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Monday, January 30, 2012

पुरातत्व सर्वेक्षण

''शहरीकरण और जनसंख्‍या के विस्‍तार के दबावों से देश भर में हमारे ऐतिहासिक स्‍मारकों के लिए खतरा पैदा हो गया है।'' ... ''पुरातत्‍व विज्ञान हमारे भूतकाल को वर्तमान से जोड़ता है और भविष्‍य के लिए हमारी यात्रा को परिभाषित करता है। इसके लिए दूर दृष्टि, उद्देश्‍य के प्रति निष्‍ठा और विभिन्‍न सम्‍बद्ध पक्षों के सम्मिलित प्रयासों की आवश्‍यकता होगी। मुझे उम्‍मीद है कि आप इस महत्‍वपूर्ण प्रयास के दायित्‍व को संभालेंगे।'' प्रधानमंत्री जी ने 20 दिसंबर को नई दिल्‍ली में आयोजित भारतीय पुरातत्‍तव सर्वेक्षण की 150वीं वर्षगांठ समारोह में यह कहा है। इस दौर में मैंने 'पुरातत्‍व', 'सर्वेक्षण' शब्‍दों पर सोचा-

पुरातत्‍व
आमतौर पर पिकनिक, घूमने-फिरने, पर्यटन के लिए पुरातात्विक स्मारक-मंदिर देखने का कार्यक्रम बनता है और कोई गाइड नहीं मिलता, न ही स्थल पर जानकारी देने वाला। ऐसी स्थिति का सामना किए आशंकाग्रस्त लोग, पुरातत्व से संबंधित होने के कारण साथ चलने का प्रस्ताव रखते हुए कहते हैं कि जानकार के बिना ऐसी जगहों पर जाना निरर्थक है, लेकिन ऐसा भी होता है कि किसी जानकार के साथ होने पर आप अनजाने-अनचाहे, उसी के नजरिए से चीजों को देखने लगते हैं। अवसर बने और कोई जानकार, विशेषज्ञ या गाइड का साथ न हो तो कुछ टिप्स आजमाएं-

मानें कि प्राचीन मंदिर देखने जा रहे हैं। गंतव्य पर पहुंचते हुए समझने का प्रयास करें कि स्थल चयन के क्या कारण रहे होंगे, पानी उपलब्धता, नदी-नाला, पत्थर उपलब्धता, प्राचीन पहुंच मार्ग? आसपास बस्ती-आबादी और इसके साथ स्थल से जुड़ी दंतकथाएं, मान्यताएं, जो कई बार विशेषज्ञ से नजरअंदाज हो जाती हैं। स्थल अब वीरान हो तो उसके संभावित कारण जानने-अनुमान करने का प्रयास करें। यह जानना भी रोचक होता है कि किसी स्थान का पहले-पहल पता कैसे चला, उसकी महत्ता कैसे बनी।

काल, शैली और राजवंश की जानकारी तब अधिक उपयोगी होती है, जब इसका इस्तेमाल तुलना और विवेचना के लिए हो, अन्यथा यह रटी-रटाई सुनने और दूसरे को बताने तक ही सीमित रह जाती है। प्राचीन स्मारकों के प्रति दृष्टिकोण 'खंडहर' वाला हो तो निराशा होती है, लेकिन उसे बचे, सुरक्षित रह गए प्राचीन कलावशेष, उपलब्ध प्रमाण की तरह देखें तो वही आकर्षक और रोचक लगता है। मौके पर अत्‍यधिक श्रद्धापूर्वक जाना, 'दर्शन' करने जैसा हो जाता है, इसमें देखना छूट जाता है और अपने देख चुके स्‍थानों की सूची में वह जुड़ बस जाता है, मानों ''अपने तो हो गए चारों धाम''।

मंदिर, आस्‍था केन्‍द्र तो है ही, उसमें अध्‍यात्‍म-दर्शन की कलात्‍मक अभिव्‍यक्ति के साथ वास्‍तु-तकनीक का अनूठा समन्‍वय होता है। मंदिर स्थापत्य को मुख्‍यतः किसी अन्य भवन की तरह, योजना (plan) और उत्सेध (elevation), में देखा जाता है। मंदिर की योजना में सामान्य रूप से मुख्‍यतः भक्‍तों के लिए 'मंडप' और भगवान के लिए 'गर्भगृह' होता है। उत्सेध में जगती या चबूतरा, उसके ऊपर पीठ और अधिष्ठान/वेदिबंध, जिस पर गर्भगृह की मूल प्रतिमा स्थापित होती है, फिर दीवारें-जंघा और उस पर छत-शिखर होता है। सामान्यतः संरचना की बाहरी दीवार पर और गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर प्रतिमाएं होती हैं, कहीं शिलालेख और पूजित मंदिरों में ताम्रपत्र, हस्‍तलिखित पोथियां भी होती हैं।

सामान्यतः मंदिर पूर्वाभिमुख और प्रणाल (जल निकास की नाली) लगभग अनिवार्यतः उत्‍तर में होता है। मंदिर की जंघा पर दक्षिण व उत्तर में मध्य स्थान मुख्‍य देवता की विग्रह मूर्तियां होती हैं और पश्चिम में सप्ताश्व रथ पर आरूढ़, उपानह (घुटने तक जूता), कवच, पद्‌मधारी सूर्य की प्रतिमा होती है। दिशाओं/कोणों पर पूर्व-गजवाहन इन्द्र, आग्नेय-मेषवाहन अग्नि, दक्षिण-महिषवाहन यम, नैऋत्य-शववाहन निऋति, पश्चिम-मीन/मकरवाहन वरुण, वायव्य-हरिणवाहन वायु, उत्तर-नरवाहन कुबेर, ईशान-नंदीवाहन ईश, दिक्पाल प्रतिमाएं होती हैं। मूर्तियों की पहचान के लिए उनके वाहन-आयुध पर ध्यान दें तो आमतौर पर मुश्किल नहीं होती। यह भी कि प्राचीन प्रतिमाओं में नारी-पुरुष का भेद स्तन से ही संभव होता है, क्योंकि दोनों के वस्त्राभूषण में कोई फर्क नहीं होता।

विष्णु की प्रतिमा शंख, चक्र, गदा, पद्‌मधारी और गरुड़ वाहन होती है। उनके अवतारों में अधिक लोकप्रिय प्रतिमाएं वराह, नृसिंह, वामन आदि अपने रूप से आसानी से पहचानी जाती हैं। जिस तरह गणेश और हनुमान की पहचान सहज होती है। शिव सामान्‍यतः जटा मुकुट, नंदी और त्रिशूल, डमरू, नाग, खप्पर, सहित होते हैं। ब्रह्मा, श्मश्रुल (दाढ़ी-मूंछ युक्त), चतुर्मुखी, पोथी, श्रुवा, अक्षमाल, कमंडलु धारण किए, हंस वाहन होते हैं। कार्तिकेय को मयूर वाहन, त्रिशिखी और षटमुखी, शूलधारी, गले में बघनखा धारण किए दिखाया जाता है। दुर्गा-पार्वती, महिषमर्दिनी सिंहवाहिनी होती हैं तो गौरी के साथ पंचाग्नि, शिवलिंग और वाहन गोधा प्रदर्शित होता है। सरस्वती, वीणापाणि, पुस्तक लिए, हंसवाहिनी हैं। लक्ष्मी को पद्‌मासना, गजाभिषिक्त प्रदर्शित किया जाता है।

जैन प्रतिमाएं, कायोत्सर्ग यानि समपाद स्थानक मुद्रा में (एकदम सीधे खड़ी) अथवा पद्‌मासनस्थ/पर्यंकासन में सिंहासन, चंवर, प्रभामंडल, छत्र, अशोक वृक्ष आदि सहित, किन्‍तु मुख्‍य प्रतिमा अलंकरणरहित होती हैं। तीर्थंकर प्रतिमाओं में ऋषभदेव/आदिनाथ-वृषभ लांछनयुक्त व स्कंध पर केशराशि, अजितनाथ-गज लांछन, संभवनाथ-अश्व, चन्द्रप्रभु-चन्द्रमा, शांतिनाथ-मृग, पार्श्वनाथ-नाग लांछन और शीर्ष पर सप्तफण छत्र तथा महावीर-सिंह लांछन, प्रमुख हैं। तीर्थंकरों के अलावा ऋषभनाथ के पुत्र, बाहुबलि की प्रतिमा प्रसिद्ध है। जैन प्रतिमाओं को दिगम्बर (वस्त्राभूषण रहित) तथा उनके वक्ष मध्य में श्रीवत्स चिह्न से पहचानने में आसानी होती है।

आसनस्थ बुद्ध, भूमिस्पर्श मुद्रा या अन्य स्थानक प्रतिमाओं जैसे अभय, धर्मचक्रप्रवर्तन, वितर्क आदि मुद्रा में प्रदर्शित होते हैं। अन्य पुरुष प्रतिमाओं में पंचध्यानी बुद्ध के स्वरूप बोधिसत्व, अधिकतर पद्‌मपाणि अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि और खड्‌ग-पोथी धारण किए मंजुश्री हैं और नारी प्रतिमा, उग्र किन्तु मुक्तिदात्री वरदमुद्रा, पद्‌मधारिणी तारा होती हैं। कुंचित केश के अलावा बौद्ध प्रतिमाओं की जैन प्रतिमाओं से अलग पहचान में उनका श्रीवत्सरहित और मस्तक पर शिरोभूषा में लघु प्रतिमा होना सहायक होता है।

मंदिर गर्भगृह प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्व उर्ध्वाधर स्तंभों पर रूपशाखा की मिथुन मूर्तियों सहित द्वारपाल प्रतिमाएं व मकरवाहिनी गंगा और कच्छपवाहिनी यमुना होती हैं। द्वार के क्षैतिज सिरदल के मध्य ललाट बिंब पर गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का ही विग्रह होता है। लेकिन पांचवीं-छठीं सदी के आरंभिक मंदिरों में लक्ष्मी और चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी से इस स्थान पर गणेश की प्रतिमा बनने लगी तथा इस स्थापत्य अंग का नाम ही गणेश पट्टी हो गया। यहीं अधिकतर ब्रह्मा-विष्णु-महेश, त्रिदेव और नवग्रह, सप्तमातृकाएं स्थापित होती हैं। आशय होता है कि गर्भगृह में प्रवेश करते, ध्‍यान मुख्‍य देवता पर केन्द्रित होते ही सभी ग्रह-देव अनुकूल हो जाते हैं, गंगा-यमुना शुद्ध कर देती हैं। यहीं कल्‍प-वृक्ष अंकन होता है यानि अन्‍य सभी लौकिक आकांक्षाओं से आगे बढ़ने पर गर्भगृह में प्रवेश होता है और देव-दर्शन उपरांत बाहर आना, नये जन्‍म की तरह है।
पाली, छत्‍तीसगढ़ का मंदिर और बाहरी दीवार पर मिथुन प्रतिमाएं
यह जिक्र भी कि पुरातत्व का तात्पर्य मात्र उत्खनन नहीं और न ही पुराविद वह है जिसका काम सिर्फ रहस्यमयी गुफा या सुरंग के खोज अभियान में जुटा रहना है। यह भी कि उत्‍खनन कोरी संभावना के चलते नहीं किया जाता, बल्कि ठोस तार्किक आधार और धरातल पर मिलने वाली सामग्री, दिखने वाले लक्षण के आधार पर, आवश्‍यक होने पर ही किया जाता है। बात काल और शैली की, तो सबसे प्रचलित शब्द हैं- 'बुद्धकालीन' और 'खजुराहो शैली', इस झंझट में अनावश्यक न पड़ें, क्योंकि वैसे भी बुद्धकाल (छठीं सदी इस्वी पूर्व) की कोई प्रतिमा नहीं मिलती और खजुराहो नामक कोई शैली नहीं है, और इसका आशय मिथुन मूर्तियों से है, तो ऐसी कलाकृतियां कमोबेश लगभग प्रत्येक प्राचीन मंदिर में होती हैं।
भोरमदेव, छत्‍तीसगढ़ का मंदिर और बाहरी दीवार पर मिथुन प्रतिमाएं
आम जबान पर एक अन्‍य शब्‍द कार्बन-14 डेटिंग होता है, वस्‍तुतः यह काल निर्धारण की निरपेक्ष विधि है, लेकिन इससे सिर्फ जैविक अवशेषों का तिथि निर्धारण, सटीक नहीं, कुछ अंतर सहित ही संभव होता है तथा यह विधि ऐतिहासिक अवशेषों के लिए सामान्‍यतः उपयोगी नहीं होती या कहें कि किसी मंदिर, मूर्ति या ज्‍यादातर पुरावशेषों के काल-निर्धारण में यह विधि प्रयुक्‍त नहीं होती, बल्कि सापेक्ष विधि ही कारगर होती है, अपनाई जाती है।

किसी स्‍मारक/स्‍थल के खंडहर हो जाने के पीछे कारण आग, बाढ़, भूकंप या आतताई आक्रमण-विधर्मियों की करतूत ही जरूरी नहीं, बल्कि ऐसा अक्‍सर स्‍वाभाविक और शनैः-शनैः होता है और कभी समय के साथ उपेक्षा, उदासीनता, व्‍यक्तिगत प्राथमिकताओं के कारण भी होता है। वैसे भी पुरातत्‍व अनुशासन में प्रशिक्षित के ध्‍यान और प्राथमिकता में वह होता है, जो शेष है, जो बच गया है, न कि वह जो नष्‍ट हो गया है। स्‍थापत्‍य खंड, मूर्तियों या शिलालेख का उपयोग आम पत्‍थर की तरह कर लिये जाने के ढेरों उदाहरण मिलते हैं और एक ही मूल के लेकिन अलग-अलग पंथों के मतभेद के चलते भी कम तोड़-फोड़ नहीं हुई है। स्‍वयं सहित कुछ परिचितों के पैतृक निवास की वर्तमान दशा पर ध्‍यान दें, वीरान हो गए गांव भी ऐसे तार्किक अनुमान के लिए उदाहरण बनते हैं। ऐसे उदाहरण भी याद करें, जिनमें आबाद भवन धराशायी हो गए हैं, मंदिर के खंडहर बन जाने के पीछे भी अक्‍सर ऐसी ही कोई बात होती है।

सर्वेक्षण
पुरातत्व के रोमांच को पुरातत्व का रोमांस बनते देर नहीं लगती। आपसी जान-पहचानी और वेब-परिचितों ने कई बार सुझाया कि इस पर भी कुछ बातें होनी चाहिए। अपने पुरातत्वीय सरकारी कार्य-दायित्‍व में ग्राम-विशेष, क्षेत्र-विशेष, ग्रामवार सर्वेक्षण के लिए सैकड़ों गांवों में जाने का अवसर मिला, स्वाभाविक ही अधिकतर में पहली बार और एकमात्र बार भी। लगा कि सर्वेक्षण भी ऐसा मामला है, कि हम किसी भी क्षेत्र, काम में हों, किसी न किसी रूप में हमें ऐसी खोज-बीन में जुटना पड़ता है। पुरातत्वीय सर्वेक्षण के लिए जो सुना-सीखा, जो गुना-बूझा वही अब समझाइश देने के काम आता है और यहां आपसे बांटने के भी।

सर्वेक्षण वाले क्षेत्र के राजस्व अधिकारी (कलेक्टर/एसडीएम/तहसीलदार), पुलिस अधिकारी (एसपी/एसडीओपी-टीआई/थाना प्रभारी) तथा यदि वन क्षेत्र हो तो वन विभाग के अधिकारी (डीएफओ/एसडीओ/रेंजर) को यथासंभव पत्र लिखकर या व्यक्तिगत संपर्क कर जानकारी एवं सहयोग प्राप्त करना आवश्यक होता है, इस क्रम में सर्वेक्षण वाले क्षेत्र का मजमूली नक्शा जिला/तहसील से प्राप्त कर लेना चाहिए। सर्वेक्षण में जाने से पहले, सर्वे आफ इंडिया के उस क्षेत्र के नक्शे, टोपो-शीट का अच्छी तरह अध्ययन कर लेना उपयोगी होता है। साथ ही सर्वेक्षण किए जाने वाले क्षेत्र के पूर्व सर्वेक्षित एवं ज्ञात स्थलों/संबंधित तथ्य तथा विभिन्न कार्यालयों/व्यक्तियों से आरंभिक जानकारी एकत्र करना आवश्यक होता है।

ग्राम-नाम, नाम का आधार, नाम-व्युत्पत्ति आदि के अनुमान और जानकारी से महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं, इस हेतु सजग रहना फायदेमंद होता है। ग्राम में नदी-नालों के घाट, महामाया, सती, सीतला, ठाकुर देव, बूढ़ा देव, बीर, थान, चौंरा जैसे ग्राम देवता स्‍थल, चौक-चौराहों, गुड़ी आदि स्थानों पर पुरातात्विक सामग्री मिलने की संभावना होती है। इसी प्रकार किला, गढ़, खइया, पुराने तालाब, डीह-टीला आदि की जानकारी के साथ पुरातात्विक स्थलों का संकेत मिलता है। नदी-नाले का उद्‌गम, संगम और अन्य जल-स्रोत पवित्र माने जाते हैं सो उनके निकट प्राचीन अवशेष प्राप्त होने की संभावना होती है। पुराने, अब कम प्रचलित मार्ग, शार्ट-कट रास्तों की जानकारी सहायक और कई बार उपयोगी होती है।

सर्वेक्षण के दौरान स्‍थानीय जनप्रतिनिधि- पंच, सरपंच आदि, शासकीय कर्मचारी- शिक्षक, पटवारी, कोटवार आदि तथा विभिन्न समाज के मुखिया, वरिष्ठ नागरिक, ओझा-बइगा-गुनिया महत्वपूर्ण सूचक होते हैं, इनसे संपर्क कर सहयोग प्राप्त करना तथा अच्छे सहयोगी सूचकों का नाम, यदि हो तो मोबाईल नम्बर सहित, स्थायी संदर्भ के लिए भी दर्ज करना चाहिए। ध्यान रहे कि अबोध मान लिए जाने वाले बच्चे भी अच्छे सूचक होते हैं। हरेक गांव की अपनी विरासत, मान्‍यताओं और विश्‍वास से जुड़ी गौरव-गाथा होती ही है, उसके श्रोता-सहभागी बनें और इस दौरान, 'आपके गांव की खासियत क्‍या है?' जैसे सवाल का दो तरह से असर होता है, एक तो सवाल में छिपी चुनौती स्‍वीकार कर जवाब में अक्‍सर काम की जानकारियां मिल जाती हैं और साथ ही ग्रामवासी पुरावशेषों, विशिष्‍टता की ओर अधिक ध्‍यान देने लगते हैं।

यह भी ध्यान रहे कि जो जानकारी मौके पर सहज उपलब्ध होती है, वही वापस लौट आने पर पुनः एकत्र करने के लिए विशेष प्रयास करना होता है। अतएव सर्वेक्षण के दौरान मौके पर सजग रहते हुए अधिकतम सूचनाएं एकत्र कर, दर्ज कर लेनी चाहिए। ऐसी जानकारियां जो सर्वेक्षण के दौरान बहुत आवश्यक नहीं लगती हों, संभव हो तो उन्हें भी लिख कर रखना, काम का होता है। स्थानीय सूचकों द्वारा महत्वपूर्ण बताई गई प्राथमिक सूचना अगर काम की न निकले, तो भी इसका उल्लेख अवश्य होना चाहिए, जैसे अक्सर गुफा या कई बार नक्काशी वाला बताया जाने वाला पत्थर, पुरातात्विक महत्व का नहीं, मात्र प्राकृतिक होता है, यानि संभावित सूचना या स्थान पर वांछित न मिलने पर इसका तथ्यात्मक विवरण, ऐसा उल्लेख भी आवश्यक है, क्योंकि यह आपके बाद के लोगों के लिए मददगार होता है।

सर्वेक्षण के दौरान आवश्यकतानुसार क्षेत्र की वीडियोग्राफी, छायाचित्र तथा पुरावशेष/कलाकृति का माप (आकार- लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई) आवश्यक होता है। स्‍थल पर विवेचना या निष्‍कर्ष पर पहुंचने के प्रयास की तुलना में यह अधिक जरूरी होता है कि वस्‍तु का विवरण अच्‍छी तरह, आवश्‍यकतानुसार नजरी नकल-नक्‍शा सहित, तैयार कर लिया जाए। स्थल, पुरावशेष का स्थानीय नाम लिख कर रखना और यह जानकारी बाद के लोगों के वहां तक पहुंचने के साथ-साथ, स्थानीय परम्पराओं को समझने में भी सहायक होता है।

मौके पर बातचीत के दौरान इर्द-गिर्द, अपने अगले पड़ाव की जानकारी ले ली जानी चाहिए। काम के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूरे दिन, नौ-दस घंटे का समय निकालना चाहिए। आवश्यकतानुसार सर्वेक्षण में जाने के पूर्व तथा सर्वेक्षण के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों/विषय व क्षेत्र के जानकारों से संपर्क कर सुझाव लेना सहायक होता है। कच्चे नोट्‌स मौके पर तुरंत, फिर शाम को लौटने पर उसी दिन व्‍यवस्थित कर लेना और उसका अंतिम स्वरूप, सर्वेक्षण सत्र के बाद, सप्ताह भर में तैयार कर लेना जरूरी होता है।

अध्‍ययन की क्रमिक-तार्किक प्रक्रिया, अवलोकन-विवरण यानि पोस्‍ट का दूसरा हिस्‍सा 'सर्वेक्षण' तथा विश्‍लेषण-व्‍याख्‍या/निष्‍कर्ष की तरह यहां पहला भाग 'पुरातत्‍व', उपशीर्षक अंतर्गत प्रस्‍तुत किया गया है। इस पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के लिए मेरी अपेक्षा है कि कोई सुझाव हो तो अवश्‍य लिखें, अन्‍यथा फौरी टिप्‍पणी के बजाय इसे बुकमार्क कर रख लें और जब ऐसे किसी प्रवास पर जाएं तो इन बातों को आजमा कर देखें, बस... हां, इसके बाद पोस्‍ट की प्रशंसा अथवा आलोचना की मिली टिप्‍पणी को समभाव से आदर सहित स्‍वीकार कर, बेहतर बनाने के लिए इसमें आवश्‍यकतानुसार संशोधन कर लूंगा।

इस पोस्‍ट का 'पुरातत्‍व' वाला हिस्‍सा उदंती.com के 21 अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित किया गया है।

Monday, January 23, 2012

मल्हार

विन्ध्य और सतपुड़ा का संगम और इसके बीचों-बीच मेकल का गर्वोन्नत शिखर। मेकल के पादतल पर छत्तीसगढ़ का खुला और विस्तृत मैदान। महानदी, शिवनाथ के जल-प्रवाह से सिंचित होकर इस मैदान में विकसित हुआ है सभ्यता का वह शिशु, जो आदिम जनजातियों में सांस लेता है, जन-जन में धड़कता है और पुराने अवशेषों में आंखें खोल कर मानों अपनी निश्छल और मासूम हंसी बिखेर देता है, तब छत्तीसगढ़ का यह धान का कटोरा लबालब भर जाता है सम्पन्नता से और जिसकी सौम्यता, आभूषण बन अपनी चमक से स्वाभाविक ही आकर्षित करती है।

देवालयों के खण्डहर, टूटी-फूटी मूर्तियां, पत्थर और तांबे पर कुरेदे अजीब अक्षर, पकी मिट्‌टी के खिलौने-ठीकरे और सोने, चांदी, तांबे के सिक्के। ढेरों तरह के अवशेष और न जाने कितने पुराने। पर हैं पुराने जरूर। किसी की नजर पड़ती है और वह तय कर लेता है काल का अंतर और अंतर इतना साफ है कि अवशेष मानव निर्मित होंगे, मानने का मन नहीं होता। शायद यह सब कुछ परमात्मा ने ही गढ़ा है। कोई राजा, महाप्रतापी और बहुत पुराना तो जरूर रहा होगा। शायद उसने सिरजा हो यह सब, वह भी सतजुग में-
रइया के सिरजे रइया रतनपुर,
राजा बेनू के सिरजे मलार।

कौन है बेनू राजा, गायक देवार भी नहीं जानता, लेकिन गाता है। इतिहास से अधिक जीवंत लोक-जीवन की साम-वाणी। इतिहास, और खासकर पुरातत्व तो अंधेरे में चलाया तीर है, निशाने पर लगा तो लगा नहीं तो तुक्का? जितना कुछ मिला, खोजा उतना इतिहासकार ने हमें बताया, बाकी जिज्ञासा शांत करने का जवाबदार तो वह नहीं है। इसीलिए देवार कवि-गायक का स्वर फूटता है या कोई साहित्यकार लिख जाता है-
गजानन अंबिका की गोद में सानंद रहते हैं।
करे कल्याण जो जन का उन्हें केदार कहते हैं॥
करे जो देवि को शोभित उसे श्रृंगार कहते हैं।
करे हर मन को जो मोहित उसे मल्हार कहते हैं॥

हमारा इतिहास इसी तरह मिथक दंतकथाओं से जीवंत रहा है और हमारे सामाजिक परिवेश हमारी चेतना में, धर्म-संस्कृति से मिलकर एकरूप सपाट बुनावट कस जाती है कि उनके ताने-बाने को देख पाना सरल नहीं है, यही हमारी मानसिकता की उदार, संतुलित, वृहत्तर संसार की पृष्ठभूमि बनती है।

मल्हार, मलार और मल्लालपत्तन; नाम तीन, लेकिन स्थान एक ही, बिलासपुर से 33 किलोमीटर दूर, मस्तूरी-जोंधरा मार्ग पर मामूली सा कस्बा है यह। किन्तु पुरानी कला-संस्कृति के प्रमाण और काल का विस्तार मानों मल्हार के सीमित दायरे में ही सिमट आया है, काल और कला का इतना सघन विस्तार अन्यत्र दुर्लभ है। राह चलते यहां आपसे कोई ठीकरा या प्रतिमा खंड ठोकर खाकर लुढ़क सकता है, ऐसा टुकड़ा जो समृद्धि-गौरव से गुरु-गंभीर मौन हो और अपने किसी आत्मीय पुराविद को पाकर यकायक मुखर हो उठे।

मल्हार और आसपास के वर्तमान गांव- चकरबेढ़ा, बेटरी, जुनवानी, नेवारी, जैतपुर, बूढ़ीखार; शायद यह पूरा क्षेत्र पहले विशाल नगर का हिस्सा रहा होगा। वर्तमान जैतपुर और बेटरी गांव लीलागर नदी के किनारे हैं यानि मल्हार पूर्व में लीलागर, पश्चिम में कुछ दूरी पर अरपा और दक्षिण में कुछ और दूर शिवनाथ नदी, इस सलिला-त्रयी की गोद में है। तालाब भी कोई पांच-पचीस नहीं 'छै आगर छै कोरी' यानि पूरे एक सौ छब्‍बीस।

मलार का मल्हार नाम परिवर्तन तो हाल के वर्षों में हुआ, शायद अधिक ललित और साहित्यिक नाम के रूप में सुधारने की कोशिश में ऐसा हुआ। यद्यपि मूल स्थान नाम मलार, मल्लालपत्तन से सीधे व्युत्पन्न है। स्थान नाम का पत्तन शब्द महत्वपूर्ण है, पत्तन यानि बाजार-हाट या गोदी। पुराविदों का मत है कि मल्हार कभी प्रशासनिक मुख्‍यालय या राजधानी रहा हो, ऐसा पुष्ट प्रमाण नाममात्र को मिलता है, किन्तु धर्म, कला, व्यवसाय का महत्वपूर्ण केन्द्र जरूर रहा है। जलमार्ग से होने वाले व्यापारिक आवागमन की दृष्टि से मल्हार में आज भी केंवट-मल्लाहों का बाहुल्य है और केंवट आबादी के क्षेत्र भसर्री में पुराने अवशेषों की भरमार है, यहां घर की नींव खोदते हुए पुरानी नींव निकल सकती है और कुंआ खोदते हुए निकल आया पुराना कुंआ तो अब भी मौके पर देखा जा सकता है।

दो हजार साल से भी अधिक पुरानी बताई जाने वाली वासुदेव-विष्णु की अद्वितीय प्रतिमा सहित अनगिनत कलाकृतियां। देव-प्रतिमाएं इतनी कि कहावत चलती है- 'सब देवता बसे मलार।' प्रसन्नमात्र के एकमात्र ज्ञात तांबे के सिक्के और मघ शासकों के दुर्लभ सिक्कों सहित ढेरों सिक्के, मुद्रांक, व्याघ्रराज और महाशिवगुप्त के अभिलेखों सहित सैकड़ों-हजारों शब्दों का उत्कीर्ण प्राचीन साहित्य, बेशकीमती और ठोस पत्थरों की गुरिया और मनकों की तो खान ही है।
पुरानी कीमियागिरी में प्रेरणा की भूमिका आदिम इच्छा ने ही निभाई, यानि यौवन और स्वर्ण या कहें कालजयी होने की ललक और भौतिक सम्पन्नता, ऐश्वर्य की चाह। मल्हार की प्राचीन कलाकृतियां आज कालजयी होकर हमारे समक्ष विद्यमान हैं और सोना तो 'कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय' है ही। कहते हैं मल्हार में कभी सोने की बरसात हुई थी और यहां दुनिया के लिए ढाई दिन का राशन पूरा कर सकने की सम्पदा धरती के गर्भ में समाई हुई है। नाम भी है- सोनबरसा खार। इन कथनों में चाहे जितनी सचाई हो लेकिन मल्हार में आज भी यह सच्ची कहावत पूरी तरह लागू है कि 'संफरिया नांगर नई चलय' यानि हल अकेले-अकेले ही जोतते है किसी के साथ नहीं, क्योंकि कहीं भी, कभी भी और कुछ भी मिल जाने की आशा अब भी लोगों को होती है।

मल्हार के पुरातत्व का काल और क्षेत्र-विस्तार धार्मिकता के तीन बिंदुओं पर केन्द्रित हो गया है- पातालेश्वर या केदारेश्वर मंदिर, देउर और डिड़िन दाई। पातालेश्वर मंदिर परिसर में इस ग्राम और क्षेत्र की धार्मिक आस्थाओं के साथ विविध गतिविधियां जुड़ी हैं। यहीं स्थानीय संग्रहालय है। मल्हार महोत्सव पर पूरे छत्तीसगढ़ के लोक-कलाकारों का मेला यहां लग जाता था और महाशिवरात्रि पर दस दिन के मेले में तो मानों पूरा क्षेत्र ही उमड़ पड़ता है।

देउर का प्राचीन मंदिर का टीला देउर कहा जाता था और दो विशाल मूर्तियों के कारण भीमा-कीचक भी। किसी प्राचीन स्थल की पूरी रहस्यात्मकता सहित इस टीले की रहस्य की परतें तीसेक साल पहले खुलनी शुरू हुईं। रहस्य के साथ भौतिकता की भव्य कल्पना सदैव जुड़ जाती है और यह प्रकाशित होते ही लोक-मानस को निराशा ही होती है देउर के स्थान पर प्रकाश में आया आठवीं सदी की महत्वपूर्ण स्थापत्य संरचना लेकिन लोक-मानस का मनो-महल भरभरा कर ढह गया, इसीलिए शायद वह धार्मिक महत्व न पा सका।

और डिड़िन दाई से तो जैसे पूरे मल्हार की धर्म-भावना अनुप्राणित हुई है। काले चमकदार पत्थर से बनी देवी। डिड़वा यानि अविवाहित वयस्क पुरुष और डिड़िन अर्थात्‌ कुंवारी लड़की। माना जाता है कि मल्हार के शैव क्षेत्र में डिडिनेश्वरी शक्ति अथवा पार्वती का रूप है, जब वे गौरी थीं, शिव-वर पाने को आराधनारत थीं। डिड़िन दाई का मंदिर पूरे मल्हार और आसपास के जन-जन की आस्था का केन्द्र है।

सरकारी पुरातत्व विभाग द्वारा तो यहां संरक्षण, अनुरक्षण, शोध और संकलन किया ही गया है, सागर विश्वविद्यालय द्वारा उत्खनन भी यहां कराया गया लेकिन ग्रामवासी भी कुछ पीछे नहीं हैं। लगभग सभी घरों में कोई अलंकृत नक्काशी का टुकड़ा देखा जा सकता है और कुछ ऐसे लोग भी हैं, प्राचीन अवशेषों का संकलन और सुरक्षा, जिनकी दिनचर्या में शामिल है। जो ऐसे माहौल में जन्मा, पला-बढ़ा उसकी विशिष्ट संवेदना और मल्हार से लगाव तो स्वाभाविक ही है तथा मल्हार के गौरव को प्रकाशित करने के प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं और इस परिवेश में संस्कृति के अन्य पक्ष- संगीत, गायन और साहित्यिक चेतना का विकास भी स्वाभाविक है। इस छोटे से कस्बे में राष्ट्रीय स्तर की कवि गोष्ठियां, लोकमंच के कार्यक्रम और सांस्कृतिक उत्सवों के आयोजन से लेकर राजनैतिक कार्यक्रम तक आयोजित हुए हैं, होते रहते हैं। पुरातत्व से जुड़े दुनिया भर के लोगों का तो तीर्थ यह है ही।

टीपः

मल्‍हार वाले श्री पा ना सुब्रमनियन और श्रीमती शुभदा-श्री विवेक जोगलेकर जी से बीसेक साल पहले पुरातत्‍व पर बात होती तो मेरी प्रशिक्षित बौद्धिकता और अर्जित ज्ञान (सूचना) से काम न चल पाता, इससे मुझे दिशा मिली और पुराने स्‍मारक-स्‍थलों को अपने विषय-विधा की सीमा से निकल कर देखने में मदद हुई। साथ ही श्री जी एल रायकवार की भटकी-सी लगने वाली बातों से पुरातत्‍वीय परिवेश के लिए न सिर्फ नजर खुली रखने, बल्कि उसके प्रति सम्‍मान का भाव विकसित करने का रास्‍ता बना। तभी यह प्रयोग किया था कि किसी पुरातत्‍वीय स्‍थल पर ऐसा कुछ लिखूं, जिसमें पुरातत्‍व न-सा हो।

Thursday, January 19, 2012

भानु कवि

चालो री साहेल्यां म्हारा जगन्नाथ जी आया री।
जगन्नाथ जी आया वो तो कोई पदारथ लाया री।
निमाड़ क्षेत्र में प्रचलित रही गीत की ये पंक्तियां भगवान जगन्नाथ के लिए नहीं बल्कि राजस्व अधिकारी के रूप में वहां पदस्थ रहे जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के लिए है, जो गीत की अगली पंक्तियों से पता लगता है-
आगूं तो हम सौ-सौ देत, अब नौ दसक सुनाया री।
बाकी रुपया सबै छुड़ाया, हरखीना घर आया री॥
निमाड़ में पदस्थ रहते भानुजी ने लगान में कमी कर जनता का दिल जीत लिया था। भानुजी निमाड़ी किसानों के प्रेम का स्मरण कर कहा करते थे- 'इस छल-कपट से भरे हुए संसार में मुझे ग्रामीण जनता से जो प्रेम और प्रतिष्ठा मिली, वह देव-दुर्लभ है।'

हिन्दी साहित्य के इतिहास में छंदशास्त्र के सर्वप्रमुख विद्वान, छत्तीसगढ़ के गौरव पुरुष जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' का जन्म 8 अगस्त 1859 को तत्कालीन मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में हुआ। सैनिक सुकवि 'हनुमान नाटक' के रचयिता पिता बख्‍शीराम से साहित्यिक संस्कार, उन्हें घुट्‌टी में मिला। भानुजी का बचपन बिलासपुर में बीता, आरंभिक शिक्षा भी यहीं हुई और आपके जीवन का अधिकतम रचनाकाल भी बिलासपुर में ही व्यतीत हुआ। मेधावी बालक जगन्नाथ ने अपनी रुचि और स्वाध्याय से हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, उड़िया और मराठी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया। भाषा और गणित में उनकी विशेष रूचि थी।

साहित्य का अध्ययन करते हुए भानुजी ने महसूस किया कि हिंदी में 'छंद' विषय पर वैज्ञानिक और व्यवस्थित कार्य का अभाव है और उन्होंने इस दिशा में कार्य आरंभ किया। छह वेदांगों में शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त और ज्योतिष के साथ छंद भी है। सर्वप्रथम संस्कृत के छंद ग्रंथ 'पिंगलशास्त्र' की रचना पिंगलाचार्य ने की, जो भगवान शेष के अवतार माने गए हैं, किंतु हिंदी के छंद ग्रंथों में जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत प्रथमतः सन 1894 में प्रकाशित 'छंदःप्रभाकर' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सन 1939 में इसके नवें संस्करण प्रकाशन के बाद 1940 में उन्‍हें हिन्‍दी के प्रथम 'महामहोपाध्‍याय' उपाधि से विभूषित किया गया।
इस ग्रंथ का 10वां संस्करण जगन्नाथ प्रिंटिंग प्रेस, बिलासपुर से सन 1960 में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण में ग्रंथ का परिचय इस प्रकार दिया गया है- 'छन्‍दःप्रभाकर' अर्थात भाषा पिंगल, सूत्र और गूढ़ार्थ सहित जिसमें छन्‍द शास्त्र की विशेष ज्ञानोत्पत्ति के लिए मात्राप्रस्तार, वर्णप्रस्तार, मेरु, मर्कटी, पताका प्रकरण, मात्रिकसम, अर्द्धसम, विषम और वर्णसम, अर्द्धसम और विषम वृत्त प्रकरणों का वर्णन बड़ी विचित्र और सरल रीति से लक्षण और उत्तम उदाहरणों सहित दिया है।

ग्रंथ की भूमिका में भानुजी ने सरल शब्दों में छंद का परिचय और महत्व इस प्रकार बताया था- 'छंद शास्त्र का थोड़ा ज्ञान होना मनुष्य के लिए परमावश्यक है। आप लोग देखते हैं कि हमारे ऋषि, महर्षि और पूर्वजों ने स्मृति, शास्‍त्र, पुराणादि जितने ग्रंथ निर्माण किये हैं वे सब प्रायः छन्‍दोबद्ध हैं। यहां तक कि श्रुति अर्थात वेद भी छंदस कहाते हैं। छंद का इतना गौरव और माहात्म्य क्यों? इसका कारण यही है कि कोई भी विषय छंदोबद्ध रहने से रमणीयता के कारण शीघ्र कंठस्थ हो जाता है और पाठकों और श्रोताओं दोनों को एक साथ ही आनंदप्रद होता है। इसके सिवाय उसका आशय गद्य की अपेक्षा थोड़े ही में आ जाता है। वे आगे लिखते हैं- 'इस ग्रंथ में हमने श्रीयुतभट्ट हलायुध के सटीक प्राचीन संस्कृत छन्‍द शास्त्र, श्रुतबोध वृत्तरत्नाकर, छन्‍दोमंजरी, वृत्तदीपिका, छंदःसारसंग्रह इत्‍यादि ग्रन्‍थों का आधार लिया है।' इस पुस्तक में सौ से अधिक पारिभाषिक शब्द, चार सौ से अधिक छंद नियम है तथा आठ सौ से अधिक शब्द नाम विषयसूची में सम्मिलित हैं।

यह न सिर्फ हिन्दी छंद शास्त्र का पहला ग्रंथ होने के कारण उल्लेखनीय है, बल्कि इसका महत्व इसलिए है कि इसमें मात्रा, वर्ण, प्रत्यय आदि का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है। बहुभाषाविद होने का लाभ लेते हुए भानु जी ने ग्रंथ में संस्कृत, मराठी तुलनात्मक उदाहरणों के साथ तुकान्त काव्य के उल्लेख सहित उर्दू-फारसी बहरों और अंगरेजी के मीटर का हिन्दी छंदों के साथ विवेचन किया है।

रामचरितमानस को आधार बना कर तैयार किया गया उनका ग्रंथ नव पंचामृत रामायण 1897/1924 में प्रकाशित हुआ, साथ ही उनकी श्री तुलसी तत्‍व प्रकाश (1931), रामायण वर्णावली (1936), श्री तुलसी भाव प्रकाश (1937) पुस्‍तकों के नाम मिलते हैं। इसके अतिरिक्त उनके अन्य ग्रंथ हैं- काव्य प्रभाकर (1905/1909), छंद सारावली (1917), अलंकार प्रश्नोत्तरी (1918), हिंदी काव्यालंकार (1918), काव्य प्रबंध (1918), काव्य कुसुमांजलि (1920), नायिका भेद शंकावली (1925), रस रत्नाकर (1927), अलंकार दर्पण (1936) आदि। उनकी अन्य काव्य कृतियां 'तुम्हीं तो हो' (1914), जय हरि चालीसी (1914) और शीतला माता भजनावली (1915) है। फैज उपनाम वाली उनकी दो उर्दू पुस्तकों, गुलजारे सखुन (1909) तथा गुलजारे फैज़ (1914) और सन 1927 में रचित अंग्रेजी तीन पुस्तिकाओं 'की टू परपेचुअल कैलेंडर बीसी', 'की टू परपेचुअल कैलेंडर एडी' तथा 'कांबिनेशन एंड परम्यूटेशन आफ फिगर्स' हैं। इसके साथ काल प्रबोध (1899), अंक विलास (1925) और काल विज्ञान (1929) सहित कई छत्तीसगढ़ी पुस्तिकाओं की रचना भी आपने की, जिसमें खुसरा चिरई के बिहाव सर्वाधिक लोकप्रिय हुई (वैसे इसी शीर्षक से खरौद के पं. कपिलनाथ मिश्र की प्रसिद्ध रचना भी है।) इसके अतिरिक्‍त भानुजी की कुछ अप्रकाशित रचनाओं की सूचना भी मिलती है।

सरकारी नौकरी के बाद सक्रिय सार्वजनिक जीवन बिताते हुए भानुजी ने सन 1913 मे बिलासपुर में जगन्नाथ प्रेस नामक छापाखाना आरंभ कर इस अंचल के एक बड़े अभाव की पूर्ति की। भानु जी की मित्र मंडली और परिचय का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। वे तत्कालीन सभी प्रमुख साहित्य मनीषियों और महापुरुषों के सतत संपर्क में रहते और सम्मान पाते थे। श्रीकृष्ण कन्या शाला के अध्यक्ष, बिलासपुर डिस्पेंसरी के सदस्य, सहकारी बैंक के संस्थापक, महाकोशल हिस्टोरिकल सोसाइटी कौंसिल के अध्यक्ष, मध्यप्रांतीय लिटरेरी एकेडमी के अजीवन सदस्य जैसी विभिन्न संस्थाओं से संबद्ध रहकर छत्तीसगढ़ में साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण के निर्माण में अविस्मरणीय योगदान दिया। वे नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा महात्‍मा गांधी, जार्ज ग्रियर्सन, आचार्य महावीर प्रसाद दि्ववेदी, पं. गौरीशंकर ओझा, हरिऔध जी व बाबू श्‍यामसुंदर दास के साथ सम्‍मानित हुए थे। महामहोपाध्‍याय, साहित्‍य-वाचस्‍पति, साहित्‍याचार्य, रायबहादुर भानु जी का निधन 25 अक्टूबर 1945 को हुआ।

मेरे द्वारा तैयार यह आलेख, लगभग इसी रूप में प्रथमतः 25 अक्टूबर 2004 को समाचार पत्र दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर के पृष्ठ-4 पर प्रकाशित।

15-20 साल पहले भानुजी के पोते श्री घनश्‍याम उर्फ मोहनकुमार कवि से मेरा मिलना-जुलना होता था, उनके चांटापारा स्थित निवास पर जाकर, भानुजी के अध्ययन कक्ष और संग्रह को भी देखने का अवसर मिला, किन्तु इस लेख के लिए जानकारियों की पुष्टि का प्रयास किया तो वहां वैसा कुछ भी शेष नहीं रहा था, मोहन जी से भी मुलाकात न हो सकी, न पता लगा सका इसलिए मात्र विभिन्न प्रकाशित स्रोतों और चर्चाओं को आधार बना कर यह लेख तैयार किया गया था। 

Wednesday, January 11, 2012

कवि की छवि

कवि के साथ छवि का तुक यहां संयोग से ही बैठ गया वरना कविता तो अतुकी-बेतुकी सी लगने वाली बातों में भी होती है- खुदबुदाते, मचलते भावों के सामने कब लाचार नहीं पड़ते शब्द, कभी जबान तोतली होने लगती है, तो कभी सघन मौन-चुप्पी। ... घना अंधेरा और तरल रोशनी ... ।
क्यों नदी खामोश है?
दहाड़ क्यों है, पहाड़ के चुप्प्प्प में
जंगल लील जाने को आतुर
चिड़िया टंगी सी, पेड़ अनमने!

कवि मन के भाव-बिंबों को समझने के प्रयास में यह बेतुकी सी बात बन गई। कविताओं के प्रति अपनी रुचि और समझ सीमा के कारण, ऐसा कुछ पढ़ते हुए असमंजस होता है, गद्यार्थी पाठक को घबराहट-सी भी होती है। लेकिन इस संकीर्णता में आसानी से समा जाए ऐसी भी कविता यदा-कदा मिल जाती है।

बात है बिलासपुर, छत्‍तीसगढ़ के युवा रचनाकार मनीष श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'अवलंबन' की। 1974 में जन्मे मनीष नब्बे के दशक से लिख रहे हैं और इस संग्रह में सन 2006 तक की अनुक्रमित (सरल क्रमांक वाली), बिना शीर्षक वाली 1 से 109 तक रचनाएं शामिल हैं, जिनमें अधिकतर का रचना काल 1999 और 2000 दर्शाया है। (रचनाओं को यहां कोष्‍ठक में उनका अनुक्रम देते हुए उद्धृत किया गया है।)

संग्रह से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि रचनाकार फिलहाल अपनी कवि-छवि से मुक्त है, उसे पता नहीं है कि वह जो कुछ लिख रहा है, वह कविता है, यानि वह एक तरह से कुंवारा-कवि है। कवि (की छवि) बन जाने के बाद, ऐसा भान, अपनी यह पहचान उसे बनाए-बचाए रखने का जतन, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी साथ बना रहा तो यह कविता पर भारी पड़ने लगता है। फिलहाल इससे लगभग मुक्त दिखते मनीष, संग्रह के आरंभ में कहते हैं- ''मैंने '97 से '07 तक काफ़ी कुछ कहा। चंद तो यूँ ही बातों में बह गया। जो कुछ मैंने याद रखा, जो कुछ कविता-स्वरूप था, वह संकलित है।''
लक्षण अच्छे कहे जा सकते हैं क्योंकि यह युवा कवि, शब्दों और भाषा को खिलौने की तरह खेलता दिखता है। काश, आकाश और अवकाश पर कविता (2) है तो एक रचना (12) में मोहन, वशीकरण, आकर्षण, द्रावण, उन्मोदन, दीपन, स्तंभन, जृम्भण, उच्चाटन, मारण शब्दों को अपनी तरह से व्यक्त किया है और द्योतक, मोदक, उद्‌घोषक, प्रेरक, धावक जैसे तुक मिले शब्दों के साथ रची गई कविता (26) भी है।

शब्दों से खेल, कहीं भाव से दर्शन तक पहुंच जाता है जैसे (54) एक क्षण, युति का // एक प्रहर, उल्लास का // एक दिवस, आवेगपूर्ण // संध्या एक, आह्लादमयी // एक पक्ष, सान्निध्यरत // एक मास, सहयोग का // एक ऋतु, प्रतीक्षा की // एक वर्ष, प्रयास का // एक दशक, संतुष्टि का // एक जीवन, पूर्णतः परिभाषित!!! और (105) प्रातः उठो, गाओ कुछ पंक्तियाँ, पूरा गीत नहीं // मध्याह्न तक, चलो कुछ कोस, पूरा पथ नहीं // संध्या बैठो, इक नदी किनारे, न, रोओ नहीं // रात सोने दो, आँखों को खेलने दो, एक नए सपन संग, न, खोलो नहीं // हर सुबह नवजीवन का आरंभ, हर रात इक ज़िंदगी ख़त्म, जीवन की अवधि, सिर्फ़ एक दिन!

इस कवि को अपनी बात कहने के लिए कामचलाऊ से लेकर अंगरेजी से भी परहेज नहीं है, लेकिन कमाल तो वहां दिखता है, जब वह शास्‍त्रीय संस्‍कृत के शब्‍द और मनोभूमि में विचरते हुए (15) मंत्रोपलों, ईक्षण, ष्‍ठीवन, लोय, जोय, प्रीत्‍योदधि, व्रण, बैंदव, त्रायमाण, विवक्षा, अमिष जैसे शब्‍दों का सहज इस्‍तेमाल करता है तब कुछ अन्य कविताओं की तरह यहां भी लगता है कि वह सिर्फ संस्कृत भाषा का अभ्यासी नहीं, बल्कि पौराणिक-औपनिषदिक मनोभाव का भी अभ्‍यस्‍त है। जब वह क्‍लासिक उर्दू को पकड़ कर बढ़ता है तो (28) ग़ज़ीर, मुबर्हन, तस्‍ख़ीर, शाबदा, रू-ए-तिला, लज़्ज़ते-गिर्या (77) यूज़क, मिक़्यासुलहरारा, सीमाब, मिक़्यासुलमौसिम, दिनाअत (78) बिफ़ज़िल्ही, चर्बक़ामत, नौख़ास्‍ता, रू-ए-शोरीदा, नैरंगसाज़े-शैदा लफ़्ज आते हैं और (79) में काफिया मिलान के शब्‍द हैं- शुस्‍तोशू, दू-ब-दू, मू-ब-मू, सू-ए-सू, ज़ुस्‍तजू, कू-ब-कू, जू-ब-जू, हू-ब-हू, रू-ब-रू के साथ शेर है- न होते अंग्रेज न 'यू-यू' होती, हिंदी होती तो तुम से तू होती।

आपकी जांच-परख के लिए इस संग्रह के कुछ नमूने-

7 शेरों वाली ग़ज़ल (6) में काफ़िया खींच कर मिलाया गया लगता है, लेकिन बात असरदार बनी है-
माशूक है रोटी यहाँ बच्चे रक़ीब हैं
चूल्हे की वस्लगाह के क़िस्से अजीब हैं
शायर के पेट दौड़ती बहती हुई शराब
कुर्ता-ए-ज़र की ज़ेब में मुद्दे ग़रीब हैं
ये प्यार काग़ज़ी है सो दो लफ़्ज़ हुए हम
मानी हैं जुदा शुक्र है हिज्जे करीब हैं

संग्रह की सबसे छोटी, स्वाभाविक कविता (18) है-
ज़िन्दगी की बिसात पे
जब भी शह देता हूँ...
...तुम मोहरे बदल देती हो!

15 अगस्त 2006 को लिखी कुछ अलग मिजाज की कविता (24) है-
शब्द-विवर में अर्थ-मंडूक // जब मौन व्रत धर लें // अंतरात्मा के झींगुर // परकोलाहलवश सुनाई न दें // चकाचौंध में भावों के मृदु तारागण // जब दिखाई न दें ...
... ... ... ... ... ... ... ... ...
(कहूँ सुप्रीम कोर्ट को इंप्यूडेंट, फिर भले भुगते मुआ ये आदिवासी
मैं और मेरा (लेस्बो) एडवेंचर तो मजे में हैं 'बस मॉस्किटो हैं')
जब कम्युनिज़म पटुओं की ललनाओं को हड़पने की
तानाशाही का जरिया बने, समाधिकार के नाम पर
जब कॅपिटलिज़म का ठेठ अर्थ ही हो जाए
अक्षम से भेदभाव या अपमान या उसे खर समझना
जब सेक्युलर का मतलब दाढ़ी
औ' नेशनलिस्ट सुसंस्कृत हो चले चोटी
सोशलिस्ट (यदि बचा हो) माने झोले में कट्टा
जब टॅररिज़म का मुकाबला करे जिंगोइज़म,
वो भी ख़ाली हाथ!
... ... ... ... ... ... ... ... ...
मौन-कंदरा में विचार शरभ निर्दोष // जब हिमनिद्रालीन हों अनिमेष ही // प्रीत्याभिषेक स्नात मृडमुख से // फूटे ''युद्धं शरणं गच्छामि!'' // कलाश्री के इक्षुचाप में दंत-अंकुश // सुमनशर बद्ध हों जब मायापाश में // तब, ममप्रिय हे अदिति, // तू मुझे अभीष्ट है!

संग्रह की एकदम सहज-स्वाभाविक सी कविता (50) है-

ओह, मैं अश्वमेध कर बैठा!

हृदय-तुरंग से ये कह बैठा
कि जा, जहाँ तक तू दौड़ेगा
वहाँ तक मेरा साम्राज्य होगा

इक नन्हीं बाला ने ऐसा पकड़ा
कि अश्व बेचारा अब तक
उसका बंदी है, वो लालन-पालन
करती है, सो ख़ुश भी है

अश्व छुड़ाने की कोशिश में
राजा से भिक्षु बन बैठा
सुनने में तो ये भी आया
कि उस हय ने संतति की है
दो बछेड़े विश्वास और संयम
और एक नन्हीं घोड़ी प्रतीक्षा
को भी जन्म दिया है!

क्यूँ नृप हारा, बाला जीती?
मैंने अश्व को दमन का अस्त्र बनाया
उसने उसे प्रेम-प्रतीक बना
जीना सिखलाया!

...धरा रह गया यज्ञ
मुझे अश्व की सेवा ही करने दो!

छोटे बहर और 29 शेरों वाली प्रयोगात्मक ग़ज़ल (27) का एक शेर है- खिलौना हूँ मैं दोनों का, करम उसका दुआ उसकी। ऐसी ही 28 शेरों वाली ग़ज़ल (59) शुरू होती है- मुझसे न लिखा जाएगा, ये वर्क़ सफ़ा जाएगा। एक शेर (34) में है- सुबू दो, इक खयाल, काफिए चार, मगर रदीफ बनाई नहीं जाती। एक और ग़ज़ल (38) के कुछ शेर देखते चलें-
भूत है वाचाल चंचल वर्तमान
क्यूँ है रहता लृटलकार मौन
गणपति, मुझ कंठकेतु पर कृपा हो
है तू सक्षम कर मेरा उद्धार मौन
तुझसे गतिमय है मेरी यौवनकथा
न रहेगा इस कथा का सार मौन।
कवि यह भी कहता है- (52) ''हां, मैं विशेषज्ञ नहीं पर, जीवन का हठी विद्यार्थी अवश्य हूँ!'' फिर यह कि- (10) ''सीख लेंगे लब ये जब क़िस्साबयानी, लस्म में, आँखों से तब इरशाद मिलेगी।'' और फिर मानों घोषणा कि- (23) ''ग़ज़लगोई ये चुप नहीं होगी, मुहब्बत तुंदख़ू से है।'' लेकिन बात यहां तक पहुंचती है- (76) ''तम्दीद-ए-ग़ज़ल में है महारत मुझे मगर, यीमन फ़ यौमन ख़ुद को घटाता रहूँ।''

रचनाओं में व्‍यापक भाव और समृद्ध बिंब का जैसा सहज प्रयोग हुआ है, वह कवि की अकूत संभावना का अनुमान कराने के लिए पर्याप्‍त है, लेकिन वह जिस भाषा का प्रयोग करता है, उसके लिए आम पाठक कवि के शब्दों में (37) ही कह सकता है-
... सुनूँ मैं तुम्हारे दिल की बात
और समझ भी पाऊँ! प्रिये यह सरल नहीं है!

राजकमल प्रकाशन की इस पुस्‍तक का आइएसबीएनः 978-81-267-1717-0 है।