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Thursday, April 28, 2011

रामकोठी

कटहल और आम, पलाश और सेमल, कोयल की कूक के साथ महुए की गंध का मधु-माधव मास। चैती-वैशाखी का महीना, धर्म-अर्थ और काम से गदराया हुआ। खरीफ जमा है और रबी की आवक हो रही है। मेलों में मनोरंजन, खरीद-फरोख्‍त हुई। मेल-जोल में बात ठहरी, वह अब रामनवमी और अक्ती-अक्षय तृतीया की मांगलिक तिथियों पर वैवाहिक संबंधों के साथ रिश्तों तक आ गई, नई गृहस्थी जमने लगी है। खेती-बाड़ी का भी नया कैलेंडर शुरू हो रहा है।

रायपुर से उत्‍तर में 25 किलोमीटर दूर मोहदी के 1 मई, मजदूर दिवस का रंग लाल नहीं, बल्कि हरित होता है। 15 अप्रैल से 15 दिन की छुट्‌टी के बाद 'सौंजिया' फिर सालाना काम पर लगेंगे। कोई 15 साल पहले वैशाख अधिक मास होने से समस्या आई कि बढ़े महीने का हिसाब कैसे हो, तब आपसी मशविरे से यह काम-काज अंगरेजी तारीख से चलने लगा। सौंजिया, किसानी की अलिखित संहिता का पारिभाषिक शब्द है, जिसकी व्याख्‍या में कृषक जीवन के विभिन्‍न पक्ष उजागर हो सकते है। सामुदायिक जीवन की कल्‍पना सी लगने वाली हकीकत गांवों में सहज रची-बसी है, जिसकी शब्‍द-रचना भी मुझ जैसे के लिए कठिन है, लेकिन तोतली भाषा में स्‍तुति करते हुए संक्षेप में सौंजिया (सउंझिया- साझीदार/साझा) यानि खेती में श्रम भागीदारी से उपज के एक चौथाई का अधिकारी। बाकायदा सौंजिया संगठन है यहां, जो इसी दौरान अपनी कमाई के दम पर सांस्‍कृतिक आयोजन करता है।

लगभग 4000 आबादी वाला छोटा सा गांव, मोहदी। अब एटीएम, मोबाइल, मोटर साइकिल, भट्‌ठी, सरपंची, गरीबी रेखा, नरेगा के चटख रंग ही दिखाई पड़ते हैं, पड़ोसी लोहा कारखाने का भी असर हुआ है, फिर भी गांव की संरचना के ताने-बाने को कसावट देने वाले कई समूह-वर्ग ओझल-से लेकिन सक्रिय हैं। पारा-मुहल्ला, टेन (गो-धन स्वामी आधारित वर्ग), पार (जाति आधारित वर्ग), दुर्गा मंदिर समिति और सबसे खास ग्रामसभा, गांव के पंच-सरपंच और प्रमुख नागरिकों की 25 सदस्यीय समिति, जो रामकोठी का संचालन करती है।

पुरानी बात, गांव में दशहरे का उत्साह है। भजन, माता सेवा, रामायण तो चलता ही रहता है, लेकिन अब की झांकी और लीला की खास तैयारी है। धूमधाम से त्यौहार मना। रामलीला की चढ़ोतरी में इकट्‌ठा हुआ धान इस बार किसी गांवजल्ला काम में खर्च नहीं किया जा रहा है, उसे जमा कर दिया गया है। अब मोहदी में भी रामकोठी है। 85 बरस पहले और आज भी। 'कोठी' यानि कोष्‍ठ या भण्‍डार और 'राम' विशेषण-उपसर्ग का यहां आशय होगा- शुभ, वृहत् और निर्वैयक्तिक। पुरानी रामकोठी छोटी पड़ने लगी तो बड़ा भवन बन गया।

छत्तीसगढ़ में देशज ग्रामीण बैंक जैसी संस्था रामकोठी कांकेर, धमतरी, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा और रायपुर जिले में अधिक प्रचलित है। आसपास के गांवों गोढ़ी, नगरगांव में भी रामकोठी है, लेकिन मोहदी की बात कुछ और है। यहां आज भी लगभग डेढ़-दो सौ क्विंटल धान क्षमता यानि कम-से-कम दो लाख रूपए मूल्‍य की जमा-पूंजी है। सवाया बाढ़ी (ब्याज) पर दिये जाने वाले कर्ज की दर अब 15 प्रतिशत सालाना कर दी गई है। त्रुटि और समस्या रहित ग्रामीण प्रबंधन। गांव में रामलीला मंडप भी बन गया। गांव के लोग मिलकर ही रामलीला करते थे, लेकिन चटख रंगों का असर हुआ और पिछले दशहरा में एक सप्ताह के लिए लीला पार्टी पड़ोसी गांव कचना से आई।
रामलीला मंडप पर नाम लिखा है- श्री मुकुंदराव। इस मंच के सामने बछरू (बछड़ा) बंधा दिखा। मेरा देहाती मन भटक जाता है। भंइसा, बइला-बछरू, किसान की ताकत। बछड़े के गले में लदका है, गर्दन पर हल का जुआ रखने का अभ्यास कराया जा रहा है। नाक नाथने का काम किसान कर लेता है, लेकिन सबसे जरूरी बधिया, अब गांव में कोई नहीं कर पाता, पास के पशु औषधालय में जाना पड़ता है। लदका, नथना और बधिया, किसान के जवान होते, मचलते पुत्र के साथ जुड़ रहा है, चाहें तो आप अपनी तरह से सोच कर देखें।

वापस, मुकुंद नाम पर। इसका खास महत्व है, रायपुर और छत्तीसगढ़ के लिए। वैसा ही जो 'शिकागो' नाम का है, दिल्ली और देश के लिए। यानि वह नाम, जो महान व्यक्तियों, नेताओं-अभिनेताओं की आवाज दूर-दूर पहुंचाने का साधन रहा है।
मोहदी में रामकोठी की तलाश करते हुए जो सूत्र मिला, उससे रास्ता तय हुआ मुकुंद रेडियो तक का। यह इतिहास की रामकोठी, खजाने जैसा ही है, जहां रायपुर और छत्तीसगढ़ पधारी हस्तियों की सचित्र स्‍मृति जतन कर रखी है।
रामकोठी की इस रामकहानी में एक रावण भी है, लेकिन यह रावण खलनायक नहीं, बल्कि सहनायक जैसा है और ग्राम देवताओं की तरह सम्मान पाता है।
82 वर्षीय इस रावण प्रतिमा की प्रतिदिन पूजा होती है, मनौती मानी जाती है, नारियल भी रोज ही चढ़ता है। इस क्षेत्र के अन्य ग्रामों की तरह पड़ोसी गांव बरबन्दा में भी रावण प्रतिमा है। गांववासियों से पूछता हूं- 'कस जी, तू मन रावन के पूजा करथव ग।' मेरे सवाल में जिज्ञासा के साथ चुभने वाली फांस भी है, लेकिन जवाब सपाट है- 'हौ, वहू तो देंवता आए एक नमूना के बपुरा (बेचारा) ह।' सटपटा कर, सभी ग्राम देवताओं सहित रावण को हमारी राम-राम।

रावी नदी के किनारे स्थित हड़प्पायुगीन विशाल अन्नागारों को सामुदायिक प्रयोजन का माना गया है। बंगाल के प्राचीनतम, चौबीस सौ साल पुराने अभिलेख, महास्थान (बांग्लादेश) के मागधी प्रभावित प्राकृत लेख में धान्य और कोठागल (कोष्ठागार) शब्द मौर्यकालीन ब्राह्मी में उत्कीर्ण है तथा कर्ज लेन-देन का भी उल्लेख है। छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के मदकू घाट (मदकू दीप) से मिले अट्‌ठारह सौ साल पुराने शिलालेख में अक्षयनिधि का उल्लेख भी इसी परंपरा का आरंभिक प्रमाण माना जा सकता है। छत्‍तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी सिरपुर की खुदाई से हाल ही में बारह सौ साल पुराने अन्‍नागार प्रकाश में आए हैं।

अक्षय तृतीया पर परिशिष्‍टः

1 मई, श्रम दिवस है। 2 मई, सत्‍यजित राय की जन्‍मतिथि और इस वर्ष आज 6 मई को अक्षय तृतीया, इन तीन तिथियों का संयोग, छत्‍तीसगढ़ और रावण के साथ जुड़ कर पंचमेल बन रहा है, यह भी देखते चलें।
महेन्‍द्र मिश्र ने 'सत्‍यजित राय पथेर पांचाली और फिल्‍म जगत' पुस्‍तक में बताया है- ''1981 में राय ने दूरदर्शन के लिए प्रेमचन्‍द की कहानी सद्गति पर एक लघु फिल्‍म बनाई। 25 अप्रैल 1982 को सद्गति के प्रदर्शन के साथ दूरदर्शन का रंगीन प्रसारण प्रारंभ हुआ।'' 'सद्गति' छत्‍तीसगढ़ में फिल्‍माई गई, जिसमें ओम पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे और गीता सिद्धार्थ के साथ यहां के भैयालाल हेड़उ और बाल कलाकार ऋचा मिश्रा ने अभिनय किया है। फिल्‍म की शूटिंग छतौना-मंदिर हसौद, पलारी (बलौदा बाजार) और महासमुंद के पास केसवा, मोंगरा गांवों में हुई बताई जाती है। फिल्‍म में प्रेमचन्‍द की कहानी में उकेरे जाति-प्रथा, श्रम-शोषण के प्रभावी चित्रांकन में गांव की रावण मूर्ति का इस्‍तेमाल, रूढ़ प्रतीक के रूप में है।


कहानी की पृष्‍ठभूमि इस उद्धरण से स्‍पष्‍ट है- ''दुखी ने सिर झुकाकर कहा- बिटिया की सगाई कर रहा हूं महाराज। कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्जी होगीॽ'' लेकिन छत्‍तीसगढ़ में रामनवमी और अक्‍ती (अक्षय तृतीया), ऐसा साइत-सगुन है, जिस पर कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। यह भी उल्‍लेखनीय है कि छत्‍तीसगढ़ में जाति-सौहार्द्र की परम्‍परा और तथ्‍यों के ढेर उदाहरण हैं (रावण भी देव-तुल्‍य है), लेकिन सद्गति में अनुसूचित जाति के लिए प्रयुक्‍त शब्‍द अब न सिर्फ निषिद्ध है वरन विस्‍फोटक हो सकता है। इन सब बातों का सार यह कि प्रेमचन्‍द और सत्‍यजित राय जैसे पंडितों के सामने हमारी स्थिति कहानी के 'दुखी' की नहीं तो चिखुरी गोंड़ से अधिक भी नहीं और इस दृष्टि से कहानी और फिल्‍म 'सद्गति' की देश-काल प्रासंगिकता प्रश्‍नातीत नहीं।

प्रेमचंद पर टिप्‍पणी करते हुए बख्‍शी जी के निबंध 'छत्‍तीसगढ़ की आत्‍मा' का उद्धरण तलाश रखा है- ''जो सामाजिक समस्‍या प्रेमचन्‍द जी की ग्राम्‍य-कहानियों में विद्यमान है, उनके लिए यहां स्‍थान नहीं है।''

Tuesday, April 19, 2011

कुनकुरी गिरजाघर

राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 78 पर जशपुर जिला मुख्‍यालय से रायगढ़ जाते हुए 45 किलोमीटर दूर बसा गांव, कुनकुरी। जशपुर क्षेत्र में ईसाई मिशनरी, उन्नीसवीं सदी से सक्रिय रहीं, तब यहां रोमन कैथोलिक और इवैंजेलिकल लुथेरन मिशन की गतिविधियां रांची केन्द्र से संचालित थी। इस अंचल का सबसे पुराना मिशन गिनाबहार (जशपुर, हॉकी की नर्सरी कहा जाता और ओलम्पियन हॉकी खिलाड़ी विंसेंट लकड़ा इसी गांव के थे।) का क्रिस्तोपाल आश्रम सन 1921 में स्थापित हुआ और दिसंबर 1951 में रायगढ़ अंबिकापुर कैथोलिक डायोसीज, कुनकुरी की स्थापना हुई। 1951 की जनगणना के अनुसार इस अंचल में ईसाई धर्मावलंबियों की संख्‍या 13873 थी जो 1961 में 90359 हो गई।

सन 2010 के क्रिसमस सप्ताह में कुनकुरी के रास्ते सफर तय करते हुए याद आया, समझ की उम्र तक पूरे हफ्ते की छुट्‌टी वाला यही एक मसीही पर्व हम जानते थे। इसके अलावा भी कोई ऐसा सप्ताह होता है, पता नहीं चलता था, क्योंकि खजूर पर्व और ईस्टर, दोनों छुट्‌टी के दिन रविवार को होते और गुड फ्राइडे से इस तरह परिचित थे कि इस फ्राइडे को छुट्‌टी होती है इसलिए यह गुड है। जैसे नासमझी की उम्र में किसी नेता, प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुजरने का मतलब और महत्व, आकस्मिक छुट्‌टी होता। बाद में पता चला कि गुड फ्राइडे भी मृत्यु का ही अवकाश है।

17 अप्रैल 2011, खजूर का पर्व। चालीस दिवसीय उपवास काल के अंतिम दिन प्रभु यीशु के येरुशलम प्रवेश की स्मृति का पाम संडे। इसके बाद आरंभ होता है, पवित्र सप्ताह या पेशन वीक, जिसमें अंतिम भोज गुरुवार, सूली पर लटकाए जाने, क्रुसिफिकेशन का गुड फ्राइडे, मौन शनिवार और अगले रविवार, 24 अप्रैल को ईस्टर, मृतोत्थान या पुनरुत्थान दिवस है। 21 मार्च के पश्चात, पास्का की पूर्णिमा के बाद आने वाले 'वारों' पर तिथियां तय होती हैं। इस साल का अठवारा 17 से 24 अप्रैल, रविवार से रविवार तक है, ईस्टर अष्टक यानि ऑक्टेव ऑफ ईस्टर।

प्रत्येक समुदाय और संस्कृति में प्रकृति की इस रूप-दशा यानि वसंत और पूर्णिमा का खास महत्व है। इसी दौरान ज्यादातर मान्यताओं में नया साल आरंभ होता है। ईसाई विश्वास में यह प्रभु यीशु की मृत्यु और पुनः जीवित होने से जुड़ा है। वैसे ईस्टर, ईओस्तर या ओइस्तर उच्चारित किए जाने वाले शब्द से बना है, जो वसंत की यूरोपीय देवी का नाम है और जर्मन कैलेंडर का अप्रैल महीना इओस्तर मोनाथ कहलाता है।

कुनकुरी पहुंच गए। रोजरी की रानी महागिरजाघर का परिसर, क्रिसमस पर विशेष रूप से सजा-धजा (सजावट में ध्वज का विशेष महत्व होता है, शायद इसीलिए सजा के साथ युति है धजा)।

यह एशिया महाद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा गिरजाघर के रूप में प्रसिद्ध है, जहां 5 से 7 हजार तक लोग एक साथ आ सकते हैं। 1962 में बिशप स्टानिसलास तिग्गा ने इसकी नींव रखी लेकिन शुरुआती काम के बाद 1969 तक निर्माण स्थगित रहा, क्योंकि इस्तेमाल किए जा रहे स्थानीय सतपुड़िया पहाड़ के पत्थर में यूरेनियम होना बताया गया। इन पत्थरों का, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने की शंका निर्मूल मानी गई तब 1969 में फिर से काम आरंभ हुआ। 1971 में भीतरी भाग पूरा हो गया और यहां नियमित रविवारीय पूजा होने लगी।

1971 से 1978 तक दूसरी बार अर्थाभाव के कारण काम रुका रहा। 27 अक्टूबर 1979 को निर्माण पूरा हुआ। इस अनूठी संरचना के वास्तुकार जे एन करसी हैं। यहां बिशप स्टानिसलास तिग्गा के अलावा तीन अन्य बिशप दफनाए गए हैं।


अब फिर से कहूं- भूत की नींव पर गगनचुम्बी भविष्य। गुड फ्राइडे, ईस्टर की जीवन संभावनायुक्त मृत्यु का पर्व। किसी एक संस्कृति का नहीं समूची प्रकृति का उत्सव। चंद्रकला के साथ ऋत्‌ चक्र का, शिशिर के अवसान पर नये वसंत के जन्म-पर्व का अभिनंदन।

कुनकुरी के फादर सिकंदर किसपोट्‌टा द्वारा दी गई जानकारियों के लिए उनका आभार। चलते-चलते थोड़ा शब्द विलास। किस का अर्थ है वराह, पोट्‌टा यानि आंत-अंतड़ियां। सिकंदर शब्द गड्‌ड-मड्‌ड हो रहा है, लेकिन क्रम कुछ इस तरह याद आता है। हमारा चन्‍द्रगुप्‍त, यूनानी सेण्‍ड्रॉकोट्टस बनता है वैसे ही मूल यूनानी अलेक्जेंडर भगवतशरण उपाध्याय का अलिकसुंदर, फिर जयशंकर प्रसाद का अलक्षेन्द्र और तब यह फारसी उच्चारण सिकंदर। (महेन्‍द्र वर्मा जी ने टिप्‍पणी कर सिकंदर के लिए प्रयुक्‍त दो अन्‍य शब्‍द 'अलेक्सांद्र और इस्कंदर' जोड़े हैं, उनका आभार।)

Tuesday, April 12, 2011

बस्‍तर में रामकथा

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। क्रम से नाम लें तो हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा। ग्रंथों के सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। ग्रंथ में छपा है मूल्य : आदिवासियों में निर्मूल्य वितरण। वैसे तो सेंटीमीटर और ग्राम में माप-तौल भी हो सकती है, लेकिन किसी ग्रंथ का ऐसा तथ्‍य-आग्रही मूल्य-महत्व बताना वाजिब नहीं, सो भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्‍या क्रमशः 688, 454 और 644 है।
प्रथम खण्ड माड़िया रामकथा (कोयामाटते रामना पाटा-वेसोड़) लिंगो ना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) के लिए कहा गया है कि यह ''रामकथा'' बस्तर की माड़िया-जनजातियों की वाचिक परम्परा की पुनर्रचना है। यह भी बताया गया है कि बस्तर की माड़िया जनजाति दो वर्गों में विभाजित है- अबुझमाड़ की अबुझमाड़िया, तथा दक्षिण बस्तर की दंडामी माड़िया।

अबुझमाड़िया तथा दंडामी माड़िया यद्यपि जातीय नाम से समान हैं, किन्तु इनकी बोलियां आपस में दुर्बोध हैं। अबुझमाड़िया मुरिया के बहुत अधिक निकट है। कोई भी मुरिया अबुझमाड़िया को आसानी से समझ सकता है, किन्तु किसी दंडामी माड़िया के लिए अबुझमाड़िया एक अबूझ पहेली है।

प्रो. हीरालाल शुक्ल
संपादक ने स्पष्ट किया है कि- ''रामकथा की पुनर्रचना के लिए सबसे पहले मैंने इनके मौखिक साहित्य में व्याप्त रामकथा के संदर्भों का संकलन किया था और तदुपरांत टूटी हुई कड़ियों का तुलसीदास के रामचरितमानस के प्रसंग में ढालने का प्रयास किया।''

ग्रंथ की भूमिका में यह उपयोगी और रोचक स्पष्टीकरण है कि गोंडी की सभी बोलियों में लोकगीत के लिए पाटा शब्द समान रूप से प्रचलित है। लोककथाओं के यहां तीन रूप मिलते हैं-
(क) सामान्य कथा के लिए अबुझमाड़िया में पिटो, दंडामी माड़िया में वेसोड़, तथा दोर्ली में शास्त्रम शब्द प्रचलित है। 
(ख) पौराणिक और धार्मिक कथाओं के लिए दंडामी माड़िया तथा दोर्ली में पुरवान शब्द प्रचलित है, जो पुराण का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है।
(ग) दंडामी माड़िया में वेसोड़ किसी कथा का वाचक है, जबकि दोर्ली में यह गीतकथा का उपलक्षक है। दंडामी माड़िया में गीतकथा के लिए पाटा-वेसोड़ शब्द प्रचलित है।

द्वितीय खण्ड मुरिया-रामचरितमानस लिंगोना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) में संपादक के अनुसार वे लगभग तीन दशकों तक मुरिया समाज में रामचरितमानस के गोंडी प्रारूप पर घोटुल के युवक-युवतियों के साथ बैठकर 'पाटा' बनाते रहे। उन्हीं के शब्दों में ''मैं इन युवक-युवतियों को मुरिया गोंडी में रामचरितमानस का अर्थ समझाता और अपने आशु कवित्व के कारण ये शीघ्र पाटा पारने लगते। दो दशक के बाद समूचे रामचरितमानस का इसीलिए (सन 1977 में) मुरिया में अनुवाद संभव हो सका।'' इसके साथ मुरिया रामकथा के 36 लोक-गायकों और 4 गायिकाओं की सूची दी गई है।

हलबी रामकथा की भूमिका में संपादक का कथन है- ''1962 से 1992 के मध्य तीन दशकों तक मेरे द्वारा सम्पादित प्रेरित या लिखित अब तक दर्जनों ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें रामकथा, गुंसाई-तुलसीदास तथा हलबी-रामचरित मानस (अक्षरशः सम्पूर्ण अनुवाद) उल्लेखनीय है। प्रस्तुत ''हलबी-रामकथा-मंजूषा'' में अब तक अप्रकाशित शेष रचनाओं का संग्रह है।

हलबी रामकथा के संपादकीय का अंश है-
''रामचरितमानस'' भारतीय-साहित्यचो अनुपम गंगा आय। एचो अमरुतचो सुआदके सियान-सजन, माई-पीला पातो एसत। एचो थाहा पाउक नी होय। एचो खोलने, गड़ेयाने डुबकी मारुन गियानचो रतन पाउन-पाउन कितरोय लोग सवकार होते एसत।

ए बड़े हरिकचो गोठ आय कि हलबी 'रामचरित' असन मौंकाने मुर होयसे, जे मौंकाने आमचो देश आजादी चो '50वीं बरिसगांठ' मनाएसे। 'रामचरितमानस' चो लिखलो 500 बरख पूरली।

मके बिसवास आसे कि ए किताबचो अदिक चलन होयदे। बस्तरचो बनवासी-रयतचो सांस्कृतिक भूक बुतातो उवाटने ए पोथी खिंडिक बले साहा होली जाले, आजादीचो 50वीं बरिसगांठ चो भाइग होली समझा।

पश्‍च-लेखः

ऊपर का लगभग पूरा हिस्सा इन ग्रंथों से लिया गया है। अब कुछ अपनी बात। वैसे तो थोड़ा कान खुला रखने वाले हिंदीभाषी के लिए समझना मुश्किल नहीं, फिर भी हलबी वाले पहले पैरा का अनुवाद इस तरह होगा-

रामचरितमानस भारतीय साहित्य की अनुपम गंगा है। इसके अमृत का स्वाद बड़े-बुजुर्ग, अबाल-वृद्ध पाते रहते हैं। इसकी थाह पाई नहीं जाती। इसकी गहराई में उतर कर, डुबकी मार के (लगाकर), ज्ञान का रत्न पा-पाकर कितने ही लोग साहूकार (सम्पन्न) होते रहते हैं।

भाषाई दृष्टि से अर्द्ध-मागधी या पूर्वी हिंदी की एक जबान (यहां तकनीकी-पारिभाषिक प्रयोजन न होने के कारण भाषा, बोली, उपभाषा के बजाय 'जबान' से काम चलाने का प्रयास है) छत्तीसगढ़ी है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के साथ उत्तरी भाग में सरगुजिया और दक्षिण में हलबी स्वरूप, व्यापक और लगभग संपूर्ण संपर्क माध्यम है। पेवर छत्तीसगढ़ी (ठेठ-खांटी छत्तीसगढ़ी में शुद्ध के लिए शायद अंगरेजी 'प्योर' का अपभ्रंश पेवर शब्द प्रचलित है) या मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ की जबान में भोजपुरी-मगही स्वाद लिए सरगुजिया (सादों या सादरी सहित) और मराठी महक व उड़िया छौंक वाली हलबी की भाषाशास्त्रीय विविधता रोचक है ही, इनकी वाचिक परम्परा के रस से थोड़ा परिचित होते ही, अरसिक भी इनमें ऊभ-चूभ होने लगता है। अपनी कहूं तो पहली जबान छत्तीसगढ़ी के बाद दोनों मौसियों सरगुजिया और हलबी से परिचित होने पर मुझे मातृभूमि पर सकारण गर्व होने लगा और भारतमाता के समग्र सांस्कृतिक रूप का कुछ अनुमान हो पाया।

त्वरित संदर्भ के लिए यह कि बस्तर अंचल पौराणिक-ऐतिहासिक दण्डकारण्य और महाकान्तार के नाम से जाना जाता था। पूर्व रियासत बस्तर का मुख्‍यालय आज की तरह ही जगदलपुर रहा, वैसे पुरातात्विक प्रमाणयुक्त बस्तर नाम का एक छोटा गांव भी जगदलपुर के पास ही है। रियासत के बाद बस्तर जिला, फिर संभाग बना। फिर उत्तरी बस्तर कांकेर जिला बना और दक्षिणी हिस्सा दंतेवाड़ा। सन 2007 से बीजापुर और नारायणपुर जिलों के गठन के बाद, अब 18 जिलों और 4 संभाग वाले छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर संभाग में 6, सरगुजा में 4, बिलासपुर में 3 तथा बस्तर संभाग में 5 जिले हैं।

कुछेक विद्वान रावण की लंका को बस्तर में ही मानते हैं। बस्तर के भाषाई-सांस्कृतिक सेतु स्वरूप इस ग्रंथ की तैयारी और प्रकाशन के दौरान न सिर्फ इसकी खोज-खबर रही, बल्कि एकाध अवसर पर मैंने सेतुबंध की गिलहरी-सा उत्साह भी महसूस किया था, वह आज रामनवमी पर याद कर रोमांचित हूं।

श्री हरिहर वैष्‍णव द्वारा ई-मेल से बस्‍तर में रामकथा पर प्राप्‍त महत्‍वपूर्ण सूचना (टिप्‍पणी के रूप में प्रकाशित) तथा दो छायाचित्र नीचे लगाए गए हैं -

Monday, April 4, 2011

चाल-चलन

शास्‍त्र वचन चरैवेति, चलते रहो... को अपनाया गांधीजी ने, दाण्‍डी यात्रा की और उनकी चाल ने कितने ही कमाल किए। उन्‍होंने कहा- पैदल चलना कसरतों की रानी है। बाद में यही बात शुभचिंतकों ने कही, फिर डॉक्‍टरों ने। अब तो शुरू करना ही होगा, सोचकर लेने गए टी-शर्ट और जूता। लेकिन यह क्‍या, प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः। 'थीम टी-शर्ट' धारण करने से पहले ही किसी ने टोक दिया- सतजुगी चरैवेति और एकला चलो के दिन लद गए, अब एसी जिम के ट्रेडमिल पर वॉक का जमाना है। 'कीप वॉकिंग' का तर्ज, गांधी का ही क्‍यों न हो, अब 'राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला' हो गया है। आप खु्द समझदार हैं, आगे चले चलिए ...

गांधी और नशे से जुड़ी एक और बात। छत्‍तीसगढ़ में गुणवत्‍तापूर्ण विदेशी शराब का व्‍यापार और सरकार के लिए राजस्‍व अर्जन के उद्देश्‍य से गठित इकाई का एक समाचार था- मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ स्टेट बेवरेजेस कार्पोरेशन के नशा मुक्त जीवन जीने का संदेश देने वाले पोस्टरों का विमोचन किया।

समाचार में आगे है- वाणिज्यिक कर मंत्री ने मुख्यमंत्री को बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में कार्पोरेशन को 29 करोड़ रूपए का लाभ अर्जित हुआ है। शराब से राजस्‍व/लाभ अर्जन वाली संस्‍था द्वारा नशा मुक्ति के विज्ञापन का विपर्यय, अनूठा प्रयास है।

इस इकाई का काम विदेशी शराब से जुड़ा है, नाम भी अंगरेजी है। इसका हिंदी नाम शायद है नहीं, होगा तो प्रचलित कतई नहीं। कारण जान पड़ता है कि दारू या शराब के बजाय मदिरा/मादक पेय/बेवरेज कहना शालीन लगता है, जैसे गुप्‍तांग और उससे जुड़ी क्रिया-प्रक्रियाओं के लिए ठेठ बानी को अश्‍लील, अमर्यादित और भदेस मान कर इसके बजाय संस्‍कृत, उर्दू या अंगरेजी के पर्यायवाची का इस्‍तेमाल किया जाता है।

टी-शर्ट से आगे बढ़े, चाल बहकी लगे तो माफ करें और आएं 'वॉक' के लिए जरूरी जूते पर। पढ़े-लिखों की तरह अब हम भी समझदार हो गए हैं। हां, बचपन की बात कुछ और थी, ज‍ब कहीं किसी कापी-किताब या कागज के टुकड़े पर भी पैर पड़ जाए, उस पर अक्षर हों, कुछ लिखा-छपा हो तो उसे माथे से लगाते थे। अब बचपना नहीं रहा हम पढ़े-लिखे समझदार हो गए, मुक्‍त कर लिया है अपने को इन रूढि़यों और संस्‍कारों से। देखिए यह जूता, चप्‍पल या कह लें पादुका और 'वेलकम' से स्‍वागत करता पांवदान।

बाल मन परेशान है, जो जूता पसंद आ रहा है, उस पर देश का नाम, अक्षर-भाषा और पूरी राष्‍ट्रीयता यानि हमारे राष्‍ट्र ध्‍वज जैसा ही तिरंगा भी बना है। फिर 'वेलकम' पांवदान और एक प्‍यूमा इंग्‍लैण्‍ड चप्‍पल ही नहीं यहां तो पूरी श्रृंखला है।

पढ़ाई-लिखाई सब जूती की नोक पर और सारी राष्‍ट्रीयता पैरों तले। समझदार मन ने जमा-नामे शुरू किया। क्‍या इंग्‍लैण्‍ड प्‍यूमा चप्‍पल हमारी कुंठा को राहत देने के लिए है। यह भी जुड़ रहा है कि प्‍यूमा, जर्मन बहुराष्‍ट्रीय कंपनी है। वही जर्मनी, जिसके इतिहास से आप परिचित हैं ही, याद कीजिए, जर्मन कुत्‍ते की नस्‍ल इंग्‍लैण्‍ड आई तो जर्मन शेफर्ड नाम तक से परहेज हुआ और नामकरण हुआ अलसेशियन।

समझदार मन, बाल मन को अपने साथ चला ले रहा है- सुबह-सबेरे पैदल चल कर स्‍वस्‍थ्‍य बने रहने के बजाय शहर के अंदेशे से काजी जी ही क्‍यों दुबले हों, पंडित विचार करें, क्‍या चरैवेति का अर्थ 'सब चलता है' नहीं निकाला जा सकता।

उत्‍पादों और उनमें समानता की जानकारी अनुपम से और कुछ चित्र गूगल से साभार

पुनश्‍चः

इस संदर्भ में मई 2011 के पहले सप्‍ताह में आस्‍ट्रेलियन फैशन वीक में लीसा बुर्क के लक्ष्‍मी चित्रांकित स्विम सूट प्रदर्शित करने की ताजी घटना, सन 2005 में राम के चित्र वाले मिनेली जूतों के विवाद की याद दिलाती है।