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Sunday, October 31, 2010

छत्तीसगढ़ राज्य

ठाकुर रामकृष्‍ण सिंह 
 छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के इतिहास और पृष्ठभूमि की तलाश में जितनी सामग्री मेरे देखने में आई उनमें लगभग सभी, संस्मरण, श्रेय और दावों के अधिक करीब हैं। स्रोतों-दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास की अपनी कमियां हो सकती हैं, लेकिन जड़ और जमीन के लिए यह आवश्यक है। इस दृष्टि से अग्रदूत समाचार पत्र के 30 नवम्बर 1955 अंक में अंतिम पृष्ठ-8 का मसौदा, जिसमें ''गोंडवाना प्रान्त की मांग क्यों ?'' शीर्षक के साथ परिचय है कि ''एस.आर.सी. की रिपोर्ट पर हमारी विधान सभा ने पिछले सप्ताह विचार-विमर्श किया। कुछ सदस्य एक 'गोंडवाना प्रान्त' की मांग कर रहे हैं। ठाकुर रामकृष्णसिंह एम.एल.ए. ने इस मांग के समर्थन में विधान-सभा में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे पठनीय है।'' उक्त का अंश इस प्रकार है-



अध्यक्ष महोदय इस सदन में आज चार-पांच रोज से जो भाषावार प्रान्त के हिमायती हैं उन्होंने भाषण दिए। उससे यह स्पष्ट हो गया कि एक ही भाषा के बोलने वाले एक ही भाषा के बड़े प्रान्त में नहीं रहना चाहते। आयोग ने या हाई कमान्ड ने जो इस बात की कोशिश की कि एक भाषा के लोग एक ही प्रान्त में रहें तो इसका भी विरोध इसी सदन में आज  5 दिनों से हम देख रहे हैं। मराठी भाषा बोलने वाले लोग ही संयुक्त महाराष्ट्र में रहना नहीं चाहते। वे अपना अलग प्रान्त बनाना चाहते हैं। उनके भाषण में एक दूसरे के प्रति कटु भाव थे। इससे मुझे भास होता है कि जब एक भाषा के बोलने वाले आपस में एक दूसरे के प्रति इतनी कटु भावना रख सकते हैं तो वे दूसरी भाषा बोलने वाले के प्रति कैसी भावना रखेंगे। इन सब कारणों के अध्यक्ष महोदय, मैं एक भाषा के एक प्रान्त बनाने की योजना का विरोध करता हूं।

दूसरी बात जो श्री जोहन ने हमारे मुख्‍यमंत्री जी के प्रस्ताव में संशोधन रखा है उसका मैं समर्थन करता हूं। इस संबंध में अभी पहले हमारे एक उपमंत्री जी ने बहुत सुन्दर ढंग से ऐतिहासिक भूमिका दी है और वह इतनी यथेष्ठ है कि उसको मैं दोहराना नहीं चाहता। हम लोग जो गोंडवाना के समर्थक हैं वे यह चाहते हैं कि हमारा एक ऐसा कम्पोजिट प्रदेश बने जिनमें वे मराठी भाषी जो आज 95 वर्ष से हमारे साथ रहते आये हैं वे भी साथ रहें और अभी तक जिस प्रकार प्रेमपूर्वक रहते आये हैं उसी प्रकार रहें।

अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्तावित मध्यपेद्रश का इसलिये विरोध करता हूं कि वह इतना अन-बोल्डी है कि उसमें एडमिनिस्ट्रटिव कनवानिअन्स बिलकुल नहीं रहेगा। अध्यक्ष महोदय, मध्यभारत, भोपाल और विन्ध्य-प्रदेश का महाकोशल प्रदेश से कभी भी शासकीय संबंध नहीं रहा है। पर्वत जंगल तथा अन्य कठिनाइयों के कारण आपस में आवागमन के लिए जो रेल और सड़क बनाने की सुविधा होनी चाहिए या इनको एक स्टेट के एडमिनिस्ट्रेशन में लाने के लिए जो सुविधा होनी चाहिये वह सुविधा बिलकुल नहीं है। आपने, अध्यक्ष महोदय, इस बात पर भी गौर किया होगा कि हमारे बस्तर से मध्यभारत की कितनी दूरी है। 800 से एक हजार मील की दूरी होती है। ऐसे प्रदेश में बस्तर जैसे पिछड़े प्रदेश में रहने वाला व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है यह सोचने की बात है।

दूसरी बात यह है कि हमारा छत्तीसगढ़, जो कि देश को बहुत ही पिछड़ा हुआ भाग है, इस बड़े प्रदेश में कभी पनप नहीं सकता। इसकी जो तरक्की होनी चाहिये इसकी तरफ से जो ध्यान देना चाहिये वह कभी भी प्रस्तावित मध्यप्रदेश के शासन में नहीं हो सकता। अध्यक्ष महोदय, आपने देखा होगा कि राजधानी के प्रश्न पर भोपाल, सागर, इटारसी और सबसे मुख्‍य जबलपुर की चर्चा होती रही पर किसी ने भी यह गौर नहीं किया कि हमारे बस्तर से या छत्तीसगढ़ से ये स्थान कितनी दूरी पर हैं। मैंने इस संबंध में इतने भाषण सुने पर किसी ने भी छत्तीसगढ़ का जिक्र नहीं किया। यह नहीं सोचा गया कि इन स्थानों से छत्तीसगढ़ कितनी दूर हो जावेगा।

हालांकि अध्यक्ष महोदय, मैंने अभी प्रस्तावित मध्यप्रदेश का विरोध किया है मगर जो होना है वह तो होकर रहेगा इसलिये इस सिलसिले में मैं यहां एक बात रिकार्ड करा देना चाहता हूं कि चाहे राजधानी भोपाल हो या सागर हो या जबलपुर हो पर उसमें हमारे छत्तीसगढ़ के हित का ध्यान रखा जाना चाहिये और वह यह है कि इसमें रायपुर शहर को उप-राजधानी बनाया जावे। रायपुर शहर छत्तीसगढ़ का हृदय है और छत्तीसगढ़ के सभी स्थानों से बराबर दूरी पर है। आज के हमारे मध्यप्रदेश की राजधानी नागपुर थी फिर गवर्नमेंट बराबर जबलपुर को उप-राजधानी मानती चली आ रही है इसलिये हम चाहते हैं कि सिर्फ सिर और चेहरे को ही न देखा जावे। इन्दौर, भोपाल और जबलपुर तो बड़े बड़े शहर हैं वे आकर्षण के केन्द्र हो सकते हैं। पर केवल चेहरे को ही न देखा जावे। हम दूर में जो गरीब लोग इस छत्तीसगढ़ में रहेंगे उनके ऊपर भी यथोचित ध्यान दिया जाना चाहिये इसलिए मेरा निवेदन है कि नवीन मध्यप्रदेश में रायपुर को उप-राजधानी बनाया जावे। यहां जो गरीब लोग रहे हैं उनमें पोलिटिकल जाग्रति नहीं है इसका प्रमाण है कि 82 सदस्यों में से किसी ने भी राजधानी के प्रश्न पर यह नहीं कहा कि रायपुर को उप-राजधानी बनाया जावे। इससे पता चलता है कि ये लोग कितने बैकवर्ड हैं। इसलिये मैं चाहता हूं कि प्रस्तावित मध्यप्रदेश का यदि निर्माण होता है तो रायपुर को उप-राजधानी बनाने के अलावा हाईकोर्ट, बेन्च, रेवन्यू बोर्ड बेन्च और दीगर फेसिलटीज जो होती हैं वे दी जावें। अध्यक्ष महोदय, मैं इन शब्दों के साथ गोंडवाना प्रान्त की मांग का समर्थन करता हूं।

डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह

उक्त अंश के साथ प्रासंगिक तथ्य है कि छत्‍तीसगढ़ में 20वीं सदी के चौथे दशक में मानव विज्ञान के क्षेत्र में हुए अध्ययन का परिणाम सन 1944 में ''द गोंडवाना एण्ड द गोंड्स'' पुस्तक के रूप में सामने आया। क्षेत्रीय अस्मिता को अकादमिक पृष्ठभूमि के साथ रेखांकित करने का यह गंभीर प्रयास डॉ. इन्द्रजीत सिंह (1906-1952) द्वारा किया गया, जो तत्कालीन सीपी एण्ड बरार के पहले मानवशास्त्री हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन की 10वीं वर्षगांठ पर राज्य निर्माताओं का नमन।

Monday, October 25, 2010

छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म

मनु नायक
छत्‍तीसगढ़ी की पहली फिल्‍म, अप्रैल 1965 में रिलीज मनु नायक की 'कहि देबे संदेस' थी, इसी दौर में विजय पांडे-निरंजन तिवारी की 'घर द्वार' भी बनी। वैसे सन 1953 में आई फिल्मिस्‍तान की 'नदिया के पार' के आरंभिक दृश्‍यों में मल्‍लाहों के किशोर साहू लिखित संवाद में छत्‍तीसगढ़ी पुट है। इस पृष्‍ठभूमि और इतिहास के साथ छत्‍तीसगढ़ के फिल्‍मोद्योग, जिसे रालीवुड फिर छालीवुड कहा जा रहा है, का सही मायनों में सिलसिलेवार आरंभ, छत्‍तीसगढ़ राज्‍य गठन 1 नवंबर 2000 के हफ्ते भर पहले आई फिल्‍म मोर छइंहा भुंइया' से हुआ। इस दशक की बात करें तो अजीब जान पड़ता है कि छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍मों की सूची के लिए काफी मशक्‍कत करनी पड़ती है और फिर भी फिल्‍म संबंधी तथ्‍य को लेकर भ्रम बना रहता है। मैंने एक पोस्‍ट में छत्तीसगढ़ी फिल्मों और गीतों पर गंभीर, अधिकृत अध्ययन किए जाने की बात लिखी है। छत्‍तीसगढ़ी गीतों पर किसी अनाम ब्‍लॉगर ने 'छत्‍तीसगढ़ी गीत संगी' आरंभ किया, लेकिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए लगा कि सुझाव जैसी यह गुहार अनसुनी रही, इसलिए आधा-अधूरा ही सही, शुरू कर देना जरूरी लगा, सो अंग्रेजी अकरादिक्रम में अब तक रिलीज छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍मों की सूची -

01 अब मोर पारी हे, 02 अंगना, 03 ए मोर बांटा, 04 बैर, 05 बंधना, 06 बनिहार, 07 भांवर, 08भुंइया के भगवान, 09 भोला छत्तीसगढ़िया, 10 छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया,
 11 छत्तीसगढ़ महतारी, 12 गजब दिन भइगे, 13 घर द्वार, 14 गुरांवट, 15 जय मां बम्लेश्वरी, 16 जय महामाया, 17 झन भूलौ मां बाप ला, 18 कहि देबे संदेश, 19 कंगला होगीस मालामाल, 20 कारी,
 21 किसान मितान, 22 लेड़गा नं 1, 23 महूं दीवाना तहूं दीवानी, 24 मया, 25 मया देदे मया लेले, 26 मया देदे मयारू, 27 मया होगे रे, 28 मया के बरखा, 29 मयारू भौजी, 30 मोंगरा,
 31 मोर छइंहा भुंइया, 32 मोर धरती मईया, 33 मोर गवंई गांव, 34 मोर संग चलव, 35 मोर संग चल मितवा, 36 मोर सपना के राजा, 37 नैना, 38 परसुराम, 39 परदेशी के मया, 40 प्रीत के जंग,

41 रघुबीर, 42 संगवारी, 43 तीजा के लुगरा, 44 तोर आंचल के छइयां तले, 45 तोर मया के मारे, 46 तोर मया मा जादू हे, 47 तोर संग जीना संगी तोर संग मरना, 48 तुलसी चौरा, 49 टुरा रिक्शावाला, 50 टुरी नं 1.

इसके साथ कुछ ऐसे नाम भी मिले, जिनके लिए बताया गया कि इनमें वीडियो फिल्‍म/ बिना सेंसर सर्टिफिकेट की/ डब की गई हैं, ये नाम हैं -
01 अनाड़ी संगवारी, 02 चंदन बाबू, 03 हर हर महादेव, 04 लेड़गा ममा, 05 लोरिक चंदा, 06 मन के बंधना, 07 मया मा फूल मया मा कांटे, 08 माटी मोर म‍हतारी, 09 पुन्‍नी के चंदा, 10 सीता, 11 संग म जीबो संग म मरबो, 12 मोर सैंया



छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍मों के निर्माता - मनु नायक, विजय पान्‍डे, शिवदयाल जैन, प्रेम चन्‍द्राकर, राकी दासवानी, अलक राय, मोहन सुन्‍दरानी, मधुकर कदम, दुष्‍यंत राणा, मनोज वर्मा, क्षमा‍निधि मिश्रा, संतोष जैन, रूपाली-संदीप तिड़के, संतोष सारथी, निर्देशक - निरंजन तिवारी, सतीश जैन, प्रेम चन्‍द्राकर, क्षमानिधि मिश्रा, मनोज वर्मा, डॉ. पुनीत सोनकर, असीम बागची, मनु नायक। संगीत - मलय चक्रवर्ती, कल्‍याण सेन, सुनील सोनी, दुष्‍यंत हरमुख, भूपेन्‍द्र साहू, गीत - हनुमंत नायडू, हरि ठाकुर, लक्ष्‍मण मस्‍तुरिया, राकेश तिवारी, कुबेर गीतपरिहा, प्रीतम पहाड़ी, कैलाश मांडले, रामेश्‍वर वैष्‍णव, गिरवरदास मानिकपुरी गायन - लता मंगेशकर, मोहम्‍मद रफी,महेन्‍द्र कपूर, साधना सरगम, कुमार शानू, अनूप जलोटा, विनोद राठौर, उदित नारायण, सुदेश भोंसले, कविता कृष्‍णमूर्ति, सुमन कल्‍याणपुर, मीनू पुरषोत्‍तम, मन्‍ना डे, बाबा सहगल, अनुराधा पौडवाल, सोनू निगम, अभिजीत, बाबुल सुप्रियो और सुरेश वाडकर जैसे बालीवुड वालों के साथ स्‍थानीय प्रतिभाओं में ममता चंद्राकर, अलका चंद्राकर, मिथिलेश साहू, सुनील सोनी, अनुज शर्मा, प्रभा भारती आदि की लंबी सूची है।

अभिनय - अनुज शर्मा, प्रकाश अवस्‍थी, करन खान, अनिल शर्मा, प्रदीप शर्मा, लोकेश देवांगन, रा‍जू दीवान, मनोज जोशी, योगेश अग्रवाल, संजय बत्रा, चंद्रशेखर चकोर, शशिमोहन सिंह, अंकित जिंदल/ निशा गौतम, पूनम नकवी, प्रीति डूमरे, विभा साहू, शिखा चिदाम्‍बरे, रीमा सिंह, स्‍वप्निल कर्महे, सीमा सिंह, सिल्‍की गुहा/ मनमोहन ठाकुर, अनिल वर्मा, रजनीश झांझी, पुष्‍पेन्‍द्र सिंह, उपासना वैष्‍णव, सुमित्रा साहू, संजू साहू, रंजना नोनहारे/ शिवकुमार दीपक, कमल नारायण सिन्‍हा, संजय महानंद, शैलेष साहू, निशांत उपाध्‍याय, बसंत दीवान, प्रमोद भट्ट, हेमलाल कौशिक, क्षमानिधि मिश्रा।

ऊपर आए नाम महत्‍व या प्राथमिकता के अनुसार नहीं हैं, न ही सूची, यह मात्र कुछ उदाहरण हैं।

छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍मों का तथ्‍यात्‍मक, पक्‍का लेखा-जोखा बनाने के लिए इस शुरूआत के साथ प्रस्‍ताव है कि निम्‍नानुसार बिंदुओं पर जानकारी-सूची तैयार करने की तुरंत आवश्‍यकता बनने लगी है, प्रस्‍तावित बिंदु हैं - फिल्‍म का नाम, मुहूर्त दिनांक, सेंसर सर्टिफिकेट का वर्ग और दिनांक, रिलीज दिनांक, निर्माता/बैनर, निर्देशक, कहानी-पटकथा-संवाद, संगीत, गीत, गायक-गायिका, अभिनेता इसके साथ तकनीशियनों और फिल्‍म की सफलता आदि अन्‍य पक्ष।

पहले भी निवेदन कर चुका हूं कि यह मेरी प्राथमिक जानकारी का क्षेत्र और विषय नहीं है इसलिए प्रारूप, सूची, जानकारी में संशोधन-सुझाव का स्‍वागत रहेगा। कृपया जानकारी सिर्फ नाम जोड़ने-काटने वाली नहीं, बल्कि उक्‍तानुसार बिंदुओं पर तथ्‍यात्‍मक हों, अगर संभव हो तो फिल्‍मवार जानकारी का सहयोग दें, यानि किसी एक फिल्‍म से संबंधित उक्‍त सभी बिंदुओं पर एक साथ अधिकृत जानकारी।

बिना खास तैयारी के उत्‍साह के चलते शुरू तो कर दिया है, लेकिन कोई यह बीड़ा उठाना चाहे तो उनके लिए हरसंभव सहयोग सहित आभारी रहूंगा। यहां उल्लिखित सभी नामों के प्रति आदर।

Monday, October 18, 2010

फिल्मी पटना

या कहें- 'पटना : मेमोरीज, ड्रीम्स, रिफ्लेक्शन्स'। पटना, मुझे फिल्मी सा ही याद आता है। कई बार इस तरह सोचना भी भाता है कि पटना नामक फिल्म तो नहीं देख ली, जिसकी स्मृति को कुछ पढ़े-सुने के साथ गड्‌ड-मड्‌ड कर, इसे अपना देखा शहर मान लेता हूं। ..... शुरू करें-

मैं राजगीर के रास्ते पर हूं। फिर मुझे सीधे दिखाई देता है, रोप-वे। ऐसा कुछ होता है, सुना भी नहीं था, वह अब सिर्फ देख ही नहीं रहा हूं, सवार हो चुका हूं, चारों ओर हरियाली घाटी। ..... रास्ते में कहीं गरम पानी का सोता और कुंड मिलता है, ऐसा कैसे होता होगा, प्राकृतिक रूप से या पर्यटकों के लिए किया गया इंतजाम है ? ..... नालंदा आता है, कितनी सीढ़ियां, कितने कमरे, कितने किस्से। किसने बनवाया, क्यों दबा, कैसे पता लगा, खोदा किस तरह ? सवाल बने रहे, तब तक और क्या सूझे। .....पावापुरी, साफ-सुथरा संगमरमरी, चारों ओर खिले कमल से लबालब भरा बड़ा सा तालाब, ऐसा सचमुच होता है ? यह जिक्र कर जैन परिचितों के बीच ईर्ष्या का पात्र बनने की सूक्ष्म हिंसा कई बार कर चुका हूं।

यह सब कम फिल्मी नहीं लगा था, याद ताजा थी और तब तक फिल्म आ गई 'जानी मेरा नाम'। इसमें रोप-वे भी दिख गया और नालंदा भी। मेरे लिए यह वह पहली फिल्म थी, जिसमें दिख रही चीजों को फिल्म से पहले आमने-सामने देख चुका हूं। हां, इस फिल्म में ट्रांसमीटर बनाकर दिखाया गया फिलिप्स फिएस्टा ट्रांजिस्टर हमारे घर आ चुका था, यह भेद बूझ लेना और फिर उसी पर '.....वादा तो निभाया' सुनना, नालंदा और रोप-वे ..... याद ताजी कर देता था।
  
बचपन की याद, तब गांधी सेतु नहीं था। वो महेन्द्रू घाट के शीशे वाले रेस्टोरेंट से स्टीमर को आते देखना तो 'जैसा फिल्मों में होता है .....' लगा था। यह याद तब और गहरा गई, जब कहीं अविश्वसनीय सा पढ़ा कि अस्सी की आयु पूरी कर चुके बुद्ध, यहां से अंधेरी बरसाती रात में उफनती गंगा, तैर कर दूसरे पाट-हाजीपुर, पहुंचे थे। फिल्म सिद्धार्थ का गीत 'ओ नोदी रे कोथाय तोमार देश .....' सुनकर मैं मानता था कि फिल्म में बुद्ध के गंगा पार करने का भी दृश्य होगा। महेन्द्र को संघमित्रा के साथ, अशोक ने यहीं-कहीं से दूर देस के लिए रवाना किया होगा। ..... किसी पटना जाने वाले से मैंने पूछ लिया था, कहां जा रहे हैं, जवाब मिला था 'बाढ़'। यह गांव का नाम निकला, मुझे पहले अजूबा फिर मजेदार लगा था।

कभी कॉलेज टूर में नेपाल से पटना आना था। काठमांडू घूमते हुए एयरपोर्ट गए और पटना का टिकट पूछा। एस्कर्शन टीम के रूप में कन्सेशन भी मिल गया, भारतीय रुपयों में हिसाब लगाकर देखा तो समाइत में था। इस तरह पहली 'अंतरराष्ट्रीय' हवाई यात्रा कर, हिमालय के ऊपर से उड़ कर अपने वतन में पटना लैण्ड किया। विमान से बाहर निकलते हुए सावधान होकर, मानों खुद को कैमरे की निगाह से देख रहे हों, धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर कर बाहर आए, ..... आसमान से उतरे, सपनों से हकीकत में।

पटना के गांधीनाम-सेतु के साथ गांधी मैदान का नाम सुन रखा था। मालूम हुआ कि आगे गांधी मैदान है, उसी तरफ बढ़ चला। घने बसे शहर के बीच अचानक खाली रह गया सा। यह शायद इसलिए और बड़ा लगा कि वहां लोग थोड़े से ही जमा थे। सीधे सुना सकने लायक समूह के सामने भोंपू-फाड़ भाषण हो रहा था। सड़क के बाईं ओर टाकीज में फिल्म थी 'चोर मचाए शोर'। फिल्म के पोस्टर और गांधी मैदान के इस भाषण की छवि जुड़कर ऐसी अंकित हुई कि कोई उत्तेजक भाषण सुनकर यह अनचाहे याद आ जाता है। जैसे टूटी और खुद कर पटी सड़क कहीं भी देखूं, समानार्थी की तरह याद आता है- 'बोरिंग कैनाल'।

शहर देखते हुए उससे पहचान बनाने के लिए गाइड-बुक से ज्यादा लोगों पर निर्भर करना मददगार होता है। जाने-अनजानों के अलावा रिक्शा वाले की निःशुल्क मार्गदर्शक सेवा लेना, उसे सारथी सम्मान देने के साथ किफायती और फायदे का सौदा लगता है। मुझे पटना के साथ भी ऐसा प्रयोग करने के कई अवसर मिले। वैसे इस समझदारी के चलते कई बार वांछित तक पहुंचने में दुगुना समय लगा है, बावजूद इसके, यह आदत बदलना मुझे अस्मिता का सवाल लगने लगता है।

सितंबर-अक्टूबर महीना। पटना में पुराना कुछ कहां देखा जा सकता है, पुराना यानि पुरातात्विक ..., पाटलिपुत्र ..., सड़क किनारे दो-तीन पढ़े-लिखे सज्जन थे, उनसे मैंने पूछा, वे मुखातिब हुए मेरे रिक्शा वाले से और अच्छी तरह समझाया कि हमें कहां-कहां जाना है। हम पहुंच गए पाटलीपुत्रा कालोनी, लेकिन रास्ते में इतना पानी भरा था कि अंदर नहीं जा सकते। बताया गया कि पॉश कालोनी है, इसलिए इसे छोड़कर आगे बढ़े। अब जिस रास्ते से हम गुजरे, गंगा हमारे दाहिने बह रही थी, ऐसा लग रहा था कि यहां नदी का जल-स्तर सड़क से ऊपर है। रिक्शावाले ने बताया कि हम बुद्धा कालोनी जा रहे हैं। मैंने सोचा कि गंगा-दर्शन हो गए और अब रिक्शा वाले से ही मार्गदर्शन लेना चाहिए।

रिक्शा वाला अब मुझे ले आया, गोलघर। रास्ते में थाना फूलपुर पढ़ा और मैंने अपने संचित सूचना का सहारा ले कर माना कि मैंने पुष्पपुर देख लिया है। 'देखा', दर्ज कर लेने जितना देखकर अपनी ठांव मिली 'केपी जायसवाल संस्थान' और पटना संग्रहालय। इतने सब के बाद यक्षी वाला दीदारगंज, कुम्हरार देखने और अगम कुंआ में सिक्का डाल कर गहराई नापने की चाह, अगली बार के लिए मुल्तवी हो गया। 'मारे गए गुलफाम' का 'तीसरी कसम' बन जाना कितना फिल्मी, कितना असली, जुगाली के लिए बचा लेता हूं।

शाम को पैदल भटकते लौटते हुए दुर्गा पूजा की रौनक और धूम से शहर कल्पना-लोक में बदल गया लग रहा है। लगा कि पटना-कलकत्ता के सांस्कृतिक रिश्ते पूजा, विदेसिया और शौकीन मारवाड़ी रईसों में सबसे सहज प्रकट है। पटना से जुड़े तीन परिचितों- शशि शेखर, संजय रंजन और सुरेश पांडे जी, को याद करता हूं-

पांडे जी रायपुर में और संजय रंजन बिलासपुर आकाशवाणी में रहे। ..... पुस्तकालयों की सदस्यता लेते हुए मेरा उत्साह ऐसा होता कि अवाप्ति क्रमांक १ से पढ़ना शुरू करूंगा, उस दौरान अपने हमउम्रों में इतना कुछ पढ़े बिरले मिले और जिनके कारण हमारे लिए 'आकाश-वाणी', आपस की बात जैसी आत्मीय हो गई। ..... बीस-पचीस साल पहले अभियंता शशिशेखर का साथ रहा। उग्र हुए बिना दृढ़ और कर्तव्यनिष्ठ, मध्यप्रदेश सरकार में मुलाजिम रहे युवा शशि ने हमेशा अपने ढंग से ही काम किया। ठंडी और सपाट विनम्रता, दबंगों पर कितनी आसानी से भारी पड़ती है, प्रत्येक अवसर पर साबित करने वाले। सिर्फ कंकड़ बाग याद है और कोई पता नहीं, कैसे तलाश करूं।

..... वैसे गंगा, मेरे लिए नदी के पर्याय जैसा शब्द है। मन के किसी तल पर हमारे अपने निजी शब्द-संदर्भ कोश भी होते हैं, जो कभी धारणा, कभी रूढ़ि तो कभी पूर्वग्रह लगते हैं, ..... और 'लिंक' के बिना असम्बद्ध जैसे भी। शायद यही रचनात्मक रूप में कभी भाव-ऋचा और स्पर्श-वास्तु बन कर उजागर होते हैं ..... खैर, कुछ अपने काम के सिलसिले में और कभी अपने शौक के चलते नदियों के किनारे, उद्गम, संगम और मुहाने पर भटकते रहने से मन अभी भी नहीं भरा है, सोच कर ही रोमांच होने लगता है। गंगा के लिए क्या कहूं, फिल्मी गीत है 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' मेरी ओर से संकल्प नहीं, बस भाव-पियरी।

टीप :

टिप्पणी करते हुए अपनी 'विद्वत्ता' निभा लेना बहुत कठिन नहीं होता। कहते हैं, किसी विषय पर जानना हो तो उस पर लेख लिखें, (इसके लिए पढ़ना पड़ेगा और) आपका काम बन जाएगा। ..... अगर बिना पढ़े ही कुछ अधिक लिखना हो तो, (लेखक-कवि गण अन्यथा न लें) अधिकतर अपनी क्षीण-सी साहित्यिक 'प्रतिभा' पर भरोसा ही साथ देता है और कई बार तो मुझ जैसे को भी कविता टाइप कुछ-कुछ सूझने लगता है। ..... बात का खुलासा, कभी सतीश सत्यार्थी जी की पोस्ट पर टिप्पणी करते पटना याद आया। राजू रंजन जी की 'गंगा, गंगा-स्नान और भारतीय संस्कृति' की मेरी टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि इस विषय (गंगा) पर मेरे पास जो कुछ है, उसे लिखूं। इस मुश्किल का हल सूझा कि अपनी टिप्पणी के अगल-बगल भटक कर राह तलाश करूं। इस तरह गंगा के पास से गुजरते, अपना विद्वत्ता-भ्रम सुरक्षित रखते, राजू जी के सदाशय-सुझाव का अनुपालन संभव होगा। ..... आकाशवाणी से फरमाइशी फिल्मी नग्मे।

'फिल्मी' इस पोस्ट में कोई चित्र नहीं है। तस्वीरें, कई बार लगता है कि कल्पना को दिशा देते हुए, उसे सीमित करने लगती हैं, रंगों को फीका कर देती हैं। ..... संदर्भ तलाशने के दबाव से मुक्त रह कर कुछ लिखने का इरादा होता था, डायरी जैसा, सो यह उपयुक्त लगा। ..... पटना से संबंधित बृजकिशोर प्रसाद जी ने इसे पढ़ा, पोस्ट के लायक माना, उनका भी आभार।

(पटना साहिब, बाबा मुराद शाह, दानापुर, बेउर, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, दिनकर, शत्रुघन सिन्हा  और अफीम वाली चटाई के साथ यादों की छान-बीन में कुछ और मिल सका तो वह सब किसी अगली पोस्ट के लिए)

Friday, October 8, 2010

बिटिया


किसी पेड़ की इक डाली को,
नव जीवन का सुख देने
नव प्रभात की किरणों को ले,
खुशियों से आंचल भर देने
दूर किसी परियों के गढ़ से, नव कोंपल बन आई बिटिया।
सबके मन को भायी बिटिया, अच्छी प्यारी सुन्दर बिटिया॥

आंगन में गूंजे किलकारी,
जैसे सात सुरों का संगम
रोना भी उसका मन भाये,
पर हो जाती हैं, आंखें नम
इतराना इठलाना उसका,
मन को मेरे भाता है
हर पीड़ा को भूल मेरा मन,
नए तराने गाता है
जीवन के बेसुरे ताल में, राग भैरवी लायी बिटिया।
सप्त सुरों का लिए सहारा, गीत नया कोई गाई बिटिया॥

बस्ते का वह बोझ उठा,
कांधे पर पढ़ने जाती है
शाम पहुंचती जब घर हमको,
आंख बिछाए पाती है
धीरे-धीरे तुतलाकर वह,
बात सभी बतलाती है
राम रहीम गुरु ईसा के,
रिश्‍ते वह समझाती है
कभी ज्ञान की बातें करती, कभी शरारत करती बिटिया।
एक मधुर मुस्कान दिखाकर हर पीड़ा को हरती बिटिया॥

सुख और दुख जीवन में आते,
कभी हंसाते कभी रुलाते
सुख को तो हम बांट भी लेते,
दुख जाने क्यूं बांट न पाते
अंतर्मन के इक कोने में,
टीस कभी रह जाती है
मैं ना जिसे बता पाता हूं,
ना जुबान कह पाती है।
होते सब दुख दूर तभी, जब माथा सहलाती बिटिया।
जोश नया भर जाता मन में, जब धीमे मुस्काती बिटिया॥

लोग मूर्ख जो मासूमों से,
भेदभाव कोई करते हैं
जिम्मेदारी से बचने को
कई बहाने रचते हैं
बेटा-बेटी दिल के टुकड़े,
इक प्यारी इक प्यारा है
बेटा-बेटी एक समान,
हमने पाया नारा है
घर की बगिया में जो महके, सुन्दर कोमल फूल है बिटिया।
पाप भगाने तीरथ ना जा, सब तीरथ का मूल है बिटिया॥

मान मेरा सम्मान है बिटिया, अब मेरी पहचान है बिटिया।
ना मानो तो आ कर देखो, मां-पापा की जान है बिटिया॥
मेरी बिटिया सुन्दर बिटिया,
मेरी बिटिया प्यारी बिटिया॥

कई क्षेत्रों में सक्रिय जयप्रकाश त्रिपाठी जी (+919300925397) स्टेट बैंक से जुड़े हैं, यह 'बिटिया' उनकी रचना है। बहुमुखी जयप्रकाश जी की प्रतिभा के अन्य रूपों को अच्छी तरह पहचान पाने में मेरी रूचि-सीमा आड़े आती रहती है। लेकिन पद्य पढ़ने से बचने वाला मैं, उनकी यह कविता बार-बार पढ़ता हूं। 'बिटिया' की वेब पर विदाई के लिए उन्होंने सहमति दी, उनका आभार।

नाम-लेवा पानी-देवाः

पुंसंतति के लिए कहा जाता है कि कोई तो होना चाहिए नाम-लेवा पानी-देवा जिससे वंश चले, आशय तर्पण से होता है, लेकिन पुत्री द्वारा मुखाग्नि और श्राद्ध-तर्पण की खबरें भी आजकल मिलने लगी हैं। बात आती है नाम-लेवा की तो कहा जाता है-
'नाम कमावै काम से, सुनो सयाने लोय। मीरा सुत जायो नहीं, शिष्‍य न मूड़ा कोय।'

बिलासपुर का एक किस्सा भी याद आ रहा है। मैंने सचाई तहकीकात नहीं की, किस्सा जो ठहरा। न सबूत, न बयान, कोई साखी-गवाही भी नहीं। आप भी बस पढ़-गुन लीजिए। तो हुआ कुछ यूं कि एक थे वकील साहब, खानदानी। अंगरेजों का जमाना। सिविल लाइन निवासी इक्के-दुक्के नेटिव। हर काम कानून से करने वाले और कानून से हर कुछ संभव कर लेने वाले। कहा तो यह भी जाता है कि उनकी जिरह-पैरवी सुन जज भी घबरा जाते थे। फिर मामला कोई भी हो, मुकदमा हारें उनके दुश्‍मन।

उच्च कुल के इन वकील साहब को कुल जमा एक ही पुत्री नसीब हुई। इंसान का क्या वश, यह फैसला तो ऊपर वाले का था। वंश परम्परा के रक्षक, पुश्‍तैनी वकील ने बेटे-बेटी में कोई फर्क न समझा। बिटिया को भी वकालत पढ़ाया। बिटिया काम में हाथ बंटाने लगी। कानून की किताबें, केस ब्रीफ और कागजात सहेजने लगी। वकील साहब निश्चिंत।

चिंता हुई, जब पत्नी ने बिटिया के हाथ पीले कर, उसे विदा करने का जिक्र छेड़ा। वकील साहब सन्न। किताबों की ओर देखने लगे इनका क्या होगा, मुवक्किल कहां जाएंगे, यह तो कभी सोचा ही नहीं। पति की चुप्पी भांपते हुए पत्नी तुरंत आगे बढ़ी, बोली बाकी तो जो रामजी की मरजी, लेकिन आप तो कोट-कछेरी में ही रमे रहे, कभी सोचा, कुल-खानदान का क्या होगा, वंश कैसे चलेगा। वकील साहब ने फिर किताबों की आलमारी की तरफ देखा और अब आसीन हो गए अपनी स्प्रिंग-गद्दे वाली झूलने वाली कुरसी पर। कुछ लिखते, कुछ पढ़ते, कुछ सोचते, झूलते-झालते रात बीत गई। ऐसा केस तो कभी नहीं आया था। लेकिन मामला कोई भी हो, आदमी हल तो अपनी विधा में ही खोजता है। उन्होंने वंश चलाने का रास्ता तलाश ही लिया, विधि-सम्मत।

सुयोग्य वर की तलाश होने लगी। पात्र मिल गया। वकील साहब ने होने वाले समधी से शर्त रखी कि वे भावी दामाद को न सिर्फ बेटा मानेंगे, बल्कि गोद ले लेंगे और अपनी बिटिया को उन्हें गोद देंगे। रिश्‍ता पक्का हुआ। गोदनामा बना, बाकायदा रजिस्टर भी हुआ। बस फिर क्या देर थी, चट मंगनी पट ब्याह। वकील साहब अपनी बेटी को बहू बनाकर, विदा करा अपनी ड्‌योढ़ी में ले आए। घर-आंगन खुशियों से भर गया.....जैसे उनके दिन फिरे .....या जैसे उन्होंने अपने दिन फेरे। वकील साहब का वंश चल रहा है, चलता रहे, 'आचन्द्रार्क तारकाः.....। अब आप ही बताइये, बेटी ही तो मां है, कौन सा वंश है जो बिना मां के चलता है और कौन कहेगा कि बेटी से वंश का नाम नहीं चल सकता।

आज नवरात्रि का आरंभ। या देवि सर्व भूतेषु .....

यह पोस्‍ट तैयार करते हुए मीरा वाली पंक्तियां ठीक याद नहीं कर सका था। यह भी याद नहीं आ रहा था कि यह कब और कहां पढ़ा-सुना। पोस्‍ट लगा दी फिर भी राजस्‍थान के और हिन्‍दी साहित्‍य वाले परिचितों को टटोलता रहा। 8 जनवरी 2011 को कवि उपन्‍यासकार विनोद कुमार शुक्‍ल जी पर केन्द्रित आयोजन में प्रो. पुरुषोत्‍तम अग्रवाल जी रायपुर आए मैंने चान्‍स लिया, उन्‍होंने तुरंत बताया और यह भी जोड़ा कि ये उनकी पसंद की पंक्तियां हैं। सो, अब सुधार दिया है।