के प्रत्येक गांव में मातृ शक्ति, माताचौरा अथवा महामाया के रूप में विभिन्न नाम-विग्रहों से पूजी जाती है, इनमें शास्त्रीय सप्तमातृकाओं का मूल स्वरूप संभवतः 'सतबहिनियां' है, साथ ही अक्काइसों बहिनी की भी पूजा की जाती है। अन्य क्षेत्रों में जयलाला, बिलासिनी, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासुली, चण्डी का नामोल्लेख सतबहिनियों के रूप मिलता है। इस अंचल में सतबहिनियां को चेचक या सात माता बूढ़ी मां, मटारा, लोहाझार, कथरिया, सिंदुरिया, कोदइया, आलस के नाम से भी पूजा जाता है। सतबहिनियां का स्थान गांव के बाहर अधिकतर नाले, जल स्रोत या जल-प्रवाह के निकट होता है। नदी घाट पर घाटादेई पूजित होती है। महामाया की पूजा नवरात्रि पर जंवारा के रूप में होती है। गौरा की पूजा वार्षिक अनुष्ठान होता है जो जनजातीय समाज में प्रचलित है। गौरा, जंवारा, बार, मड़ई, जगार, जतरा आदि प्राचीन मह या वार्षिक मेले के रूप हैं जो मनौती या विशाल धार्मिक सामूहिक आयोजन है।
परा-शक्ति और ग्रामीणों के बीच की कड़ी बैगा (गुनिया, देवार, सिरहा) है। मान्यता है कि ग्राम देवता, बैगा के माध्यम से संदेश देते हैं। इन्हीं बैगाओं के पूर्व-पुरुष परऊ बैगा, देवता के रूप में पूजे जाते हैं, परऊ बैगा की स्थापना अंचल के अधिकतर मैदानी ग्रामों में अवश्य है। कुछ क्षेत्रों में बैगा की एक अन्य श्रेणी होमदेवा है जैसा कि नाम से स्पष्ट है- होमदेवा, मात्र होम दे सकते हैं, लेकिन देव आह्वान का अधिकार बैगा को ही होता है। बैगाओं में परऊ बैगा और गुरुओं में देगन गुरु जैसी प्रतिष्ठा अन्‍य की नहीं, लेकिन राउतराय, धेनु भगत, बिरतिया बाबा, बीर सुनइता, बीर बयताल, लाला साहब, राय मुण्डादेव, संवरादेव, सौंराइन दाई आदि की भी मान्‍यता है। देव प्रतिष्ठा अर्जित अन्य गुरु हैं- सेत गुरु, सोनू गुरु, संवत गुरु, भुरहा गुरु, बिद गुरु, ढुरु गुरु, अगिया गुरु, जोगिया गुरु, बंधू गुरु, देवा गुरु, बेन्दरवा गुरु, सइजात गुरु, सुंदर गुरु, अकबर गुरु, रहमत गुरु, मांधो गुरु, गुरु धनित्तर। शबर जनजाति (संवरा या सौंरा) इस अंचल में झाड़-फूंक मंत्रों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। धनुहार और बिरहोर आदि जनजातियों में भी मंत्रों का विशेष प्रचलन है। कुछ स्थानों पर इन मंत्रों की विधिवत ज्ञान के लिए प्रशिक्षण केन्द्र होते हैं, जहां प्रत्येक नागपंचमी को दीक्षान्त समारोह होता है, दीक्षित शिष्य ही मंत्र-प्रयोग कर सकने का अधिकारी होता है।
गोंड़ जनजाति के परगनिहा और कुमर्रा देव भी, उनके धर्मगुरू हैं जिन्हें देवता की श्रेणी प्राप्त हैं, और ये समान रूप से ग्राम देवताओं के साथ पूजित होते हैं। नांगा बैगा-बैगिन जैसे प्रचलित देवताओं के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न ग्रामों में विभिन्न बैगा देवताओं की स्थापना ज्ञात होती है, उदाहरणतया- सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजऊ, लतेल, ठंडा बैगा आदि। इसी प्रकार मुनि बाबा, पांडे देव, धुरुआ देव आदि की भी प्रतिष्ठा है। इनमें से कुछ स्थापनाओं के साथ मान्यता है कि इन देवों के चबूतरे पर सर्पदंश पीड़ित व्यक्ति को लिटा देने से या चबूतरे की मिट्‌टी खिलाने से लाभ होता है। सामान्यतया बैगा, जनजातीय समाज अथवा निषाद या कहीं-कहीं यादव जैसी पिछड़ी जाति के होते हैं, किन्तु कहीं सतनामी बैगा भी हैं।

अंचल में पूजित अन्य मुख्‍य देवों में विभिन्न बाबा, यथा- सिद्ध या सीतबावा, बरमबावा, भैरोबावा, मुड़ियाबावा, अघोरीबावा, कलुआबावा आदि हैं। पाट या पाठ देवता अधिकतर वृक्ष देव हैं, जिनमें कुर्रूपाठ, बासिनपाठ, कंवलापाठ, कोइलरपाठ, होइलरपाठ, मोहरिलपाठ, लोढ़िनपाठ, कोहारिनपाठ, सुरसापाठ, सेतरपाठ, लखेसरपाठ, करबा-करबिनपाठ, निरासीपाठ, पठरियापाठ, डूंगरपाठ, बइहारपाठ, सिंहासनपाठ, भंवरपाठ, अंधियारीपाठ, अंजोरीपाठ, बघर्रापाठ, डोंगापाठ, कोटरापाठ, नंगनच्चापाठ आदि हैं। देवियों में बमलई, समलई, महलई, खमदेई कोसगई, सरंगढ़िन, विशेसरी, सत्तीदाई, चण्डीदाई, मावली, कालिका, कंकालिन, सरपिन या पानी गोसाइन आदि भी पूजित होती हैं। कुछ अन्य देवी-देवता हरदेलाल, घोड़ाधार, सांहड़ादेव, सांढ़-सांढ़िन, परातिन, हाड़ादेव, नांगरदेव, चिरकुटी, खूंटदेव, खरकखाम्ह, अखराडांड, धूमनाथ, चितावरी, ठंगहादेव, जैसी विस्तृत सूची है। इनमें कुकुरदेव और बंजारी देवी को बंजारा-नायकों से संबंधित किया जाता है।

ग्राम देवताओं में सभी प्रकार की शुभंकर-अनिष्ट शक्तियां, मृत पूर्व पुरूषों की स्मृति, पुरानी व्यवस्था में ग्राम के प्रभारी दाऊ साहब का प्रतीक स्थान, परगनों अथवा जमींदारियां, रिसायतों के संबंध जैसे- सरंगढ़िन और मार्ग सूचक चिन्ह स्थान ओंगन पाठ, चिथरी दाई, ढेला देव सभी का आत्मीय साहचर्य महसूस किया जाता है। जिला मुख्‍यालय धमतरी के पास करेठा को कुआरी गांव माना जाता है, यहां होलिका दहन नहीं किया जाता और लोग कहते हैं कि यहां ग्राम देवी-देवताओं की शादी नहीं हुई है और इस गांव को कुंआरीडीह भी कहा जाता है। कनिंघम (1882) ने अपने विस्तृत निबंध में इसे दानव या असुर पूजा मान लिया है, किन्तु देवताओं से भयभीत होकर उन्हें सम्मान देने वाला जनमानस, वर्षा के लिए देवता से सहज आत्मीयता के पर्याप्त उदाहरण के रूप में, गोबर या मिट्‌टी लीप-पोत कर, धूप में बाहर निकालकर उसे दण्ड (सजा) भी देता है।

वस्तुतः यही वह बिन्दु है जहां मनुज जाति की व्यापकता से उपजी संस्कृति के सूत्रों का अनुमान होता है। इस बिन्दु पर हम सृष्टि की कोख से उत्पन्न प्रकृति- नदी, पहाड़, जीव-जन्तु, वनस्पति, परा-अपरा से एकाकार, अपने जनजातीय सम्पर्कों में सर्वबंधुत्व का आभास पाते हैं अतः ग्राम देवताओं के माध्यम से जनजातीय संस्कृति की पहचान के लिए विस्तृत और गहन शोध-सर्वेक्षण की आवश्यकता है, जिसमें ग्राम देवता की नामोत्पत्ति, स्थापना का इतिहास, अवस्थिति, भौतिक स्वरूप ज्ञान-मान्य रूप, पूजा का प्रयोजन उद्‌देश्य व अवसर, अन्य देवों से सम्बद्धता, पूजा में प्रयुक्त/निषिद्ध वस्तु के साथ-साथ बैगा-गुनिया परंपरा का समावेश हो ताकि सृष्टि में अपने मूल की तलाश करते हुए, सहोदर प्रकृति से स्वयं तक की सांस्कृतिक अनेकता में एकता का सूत्र पिरोया जा सके। यह ऐसी खोज है, जिसमें लक्ष्य तक न पहुंचने, परिणाम हासिल न होने के बावजूद भी जो मिलता है, वह कम नहीं।
यह लगभग इसी रूप में रावत नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर की
वार्षिक पत्रिका 'मड़ई' सन 1999 में प्रकाशित हुआ है।
अपनी पिछली पोस्ट 'ठाकुरदेव' में जैसा उल्लेख किया है, छत्तीसगढ़ के ग्राम-देवताओं की जानकारी, शौकिया व अनियमित तौर पर पिछले लगभग 30 वर्षों से जुटा रहा हूं। इसकी शुरुआत सहज जिज्ञासा से हुई और यह हरि अनंत ... साबित हुआ है, लेकिन एक स्थिति में कुछ अन्‍य बातों सहित यह स्‍पष्‍ट हुआ कि आदिम समाज में बैगा, व्‍यक्ति और पूरे समाज के कायिक-मानसिक विकास के लिए उत्‍तरदायी रहे हैं, जो कार्य ब्राह्मणों के जिम्‍मे बंटा या जैसा प्रयास इसाई मशिनरियों ने किया। कायिक-मानसिक का तात्‍पर्य, स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा से है। बैगा, झाड़-फूंक से 'कायिक' रोग-व्‍याधि दूर करते रहे हैं वहीं मंत्रों और देव स्‍थानों की पूजा-अनुष्‍ठान से अपनी परम्‍परा में 'मानसिक' शिक्षित-दीक्षित करते रहे हैं।
यहां मुख्‍यतः मध्य-मैदानी छत्तीसगढ़ में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर चर्चा है। इसमें उत्तरी छत्तीसगढ़-सरगुजा और दक्षिणी छत्तीसगढ़-बस्तर के संदर्भ न के बराबर हैं। इसी तरह महाराष्ट्र से लगे पश्चिम सीमावर्ती छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमा के पूर्वी छत्तीसगढ़ के हवाले यहां कम ही हैं।
ग्राम-देवता स्‍थलों के चित्र अकलतरा के हैं।



  • यह पोस्‍ट रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'इतवारी अखबार' के 19 अगस्‍त 2012 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, July 3, 2012

ठाकुरदेव

ग्राम देवताओं के थान पर माथा टेकने निकला तो सबसे पहले सुमिरन किया देवाधिदेव ठाकुरदेव का। ग्राम देवताओं में सर्वाधिक शक्तिशाली-प्रभावशाली माने गये हैं, ठाकुरदेव। बस्ती के एक सिरे पर इनकी स्थापना है, लक्खी तालाब के किनारे। गांव पर आने वाली विपत्तियों, विघ्न-बाधाओं का रास्ता रोके, ठाकुरदेव बस्ती की सीमा पर घोड़ाधार व हरदेलाल, दो अन्य देवताओं के साथ एक चबूतरे में माने-पूजे जाते हैं। पहले कोई भी यहां से जूता पहने या वाहन पर सवार होकर नहीं गुजरता था और किसी प्रकार से इस थान का परोक्ष अपमान करने से भी प्रत्येक ग्रामवासी या ग्राम में प्रवेश करने वाला बचता था।
ग्राम देवताओं में प्रमुख, गांव के मालिक-देवता, ठाकुरदेव का बड़ा-सा सफेद बकरा दिखाई पड़ता है, भोले बाबा के गंभीर लेकिन अलमस्‍त नंदी की तरह। ठाकुरदेव पर बलि नहीं दी जाती बल्कि उनकी पूजा कर, सफेद बकरा यूं ही छोड़ दिया जाता है। बकरे व अन्य सभी सामान्य पूजा की व्यवस्था गांव के गौंटिया/प्रमुख करते हैं और बैगा के माध्यम से पूजा सम्पन्न होती है। सामने ही ठाकुराइन दाई स्थित है जो अपेक्षाकृत नयी स्थापना है। पहले किसी घर में इनका वास था, किन्तु बैगा ने पूजा-पाठ कर इन्हें यहां उपयुक्त स्थान में स्थापित कर दिया है।

पर्री तालाब के पार में चबूतरे पर पत्थर का एक स्थापत्य खंड और त्रिशूल गड़ा है यहां अघोरी बाबा और कालिका देवी की स्थापना हैं, जाति और प्रयोजन-विशेष के ये देवता आमजन द्वारा पूजित नहीं हैं, किन्तु अन्य देवताओं की भांति होली, छेरछेरा, हरेली में इनकी पूजा बैगा करता है, दशहरा के दिन विशेसरी या विश्वेश्वरी देवी का ध्वज-स्तंभ यहां लाकर गाड़ा जाता है, ये देवता पूजा में होम, फूल, दूब के साथ शराब व बकरा भी लेते हैं।

बस्ती के बीच तीन देवी-देवता पास-पास ही स्थापित है- सत्ती दाई, परऊ बैगा और मुड़िया बाबा। इनमें सत्ती दाई, पुराने समय की सती हुई कोई स्त्री का स्थान है, जहां पत्थर मिट्‌टी का चबूतरा है। परऊ बैगा को प्राचीन, अत्यंत शक्तिशाली और प्रसिद्ध बैगा बताया जाता है, जो ईंटों के छोटे से चबूतरे पर किसी प्राचीन मूर्ति-खंड व अन्य अनगढ़ पत्थर के टुकड़े के रूप में हैं। मुड़िया बाबा के रूप में पीपल के वृक्ष के नीचे चबूतरे पर रखा कलश के आकार का पाषाण खंड और लकड़ी की गदा हैं। विवाह के अवसर पर महिलाएं देवतल्ला में ठाकुरेदव, घोड़ाधार, हरदेलाल, ठकुराइन दाई, विशेसरी के साथ इन तीनों पर भी हल्दी चढ़ाती हैं; बाकी ठौर पर बैगा जाया करता है।
अन्य देवताओं में मुख्‍यतः रामसागर तालाब के पार की महामाई है, जहां अब मंदिर बन गया है। होली जलने के दिन और चैत की नवरात्रि में इनकी विशेष पूजा होती है। यहां पूजा में बकरे के अलावा रेशमी चूड़ी, सिन्दूर आदि भी चढ़ाया जाता है। इसी के पीछे कुर्रूपाठ देवता है, जिनका अस्तित्व अब लगभग लुप्त हो चुका है। पालतू मवेशियों को रोग-बीमारी हो तो बघर्रा पाठ की पूजा की जाती है। चेचक होने पर शीतला माता की और हैजा के समय चण्डी दाई की पूजा होती है।
गांव के एक छोर पर गोपिया तालाब के किनारे अधियारी पाठ है। ठाकुरदेव आपत-विपत पड़ने पर अपने सफेद घोड़े पर सवार हो, यहां तक आया करते हैं और ग्राम-प्रमुख, बैगा आदि को भी सूचना दिया करते हैं। इनके घोड़े की टाप सुनने की बात कितने ही ग्रामवासी विश्वासपूर्वक बताते हैं। अंधियारी पाठ भी ग्राम सीमा के देवता है। अर्थात गांव में किसी भी प्रकार के अशुभ को प्रवेश नहीं करने देते।
दाऊ साहब को गोंड़ों-नायकों का देवता बताया जाता है। सीवाने के दो अन्य देवता हैं- डंगरादाई और ओंगनपाठ। डंगरादाई को सबसे पहले विशेष रूप से तब पूजा जाता है, जब कोई व्यक्ति मवेशी खरीदकर यहां से गुजरता है। वैसे डंगरदाई की मूर्ति किसी प्राचीन मंदिर के द्वारपाल की है जिस पर सिन्दूर लगा है और उसे परिधान से ढक दिया गया है। ओंगनपाठ देवता का अस्तित्व सामान्यतः सीवाने पर ही हुआ करता है और यहां से जो भी वाहन वाला- गड़हा निकलता है, देवता पर थोड़ा सा ओंगन तेल चढ़ा देता है, ताकि उसकी यात्रा निर्विघ्‍न हो।

लगभग पूरे गांव का चक्कर लगाकर मैं वापस आता हूं, और पुनः नमन करता हूं उस सहज-सरल, आदिम-आस्था को और आस्था के केन्द्र बिन्दु व सांस्कृतिक-धार्मिक समन्वय के प्रतीक ग्राम देवताओं को।

छत्तीसगढ़ के ग्राम-देवताओं की जानकारी, शौकिया व अनियमित तौर पर, जुटाने का सिलसिला तीसेक साल पुराना है। अकलतरा के तीन निखाद बइगा- मेरे लिए गुरुतुल्य बहादुर, भगोली और मुड़पटका (ऐसे ही नाम पुकारे जाते और इसी तरह याद है) और नंदू मुनीमजी कहे जाने वाले गंवई-गूगल जैसे श्री नंदकुमार सिंह से पूछताछ करते इसकी शुरुआत हुई, तब अपने गांव के 25 से भी अधिक ग्राम-देवताओं और उनसे जुड़ी परम्पराओं के बारे में कुछ जान पाया, और यही आरंभिक जानकारी बाद में अन्य इलाकों में पूछताछ के लिए, संवाद स्थापित करने में सहायक होती रही।

(यहां इस्‍तेमाल कुछ तस्‍वीरें, श्री यशोदा ने भेजी हैं।)